Bhojpuri Actor Sanju Solanki. Bhojpuri Cinema में हीरो की एंट्री पर तालियां बजती हैं, लेकिन कहानी में उस हीरो को चुनौती देने वाला विलेन भी कम अहम नहीं होता. विलेन जितना दमदार होगा, हीरो की जीत का असर भी उतना ही गहरा होगा.

एक्टर संजू सोलंकी भोजपुरी फिल्मों में नैगेटिव किरदारों से अपनी पहचान बनाने में कामयाब रहे हैं. पवन सिंह, खेसारीलाल यादव और दिनेशलाल यादव ‘निरहुआ’ जैसे चर्चित कलाकारों के साथ काम कर चुके संजू सोलंकी के लिए अब चुनौती सिर्फ फिल्मों में काम करना नहीं, बल्कि अपनी अलग पहचान को बनाए रखना भी है.

फिल्म ‘दर्पण झूठ न बोले’ के सैट पर संजू सोलंकी से मुलाकात हुई, तो उन के फिल्मी सफर, विलेन की छवि, भोजपुरी सिनेमा की चुनौतियों और भविष्य की योजनाओं पर लंबी बातचीत हुई. पेश हैं, उसी के खास अंश :

भोजपुरी फिल्मों में विलेन का चेहरा बनना आसान है, लेकिन उस छवि से बाहर निकलना कितना मुश्किल है?

एक कलाकार की असली परीक्षा यही है कि वह उस छवि को तोड़ कर खुद को दूसरे किरदारों में भी साबित करे. मैं विलेन के रोल को अपनी कमजोरी नहीं, ताकत मानता हूं. हां, मैं चाहता हूं कि दर्शक मेरे दूसरी तरह के किरदारों को भी उसी नजरिए से देखें और मेरी एक्टिंग के अलगअलग रंगों को पहचानें.

फिल्मों में हीरो को तालियां मिलती हैं, विलेन को गालियां. क्या विलेन को उस की एक्टिंग का पूरा क्रेडिट मिल पाता है?

सिनेमाघरों में दर्शक जब विलेन को देख कर गुस्सा होते हैं, तो यह भी कलाकार की एक्टिंग की कामयाबी है. लेकिन फिल्म की कामयाबी का क्रेडिट सिर्फ हीरो को देना ठीक नहीं है. कहानी, निर्देशन, खलनायक, कौमेडियन और दूसरे कलाकार… सब मिल कर फिल्म को असरदार बनाते हैं. मेरा मानना है कि अच्छे काम की पहचान होनी चाहिए, चाहे कलाकार हीरो हो या विलेन.

आप ने पवन सिंह, खेसारीलाल यादव और दिनेशलाल यादव ‘निरहुआ’ जैसे बड़े कलाकारों के साथ काम किया है. उन सब से बड़ी सीख क्या मिली?

बड़े कलाकारों के साथ काम करने से मुझे सैट पर अनुशासन, कैमरे के सामने आत्मविश्वास और अपने किरदार के प्रति जिम्मेदारी जैसी बातें सीखने को मिलती हैं. हर कलाकार का काम करने का अपना तरीका होता है. मैं कोशिश करता हूं कि अपने सीन को बेहतर बनाऊं, सामने वाले कलाकार की अदायगी को समझ और पूरी टीम के साथ तालमेल बना कर काम करूं. मेरे लिए हर फिल्म सीखने का एक नया मौका है.

क्या नैगेटिव रोल मिलने पर कलाकार को अपनी पसंद का किरदार चुनने की आजादी कम हो जाती है?

जब किसी कलाकार की पहचान एक खास तरह के रोल से बन जाती है, तो निर्माता भी उसे उसी तरह के किरदारों में देखने लगते हैं. लेकिन कलाकार को अपनी एक्टिंग दिखाने के मौके तलाशते रहना चाहिए. मैं ऐसा किरदार करता रहा हूं जिस में सिर्फ गुस्सा, मारपीट या धमकी न हो कर उस के पीछे कोई सोच, भावना और कहानी भी होती है. मेरे कई ऐसे यादगार रोल है जो दर्शकों के जेहन में आज भी बने हुए हैं.

आप के हिसाब से एक अच्छा विलेन कैसा होना चाहिए? जो सिर्फ डराए या जिस की अपनी कहानी भी हो?

मेरे हिसाब से अच्छा विलेन वही है, जिस के किरदार में गहराई हो. सिर्फ ऊंची आवाज में बोलना या खतरनाक चेहरा बनाना एक्टिंग नहीं है. उस के बरताव, संवाद और फैसलों के पीछे कोई वजह होनी चाहिए. अगर दर्शक उस किरदार से नफरत करते हुए भी उसे याद रखें, तो कलाकार ने अपना काम किया. मैं भी ऐसे किरदार करता हूं, जिन की छाप फिल्म खत्म होने के बाद तक बनी रहती है.

क्या आप सिर्फ वही नैगेटिव किरदार को तरजीह देते हैं या जिन में गालीगलौज और मारपीट होती है या किरदार की कोई सीमा भी तय करते हैं?

मेरे लिए सब से जरूरी है कि किरदार कहानी में क्या योगदान दे रहा है. अगर कोई सीन सिर्फ चौंकाने के लिए रखा गया है और कहानी में उस का कोई मतलब नहीं है, तो उस किरदार को करने से मै इनकार कर देता हूं. मैं ऐसे किरदार को तरजीह देता हूं जिन में एक्टिंग की गुंजाइश हो और जिन का कहानी में मजबूत आधार हो.

‘दर्पण झूठ न बोले’ आप के लिए किस तरह की फिल्म है? क्या दर्शकों को इस में आप का कोई अलग रूप देखने को मिलेगा?

हर फिल्म कलाकार के लिए एक नया अनुभव होती है. ‘दर्पण ?ाठ न बोले’ भी मेरे लिए अहम है. मैं चाहता हूं कि दर्शक फिल्म देखते समय मेरे किरदार को उस की कहानी के संदर्भ में सम?ों. इस में मेरा किरदार किस तरह का है और वह कहानी में क्या भूमिका निभाता है, इस बारे में फिल्म से जुड़ी सही जानकारी के आधार पर ही बात करना बेहतर होगा. मेरी कोशिश रहती है कि जो भी किरदार करूं, उसे पूरी ईमानदारी से निभाऊं.

आज की नौजवान पीढ़ी सोशल मीडिया पर रील बनाने से ले कर एक्टर बनने तक का सपना देखती है. इस को ले कर आप का क्या नजरिया है?

सोशल मीडिया से एक्टर नहीं बना जा सकता है. अगर ऐसा होता, तो घरघर में एक्टर ही पैदा होने लगेंगे. एक्टर बनने के लिए कड़ी मेहनत और एक्टिंग की बारीकियां सीखने की जरूरत होती है.

आप ने ‘सरस सलिल’ पत्रिका को कब पढ़ना शुरू किया था?

मैं ‘सरस सलिल’ पत्रिका को पहले अंक से ही पढ़ता रहा हूं. चाहे बस स्टैंड हो या रेलवे स्टेशन, यह हर जगह मिल जाया करती थी, इसलिए इस के किसी भी अंक को मैं पढ़ना मिस नहीं करता था. मुझे खुशी है कि अयोध्या में हुए ‘5वें सरस सलिल भोजपुरी सिने अवार्ड’ शो में मुझे ‘बैस्ट कैरेक्टर एक्टर’ के अवार्ड से नवाजा गया था. Bhojpuri Actor Sanju Solanki

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