Bollywood. हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में जब भी ‘स्टार पावर’ और ‘कामयाबी’ की बात आती है, तो पीआर (पब्लिक रिलेशंस) की मशीनरी द्वारा सब से पहले आलिया भट्ट का नाम परोसा जाता है.
यह कड़वा सच है कि आलिया भट्ट अपनी एक्टिंग की बदौलत नहीं बल्कि पीआर मशीनरी की बदौलत ही स्टार बनी हुई हैं. इस के अलावा वे महेश भट्ट की बेटी जरूर हैं, मगर उन पर वरदहस्त ‘नैपोकिड के पालनहार’ कहे जाने वाले करन जौहर का है.
करन जौहर और पीआर मशीनरी आलिया भट्ट के इंडस्ट्री की ‘नंबर वन’ और ‘सुपरस्टार’ एक्ट्रैस का ढोलनगाड़ा बजाती रहती है, लेकिन अहम सवाल तो यही है कि क्या वाकई आलिया की यह चमक उतनी ही असली है, जितनी दिखाई जाती है या फिर इस चकाचौंध के पीछे फ्लौप फिल्मों की लंबी फेहरिस्त, बौक्स औफिस के डगमगाते आंकड़े और एक नैपोकिड को जबरन महान बनाने की कोशिश छिपी है?
हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में कुछ सितारों को अपनी पहचान बनाने के लिए सालों तक छोटेमोटे किरदार निभाने पड़ते हैं. औडिशन पर आडिशन देते हुए रिजैक्शन झेलने पड़ते हैं और कई बार तो एक फिल्म मिलने के लिए भी लंबा इंतजार करना पड़ता है. दूसरी तरफ कुछ सितारों की शुरुआत ही ऐसी होती है कि उन्हें पहली फिल्म में बड़े निर्माता, मशहूर निर्देशक और शानदार प्रचार मिल जाता है.
आलिया भट्ट दूसरी श्रेणी में आती हैं. महेश भट्ट और सोनी राजदान की बेटी आलिया ने 2012 में करन जौहर की फिल्म ‘स्टूडैंट औफ द ईयर’ से बतौर लीड हीरोइन शुरुआत की. शुरुआत से ही उन के पास वह मंच था, जिस का सपना हजारों नए कलाकार देखते हैं. इसे उन की गलती नहीं कहा जा सकता, लेकिन इस सुविधा को नजरअंदाज कर के उन की कामयाबी की कहानी सुनाना भी गलत ही होगा.
एक्टिंग कैरियर या बेहतरीन मौकों की मलाई
सच यही है कि पीआर मशीनरी और तथाकथित समोसा क्रिटिक्स हर फिल्म के रिलीज के बाद आलिया भट्ट की एक्टिंग को ‘असाधारण’ या ‘अद्वितीय’ बताते रहते हैं, लेकिन अगर गहराई से देखा जाए, तो उन का अभी तक का पूरा कैरियर ‘गौडफादर’ करन जौहर और सही समय पर बेहतरीन स्क्रिप्ट्स के मिलने का नतीजा है.
फिर चाहे 2014 की इम्तियाज अली निर्देशित फिल्म ‘हाईवे’ हो या 2016 मे रिलीज हुई अभिषेक चौबे की फिल्म ‘उड़ता पंजाब’ या 2018 में रिलीज हुई ‘राजी’ जैसी फिल्मों में उन की एक्टिंग की तारीफ हुई.
माना कि ‘हाईवे’ में वीरा के किरदार ने दिखाया कि आलिया भट्ट ग्लैमरस किरदारों से आगे जा सकती हैं. ‘उड़ता पंजाब’ में उन का प्रदर्शन असरदार रहा. ‘डियर जिंदगी’ में उन्होंने भावनात्मक उलझनों से गुजरती एक लड़की को सहजता से निभाया. ‘राजी’ में एक जासूस के रूप में उन की एक्टिंग ने उन के कैरियर को नई ऊंचाई दी. ‘गली बौय’ में भी उन्होंने सीमित समय में अपनी छाप छोड़ी. ‘2 स्टेट्स’ और ‘हंप्टी शर्मा की दुलहनिया’ जैसी फिल्मों ने उन्हें व्यावसायिक रूप से उपयोगी स्टार बनाया.
‘कपूर एंड सन्स’, ‘डियर जिंदगी’, ‘राजी’ और ‘गली बौय’ ने आलिया भट्ट की छवि को केवल रोमांटिक फिल्मों वाली हीरोइन तक सीमित नहीं रहने दिया. लेकिन कड़वी सच्चाई यह है कि इन फिल्मों का कंटैंट और निर्देशन इतना मजबूत था कि कोई भी औसत दर्जे की अदाकारा भी इस में चमक जाती.
आलिया भट्ट की एक्टिंग की सब से बड़ी कमजोरी यह है कि वे हर गंभीर किरदार में एक ही तरह से नजर आती हैं, एक ही तरह से रिएक्ट करती रहती हैं. एक ही तरीके से चीखनाचिल्लाना, नाक सिकोड़ना और रोते हुए कांपती आवाज. आप याद करें ‘राजी’ की सहमत को या ‘गंगूबाई काठियावाड़ी’ की गंगू को… इन किरदारों में आलिया भट्ट की एक्टिंग में ठहराव की कमी और बनावटीपन को अहसास किया जा सकता है.
बौक्स औफिस का सच
आलिया भट्ट के पास एक ऐसी ताकतबर पीआर टीम है, जो हर बार उन्हें ‘गारंटीड बौक्स औफिस क्वीन’ के रूप में बेचती है, जबकि बौक्स औफिस आंकड़े तो दूसरी कहानी बयां करते हैं. 2012 से 2026 तक के उन के कैरियर में हिट फिल्मों से ज्यादा फ्लौप और औसत फिल्मों का अंबार है, जिसे चालाकी से छिपाया जाता है.
2015 में विकास बहल के निर्देशन में बनी फिल्म ‘शानदार’ में आलिया भट्ट व शाहिद कपूर की जोड़ी थी, जिस ने बौक्स औफिस पर महज 39.48 करोड़ रुपए का लाइफटाइम कलैक्शन किया और बुरी तरह फ्लौप रही.
2019 में रिलीज फिल्म ‘कलंक’ का लाइफटाइम कलैक्शन महज 46.31 करोड़ रुपए रहा, जबकि इस फिल्म का बजट 130 करोड़ रुपए था, इसलिए इसे बहुत बड़ी फ्लौप फिल्म माना गया.
2020 में ‘सड़क 2’ को थिएटर्स नसीब नहीं हुए, तब इसे मजबूरन ओटीटी पर रिलीज कर दिया गया. पर फिल्म क्रिटिक्स व दर्शकों ने इस फिल्म को सिरे से खारिज कर दिया. इस के बाद भी ‘ब्रह्मास्त्र’ समेत उन की कई फिल्में नाकाम होती रहीं.
2026 में रिलीज यशराज फिल्म्स निर्मित फिल्म ‘अल्फा’ से आलिया भट्ट को बहुत उम्मीदें थीं, लेकिन 150 करोड़ रुपए के बजट वाली यह फिल्म फिल्म बौक्स औफिस पर केवल 57.72 करोड़ रुपए ही कमा सकी और सुपर फ्लौप साबित हुई.
इतना ही नहीं, भारीभरकम बजट वाली संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘गंगूबाई काठियावाड़ी’ भी औसत रही, लेकिन इसे पीआर मशीनरी ने ऐतिहासिक ब्लौकबस्टर के रूप में प्रचारित किया.
फिल्म निर्माता बनने का अहंकार
एक तरफ आलिया भट्ट की फिल्में बौक्स औफिस पर दम तोड़ रही थीं, तो दूसरी तरफ उन्होंने खुद को महान बताने का एक बड़ा फैसला लिया. वे ‘इटरनल सनशाइन प्रोडक्शंस हाउस’ खोल कर फिल्म निर्माता बन बैठीं. उन का यह फैसला पूरी तरह से एक ‘अहंकारी डिजास्टर’ साबित हुआ.
आलिया भट्ट खुद को केंद्र में रख कर वाहवाही लूटना चाहती थीं, भले ही फिल्म के नाम पर दर्शकों को कचरा परोसा जाए. अफसोस 2022 में बतौर निर्माता अपनी पहली फिल्म ‘डार्लिंग्स’ में घरेलू हिंसा जैसे संवेदनशील मुद्दे का मजाक उड़ाया. थिएटर्स नहीं मिले तो नैटफ्लिक्स पर रिलीज कर दिया. दर्शकों ने इस उबाऊ फिल्म को लात मार दी.
इस के बाद 2024 में आया उन का सब से बड़ा अहंकार ‘जिगरा’. करन जौहर के पैसों और आलिया के प्रोडक्शन के अहंकार ने मिल कर दर्शकों के सामने एक बेतुकी और मैलोड्रामैटिक जेलब्रेक कहानी परोसी, जो बौक्स औफिस पर महज 30.69 करोड़ रुपए पर ढह गई, जबकि इस का बजट 90 करोड़ रुपए से ऊपर था.
टीसीरीज की मालकिन दिव्या खोसला कुमार ने तो उस समय सिनेघर के अंदर के वीडियो बना कर सोशल मीडिया पर वायरल करते हुए कहा था कि ‘जिगरा’ को दर्शक नहीं मिल रहे. आलिया भट्ट अपनी जेब से टिकटें खरीद रही हैं.
इस फिल्म ने इस बात पर मुहर लगा दी कि निर्माता के रूप में आलिया के पास स्क्रिप्ट की कोई समझ नहीं है, उन का प्रोडक्शन हाउस केवल उन की खुद की फ्लौप एक्टिंग को जबरन स्क्रीन पर थोप कर खुद को ‘महान’ साबित करने का एक महंगा खिलौना मात्र है.
अपना हाथ जला चुकी आलिया भट्ट 2026 मे तीसरी फिल्म ‘डोंट बी शाय’ ले कर आईं, पर सीधे ओटीटी पर. लेकिन इसे भी दर्शक नहीं मिल रहे.
करन जौहर और आलिया भट्ट का सिंडिकेट
हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में करन जौहर और आलिया भट्ट के रिश्ते को अकसर ‘बापबेटी’ या ‘गुरुशिष्या’ का रूप दिया जाता है, लेकिन अगर परदे के पीछे की सच्चाई देखें तो इसे सब से क्रूर और अनैतिक ‘नैपोटिज्म सिंडिकेट’ की संज्ञा दी जा सकती है. यह कोई साधारण रिश्ता नहीं है, बल्कि एक ऐसा गैंग है जो बाहरी टैलेंट का गला घोंट कर केवल आलिया भट्ट को नंबर वन बनाए रखने की साजिशें रचता है.
करन जौहर ने इंडस्ट्री में एक ऐसी तानाशाही चला रखी है, जिस के तहत आलिया को हर बड़ी फिल्म, हर बड़ा ब्रांड और हर बड़ा प्रोजैक्ट थाली में सजा कर दिया जाता है, भले ही इस के लिए किसी ज्यादा काबिल आउटसाइडर लड़की का हक ही क्यों न मारना पड़े.
जब भी आलिया भट्ट की ‘अल्फा’ या ‘जिगरा’ सहित कोई भी फिल्म बौक्स औफिस पर औंधे मुंह गिरती है, तब तुरंत आलिया भट्ट की ही नहीं, करन जौहर की भी पूरी पीआर मशीनरी सक्रिय हो जाती है.
करन जौहर खुद सोशल मीडिया पर आ कर दर्शकों को ‘मूर्ख’ और क्रिटिक्स को ‘नैगेटिव’ बताने से बाज नहीं आते हैं. मतलब वे अपनी तरफ से आलिया भट्ट की नाकामी पर परदा डालने की पूरी कोशिश करते हैं.
आउटसाइडर्स से क्रूर भेदभाव
करन जौहर और आलिया भट्ट का यह सिंडिकेट सिर्फ फिल्में हथियाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इस का एक बेहद डार्क और घिनौना पहलू है… आउटसाइडर्स (बाहरी कलाकारों) को मानसिक रूप से सताते हुए उन्हें इंडस्ट्री से बाहर का रास्ता दिखाना.
कंगना राणावत ने जब करन जौहर को ‘नैपोटिज्म का फ्लैगबियरर’ कहा था, तो वह कोई हवाहवाई आरोप नहीं था. करन जौहर के ही कार्यक्रम ‘कौफी विद करन’ में सुशांत सिंह को ले कर आलिया ने जो बयान दिया था, वह आउटसाइडर्स को कीड़ामकोड़ा सम?ाने वाली उस गहरी सोच का सुबूत था, जो नैपोगैंग के भीतर कूटकूट कर भरी है.
पुरस्कारों का बाजार
आलिया भट्ट के स्टारडम को बनाए रखने में उन की पीआर मशीनरी के साथ ही ‘पुरस्कारों’ की भी एक भूमिका रही है, लेकिन ये पुरस्कार सदैव विवादों और आलोचनाओं के घेरे में रहे हैं.
सोशल मीडिया पर अकसर ऐसे दावे और गंभीर आरोप लगते रहे हैं कि आलिया भट्ट के लिए अवार्ड्स पहले से ही ‘फिक्स’ या ‘खरीदे’ जाते हैं. फिल्मफेयर जैसे बड़े मंचों पर उन की औसत परफौर्मैंस (जैसे हाल ही में फिल्म ‘जिगरा’ के लिए बैस्ट एक्ट्रैस का अवार्ड) को भी जब सम्मानित किया गया, तो सिर्फ बौलीवुड ही नहीं दर्शक व आलिया के फैन्स भी हैरान रह गए.
आलोचकों का साफ कहना है
कि जहां अन्य गैरफिल्म बैकग्राउंड की हीरोइन अपने खूनपसीने से बेहतरीन एक्टिंग करती हैं, वहीं आलिया भट्ट को उन के मजबूत बैकग्राउंड और लौबिंग के दम पर पुरस्कार थाली में सजा कर दे दिए जाते हैं.
हाल ही में हुए एक बड़े स्क्रीन अवार्ड्स शो में जब आलिया भट्ट को होस्टिंग का जिम्मा दिया गया, तो उन के फ्लैट जोक्स और खराब टाइमिंग के कारण दर्शकों ने उन्हें ‘क्रिंज’ कह कर बुरी तरह ट्रोल कर दिया.
शादी और बेटी का जन्म
आलिया भट्ट ने अपनी जिंदगी में एक सही फैसला तब लिया जब उन्होंने 29 साल की उम्र यानी कि साल 2022 में कपूर खानदान के चिराग व हीरो रणबीर कपूर से शादी कर ली और साल 2022 में ही नवंबर महीने में वे राहा की मां भी बन गईं.
आमतौर पर किसी भी महिला के लिए यह जिंदगी का सब से खूबसूरत और निजी पल होता है, लेकिन हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के इस सब से बड़े पीआर कपल के लिए यह एक बेहतरीन ‘मार्केटिंग और ब्रांडिंग’ का जरीया बन गया.
शादी के तुरंत बाद से ही आलिया भट्ट और रणबीर कपूर की निजी जिंदगी को मीडिया में इस तरह बेचा गया जैसे कोई फिल्म प्रमोट हो रही हो. बेटी राहा के जन्म के बाद तो जैसे पीआर मशीनरी को एक नया कंटैंट मिल गया. एयरपोर्ट लुक्स से ले कर ‘संडे ब्रंच’ तक, हर जगह बच्चे को कैमरे के सामने इस तरह पेश किया जाता है, ताकि आलिया भट्ट की ‘सुपरमौम’ वाली छवि को चमकाया जा सके.
पर आलिया के फैंस भी समझदार हैं. उन्हें पता है कि इस शादी और मातृत्व का उपयोग आलिया भट्ट के गिरते बौक्स औफिस ग्राफ को संभालने और सोशल मीडिया पर ‘सिम्पैथी और एंगेजमैंट’ बटोरने के लिए एक सुरक्षा कवच के रूप में किया जा रहा है.
यह कितनी बड़ी विडंबना है कि जब फिल्में फ्लौप होने लगती हैं, तो पारिवारिक तसवीरें और क्यूट वीडियो ही स्टारडम को जिंदा रखने का आखिरी सहारा बनते हैं.
‘लव एंड वार’ में रणबीर को लेने का दबाव
संजय लीला भंसाली जैसे निर्देशक के साथ बौक्स औफिस पर औसत कमाई करने वाली फिल्म ‘गंगूबाई काठियावाड़ी’ करने के बाद आलिया भट्ट के हौसले सातवें आसमान पर पहुंच गए.
संजय लीला भंसाली की अगली बड़ी फिल्म ‘लव एंड वार’ 2 साल से भी ज्यादा समय से बन रही है. इस फिल्म के बारे में हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के गलियारों से जो खबरें छनछन कर बाहर आईं, वे आलिया के बढ़ते दखल और अनप्रोफैशनल रवैए को उजागर करती हैं.
खबरों के मुताबिक, आलिया भट्ट ने इस फिल्म में अपने पति रणबीर कपूर को लीड एक्टर के तौर पर लेने के लिए संजय लीला भंसाली पर भारी दबाव बनाया. सवाल यह उठता है कि क्या एक निर्देशक की फिल्म में कलाकार का चयन फिल्म की स्क्रिप्ट व किरदार की मांग के आधार पर होना चाहिए या किसी हीरोइन की वैवाहिक इच्छा के आधार पर?
आलिया भट्ट का यह दबाव पूरी तरह से गलत और अनुचित ही माना जा रहा है. संजय लीला भंसाली की चुप्पी भी लोगों की समझ से बाहर है. हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का एक तबका इसे नैपोटिज्म और पावरप्ले का सब से भद्दा रूप मानता है, जबकि एक तबका मानता है कि संजय लीला भंसाली ने अपनी क्रिएटिविटी के साथ समझोता किया है.
संजय लीला भंसाली अपनी फिल्मों में किरदारों की गहराई के लिए जाने जाते हैं. दर्शक रणबीर कपूर और आलिया भट्ट की जोड़ी को सुपर फ्लौप फिल्म ‘ब्रह्मास्त्र’ में देख चुके हैं और औनस्क्रीन उन की कैमिस्ट्री बेहद ठंडी और बेजान लगी थी. इसी वजह से करन जौहर 4 साल के बाद भी ‘ब्रह्मास्त्र 2’ शुरू करने की हिम्मत नहीं जुटा पाए.
रीयललाइफ कपल को जबरन स्क्रीन पर बारबार दिखाना दर्शकों के सब्र का इम्तिहान लेना है. आलिया भट्ट का यह रवैया दिखाता है कि वे अपनी स्टार पावर का इस्तेमाल सिनेमा को बेहतर बनाने के लिए नहीं, बल्कि अपने पारिवारिक साम्राज्य को मजबूत करने के लिए कर रही हैं.
आने वाली फिल्में
आलिया भट्ट की बड़ी आने वाली फिल्मों में संजय लीला भंसाली की ‘लव एंड वार’ ही है, जिस की रिलीज की तारीख 3 बार बदली जा चुकी है. अब इस फिल्म को 2027 में रिलीज करने की बात कही जा रही है.
इस फिल्म में एक त्रिकोणीय प्रेम कहानी है, जिस में आलिया भट्ट का किरदार सेना के 2 अफसरों के बीच फंसी महिला का है. फिल्म में उन के साथ उन के पति रणबीर कपूर और विक्की कौशल हैं.
चूंकि दर्शक रणबीरआलिया की औनस्क्रीन जोड़ी से पहले ही ऊब चुके हैं, इस फिल्म की पूरी कामयाबी विक्की कौशल की एक्टिंग और संजय लीला भंसाली के भव्य निर्देशन पर निर्भर करेगी. आलिया भट्ट के लिए यहां अपने दम पर दर्शकों को खींचना नामुमकिन होगा.
खोखले स्टारडम की ढलती शाम
कुलमिला कर आलिया भट्ट का कैरियर इस बात का जीताजागता उदाहरण है कि किस तरह बिना किसी ठोस और लगातार बौक्स औफिस की कामयाबी के भी, केवल बेहतरीन पीआर, गौडफादर के सपोर्ट और मीडिया हाइप के जरीए किसी भी कलाकार को ‘सुपरस्टार’ के सिंहासन पर बिठाया जा सकता है.
पर लगातार मिल रही नाकामियों ने आलिया भट्ट के इस खोखले स्टारडम की कलई खोल कर रख दी है. दर्शक अब समझदार हो चुके हैं. उन्हें नैपोटिज्म की मलाई और पीआर का ओवरडोज समझ में आता है.
अगर आलिया भट्ट ने अभी भी अपनी एक्टिंग के घिसेपिटे तौरतरीकों को नहीं बदला, फिल्मों के चयन में अपने अहंकार को दूर नहीं रखा और निर्देशकों के काम में दखल देना बंद नहीं किया, तो वह दिन दूर नहीं जब उन का यह चमकीला महल ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगा. Bollywood




