Story. उस की उम्र 19 साल के आसपास रही होगी. वह 8वीं जमात पास था. रंग सांवला और रंग के हिसाब से ही नाम भी था श्याम. परिवार में वह और उस की बूढ़ी मां ही थे.

सिर से पिता का साया उठ जाने से श्याम को अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी थी और जुट गया था पेट भरने के जुगाड़ में. किसी तरह एक सेठ के यहां उसे नौकरी भी मिल गई.

श्याम के इरादे ऊंचे थे, इसलिए सेठ की नौकरी करतेकरते वह खुद भी अपना कोई कामधंधा शुरू करने के सपने देखा करता था. यही वजह थी कि उस से काम में गलतियां हो जाती थीं और बदले में मिलती थी सेठ की गालियां और कभीकभार 2-4 थप्पड़ भी.

श्याम का मन खिलाफत करने लगता था, खासकर उस समय, जब सेठ उसे किसी दूसरे शख्स के सामने गालियां देता या मारता था.

श्याम का मन करता कि वह भी पलट कर सेठ को गाली दे या मारे और इस नौकरी को लात मार दे, लेकिन तभी उसे अपनी बूढ़ी मां का खयाल आ जाता और वह खून का घूंट पी कर रह जाता था.

श्याम अपनी तनख्वाह से थोड़ाथोड़ा कर के इतने रुपए जमा करना चाहता था कि खुद का कोई कामधंधा आसानी से शुरू किया जा सके.

आखिरकार वह दिन आ ही गया, जब श्याम ने सेठ की नौकरी छोड़ अपने पास जमा हुए पैसे से चश्मे, चाबी के छल्ले और पर्स वगैरह सामान खरीद कर सड़क के किनारे ही अपनी दुकान जमा दी.

वह पहले ग्राहक का इंतजार करने लगा, तभी एक आदमी आया और उस ने सामान की ओर उंगली घुमाते हुए पूछा, ‘‘यह सारा सामान तेरा ही है?’’ ‘‘हां साहब…’’ श्याम ने जवाब दिया.

‘‘क्या नाम है तेरा?’’ यह उस शख्स का दूसरा सवाल था. ‘‘श्याम…’’

‘‘यह ले रसीद और 5 रुपए दे,’’ उस शख्स ने उस के नाम की 5 रुपए की रसीद काट कर उस के हाथ में देते हुए कहा.

‘‘किस बात के?’’ श्याम ने हैरानी से पूछा. ‘‘लगता है, नईनई दुकान खोली है तू ने… सड़क के किनारे दुकान लगा कर बैठने का नगरपालिका को टैक्स देना पड़ता है…’’ उस शख्स ने कहा.

‘‘सड़क के किनारे बैठने का भी टैक्स?’’ श्याम ने हैरानी से पूछा. ‘‘और नहीं तो क्या… नगरपालिका के पास जनसुविधाएं देने के लिए नोट तो छपते नहीं हैं. इन्हीं टैक्सों से तो नगरपालिका से सुविधाएं मिलती हैं…’’ उस शख्स ने समझाना चाहा.

‘‘लेकिन अभी तो मेरी बोहनी भी नहीं हुई है…’’ श्याम ने फौरन टैक्स देने में अपनी मजबूरी जताई. ‘‘तो मैं क्या करूं…’’

‘‘शाम को ले लेना… तब तक मेरी कुछ बिक्री भी हो जाएगी…’’ श्याम ने जवाब दिया. ‘‘ठीक है…’’ एहसान सा जताते हुए वह शख्स बोला, ‘‘अगर शाम को टैक्स नहीं दिया, तो समझ लेना कि कल से तेरी दुकान यहां नहीं लगेगी.’’

उस शख्स के जाने के बाद श्याम सोच में पड़ गया कि नगरपालिका यहां कौन सी सुविधा दे रही है. सड़क के किनारे… साफसफाई भी तो उसे खुद ही करनी पड़ी है. न बिजली की सुविधा है, न पानी की, फिर भी टैक्स चाहिए.

फिर श्याम खुद ही सोचने लगा कि होगा सरकार का कोई कानून… फिर वह रसीद भी तो दे रहा था. वह कोई झूठ थोड़े ही बोल रहा होगा. वैसे भी तो वह सभी को रसीद दे कर पैसे ले रहा था.

यह सब सोच कर श्याम खुद ही बड़बड़ाया, ‘कोई बात नहीं… शाम को आएगा, तो दे दूंगा टैक्स… 5 रुपए की ही तो बात है.’

अभी श्याम यह सब सोच ही रहा था कि एक दूसरे शख्स के शब्दों से उस का ध्यान टूटा, ‘‘ऐ लड़के…’’

श्याम ने पुकारने वाले की ओर देखा, तो सामने पुलिस का दारोगा खड़ा था, जिसे देख कर श्याम अंदर तक सिहर उठा. अब यह भी न जाने क्या कहेगा? शायद टैक्स मांगने वाले ने ही इस को मेरे पास भेजा है, वगैरह सवाल उस के दिमाग में एकसाथ उभर आए.

अपने मन का डर छिपाते हुए श्याम बोला, ‘‘जी साहब…’’ ‘‘जरा यह काला वाला चश्मा तो दिखाना.’’

‘‘जी साहब…’’ श्याम ने खुशी से चश्मा उठाया और कपड़े से पोंछ कर दारोगा के हाथों में थमा दिया.

श्याम खुश हो रहा था कि उस की दुकान खोलने के बाद सब से पहला ग्राहक आया है. दारोगा ने चश्मा आंखों पर लगाया और शीशे में सिर को दाएंबाएं घुमा कर खुद को देखा और मोटरसाइकिल में किक मार कर चलता बना.

श्याम की पैसे मांगने की हिम्मत नहीं हुई थी. उसे अपनी ही कमजोरी पर गुस्सा आने लगा. चेहरा गुस्से से लाल हो गया, लेकिन वह अब कर भी क्या सकता था.

अभी वह इस घटना से उबर भी नहीं पाया था कि तभी उस के पास कई मवाली टाइप लड़के आए. उन में से एक ने पूछा, ‘‘क्यों बे, कब से बैठने लगा है तू यहां?’’ ‘‘आज से ही…’’ श्याम ने सहमी आवाज में कहा.

‘‘और हमें बताया भी नहीं…’’ तभी दूसरा बोला. ‘‘जी…’’ श्याम के मुंह से बोल नहीं निकल पा रहे थे.

‘‘जी के बच्चे… यह राजू दादा का इलाका है, यहां बैठने के लिए पहले राजू दादा की इजाजत लेनी पड़ती है. क्या समझा?’’

‘‘गलती हो गई,’’ श्याम की जैसे हिम्मत लौटने लगी थी, लेकिन अंदर ही अंदर डर रहा था. डरता भी क्यों नहीं… सामने 4-4 हट्टेकट्टे मवाली टाइप लड़के जो खड़े थे.

‘‘ठीक है… जल्दी से हफ्ता निकाल… और फिर कभी ऐसी गलती नहीं करना…’’ उन सब लड़कों का उस्ताद राजू दादा बोला.

‘‘हफ्ता…’’ श्याम को अपने गले में कुछ अटकता हुआ सा लगा, ‘‘कैसा हफ्ता?’’ ‘चटाक… चटाक…’ उस के दोनों गालों पर चारों ने ही अनगिनत थप्पड़ एकदम जड़ दिए. थप्पड़ की मार से श्याम की आंखों से आंसू निकल आए.

‘‘यहां बैठने के किराए को हफ्ता कहते हैं और यह हफ्ता है सौ रुपए… समझा कि नहीं…’’ एक मवाली चिल्लाया.

‘‘लेकिन मेरे पास तो अभी कुछ भी नहीं है…’’ ‘‘झूठ बोलता है… तलाशी लो इस की…’’ राजू दादा बोला. अपने उस्ताद का आदेश सुन कर बाकी तीनों उस की तलाशी लेने लगे, लेकिन जेब में कुछ भी नहीं मिला.

‘‘इस के पास तो कुछ भी नहीं है…’’ एक ने राजू दादा को बताया. ‘‘क्यों बे कंगले… जेब में फूटी कौड़ी भी नहीं है…’’ राजू दादा बोला, ‘‘और दुकान खोलने बैठ गया है राजू दादा के इलाके में…’’

‘‘कल दे दूंगा… अभी तो मेरी बोहनी भी नहीं हुई है…’’ कह कर श्याम ने अपना पीछा छुड़ाना चाहा.

‘‘ठीक है, कल दे देना, नहीं तो अपनी यह दुकान इस इलाके से हटा लेना,’’ फिर राजू दादा आगे बढ़ कर बोला, ‘‘हां, यह चश्मा अच्छा है,’’ और एक चश्मा उठा कर उस ने अपनी आंखों पर लगाया और सभी वहां से चलते बने.

इस बेइज्जती से श्याम का खून खौल उठा. ईमानदारी से चार पैसे कमाना भी आसान नहीं है. एक बड़ा कारोबारी बनने के लिए तो न जाने क्याक्या सहना पड़ता होगा? कभी पुलिस वाले, कभी सरकार का टैक्स और कभी ये मवाली.

इन्हीं सब से निबटने में दोपहर हो चुकी थी, लेकिन ग्राहक के नाम पर कोई नहीं आया, उलटे घाटा हो गया.

कुछ समय पहले की घटनाओं से श्याम ने यह जरूर महसूस किया कि किसी भी तरह की दुकान लगाने से पहले बजट बनाना जरूरी है. किसे कितना टैक्स देना है, किसे कितना हफ्ता देना है वगैरह.

श्याम आगे सोचने लगा कि अगर उस का कुछ भी सामान नहीं बिका, तो वह नगरपालिका वाले को टैक्स कहां से देगा? या कल मवाली फिर आ गए तो… कुछ भी नहीं मिलने पर तो वे उस की दुकान ही उठा कर फेंक देंगे.

यह सोचते ही श्याम एक बार फिर कांप उठा. घर में अगर खाने के लिए कुछ राशन ले कर नहीं गया, तो…

‘‘यह चश्मा कितने का है?’’ सामने खड़े एक ग्राहक ने पूछा. ‘‘जी, 60 रुपए का.’’ ‘‘यह तो तुम बहुत महंगा बता रहे हो.’’ ‘‘चलो साहब, 50 ही दे देना…’’

‘‘अरे, 30 में दो न…’’ ‘‘नहीं साहब, इतने में नहीं पूरा पड़ता…’’ ‘‘देना है तो 30 में दे दो, नहीं तो…’’

‘दुकान खोलने के बाद यही तो पहला असली ग्राहक आया है. अगर इतने में ही बेच दिया, तो मुझे क्या बचेगा? 30 रुपए की तो अपनी ही खरीद है.

‘लेकिन अगर इसे भी नहीं बेचा, तो यह ग्राहक भी हाथ से निकल जाएगा और घर खाली हाथ ही लौटना पड़ेगा. घर में चूल्हा कैसे जलेगा? मैं फिर भी भूखा रह लूंगा, लेकिन मां… बेचारी…’ वह इस से आगे कुछ नहीं सोच सका.

‘‘ठीक है साहब, ये लो 30 रुपए में ही…’’ उस ग्राहक ने 30 रुपए दे कर चश्मा ले लिया और जातेजाते बोला, ‘‘मुझे ज्यादा मोलभाव करने की आदत नहीं है. वैसे बता दूं कि ये 30 रुपए का भी नहीं है, पर मैं ने जो दे दिया, सो दे दिया. यह तो 20 से ज्यादा का नहीं है. दिल्ली में तो 10 का भी महंगा है…’’

ग्राहक के जाते ही एक पुलिस का हवलदार आया और उस ने एक छोटा सा चश्मा उठा कर अपने बच्चे को पहना दिया और बच्चे से पूछा, ‘‘बेटे, कैसा लग रहा है?’’ ‘‘नहीं पापा, नहीं… मुझे तो वह चाहिए…’’

‘‘अच्छा बेटा, वही ले लो…’’ हवलदार ने पहला चश्मा वापस रख दूसरा चश्मा बच्चे को पहना दिया, ‘‘अरे वाह, हमारा बेटा तो इस चश्मे में राजा लग रहा है…’’ फिर वह श्याम से बोला, ‘‘क्यों भाई, यह चश्मा ठीक है या नहीं?’’

‘‘जी साहब, अच्छा लग रहा है…’’ हवलदार ने उस के हाथ में एक 5 रुपए का नोट रखा और चलने लगा. इस बार श्याम से रहा नहीं गया. उस ने रहीसही हिम्मत बटोर कर कह दिया, ‘‘साहब, इतने कम में तो नहीं…’’

‘‘क्या बोला बे…’’ हवलदार कड़क आवाज में बोला, ‘‘अबे रख ले… नहीं तो यह भी नहीं दूंगा… सड़क के किनारे दुकान लगाता है और दाम चाहिए बड़ी दुकान के,’’ फिर उस की ओर आंखें निकालते हुए हवलदार बोला, ‘‘रख ले इसे… लड़का समझ कर दे रहा हूं, वरना हम पुलिस वाले पैसा दे कर कुछ भी नहीं खरीदते… इस के बाद भी ज्यादा चूंचपड़ की, तो फेंक दूंगा तेरा सारा टीनटपरा,’’ कह कर हवलदार चला गया.

शाम होने को आई. पहले ही दिन श्याम का धंधा घाटे का रहा था. जो कुछ भी पैसे सामान बिकने से आए थे, उन में जरूरत का राशनपानी भी मुश्किल से ही आ पाएगा और अगर ये भी मवालियों और सरकारी टैक्स या पुलिस वालों को दे दिया, तो खाएगा क्या?

‘मैं तो एकाध दिन भूखा भी रह लूंगा, लेकिन मां…’ श्याम इस से आगे कुछ भी नहीं सोच पाया.

जब श्याम का दिमाग कुछ शांत हुआ, तो वह सोचने लगा कि इस दुकान से अच्छा तो उस सेठ के यहां ही ठीक था. 4 गाली देता था, 1-2 थप्पड़ मार देता था, फिर भी कम से कम पेटभर रोटी तो मिल जाती थी.

तभी उस ने लाउडस्पीकर पर जोरजोर से होने वाले ऐलान को सुना, ‘सभी दुकानदारों से अनुरोध है कि कल सभी अपनीअपनी दुकानें बंद रखें. बेकारी और गरीबी के विरोध में हमारी पार्टी ने कल शहर बंद का ऐलान किया है. कृपया सभी हमारे इस बंद में मदद करें.’

यह ऐलान सुन कर श्याम के माथे पर चिंता की लकीरें बढ़ गईं. कल बंद में कहां से जुगाड़ करेगा पैसे का?

अभी अपनी मुसीबत का हल मन में तलाश नहीं पाया था कि वे मवाली लड़के फिर से आ गए, ‘‘निकाल हफ्ता. अब तो तेरे पास पैसे आ गए होंगे.’’ ‘‘नहीं हैं…’’ श्याम ने मजबूती से कहा.

‘चटाक…’ एक ने श्याम को थप्पड़ मारा, दूसरे ने लातघूंसों की शुरुआत कर दी. राजू दादा ने दुकान का सारा सामान उठा कर फेंक दिया, जिस में चश्मे, पैन जैसे नाजुक सामान टूट गए.

मवालियों की इस हरकत को देख कर पास ही सड़क पर बैठे दूसरे दुकानदार अपना सामान समेट कर भागने लगे.

पिटने के बाद भी श्याम ने उन मवालियों को हफ्ते के नाम पर कुछ भी नहीं दिया, तभी नगरपालिका का सुबह वाला कर्मचारी टैक्स मांगने आ गया और श्याम के हाथों में रसीद थमा दी, तो गुस्से से उस ने रसीद फाड़ दी. कर्मचारी ने एक भद्दी सी गाली दी और अगले दिन से यहां दुकान नहीं लगाने की धमकी दे कर चला गया.

इन सभी घटनाओं में अंधेरा घिर आया था. श्याम अपना टूटाफूटा और सहीसलामत बचा हुआ सामान उठा कर घर की ओर चल दिया. चलतेचलते वह फैसला ले चुका था कि कल से दोबारा सेठ के यहां ही काम करेगा.  Story

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