आज की घटना पर एक कहानी लिखना चाहता था, जो इस तरह बन सकती थी:

‘‘नाम क्या है?’’ ‘‘सोहन कुमार.’’

‘‘पिता का नाम?’’ ‘‘रमेश रंजन.’’

पूछने वाले शिक्षक मन ही मन कुढ़ गए और सोचा, ‘कुमार, रंजन? नाम से पता ही नहीं चलता कि कौन किस जाति का है. मगर जाति तो जाननी ही पड़ेगी. सूरत तो निचली जाति जैसी लगती है. कुछ और सवाल पूछ कर देखा जाए. कहीं किसी निचली जाति के टोले या स्लम एरिया का ही निकल जाए.’

उन्होंने पूछा, ‘‘कहां रहते हो?’’ ‘‘समस्तीपुर.’’

‘‘यहां कहां रहते हो?’’ ‘‘पिताजी के साथ किराए के मकान में रहता हूं?’’

‘‘पिताजी क्या करते हैं?’’ ‘‘सेठजी के यहां नौकरी.’’

शिक्षक झल्ला उठे. जाति के कीटाणु उन के मन में कुलबुला रहे थे, इसलिए अब उन्होंने सीधे पूछा, ‘‘तुम्हारी जाति क्या है?’’

छात्र इस सवाल से थोड़ा सकपका गया, फिर वह संभल कर बोला, ‘‘सर, जाति जानना जरूरी है क्या?’’

‘‘हां, जरूरी है. रिजर्वेशन जो है.’’ ‘‘मुझे रिजर्वेशन नहीं चाहिए. मैं ने जनरल कोटे में अर्जी दी है.’’

‘‘किस डिवीजन में पास हो?’’ ‘‘फर्स्ट डिवीजन में.’’

‘‘क्या तुम्हारे औनर्स पेपर में 60 फीसदी नंबर हैं?’’ ‘‘जी, 71 फीसदी हैं.’’

शिक्षक का चश्मा नाक के नीचे उतर आया. उन की आंखों में प्यार के बदले शक था. वह छात्र उन के लिए एक पहेली बन गया था. कहीं यह कायस्थ तो नहीं है. लाला लोग भी काले रंग के होते हैं. उन्होंने छात्र को सिर से पैर तक देखा. नहीं, ऐसा नहीं हो सकता. इस के कपड़े तो मजदूरों जैसे हैं.

जब तक यह पहेली सुलझ नहीं जाती, तब तक नामांकन नहीं हो सकता. मगर फौरन इस का कोई उपाय नजर नहीं आता था. आखिर में उन्होंने टालने के खयाल से पूछा, ‘‘तुम किस कालेज से पास हो?’’ ‘‘लोहिया कालेज से.’’

शिक्षक का शक अब सच साबित हो रहा था. उन की बांछें खिल चुकी थीं. डा. राम मनोहर लोहिया के नाम पर बना लोहिया कालेज शहर के जानेमाने कालेजों में से एक था. पर उसे बैकवर्ड तबके के लोगों ने खोला था, इसलिए उस में पढ़ने वाले छात्रों को भी अमूमन उसी नजर से देखा जाता था.

शिक्षक ने अपना चश्मा ठीक करते हुए फैसला सुनाया, ‘‘तुम्हारा दाखिला आज नहीं होगा.’’ ‘‘क्यों नहीं होगा सर?’’

‘‘क्योंकि दूसरे कालेज के छात्रों का नामांकन अभी नहीं हो रहा है.’’ ‘‘फिर कब होगा?’’

‘‘तुम 4 दिनों के बाद आ कर पूछ लेना.’’ इतना सुन कर सोहन ‘ऐडमिशन काउंटर’ से नीचे उतर आया था. शिक्षक अब भी उसे गौर से देख रहे थे. उन्होंने उस का फार्म अलग छांट लिया था.

‘इन को 50 फीसदी रिजर्वेशन भी चाहिए और बाकी सीटों पर भी दावा. चले आते हैं सिर उठाए जनरल कोटे में नामांकन कराने. अरे, रिजर्वेशन है, तो निचली जाति वाले बन कर रहो, जनरल कोटे में आ कर ब्राह्मण क्यों बनते हो?

‘इधर मेधावी और कुलीन भी बने रहो और उधर जात के नाम पर रिजर्वेशन भी लो… दोनों साथसाथ नहीं चलेगा,’ शिक्षक बड़बड़ाए जा रहे थे.

खैरियत थी कि वहां कोई और शिक्षक नहीं था और न ही कोई छात्र. केवल एक चपरासी और 1-2 क्लर्क थे, जो उन्हीं की जाति के थे, वरना ऐसे सांप्रदायिक जहर उगलने वाले और गंदी सोच रखने के लिए उन्हें जरूर कोई टोक देता.

कुछ ही देर में उस दिन का नामांकन बंद हो गया. शिक्षक महोदय का मूड खराब हो चुका था.

ऊंची जाति के उस ऊंचे कालेज में ऊपर से नीचे तक ऊंचे ही लोग थे. वहां पढ़ाईलिखाई का अच्छा बंदोबस्त था. एक से बढ़ कर एक विद्वान शिक्षक थे, इसलिए दूरदराज से छात्र यहां पढ़ने आते थे.

वैसे सरकारी नियम व कानून के मुताबिक पिछले कुछ सालों में काफी बदलाव आ गया था. अब तकरीबन हर तबके के शिक्षक, कर्मचारी और पदाधिकारी वहां काम कर रहे थे. छात्र भी मिलेजुले समुदाय से आ रहे थे. मगर एक ही जाति, वर्ग और विचारधारा के दबदबे की परंपरा वहां अब भी कायम थी.

‘ऐडमिशन इंचार्ज’ बने वे शिक्षक इसी परंपरा की विरासत थे. छात्रों को वे साहित्य और संस्कृति पढ़ाते थे. ‘तुलसी’ और ‘निराला’ के परम भक्त थे. कालेगोरे की पहचान रखते थे. उन का साफसाफ मानना था कि ‘काली पीढ़ी’ या तो ‘ताड़न की अधिकारी’ है या ‘दया’ और ‘करुणा’ की पात्र.

‘दलित जन पर करो करुणा…’ कक्षा में छात्रों के बीच वे उदारता का यही मंत्र जाप करते रहते, मगर ऊंची जाति के दोस्तों के बीच उन का वही सूत्र होता, ‘ढोर, गंवार, शूद्र, पशु, नारी…’ क्लास में तो वे कबीर, सूर और तुलसी के प्रेम और भक्ति के पाठ पढ़ाते, पर दोस्तों के बीच सरकार और व्यवस्था को गालियां देते नहीं थकते.

पहले तो मुसलिमों को ही सिर पर बिठाया था, अब जिसे देखो, वही पीठ पर सवार है. अरे, ऊंची तालीम हासिल करनी हो, तो ऊंचा बनो, मैरिट लाओ. फिर एमए, बीए पास करो. रोकता कौन है? पर दोनों राह से तुम्हीं आओगे, यह न होगा. या तो रिजर्वेशन लो या सारे के सारे मैरिट से आओ.

चौथे दिन जब सोहन नामांकन के लिए आया, तो उन शिक्षक महोदय ने पहचानने से ही मना कर दिया. सोहन ने कई बार अपने परिचय का हवाला दिया,  ‘‘सर, मेरा नाम सोहन है, आप ने मुझे बुलाया था,’’ तब जा कर उन्होंने उस की बात सुनना स्वीकार किया. उन्होंने उसे जानबूझ कर 4 दिनों के बाद बुलाया था, ताकि सामान्य सीटों पर नामांकन खत्म हो जाए.

सोहन की पूरी बात सुन कर उन्होंने बताया, ‘‘मुझे तो याद नहीं कि मैं ने तुम्हें 4 दिनों के बाद बुलाया था. सैकड़ों छात्र आतेजाते रहते हैं. सब की बातें याद रखूंगा, तो पागल हो जाऊंगा. सामान्य सीटों पर तो ऐडमिशन खत्म हो चुका है. रिजर्वेशन की कुछ सीटें बची हैं, अगर तुम उस कोटे में आते हो, तो नामांकन कर सकता हूं.’’

सोहन सालों से इस नामी कालेज में नामांकन कराने का सपना पाले हुआ था. अपने अच्छे अंकों की बदौलत उसे पूरा यकीन था कि यहां उस का नामांकन हो ही जाएगा, पर शिक्षक के इस बरताव से अब नामांकन होने की कम ही उम्मीद थी.

वह दुखी और निराश हो गया, पर उसे नामांकन न होने के दुख से ज्यादा शिक्षक के विश्वासघात का दुख था. उसे शिक्षक नाम से नफरत सी होने लगी थी.

निराश और कातर आवाज में वह बोला, ‘‘सर, मैं रिजर्वेशन के दायरे में जरूर आता हूं, क्योंकि मैं दलित हूं. पर मैं रिजर्वेशन का फायदा ले कर किसी दलित भाई का हक नहीं मारना चाहता.

‘‘मैं ने जाति सर्टिफिकेट भी अभी तक नहीं बनवाया है. आप जानते हैं कि जाति सर्टिफिकेट बनवाना कितना मुश्किल काम है. दफ्तरों में महीनों दौड़ना पड़ता है, तब जा कर वह बनता है.’’

‘‘यह सब मैं नहीं जानता. मुझे तो जो कहना था, कह दिया.’’ ‘‘मेरा नामांकन सामान्य कोटे में क्यों नहीं हो सकता?’’

‘‘कहा न, तुम समय पर नहीं आए. सामान्य सीटें अब भर चुकी हैं.’’ ‘‘सर, कोई उपाय कीजिए. मैं बहुत गरीब लड़का हूं.’’

‘‘उपाय वही है, रिजर्वेशन में जाओ. जाति का सर्टिफिकेट लाओ, नामांकन करा लो.’’ ‘‘लेकिन सर…’’

‘‘मैं कुछ नहीं जानता. अगर ऐसा नहीं कर सकते, तो तुम्हारा नामांकन नहीं हो सकता.’’ ‘‘वह तो आप ने पहले से ही सोच रखा है,’’ सोहन नाराज होते हुए बोला.

‘‘मैं ने क्या सोच रखा है?’’ शिक्षक गुस्से में आ गए. ‘‘यही कि मेरा ऐडमिशन आप किसी भी तरह नहीं करेंगे.’’

‘‘हांहां, सोच रखा है, क्या कर लोगे? तुम जैसे बदमाशों के लिए यहां जगह नहीं है. जहां जाना हो, जाओ.’’

‘‘पहले मैं समय पर नहीं आया. अब बदमाश भी हो गया. अरे, कुछ तो शर्म कीजिए गुरुजी, झूठ पर झूठ बोले जा रहे हैं. एक ऐडमिशन के लिए आप ईमानधर्म भी भूल गए,’’ सोहन अपनी रौ में आ गया था.

‘‘ज्यादा बकबक मत करो, नहीं तो जबान खींच लूंगा,’’ सचाई सुन कर शिक्षक चिल्ला उठे. ‘‘अब दोबारा द्रोणाचार्यों का जमाना गया गुरुजी, जो छल से अंगूठा कटवा लेते हैं.’’

‘‘अरे, कोई है? देखिए, यह लड़का बदतमीजी पर उतर आया है,’’ शिक्षक का चोर मन अंदर से कांप रहा था. वे चिल्लाए जा रहे थे.

तेज आवाज सुन कर वहां कुछ लड़के जमा हो गए थे. उन में से ज्यादातर ऐसे छात्र थे, जिन के अच्छे नंबर रहने पर भी नामांकन नहीं हो सका था.

नामांकन कला में उस्ताद शिक्षक कोई न कोई बहाना बना कर छात्रों को छांट देते और फिर खाली सीटों को पैसे ले कर या चहेते उम्मीदवारों को दाखिला दे देते.

छात्रों की भीड़ बढ़ती ही जा रही थी. शिक्षक ने हालात भांप कर छात्रों को पुचकारना शुरू किया, ‘‘देखिए, आप लोग भी छात्र हैं, शरीफ हैं. आप में से बहुतों का नामांकन नहीं हुआ है, पर चुप हैं. नामांकन के अपने नियमकायदे होते हैं. इस में हम क्या कर सकते हैं? कानून तो हम बनाते नहीं.

‘‘यह लड़का समय पर आया नहीं और अब ऐडमिशन नहीं हुआ, तो बदमाशी पर उतर आया है. द्रोणाचार्य और एकलव्य की बात कर के यहां जातपांत फैलाना चाहता है. पूछिए इस से, यह क्या कर लेगा?’’

ऊंची जाति के छात्रों की हमदर्दी बटोरने और उन्हें सोहन के खिलाफ भड़काने के लिए शिक्षक ने एक और पासा फेंका. मगर छात्र तो छात्र होते हैं. पहली नजर में वे आदर्शवादी ही होते हैं. उन पर ओछी सोच का असर धीरेधीरे होता है, इसलिए कोई कुछ नहीं बोल रहा था.

शिक्षक इसे ‘मौन स्वीकार लक्षणम’ समझ रहे थे. अब वे सोहन की ओर मुड़े और दांत पीसते हुए दहाड़े, मानो खा जाएंगे, ‘‘बोल रे एकलव्य की औलाद, क्या कर लेगा? भीड़ जुटाएगा, मारपीट करेगा. क्या करेगा, बोल?’’

सोहन शांत रहा, मगर शिक्षक उसे बारबार कुरेदे जा रहे थे. ‘‘मुंह पर ताले क्यों पड़ गए? बोल, क्या कर लेगा? गांधीगीरी, धरना, अनशन और क्या?’’

‘‘गांधीगीरी करूंगा,’’ सोहन ने धीरे से कहा. ‘लगे रहो मुन्नाभाई,’ छात्रों ने जोर से नारा लगाया. भीड़ ने सोहन को हाथोंहाथ उठा लिया.

‘गांधीगीरी… जिंदाबाद.’  ‘मुन्नाभाई… जिंदाबाद.’ ‘गुंडागीरी… मुरदाबाद.’

‘ऐडमिशनगीरी नहीं चलेगी, नहीं चलेगी…’ ‘छात्र एकता… जिंदाबाद.’

मजाक, मनोरंजन और कुतूहल में उठा यह नया गांधीवाद छात्रों के बीच असरदार ढंग से उछल आया था. फिल्मी असर था, जिस ने आते ही रंग जमा लिया. किंतु मामला अब गंभीर हो चुका था.

जुलूस और नारों के बीच सोहन प्रिंसिपल के यहां जा रहा था. अब हालात उस के काबू से बाहर थे. खबर पा कर अनेक छात्र नेता भी उस में शामिल हो चुके थे.

छात्र अब सोहन रूपी मुन्नाभाई को ले कर प्रिंसिपल चैंबर के बाहर धरने पर बैठ चुके थे. शांतिपूर्ण धरना, सैकड़ों छात्र चुपचाप बैठे थे. मगर इस चुप्पी में ही शोर समाया हुआ था.

हड़बड़ा कर प्रिंसिपल बाहर निकले. पूछने पर एक लड़के ने पूरी बात बताई. प्रिंसिपल ने समाधान का आश्वासन दिया. मगर लड़कों ने बिना समाधान हुए धरने से उठने का नाम नहीं लिया.

प्रिंसिपल ने तुरंत उस नामांकन प्रभारी शिक्षक को बुलाया और फौरन छात्र के नामांकन का आदेश दिया.

कहानी यहीं खत्म होती है. सचाई यह है कि सोहन की कहानी यहां तक पहुंचती ही नहीं. वह गांधीगीरी जरूर करता है, मगर उसे पकड़ कर प्रिंसिपल के सामने लाया जाता है.

अनेक शिक्षकों के साथ वे नामांकन प्रभारी भी बैठे हैं. सारा दोष उसी पर मढ़ा जाता है. उसे माफी मांगने को मजबूर किया जाता है, नहीं तो कालेज में अशांति फैलाने के जुर्म में उसे जेल भेजने की धमकी दी जाती है.

पुलिस, केस और लड़ाईझगड़े के इस लफड़े में वह अपने गरीब मांबाप को नहीं घसीटना चाहता, इसलिए वह अपने मान, स्वाभिमान और अधिकार को छोड़ कर माफी मांग लेता है. उस का नामांकन हो जाता है.

एकलव्य का अंगूठा एक बार फिर काट लिया जाता है. उस के स्वाभिमान का अंगूठा… उस के अधिकार का अंगूठा… वह दया और सहानुभूति का पात्र बन जाता है. Story

और कहानियां पढ़ने के लिए क्लिक करें...