Hindi Kahani. कमला महाजन अपने बच्चों के साथ अकेली रहती थीं. वे प्राइमरी स्कूल में टीचर थीं. उन के पति दिनेश महाजन तहसीलदार बन कर जब से झाबुआ गए थे, तब से वे अकेली रह गई थीं.
तहसीलदार होने के नाते दिनेश की जिम्मेदारी इतना ज्यादा बढ़ गई थी कि रविवार या छुट्टी वाले दिन भी वे चाह कर मंदसौर नहीं आ सकते थे.
शादी हुए 20 साल गुजर गए थे. शादी के पहले कमला असिस्टैंट टीचर थीं. दिनेश तब तहसील दफ्तर में बाबू थे. कमला की शादी मंदसौर में हुई, जबकि उन का मायका रतलाम में था.
शुरूशुरू में वे रतलाम से मंदसौर अपडाउन कर लेती थीं, मगर जब बेटा पैदा हुआ, तब वे परेशान हुईं, इसलिए जोड़तोड़ कर के उन्होंने अपना तबादला मंदसौर करा लिया. फिर शादी की पटरी पर घर की गाड़ी सही चलने लगी.
इधर दिनेश महाजन का भी सहायक तहसीलदार के पद पर प्रमोशन हो गया. इस तरह उन का पूरा परिवार सैट हो गया. 2 बेटे व एक बेटी के बाद कमला ने परिवार नियोजन करवा लिया.
जब दिनेश महाजन का नायाब तहसीलदार के पद पर प्रमोशन हुआ, तब ऊपरी आमदनी भी बढ़ गई. प्लाट खरीद कर मकान बना लिया.
ऊपरी आमदनी होने के चलते शहर के ज्यादातर लोग दिनेश के दुश्मन बन गए. उन दिनों अविनाश भंडारी, जो नगर के उभरते हुए नेता थे, विधायक के खासमखास थे. एक दिन उन की फाइल दिनेश महाजन ने रोक दी. तब वे दफ्तर में आ कर तैश से बोले, ‘‘महाजनजी, आप ने मेरी फाइल क्यों रोकी?’’
‘‘नियमानुसार उस में वजन नहीं है,’’ दिनेश महाजन ने जवाब दिया. ‘‘ऐसा कहते हुए आप को शर्म नहीं आती,’’ अविनाश भंडारी तैश में बोले.
‘‘ऐसी बात नहीं है…’’ दिनेश महाजन नरम लहजे में बोले.
‘‘बात ऐसी ही है महाजनजी, मैं बहुत दिनों से आप के बारे में यही शिकायत सुन रहा हूं कि आप बिना वजन के फाइल निबटाते नहीं हैं…’’ अविनाश भंडारी बोले, ‘‘आप फाइलों को जबरदस्ती रोकते हैं, फिर उस का तोड़ बिठाते हैं.’’
‘‘यह सरासर गलत है.’’ ‘‘क्या गलत है, क्या सही, इस का तो मेरे पास जवाब है, मगर आप मेरी इस फाइल को निबटा दीजिएगा.’’
‘‘कमी पूरी हो जाएगी, तो फाइल अपनेआप निबट जाएगी.’’ ‘‘क्या अंतिम फैसला है आप का?’’
‘‘हां नेताजी, यह मेरा अंतिम फैसला है?’’ ‘‘तो ठीक है, तुम तबादले के लिए बोरियाबिस्तर बांध लेना,’’ अविनाश भंडारी तैश में आ कर बोले.
‘‘जब आप नेता लोगों का काम नियमानुसार नहीं होता है, तब अफसर को तबादले की धमकी जरूर देते हैं,’’ कहने को दिनेश महाजन ने कह जरूर दिया, मगर भीतर ही भीतर वे पछताए भी कि अगर सच में तबादला कर दिया, तो वे कहीं के नहीं रहेंगे.
उस दिन दिनेश महाजन ने उस नेता से पंगा क्या लिया, वह जान का दुश्मन बन गया और आएदिन उन्हें परेशान करने लगा. वह उन का तबादला भी करवा देता, मगर उन का प्रमोशन जल्दी होने वाला था. आखिर रुक गई उन की फाइल.
दिनेश महाजन ऊपरी कमाई जरूर करते थे, मगर कोई सुबूत नहीं छोड़ते थे, फिर भी वह नेता उन के खिलाफ साजिश रचता रहा.
दिनेश महाजन का प्रमोशन तहसीलदार के पद पर होने वाला था, मगर पद खाली होने के बावजूद उन का प्रमोशन नहीं हो सका. मजबूरी में उन्हें झाबुआ जाना पड़ा.
इसी दौरान 2 घर बन गए. आज 3 साल से वे झाबुआ में ही हैं. अब उन का तबादला तय है, मगर यहां से उन का तबादला ज्यादा दूर कर दिया, तो उन की मुसीबतें और बढ़ जाएंगी. बेटे कालेज में पढ़ रहे हैं और बेटी स्कूल में. उन्होंने तबादला आसपास करवाने की बहुत कोशिश की, मगर उस नेता ने ऐसा नहीं होने दिया.
दिन तो फिर भी कट जाते हैं, मगर रातें भारी लगती हैं. एक तो अकेली औरत, ऊपर से कालोनी का सन्नाटा कमला महाजन के भीतर डर पैदा करता है. वे आएदिन कालोनियों में लूटपाट, मारकाट की खबरें अखबारों में पढ़ती रहती हैं, तो उन का मन डर जाता है.
एक बार दिनेश महाजन एक हफ्ते की छुट्टी ले कर घर आए, तब वे दोनों हमबिस्तर हुए. कमला ने पूछा, ‘‘आप का तबादला इधर कब होगा?’’
‘‘देखो कमला, कोशिश तो खूब कर रहा हूं, मगर न जाने क्यों अटक जाता है. मुझे लगता है कि उस नेता ने मामला अटका रखा है.’’
‘‘तो आप मिल क्यों नहीं लेते उस से? आजकल बिना नेता से मिले काम भी तो नहीं होता है.’’
‘‘सो तो है, मगर मैं उस नेता से मिलूंगा नहीं.’’ ‘‘नहीं मिलोगे, तब इधर आना मुमकिन भी नहीं होगा.’’
‘‘विश्वास रखो कमला, मैं बहुत जल्दी आ जाऊंगा,’’ दिनेश महाजन ने यह आश्वासन कई बार दिया, मगर नतीजा वही ढाक के तीन पात रहा.
‘‘नमस्ते बहिनजी,’’ कमला ने देखा कि अविनाश भंडारी उन के सामने हाथ जोड़ कर मुसकरा रहे थे. वे उन के यहां आने का माजरा नहीं समझ सकीं.
अविनाश भंडारी उन्हें चुप देख कर बोले, ‘‘बहिनजी, आप को हैरानी हो रही होगी कि मैं यहां क्यों आया?’’
‘‘हां, आप क्यों आए हैं? आप ने उन का तबादला करवा दिया, फिर भी आप उन के पीछे क्यों पड़े हुए हैं? आखिर आप ने 2 घर कर ही दिए न.
‘‘आप चाहें तो एक घर भी कर सकती हैं.’’ ‘‘आप कहना क्या चाहते हैं?’’
‘‘मैं चाहता हूं कि दिनेशजी का तबादला यहां हो जाए और आप साथसाथ रहें. दोनों का फिर से एक चूल्हा बन जाए.’’
‘‘तो फिर करवा दीजिए न,’’ वे नरम पड़ते हुए बोलीं. ‘‘मगर इस के लिए तोड़ करना पड़ेगा.’’
‘‘तोड़ से आप का मतलब?’’ ‘‘बहिनजी, आप तहसीलदार साहब की बीवी हैं,’’ अविनाश भंडारी जरा खुल कर बोले, ‘‘वे कितनी ऊपरी कमाई करते हैं, यह आप अच्छी तरह से जानती हैं. उस ऊपरी कमाई का कुछ हिस्सा मुझे भी दे दें, तो मैं उन का तबादला यहां करवा दूंगा.’’
‘‘मतलब, आप सौदा कर रहे हैं?’’ ‘‘सौदा नहीं, इसे हमारी जबान में तोड़ कहते हैं. मैं आप को विश्वास दिलाता हूं कि तहसीलदार साहब का तबादला यहां करवा दूंगा.’’
‘‘मैं कैसे विश्वास करूं कि आप तोड़ का इस्तेमाल सही तरह करेंगे?’’ ‘‘इस मामले में हम नेता लोग जबान के पक्के होते हैं. अगर आप तोड़ नहीं करेंगी, तो मैं तहसीलदार साहब का तबादला भिंड या मुरैना में भी करवा सकता हूं,’’ कह कर अविनाश भंडारी ने अपना तुरुप का पत्ता फेंक दिया.
कमला महाजन उलझन में पड़ गईं. फिलहाल इन नेताजी की ही चल रही है. आजकल सरकारी मुलाजिमों के तबादले बिना नेता के होते नहीं हैं. पहले तो भिजवा दिया, अब खुद ही तोड़ करने आए हैं. कैसा दोहरा चरित्र है इन का.
‘‘कितना चाहिए?’’ ‘‘आप कितना दे देंगी?’’ ‘‘बात आप ने शुरू की, आप ही बता दीजिएगा.’’ ‘‘40 हजार.’’
‘‘मगर यह तोड़ तो महंगा है.’’ ‘‘तहसीलदार साहब अफसर हैं. हम ने जो रेट बना रखे हैं, वे सही हैं.’’
‘‘मैं ज्यादा नहीं दे सकती.’’ ‘‘देखिए बहिनजी, हम जो भी तोड़ करते हैं, लोगों की हैसियत के मुताबिक करते हैं.’’
‘‘देखिए, इस मामले में मैं तहसीलदार साहब से एक पैसा भी नहीं लूंगी. जो कुछ देना है, मुझे ही देना है. आप रकम कम कर दीजिएगा… मैं 25 हजार ही दे सकती हूं.’’
‘‘ठीक है, आप ने पहल की, इसलिए मंजूर है.’’ ‘‘मगर मेरी 2 शर्तें हैं.’’ ‘‘कौन सी?’’
‘‘एक तो आप तहसीलदार साहब को हवा भी नहीं लगने देंगे कि मैं ने पैसे दे कर उन का तबादला करवाया है.’’
‘‘ठीक है… और दूसरी शर्त?’’ ‘‘दूसरी शर्त यह कि 10 हजार अभी दूंगी, बाकी काम होने के बाद.’’
‘‘मुझे आप की दोनों शर्तें मंजूर हैं,’’ अविनाश भंडारी ने कहा.
कमला महाजन भीतर गईं. कुछ ही देर में वे नेताजी को 10 हजार की गड्डी सौंपते हुए बोलीं, ‘‘आप पर भरोसा कर रही हूं. काम हर हाल में होना चाहिए.’’
‘‘आप निश्चिंत रहे बहिनजी, आप का काम समझो हो गया,’’ कह कर अविनाश भंडारी चले गए. कमला महाजन ने सोचा, ‘जुआ खेला है. अगर जीत गए तो ठीक, हार गए तो समझो डूब गए.’
अब कमला महाजन अपने पति के तबादले का इंतजार करने लगीं. इसी बीच वे अविनाश भंडारी के संपर्क में भी रहीं.
कमला महाजन को इंतजार लंबा नहीं करना पड़ा. अविनाश भंडारी खुद ही तबादले की फोटोकौपी ले कर आए. मगर इसी बीच दिनेश महाजन का भी फोन आया कि उन का तबादला यहां हो गया है. 2-3 दिनों में आ रहे हैं.
अब इस में किस का तोड़ भारी पड़ा, कमला महाजन अच्छी तरह समझती हैं. अगर अविनाश भंडारी उन से तोड़ नहीं करते, तो उन के पति शायद नहीं आ पाते.




