Hindi Story. जून की तपिश भरी गरमी… उमस ही उमस, पसीना ही पसीना और शाम का समय. गठीला बदन, नाटा कद, दाढ़ीमूंछ बढ़ी हुई, सफेद बिखरे बाल, कुरते की बांह फटी हुई, पैर से चप्पल नदारद. रामचंद्र भागे जा रहे थे. उन को घर पहुंच कर भोजन बनाना था.

‘‘माचिस मिलेगी, चूल्हा जलाना है,’’ उन्होंने रामभजन की मां से कहा और मंड़ई में चले गए.

अंदर से बरतनों के गिरने की आवाज आई. लू के थपेड़े शांत हो रहे थे. चेहरे से आंच जैसी कोई चीज कम हो रही थी. कपड़े पसीने से तर हो गए. प्यास से गला सूखा जा रहा था, लेकिन रामचंद्र काम में लग गए. रहते तो वे इस मंड़ई में अकेले ही थे, पर भोजन तो अकेले को भी करना पड़ता है न.

रामचंद्र रिटायर हो चुके थे. वे किसी प्राइवेट फर्म में अफसर थे. वहां उन की अच्छीखासी तनख्वाह थी. रिटायरमैंट के समय काफी रुपया भी मिला था. सब अपने बेटों पर खर्च कर दिया. अब न तो पैसा है और न ही ताकत. इधरउधर से किसी तरह एक समय के भोजन के इंतजाम में दिन कट जाता है.

ऐसा नहीं था कि उन्होंने घर नहीं बनवाया था. बनवाया था बड़ा सा घर, पक्का घर. उन दिनों पूरे गांव में चर्चा हुई थी. लाखों रुपए खर्च किए थे.

तब रामचंद्र सोचा करते थे कि जवानी तो शहर में कटी, रिटायरमैंट के बाद इस घर के बरामदे में शाम को शान से बैठ कर अपने हमजोलियों के साथ चाय पी जाएगी.

वैसे रामचंद्र की पत्नी की टीबी की बीमारी से मौत हो चुकी थी. माली तंगी के चलते वे उन का ठीक से इलाज न करवा सके थे.

इस के बाद समय ने ऐसी करवट बदली कि रामचंद्र घर के रहे न घाट के. बड़ा बेटा देवनारायण सरकारी प्राइमरी स्कूल में टीचर था. उस के बच्चे भी थे. छोटा बेटा कहीं परदेश में रहता था. उस की पत्नी रामचंद्र को देखना तक नहीं चाहती थी. मझला बेटा बीएड कर के किसी नर्सरी स्कूल में पढ़ाता था. उस के भी एक बेटी थी.

बड़े मकान में रामचंद्र के तीनों बेटे रहते थे. उन्होंने घर के कमरों का आपस में बंटवारा कर लिया. तीनों को ही जगह कम पड़ती थी, इसीलिए रामचंद्र को उन्हीं के बनाए घर में हिस्सा नहीं मिला. बाहर मंड़ई ही उन के हिस्से में आई थी.

गन्ने के पत्तियों की मंड़ई थी. अरहर के पेड़ों से रामचंद्र ने दीवार बना ली. उस के भीतर कुछ बरतन और एक टूटा हुआ चूल्हा था. एक रस्सी पर कुछ फटे हुए कुरते टंगे थे, जो रामचंद्र के बड़े बेटे ने दिए थे. धोती तो सिर्फ एक ही थी, वह भी फटी हुई.

रामचंद्र के पास 2 बीघा जमीन भी थी, जिस का बंटवारा उन के तीनों बेटों ने कर लिया. पूरी जमीन को वे आपस में ही बांटना चाहते थे, पर गांव वालों के दखल के बाद उस जमीन का चौथा हिस्सा रामचंद्र को भी मिला.

अपनी ही औलादों के सामने उन्हें अपनी ही जमीन के लिए गिड़गिड़ाना पड़ा था. बड़ा बेटा तो बिलकुल भी राजी न था, पर उस की बीवी तैयार हो गई. तब जा कर खेत का एक छोटा हिस्सा रामचंद्र को मिल पाया था, जिस में वे सब्जियां उगाया करते थे.

इस बंटवारे को ले कर उन दिनों गांव में तरहतरह की चर्चाएं हुई थीं. रामभोला तिवारी कह रहे थे, ‘भला बुढ़ौती में जमीन ले कर रामचंद्र क्या करेंगे?’

तिवारीजी से कौन पूछे कि बुढ़ौती में भी पेट साथ ही रहता है. उसे एक अदद खुराक की जरूरत तो पड़ती ही है. नन्हकाऊ की अम्मां ने तो रामचंद्र का खूब साथ दिया. वे कहने लगीं, ‘जब सबकुछ बच्चों ने ले लिया है, तो कहां से पांडे बाबा अपना पेट भरेंगे. उन्हें जमीन में अपना हक मिलना ही चाहिए.’

छोटका काकी कह रही थीं, ‘पांडे बाबा का खयाल बड़े बेटे को रखना चाहिए. उस के पास सरकारी नौकरी है.’

इस पर बड़े बेटे ने कहा, ‘क्या इन्होंने मुझे ही पैदा किया है? हक तो और बेटे भी लेंगे, फिर मैं अकेले इन की सेवा क्यों करूं?’

तब प्रधानजी ने एक सुझाव दिया था कि तीनों बेटे साल के 4-4 महीने रामचंद्र के खाने का इंतजाम करें. पहले तो काफी कहासुनी हुई, पर प्रधानजी व छोटका काकी के दबाव में तीनों बेटों ने यह बात मान ली.

सभी ने राहत की सांस ली, पर रामचंद्र बचपन से ही मेहनत कर के बड़े हुए थे. उन्हें प्रधानजी की यह बात पसंद नहीं आई. उन्होंने यह कह कर बात ठुकरा दी कि वे कोई अपाहिज नहीं हैं. अगर होते भी तो अपने इन नालायक बेटों के सामने दो जून की रोटी के लिए हाथ नहीं फैलाते.

छोटका काकी ने कहा था, ‘अभी कुछ ताकत बाकी है, पर जब हाथपैर साथ नहीं देंगे, तब क्या करोगे?’

रामचंद्र ने कहा, ‘तब की तब देखी जाएगी. मर जाऊंगा, पर किसी के रहम पर जीना पसंद नहीं करूंगा.’

तब से रामचंद्र अपना भोजन खुद बना कर खाते थे.

‘‘बाबा,’’ गोलू ने पुकारा. ‘‘कौन? गोलू…’’ ‘‘हां बाबा, क्या कर रहे हो?’’ ‘‘चूल्हा जला रहा हूं.’’

गोलू रामचंद्र के बड़े बेटे का बड़ा बेटा था. वह 5 साल का था और शाम को अपने बाबा की मंड़ई में आ जाता था.

रामचंद्र अपने बेटों से तो नाराज थे, पर पोते को वे बड़े प्यार से मंड़ई में बिठाते. उसे कुछ खाने को भी देते.

पिछले मंगलवार को वे बाजार से जलेबी लाए थे. गोलू जलेबी ले कर घर चला गया. उस की मां ने उस की पिटाई की और कहा, ‘फिर से अगर बुढ़ऊ से कुछ मांगा, तो हाथपैर तोड़ दूंगी.’

रामचंद्र ने यह बात जानने के बाद कुछ दिनों तक गोलू को कुछ भी खाने को नहीं दिया. अगर दिया भी, तो उस से कहा कि यहीं पर खा कर घर जाना, नहीं तो तुम्हारी मां मारेगी. वे नहीं चाहते कि उन की वजह से उन का पोता मार खाए.

‘‘बाबा, कुत्ता,’’ गोलू चिल्लाया. ‘‘क्या हुआ?’’ ‘‘बाबा, कुत्ते ने मट्ठा जूठा कर दिया.’’

रामचंद्र ने देखा कि वे रामभोला तिवारी के यहां से जो मट्ठा मांग कर लाए थे, उसे कलुआ कुत्ता पी रहा था.

‘‘दूरदूर…’’ कहते हुए उन्होंने कलुआ को भगाया और मट्ठे को एक तरफ रख दिया. आज शाम को उसी से रोटी खानी थी. रामचंद्र ने सोचा कि कलुआ ने मट्ठा जूठा ही तो किया है, उस में जहर थोड़े ही मिलाया.

आखिर कलुआ ही तो था, जो हर समय उन की गैरमौजूदगी में मंड़ई की रखवाली करता था. उस रात जब वे तेज बुखार से तप रहे थे और कराह रहे थे, तो रातभर कलुआ मुंह लटकाए उन के सिरहाने बैठा रहा.

एक दिन जब एक सांप मंड़ई में आया था, तो कलुआ ने भूंकभूंक कर उस सांप को भगा दिया था. सब से बड़ी बात कि कुछ चंद टुकड़ों पर कलुआ इतनी वफादारी करता था. एक तरफ वे लोग थे, जो सारी कमाई खा कर ठीक से बात भी नहीं करते.

कहते हैं कि जमाना खराब है, तो क्या इनसानों के लिए ही या जानवरों के लिए भी? कलुआ को देख कर तो ऐसा नहीं लगता.

यही सब खयाल रामचंद्र को आ रहे थे कि तभी उन्हें छोटका काकी की आवाज सुनाई पड़ी, ‘‘पांडे बाबा…’’

‘‘क्या है छोटका?’’ ‘‘कुछ नहीं बाबा, इधर से जा रही थी, सोचा हाल जान लें.’’

‘‘हाल तो ठीक है, पर यह गरमी जान ले लेगी.’’ ‘‘हां बाबा, गरमी बहुत है.’’ ‘‘गोलू, तुम घर जाओ,’’ रामचंद्र ने कहा.

गोलू बिना कुछ बोले घर चला गया. छोटका काकी भी कुछ देर बाद वहां से चली गईं.

रामचंद्र पांडे के एक चचेरे भाई रामदुलार पांडे थे. दोनों एक ही परिवार के थे. रामदुलार का बड़ा बेटा रमेश पांडे ठेकेदारी करता था, छोटा बेटा वकील था. पहले तो जमीन कम थी, पर बैनामा ले कर काफी जमीन इकट्ठा कर ली थी.

रामचंद्र पांडे के बड़े बेटे देवनारायण और रामदुलार के बेटों में बिलकुल नहीं पटती थी. बाग को ले कर अकसर झगड़ा होता रहता था.

एक दिन तो आम के लिए दोनों परिवारों के बीच इतना झगड़ा हुआ कि सिर फूटतेफूटते बचे.

वैसे इन पेड़ों पर कई साल बाद आम आए थे. नए पेड़ों में तो आम के बौर दिख भी जाते थे, पर पुराने पेड़ों पर कम ही दिखाई पड़ते थे, जैसे पेड़ों को पता चल गया कि उन के आमों के लिए कई परिवारों के बीच झगड़ा होता है, जिन्होंने उन्हें लगाया, वे लोग मरखप गए. उन की औलादें नए पेड़ तो लगाती नहीं, उलटे पुराने पेड़ों को भी काटती रहती हैं. शायद इसीलिए अब पुराने आम के पेड़ों पर फल किसीकिसी साल ही दिखाई पड़ते हैं.

‘‘तुम ने मेरे बेटे को क्यों मारा?’’ गोलू की मां ने कहा. ‘‘तुम्हारे बेटे ने आम क्यों लिया?’’ रामदुलार के बड़े बेटे ने कहा.

तड़ाक, तड़ाक… रामदुलार पांडे के बड़े बेटे ने 2 और थप्पड़ गोलू को जड़ दिए.

गोलू की मां आगबबूला हो गई. रमेश पांडे कुरते की बांह ऊपर करते हुए अपने घर की ओर जाने लगा. गोलू की मां गालियां बकने लगी.

रमेश ने कहा, ‘‘चुप रहो, नहीं तो अभी तुम्हें भी ठीक कर दूंगा.’’ ‘‘क्या करोगे बाबू, फिर से तो कहो?’’ रामचंद्र पांडे ने कहा.

‘‘तुम न बोलो दादा, ये लोग तुम्हें मंड़ई में रखते हैं और आए हो उन की तरफदारी करने.’’

‘‘ये मुझे कहीं भी रखें, पर तुम मेरी बहू को बुराभला न कहो. तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरे पोते को मारने की, फिर कभी ऐसे न करना, वरना मुझ से बुरा कोई न होगा.’’

इतने में छोटका काकी आ गईं. उन्होंने बीचबचाव कर 2 परिवारों के बीच होती लड़ाई खत्म की.

रामचंद्र अपने पोते गोलू को सहलाते हुए मंड़ई में ले आए. उन की बहू ने नल से एक बालटी पानी ला कर मंड़ई के पास रख दिया. गोलू कोई चीज खाने में मगन था.

आज दोपहर से ही आसमान पर बादल छाए हुए हैं. जोरों की आंधी चल रही है. अभी शाम के 6 बजे ही अंधेरा हो गया है. लोग अपने पालतू पशुओं को उन के घरों में बांध रहे हैं. बाहर चरने गए पशु लौट रहे हैं. आंधियों के झोंकों से पेड़ अस्तव्यस्त हो रहे हैं. बीचबीच में बिजली की कड़कड़ा रही है. पूरा माहौल धूल से भर गया है. गेहूं का भूसा उड़ा जा रहा है. किसान उसे ढंकने की कोशिश कर रहे हैं.

गाय के बछड़े अपनी माताओं के साथ अपने घरों की ओर भाग रहे हैं. बाहर पड़ी खटिया को नन्हका काकी भीतर कर रही है. उन की साड़ी उड़ी जा रही है, उसे वह बारबार समेट रही हैं. छोटका काकी गोबर के उपले को ढक रही है. भीग गए, तो रसोई कैसे जलेगी. अचानक होने वाली बरसात से सभी बेहाल हैं, जो जहां है वहीं कुछ न कुछ कर रहा है. पूरा गांव काम में लग गया है. कुछ बच्चे जोरजोर से चिल्ला रहे हैं, वे बदल रहे मौसम से काफी खुश हैं.

‘आगआग’ रामचंद्र पांडे के मड़हे की तरफ से आवाज आ रही है. कुछ बच्चे चिल्ला रहे हैं. हवा जोरों से बह रही है. पास खड़ा आदमी भी धूल के चलते साफ नहीं दिखाई दे रहा है. अब कई लोग ‘आगआग’ चिल्ला रहे हैं. धुआं जोरों का उठ रहा है.

लोग अपने निजी कामों को छोड़ कर बालटी लिए उठते धुएं की तरफ बेतहाशा दौड़े जा रहे हैं. आग पांडे बाबा के मड़हे में लगी है. कुछ लोग मड़हे की तरफ पानी फेंक रहे हैं. आग की लपक बहुत तेज है. दूर से ही लोग पानी फेंक रहे हैं.

मड़हे से लंबीलंबी आग की लपटें निकल रही हैं. लोगों के पानी फेंकने की कोशिश बेकार हो रही है. मड़हा तकरीबन पूरी तरह से राख में तबदील हो गया है. इस बीच पानी की बड़ीबड़ी बूंदें आसमान से गिर रही हैं. कुछ क्षण पहले यही बूंदें रामचंद्र पांडे के मड़हे की आग को बुझा सकती थीं, पर अब तो मड़हे की जगह पर राख का ढेर है. वह ढेर हवा के साथ उड़ रहा है.

कुछ दूर पर खड़ा गोलू हैरान सा खड़ा है. शायद वह सोच रहा है कि उस के बाबा अब कहां रहेंगे. गांव के लोग परेशान हैं. उन्हें पांडे बाबा को ले कर चिंता है. पांडे बाबा बाजार गए हैं, सब्जियां बेचने. इस बार उन की सब्जी की फसल ठीक है. सामने एक टूटीफूटी साइकिल पर एक खाली बोरी लिए रामचंद्र पांडे दिखाई दिए. उन्हें देख कर कुछ लोगों की आंखें नम हो गई.

बरसात थोड़ी तेज हो गई है. पांडे बाबा धूल और बरसात से लथपथ हैं. मूंछों और दाढ़ी के बालों में तमाम कूड़ाकरकट लग गया है. बाल बिखरे हैं. बरसात में भी पसीने से वह तर हैं. वह साइकिल को तेज चलाते हुए लौटे हैं. उन के बाएं पैर की एड़ी से खून बह रहा है. साइकिल में पैडल नहीं है. शायद राड उन के पैर में लग गई है. उन्हें उस चोट की खबर भी नहीं है, वह सामने देख रहे हैं. उन का अपना घर जल कर खाक हो गया है. सारी चीजें तहसनहस हो गई हैं. घर में अब केवल राख ही बची है. अनाज और कपड़े तो पूरी तरह से जल गए हैं. बरतन टेढ़ेमेढ़े हो गए हैं. फसल काटने के कुछ औजार लाल हो गए हैं.

यह देख पांडे बाबा हैरान हैं. उन्हें काटो तो खून नहीं. वह एकदम चुपचाप खड़े हैं. आंखें भर आई हैं. पैर कांप रहे हैं. ऊपर से बरसात हो रही है. लेकिन उन के भीतर तो अजीब हलचल है. आसपास के लोग उन्हें बेचारगी से देख रहे हैं. रामचंद्र इस समय सब की निगाह में बेचारे हो गए हैं. रामचंद्र की बहुएं घर के बरामदे से उन्हें देख रही हैं. उन का लड़का देवनारायण अभी घर नहीं पहुंचा है. मझला लड़का हफ्तों से कहीं गया है. धीरेधीरे चलते हुए गोलू बरामदे से बाहर आता है. वह पांडे बाबा के हाथों को पकड़ लेता है. रुंधियाए गले से अपने बाबा को पुकारता है, ‘‘बाबा बाबा.’’

हैरान से खड़े बाबा उस की आवाज नहीं सुन पाते, तो वह जोर से पांडे बाबा का हाथ खींचता है. पांडे बाबा गोलू को अपनी गोद में उठा लेते हैं. उसे जोर से छाती से चिपका लेते हैं. गोलू भी उन से लिपट जाता है.

बाबा की आंखों से आंसू बाहर आ जाते हैं. वह आंसू पोंछते हुए अपनी बहुओं की तरफ जाते हैं. बरामदे में जा कर खड़े हो जाते हैं. कुछ लोग उन से सहानुभूति प्रकट करते हैं. धीरेधीरे सभी चले जाते हैं. बहुएं घर के भीतर चली जाती हैं. बरामदे में पड़ी चारपाई पर रामचंद्र बैठ जाते हैं. गोलू गोद से उतर कर उन के पास बैठ जाता है.

बाबा के कंधे से लटक रहे अंगोछे की गांठ को वह खोलने की कोशिश करता है. बाबा अंगोछे में बंधी जलेबी उसे दे देते हैं. वह भीगी हुई जलेबी ले कर घर में घुस जाता है.

रामचंद्र वहीं बैठेबैठे सोचने लगता है कि मड़हा तो जल गया और उस में रखा सामान भी. अब मजबूर हो कर उन्हें अपने बेटों के साथ रहना होगा. बहुएं न जाने कैसा व्यवहार करें. फिर सोचा, अगर बेटा घर में रहने को कह देगा, तो साथ रह लेंगे. अपनों के आगे क्या सम्मान, क्या अपमान. इसी सब उधेड़बुन में थे, किसी ने कहा, ‘‘बाबा, भोजन खा लीजिए.’’

रामचंद्र की बड़ी बहू थाली में भोजन लिए सामने खड़ी थी. गोलू के हाथ में पानी है. रामचंद्र कुछ नहीं बोले. बहू भोजन चारपाई पर रख कर चली गई. रामचंद्र ने पानी से हाथ धोया और बरामदे की फर्श पर बैठ गए. उन्हें इस तरह भोजन लेना ठीक तो नहीं लग रहा है, परंतु अपनी ही बहूबेटे हैं. उन्होंने ही तो दिया है.

भूखे रहने से थोड़े ही न कुछ काम होगा, यही सब तमाम बातें सोचतेविचारते उन्होंने भोजन कर लिया, काफी रात बीते उन के टीचर बेटे आए. मड़हे की सारी जानकारी उन्हें पहले ही मिल चुकी थी. उन्होंने चारपाई पर पड़े पांडे बाबा को नहीं जगाया और घर में चले गए. पांडे बाबा को नींद नहीं आ रही है. कल वे क्या करें, बहूबेटों के साथ रहें, तो उन के स्वाभिमान को चोट लगती है. मड़हा भी नहीं है. पूरी गृहस्थी बनाने में समय लग जाएगा. वे क्या करें. इसी उधेड़बुन में रातभर जागते रहे. सुबह हुई, दातून करने पास के नल पर बैठे हैं. गोलू नल को चला रहा है. दातून को चीर कर जैसे ही जीभ साफ करने लगे, उसी समय उन के टीचर बेटे ने कहा, ‘‘बाबू, भोजन कर लेना, मड़हा बनने में तो कुछ दिन लग जाएंगे.’’

रामचंद्र के हाथ कुछ क्षण के लिए रुक गए. बिना जीभ साफ किए ही उन्होंने दातून दूर फेंकी. रातभर जो विचार किया था, वह सब बेकार लगा. उन्हें खुद पर गुस्सा आ रहा था. वह सोचने लगे कि क्यों फिर इन सब के साथ रहने के लिए सोच ही रहे थे. आखिर लड़के को मड़हा बनने का इंतजार है. बहू दूसरे घर से आई है. बेटा तो अपना है, चला गया. एक बार ठीक से बात भी नहीं की.

उन्होंने पानी का कुल्ला किया. अंगोछे को पहन कर नहाए. बरसात से भीगे कपड़े कुछ सूख गए थे. उन्हें फिर से पहन कर बाबू जगत सिंह की ओर चल पड़े.

बाबू जगत सिंह गांव के संपन्न किसान हैं. चारपाई पर बैठे हैं. आसपास गांव के लोग बैठे हैं. कुछ लोग सुबहसुबह जगत सिंह के पास इसलिए आ जाते हैं, क्योंकि वहां चायबीड़ी, तंबाकू मिल जाती है. बाबू जगत सिंह दरवाजे पर आए हर व्यक्ति का स्वागत चाय, बीड़ी, तंबाकू और पान से करते हैं. सरकारी मुलाजिम भी उन्हीं के यहां डेरा डालते हैं.

रामचंद्र पांडे को देखते ही वह चारपाई से खड़े हो जाते हैं और दोनों हाथ जोड़ कर कहते हैं, ‘‘महाराज पायलागूं.’’

‘‘बाबू साहब बढ़ती हो,’’ आशीर्वाद की मुद्रा में रामचंद्र कहते हैं. रामचंद्र पांडेजी के लिए चारपाई पर से कुछ लोग उठ जाते हैं. रामचंद्र बैठ जाते हैं. पांडेजी के लिए अपने एक आदमी से बाबू जगत सिंह चाय लाने को कहते हैं. मड़हे की आग व अचानक आई बरसात की चर्चा वहां बैठे लोग करते हैं चाय आ जाती है. रामचंद्र चाय को जल्दबाजी में पीते हैं, जिस से उन की जीभ जल जाती है.

इतने में बाबू जगत सिंह कहते हैं, ‘‘पंडितजी, आप के मड़हे के जलने की खबर मिली, सुन कर बहुत दुख हुआ.’’

‘‘हां बाबू साहब, क्या करें, बाजार गए थे और वापस आने पर सब राख हो चुका था,’’ रामचंद्र ने कहा. ‘‘पंडितजी, आप अपने बेटों के साथ रहिए, कहनासुनना तो लगा रहेगा.’’ ‘‘नहीं बाबू साहब, हम वहीं रहेंगे, उन से हमारी अब नहीं निभेगी.’’

‘‘बाबू साहब और रामचंद्र बात कर ही रहे थे कि पास बैठे लखन ने कहा, ‘‘बाबू साहब, आजकल के लड़कों को क्या हो गया है, जो अपने मांपिता का निरादर करते हैं.’’

‘‘कुछ नहीं हुआ लखन, जब तक काम के रहोगे, पल्ले रुपया होगा, बेटाबहू पूछेंगे. अगर जेब खाली, तो ऊपर वाला ही मालिक है,’’ रामचंद्र जी ने कहा.

लखन ने रामचंद्र की बात को काटते हुए कहा, ‘‘यह गांव में इस तरह हैं, शहर में तो बुढ़वा मजा कर रहा होगा.’’

‘‘कोई मजा नहीं है लखन, यहां तो सब से मिलजुल कर बूढ़े जी लेते हैं, शहर में तो पढ़ेलिखे धनवान बेटे मातापिता को वृद्धाश्रम में डाल देते हैं,’’ बाबू जगत सिंह ने कहा, तो रामभजन ने कहा, ‘‘यह  वृद्धाश्रम क्या है, बाबू साहब कोई बढि़या जगह का नाम है क्या?’’

बाबू जगत सिंह ने कहा, ‘‘नहीं, यह सब पढ़ेलिखे लोगों का आश्रम है. जहां घर से बाइज्जत निकाले बुजुर्ग रहते हैं. कई बुजुर्ग एकसाथ रहते हैं, जिन का खर्च उन के बेटेबहू देते हैं.’’

‘‘यह तो बड़ी खराब बात है.’’ निहोरे कोरी ने कहा तो दयाल भाट बोले, ‘‘बाबू साहब, आज के जमाना में हम बुड्ढों की कोई कदर नहीं है.’’

बाबू जगत सिंह ने सिगरेट का धुआं छोड़ते हुए कहा, ‘‘क्यों नहीं हमारे प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति तो बुजुर्ग ही हैं…’’

बाबू जगत सिंह अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाए थे कि रामचंद्र ने उन की बात को बीच में ही काटते हुए कहा, ‘‘देश का प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति तो वृद्ध हो सकता है, लेकिन अपने घर का मालिक नहीं हो सकता. शायद, इन की भी अपने घर में न चलती हो,’’ रामचंद्र की इस बात वहां मौजूद सभी लोग चुप हो गए.

इतने में जगत सिंह का बड़ा लड़का बाहर आया और पिता से बोला, ‘‘बाबूजी नहा लीजिए, आप भी इस उम्र में बेकार के लोगों को बिठाए रहते हैं. खेत में ट्रैक्टर चल रहा है, जरा निगरानी कर आइएगा,’’ इतना कहते हुए उस ने बुलेट मोटरसाइकिल को किक मारी और कीचड़ में से मोटरसाइकिल को धीरेधीरे चलाता हुआ चला गया. बुलेट मोटरसाइकिल की आवाज से सभी की आवाज दब गई. मौन को तोड़ते हुए रामचंद्र ने कहा, ‘‘बाबू साहब, एक काम से आए थे.’’

‘‘कहिए पंडितजी, क्या काम है?’’

‘‘बाबू साहब, आप तो जान रहे हैं, मड़हा जल गया है. हमारे पास सबकुछ है, पर ईख की पत्तियां नहीं हैं. वही मिल जातीं, तो मड़हा फिर से तैयार हो जाता, जो दाम होगा, वह हम दे देंगे.’’

‘‘पंडितजी दाम देना है, तो कहीं और से ले लीजिए, हम ईख की पत्ती, वह भी पंडित को दाम ले कर देंगे, भला ऊपर वाले को क्या मुंह दिखाएंगे. आप को जितनी पत्तियां चाहिए, आप ले जाइए और किसी चीज की जरूरत हो तो कहिए. आखिर हम सब एक बिरादर हैं. आप भी बूढ़े, हम भी बूढ़े हैं. हमें तो एकदूसरे की मदद करनी ही चाहिए.’’

‘‘बाबू साहब, ऊपर वाला आप को लंबी उम्र दे.’’

‘‘नहीं पंडितजी, लंबी उम्र का आशीर्वाद मत दीजिए, जितने दिन शरीर में ऊर्जा बनी रहे, उतने ही दिन जिंदा रखें तो ठीक, अन्यथा तो आप जानते ही हैं.’’

रामचंद्र चुप हो गए. उन्हें भी अपनी उम्र को ले कर चिंता होने लगी. बाबू जगत सिंह ने अपने 2 आदमियों से कहा, ‘‘पंडितजी को जितनी पत्तियां चाहिए, उतनी उन के घर के पास पहुंचा दो.’’

इतना कह कर सभी की ओर हाथ जोड़ते हुए बाबू जगत सिंह नहाने के लिए कुएं की तरफ चल दिए.

रामचंद्र व बाबू साहब के 2 आदमी ईख की पत्तियां ढोने में लग गए. गांव वालों ने मदद की और शाम तक मड़हा फिर बन कर तैयार हो गया. ईंट के टुकड़ों का चूल्हा फिर से बन गया रामचंद्र पांडे गांव के बनिए के यहां से भोजन के सामान के साथ दाल, चावल, आटा लाने चल दिए. Hindi Story

– रमाकांत ‘क्षितिज’

और कहानियां पढ़ने के लिए क्लिक करें...