Short Story. रमऊ के आगेपीछे कोई नहीं था. अछूत समझ कर गांव वालों ने उसे गांव से बाहर रहने को मजबूर कर दिया था.

रमऊ ने गांव से बाहर एक कच्चा घर बनाया था. उस के घर में मिट्टी के कुछेक बरतनों और एक फटी गुदड़ी के अलावा कुछ भी न था. वह सुबह आंखें मलता हुआ मजदूरी की तलाश में निकलता और शाम ढले घर पहुंचता. उस के अंगोछे के एक छोर में मजदूरी के एवज में मिले 3-4 मुट्ठी चावल बंधे होते.

एक गरीब ब्राह्मण उसी गांव में दिनभर घूमघूम कर भीख मांगता और रात को किसी के बरामदे में सो जाता. उस ब्राह्मण को लोग ‘देवता’ समझते थे.

बरसात का मौसम आ गया. ऐसे समय में बड़ी जगह भी छोटी पड़ने लगती है. ब्राह्मण को तो कुछ ज्यादा ही परेशानी होने लगी. बरामदे में अकसर उस के साथ कुत्ते भी शरण ले लेते थे. किसी ने सुझाया कि वह रमऊ के मकान पर कब्जा कर ले.

एक दिन जब रमऊ घर पर नहीं था, ब्राह्मण ने उस के मकान पर कब्जा कर के उस की गुदड़ी जला दी, मिट्टी के बरतन फेंक दिए, फिर उस ने साफसफाई करवाई और रंगरोगन करवाया.

शाम को रमऊ घर पहुंचा, तो देखा कि घर में ताला लगा है. उसे बहुत हैरानी हुई. वह वहीं सिर पकड़ कर बैठ गया. कुछ देर बाद ब्राह्मण भी आ पहुंचा. ताला खोल कर वह मकान में दाखिल होने लगा, तो रमऊ ने उसे रोका, ‘‘ठहरिए, यह मेरा घर है.’’

ब्राह्मण ने रमऊ को सिर से पैर तक देखा और डांटते हुए कहा, ‘‘दूर हट अछूत… इधर अब कभी मत फटकना, नहीं तो खूब मरम्मत करूंगा. यह मेरा घर है. समझे.’’

ब्राह्मण आंखें तरेर कर उसे घूरने लगा. रमऊ सहम गया. लेकिन अपने घर की दावेदारी कैसे छोड़ देता. वह गरज कर बोला, ‘‘अरे ब्राह्मण, किसी दूसरे के घर पर कब्जा करते हुए तुझे  लज्जा नहीं आती?’’

दोनों में जम कर ‘तूतू मैंमैं’ होने लगी. रमऊ कहता, यह मेरा घर है और ब्राह्मण कहता कि मेरा है. दोनों फैसला कराने काजी के पास पहुंचे.

‘‘काजीजी, आप इंसाफ कीजिए. यह दुष्ट मेरे घर पर अपना कब्जा जमाना चाहता है,’’ कहते हुए ब्राह्मण रोने लगा.

‘‘काजी साहब, वह तो मेरा घर है, जिस पर इस पाखंडी ब्राह्मण ने कब्जा कर रखा है,’’ रमऊ बोला.

काजी को ब्राह्मण की बात पर यकीन हो गया. उस ने रमऊ को कभी देखा नहीं था. उस का हुलिया काजी को चोर की तरह लगा. लेकिन फैसला तो करना ही था. उस ने उस मकान को देखने का इरादा जाहिर किया.

जब काजी उस घर में दाखिल होने लगा, तो दरवाजे की ऊंचाई कम होने के कारण उस का सिर टकरा गया. तभी उस के दिमाग में एक बात आई.

कमरे में ब्राह्मण के कपड़ेलत्ते, शंकर की मूर्ति के आगे ढेर सारी पूजा की सामग्री रखी थी. कमरे से बाहर निकलते वक्त भी काजी का सिर दरवाजे से टकराया. उस ने फौरन हुक्म दिया, ‘‘आप दोनों बारीबारी से मकान के अंदर जाओ और बाहर निकलो.’’

पहले रमऊ कमरे के अंदर गया और आराम से बाहर निकल आया. काजी ने गौर से देखा कि रमऊ का सिर दरवाजे से नहीं टकराया.

फिर ब्राह्मण ने मकान के अंदर जाने के लिए पैर बढ़ाए, तो दरवाजे से उस का सिर टकराया और वह वहीं बैठ गया.

काजी ने फैसला सुनाया, ‘‘यह रमऊ का मकान है,’’ फिर वह ब्राह्मण के पास पहुंचा और उस के कंधे पर हाथ रख कर बोला, ‘‘अब तो मानते हैं न कि यह मकान आप का नहीं है. अगर यह मकान आप का होता, तो आप को झुक कर चलने की आदत होती और आप का सिर दरवाजे से कभी न टकराता. कुछ समझे, पंडितजी.’’

ब्राह्मण शर्म से जमीन में गड़ गया. धोती की कांछ को कमर में खोंसते हुए वह वहां से भाग खड़ा हुआ.

रमऊ हाथ जोड़ कर बोला, ‘‘काजी साहब, आप का यह एहसान मैं कभी नहीं भूल पाऊंगा.’’

काजी ने जवाब दिया, ‘‘रमऊ भाई, इस में एहसान कैसा, यह तो मेरा फर्ज था.’’

रमऊ ने पीतल के बरतनों में खाना बनाया, कांसे के बरतनों में खाया और मखमली बिस्तर पर सो गया. वैसे, वह सोच रहा था कि कभी न कभी ब्राह्मण अपना सामान लेने जरूर आएगा.  Short Story

-इंदरमन साहू

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