Hindi Story. बाएं तरफ के लकवे से पीडि़त होने के कारण पिछले 3 साल से काशी प्रसाद अपने घर के बारामदे में बिछी खाट पर लेटे रहते थे. 60 साल की उम्र में हुई इस बीमारी में उन की देखभाल की पूरी जिम्मेदारी पत्नी सोमवती पर थी, क्योंकि घर में कोई और नहीं रहता था. काफी इलाज के बाद वे ठीक से बोलने जरूर लगे थे, लेकिन बिना सहारा दिए ज्यादा चलफिर नहीं पाते थे.
ऐसा नहीं है कि काशी प्रसाद की कोई संतान नहीं थी. 5 बेटियां और एक बेटा ऋतुराज था. लेकिन, जब 3 एकड़ की खेती से जिंदगी की बुनियादी जरूरतों ने पूरा होने से इनकार कर दिया तो ऋतुराज पीठ पर बैग लाद कर दिल्ली में सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी करने चला गया. बेटियां अपने ससुराल में बस गई थीं, जो कभीकभार ही मांबाप के पास आती थीं.
काशी प्रसाद खेतीकिसानी करने वाले और उसी के सहारे जिंदगी जीने वाले ठेठ गंवई शख्स थे. जाति से ब्राह्मण भले थे, लेकिन कुछ खास पढ़ेलिखे नहीं थे. हालांकि, जातिगत श्रेष्ठता और 3 एकड़ खेत का मालिक होने का घमंड उन में कूटकूट कर भरा हुआ था.
वे अपने चरित्र में एक ऐसे किसान थे, जिस के लिए खेत ही उस की सब से कीमती जायदाद थी. यही खेत उन के इलाके, गांवसमाज और रिश्तेनाते में उन की सामाजिक और माली हैसियत का मापदंड था. गांव के लोग बेटे ऋतुराज को इसी खेत के कारण अकसर मजाक में जमींदार भाई के उपनाम से भी पुकारते थे.
अपने इन खेतों में काशी प्रसाद जब भी मजदूर लगाते थे तो एक सख्त मालिक की तरह उन मजदूरों की निगरानी करते थे. इलाके में छोटी जातियों के लोग उन के इस सख्त बरताव के कारण बहुत मजबूरी में ही उन के खेतों में काम करने को तैयार होते थे, क्योंकि वे मजदूरों से बहुत हाड़तोड़ काम तो लेते ही थे, जातिगत दंभ के कारण बदजबानी भी कर देते थे. इस दौरान वह एक बेरहम जमींदार की रोल में होते थे, जिस के लिए इस जायदाद और जेब में मौजूद रुपयों से ज्यादा कीमती कुछ भी नहीं था.
हालांकि, इन खेतों सहारे इस परिवार का जीवन 90 के दशक तक तो ठीक से चल गया, लेकिन देश में उदारीकरण का दौर आने के बाद, खेती से होने वाली यह आमदनी तेजी से गिरने लगी.
जब खेतीकिसानी अन्य सैक्टर के मुकाबले हाशिए पर गई तो काशी प्रसाद भी चिंतित जरूर हुए, लेकिन अर्थव्यवस्था में आ रहे इस बदलाव को वक्त के मुताबिक पढ़ नहीं पाए.
हालांकि, अर्थव्यवस्था में किसानों की कमजोर होती इस भूमिका को उन के ही खेतों में काम करने वाले भूमिहीन मजदूरों ने बहुत जल्दी पढ़ लिया और वे नए ठिकाने की तलाश में शहरों की तरफ तेजी से शिफ्ट होने लगे.
दरअसल, मजदूरी बढ़ाए जाने की मांग को किसान इसलिए नहीं मानते थे क्योंकि कोई किसानों की आमदनी में कोई बढ़ोतरी ही नहीं हो रही थी.
असल में, काशी प्रसाद को अतीत में कभी यह लगता ही नहीं था कि उन का परिवार ऐसे दिन भी देख सकता है जब ये खेत उन की जिम्मेदारी उठाने में असहाय हो जाएंगे. जाति से ब्राह्मण होने और 3 एकड़ खेत का मालिक होने के गुरूर ने बेटे ऋतुराज की बेहतर पढ़ाईलिखाई पर भी उन्होंने इसलिए भी कोई ध्यान नहीं दिया क्योंकि वे यह मानते थे कि खेत होने से समाज में शादीब्याह तो हो ही जाएगा और फिर इसे कहां नौकरी करने जाना है.
लेकिन, अब जब खेती में गुजारा करने का कोई ठोस औप्शन नहीं बचा तो अपने 10वीं फेल बेटे ऋतुराज को दिल्ली में सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी के बाबत जाने से नहीं रोक पाए.
हालांकि, ऋतुराज के दिल्ली जाने के दौरान, काशी प्रसाद के द्वारा गांव में यह अफवाह भी फैलाई गई कि बेटा दिल्ली में बिजनैस करने लगा है, क्योंकि उन का सामंती मन यह स्वीकार करने में शर्मिंदगी महसूस करता था कि 3 एकड़ खेत के मालिक का बेटा, और एक ब्राह्मण दिल्ली में डंडा लिए दूसरों की दुकान की रखवाली करेगा?
एक जमींदार सोच, जिसे इलाके में ऊंची सामाजिक और माली हैसियत वाले पालनहार की तरह देखा और इज्जत दी जाती रही हो, का बेटा दिल्ली में एक मामूली सुरक्षा गार्ड की नौकरी कैसे कर सकता है?
यह व्यवस्था का पहला बड़ा झटका था जिस ने काशी प्रसाद जैसे सामंती मिजाज के लोगों को यह सिखाया कि वक्त के साथ नौकरी देने वाले मालिक भी नौकर बन सकते हैं. समय किसी के साथ पक्षपात नहीं करता है, उस की अपनी गति होती है और उस के मुताबिक खुद को ढालना ही होता है.
असल में, खेती के घाटे में जाने के बाद, काशी प्रसाद अपनी बाकी बची जिंदगी में ऋतुराज को कहीं नई जगह सैटल होते देखना चाहते थे. चूंकि अब उन्हें खेती में कोई ठोस आमदनी और भविष्य नहीं दिख रहा था इसलिए खेतों को बंटाई पर दे कर, मन मसोस कर वक्त, समाज और हालात में आ रहे बदलाव के मुताबिक खुद को समझाने और ढालने में लगे हुए थे.
लेकिन, इस बदलाव से उन्हें गहरा दुख इसलिए था क्योंकि उन की सामाजिक, माली हैसियत साल दर साल अप्रासंगिक होती जा रही थी और समय की आंधी में वे बहुत पीछे होते जा रहे थे.
यही नहीं, काशी प्रसाद को अपनी इस बीमारी से उपजी नाकामी और विकलांगता का कोई खास मलाल नहीं था. वे मानते थे कि चलाचली की शुरू हुई इस बेला में ये सब समस्याएं आना लाजिमी ही हैं, इसलिए इस का कोई मलाल भी नहीं होना चाहिए.
उन्हें मलाल इस बात का था कि अपनी पूरी जिंदगी में जिस श्रेष्ठता बोध को उन्होंने देखा और जिया था, अब वह खत्म होती जा रही है. आखिर यह कैसा दौर आया है कि उन के जैसे लोगों को केवल अप्रासंगिक ही नहीं बनाता जा रहा है, बल्कि पुराने सामाजिक, पारिवारिक संबंधों को केवल पैसे से जुड़े रिश्तों में बदल रहा है.
काशी प्रसाद को इस बात का भी बहुत दुख था कि अब गांवसमाज के लोग उन का हालचाल लेने भी नहीं आते हैं, जबकि उन के दौर में इसी गांवसमाज और जाति के लोगों से संपर्क, संवाद न केवल मजबूत रहता था, बल्कि वह एक जिंदादिल समाज के गवाह रहे थे.
उन के दौर में समाज में सामूहिकता की जो भावना थी वह भी अब मरती जा रही थी. किसी के दुखदर्द में शामिल होने की भावना और सामाजिक भाईचारा जिस तरह जमींदोज हो रहा था, वह उन्हें बहुत तकलीफ देता था.
असल में पिछले कुछ सालों में, समाज में पैसे की अहमियत बढ़ने के साथ जिस तरह का एकाकीपन पसरा था उस से उन्हें पीड़ा थी. उन्होंने, अपने दौर में वह वह समाज देखा था जहां लोग एक दूसरे के दुखसुख में न सिर्फ शामिल होते थे बल्कि समाज में सामूहिकता और मदद करने भावना बहुत मजबूत थी. किसी का छप्पर उठाना हो, शादी विवाह हो, भोज हो या फिर लाश उठाना…
समाज के लोग एकदूसरे की मदद के लिए खुले दिल से तत्पर रहते थे. लेकिन अब कोई किसी का हालचाल पूछने के लिए तैयार नहीं था. आखिर लोग इतना कैसे बदल सकते हैं?
यही नहीं, बदलते वक्त ने पुराने रिश्तेनाते, भाईचारा और सामाजिक संबंधों को बेरहमी से तोड़ डाला था. अब लोग केवल खुद के विकास पर केंद्रित हो गए थे, जहां किसी नैतिकता, सामाजिक बंधन और मान्यताओं और रिश्तों की कोई कद्र नहीं थी. यह सोच उदारीकरण के दौर में बने समाज में बहुत तेजी से उपजी थी, जिस ने समाज को मजबूत करने वाली मान्यताओं को गटर में डाल दिया था.
दरअसल, अपने दौर में काशी प्रसाद समाज के लिए बहुत सहयोगी इनसान थे. जब गांवसमाज में लोगों के यहां शादीब्याह, तिलक, भोज या तेरहवीं आदि के कार्यक्रम होते थे तो उन्हें इस कार्यक्रम में खाना बनाने की जिम्मेदारी दी जाती थी. वे अपनी इस जिम्मेदारी को बखूबी निभाते थे. गांव और पट्टीदारी सब जगह उन्हें इस काम के लिए बुलाया जाता था.
काशी प्रसाद भोजन तैयार करने की एक टीम रखते थे, जो उन के निर्देशन में काम करती थी. इस टीम ने कभी भी इस जिम्मेदारी के लिए किसी से एक पैसे नहीं लिए. उन्होंने कितने विवाह, तिलकोत्सव, भोज, तेरही और अन्य सामाजिक कामों में यही जिम्मेदारी संभाली कि उन्हें संख्या खुद ही याद नहीं थी.
इस के पीछे उन का सिर्फ एक ही तर्क होता था कि अगर कुछ भी गड़बड़ हुआ तो गांव की बड़ी बदनामी होगी. लेकिन, जब आज वे इसी काम को पेशेवर हलवाइयों द्वारा किए जाते हुए देखतेसुनते तो उन्हें बड़ा दुख होता था.
दरअसल, उदारीकरण के दौर में तैयार हुई नई पीढ़ी के पास इन सामाजिक परंपराओं को संजोने, दूसरे के दुखसुख में शामिल होने जैसी भावुक चीजों में कोई रुचि नहीं रह गई थी.
उदारीकरण ने जिस तरह से हर सेवा, सहायता का मुद्रीकरण किया था, उस का ही असर था कि समाज के लिए हमेशा खड़े रहने वाले काशी प्रसाद और उन के जैसे लोग आज खुद को अप्रासंगिक और बेकार समझने लगे थे.
लेकिन, वक्त के साथ बदलाव एक जरूरी चीज है, जिसे रोका नहीं जा सकता था. हालांकि, इस बदलाव में भी काशी प्रसाद जैसे लोगों को अनदेखा, अप्रासंगिक होने से बचाने की जिम्मेदारी भी इसी नए बने समाज की थी, जिस में वह नाकाम हो गया था. अनदेखा और अप्रासंगिक होने की यह टीस काशी प्रसाद जैसे
लोगों के दिल में गांठ बन कर चुभती थी. आखिर, हम अपने पुरखों की अनदेखी करने के अपराधी बन चुके थे. Hindi Story




