Social Issues. ‘लव जिहाद’ के आरोपों से आगे असली सवाल कि क्या प्यार के नाम पर धोखा, जिस्मानी शोषण और डिजिटल ब्लैकमेलिंग एक नया अपराध मौडल बन रहा है?
मोबाइल स्क्रीन पर शुरू हुई एक बातचीत कब यकीन में बदल जाती है और वही यकीन कब किसी इनसान की सब से बड़ी कमजोरी बन जाता है, इस का पता अकसर तब चलता है जब बहुत देर हो चुकी होती है.
सोशल मीडिया ने प्यार, दोस्ती और संवाद के लिए भरपूर मौके दिए हैं, लेकिन इसी डिजिटल दुनिया ने अपराध के कई पुराने तौरतरीकों को भी नया मीडियम दे दिया है. फर्जी पहचान, इमोशनल दबाव, निजी तसवीरें, वीडियो बनाना, ब्लैकमेल, जिस्मानी शोषण और आखिर में धर्मांतरण या शादी के लिए दबाव… ऐसे आरोपों वाले मामले देश के अलगअलग हिस्सों से सामने आते रहे हैं.
इन मामलों को आमतौर पर ‘लव जिहाद’ कहा जाता है, मगर पत्रकारिता की पहली जिम्मेदारी यह तय करना है कि आरोप क्या है, अपराध क्या है और सुबूत क्या कहते हैं.
‘लव जिहाद’ नाम से कोई केंद्रीय अपराध आंकड़े मुहैया नहीं हैं. गृह मंत्रालय ने 2014 में संसद में साफ किया था कि ऐसे मामलों का राज्यवार केंद्रीय आंकड़ा अलग से नहीं रखा जाता. पर इस का मतलब यह नहीं कि पहचान छिपा कर धोखा देने, सैक्स हिंसा करने, निजी तसवीरों से ब्लैकमेल करने या जबरन धर्मांतरण कराने के आरोपों को नजरअंदाज कर दिया जाए. उलटे, इन आरोपों को उन के असली कानूनी रूप में देखना ज्यादा गंभीर और ज्यादा असरदार रास्ता है.
आंकड़े ‘लव जिहाद’ के नहीं, अपराध के हैं
राष्ट्रीय अपराध रिकौर्ड ब्यूरो की लेटैस्ट क्राइम इन इंडिया, 2024 रिपोर्ट के मुताबिक साल 2024 में देश में कुल 1,01,928 साइबर अपराध दर्ज हुए, जबकि 2023 में यह संख्या 86,420 और 2022 में 65,893 थी यानी 3 सालों में दर्ज साइबर अपराधों में काफी बढ़ोतरी हुई.
2024 के एनसीआरबी आंकड़ों में साइबर अपराधों के भीतर साइबर स्टौकिंग जैसे महिलाओं और बच्चों को औनलाइन परेशान करने के 1,240 मामले, साइबर ब्लैकमेलिंग या धमकी के 601 मामले, फर्जी प्रोफाइल के 266 मामले, डिफेमेशन या मौर्फिंग के 28 मामले और धोखाधड़ी के 29,758 मामले दर्ज किए गए.
इन्हें ‘लव जिहाद’ के मामले कहना उचित नहीं होगा, लेकिन ये आंकड़े बताते हैं कि डिजिटल मीडियम से इनसान की पहचान, इज्जत, निजी जीवन और माली व सामाजिक सिक्योरिटी को निशाना बनाने का अपराध असली और बढ़ता हुआ है.
यहीं से उस तथाकथित अपराध स्टाइल को सम?ाने का रास्ता खुलता है, जिसे कई परिवार ‘लव जिहाद’ के रूप में देखते हैं.
पहले सोशल मीडिया पर मेलजोल, फिर लगातार बातचीत, भावनात्मक निकटता, मिलने की गुजारिश, निजी तसवीरों या वीडियो को एकदूसरे को भेजना और उस के बाद धमकी… अगर इस के साथ ?ाठी पहचान, जिस्मानी शोषण या धर्म बदलने का दबाव जुड़ जाए तो मामला केवल प्रेम संबंध का नहीं रह जाता, वह अलगअलग आपराधिक धाराओं के तहत जांच का सब्जैक्ट बन सकता है.
4 राज्यों का आंकड़ा क्या कहता है
उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तराखंड और छत्तीसगढ़ का उदाहरण लें. एनसीआरबी के मुताबिक साल 2024 में उत्तर प्रदेश में 11,073, महाराष्ट्र में 9,922, उत्तराखंड में 543 और छत्तीसगढ़ में 660 साइबर अपराध दर्ज हुए. साल 2023 में यही संख्या इन्हीं राज्यों में क्रम से 10,794, 8,103, 494 और 473 थी.
इन में से कितने मामले किसी हिंदूमुसलिम प्रेम संबंध से जुड़े थे, कितनों में जिस्मानी शोषण हुआ और कितनों में धर्मांतरण का आरोप था, इस का कोई अलग से राष्ट्रीय आंकड़ा उपलब्ध नहीं है, इसलिए इन संख्याओं को ‘लव जिहाद’ के आंकड़े के रूप में पेश करना गलत होगा.
लेकिन इन आंकड़ों की अहमियत दूसरी जगह है. वे बताते हैं कि डिजिटल अपराध की बुनियाद तेजी से फैल रही है और उसी डिजिटल माहौल में धोखे, फर्जी पहचान, स्टौकिंग, धमकी और निजी सामग्री के गलत इस्तेमाल जैसे अपराधों की संभावना भी मौजूद है.
साल 2024 में दर्ज साइबर अपराधों में उत्तर प्रदेश की संख्या साल 2023 के मुकाबले बढ़ी. महाराष्ट्र में भी बढ़ोतरी हुई. उत्तराखंड में भी साल 2023 के 494 से 2024 में 543 मामले दर्ज हुए, जबकि छत्तीसगढ़ में 473 से बढ़ कर 660 मामले हुए.
यहां पत्रकारिता का नतीजा साफ होना चाहिए कि ये आंकड़े ‘लव जिहाद’ साबित नहीं करते, लेकिन उस डिजिटल अपराध के हालात की गंभीरता जरूर बताते हैं जिस में ऐसे आरोपों वाले मामले जन्म लेते हैं.
उत्तर प्रदेश में कानून ने बदल दिया है जांच का ढांचा
उत्तर प्रदेश ने 2021 में उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म परिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम लागू किया. कानून में गलत प्रस्तुतिकरण, बल, धोखा, अनुचित प्रभाव, जबरदस्ती या प्रलोभन के माध्यम से धर्म परिवर्तन पर रोक का प्रावधान है. इस में ऐसे विवाह को भी संबोधित किया गया है जिस का उद्देश्य धर्मांतरण से जुड़ा हो. कानून के तहत अपराधों को संज्ञेय और गैरजमानती बनाया गया है.
लेकिन इस कानून के लागू होने के शुरुआती दौर के आंकड़े यह भी बताते हैं कि ‘लव जिहाद’ के आरोपों में असली तसवीर हमेशा एकजैसी नहीं रही.
साल 2020 में अध्यादेश लागू होने के तकरीबन एक महीने बाद उत्तर प्रदेश पुलिस ने 14 मामले दर्ज किए थे और 51 गिरफ्तारियां हुई थीं. इन में 13 मामलों में हिंदू महिलाओं पर तथाकथित धर्मांतरण के दबाव का आरोप था. महत्वपूर्ण फैक्ट यह था कि उन 14 मामलों में केवल 2 मामलों में संबंधित महिला खुद शिकायतकर्ता थी, जबकि बाकी मामलों में रिश्तेदार शिकायतकर्ता थे.
यह फैक्ट कई सवाल उठाता है. अगर कोई बालिग लड़की अपनी इच्छा से किसी लड़के के साथ संबंध में है तो क्या उस की अपनी आवाज सब से अहम नहीं होनी चाहिए? और अगर वह धोखे, हिंसा या दबाव की शिकार है तो क्या जांच का केंद्र उस के धर्म के बजाय उस के साथ हुए अपराध पर नहीं होना चाहिए?
सुप्रीम कोर्ट ने बारबार किसी बालिग को अपने जीवनसाथी के चयन का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 से जोड़ा है. अदालत ने साफ किया है कि इनसान की पसंद, प्यार और सा?ोदारी उस के निजी स्वायत्तता के क्षेत्र का हिस्सा हैं और समाज को उस के साथी का चयन करने की भूमिका नहीं दी जा सकती, इसलिए 2 बातें एकसाथ सच हो सकती हैं, मरजी से किया गया अंतर्धार्मिक संबंध अपराध नहीं है, लेकिन धोखे, बल, जिस्मानी हिंसा, धमकी या जबरन धर्मांतरण का आरोप गंभीर अपराध है.
उत्तराखंड से उठता सवाल, नाम बदलना कितना बड़ा अपराध
उत्तराखंड में समयसमय पर ऐसे मामले सामने आए हैं जिन में मुसलिम लड़के पर हिंदू पहचान बता कर संबंध बनाने, विवाह का वादा करने, जिस्मानी शोषण करने या धर्मांतरण के दबाव का आरोप लगाया गया.
फरवरी, 2025 में हरिद्वार के एक मामले में पुलिस के सामने ऐसी शिकायत आई जिस में लड़की ने आरोप लगाया कि लड़के ने अपनी पहचान बदल कर उस से संबंध बनाए, शादी का वादा किया, कई बार रेप किया और बाद में धर्म बदलने का दबाव बनाया.
यहां भी आखिरी नतीजा अदालत और जांच पर निर्भर करता है, लेकिन पत्रकारिता के लैवल पर मामला एक अहम सवाल सामने रखता है, अगर किसी इनसान ने जानबू?ा कर अपनी पहचान छिपा कर किसी महिला की सहमति हासिल की, तो क्या वह सहमति असलियत में आजाद और सूचित सहमति थी? यही वह क्षेत्र है जहां आधुनिक अपराध कानून और डिजिटल युग की नैतिकता एकदूसरे से मिलती हैं.
जब प्यार का डिजिटल जाल ब्लैकमेल में बदल गया
जुलाई, 2025 में लखनऊ के एक मामले में लड़की ने पुलिस को शिकायत दी कि परिचित लड़के ने तथाकथित रूप से नशीला पदार्थ दे कर उस के साथ रेप किया, उस का अश्लील वीडियो बनाया और फिर उसे वायरल करने की धमकी दी. शिकायत में धर्मांतरण और निकाह के लिए दबाव के भी आरोप लगाए गए. पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू की.
इस मामले की सब से खास बात धर्म नहीं, अपराध का कथित क्रम है, विश्वास, जिस्मानी शोषण, वीडियो, ब्लैकमेल और फिर के कंट्रोल. अगर यही घटनाक्रम किसी दूसरे धर्म के 2 लोगों के बीच हो, तब भी अपराध की प्रकृति वही रहेगी.
यही वजह है कि ‘लव जिहाद’ की बहस को केवल धार्मिक पहचान तक सीमित कर देना अपराध की तकनीक को सम?ाने में बाधा डाल सकता है.
महाराष्ट्र में भी आरोप और प्रत्यारोप
महाराष्ट्र के उल्हासनगर में मई, 2026 में एक महिला ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराते हुए आरोप लगाया कि एक मुसलिम शख्स ने हिंदू पहचान बता कर उस के साथ संबंध बनाया और शादी के बाद उस पर धार्मिक रीतिरिवाज अपनाने और दूसरी तरह के दबाव डालने की कोशिश की.
पुलिस ने आरोपी और उस के भाइयों को गिरफ्तार किया और विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज किया, लेकिन महाराष्ट्र का दूसरा उदाहरण इस बहस को और पेचीदा बनाता है.
मार्च, 2026 में पुणे के वाघोली इलाके में एक 18 साल की हिंदू लड़की ने पुलिस को लिखित रूप से बताया कि उस ने मुसलिम लड़के के साथ अपनी इच्छा से ब्याह किया है और वह उस के साथ रहना चाहती है. यह घटना बताती है कि हर अंतर्धार्मिक संबंध को खुद से अपराध मान लेना भी तथ्यात्मक रूप से गलत हो सकता है, इसलिए असली कसौटी धार्मिक पहचान नहीं, बल्कि सहमति और अपराध के सुबूत होने चाहिए.
छत्तीसगढ़ में नाबालिगों के मामले और भी गंभीर
छत्तीसगढ़ में अप्रैल, 2025 में कोरबा से एक मामले की रिपोर्ट आई जिस में मुसलिम लड़के पर नाबालिग हिंदू लड़की को बहलाफुसला कर ले जाने और उस के साथ सैक्स अपराध करने का आरोप लगा और गिरफ्तारी की गई.
नाबालिग के मामले में मामला और भी साफ हो जाता है. वहां ‘प्यार’ की बहस कानूनी सहमति का औप्शन नहीं बन सकती. बच्चे की हिफाजत सर्वोच्च प्राथमिकता है.
रायपुर से भी साल 2025 में एक बालिग हिंदू लड़की और मुसलिम लड़के के ब्याह को ले कर ‘लव जिहाद’ के आरोपों का विवाद सामने आया. ऐसे मामलों में पुलिस और अदालत के लिए यह जरूरी है कि आरोपों, लड़की के बयान और उपलब्ध सुबूतों की बुनियाद पर फैसला किया जाए, न कि सोशल मीडिया के दबाव की बुनियाद पर.
निजी तसवीर, अपराधी का सब से खतरनाक हथियार
डिजिटल युग ने तथाकथित अपराध पद्धति को एक नया हथियार दिया है, निजी तसवीर और वीडियो. पहले किसी महिला को समाज में बदनाम करने की धमकी देने के लिए आरोपी को बहुतकुछ करना पड़ता था. अब एक मोबाइल फोन ही काफी है. निजी तसवीर एक सैकंड में सैकड़ों लोगों तक पहुंच सकती है.
सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66ई किसी इनसान की निजी जगह की तसवीर को उस की रजामंदी के बिना कैप्चर, प्रकाशित या प्रसारित करने को दंडनीय बनाती है. इसी कानून में धारा 67 और 67ए इलैक्ट्रौनिक माध्यम से अश्लील और यौन रूप से स्पष्ट सामग्री के प्रकाशन या प्रसारण से संबंधित अपराधों को संबोधित करती हैं.
नए आपराधिक कानून में भी महिलाओं के विरुद्ध सैक्स अपराध, पीछा करना और संबंधित अपराधों के लिए प्रावधान हैं. भारतीय न्याय संहिता में जिस्मानी शोषण, वौयूरिज्म और स्टौकिंग जैसे अपराध अलगअलग धाराओं में संबोधित किए गए हैं यानी किसी महिला को यह कह कर डराना कि ‘तुम ने मेरा साथ नहीं दिया तो वीडियो वायरल कर दूंगा’, यह प्यार की भाषा नहीं, आपराधिक कंट्रोल की भाषा है.
क्या यह संगठित धार्मिक साजिश है
यही सब से मुश्किल सवाल है. कुछ मामलों में पुलिस ने संगठित गिरोह, फर्जी पहचान या धर्मांतरण नैटवर्क की जांच की है. साल 2025 में उत्तर प्रदेश के कुशीनगर में पुलिस ने 8 लोगों की गिरफ्तारी की सूचना दी थी और आरोप था कि एक संगठित नैटवर्क लड़कियों को बहलाफुसला कर धर्मांतरण की दिशा में ले जा रहा था.
आगरा से भी साल 2025 में उत्तर प्रदेश पुलिस ने 6 राज्यों से जुड़े कथित धर्मांतरण नैटवर्क में 10 लोगों की गिरफ्तारी की जानकारी दी थी. पुलिस के मुताबिक आरोपियों द्वारा लड़कियों को प्रभावित करने के लिए ‘लव जिहाद’ जैसी चालों के इस्तेमाल की जांच की जा रही थी.
लेकिन किसी एक या कई मामलों से पूरे धर्म के करोड़ों अनुयायियों को अपराधी मान लेना सही नतीजा नहीं हो सकता.
अपराधी का धर्म उस की आपराधिक जिम्मेदारी को न तो बढ़ाता है और न घटाता है. अगर किसी मुसलिम लड़के ने धोखा दिया है तो वह अपने अपराध का जिम्मेदार है. उसी तरह किसी हिंदू लड़के द्वारा किसी मुसलिम लड़की को धोखे से फंसाने, ब्लैकमेल करने या जिस्मानी शोषण करने पर भी वही सिद्धांत लागू होना चाहिए. कानून इनसान को देखता है, समुदाय को नहीं.
‘लव जिहाद’ शब्द की सब से बड़ी समस्या
इस शब्द के 2 अलगअलग मतलब सार्वजनिक बहस में मिल जाते हैं. पहला, ऐसे मामलों के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला राजनीतिकसामाजिक शब्द, जिस में आरोप लगाया जाता है कि मुसलिम लड़के योजनाबना कर हिंदू लड़कियों को प्यार के नाम पर धर्मांतरण की ओर ले जाते हैं.
दूसरा, वे आपराधिक घटनाएं जिन में पहचान छिपाने, धोखे, बल, जिस्मानी शोषण, ब्लैकमेल या जबरन धर्मांतरण का आरोप है.
पहले दावे के लिए नैशनल लैवल पर कोई प्रमाणित केंद्रीय आंकड़ा उपलब्ध नहीं है. दूसरी तरह के अपराधों के लिए कानून मौजूद हैं और पुलिस या कानून व्यवस्था उन्हें अलगअलग धाराओं में दर्ज कर सकती है. यही फर्क पत्रकारिता में बेहद खास है.
अगर किसी घटना में आरोपित इनसान ने धर्म छिपाया, तो इसे रिपोर्ट किया जा सकता है. अगर उस ने रेप किया, तो उस का जिक्र होना चाहिए. अगर निजी वीडियो बना कर ब्लैकमेल किया, तो साइबर ब्लैकमेल या संबंधित अपराध का जिक्र होना चाहिए. अगर जबरन धर्मांतरण का आरोप है, तो संबंधित राज्य के कानून के तहत जांच की बात कही जानी चाहिए.
लेकिन ‘यह इसलाम का आधुनिक जिहाद है’, यह नतीजा तभी पत्रकारिता में रखा जा सकता है जब उस के समर्थन में ठोस, पुख्ता और काफी सुबूत हों. अभी उपलब्ध केंद्रीय अपराध सांख्यिकी ऐसा सुबूत पेश नहीं करती.
पीडि़ता की आवाज सब से ऊपर
ऐसे मामलों में सब से ज्यादा नुकसान अकसर उस लड़की का होता है जो 2 तरफ से दबाव ?ोलती है.
एक तरफ आरोपी का कथित ब्लैकमेल, धमकी या हिंसा. दूसरी तरफ परिवार, समाज और सोशल मीडिया का दबाव.
कई बार लड़की पुलिस के सामने कुछ कहती है और सोशल मीडिया पर उस के बारे में दूसरी कहानी चलने लगती है. कई मामलों में परिवार शिकायतकर्ता बन जाता है जबकि संबंधित लड़की खुद अपने संबंध को अलग तरीके से देखती है.
उत्तर प्रदेश में कानून लागू होने के शुरुआती मामलों में भी यह फैक्ट सामने आया था कि ज्यादातर शिकायतें लड़की के बजाय उस के रिश्तेदारों ने दर्ज कराई थीं, इसलिए पुलिस के लिए सब से जरूरी है, लड़की का बिना किसी दबाव में आए सुरक्षित बयान. न्यायपालिका के लिए सब से जरूरी है, सुबूत. मीडिया के लिए सब से जरूरी है, उसे सर्टिफाई करना और समाज के लिए सब से जरूरी है पीडि़ता को अपराध का दूसरा शिकार न बनाना.
सोशल मीडिया की प्रेम व्यवस्था में सावधानी क्यों जरूरी है
आज किसी अनजान इनसान की डिजिटल पहचान को सर्टिफाई करना आसान नहीं है. तसवीर किसी और की हो सकती है. नाम बदला जा सकता है. प्रोफाइल महीनों तक विश्वास पैदा कर सकता है. लड़कियों को ही नहीं, लड़कों को भी सम?ाना होगा कि डिजिटल निकटता असली पहचान की गारंटी नहीं है.
निजी तसवीरें सा?ा करना, वीडियो काल रिकौर्ड होने देना, ओटीपी देना, बैंक संबंधी जानकारी सा?ा करना या किसी इनसान से अकेले मिलने का फैसला, इन सब में सावधानी बरतना जरूरी है. और अगर कोई इनसान निजी तसवीर वायरल करने की धमकी देता है तो चुप रहना समाधान नहीं है. स्क्रीनशौट, चैट, फोन नंबर, प्रोफाइल लिंक, ईमेल और दूसरे डिजिटल सुबूत महफूज रखना जांच में मदद कर सकता है.
समाज को 2 अतियों से बचना होगा
पहली अति है, हर अंतर्धार्मिक प्यार को साजिश मान लेना. दूसरी अति है, हर आरोप को यह कह कर खारिज कर देना कि यह केवल सांप्रदायिक राजनीति है. दोनों नजरिए खतरनाक हैं.
अगर असलियत में धोखा, जिस्मानी हिंसा या जबरन धर्मांतरण हुआ है तो पीडि़ता को इंसाफ मिलना चाहिए. अगर 2 बालिग अपनी इच्छा से अलग धर्मों के बावजूद साथ रहना चाहते हैं तो उन्हें सामाजिक हिंसा और दबाव से सिक्योरिटी मिलनी चाहिए.
सुप्रीम कोर्ट ने बालिग के जीवनसाथी के चुनाव को निजी आजादी से जोड़ा है. अदालत ने यह भी साफ किया है कि परिवार या समुदाय की सहमति बालिगों की शादी के लिए जरूरी नहीं है, इसलिए भारत के लोकतांत्रिक समाज के सामने असली चुनौती प्यार रोकना नहीं, धोखे और हिंसा को रोकना है.
आंकड़ों से निकला नतीजा
साल 2024 में देश में 1,01,928 साइबर अपराध दर्ज होना बताता है कि डिजिटल अपराध अब हाशिए की समस्या नहीं है.
उत्तर प्रदेश में 11,073, महाराष्ट्र में 9,922, छत्तीसगढ़ में 660 और उत्तराखंड में 543 साइबर अपराध दर्ज हुए. लेकिन इन में से कितने ‘लव जिहाद’ थे, इस का राष्ट्रीय आधिकारिक आंकड़ा नहीं है, इसलिए हमें आंकड़ों को तोड़मरोड़ कर किसी नतीजे की पुष्टि करने के बजाय एक नई अपराध श्रेणी पर ध्यान देना चाहिए… डिजिटल रोमांस फ्रौड, पहचान की धोखाधड़ी, जिस्मानी शोषण, साइबर ब्लैकमेल और जबरन कंट्रोल. यह समस्या धर्म की सीमा से कहीं बड़ी है.
हां, अगर किसी मामले में धार्मिक पहचान छिपा कर संबंध बनाया गया और उस के बाद धर्मांतरण का दबाव, हिंसा या जिस्मानी शोषण हुआ, तो उस की गंभीरता कम नहीं किया जा सकता. ऐसे मामलों की निष्पक्ष जांच और कठोर कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए. लेकिन किसी अपराधी की पहचान को करोड़ों लोगों की धार्मिक पहचान से जोड़ देना इंसाफ की जगह सामूहिक शक पैदा करता है.
आखिरी सवाल, हम किसे बचाना चाहते हैं?
अगर किसी लड़की को ?ाठी पहचान से फंसाया गया, उस के साथ गलत काम हुआ, निजी वीडियो बनाया गया और उसे धमकाया गया, तो उसे इंसाफ मिलना चाहिए.
अगर किसी लड़की ने अपनी इच्छा से किसी दूसरे धर्म के लड़के को जीवनसाथी चुना है, तो उस की इच्छा की इज्जत होनी चाहिए. दोनों हालात को एक ही तराजू में नहीं तोला जा सकता.
‘लव जिहाद’ शब्द राजनीतिक बहस का हिस्सा बन चुका है, मगर अपराध की जांच राजनीति से नहीं, सुबूत से होनी चाहिए. किसी धर्म को कठघरे में खड़ा करने से पहले यह पूछना जरूरी है कि क्या हमारे पास संगठित साजिश का सुबूत है?
और किसी पीडि़ता की शिकायत को खारिज करने से पहले यह पूछना भी उतना ही जरूरी है कि क्या उस के साथ सच में धोखा, हिंसा, जिस्मानी शोषण या जबरन धर्मांतरण हुआ है? इन दोनों सवालों के बीच ही जिम्मेदार पत्रकारिता का रास्ता निकलता है.
भारत का संविधान प्यार करने की आजादी देता है, लेकिन किसी को धोखा देने की आजादी नहीं देता. कानून धर्म बदलने के नाम पर बल और धोखे को स्वीकार नहीं करता, लेकिन वह बालिगों की अपनी आजाद पसंद को भी अपराध नहीं बनाता.
इसलिए बहस को ‘हिंदू बनाम मुस्लिम’ से आगे ले जाने का समय आ गया है. असल लड़ाई है सहमति बनाम छल, प्रेम बनाम शोषण, निजी स्वतंत्रता बनाम जबरदस्ती और डिजिटल संवाद बनाम डिजिटल अपराध. यदि कोई व्यक्ति प्रेम के नाम पर धोखा देता है, वह अपराधी है.
अगर कोई इनसान निजी तसवीर के नाम पर धमकाता है, वह अपराधी है. अगर कोई इनसान जबरदस्ती धर्मांतरण कराता है, वह कानून के सामने जवाबदेह है.
और अगर कोई इनसान केवल इसलिए किसी बालिग महिला के चुनाव को अपराध घोषित करता है क्योंकि उस का साथी दूसरे धर्म का है, तो वह भी संवैधानिक आजादी की मूल भावना को चुनौती देता है.
‘लव जिहाद’ की बहस का सब से जिम्मेदार नतीजा शायद यही है कि नाम चाहे जो दिया जाए, हर मामले की जांच इनसान, सुबूत और कानून की बुनियाद पर होनी चाहिए, धर्म की बुनियाद पर नहीं.
यही बात पीडि़ता को इंसाफ भी दे सकती है और बेकुसूर को सामूहिक शक से बचा भी सकती है. Social Issues




