Editorial. जिस जेनजी ने सरकार को दिल्ली के जंतरमंतर पर धरने से हिला दिया उसी की दिल्ली यूनिवर्सिटी के स्टूडैंट्स यूनियन के इलैक्शन में हार ने भाजपा सरकार की भगवा मूवमैंट को नई राहत दे दी है. चुनावों में जेनजी का जोर चला और उस ने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के मुकाबले कांग्रेस की सपोर्ट पर चलने वाली नैशनल स्टूडैंट्स यूनियन औफ इंडिया को वोट पहले से कहीं ज्यादा दिलवाए पर जीत नहीं दिला सके.

यह तो साफ था कि भाजपा ने पैसा खर्चने में कोई कमी नहीं छोड़ी थी और स्टूडैंट्स यूनियन के इलैक्शन में महंगी मर्सीडिज, बीएमडब्लू, लैंबोर्गिनी तक घूम रही थीं. राजनीति में माहिर लोगों ने लगाम पकड़ रखी थी जो खेमों को तोड़ने में कृष्ण की तरह माहिर हैं.

दूसरी तरफ एनएसयूआई सोच रही थी कि वह चुनाव कौकरोचों के बल पर जीत जाएगी, ऐसा नहीं हुआ क्योंकि कौकरोच यह तो बता सकते हैं कि कहां गंदगी है पर उसे कैसे ठीक किया जाए यह बताना न उन के बस का है न उन का काम है. चुनाव जीतना एक मेहनत का काम है और भगवा खेमा सदियों से इस में एक्सपर्ट रहा है जब वह राजाओं में से अपनी मरजी के राजकुमार को चुनता था.

गांवगांव में भगवाई फूट डालो और राज करोका फार्मूला अपना कर उन को बहकातेबहलाते रहे हैं जिस पर वे जबरन अपने नियमकानून थोपते हैं. एससीएसटी और ओबीसी में लड़ाई करा कर वे जीतते रहे हैं. अब वे कौकरोच जनता पार्टी में किसी दिन फूट डलवा देंगे और जंतरमंतर उन के मंतर से उड़नछू हो सकता है. दिल्ली यूनिवर्सिटी में उस की  झलक दिखी कि कैसे जेनजी को भी फुसलाया जा सकता है जो एग्जामों के चक्करों, बढ़ती फीसों, बढ़ती बेरोजगारी से कराह रही है.

जेनजी का बड़ा वर्ग मोबाइल प्रेमी है, वह पैरों से चल कर वोट डालने नहीं गया, किसी को मोबाइल पर फौलो करना उस के बस का है. वोटिंग के लिए छुट्टीके दिन यूनिवर्सिटी या कालेज जाना था जो उस ने टाल दिया. जंतरमंतर के तमाशे ने उसे अट्रैक्ट किया था पर वहां सिर्फ कुछ डंडे खाने के और तो म्यूजिक व डांस था. इलैक्शन में यह कहां होता है.      Editorial

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