कल रात से अनामिका बहुत ज्यादा बेचैन थी. पिछले हफ्ते उस की और विजय की लड़ाई हो गई थी, तब से विजय ने उसे मोबाइल पर ब्लौक कर दिया था.

सुबह उठते है अनामिका ने कैब बुक की और विजय के घर जा धमकी. डोरबैल बजाई तो काफी देर के बाद विजय की मम्मी ने दरवाजा खोला.

“नमस्ते आंटी,” अनामिका बोली, पर आंटी तो उस की नमस्ते लेने से पहले ही तकरीबन भागते हुए अपने कमरे में गईं.

अनामिका का दिल धड़क कर रह गया. वह भी तेजी से कमरे में गई और वहां का माहौल देख कर दंग रह गई.

सारा सामान इधर उधर फैला हुआ था. कई सूटकेस खुले थे. बहुत से बक्सों का सामान इधरउधर फैला हुआ था.

“विजय, तू टांड के ऊपर वाला बैग निकाल,” विजय के पापा चिल्लाए.

अनामिका को कुछ समझ नहीं आया, फिर भी उस ने पूछा, “अंकल, क्या दीवाली की सफाई चल रही है? मैं कुछ मदद करूं?”

पर उन तीनों को कहां फुरसत थी. वे तो पता नहीं किस धुन में थे और पता नहीं किस खजाने की चाबी ढूंढ़ रहे थे.

“विजय, तुम ने मुझे फोन क्यों नहीं किया? पता है मैं कितनी परेशान थी,” अनामिका ने दुखी मन से कहा.

विजय तो चुप रहा, पर उस के पापा ने कहा, “अनामिका, तुम जरा 4 कप चाय बना लो.”

“ठीक है अंकल,” अनामिका ने बेमन से कहा और रसोईघर में चली गई.

“और हां, चाय दिल्ली वाली बनाना, बिहार वाली नहीं,” विजय की मम्मी ने चुटकी ली, तो अनामिका मुसकरा दी.

कुछ देर के बाद अनामिका चाय और बिसकुट ले आई.

वे तीनों भी ड्राइंगरूम में आ गए और चाय पीने लगे.

“चाय तो बहुत अच्छी बनाई है,” विजय की मम्मी ने कहा.

“आंटी, बाकी सब तो ठीक है पर आप लोगों ने घर का कबाड़खाना क्यों बना रखा है. ऐसा क्या ढूंढ़ रहे हैं कि मुझे भी नहीं बताया?” अनामिका ने पूछा.

“कुछ मत पूछो. हम अपने घर का पता ढूंढ़ रहे हैं वरना हमारे वोट कट जाएंगे,” विजय बोला.

“मतलब?” अनामिका ने पूछा.

“हमारे घर का नंबर बदल गया है. अब तक तो हम पुराने नंबर से काम चला रहे थे, पर अब हम से कहा गया है कि घर के पुराने नंबर का प्रूफ लाओ, तभी वोटर लिस्ट में सब का नाम चढ़ेगा,” विजय के पापा ने कहा.

“अच्छा, तो आप सब पुराने नंबर के कागजात ढूंढ़ रहे हैं?” अनामिका बोली.

“हां, पर यह सब तो चलता रहेगा. तेरी चाय ने हम सब का मूड सही कर दिया. हम कल से परेशान थे. तू आ गई तो घर में रौनक आ गई है. तेरे आने से हम सब का मन लग गया,” विजय की मम्मी ने अनामिका के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा.

“पर आंटी, मैं आप के बेटे से नाराज हूं. इस ने मुझे ब्लौक कर दिया है. मुझे लगता है कि विपक्ष की तरह मुझे भी विजय के खिलाफ मोरचा निकालना होगा कि मुझे इंसाफ मिले,” अनामिका बोली.

“विपक्ष ने क्या किया?” विजय के पापा ने पूछा.

“जैसे आप के वोट कटने का डर है, ऐसे ही विपक्ष ने इलजाम लगाया है कि चुनाव आयोग और केंद्र सरकार ने मिल कर 13 करोड़ वोट काट दिए हैं और वे राहुल गांधी की अगुआई में सड़क पर उतर कर मुख्य चुनाव आयुक्त का इस्तीफा मांग रहे हैं,” अनामिका बोली.

“राहुल गांधी के प्रदर्शन वाला क्या मामला है?” यह सवाल विजय की मम्मी ने किया था.

“आंटी, मैं ने बीबीसी की एक बड़ी रिपोर्ट पढ़ी थी. हुआ यों कि दिल्ली में वोट चोरी वाले मामले में राहुल राहुल गांधी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को ले कर हो रहे प्रदर्शन में शामिल थे. यह विरोध प्रदर्शन मतदाता सूचियों के विवादित एसआईआर (स्पैशल इंटैंसिव रिविजन) के खिलाफ किया जा रहा था,” अनामिका ने बताया.

“अच्छा, आगे क्या हुआ था वहां?” मम्मी ने चाय की चुसकी लेते हुए पूछा.

“इस सारे बवाल में राहुल गांधी और उन की बहन प्रियंका गांधी वाड्रा को पुलिस जबरन आकाशवाणी के कैंपस से एक बस की ओर ले गई थी. इस से पहले सैकड़ों पुलिस वालों ने उन्हें निर्वाचन आयोग के मुख्यालय की ओर मार्च करने से रोक दिया था. फिर दोनों को शाम में रिहा कर दिया गया था.

“खबरों के मुताबिक, विपक्षी नेता मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने और मतदाता सूची में किए गए विवादित बदलाव को रद्द करने की मांग कर रहे हैं. इस प्रक्रिया में मतदाता सूची से 13 करोड़ से ज्यादा नाम हटाए गए हैं.

“विपक्ष का आरोप है कि इस प्रक्रिया से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सत्तारूढ़ पार्टी को अनुचित लाभ मिला है, जबकि चुनाव आयोग और नरेंद्र मोदी की भारतीय जनता पार्टी ने इन आरोपों से इनकार किया है.”

“राहुल गांधी तो फिर काफी गुस्से में होंगे?” मम्मी ने अगला सवाल किया.

“बिलकुल. राहुल गांधी विरोध प्रदर्शन के दौरान पुलिस अधिकारी से बहस करते भी दिखे. एक पुलिस अधिकारी ने राहुल से कहा कि उन्हें यहां से चले जाना चाहिए.”

“अच्छा, पुलिस की इतनी हिम्मत?”

“इस पर राहुल गांधी ने कहा, ‘क्या लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन का अधिकार नहीं है? क्या विपक्षी सांसद मुख्य चुनाव आयुक्त से नहीं मिल सकते हैं?’

“इस के जवाब में पुलिस अधिकारी ने कहा कि आप को चुनाव आयोग में अपौइंटमैंट लेना चाहिए था. जवाब में राहुल ने कहा, ‘मैं ने कई बार अपौइंटमैंट मांगा लेकिन मिला नहीं? दिल्ली में कोई ऐसी जगह बता दो मैं वहीं चला जाता हूं विरोध प्रदर्शन करने.”

“यह तो एकदम सटीक जवाब दिया. बाकी लोग क्या कह रहे हैं?” इस बार विजय के पापा ने पूछा.

“सु्प्रीम कोर्ट की सीनियर वकील और मानवाधिकार कार्यकर्ता वृंदा ग्रोवर दिल्ली पुलिस के रोल पर सवाल उठाया. उन्होंने एक्स पर एक पोस्ट में लिखा, ‘भारत के लोग शांतिपूर्ण प्रदर्शन के लिए जंतरमंतर नहीं जा सकते. विपक्षी नेता भारत निर्वाचन आयोग तक नहीं जा सकते. दुनिया मोदीशाह के लोकतंत्र की जननी के विचार को देख रही है. हम, भारत के लोग, अपने लोकतंत्र को फिर से हासिल करेंगे.’

“इतना ही नहीं मोदी सरकार में मंत्री रहे और पूर्व गृह सचिव आरके सिंह ने भी दिल्ली पुलिस की भूमिका पर सवाल उठाया. उन्होंने लिखा, ‘भारत के नागरिकों को संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत शांतिपूर्वक और बिना हथियार के एकत्र होने का मौलिक अधिकार प्राप्त है. ऐसे में दिल्ली के पुलिस आयुक्त जंतरमंतर पर प्रदर्शन को कैसे रोक सकते हैं?’

“उन्होंने आगे लिखा, ‘पुलिस मैनुअल के तहत पुलिस को सभाओं और जुलूसों को नियंत्रित करने का अधिकार है, लेकिन इस का मतलब यह नहीं हो सकता कि लोगों के एकत्र होने या प्रदर्शन करने पर पूरी तरह रोक लगा दी जाए. ऐसा करना संविधान का उल्लंघन होगा. पुलिस आयुक्त यह तर्क भी नहीं दे सकते कि जंतरमंतर पर प्रदर्शन से लोगों को असुविधा होगी, क्योंकि वहां पहले भी नियमित रूप से प्रदर्शन होते रहे हैं. पुलिस आयुक्त को संविधान और कानूनों के अनुसार, काम करना चाहिए, न कि किसी राजनेता के कथित अवैध निर्देशों के अनुसार.’

“चुनाव आयोग की कार्यशैली पर सवाल केवल विपक्ष ही नहीं उठा रहा है बल्कि इस संस्थान में शीर्ष पर रहे लोग भी उठा रहे हैं. चुनाव आयोग के पूर्व आयुक्त अशोक लवासा मानते हैं कि ईसी ने खुद को बहुत ही मुश्किल स्थिति में पहुंचा दिया है और अफसोस की बात है कि यहां तक पहुंचने में उस की अपनी भूमिका भी रही है.

“अशोक लवासा ने प्रमुख अंगरेजी अखबार ‘इंडियन एक्सप्रैस’ में 6 अक्तूबर को लिखा था, ‘वर्षों से अपने सहज और मैत्रीपूर्ण रवैए के कारण लोगों का विश्वास जीतने वाला यह संस्थान आज लगभग पूरी तरह अकेला पड़ गया है.’

”उन्होंने आगे लिखा, ‘उस का एकमात्र मित्र, सत्तारूढ़ दल, जब भी उस के बचाव में सामने आता है, आयोग को और ज्यादा मुश्किल स्थिति में धकेल देता है. ईसीआई के भीतर चल रही जंग अब सार्वजनिक हो चुकी है. 2 चुनाव आयुक्तों की ओर से लिखे गए 14 आपत्तियों ने मुख्य चुनाव आयुक्त को विवाद के केंद्र में ला दिया है, भले ही यह तूफान उन की अपनी स्थिति को भी प्रभावित कर सकता है.'” अनामिका ने बताया.

“तो क्या चुनाव आयोग ने कुछ नहीं कहा?” विजय ने पूछा.

“प्रदर्शन वाले दिन देर शाम इस मामले में चुनाव आयोग का जवाब भी आया. चुनाव आयोग ने कहा कि उस ने प्रदर्शन कर रहे सांसदों से ज्ञापन लेने के लिए प्रस्तावित बैठक स्थल पर ड्यूटी पर मौजूद सब से वरिष्ठ अधिकारी भेजने की पेशकश की थी. आयोग के मुताबिक़, यह अपनेआप में एक अभूतपूर्व कदम होता. हालांकि, प्रदर्शन कर रहे नेताओं ने यह प्रस्ताव भी ठुकरा दिया.

“राजधानी में आल इंडिया रेडियो के मुख्यालय आकाशवाणी भवन के अंदर प्रदर्शन स्थल से राहुल गांधी को हिरासत में लिए जाने के बाद जारी आधिकारिक बयान में चुनाव आयोग ने कहा कि शाम 4 बजे तक उसे मीडिया के जरीए ही यह जानकारी मिली थी कि कुछ सांसद मुख्यालय की ओर मार्च के दौरान अपने प्रतिनिधिमंडल के साथ आयोग से मिलना चाहते हैं.

“आयोग ने कहा, ‘आज शाम 4 बजे तक किसी भी राजनीतिक दल ने अपने प्रतिनिधियों के चुनाव आयोग से मुलाकात के लिए समय नहीं मांगा था.’

“‘हालांकि, करीब 4 बजे दिल्ली पुलिस से जानकारी मिली कि राहुल गांधी के नेतृत्व में सांसदों का एक प्रतिनिधिमंडल आयोग से मिलना और ज्ञापन सौंपना चाहता है.

“‘इस के बाद जब चुनाव आयोग इस अनुरोध पर विचार कर रहा था, तब दिल्ली पुलिस के डिप्टी कमिश्नर औफ पुलिस ने बताया कि प्रतिनिधिमंडल में 240 सांसद शामिल हैं और प्रस्तावित बैठक स्थल संसद भवन एनेक्सी है.’

“आयोग ने अपने बयान में कहा, ‘चुनाव आयोग ने इस अनुरोध को असामान्य माना और इसलिए इसे स्वीकार नहीं किया जा सका, क्योंकि ईसीआई के प्रोटोकौल के अनुसार, ऐसी बैठकें केवल भारत निर्वाचन आयोग के परिसर में ही होती हैं.’

“चुनाव आयोग ने कहा कि इसके बजाय उसने ड्यूटी पर मौजूद सब से वरिष्ठ अधिकारी को भेज कर ज्ञापन लेने की पेशकश की थी, लेकिन विपक्षी सांसदों ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया.

“आयोग ने आगे कहा कि 2025 में उस ने राजनीतिक दलों के साथ बैठक के लिए एक प्रक्रिया निर्धारित की थी और सभी राजनीतिक दलों को इस की जानकारी दी गई थी.

“आयोग ने कहा, ‘इस प्रक्रिया के तहत, जब किसी राजनीतिक दल का प्रतिनिधिमंडल या कई दलों का संयुक्त प्रतिनिधिमंडल चुनाव आयोग से मिलना चाहता है, तो उसे अपने अधिकृत प्रतिनिधि के जरीए मुलाकात के लिए समय मांगना होता है. इस के बाद बैठक का समय दोनों पक्षों की आपसी सहमति से तय किया जाता है.'”

“पर मतदाता सूची में बदलाव क्यों होता है? सरकार शक के दायरे में क्यों है?” विजय की मम्मी ने पूछा.

अनामिका ने बताया, “मतदाता सूची में बदलाव की इस प्रक्रिया को स्पैशल इंटैंसिव रिविजन के नाम से जाना जाता है. इस की शुरुआत पिछले साल बिहार से हुई थी, जहां भाजपा ने आराम से जीत हासिल की थी. इसके बाद इसे पूरे देश में लागू किया गया. अनुमान है कि तकरीबन 13 करोड़ नाम यानी कुल मतदाताओं के लगभग 13 फीसदी ना मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं.

“निर्वाचन आयोग ने इस प्रक्रिया का बचाव करते हुए कहा है कि हटाए गए नाम डुप्लीकेट, मृत लोगों या अप्रवासियों के थे. हालांकि, आलोचकों का आरोप है कि आयोग ने गलत तरीके से करोड़ों मतदाताओं के नाम हटा दिए, जिन में खासतौर पर मुसलिम मतदाता शामिल हैं और यह सब मोदी सरकार के दबाव में किया गया.

“पिछले एक साल में भाजपा ने कई राज्यों में जीत हासिल की है, जिन में विपक्ष के कब्जे वाला पश्चिम बंगाल भी शामिल है. अब भाजपा और उस के सहयोगियों का नियंत्रण ऐसे राज्यों पर है, जिन में देश की 70 फीसदी से अधिक आबादी रहती है. यह स्थिति 1970 के दशक में इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस के प्रभुत्व के करीब मानी जा रही है.

“भाजपा फरवरी, 2027 में उत्तर प्रदेश में भी अपना नियंत्रण बनाए रखने की कोशिश कर रही है. उत्तर प्रदेश भारत का सब से अधिक आबादी वाला राज्य है और यहां बड़ी मुसलिम आबादी रहती है.

“याद रहे कि साल 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को केवल 240 सीटें मिलीं, जिस के कारण नरेंद्र मोदी को सरकार बनाने के लिए तेलुगु देशम पार्टी और जनता दल (यूनाइटेड) जैसे सहयोगी दलों पर निर्भर रहना पड़ा. कांग्रेस ने 99 सीटें जीतीं, जिस से राहुल गांधी औपचारिक रूप से लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष की भूमिका संभाल सके और संसद में विपक्ष पहले की तुलना में अधिक मुखर नजर आ रहा है.”

“चलो, जो भी होगा, जल्दी ही सब के सामने आ जाएगा. वैसे भी अब भाजपा सिर्फ मंदिरमसजिद की ही बात करती है. वह लोगों को धार्मिक कामों में उलझाए रखना चाहती है. यही वजह है कि जेनजी भी इस सरकार से परेशान हो गए हैं. वे पेपर लीक मामले में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा भी ले चुके हैं. अब भाजपा की पोलपट्टी खुलती जा रही है,” विजय के पापा ने कहा.

“आप तो रहने ही दो करो. एक कागज तो ढूंढ़ नहीं पाए,” विजय की मम्मी ने कहा तो सब हंस पड़े. News Story

और कहानियां पढ़ने के लिए क्लिक करें...