Story in Hindi. पंडित जुगल किशोर शहर की सत्ताधारी पार्टी के सर्वेसर्वा थे. हाईकमान पर उन की पकड़ मजबूत थी, इसलिए पार्टी का बड़े से बड़ा कार्यकर्ता भी उन से दब कर रहता था.
रामकन्या झुग्गी झोपड़ी में रहने वाली एक पढ़ीलिखी औरत थी. वह अनुसूचित जाति की थी. उस का पति रामकिशन सरकारी दफ्तर में चपरासी था.
दिनरात नशे में धुत्त रहने की वजह से कई बार लापरवाही के चलते रामकिशन सस्पैंड भी हुआ, फिर भी उस की शराब नहीं छूटी थी.
ऐसे में रामकन्या पर घर की सारी जिम्मेदारी आ गई थी. किसी ने उसे सलाह दी, तो वह ठेले पर सब्जी बेचने लगी.
कई बार शराब को ले कर रामकिशन और रामकन्या के बीच झगड़ा होता था. रामकिशन उसे मारता था.
आज वही रामकन्या नगरपालिका की पार्षद थी. इस बस्ती के वार्ड की एक जिम्मेदार औरत.
पुरानी बात है. एक दिन पंडित जुगल किशोर शर्मा उस बस्ती से गुजर रहे थे. उन दिनों नगरपालिका के चुनाव का ऐलान हो चुका था. इस वार्ड से अनुसूचित जाति की औरत के लिए रिजर्वेशन था. उन्हें अनुसूचित जाति की दबंग औरत की जरूरत थी. पार्टी में ऐसी कोई दबंग औरत नहीं थी.
जब पंडितजी रामकिशन के घर के सामने से गुजर रहे थे, तब रामकिशन रामकन्या को पीट रहा था.
रामकन्या का बचाव करते हुए वे बोले, ‘तुम कैसे मर्द हो, जो अपनी जोरू को पीट रहे हो?’
‘हांहां, पीट रहा हूं. यह मेरी जोरू है. आप बीच में बोलने वाले कौन होते हैं?’ नशे में धुत्त रामकिशन ने यह बात कही, तब पंडितजी सोच में पड़ गए.
कुछ देर बाद वे संभलते हुए बोले, ‘देखो, यह तुम्हारी जोरू है. तुम इसे मारोपीटो. मु?ो बोलने का कोई हक नहीं है. मगर सारी बस्ती के सामने मारना क्या अच्छा है?’
‘अच्छेबुरे का पाठ हमें मत पढ़ाओ. मेरी जोरू मेरा कहना नहीं मानती है, इसलिए पीटता हूं.’
‘मैं तेरा कौन सा कहना नहीं मानती हूं. तु?ा से कहती हूं, शराब मत पी, मगर तू पीता है. तु?ो कितनी बार तेरे साहब ने सम?ाया है कि ड्यूटी पर शराब मत पी, मगर तू किसी की सुनता कहां है.
‘तू कितनी बार इस शराब की खातिर सस्पैंड हुआ है, यह सोचा है. यह तो मैं कामधंधा कर के तेरी औलाद को खिला रही हूं… अगर नहीं खिलाती, तो तेरा परिवार सड़क पर आ गया होता.’
‘बहुत बढ़बढ़ कर बातें कर रही है.’
‘रामकिशन, तेरी जोरू सच कह रही है,’ पंडित जुगल किशोर बोले.
‘क्या सच कह रही है? मैं मर्द हूं, इसे मेरा कहना मानना चाहिए… मैं शराब पीऊं या लड़कियां नचाऊं… यह बोलने वाली कौन होती है?’
‘देखा पंडितजी, यह नहीं इस की शराब बोल रही है…’ रामकन्या गुस्से से बड़बड़ाई.
यह सुन कर रामकिशन लड़खड़ाते कदमों से रामकन्या को मारने दौड़ा.
अपना बचाव करती हुई रामकन्या पंडितजी के पीछे आ कर बोली, ‘पंडितजी, मुझे इस राक्षस से बचाओ.’
‘मुझे राक्षस कहती है. मैं राक्षस हूं,’ रामकिशन चिल्ला पड़ा.
‘हांहां, शराब के नशे में तू राक्षस लगता है,’ जब रामकन्या ने गुस्से से चिल्ला कर यह बात कही, तब रामकिशन उसे मारने के लिए ?ापटा, मगर रामकिशन का हाथ पकड़ते हुए पंडितजी बोले, ‘देख रामकिशन, तू नहीं जानता, शराब पी कर बस्ती में हंगामा करना कानूनन अपराध है. अगर तू अपनी जोरू को मारेगा, तो मैं पुलिस को बुला लूंगा.
‘तू सरकारी मुलाजिम है. ड्यूटी के समय शराब पीना जुर्म है, यह बात तू भी अच्छी तरह जानता है… बुलाऊं पुलिस को…’ कह कर पंडितजी ने जेब से मोबाइल फोन निकाला.
तभी रामकिशन माफी मांगते हुए बोला, ‘माफ करें पंडितजी, शराब पी कर मैं बहक जाता हूं.’
‘तो वचन दे, अब जोरू को नहीं मारेगा.’
‘बिलकुल नहीं मारूंगा.’
‘एक बात और कान खोल कर सुन ले…’ पंडितजी ने यह कह कर रामकन्या की ओर देखा, जिस का चेहरा गुस्से से अब भी लाल था, और बोले, ‘तेरी जोरू बड़ी हिम्मत वाली है. तुझे ऐसी जोरू पर नाज होना चाहिए. इस में बहुत दम है.’
‘आप क्या कह रहे हैं पंडितजी. मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा है,’ नशे में लड़खड़ाता हुआ रामकिशन बोला.
‘जब तेरी शराब उतर जाएगी, तब समझ में आएगा कि तेरी जोरू कितनी बड़ी बन सकती है,’ पंडितजी बोले.
‘क्या सचमुच मेरी रामकन्या बड़ी औरत बन सकती है?’ रामकिशन का नशा धीरेधीरे उतरने लगा.
‘मैं तेरी रामकन्या को अपनी पार्टी का सदस्य बनाना चाहता हूं…’ पंडित जुगल किशोर गहरी सांस ले कर बोले, ‘क्या तुझे कोई एतराज है?’
‘नहीं पंडितजी, मुझे कोई एतराज नहीं,’ रामकिशन ने हामी भरी.
‘पंडितजी, आप मेरे मर्द को नहीं जानते हैं…’ रामकन्या बोली, ‘मैं इस की आदतें अच्छी तरह जानती हूं. अभी तो इस ने हां कह दी, बाद में मना करकर के फिर अपनी मर्दानगी दिखाएगा. मुझ आप की पार्टी का सदस्य नहीं बनना है. मैं इस पचड़े में नहीं पड़ने वाली.’
रामकन्या का साफसाफ जवाब सुन कर पंडितजी ने अपना जाल फेंकते हुए कहा, ‘देखो रामकिशन, तुम्हारी जोरू के लिए यह सुनहरा मौका है. इस वार्ड से अनुसूचित जाति की ही औरत खड़ी हो सकती है. मैं यहां से रामकन्या को खड़ा करना चाहता हूं.’
‘नहीं पंडितजी, हम गरीब लोग कहां खड़े हो सकते हैं. चुनाव में खड़ा होने के लिए पैसा चाहिए और हम गरीबों के पास कहां है पैसा,’ रामकन्या ने कहा.
तब पंडितजी मोरचा संभालते हुए बोले, ‘पैसा तो पार्टी खर्च करेगी. रामकन्या तुम्हें गांठ से एक पैसा भी खर्च नहीं करना है.’
‘अरे रामकन्या, मान क्यों नहीं जाती. हमारी जाति का कोई चुनाव में खड़ा होगा, यह हमारे लिए खुशी की बात होगी,’ रामकिशन की आंखें खुशी से चमक उठीं. वह आगे बोला, ‘सारा खर्चा पार्टी उठा रही है. यह मौका मत छोड़ो रामकन्या… पंडितजी तुम्हें ऊंचा उठाना चाहते हैं. तुम जीत जाओगी, तो पार्षद कहलाओगी. जाति का नाम भी कमाओगी.’
‘अरे, जीतना उतना आसान नहीं, जितना तुम समझ रहे हो.’
‘जिताने की गांरटी भी मैं ले रहा हूं,’ पंडितजी ने तुरुप का पत्ता फेंक दिया.
आखिरकार पंडितजी ने रामकन्या को अपनी पार्टी का सदस्य बना लिया.
पंडितजी ने रामकन्या को उस वार्ड से टिकट दिया. काफी जद्दोजेहद के बाद वह जीत गई.
बस्ती वालों को रामकन्या से बहुत सी उम्मीदें थीं. बस्ती में सड़कें, नालियां बनेंगी और दूसरी सुविधाएं भी होंगी.
आज की बात करें, तो रामकन्या भले ही पार्षद बन गई थी, मगर उस का सब्जी बेचना जारी रहा. सालभर के भीतर ही उस ने एहसास कर लिया था कि उस के सारे सूत्र पंडितजी ने अपने पास रख छोड़े हैं. उसे तो केवल दस्तखत करने वाला मुहरा बना रखा है.
इस का नतीजा यह हुआ कि बस्ती वाले रामकन्या से नाराज हो गए. मगर उस ने उन की नाराजगी की परवाह नहीं की. पंडितजी की वह भले ही कठपुतली बनी रही, मगर उन के जरीए वह और भी ऊंचा उठना चाहती थी.
इस का नतीजा यह हुआ कि थोड़े दिनों बाद वह बस्ती के लोगों से कतराने लगी.
एक दिन नशे में धुत्त रामकिशन आ कर बोला, ‘‘ऐ रामकन्या, ये बस्ती वाले क्या कह रहे हैं?’’
‘‘क्या कहते हैं?’’ रामकन्या ने पूछा.
‘‘तुझ में घमंड आ गया है… तू उन की समस्याएं नहीं सुनती है.’’
‘‘बस्ती वालों का जितना भी काम करो, फिर भी वे खुश नहीं रहते हैं.’’
‘‘मत भूल कि अगली बार जब तू चुनाव में खड़ी होगी, तो वे तुझे हरा देंगे.’’
‘‘जब अगला चुनाव आएगा, तब की तब देखी जाएगी. अभी तो जो है, उसी में मौज करो,’’ यह कहते समय रामकन्या का सिर घमंड से ऊंचा उठ गया.
रामकिशन बोला, ‘‘जमीन पर चलना सीख, हवा में मत उड़. जमीन के लोग जमीन पर ही अच्छे लगते हैं. कल ये बस्ती वाले ही हमारे काम आएंगे, वे पंडितजी नहीं, समझ?’’
‘‘ठीक है, ठीक है, मुझे उपदेश मत पिला. आज मैं जो कुछ हूं, पंडितजी की वजह से हूं. मुझे जिताया, सो जिताया, पैसे भी खर्च किए, वरना हम कंगालों के पास क्या था?’’
‘‘हांहां, लेकिन तू यह क्यों भूल रही है कि पंडितजी तेरे कंधे पर बंदूक रख कर अपना मतलब निकाल रहे हैं. वे जैसा चाहते हैं, तुझे नचा रहे हैं और तू कठपुतली बन कर नाच रही है,’’ रामकिशन ने शराब के नशे में कह दिया.
रामकिशन के इस जहर भरे वाक्य ने रामकन्या को झकझोर दिया. वह चिल्ला कर बोली, ‘‘तू ही क्या, सारे बस्ती वाले पंडितजी से जलते हैं. यह मत भूल कि पंडितजी ही हमारे लिए सबकुछ हैं.’’
‘‘मेरी निगाह में तो वे बेईमान हैं.’’ ‘‘क्या कहा तू ने… वे बेईमान हैं?’’ रामकन्या चिल्ला कर बोली.
‘‘हांहां, वे बेईमान हैं,’’ रामकिशन ने भी उसी तरह जवाब दिया.
‘‘खबरदार, जो अपने मुंह से उन के लिए गंदे शब्द निकाले.’’ ‘‘हांहां, निकालूंगा… क्या कर लेगी तू मेरा?’’
रामकन्या गाली देते हुई बोली, ‘‘शराब पी कर ज्यादा जबान मत चला.’’ ‘‘देख रामकन्या, मुंह संभाल कर बात कर.’’
‘‘अरे, मुंह संभाल कर तो तू बात नहीं कर रहा है.’’
‘‘रामकन्या, तू अपने दायरे में रह. तू नेता बन गई, तो क्या हुआ? आखिर है तो मेरी जोरू…’’ नशे में लड़खड़ाता रामकिशन उस के पास आ कर बोला, ‘‘पंडितजी का मतलब पूरा हो जाएगा, तो तु?ो दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल कर फेंक देंगे.’’
‘‘खबरदार, अगर पंडितजी के बारे में कुछ कहा तो…’’ इतना कहते हुए रामकन्या रामकिशन के खानदान को गालियां देने लगी.
यह सुन कर रामकिशन रामकन्या को पीटने लगा. बस्ती वाले यह नजारा देख कर हंस रहे थे. Story in Hindi




