Short Story in Hindi. ठाकुर वीर सिंह की हवेली दुलहन की तरह सजी थी. बिजली वाले रंगबिरंगे बल्ब लगा कर हवेली को जगमगा रहे थे. फूल वाले उसे फूलों से सजा रहे थे और हलवाई कई तरह के पकवान बना रहे थे, जिन की खुशबू चारों ओर फैल रही थी.

हवेली के अंदर सिर्फ एक ही नाम पुकारा जा रहा था, ‘बिंदिया… बिंदिया… बिंदिया…’

हलवाई बोल रहा था, ‘‘बिंदिया बहू, भोजन तैयार है…’’

माताजी पुकार रही थीं, ‘‘बेटी बिंदिया, भोग का समय हो रहा है.’’

तभी ऊपर से आवाज आई, ‘‘बिंदिया भाभी, दूल्हे का सूट कहां रखा है?’’

हवेली के छोटे ठाकुर शक्ति सिंह की शादी हो रही थी और बरात जाने की तैयारी चल रही थी, लेकिन बिंदिया को घड़ी भर की भी फुरसत नहीं थी. वह अपनी सूझबूझ  से सारे काम बखूबी निबटा रही थी.

इसी बीच नौकरानी ने कहा, ‘‘बीबीजी, आप को बाबूजी बुला रहे हैं.’’

बिंदिया ने रसोई में जा कर भोजन का थाल सजा कर भोग लगाया, फिर शक्ति सिंह का सूट अलमारी से निकाल कर सीधे बाबूजी के पास पहुंची और बोली, ‘‘आप ने मुझे बुलाया बाबूजी?’’

बाबूजी ने कहा, ‘‘मैं ने तुम्हें इसलिए बुलाया था कि देखना किसी भी काम में कोई कमी न रह जाए. शादी का सारा काम तुझे ही संभालना है.’’

बिंदिया ने हंसते हुए कहा, ‘‘बाबूजी, आप परेशान न हों. मैं सब संभाल लूंगी.’’

बिंदिया के जाने के बाद बाबूजी सोच में डूब गए और उन्हें 3 साल पुरानी घटना याद आने लगी…

एक बार जब ठाकुर वीर सिंह अपनी पत्नी के साथ शहर जा रहे थे, तो रास्ते में तेज रफ्तार से आते एक ट्रक ने उन की गाड़ी को पीछे से टक्कर मार दी थी. उस हादसे में उन की पत्नी की टांग में बहुत चोट आई थी. ज्यादा खून निकलने से वे बेहोश हो गई थीं.

जैसेतैसे उन्होंने अपनी पत्नी को अस्पताल पहुंचा दिया था, पर उन्हें यह चिंता हो रही थी कि इस अनजान शहर में कौन उन की मदद करेगा. उन की पत्नी को जिस ग्रुप का खून चढ़ाया जाना था, वह अस्पताल में मौजूद नहीं था.

तब नर्स ने उन्हें खून देने वालों की लिस्ट थमाते हुए एक पते की ओर इशारा करते हुए कहा था, ‘आप इस पते पर जाइए, आप का काम हो जाएगा.’

ठाकुर वीर सिंह उसी वक्त उस पते पर जा पहुंचे. उन्होंने उस छोटे से घर का दरवाजा खटखटाया.

जल्दी ही 20-21 साला एक लड़की ने दरवाजा खोल कर पूछा, ‘कहिए, आप को किस से मिलना है?’

तब ठाकुर साहब ने सारी घटना बताई, जिसे सुनते ही लड़की ने अस्पताल जा कर अपना खून दे दिया.

खून मिल जाने से ठाकुर वीर सिंह की पत्नी की जान तो बच गई, पर कमजोरी के चलते लड़की की हालत खराब हो गई.

जब वह लड़की ठीक हो गई, तब ठाकुर साहब ने उसे बुला कर रुपए देने की कोशिश की, तो उस ने कहा, ‘बाबूजी, आप मुझे  जो रुपए दे रहे हैं, इन के सहारे मैं समाज में कितने दिन इज्जत से जी सकूंगी.

‘आप तो जानते हैं कि जब एक जवान लड़की के सिर से उस के मांबाप का साया उठ जाता है, तो समाज के भूखे भेडि़ए उसे ललचाई नजरों से देखने लगते हैं और मौका पा कर उसे नोचने लगते हैं, इसलिए आप मुझे रुपए नहीं, बल्कि कोई काम दे दीजिए.’

पहली बार ठाकुर साहब ने उस लड़की को गौर से देखा. वह उन्हें सुंदर व सुशील लगी. उन्होंने मन ही मन उसे अपने बड़े बेटे अजीत सिंह की पत्नी बनाने का फैसला किया और कहा, ‘बेटी, क्या तुम हमारे साथ गांव चलोगी? जब तक मेरी पत्नी चलफिर नहीं सकती, तुम्हें उन की सेवा करनी पड़ेगी… जब तुम कहीं और जाना चाहोगी, मैं भेज दूंगा.’

ठाकुर साहब ने अपनी पत्नी को मन की बात बताई, तो वे भी राजी हो गईं.

बिंदिया की सेवा और मालिश से ठकुराइन की टांग 2 महीने में ही पूरी तरह ठीक हो गई. फिर जल्दी ही उन्होंने उसे अपनी बहू बना लिया.

ठाकुर साहब अपने छोटे बेटे की शादी भी एक गरीब परिवार में कर रहे थे, जिसे बिंदिया ने ही पसंद किया था और कहा था, ‘बाबूजी, आप ने जैसे मुझ  गरीब को अपनी बहू बनाया, उसी तरह इस लड़की को भी अपना लीजिए.

‘गरीब पैसे का नहीं, प्यार का भूखा होता है. उसे जो प्यार करता है, उस पर वह सबकुछ न्योछावर कर देता है…’

यही सोचतेसोचते ठाकुर साहब की आंखों से आंसू निकल पड़े.

तभी बिंदिया की आवाज आई, ‘‘बाबूजी, जल्दी से खाना खा लीजिए. बरात के जाने का वक्त हो रहा है.’’

यह सुन कर उन्होंने जल्दी से अपनी आंखें पोंछीं और बिंदिया का सपना पूरा करने चल पड़े.  Short Story in Hindi

– अनिल सोनी

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