Scams- चर्चित टैंडर घोटाला मामले के रिशुश्री का नाम स्थानीय लोगों के लिए बहुत ज्यादा अपरिचित नहीं है. प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी ने जब बिहार के चर्चित टैंडर घोटाले और मनी लौन्ड्रिंग मामले में आरोपी ठेकेदार रिशु रंजन सिन्हा उर्फ रिशुश्री को विशेष निगरानी इकाई ने गिरफ्तार किया था, तब स्थानीय लोगों को कोई आश्चर्य नहीं हुआ था. गिरफ्तारी से पहले, पटना के मीठापुर में बने उस के आवास पर विशेष निगरानी इकाई की टीम ने करीब 11-12 घंटे तक छापेमारी की थी.
इस छापेमारी में तकरीबन 2 करोड़ रुपए के सोनेचांदी और हीरे के आभूषण, ढाई लाख नकद, विभिन्न बेनामी संपत्ति से जुड़े कई दस्तावेज और कई इलैक्ट्रौनिक उपकरण भी बरामद किए गए थे. गिरफ्तारी के बाद, उसे 14 दिन की न्यायिक हिरासत में बेऊर जेल भेज दिया गया था.
बताया जा रहा है कि रिशुश्री पहले से ही ईडी की जांच का सामना कर रहा है. उस के खिलाफ धन शोधन निवारण अधिनियम के तहत भी जांच चल रही है और एजेंसियां मामले के विभिन्न पहलुओं की पड़ताल कर रही हैं.
इस टैंडर घोटाले में रिशुश्री पर यह कोई पहला आरोप नहीं है. और न ही वह पहली बार जेल गया है. पिछले साल 30 अप्रैल, 2025 को टैंडर घोटाले में रिशुश्री का नाम संजीव हंस के साथ आया था. और इन दोनों के घरों पर ईडी का छापा पड़ा था.
उसी समय रिशुश्री के ठिकाने से चौंकाने वाले दस्तावेज बरामद हुए थे. लेकिन समस्या यह थी कि रिशुश्री के साथ कुछ और रसूखदार लोगों के नाम आ रहे थे. सो उसे बचाने की मुहिम शुरू हो गई. और यही कारण रहा कि रिशुश्री के खिलाफ कोई गंभीर कार्रवाई नहीं हुई.
हालांकि जांच एजेंसी को अपनी जांच में पता चल गया कि महज 7-8 साल से दलाली के धंधे का काम कर रहे रिशुश्री ने भारी कमाई की है. दिल्ली में रिएल स्टेट में उस ने काफी पैसा निवेश किया है. ईडी को उस के नाम से संपत्तियों के 61 सेल डीड मिले थे. इस के अलावा पटना और हाजीपुर में उस के 2 पैट्रोलपंप भी थे. उस की लग्जरी जिंदगी का आलम यह था कि पिछले 2 साल में उस ने बीएमडब्लू और लैंड क्रूजर जैसी आधा दर्जन से ज्यादा कारें खरीदी थीं. उस ने अनेक कंपनियों का जाल बिछा रखा था, ताकि पैसों को खपा सके.
पिछले तकरीबन 5 सालों में दुबई और यूरोपीय देशों की लगातार यात्राएं कर चुके रिशुश्री के प्रति जांच एजेंसी का अनुमान था कि उस ने बिहार सरकार के कई अधिकारियों की काली कमाई का विदेशों में निवेश किया है.
सालों तक, सचिवालय के संगमरमरी गलियारों में फुसफुसाहटों में उस का नाम गूंजता रहा है. रिशु रंजन सिन्हा उर्फ रिशुश्री यानी परदे के पीछे का आदमी. अनजान लोगों के लिए, वह बस एक नाम भर रहा है. लेकिन बिहार के नौकरशाही के गढ़ में रहने वालों के लिए, वह असली द्वारपाल था, जिस के आगे सत्ता से अनौपचारिक संपर्क सूत्र थे. इस की एक झलक से फाइलें विभागों से गुजर सकती थीं या गुमनामी में डूब सकती थीं.
उन्हीं दिनों जब बिहार पुलिस की विशेष निगरानी इकाई ने आखिरकार प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा बहुत पहले सौंपे गए सुबूतों के आधार पर मनी लौन्ड्रिंग के एक मामले में उस के खिलाफ एफआईआर दर्ज की, तो परदा उठने लगा था.
कबाड़ ठेकेदार के रूप में काम शुरू करने वाले रिशुश्री को सचिवालय में रिशु बाबू के नाम से संबोधित किया जाता था. रिशुश्री न कोई नौकरशाह था, न कोई निर्वाचित जनप्रतिनिधि ही, फिर भी उस की हनक कई माने में दोनों से ज्यादा ताकतवर थी. उस की ऐसी पहुंच थी कि बिहार के सत्ता प्रतिष्ठानों के गलियारों में प्रमुख आईएएस अफसरों के दफ्तरों में कोई भी बड़ी फाइल उस की मरजी के बिना आगे नहीं बढ़ती थी.
दरअसल, जब ईडी ने 16 जुलाई, 2024 को रिशु श्री की संपत्तियों पर छापा मारा, तो यह छापेमारी यहीं नहीं रुका. उसी दिन, आईएएस अफसर संजीव हंस के ठिकानों पर भी छापा मारा गया था.
यह छापेमारी इस खुफिया जानकारी के आधार पर थी कि संजीव हंस की ओर से रिशुश्री के जरीए हवाला लेनदेन किया जा रहा था. छापों से कई अहम दस्तावेज मिले. कुछ लोग तो इसे विस्फोटक दस्तावेज भी बताते थे.
एक सीनियर अफसर ने नाम न लिखने की शर्त पर जानकारी देते हुए बताया, ‘‘सब जानते थे. सवाल यह नहीं था कि रिशुश्री पकड़ा जाएगा या नहीं? सवाल यह था कि रिशु के बहाने कौनकौन सलाखों के पीछे होगा?’’
संजीव हंस के साथ रिशुश्री के संबंधों को खुलासा करने वाला एक और मामला भी उन्हीं दिनों सामने आया था. उसी साल एक महिला ने संजीव हंस पर दुष्कर्म के आरोप लगाये थे. उस तक रिशुश्री के ही माध्यम से 20 लाख रुपए पहुंचा कर मामले को रफादफा किया गया था.
ईडी के मुताबिक, आईएएस अफसर संजीव हंस, पूर्व विधायक गुलाब यादव के साथ ललित पर जिस महिला ने गैंगरेप का आरोप लगाया है, उस को रिशुश्री के जरीए 20 लाख रुपए दिए गए थे.
ईडी ने अपनी जांच रिपोर्ट में कहा है कि रिशुश्री की कंपनी मैसर्स ‘रिलायबल इंफ्रा सर्विसेज’ द्वारा सुनील कुमार सिन्हा को 20 लाख रुपए भेजे गए थे. सुनील सिन्हा ने यह राशि पीडि़ता को ट्रांसफर कर दी थी.
ईडी ने स्पष्ट रूप से आरोप लगाया था कि रिशुश्री अपनी कंपनियों के माध्यम से जल संसाधन विभाग में तब ठेका लेता था, जब संजीव हंस इस विभाग के सचिव थे. इस कारण 20 लाख रुपए का यह भुगतान वास्तव में संजीव हंस के लिए रिश्वत की रकम थी.
हालांकि, 14 फरवरी, 2025 को ईडी ने इओयू के एडीजी को एक पत्र भेज कर यह भी आरोप लगाया था कि संजीव हंस ने दुष्कर्म पीडि़ता को 90 लाख रुपए का भुगतान किया था. और यह दोनों ही बातें सच हो सकती हैं. लालच का कोई अंत नहीं होता. मगर इस से साफ पता चलता है कि रिशुश्री के संजीव हंस के साथ घनिष्ठ संबंध थे.
इधर सरकार बदली, तो लोगों के कान खड़े हुए. और जिस बात का आरोपितों को डर था, वही हुआ.
28 मई, 2026 को रिशुश्री को पकड़ कर बेऊर जेल के अंदर कर दिया गया. और इसी के साथ एक टैंडर घोटाला मामला सतह पर आ गया.
बिहार के चर्चित टैंडर घोटाला मामले में जांच का दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है. सूत्रों के अनुसार प्रवर्तन निदेशालय ने ठेकेदार रिशुश्री से जुड़ी 15 निजी कंपनियों को अपने रडार पर ले कर जांच तेज कर दी है. बुडको की तरफ से 2016 से 2025 तक दिए गए ठेकों, भुगतान और परियोजनाओं की जानकारी मांगी गई है.
जांच एजेंसी को शक है कि इन कंपनियों को नियमों के खिलाफ और भ्रष्ट तरीके से सरकारी ठेके दिए गए हो सकते हैं. जानकारी के मुताबिक इन कंपनियों को बिहार के नगर विकास एवं आवास विभाग की एजेंसी बुडको (बिहार शहरी आधारभूत संरचना विकास निगम) के माध्यम से सब से ज्यादा काम मिला था. अब ईडी इस पूरे मामले की गहराई से जांच कर रही है.
सूत्रों के मुताबिक, ईडी ने नगर विकास एवं आवास विभाग को पत्र भेज कर बुडको से जुड़ी इन 15 कंपनियों की पूरी जानकारी मांगी है. एजेंसी ने साल 2016 से ले कर 2025 तक इन कंपनियों को दिए गए सभी ठेकों, एग्रीमैंट, परियोजनाओं और भुगतान से जुड़ी जानकारी उपलब्ध कराने को कहा है.
जिन कंपनियों की जांच की जा रही है, उन में रिलायबल एंटरप्राइजेज और रिलायबल इंफ्रा सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड जैसी कंपनियां सीधेतौर पर रिशुश्री से जुड़ी बताई जा रही हैं. इस के अलावा श्री नैस्टबिल्ड इंफ्रा प्राइवेट लिमिटेड, अर्बन एनवायर्नमैंटल सौल्यूशंस प्राइवेट लिमिटेड, वीए टैक वबाग प्राइवेट लिमिटेड और रीताश्री एंटरप्राइजेज समेत कुल 15 कंपनियां जांच के दायरे में हैं.
इन सभी कंपनियों को बुडको के माध्यम से सीवरेज ट्रीटमैंट प्लांट, जलापूर्ति परियोजनाएं, शहरी सौंदर्यीकरण और आधारभूत ढांचे से जुड़े सैकड़ों करोड़ रुपए के प्रोजैक्ट दिए गए थे. अब इन परियोजनाओं से जुड़े दस्तावेज, भुगतान रिकौर्ड और टैंडर प्रक्रिया से संबंधित सभी जानकारी जांच एजेंसियों को उपलब्ध कराई जा रही हैं.
ईडी यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि टैंडर आवंटन प्रक्रिया में कहीं नियमों की अनदेखी तो नहीं की गई. साथ ही यह भी जांच की जा रही है कि तकनीकी और वित्तीय दस्तावेजों में किसी तरह की गड़बड़ी तो नहीं हुई और सरकारी भुगतान का पैसा किनकिन माध्यमों से गुजरा.
सूत्रों का कहना है कि आने वाले दिनों में इस मामले में कई अफसरों पर भी कार्रवाई की जा सकती है. इस पूरे मामले ने बिहार की नौकरशाही और राजनीतिक गलियारों में हलचल बढ़ा दी है. यह मान कर चला जा रहा है कि उस ने दुबई, फ्रांस और स्विट्जरलैंड में 12 आईएएस अफसरों के लिए प्रोपर्टी बनाई.
रिशुश्री को कथित हेराफेरी और कमीशनखोरी के मामले में गिरफ्तार कर 14 दिनों के लिए 29 मई, 2026 को ही बेऊर जेल भेज दिया गया था. आरोप है कि उस ने विभिन्न सरकारी विभागों में प्रभाव का इस्तेमाल कर के ठेके हासिल किए. इस के लिए रिशुश्री अधिकारियों को विदेश भेजने के अलावा लग्जरी लाइफस्टाइल मुहैया कराता था.
इसी कड़ी में एक और आरोपी संतोष कुमार की गिरफ्तारी 30 मई को हुई. सूत्रों के मुताबिक, गिरफ्तार संतोष कुमार मातोश्वरी कंपनी का डायरैक्टर है, जबकि इस कंपनी में रिशुश्री की पत्नी ऋतंभरा कुमारी भी डायरैक्टर के पद पर थी. यह कंपनी सुपौल से संचालित होती थी. जांच एजेंसी इस के वित्तीय लेनदेन और सरकारी ठेकों की जांच कर रही है. इस मामले में बिहार सरकार पूर्व में ही योगेश कुमार सागर और अभिलाषा कुमारी नाम के 2 सीनियर आईएएस अफसरों को सस्पैंड कर चुकी है.
पूछताछ के दौरान संतोष कुमार ने स्वीकार किया कि उस का मुख्य काम अफसरों तक घूस पहुंचाना और बेनामी संपत्तियां खरीदना था. जांच एजेंसियों को इस संबंध में डिजिटल सुबूत, चैट रिकौर्ड और वित्तीय लेनदेन से जुड़े कागजात मिले हैं.
रिशुश्री बिहार के एक सीनियर आईएएस अफसर के करीबी कनैक्शन ने जांच एजेंसियों को हैरान कर दिया है. जांच में सामने आया कि रिशुश्री कथिततौर पर इस अफसर को ‘आईएएस भैया’ कह कर बुलाता था. उस के मोबाइल में यह इसी नाम से सेव भी था.
एजेंसी अब यह पता लगा रही है कि ये संबंध केवल निजी था या टैंडर प्रक्रिया को प्रभावित करने में इस की कोई भूमिका थी. जब्त मोबाइल और डिजिटल डाटा की जांच जारी है.
यहां काली कमाई का खेल दिलचस्प था. संतोष, रिशुश्री की कंपनी मातृस्वा कंस्ट्रक्शन में फर्जी और बढ़ाचढ़ा कर खर्चे दिखाता था. इस खेल के जरीए बैंक खातों से मोटी नकदी निकाली जाती थी, जिस के द्वारा अफसरों की लग्जरी जरूरतें पूरी की जाती थीं.
इसी निकाली गई नकदी का इस्तेमाल बड़े नौकरशाहों और सरकारी इंजीनियरों को रिश्वत देने के लिए किया जाता था. साथ ही संतोष कुमार के माध्यम से रिशुश्री के लिए अनेक बेनामी संपत्तियां खरीदी गईं. एक दिलचस्प तरीका और कि रिश्वत के लिए नकदी का इंतजाम करने के लिए गाडि़यों के ईंधन फर्जी बिल भी तैयार किए जाते थे.
जांच में सामने आया है कि जल संसाधन विभाग में अपने रसूख का इस्तेमाल करते हुए 125 करोड़ रुपए का एक बड़ा टैंडर (सुपौल के बीरपुर में फिजिकल मौडलिंग सैंटर), पहले अहमदाबाद की कंपनी ‘शेवरौक्स’ को दिलवाया गया.
इस के बाद एक सोचीसम झी साजिश के तहत इसे सब कौन्ट्रैक्ट के जरीए रिशुश्री की कंपनी ‘मातृस्वा कंस्ट्रक्शन’ को ट्रांसफर करा दिया गया. संतोष इसी कंपनी में डमी डायरैक्टर के तौर पर काम कर रहा था.
बताया जाता है कि संतोष और रिशुश्री का संबंध साल 2010 से है. उन दिनों रिशुश्री डस्टबिन सप्लाई का काम शुरू किया करता था. धीरेधीरे भरोसा बढ़ा, तो रिशुश्री ने संतोष को अपनी कई शैल (फर्जी) कंपनियों में डायरैक्टर बना दिया.
90 के दशक में बिहार में टैंडर मैनेजिंग और विभागों में अपने वर्चस्व को ले कर खूनी गैंगवार होता था. बिहार में जितने बाहुबली थे, सभी के अपनेअपने क्षेत्र थे. आज सारे बाहुबली सफेदपोश हो चुके हैं.
जब नीतीश मुख्यमंत्री बने, तो धीरेधीरे इस खेल पर ब्रेक लगने लगा. एक ऐसा समय आया कि तथाकथित डौन के सहारे टैंडर मैनेज का खेल न के बराबर रह गया.
लेकिन कुछ दिनों बाद डौन की जगह सारे आईएएस और सरकारी सीनियर इंजीनियरों ने ले लिया और फिर शुरू हुआ एक खेल जिस का सरगना ‘रिशुश्री’ था. उन लोगों की हिम्मत और हिमाकत इतनी कि जनप्रतिनिधि विधायकमंत्रियों तक को अनदेखा करने लगे.
यह साल 2021 की बात है, जब बिहार के सामाजिक कल्याण मंत्री मदन सहनी ने नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली राज्य मंत्रिमंडल से इस्तीफा देने की पेशकश कर दी थी. वह इस कारण कि सरकार में नौकरशाह मंत्रियों की बात नहीं मानते हैं. बाद में कुछ जनप्रतिनिधियों ने मुखर हो कर, तो कुछ ने अप्रत्यक्ष रूप से इस बात को स्वीकार भी किया.
उन दिनों जिलाधिकारी, वरिष्ठ पुलिस कर्मचारी, सचिव और इंजीनियरों तक के मनचाहे पोस्टिंग और ट्रांसफर के लिए रिशुश्री के पैरवी ही काफी थे. हर विभाग में उस का दबदबा कायम था. सचिवालय में यह बात काफी प्रचलित थी कि अगर आप का काम रुका हुआ है, तो रिशुश्री को पकड़ो. वह आप को संकटमोचक बन कर मदद कर देगा.
अब तो यह राज खुल ही चुका है कि जिलाधिकारी के घर में लाखों की बागबानी करवाने और सचिव से ले कर प्रधान सचिव तक के विदेश में चार्टर प्लेन से घुमाने तक के खर्चा रिशुश्री के माथे होता था. पटना में ही इन के करीब सैकड़ों कट्ठे जमीन के सुराग, दसेक किलोग्राम सोनेचांदी, हीरेजवाहरात के जेवरात और अरबों रुपए निवेश के कागजात मिले हैं.
उन दिनों नीतीश कुमार के ऊपर ब्यूरोक्रैट्स का काला धब्बा ही लग गया था. और यही कारण है कि वे हमेशा बेबस से भी दिखे. उन दिनों उन की पार्टी के कमजोर होने का एक कारण यह भी था. वर्तमान में ऐसे सैकड़ों रिशुश्री बिहार में ब्यूरोक्रैट्स के संरक्षण में पल रहे हैं. आरोप तो यह भी है कि अपने नए आदमी को बिठाने के लिए पुराने सरकार के आदमी को फंसाया गया.
अभी रिशुश्री के 25 ऐसे कंपनियों के नाम सोशल मीडिया पर वायरल हैं, जिस को बड़ेबड़े सरकारी ठीके मिलते रहे. इन सब पर सरकार को संज्ञान लेने की जरूरत तो है ही.
जो भी हो, इस संगीन खेल में नौकरशाह, ठेकेदार तथा एक आम आदमी की हैसियत को देखना दिलचस्प तो है ही कि लोग कैसे करोड़ों में खेलने लगते हैं.
लालच बुरी बला है, सभी जानते हैं. फिर भी सभी फंसते और भुगतते हैं. बस कोई पहले, तो कोई देर से इस के चंगुल में आता है.
बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने हाल ही में इस की पूरी फाइल अपने हाथ में ले ली है. अब देखना तो यही है कि आगे क्या होगा.




