Politics. डाक्टर भीमराव अंबेडकर के बाद भारतीय राजनीति में दलित समाज से कई नेता उभरे, लेकिन वे दलितों के हित के लिए कोई क्रांतिकारी आंदोलन खड़ा नहीं कर पाए. दलित समाज से जो भी हाल में नेता हुए, अवसरवादी राजनीति का शिकार हो कर रह गए. ज्यादातर दलित नेताओं ने दलितों की भलाई के नाम पर वोटों को बेचने का ही काम किया. यही हाल मुसलिमों का भी रहा.
मुसलिम समाज के बीच से नेता तो कई उभरे, लेकिन यह किसी न किसी राजनीतिक पार्टी के दलाल ही बने रहे. मुसलिम नेताओं से मुसलिम समाज को कोई फायदा नहीं हुआ. मुसलिमों के हित की राजनीति करने की आड़ में इन मुसलिम नेताओं ने गैरमुसलिमों की पार्टी का ही भला किया.
आज की राजनीति में दलितों और मुसलिमों का कोई सर्वमान्य नेता नजर नहीं आता. आज की राजनीति में दलितों के बड़े नेताओं में मायावती, चंद्रशेखर आजाद रावण, रामदास अठावले, चिराग पासवान, जीतनराम मांझी जैसे लोग ही नजर आते हैं, जिन के लिए विचारधारा की कोई कीमत नहीं रह गई है. मायावती सिर्फ जाटवों की नेता बन कर रह गई हैं. चिराग पासवान दुसाध जाति के नेता हैं. चंद्रशेखर आजाद रावण भी दलितों की कुछ जातियों के नेता हैं और जीतनराम मांझी मुसहर समाज के नेता हैं. इस से ज्यादा इन नेताओं की कोई पहचान नहीं रह गई है.
बिना नायक की आबादी
भारत में दलितों की आबादी तकरीबन 24 करोड़ है, जो देश की कुल आबादी का 17 फीसदी है. आदिवासी समाज कुल आबादी का 9 फीसदी है यानी तकरीबन 11 करोड़ है. वहीं मुसलिमों की कुल आबादी तकरीबन 14 फीसदी यानी 20 करोड़ के आसपास है. दलित, मुसलिम और आदिवासी समाज के हालात तकरीबन एकजैसे ही हैं.
अर्जुन सेन गुप्ता की रिपोर्ट को सच मानें तो ज्यादातर मुसलिमों के हालात दलितों से बदतर हैं. दलितों, मुसलिमों और आदिवासियों की कुल आबादी को जोड़ दिया जाए तो देश की आबादी में इन तीनों समाजों का अनुपात तकरीबन 40 फीसदी हो जाता है. इस में ईसाई, सिख, बौद्ध और दूसरे अल्पसंख्यक समाजों को भी जोड़ लिया जाए तो यह फीसदी 50 के पार पहुंच जाएगा, लेकिन फिर भी मौजूदा राजनीतिक माहौल में देश की यह आधी आबादी पूरी तरह सत्ता से दूर नजर आती है.
40 फीसदी आबादी होने के बावजूद मुसलिम, दलित और आदिवासी पूरी तरह हाशिए पर हैं. नेता नहीं, मीडिया नहीं, उद्योगपति नहीं, लेखक नहीं और कोई नायक नहीं.
मुसलिम, दलित व आदिवासियों के जो नेता संसद और विधानसभाओं में हैं, वे अपनेअपने समाजों और उन की समस्याओं से इतने ऊपर उठ चुके हैं कि उन्हें समाज के भीतर की मुश्किलें नजर ही नहीं आती हैं.
दलित, मुसलिम और आदिवासी समाज की सब से बड़ी समस्या अशिक्षा है, लेकिन इसे दूर करने में इन समाजों के नेताओं की कोई दिलचस्पी नहीं है.
मेनस्ट्रीम मीडिया के बंद दरवाजे
मीडिया में नुमाइंदगी नहीं होने के चलते दलितों, मुसलिमों और आदिवासियों की असली समस्याएं कभी हाईलाइट ही नहीं हो पाती हैं. गरीबी, बेरोजगारी का दंश झेलते इन तीनों समाजों का जम कर शोषण होता है, अत्याचार होते हैं, लेकिन इन की ऐसी खबरें कभी भी मेनस्ट्रीम मीडिया तक नहीं पहुंच पाती हैं.
मुख्यधारा की मीडिया में दलित, मुसलिम और आदिवासी समाज की भागीदारी बिलकुल न के बराबर है. ये तीनों वर्ग न्यूजरूम, कवरेज, एंकरिंग और नेतृत्व वाले पदों से कोसों दूर खड़े हैं.
औक्सफेम इंडिया और न्यूजलौन्ड्री की रिपोर्ट के मुताबिक, मीडिया में केवल ऊंची जातियों का ऐसा दबदबा है कि यह तकरीबन 86-90 फीसदी पदों पर काबिज हैं. इन तीनों वर्गों की लेखन, रिपोर्टिंग, एंकरिंग में भागीदारी जीरो है. एक भी दलित, मुसलिम या आदिवासी मेन स्ट्रीम के किसी भी मीडिया ग्रुप का हैड नहीं है. यही वजह है कि इन तबकों से जुड़े मुद्दों को ले कर अंगरेजी अखबारों में 5 फीसदी से कम लेख छपते हैं तो हिंदी अखबारों में महज 10 फीसदी ही लेख छपते हैं.
मीडिया के 121 प्रमुख पदों में से 106 पदों पर ऊंची जाति के लोग बैठे हैं. एनडीटीवी, आजतक, जी न्यूज आदि में एससीएसटी एंकर एक भी नहीं है. 972 प्रमुख पत्रिकाओं की कवर स्टोरी में से केवल 10 दलित या आदिवासी मुद्दों पर केंद्रित होती हैं.
दलित अत्याचार, आदिवासी विस्थापन या मुसलिम भेदभाव की खबरें मेनस्ट्रीम से गायब रहती हैं या इन्हें भाव ही नहीं दिया जाता. मुसलिम, दलित और आदिवासियों के मुद्दे अकसर ऊंची जाति के पत्रकारों द्वारा कवर किए जाते हैं, जिन में ज्यादातर पूर्वाग्रह से ग्रसित होते हैं. दलित, मुसलिम और आदिवासी पत्रकारों को अंगरेजी या हिंदी मीडिया में प्रवेश मुश्किल से मिलता है.
उद्योगों से भी दूर
वंचित समाज रोजगार के नाम पर असंगठित क्षेत्र की नौकरी, मजदूरी और रेहड़ीपटरी के अलावा दलित, मुसलिम और आदिवासी समाजों के पास कोई औप्शन नहीं होता. अपवादों को छोड़ दिया जाए तो दलित, मुसलिम और आदिवासी कभी उद्योगों के मालिक नहीं बन पाते.
भारत के टौप 100 अमीर उद्योगपतियों में मुसलिम, दलित और आदिवासी की नुमाइंदगी जीरो है. साल 2025 की रिपोर्ट्स (फोर्ब्स और वर्ल्ड इनइक्वालिटी लैब) के मुताबिक टौप 100 उद्योगपतियों में तकरीबन 90 फीसदी ऊपरी जातियों से हैं.
वर्ल्ड इनइक्वालिटी लैब के मुताबिक, एसटी से कोई भी अरबपति नहीं है. कोई आदिवासी उद्योगपति या कोई बड़ा ट्राइबल बिजनैस ग्रुप टौप 100 में नहीं है.
हुरुन इंडिया रिच लिस्ट 2025, वर्ल्ड इनइक्वालिटी लैब 2024-25, फोर्ब्स इंडिया रिच लिस्ट के मुताबिक, टौप 1,000 अमीर भारतीयों की सूची में जिन की नैटवर्थ 1,000 करोड़ रुपए से ज्यादा हो इन में ऊं जातियों का दबदबा 88.4 फीसदी है. एसटी आबादी (8 फीसदी) के बावजूद कोई आदिवासी उद्योगपति टौप 1,000 में भी नहीं है.
यही हाल मुसलिमों का है. उन की कुल संपत्ति में हिस्सेदारी महज एक फीसदी है और कोई प्रमुख मुसलिम उद्योगपति टौप 1,000 में नहीं है. भारतीय राजनीति में मुसलिम नेताओं ने स्वतंत्रता संग्राम में खास रोल अदा किया है. आजादी के बाद भी मौलाना अबुल कलाम आजाद जैसे मुसलिम नेता हुए जिन्होंने मुसलिम समाज की तरक्की पर जोर दिया, लेकिन आज के समय मुसलिम समाज में ऐसे नेता नहीं हैं, जो हाशिए पर खड़े मुसलिम समाज को मुख्यधारा से जोड़ने की दिशा में ईमानदारी से कदम बढ़ा सकें.
मौजूदा दौर में मुसलिम समाज के पास असदुद्दीन ओवैसी जैसे नेताओं का जमावड़ा है. फारूक अब्दुल्ला, गुलाम नबी आजाद, बदरूद्दीन अजमल, अरिफ मोहम्मद खान, उमर फारूक, मौलाना अरशद मदनी जैसे तमाम मुसलिम नेताओं का मुसलिम समाज की तरक्की में कोई खास योगदान नहीं है. इन तमाम नेताओं ने मुसलिम समाज को वोट बैंक की तरह इस्तेमाल किया और सिर्फ मुसलिमों के नाम पर राजनीति की है.
दलितों को राजनीति सिखाने वाले कांशीराम
कांशीराम भारतीय राजनीति में एक ऐसे दलित नेता थे जिन्होंने डाक्टर भीमराव अंबेडकर के विचारों को अपनाया और हाशिए पर पड़े दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से मजबूत करने का सपना देखा.
कांशीराम ने ‘बहुजन’ की सोच को लोकप्रिय बनाया जिस में समाज के 85 फीसदी लोग दलित, अन्य पिछड़ा वर्ग, आदिवासी, अल्पसंख्यक शामिल थे. उन का नारा था ‘जाति तोड़ो, समाज जोड़ो’ और ‘वोट हमारा, राज तुम्हारा, नहीं चलेगा’.
कांशीराम ने 1971 में आल इंडिया बैकवर्ड एंड माइनौरिटी कम्युनिटीज एम्प्लौइज फैडरेशन को बनाया था, जो सरकारी कर्मचारियों को संगठित करने और दलितपिछड़ा जागरूकता बढ़ाने का मंच था. बाद में 1981 में डीएस-4 दलित शोषित समाज संघर्ष समिति और 1984 में बहुजन समाज पार्टी को बनाया.
कांशीराम का मानना था कि वोट की ताकत से दलितपिछड़े समुदाय सत्ता हासिल कर सकते हैं. उन्होंने बहुजन समाज पार्टी को उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में एक मजबूत राजनीतिक ताकत बनाया.
कांशीराम ने विभिन्न जातियों और समुदायों को एकजुट करने की रणनीति अपनाई, जैसे ‘दलितमुसलिम या ‘दलित और अन्य पिछड़ा वर्ग गठजोड़, ताकि राजनीति में बहुजन समाज की नुमाइंदगी मजबूत हो सके. कांशीराम ने अपने विजन को पूरा कर दिखाया और मायावती 4 बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं.
मायावती का राजनीतिक सफर
1977 में कांशीराम पहली बार मायावती के घर पहुंचे थे तब मायावती सिविल सेवा की तैयारी कर रही थीं. कांशीराम ने उन्हें सिविल सेवा छोड़ कर राजनीति में आने के लिए प्रेरित किया. कांशीराम ने तब मायावती से कहा था, ‘‘मैं तुम्हें इतना बड़ा नेता बना दूंगा कि आईएएस अधिकारी तुम्हारे आदेशों के पालन के लिए लाइन लगा देंगे.’’
मायावती ने 1984 में बहुजन समाज पार्टी के बनने के समय से ही पार्टी में सक्रिय भूमिका निभानी शुरू की. 1989 में पहली बार वे बिजनौर से लोकसभा सदस्य चुनी गईं. मायावती की यह जीत दलित राजनीति में एक मील का पत्थर साबित हुआ.
1998-2004 के बीच मायावती अकबरपुर से 3 बार लगातार लोकसभा सांसद रहीं. 15 दिसंबर, 2001 को कांशीराम ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी घोषित किया और 18 सितंबर, 2003 को मायावती बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष बनीं. 3 जून, 1995 को मायावती उत्तर प्रदेश की पहली दलित महिला मुख्यमंत्री बनीं. 2012 तक वे 4 बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रहीं.
इस बीच विचारधारा बदल चुकी थी. विचारधारा के साथ नारा भी बदल गया. ‘बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय’ का नारा अब ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ हो चुका था. दलितों के साथ ब्राह्मणों को जोड़ कर ‘सोशल इंजीनियरिंग’ का प्रयास बुरी तरह फ्लौप हो गया और इस के साथ ही कांशीराम की 40 साल की मेहनत भी धूल में मिल गई. तब से बहुजन समाज पार्टी का लगातार पतन ही हुआ.
साल 2004 बहुजन समाज पार्टी ने लोकसभा में 19 सीटें जीतीं थीं. 2014, 2019 और 2024 लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश से कोई सीट नहीं मिली. साल 2017 और साल 2022 विधानसभा चुनावों में भी हार मिली. इस तरह एक सामाजिक क्रांति की असमय मौत हो गई.
क्या से क्या हो गए जीतनराम मांझी
जीतनराम मांझी इस समय भाजपा की गठबंधन सरकार में मंत्री हैं और आज भाजपा के हिंदुत्ववादी नैरेटिव का समर्थन करते हुए नजर आते हैं. यही जीतनराम मांझी 2 साल पहले तक दलितों की आवाज बन कर उभरे थे.
जीतनराम मांझी का राजग में जुड़ने से पहले का इतिहास देखें तो उन्होंने कई बार हिंदू धर्म पर विवादास्पद बयान दिए हैं. उन्होंने 2023 में बक्सर के एक मंच से कहा था कि राम काल्पनिक पात्र हैं और वे उन्हें भगवान नहीं मानते. उन्होंने रामायण को बाल्मीकि और तुलसीदास द्वारा रचित कथा बताया था.
जीतनराम मांझी जोरशोर से यह बात कहते थे कि हिंदू धर्म में जातिगत भेदभाव को चुनौती देना जरूरी है. मांझी ने कहा कि ‘रावण का चरित्र श्रीराम से बड़ा और महान था’. उन्होंने रावण को विद्वान और शासक के रूप में सराहा, जबकि राम को पारंपरिक हिंदू आख्यान का हिस्सा बताया.
इ तना ही नहीं जीतनराम मांझी ने ब्राह्मण प्रधान हिंदू परंपराओं को दलितों के शोषण का माध्यम बताया था. जीतनराम मांझी के इन बयानों से भाजपा और हिंदू संगठन इतने नाराज हुए थे कि उन्होंने जीतनराम मांझी को ‘धरती पर बोझ’ तक कहा और उन्हें ‘हिंदू विरोधी’ करार दिया. उन के खिलाफ ब्राह्मणों ने विरोध मार्च निकाला, पुतला फूंका और उन के खिलाफ मुकदमा भी दर्ज हुआ, लेकिन जीतनराम मांझी ने माफी नहीं मांगी और कहा कि वे अपनी बात पर कायम हैं.
इस मामले के बाद बिहार की राजनीति में जीतनराम मांझी शोषित समाज के लिए एक मजबूत आवाज बन कर उभरे, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद उन्होंने मंत्री बनने के लालच में अपनी विचारधारा को तिलांजलि दे दी.
रामविलास पासवान मसीहा या अवसरवादी
बिहार में कभी दलितों के सब से बड़े नेता के रूप में रामविलास पासवान को गिना जाता था. रामविलास पासवान 80 और 90 के दशक में सामाजिक न्याय, दलित उत्थान और पिछड़े वर्गों के अधिकारों के लिए लड़ने वाले मजबूत नेता के रूप में उभरे थे. वे ‘जय भीम’ का उपयोग संसद और रैलियों में अकसर किया करते थे. यह नारा सामाजिक समानता, संविधान की रक्षा और जातिगत भेदभाव के खिलाफ उन के संघर्ष का हिस्सा था.
रामविलास पासवान ने 1989 से लोकसभा में ‘जय भीम’ का नारा बुलंद करना शुरू किया. वे संसद में अंबेडकर और बहुजन नेताओं के योगदान को रेखांकित करते हुए इस नारे का इस्तेमाल करते थे. 1991 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा के खिलाफ बोलते हुए रामविलास पासवान ने संसद में ऐतिहासिक भाषण दिया था.
इस भाषण में उन्होंने ‘जय भीम’ के साथ सैकुलरिज्म और सोशल जस्टिस की बात की थी. वे बोधगया महाबोधि मंदिर को बौद्धों के नियंत्रण में देने के मुद्दे पर भी सदन में जोरदार भाषण देते हुए ‘जय भीम’ का उच्चारण करते हुए कहते थे, ‘‘मिल कर लड़ेंगे, जीतेंगे, इंकलाब जिंदाबाद, जय भीम.’’
यह नारा रामविलास पासवान के लिए दलितों और वंचितों के सशक्तिकरण की दिशा में उन की स्पष्ट विचारधारा का प्रतीक था. रामविलास पासवान ने मंडल कमीशन लागू कराने, आरक्षण और एट्रोसिटी एक्ट जैसे मुद्दों पर लड़ाई लड़ी. वे खुद को ‘दलितों का रक्षक’ कहते थे और उन का नारा ‘मैं उस घर में दीया जलाने चला हूं, जिस घर में सदियों से अंधेरा था’ दलित उत्थान का प्रतीक बन गया था.
लेकिन बाद के सालों में दलितों के इस मसीहा ने अवसरवादी राजनीति का शिकार हो कर अपनी विचारधारा को तिलांजलि दे दी. रामविलास पासवान लगातार 5 दशकों तक सक्रिय राजनीति का हिस्सा रहे और इस बीच 6 अलगअलग प्रधानमंत्रियों (चरण सिंह, वीपी सिंह, चंद्रशेखर, एचडी देवेगौड़ा, आईके गुजराल और नरेंद्र मोदी) की सरकारों में केंद्रीय मंत्री बने रहे.
रामविलास पासवान ने 1969 में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी से विधायक बन कर राजनीति में प्रवेश किया था. 1977 में जनता पार्टी से जुड़ कर वे लोकसभा पहुंचे और 1980 में जनता पार्टी (सैकुलर) से फिर जीते लेकिन 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद वे फिर से कांग्रेसी हो गए और कुछ सालों के बाद में वे जनता दल में शामिल हो गए.
रामविलास पासवान मई, 1996 के लोकसभा चुनाव में बिहार के हाजीपुर निर्वाचन क्षेत्र से जनता दल के टिकट पर चुनाव जीते. इस तरह वे छठी बार लोकसभा पहुंचे. जून, 1996 में एचडी देवेगौड़ा की संयुक्त मोरचा सरकार के बनने के बाद वे केंद्रीय रेल मंत्री बने. यह उन का पहला कार्यकाल था जब वे रेल मंत्रालय संभाल रहे थे.
इस दौरान चूंकि एचडी देवेगौड़ा राज्यसभा सदस्य थे इसलिए लोकसभा में गठबंधन के प्रस्तावों का नेतृत्व रामविलास पासवान ने किया. वे लोकसभा में लीडर औफ हाउस (4 जून, 1996 से दिसंबर, 1997 तक) के रूप में सक्रिय रहे. 1997 में इंद्र कुमार गुजराल की संयुक्त मोरचा सरकार में भी रेल मंत्री बने रहे. इस दौरान रामविलास पासवान ने लालू प्रसाद यादव के साथ बिहार में गठबंधन बनाए रखा.
गुजराल सरकार 1998 की शुरुआत में विपक्ष के अविश्वास प्रस्ताव के कारण गिर गई. फरवरीमार्च, 1998 के लोकसभा चुनाव में वे फिर से हाजीपुर से जनता दल के टिकट पर जीते. यह उन की 7वीं लोकसभा सदस्यता थी. हालांकि, चुनाव के बाद राजग सरकार बनी, लेकिन तब पासवान ने राजग का समर्थन नहीं किया. इस के बजाय वे विपक्ष में रहे लेकिन ज्ल्दी ही उन्होंने हवा के रुख को पहचान लिया और 1999 में राजग के साथ जुड़े गए.
साल 2000 में उन्होंने लोक जनशक्ति पार्टी की स्थापना की और पार्टी के जरीए राजग को समर्थन जारी रखा. इस दौरान वे अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में संचार मंत्री बने और बाद में कोयला और खान मंत्री का पदभार भी संभाला.
2002 के गुजरात दंगों के बाद पासवान ने भाजपा को ‘सांप्रदायिक’ बताते हुए राजग छोड़ दिया. 2004 में कांग्रेस गठबंधन (संप्रग-1) की सरकार बनी और रामविलास पासवान इस गठबंधन में शामिल हो गए. कांग्रेस सरकार में उन्होंने 23 मई, 2004 से 22 मई, 2009 तक रसायन एवं उर्वरक मंत्री तथा स्टील मंत्री के रूप में कार्य किया.
2009 में संप्रग-2 सरकार बनी लेकिन इस गठबंधन में रामविलास पासवान शामिल नहीं हो पाए क्योंकि 2009 के लोकसभा चुनावों में उन की पार्टी लोजपा ने संप्रग से अलग हो कर चौथे मोरचे (राष्ट्रीय जनता दल और समाजवादी पार्टी के साथ) के तहत चुनाव लड़ा था और पासवान खुद हाजीपुर से चुनाव हार गए थे. 2014 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले, जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा मजबूत हुई, तो वे फिर से राजग की गोद में जा बैठे.
6 दशकों की राजनीति में रामविलास पासवान ने हमेशा गठबंधन सरकारों में महत्वपूर्ण मंत्रालय हासिल किए. रामविलास पासवान की शुरुआती राजनीति पर गौर करें तो वे सामाजिक न्याय और जातिगत असमानता के लिए लड़ने वाले नेताओं में से एक नजर आते थे, लेकिन उन के पूरे राजनीतिक सफर को देखें तो वे एक घोर अवसरवादी नेता ही साबित होते दिखे.
यही कारण है कि रामविलास पासवान दलित नेता जरूर थे लेकिन दलितों के नेता कभी नहीं बन पाए. उन्होंने कभी बिहार में दलितों के लिए कोई मजबूत आधार नहीं बनाया.
पिता की अवसरवादी राजनीति को आगे बढ़ाते चिराग पासवान
साल 2020 में रामविलास पासवान के न रहने के बाद उन के बेटे चिराग पासवान ने अपने पिता के पदचिन्हों पर चलते हुए अवसरवादी राजनीति का ही सहारा लिया. चिराग पासवान वर्तमान में लोक जनशक्ति पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं और खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्री के रूप में केंद्र सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं.
रा जनीति में आने से पहले चिराग पासवान ने बौलीवुड में कैरियर बनाने की कोशिश की. साल 2011 में उन की पहली फिल्म ‘मिले न मिले हम’ आई लेकिन यह फिल्म बौक्स औफिस पर नाकाम रही. इस नाकामी के बाद उन्होंने राजनीति की ओर रुख किया.
2014 में चिराग पासवान ने अपना पहला लोकसभा चुनाव लड़ा और राष्ट्रीय जनता दल के सुधांशु शेखर भास्कर को 85,000 से अधिक वोटों से हराया. इस जीत ने उन्हें बिहार की राजनीति में स्थापित कर दिया.
पिता की तरह चिराग पासवन के पास भी कोई ठोस विचारधारा नहीं है. यही कारण है कि चिराग पासवान ने 2021 में अयोध्या के राम मंदिर निर्माण के लिए 1.11 लाख रुपए दान किए और भाजपा के साथ गठबंधन में शामिल हो कर जून, 2024 में खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्री बन गए.
चिराग पासवान ने 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में जमुई सीट जीती. 2019 में उन्होंने 55.76 फीसदी वोट शेयर के साथ भुड़ेव चौधरी को हराया. 2020 में लोजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और चिराग पासवान के पिता रामविलास पासवान का निधन हो गया. चिराग ने पिता की राजनीतिक विरासत की कमान संभाली पार्टी और अपनी पार्टी को राजग के साथ मजबूत गठबंधन में बनाए रखा.
रामविलास पासवान की मृत्यु के तुरंत बाद उन की लोजपा के नेतृत्व को ले कर विवाद हुआ. रामविलास पासवान के बड़े भाई पशुपति कुमार पारस ने पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष पद हथिया लिया, जिस के बाद लोजपा 2 गुटों में बंट गई. एक चिराग पासवान के नेतृत्व में (लोजपा-रामविलास) और दूसरा पशुपति पारस के नेतृत्व में. इस राजनीतिक बंदरबांट में पार्टी के कई दिग्गज नेता इधरउधर हुए लेकिन इस से चिराग पासवान के राजनीतिक कैरियर पर ज्यादा असर नहीं पड़ा.
2024 के लोकसभा चुनाव में चिराग पासवान ने हाजीपुर (एससी) सीट से चुनाव लड़ा, जो उन के पिता का गढ़ था. इस चुनाव में उन्होंने 53.3 फीसदी वोट शेयर के साथ जीत हासिल की. जून, 2024 में उन्हें मोदी सरकार में खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्री बनाया गया. साल 2014 और साल 2019 में लोजपा ने राजग के साथ मिल कर बिहार में अच्छा प्रदर्शन किया.
2020 बिहार विधानसभा चुनाव से पहले चिराग ने नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली जद (यू) के खिलाफ ‘बिहार फर्स्ट’ नीति अपनाई, जिस से लोजपा को नुकसान हुआ. 2024 लोकसभा चुनाव में उन की पार्टी ने बिहार की 5 सीटें जीतीं जिस से लोजपा तो मजबूत हुई साथ ही राजग भी मजबूत हुआ.
कांग्रेस का दलित कार्ड
इस में कोई दो राय नहीं कि कांग्रेस अपनी शुरुआत से सवर्णों की पार्टी रही है. यही कारण है कि डाक्टर भीमराव अंबेडकर जैसे नेताओं ने कांग्रेस से दूरी बनाए रखी.
डाक्टर अंबेडकर शूद्रों और अछूतों को हिंदू धर्म से अलग मानते थे. उन का मानना था कि अछूतों को हिंदू धर्म से अलग किए बिना अछूतों की गुलामी दूर नहीं होगी, इसलिए वे लगातार हिंदू धर्म और इस की वर्णव्यवस्था की आलोचना करते थे.
डाक्टर अंबेडकर की यह बात कांग्रेसी नेताओं को हजम नहीं होती थी. अंबेडकर से सहमत न होने वाले कांग्रेस के बड़े नेताओं में मोहनदास करमचंद गांधी भी शामिल थे. डाक्टर अंबेडकर जहां दलितों को हिंदू धर्म से दूर करने की बात करते थे वहीं महात्मा गांधी ने 1930 के दशक में दलितों को ‘हरिजन’ (ईश्वर के लोग) कहना शुरू किया. यह कांग्रेस की दलितों के उत्थान का अपना तरीका था.
म हात्मा गांधी चाहते थे अछूतों के लिए समाज में फैली नफरत तो खत्म हो लेकिन जाति व्यवस्था बनी रहे. वहीं डाक्टर अंबेडकर वर्णव्यवस्था को समाज के लिए घातक मानते थे. यही वजह है कांशीराम जैसे नेता कांग्रेस को दलितों का छिपा दुश्मन मानते थे. यह सच है कि कांग्रेस कभी भी दलितों की हमदर्द नहीं रही लेकिन संविधान निर्माण में कांग्रेस के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता.
आजादी के बाद कांग्रेस ने डाक्टर अंबेडकर की अध्यक्षता में संविधान सभा का गठन किया. 1950 में लागू भारतीय संविधान ने अनुसूचित जातियों (एससी) के लिए आरक्षण की व्यवस्था की, जिस में शिक्षा, नौकरियों और विधायिकाओं में कोटा तय किया गया. यह कांग्रेस की दलित उत्थान की प्रतिबद्धता का एक खास कदम था.
जवाहरलाल नेहरू ने सामाजिक समानता पर जोर दिया और दलितों को सरकारी योजनाओं का हिस्सा बनाया जिस से दलितों के सामाजिक और आर्थिक स्तर में सुधार होना शुरू हुआ.
कांग्रेस ने ही 1955 में अस्पृश्यता अपराध अधिनियम पास किया जिसे 1989 में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के रूप में और मजबूत किया गया.
इंदिरा गांधी ने 1970 के दशक में ‘गरीबी हटाओ’ नारे के तहत कई कल्याणकारी योजनाएं शुरू कीं, जिन का लाभ दलित समुदायों को भी मिला. भूमि सुधार और ग्रामीण विकास जैसी क्रांतिकारी योजनाओं ने दलितों की आर्थिक को मजबूत करने में खास रोल निभाया. 1990 में वीपी सिंह की सरकार ने मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू किया. कांग्रेस ने भी इस का समर्थन किया. कांग्रेस की विभिन्न राज्य सरकारों ने दलितों के आरक्षण को और मजबूत किया.
यूपीए सरकार (2004-2014) के दौरान मनमोहन सिंह के नेतृत्व में कई योजनाएं, जैसे मनरेगा, शिक्षा का अधिकार, और खाद्य सुरक्षा अधिनियम, लागू की गईं, जिन का लाभ दलित समुदायों को भी मिला.
दलितों के हितों के लिए किए गए तमाम प्रयासों के बावजूद कांग्रेस पर अकसर यह आरोप लगता रहा है कि उस ने दलितों के प्रति प्रेम को वोट बैंक की राजनीति के रूप में इस्तेमाल किया.
अंबेडकरवादी संगठनों और कुछ दलित नेताओं ने कांग्रेस पर यह आरोप लगाया कि उस ने दलितों की समस्याओं को पूरी तरह हल करने के बजाय सतही कदम उठाए.
इतिहास में कांग्रेस ने भले ही दलितों के हितों को महत्व न दिया हो लेकिन हाल के सालों में कांग्रेस ने दलितों के मुद्दों को जोरशोर से उठाया है, खासकर रोहित वेमुला आत्महत्या का मामला हो या दलितों पर अत्याचार की घटनाओं की बात हो राहुल गांधी और कांग्रेस के अन्य नेताओं ने इन मुद्दों पर अपना विरोध ईमानदारी से दर्ज करवाया है.
यह सच है कि ग्रामीण क्षेत्रों में दलितों के खिलाफ भेदभाव और हिंसा को पूरी तरह रोकने में कांग्रेस की सरकारें पूरी तरह सफल नहीं रहीं लेकिन यह भी सच है की कांग्रेस के शासनकाल में ही दलित आंदोलनों
ने जोर पकड़ा और कांशीराम जैसे दलितों के बड़े नेताओं की राजनीति के लिए जमीन तैयार हुई.
दलितों के मसीहा बाबू जगजीवन राम
बाबू जगजीवन राम का सामाजिक न्याय की लड़ाई में खास योगदान रहा. वे भारत के प्रमुख दलित नेता और स्वतंत्रता सेनानी थे, जिन्होंने सामाजिक समानता, दलित उत्थान और पिछड़े वर्गों के अधिकारों के प्रयास किए.
जगजीवन राम ने दलितों और वंचित वर्गों की आवाज को राष्ट्रीय मंच पर उठाया. वे आजादी के समय कांग्रेस के प्रमुख नेताओं में से एक थे और वे संविधान सभा के सदस्य भी थे इसलिए उन्होंने दलितों और अन्य वंचित समुदायों के लिए आरक्षण और समानता के प्रावधानों को लागू करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. यही कारण है कि बाबू जगजीवन राम को ‘दलितों के मसीहा’ के रूप में भी जाना जाता है.
अपने शुरुआती जीवन में, बिहार में और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान, उन्हें छुआछूत और जातिगत भेदभाव का सामना करना पड़ा. इस भेदभाव के विरोध में उन्होंने स्कूल में दलितों के लिए रखे गए अलग घड़े को तोड़ दिया था, जिस के बाद प्रधानाचार्य को उस व्यवस्था को खत्म करना पड़ा. छुआछूत के खिलाफ यह जगजीवन राम की पहली लड़ाई थी. यहीं से उन्हें समाज के एक विशेष वर्ग के खिलाफ अन्यायपूर्ण रवैए के खिलाफ लड़ने की प्रेरणा मिली.
जगजीवन राम ने दलितों और शोषित वर्गों को संगठित करने के लिए 1934-35 में अखिल भारतीय शोषित वर्ग लीग की स्थापना की में अहम भूमिका निभाई. उन के इस संगठन का उद्देश्य अछूतों को समानता का अधिकार दिलाना था.
कांग्रेस से जुड़ कर जगजीवन राम ने दलितों को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्रीय राजनीति की मुख्यधारा से जोड़ने का प्रयास शुरू किया. वे 1936 में बिहार विधानसभा परिषद के सदस्य नामित हुए और बाद में बिहार विधानसभा के लिए चुने गए.
स्वतंत्रता के बाद, भारत सरकार में विभिन्न पदों पर रहते हुए उन्होंने दलितों के अधिकारों की रक्षा के लिए कई कानून बनाए. सिविल अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955 का निर्माण उन्हीं के प्रयासों का परिणाम माना जाता है, जिस का उद्देश्य छुआछूत को कानूनी रूप से दंडनीय बनाना था.
बाबू जगजीवन राम ने न केवल राजनीतिक और कानूनी स्तर पर, बल्कि सामाजिक स्तर पर भी दलितों के उत्थान के लिए काम किया. महात्मा गांधी की प्रेरणा से जगजीवन राम ने दलितों के सामूहिक धर्म परिवर्तन को रोका और उन्हें भारतीय समाज की मुख्यधारा में बनाए रखने के लिए प्रेरित किया.
बाबू जगजीवन राम का योगदान केवल बिहार तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर दलितों के लिए एक मजबूत आवाज बन कर उन के अधिकारों की लड़ाई लड़ी और उन्हें सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय दिलाने के लिए अथक प्रयास किए.
बाबू जगजीवन राम भारत के सब से लंबे समय तक केंद्रीय मंत्रिमंडल में रहे. वे लगातार 30 सालों तक अलग अलग मंत्रालयों में मंत्री रहे. जगजीवन राम ने छात्र जीवन से ही स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया और 1931 में वे कांग्रेस में शामिल हुए. सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी से प्रेरित हो कर उन्होंने 10 दिसंबर, 1940 को गिरफ्तारी दी.
1946 से 1952 के बीच जगजीवन राम श्रम मंत्री रहे. इस दौरान उन्होंने मजदूरों के अधिकारों के लिए कई महत्वपूर्ण काम किए. 1952 से 1956 के दौरान वे संचार मंत्री रहे और उन्होंने डाक और संचार सेवाओं का विस्तार किया. 1956 से 1962 के दौरान उन्होंने रेल मंत्री के तौर पर रेलवे का आधुनिकीकरण किया. 1967 से 1969 के बीच वे खाद्य एवं कृषि मंत्री रहे और इस दौरान उन्होंने हरित क्रांति की नींव रखी. 1977 से 1978 के बीच वे उपप्रधानमंत्री रहे.
जगजीवन राम दलितों और पिछड़े वर्गों के उत्थान के लिए हमेशा संघर्षरत रहे. 1977 के चुनावों से पहले उन्होंने कांग्रेस छोड़ कर जनता पार्टी जौइन की, लेकिन बाद में वापस लौट आए. बाबू जगजीवन राम की मृत्यु 6 जुलाई, 1986 को नई दिल्ली में हुई. बाबू जगजीवन राम सामाजिक न्याय, शिक्षा और समानता के प्रतीक थे. उन की बेटी मीरा कुमार लोकसभा की पहली महिला स्पीकर बनीं.
बाबू जगजीवन राम बिहार से निकले हुए नेता थे जो राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेस के उसूलों के साथ जुड़े रहे इस बीच दलितों के उत्थान के लिए उन्होंने ऐतिहासिक काम किए, लेकिन बिहार में जमीनी स्तर पर उन्होंने कोई सामाजिक आंदोलन खड़ा नहीं किया.
कांग्रेस की अलगअलग सरकारों में लगातार 30 सालों तक मंत्री बने रहने के बावजूद बिहार में दलित चेतना को जगाने में बाबू जगजीवन राम का कोई खास योगदान नहीं रहा. अगर बाबू जगजीवन राम जैसे नेता सत्ता सुख को चुनने के बजाय बिहार के जातिगत सामाजिक परिवेश को बदलने के लिए जमीन से जुड़ कर काम करते तो बिहार में बड़ी क्रांति की शुरुआत हो जाती. इस क्रांति से दलितों के अपने नेता निकल कर आते जिस से आज के बिहार में दलितों का भी राजनीतिक नेतृत्व संभव हो जाता.
नेता और मसीहा में फर्क होता है
डाक्टर अंबेडकर अपने समय के नेता ही थे लेकिन आज उन्हें दलितों, शोषितों और वंचित तबकों का मसीहा माना जाता है, क्योंकि उन्होंने सिर्फ राजनीति के लिए राजनीति नहीं की. सिर्फ नेता बनने के लिए चुनाव नहीं लड़ा. वे सिर्फ बंगलागाड़ी के लिए कांग्रेस के मंत्रिमंडल में शामिल नहीं हुए, बल्कि उन्होंने अछूतों के मानसम्मान और अधिकारों के लिए सामाजिक और राजनीतिक लड़ाई लड़ी.
डाक्टर अंबेडकर का पूरा जीवन वंचित तबके को न्याय, समता और सम्मान दिलाने के संघर्ष का प्रतीक है. भारत में उन के बाद दलितों का कोई मसीहा पैदा नहीं हुआ.
यही कारण है की डाक्टर अंबेडकर व्यक्ति नहीं विचारधारा बन गए और इसी विचारधारा पर चल कर भारतीय राजनीति में कई दलित नेता पैदा हुए जिन में कुछ बहुत लोकप्रिय भी हुए और महान भी बने लेकिन डाक्टर अंबेडकर की तरह मसीहा नहीं बन पाए.
डाक्टर अंबेडकर जैसा मसीहा मुसलिम समाज में कोई पैदा नहीं हुआ. उन्होंने खुल कर हिंदू धर्म के मूल सिद्धांतों की आलोचना की वर्णव्यस्था के खिलाफ आवाज उठाई. ब्राह्मणवादी सोच को चुनौती दी और इस सोच को पोसने वाले ग्रंथों में आग लगाई. यह एक वैचारिक क्रांति की शुरुआत थी. ऐसी वैचारिक क्रांति करने वाला मसीहा मुसलिम समाज में कभी पैदा नहीं हुआ. राजनीतिक स्वार्थों से ऊपर उठ कर मुसलिम समाज की वास्तविक समस्याओं के लिए जमीनी संघर्ष करने वाले मुसलिम नेता भी कहीं नजर नहीं आते.
दलितों की राजनीति का अंत या शुरुआत
आज के समय मुसलिम, दलित और आदिवासी तबकों का कोई ऐसा नेता फिलहाल नहीं है जो दलितों के न्याय और अधिकारों के लिए कोई बड़ा आंदोलन खड़ा कर सके. चंद्रशेखर रावण जैसे दलित नेता भीड़ तो इकट्ठा कर लेते हैं, लेकिन भीड़ तो सिर्फ भीड़ होती है. भीड़ को ले कर कभी क्रांति नहीं हो सकती. दलितों, मुसलिमों और आदिवासियों के जमीन से जुड़े नेताओं के मामले में देश इतना बंजर हो चुका है की फिलहाल दूरदूर तक कोई नजर नहीं आता.
यह देश के 40 फीसदी शोषित, दलित वर्ग के लिए बेहद चिंताजनक हालात हैं. गुजरात के जिग्नेश मेवाणी हों या उत्तर प्रदेश के चंद्रशेखर रावण, ये दोनों नेता युवाओं में काफी लोकप्रिय युवा नेता जरूर हैं लेकिन यह दलितों के मसीहा नहीं बन सकते क्योंकि मसीहा जमीन से जुड़े लोग होते हैं जो कभी हवा में नहीं उड़ते. Politics




