Emotional Family Story. ‘‘मनजीत, कल अमेरिका से तेरे धर्मपिता आ रहे हैं… उन्हें लेने सुबह 5 बजे हवाईअड्डे चलना है…’’ रात को सरदार बलजीत सिंह ने अपने डाक्टर बेटे से कहा.
मनजीत ने हैरानी से पूछा, ‘‘मेरे पिता तो आप हैं, फिर ये धर्मपिता कौन हैं?’’
‘‘बेटा, यह सच है कि तू मेरा बेटा है और मैं तेरा पिता हूं, पर तेरे जीवनदाता तो डाक्टर महेश ही हैं.’’
‘‘वह कैसे?’’ ‘‘यह सब मैं तुझे कल डाक्टर महेश और परिवार के बाकी लोगों की मौजूदगी में बताऊंगा.’’
दूसरे दिन मनजीत और बलजीत सिंह डाक्टर महेश को हवाईअड्डे से घर ले आए.
बलजीत सिंह की पत्नी राजिंदर कौर बैठक में आईं और डाक्टर महेश को नमस्ते कर के बोलीं, ‘‘लो भाई साहब, संभालो अपने बेटे मनजीत को.’’
डाक्टर महेश हंसते हुए बोले, ‘‘बहिनजी, आप दोनों को बहुतबहुत मुबारक. अपना मनजीत इतना बड़ा डाक्टर जो बन गया है. हैंडसम तो यह दिखता ही है.’’
बलजीत सिंह मनजीत से बोले, ‘‘तुम इन के बारे में जानना चाहते थे न… तो सुनो… यह साल 1975 की बात है. उस समय तुम 5 साल के थे. उस दिन पूरा शहर मजहबी दंगों की चपेट में था. जगहजगह आगजनी और लूटपाट हो रही थी. रात के तकरीबन 9 बजे कुछ दंगाइयों ने हमारे घर में आग लगा दी थी.
‘‘कुछ ही मिनटों में पूरा घर आग की चपेट में आ गया था. मैं और तेरी मां तो किसी तरह बाहर आ गए थे. तेरी बहिन मेरी गोद में थी, पर तू दूसरे कमरे में सोया हुआ था, इसलिए अंदर ही रह गया था.
‘‘घर के बाहर लोगों की भीड़ जमा हो गई थी. तेरी मां तुझे बचाने के लिए लोगों से फरियाद कर रही थी. लोग चाहते हुए भी जलते मकान में घुसने की हिम्मत नहीं कर पा रहे थे.
‘‘ऐसे में डाक्टर महेश अपनी जान की परवाह न करते हुए एक कंबल लपेट कर जलते मकान में घुस गए और तुझे बाहर ले आए. इस दौरान ये खुद भी जल गए थे,’’ कहतेकहते बलजीत सिंह का गला रुंध गया.
अपनेआप को संभाल कर बलजीत सिंह आगे बोले, ‘‘बेटा, तुम्हीं बताओ कि ऐसे जीवनदाता को तुम्हारा धर्मपिता न कहूं, तो क्या कहूं?’’
‘‘आप सच कह रहे हैं पापा. ऐसे नेक इनसान को तो धर्मपिता कहना ही चाहिए,’’ यह कहते हुए मनजीत ने उठ कर डाक्टर महेश के पैर छुए. फिर वह आगे बोला, ‘‘आप इतने साल कहां रहे और अपने इस बेटे की सुध क्यों नहीं ली?’’
‘‘नहीं बेटा, ऐसी बात नहीं है… मैं चिट्ठी लिख कर तेरे पापा से यहां के हालचाल मालूम करता रहता था…’’ फिर डाक्टर महेश यादों में खोते हुए बोले, ‘‘बेटा, उस हादसे के अगले ही दिन मैं अपनी पत्नी के साथ अमेरिका जाने वाला था, पर आग से जल जाने के चलते कुछ दिन रुकना पड़ा. फिर जल्दी ही हम अमेरिका चले गए… वहीं पर मेरी बेटी डिंपल का जन्म हुआ और अब वह भी डाक्टर बन गई है.’’
‘‘आंटी और डिंपल कहां हैं?’’ ‘‘बेटा, वे दोनों अभी अमेरिका में ही हैं. यहां से मैं दिल्ली अपने घर जाऊंगा और फिर अगले महीने वे लोग भी वहीं आ जाएंगे. अब हम भारत में ही रहेंगे.’’
‘‘अंकल, आप की वजह से ही मेरा दूसरा जन्म हुआ है. अगर मैं आप के किसी काम आ सकूं, तो मु?ो बहुत खुशी होगी,’’ मनजीत ने कहा.
डाक्टर महेश कुछ सोचते हुए बोले, ‘‘बेटा, तुम काम तो आ सकते हो… इस बारे में बलजीत से बात कर के मैं कल तुम्हें बता दूंगा.’’
उस रात डाक्टर महेश ने बलजीत और राजिंदर कौर से कुछ बात की.
अगले दिन डाक्टर महेश ने मनजीत से कहा, ‘‘बेटा, मैं जो मदद तुम से चाहता हूं, उस में कुरबानी की जरूरत है, इसलिए तुम सोचसमझ कर ही फैसला लेना.’’
‘‘अंकल, आप ने मेरी जान बचाई है, यह जिंदगी आप के लिए ही है. मैं अपनी जान दे कर भी आप की मदद करना चाहूंगा.’’
‘‘नहीं बेटा, इस की जरूरत नहीं पड़ेगी… मैं जो कहने जा रहा हूं, उसे गौर से सुनना और फैसला बहुत सोचसमझ कर लेना.’’
डाक्टर महेश कुछ देर सोचते रहे, फिर बोले, ‘‘बेटा, एक हादसे में डिंपल की बाईं टांग घुटने के नीचे से कट गई थी, इसलिए उस की वह टांग लकड़ी की है.
‘‘मुझे उस की शादी की चिंता लगी हुई है. अमेरिका में एक लड़का उस से शादी करने को तैयार था, पर मुझे उस पर यकीन नहीं हुआ. जोश में आ कर या मुझ से मिलने वाली दौलत के लालच में कोई नौजवान उस से शादी करने को तैयार तो हो सकता है, पर उम्रभर उस का साथ निभा सके, मुझे इस बात का भरोसा चाहिए. वह भरोसा मैं तुम में देख रहा हूं. अगर तुम दिल से तैयार हो, तो मेरी परेशानी दूर हो जाएगी और मैं हमेशा तुम्हारा एहसानमंद रहूंगा.’’
यह सुन कर मनजीत बोला, ‘‘यह आप क्या कह रहे हैं अंकल. अगर मेरे मम्मीपापा हुक्म देंगे, तो मुझे आप की पेशकश दिल से मंजूर है.’’
‘‘बेटा, तेरे मम्मीपापा ने तो पहले ही अपनी मंजूरी दे दी थी… तुम भी इतमीनान से सोचसमझ कर मुझे अपना फैसला बता देना.’’
‘‘मैं सोचसमझ कर ही जवाब दे रहा हूं. आप तो बस शादी की तैयारियां कीजिए.’’
यह सुन कर राजिंदर कौर अपने पति से बोलीं, ‘‘आप क्या सोच रहे हैं? आप को तो खुश होना चाहिए कि आप का बेटा इतना समझदार है.’’
बलजीत सिंह बोले, ‘‘मैं यही सोच रहा था कि मनजीत मना कर देता, तो मैं डाक्टर महेश को क्या मुंह दिखाता. मनजीत ने मेरी लाज रख ली है.’’
‘‘हादसे तो किसी के भी साथ हो सकते हैं. ऐसा शादी के बाद भी हो सकता था. नकली टांग जिंदगी की राह में रुकावट तो नहीं है,’’ मनजीत ने कहा.
राजिंदर कौर अंदर से मिठाई ले आईं और डाक्टर महेश से बोलीं, ‘‘लीजिए भाई साहब, मुंह मीठा कीजिए. आज से आप दोनों दोस्त समधी हो गए हैं.’’
‘‘आप ठीक कहती हैं,’’ डाक्टर महेश ने कहा और बलजीत सिंह को गले लगा लिया. फिर वे बोले, ‘‘मैं कल दिल्ली जा रहा हूं. डिंपल और उस की मां के आने पर आप को खबर भेज दूंगा.’’
तकरीबन 3 महीने बाद मनजीत और डिंपल की शादी हो गई. फूलों से सजे हुए कमरे में डिंपल दुलहन के लिबास में पलंग पर बैठी थी.
मनजीत ने हाथ पकड़ कर उसे अपने पास बैठा लिया. दोनों काफी देर तक बातें करते रहे.
मनजीत को डिंपल बहुत पसंद आई थी, लेकिन दिल के एक कोने में कसक सी बनी हुई थी कि डिंपल उस नकली टांग के साथ कैसी लगेगी? उस पहली झलक को उस का दिल कैसे बरदाश्त कर पाएगा?
मनजीत इन्हीं खयालों में खोया हुआ था कि डिंपल गुसलखाने में जा कर कपड़े बदल कर लौट आई.
वह मनजीत के कंधे पर हाथ रख कर बोली, ‘‘मैं जानती हूं कि आप किन खयालों में खोए हुए हैं. मैं आप के दिल की हालत समझ सकती हूं, इसलिए नहीं चाहती हूं कि आप का शक बना रहे…’’ फिर उस ने साड़ी थोड़ी ऊपर उठाई और बोली, ‘‘आप खुद देख लीजिए, कोई भी टांग नकली नहीं है. दरअसल, आप के और मेरे पापा की साजिश के तहत आप का इम्तिहान लिया जा रहा था.
‘‘मुझे आप पर नाज है… आप न सिर्फ दोनों ‘पापा’ की निगाहों में खरे उतरे, बल्कि मेरी निगाह में भी एक नेक और रहमदिल इनसान बन गए…’’
मनजीत ठगा सा खड़ा एकटक डिंपल की टांगों की ओर देखने लगा, क्योंकि उस की एक भी टांग लकड़ी की नहीं थी. Emotional Family Story
–डा. एनएस गुप्ता




