Story in Hindi. नए बौस की बीमारी की खबर सुन कर जयंत ने घर आए अपने पुराने बौस को पत्नी मंजुला के हवाले कर दिया और खुद अस्पताल चला गया. पति के प्यार को तरस रही मंजुला के सामने एक जवां मर्द और रात की तनहाई थी. क्या हुआ उस रात को?

तबादले के बाद जब जयंत रामपुर वाले नए दफ्तर में पहुंचा, तो उसे वहां का माहौल काफी अच्छा लगा. साथ काम करने वालों की मदद से उसे दफ्तर के पास ही एक अच्छा किराए का मकान भी मिल गया. उस की पत्नी मंजुला को भी वह मकान काफी पसंद आया.

शादी के 10 साल बाद भी जयंत और मंजुला के कोई औैलाद नहीं हुई थी.

मंजुला का गोरा, खूबसूरत और गदराया बदन भी जयंत को अपनी ओर खींच नहीं पाता था. जिंदगी की तमाम परेशानियों ने जयंत के अरमान कुचल डाले थे.

वक्त के थपेड़ों ने धीरेधीरे जयंत से उस की मर्दानगी भी छीन ली थी और तब मंजुला मन से ही नहीं तन से भी गरीब हो गई थी.

शाम के 7 बजे थे. जयंत दफ्तर से लौट आया था और बिस्तर पर लेट कर टैलीविजन पर क्रिकेट मैच देखने का मजा ले रहा था, तभी मंजुला चाय ले कर कमरे में आई और चाय की प्याली जयंत की ओर बढ़ाते हुए बोली, ‘‘आज आप ने लौटने में इतनी देर क्यों कर दी?’’

चाय की चुसकी लेता हुआ जयंत कुछ जवाब देता, इस के पहले ही दरवाजे की घंटी बज उठी.

जयंत ने दरवाजा खोला, तो अपने पुराने बौस वीरेंद्र को देख कर खुशी से बोल उठा, ‘‘सर, आप… आप को अपने घर में देख कर बेहद खुशी हुई. आइए, अंदर आइए.’’

वीरेंद्र ने सोफे पर बैठते हुए कहा, ‘‘हां जयंत, तुम्हारे जैसे ईमानदार और मेहनती सहयोगी के तबादले से मैं परेशान था और तुम से मिलना चाह रहा था. आज यहां मेरी एक बैठक थी. बैठक खत्म होते ही मैं सीधा तुम्हारे दफ्तर पहुंचा, वहां से तुम्हारे मकान का पता ले कर यहां आया हूं.’’

‘‘यह तो आप की मेहरबानी है सर. मेरे नए बौस विशालजी भी आप की वजह से मुझ बहुत चाहते हैं.’’

‘‘लेकिन जयंत, आज की बैठक में तुम्हारे बौस विशाल को नहीं देखा,’’ वीरेंद्र ने पूछा.

‘‘दरअसल, वे कल से ही काफी बीमार हैं और छुट्टी पर हैं. बच्चे बाहर गए हुए हैं. घर में सिर्फ उन की पत्नी और नौकर दीपू ही हैं,’’ जयंत ने उत्तर दिया.

तभी मंजुला ट्रे में चायनाश्ता ले कर वहां आ पहुंची. ‘नमस्ते’ कह कर उस ने ट्रे वीरेंद्र के सामने मेज पर रख दी. फिर तीनों ने साथसाथ चाय पी.

बहुत देर तक दफ्तर की बातें होती रहीं. फिर जयंत ने वीरेंद्र से कपड़े बदलने और फ्रैश हो कर आराम करने को कहा. तभी फोन बजा. मंजुला ने फोन उठाया, ‘‘हैलो?’’

उधर से आवाज आई, ‘मैं विशाल की पत्नी माया बोल रही हूं. इन की तबीयत अचानक ज्यादा खराब हो गई है. डाक्टर ने इन्हें फौरन भरती करने को कहा है. इन्होंने जयंतजी को तुरंत बुला लेने को कहा है. जरा जयंतजी से बात करा दीजिए.’

मंजुला फोन जयंत की ओर बढ़ाते हुए बोली, ‘‘मायाजी का फोन है. वे बहुत घबराई हुई हैं… आप बात कर लें.’’

‘‘हैलो मैडम, मैं जयंत बोल रहा हूं. क्या बात है?’’

उधर से माया ने बताया, ‘आप यहां जल्दी चले आइए. इन की तबीयत बहुत खराब हो गई है. इन्हें तुरंत डाक्टर मिश्र के क्लिनिक में भरती कराना है. इन्होंने आप को जल्दी बुला लेने को कहा है. शायद आप को रात में क्लिनिक पर ही रुकना पड़े. मैं अकेली हूं. प्लीज, जल्दी आ जाइए.’

जयंत और मंजुला एकदूसरे को देखने लगे. उन की खामोशी देख वीरेंद्र ने पूछा, ‘‘क्या बात है जयंत? तुम लोग चुप क्यों हो?’’

जयंत ने उन्हें माया से हुई बात बताई और जाने के लिए उन से इजाजत चाही.

वीरेंद्र ने कहा, ‘‘इस में हिचक कैसी? दुख की घड़ी में दूसरों की मदद करना तो हर इनसान का फर्ज है.’’

जयंत ने बिना एक पल गंवाए मंजुला की ओर मुड़ कर कहा, ‘‘मंजुला, मैं चलता हूं. तुम इन का ध्यान रखना. इन्हें यहां किसी चीज की दिक्कत नहीं हो.’’

रात में दरवाजा ठीक से बंद कर लेने की हिदायत दे कर जयंत विशाल के घर की ओर चल पड़ा. उस समय रात के 10 बज रहे थे.

जयंत कुछ ही देर में विशाल के घर पहुंच गया. उस के पहुंचते ही माया विशाल को ले कर कार से क्लिनिक की ओर चल पड़ी.

क्लिनिक पहुंचते ही डाक्टर ने विशाल को आईसीयू में भरती कर लिया और उन का बाकायदा इलाज शुरू कर दिया.

इस के बाद जयंत ने मोबाइल से घर का नंबर मिलाया. फोन की घंटी बजते ही वीरेंद्र ने फोन उठा कर ‘हैलो’ कहा.

वीरेंद्रजी की आवाज सुन कर जयंत ने कहा, ‘सर, विशालजी की हालत चिंताजनक है. उन्हें आईसीयू में भरती कर लिया गया है. मैं रात को घर नहीं आ सकूंगा.’

फोन पर हो रही बात सुन कर मंजुला भी वहां आ गई. वीरेंद्र ने फोन मंजुला को थमा दिया.

जयंत ने मंजुला से कहा, ‘मंजुला, मैं आज रात नहीं आ सकूंगा. तुम वीरेंद्रजी का ध्यान रखना. उन्हें कोई तकलीफ न हो.’

मंजुला सोच रही थी कि आज की रात एक पराए मर्द की मौजूदगी में अकेले गुजारनी होगी. उधर वीरेंद्र के दिल की धड़कन तो जयंत के न लौटने की खबर से बढ़ गई थी. दोनों खामोश एकदूसरे को अपलक देख रहे थे.

मंजुला ने खामोशी तोड़ते हुए पूछा, ‘‘खाना लगाऊं?’’

वीरेंद्र ने कहा, ‘‘नहीं मंजुला, खाना तो रोज खाता हूं. आज कुछ पीने की इच्छा हो रही है… पिलाओगी?’’

वीरेंद्र की इस अजीब बात पर मंजुला एकाएक घबरा उठी. इस पर उन्होंने कहा, ‘‘घबराओ नहीं. बस, उधर रखा मेरा ब्रीफकेस उठा कर मुझे दे दो.’’

मंजुला ने जब ब्रीफकेस ला कर वीरेंद्र के सामने रख दिया, तो वे उसे खोलते हुए बड़े प्यार से बोले, ‘‘मैं पहली बार तुम्हारे घर आया हूं. जल्दबाजी में कुछ ले कर नहीं आया,’’ यह कहते हुए उन्होंने अपने ब्रीफकेस से सौसौ रुपए के 2 बंडल निकाले और मंजुला की ओर बढ़ाते हुए कहा, ‘‘बुरा मत मानना. इसे अपने पास रख लो और अपनी पसंद से अपने लिए सोने की चेन और कुछ अच्छी साडि़यां खरीद लेना.

‘‘देखो, यह पैसा मेरा नहीं है… यह तुम्हारा ही है. जयंत के जरीए मैं ने बहुत रुपए कमा लिए हैं, लेकिन उस ने कभी अपना हिस्सा नहीं लिया. अगर तुम भी इनकार कर दोगी, तो मेरा दिल टूट जाएगा और मुझे बहुत दुख होगा.’’

मंजुला का दिल ही नहीं, बदन भी कांप रहा था. उस ने एकसाथ 20 हजार रुपए कभी देखे भी नहीं थे. उस के अंदर उथलपुथल मची थी.

उस ने दूसरे ही पल सोचा, ‘इस 20 हजार रुपए पर उस का ही हक होगा, जिसे जयंत भी कभी जान नहीं सकेंगे. मन की कितनी दबी ख्वाहिशें एकसाथ पूरी हो सकती हैं,’ और उस ने रुपए थाम लिए और वीरेंद्र का चेहरा खुशी से दमक उठा.

वीरेंद्र ने कहा, ‘‘मंजुला, मैं ने कहा था न कि आज कुछ खाने की नहीं, पीने की इच्छा है. क्या तुम मुझे  पिलाओगी?’’ इतना कह कर उन्होंने ब्रीफकेस से शराब की एक बोतल निकालते हुए उस से पैग तैयार कर देने को कहा और वह मना न कर सकी.

सोफे पर बैठ कर मंजुला वीरेंद्र के लिए पैग तैयार करने लगी.

मंजुला के चेहरे पर उठते हुए भावों को वीरेंद्र ने पढ़ने की कोशिश की, जिस में झिझक तो थी, लेकिन हामी भी दिख रही थी.

मंजुला से पैग ले कर वीरेंद्र ने उस के हाथों पर अपना हाथ रखते हुए कहा, ‘‘मंजुला, हालात ने हमें यह मौका दिया है. यहां मेरा अचानक आना, जयंत का रातभर के लिए बाहर जाना, यह मस्ती भरा आलम, सुहानी रात और हम दोनों का घर में रातभर के लिए अकेले होना, क्या यह सब सिर्फ इत्तिफाक भर है? ऐसा मौका जिंदगी में शायद ही कभी किसी को मिलता है.

‘‘आओ मंजुला, हम एकदूसरे को प्यार करें…’’ और इतना कह कर वीरेंद्र ने मंजुला को अपनी बांहों में भर लिया और उस के रसीले होंठों को चूम लिया.

इस के बाद तो वीरेंद्र के चुंबनों की बौछार ने मंजुला को मदहोश कर दिया.

वीरेंद्र ने मंजुला के जिस्म से कपड़े उतार कर नीचे फेंकने शुरू कर दिए और फिर देखते ही देखते वे दो जिस्म एक जान हो गए.

मंजुला मस्ती के इस आलम में इस कदर खो गई कि उसे अच्छेबुरे का एहसास नहीं रहा. फिर तूफान शांत हो गया. जब दोनों की आंखें खुलीं, तो दोनों मुसकरा रहे थे. उस समय रात के 2 बज रहे थे.

मंजुला ने कहा, ‘‘अब तो कुछ खा लीजिए, नहीं तो जयंत कहेंगे कि मैं ने उन के बौस की खातिरदारी नहीं की.’’

‘‘नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है. तुम ने तो मेरी ऐसी खातिरदारी की है कि मैं जिंदगीभर नहीं भूल सकूंगा,’’ वीरेंद्र ने कहा, पर मंजुला नहीं मानी और रसोई से खाना ले आई और दोनों ने एकसाथ खाना खाया.

मंजुला जब सोने के लिए दूसरे कमरे में जाने लगी, तो वीरेंद्र ने मंजुला को अपने साथ सोने को मजबूर कर दिया.

दोनों की आंखें तब खुलीं, जब सुबह के 7 बज गए. मंजुला ने उठ कर पहले अपने कपड़ों को ठीक किया और अपने कमरे की ओर जाने लगी, तभी वीरेंद्र ने कहा, ‘‘मंजुला, अगर मुझ से कोई गलती हुई हो, तो मुझे माफ कर देना. हम शायद ही कभी इस तरह दोबारा मिल सकेंगे. हमें कभी इस के लिए अफसोस नहीं करना चाहिए.’’

मंजुला चुपचाप खड़ी वीरेंद्र की बातें सुन रही थी. उस के चेहरे पर भी कहीं अफसोस का भाव नहीं था.

वीरेंद्र ने कहा, ‘‘मुझे अभी 8 बजे की ट्रेन से लौटना है. क्या एक कप चाय पिला सकोगी?’’

‘‘क्यों नहीं,’’ कह कर मंजुला चाय बनाने चल पड़ी.

जैसे ही वह चाय ट्रे में ले कर गई, तभी दरवाजे की घंटी बज उठी. उस ने लपक कर दरवाजा खोला. सामने जयंत खड़ा था. उस की आंखें थकीथकी सी थीं और चेहरे पर उदासी थी.

तभी जयंत की नजर वीरेंद्र पर पड़ी, जो तैयार हो कर बैठे चाय पी रहे थे.

वीरेंद्र ने पूछा, ‘‘जयंत, तुम्हारे बौस का क्या हाल है? मैं तो एक जरूरी काम से अभी 8 बजे की गाड़ी से लौट रहा हूं, वरना क्लिनिक पर जा कर उन से जरूर मिलता.’’

जयंत ने जवाब दिया, ‘‘मैं अभीअभी अपने नए बौस को अंतिम यात्रा पर विदा कर के लौटा हूं और अपने पुराने बौस को ठीक से खातिरदारी किए बगैर विदा कर रहा हूं.

‘‘काश, ऐसी रात फिर कभी मुझे न देखनी पड़े. सचमुच यह रात मेरे लिए अंधेरा ले कर आई, जिस में मैं ने बहुतकुछ खोया है.’’

मंजुला चुपचाप खड़ी सूनी आंखों से उन दोनों को देख रही थी.  Story in Hindi

–पुरुषोत्तम

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