‘‘बे टा, मैं तुम से कितने दिनों से कह रहा हूं कि अंदर कोठरी में पीतल के टूटेफूटे पुराने बरतन पड़े हैं, उन्हें कपड़े में बांध कर शहर ले जा और बेच आ.’’
‘‘दादाजी, ये सारे बरतन टूटफूट जाएंगे. मेरा तो कहना है कि इन बरतनों को यहीं गांव के ही लाला को बेच दो और उस के बदले में घर का छोटामोटा सामान खरीद लो.’’
‘‘अरे बेटा, यह लाला इतने सारे बरतनों का कुछ भी पैसा नहीं देगा. वह ठग है, पूरा ठग. मेरी मान, इन्हें शहर ले जा और बेच आ. वहां अच्छे पैसे मिल जाएंगे.’’
‘‘अच्छा दादाजी, मुझे जब भी समय मिलेगा, बेच आऊंगा.’’
‘‘अरे बेटा, फिर वही बात. इन बरतनों को कल ही ले जा न. कल कोई खास काम है क्या?’’
‘‘अच्छा दादाजी, ठीक है.’’
अगले दिन सुबहसवेरे उन बरतनों को एक कपड़े में बांध कर मैं रेलवे स्टेशन पहुंच गया. स्टेशन तक के लिए मैं ने अपने छोटे भाई को भी अपने साथ ले लिया था.
टिकट खरीदने के बाद छोटा भाई बरतनों का गट्ठर गाड़ी में रख कर गांव लौट गया. डब्बे में काफी भीड़ थी, इसलिए मैं ने गट्ठर को वहीं दरवाजे के पास ही रख दिया. वैसे भी वहां से शहर की दूरी ज्यादा नहीं थी.
गाड़ी को स्टेशन से चले अभी 5 मिनट ही हुए थे कि एक टीटी टिकट चैक करने वहां आ गया. उस ने बालपैन को कान के ऊपरी हिस्से में टांग रखा था.
मैं ने कुरते की जेब से टिकट निकाल कर उसे दिखाया, तो वह आंखें तरेरते हुए बोला, ‘‘इन बरतनों का टिकट.’’
जब टीटी ने बरतनों की तरफ इशारा कर के मुझ से बरतनों का टिकट मांगा, तो मेरे चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं.
मैं जैसेतैसे हिम्मत बटोर कर बोला, ‘‘बाबूजी, क्या बताएं, ये तो पीतल के पुराने बरतन हैं.
‘‘अब स्टील का जमाना है और पीतल के बरतनों में कलई भी तो करवानी होती है. आजकल कलई करने वाले भी नहीं रहे, जो गलीमहल्ले में जा कर फेरी लगाते हुए ‘कलई करवा लो’ की आवाजें लगाते थे, इसलिए दादाजी के कहने पर इन्हें शहर बेचने जा रहा हूं.
‘‘आजकल घर में जो लड़कियां ब्याह कर आ रही हैं, उन के नखरे कम नहीं हैं. वे स्टील के बरतनों को ही चूल्हे पर चढ़ाना पसंद करती हैं.’’
‘‘ठीक है, ठीक है. ज्यादा बातें बना कर मुझे बहकाने की कोशिश मत करो. जल्दी से इन का टिकट दिखाओ.’’
‘‘अब मुझे क्या पता है साहब, इन का भी टिकट खरीदना पड़ता है?’’ ‘‘अरे, इतना बड़ा गट्ठर है. जितनी जगह इस ने घेर रखी है, यहां 3 सवारियां खड़ी हो जातीं.’’
‘‘अरे बाबूजी, कितना टिकट लगता है यहां से? यही 10 रुपए. लो, 10 रुपए आप ही ले लो.’’
यह सुन कर टीटी बाबू का चेहरा गुस्से से लाल हो गया. वह तिलमिला कर बोला, ‘‘टिकट तो 10 रुपए का ही है, पर बिना टिकट सफर करने पर जुर्माना भी लगता है.’’
‘‘साहब, इस गट्ठर में टूटेफूटे बरतन ही तो हैं?’’ ‘‘नहीं… नहीं, टिकट काटना पड़ेगा. उस के साथ जुर्माना भी लगेगा. निकालो, एक सौ 10 रुपए. जल्दी करो.’’
‘‘अरे बाबूजी, इतने के तो बरतन भी नहीं हैं?’’ ‘‘देखो, जल्दी करो. मेरा ज्यादा वक्त बरबाद न करो, नहीं तो अगले स्टेशन पर तुम्हें पुलिस के हवाले कर दूंगा.’’
इस बीच मेरे साथ खड़ी सवारी ने मेरे कान में फूंक मारी, ‘‘टीटी से अगर अपनी जान छुड़ानी है, तो 50 का नोट इस के मुंह पर दे मारो.’’
एक बार तो मन हुआ कि टीटी से कह दिया जाए कि मेरे पास देने के लिए कुछ भी नहीं है. हां, ये पुराने बरतन हैं, सो इन्हें ही ले जाओ. पर 50 रुपए के लिए तो इतने ढेर सारे बरतनों को छोड़ा भी नहीं जा सकता था.
मैं ने उन साथ खड़े भाई साहब का कहा मान कर 50 रुपए का एक नोट मुट्ठी में भींच उन की ओर बढ़ा दिया.
टीटी 50 का नोट देख कर ऐसे चिल्लाया, जैसे मैं ने उसे कोई गाली दे दी हो. मैं उस की नब्ज पकड़ चुका था. मैं ने तुरंत कहा, ‘‘ठीक है, आप मुझे अगले स्टेशन पर उतार कर पुलिस के हवाले कर देना.’’
टीटी को लगा कि 50 रुपए भी गए. वह तुरंत बोला, ‘‘अच्छा ठीक है, तू 50 रुपए ही निकाल.’’
सरकारी भूत से पीछा छुड़ा कर मैं अगले स्टेशन पर उतर गया और बरतनों का गट्ठर सिर पर उठा कर सीधे बसस्टैंड की ओर चल पड़ा. वहां पहुंच कर देखा, गले में एक छोटा सा बस्ता लटकाए एक कंडक्टर कई जगहों के नाम जोरजोर से बोल कर सवारियों को अपनी ओर बुला रहा था.
मैं ने उस के नजदीक जा कर पूछा, ‘‘कंडक्टर साहब, सर्राफा बाजार कौन सी बस जाएगी?’’
वह मेरी बाजू पकड़ कर एक बस के दरवाजे की ओर ले जाते हुए बोला, ‘‘हां… हां… भाई साहब, यही बस वहां जाएगी. चलो… चलो… जल्दी करो. कुछ ही देर में बस चलने वाली है.’’
मैं ने गट्ठर वहीं उतारा और कंडक्टर से बोला, ‘‘अरे कंडक्टर साहब, जरा इसे बस के ऊपर रखवा दो.’’
‘‘अरे… अरे, बस तो अभी जा रही है. इसे अंदर ही रख दो.’’
यह सुन कर मैं बहुत खुश हुआ. अगर इसे ऊपर चढ़ाया जाता, तो पूरे रास्ते यही खटका रहता कि कहीं कोई उतार न ले या फिर नीचे ही न गिर जाए. उसे वहीं मेरे नजदीक रख कर कंडक्टर ने मुझे सभी मुसीबतों से नजात दिला दी.
बस जल्दी ही चल पड़ी. रास्ते में सवारियां चढ़उतर रही थीं, पर मेरा ध्यान बरतनों की ही तरफ था कि कहीं कोई सवारी उस पर पैर न रख दे.
आधे घंटे बाद मैं बस से सर्राफा बाजार पहुंचा. बस से उतर कर मैं बरतनों का गट्ठर सिर पर उठाए एक दुकान पर जा कर रुक गया.
दुकानदार पहले से खड़े ग्राहकों को निबटाने में लगा था. जैसे ही ग्राहकों से दुकान खाली हुई, तो उस का ध्यान मेरी ओर गया.
मैं ने गट्ठर की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘‘पीतल के बरतन हैं. पुश्तैनी हैं. किसी म्यूजियम की शान भी बन सकते हैं. किसी विदेशी की नजर पड़ जाए, तो समझे कि आप के वारेन्यारे हो सकते हैं.
‘‘वह क्या है कि आजकल स्टील के बरतन आ गए हैं न, घर की बहुएं पीतल के बरतनों को पसंद नहीं करतीं. बस, इसलिए इन्हें बेचना पड़ रहा है.
‘‘गांव से चल कर शहर में बेचने आया हूं वह भी दादाजी के कहने से, वरना मैं तो वहीं गांव के लाला को देने के हक में था.’’ ‘‘ठीक है… ठीक है, गट्ठर खोल कर तो दिखाओ.’’
मैं ने अपना काम बनता देख कर खुशीखुशी गट्ठर खोल दिया. बरतन देखते ही वह आदमी अपनी गद्दी से उछल पड़ा और धीरे से बोला, ‘‘अरे, यह तो चोरी का सामान लगता है. अगर किसी पुलिस वाले की निगाह पड़ गई, तो तुम्हें तो बाद में दबोचेगा, पहले मुझे ले जाएगा और जेल में बंद कर देगा. जितने के बरतन नहीं, उस से ज्यादा पैसे देने पड़ जाएंगे.’’
‘‘पर लालाजी, ये तो हमारे पुश्तैनी बरतन हैं.’’ ‘‘भाई, मैं तो चोरी के बरतन नहीं खरीदता. ऐसा करो, इसे जल्दी से उठाओ और अगली दुकान पर ले जाओ.’’
उस का जवाब सुन कर मैं तिलमिला कर रह गया और अपना सा मुंह ले कर बाहर आ गया. मैं साथ वाली दुकान की ओर बढ़ गया और उस की गद्दी पर सांप की तरह कुंडली मार कर बैठे लालाजी से बरतन खरीदने की गुजारिश करने लगा.
बरतनों का गट्ठर उस की दुकान के भीतर रखा ही था कि वह भी इसे चोरी का सामान सम झने लगा.
उस लाला ने तो गट्ठर खुलने भी नहीं दिया और उठ कर मेरे सिर पर रखवाता हुआ बोला, ‘‘भैया, यहां चोरी का सामान नहीं बिकता. जितने का मुनाफा नहीं होगा, उस से ज्यादा पुलिस के डंडे खाने पड़ जाएंगे.’’
‘‘लालाजी, यह चोरी का सामान नहीं है. ये तो पुश्तैनी पीतल के बरतन हैं. आजकल घरों में स्टील के बरतनों का जमाना है, इसलिए इतने अच्छे बरतनों को बेचना पड़ रहा है.’’
वह तल्ख लहजे में मु झे समझाते हुए बोला, ‘‘अरे, सुना नहीं, मैं क्या कह रहा हूं. चल, जल्दी से दुकान खाली कर. कहीं पुलिस वाले ने देख लिया, तो डंडे खाने पड़ जाएंगे.’’
मैं बेइज्जती का कड़वा घूंट पी कर दुकान से बाहर आ गया और बसअड्डे की ओर मुड़ गया, ताकि जल्दी ही रेलवे स्टेशन पहुंच कर गांव को जाने वाली अगली गाड़ी पकड़ ली जाए.
मैं कुछ ही कदम चला था कि किसी ने पीछे से बरतनोें पर इतनी जोर से डंडा मारा कि बरतनों का गट्ठर हाथ से छूट गया और जोरदार आवाज करता हुआ सड़क के बीचोंबीच गिर गया.
मैं ने पीछे मुड़ कर देखा, तो एक सिपाही का डंडा हवा में लहरा रहा था. वह चिल्लाया, ‘‘क्यों बे, कहां से चोरी किए ये बरतन?’’
‘‘हवलदारजी, चोरी के नहीं हैं ये. पुश्तैनी बरतन हैं. इन्हें गांव से शहर बेचने आया हूं,’’ मैं ने हौसला बटोर कर जवाब दिया.
हवलदार मेरे पैरों की तरफ डंडा मारते हुए बोला, ‘‘चल बे, बड़ा आया पुश्तैनी बरतनों वाला. यहां जो भी आता है, ऐसा ही कहता है. चल, थाने चल. जब डंडे पड़ेंगे, तो अपनेआप बोलेगा कि कहां से चोरी किए हैं?’’
मैं हाथ जोड़ते हुए बड़ी नम्रता से बोला, ‘‘हवलदारजी, आप नाहक मु झे परेशान कर रहे हैं. ये मेरे दादादादी के समय के पीतल के बरतन हैं, जिन्हें मैं यहां बेचने आया हूं.’’
सिपाही अपना डंडा लहराते हुए बोला, ‘‘अरे सुना नहीं, उठा बरतन और चल थाने…’’ फिर धीरे से फुसफुसा कर बोला, ‘‘नहीं तो निकाल 2 सौ रुपए.’’
2 सौ रुपए का नाम सुनते ही मु झे ऐसा लगने लगा, जैसे मेरे नीचे की जमीन धंस रही है. मैं अपना सिर पकड़ कर वहीं बैठ गया.
मेरा गला सूख गया था, तभी मु झे सामने दुकान के बाहर रखे घड़ों में पानी नजर आया. मैं पानी पीने की गरज से उस ओर दौड़ पड़ा.
मु झे दौड़ता देख वह सिपाही भी मेरे पीछे भागा और कुरते को पीछे से पकड़ कर बोला, ‘‘अबे, भाग कर जाता कहां है? चोरी का माल है न, तभी तो भाग रहा है.
‘‘मैं तो देखते ही सम झ गया था कि यह चोरी का सामान है, पुलिस महकमे में यों ही बाल सफेद नहीं किए हैं. ‘‘अरे, हम तो चोर के चेहरे को देख कर ही ताड़ जाते हैं.
‘‘चल बेटा, थाने चल. आज तु झे हवालात की हवा नहीं खिलाई, तो मेरा नाम भी खजूरा सिंह नहीं.’’
जब वह बोल रहा था, उस की पूरी तोंद हिल रही थी. मैं ने मटके से पानी निकाला और गटागट पीने लगा. पानी पी कर मु झ में थोड़ी जान आई. मैं कुरता छुड़वाते हुए बोला, ‘‘हवलदारजी, भाग कौन रहा था? हमारा तो गला सूख रहा था. सामने घड़े देखे, सो दौड़ पड़ा पानी पीने. हां, अब सुनो, ये बरतन चोरी के नहीं हैं. चलना है, तो मेरे गांव चलो. वहां से सबकुछ सच पता चल जाएगा.’’
इस बार सिपाही थोड़ा सा नम्र हो कर बोला, ‘‘अरे, अगर 2 सौ नहीं हैं, तो सौ ही दे दे, वरना थाने में बंद कर दिया, तो जल्दी से जमानत भी नहीं होगी और पूरे घर के लोग शहर के चक्कर काटतेकाटते मर जाएंगे.’’
मैं भी अड़ गया और जोर से बोला, ‘‘क्यों दूं सौ रुपए. जा, ये बरतन ले जा और मुझे थाने में बंद कर दे. मैं तुम्हें फूटी कौड़ी भी नहीं दूंगा.’’
देखते ही देखते वहां कुछ लोग जमा हो गए. वैसे आजकल किस के पास इतना समय है कि दूसरे के पचड़े में पड़े. यह तो मेरी किस्मत ही कहिए, उन लोगों में से कुछ लोग आगे आ कर मेरी बात सुनने लगे. उन्हें देख कर सिपाही फिर चिल्लाया, ‘‘चोरी के बरतन हैं. बाजार में बेच रहा था, मैं ने पकड़ लिया. अब यह थाने भी नहीं चल रहा.’’
उस के इस तरह बोलते ही मैं भी बोल उठा, ‘‘ये सिपाहीजी सरासर झूठ बोल रहे हैं. हम आज ही अपने रामपुरा गांव से आए हैं. ये बरतन हमारे पुश्तैनी हैं. दादाजी कहने लगे कि इन्हें शहर बेच आ. अब यह सिपाही इन्हें चोरी का बता कर जबरदस्ती पैसे ऐंठना चाहता है.’’
इस पर 2-3 लोग जो शुरू में रुके थे, वे सिपाही से बोले, ‘‘हम ने इन की भी बात सुनी है, उस से तो यही लगता है कि ये बिलकुल सच बोल रहे हैं. भाई, तुम क्यों एक शरीफ आदमी को तंग कर रहे हो?’’
बस फिर क्या था, जब सिपाही ने भीड़ को हमारी तरफ से बोलते हुए देखा, तो वह आगे खड़े 2-3 लोगों को डंडा दिखाते हुए कड़क आवाज में बोला, ‘‘कौन कह रहा है कि यह सच बोल रहा है?’’
जब कोई नहीं बोला, तो वह सम झ गया कि उस का तीर निशाने पर बैठा है. इस बार वह और भी ज्यादा उत्साहित हो कर जोर से बोला, ‘‘अरे, कौन इस चोर का पक्ष ले रहा था? जिसे जो भी कहना हो, थाने में चल कर कहना.’’
जब थाने की बात आई, तो वहां से सभी खिसकते नजर आए.
मु झे अकेला देख सिपाही अपनी मूंछों पर हाथ फेरते हुए बोला, ‘‘क्यों बे, चलता है या नहीं.’’ फिर हमें एक तरफ ले जा कर बोला, ‘‘अभी भी कह रहा हूं, 2 सौ नहीं हैं, चल सौ ही दे दे. अगर एक बार थाने ले गया, तो डंडा परेड तो जो होगी, सो होगी ही, कुछ भी खाने को तरस जाएगा और रात में मच्छर जो बुरा हाल करेंगे, सो अलग.’’
मेरी जेब में केवल सौ का ही नोट था. मु झे लगा कि अब मैं अजीब मुसीबत में फंस गया हूं.
मैं सोचने लगा कि अगर इसे सौ रुपए दे दिए, तो घर कैसे पहुंचूंगा. अभी मैं सोच ही रहा था कि उधर से एक आटोरिकशा आता हुआ दिखाई दिया.
उस के नजदीक आते ही सिपाही आटोरिकशे पर डंडा मारते हुए बोला, ‘‘अरे, किधर चला आ रहा है? देख नहीं रहा, बाजार में कितनी भीड़ है. तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई इस भीड़ भरे इलाके में घुसने की?’’
‘‘माईबाप, इस बाजार में आना मना है क्या? सवारी को उतारने के लिए तो जहन्नुम में भी जाना पड़ता है, यह तो भीड़ भरा बाजार है,’’ आटोरिकशे वाला बोला.
‘‘बहुत ज्यादा बकबक करता है, दिखा अपने कागज,’’ सिपाही बोला.
वह आटोरिकशे में से कागज निकाल कर दिखाता हुआ बोला, ‘‘लो हवलदार साहब, देख लो. मेरे सारे कागज पूरे हैं.’’
वह मूंछों पर हाथ फेर कर फरमान सुनाता हुआ बोला, ‘‘चल, थाने चल. वहीं जा कर ये कागज दिखाना.’’
वह इस बार थोड़ा गिड़गिड़ा कर हाथ जोड़ता हुआ बोला, ‘‘ऐसा न करो. कागज पूरे हैं, आप यहीं देख लो.’’
‘‘कहा न, थाने चल. वहीं देखेंगे. और हां, ये बरतनों का गट्ठर है न, इसे उठा कर अंदर रख ले,’’ कहते हुए वह मेरा हाथ पकड़ कर आटोरिकशे में बैठाते हुए बोला, ‘‘चल बेटा, थाने चल. वहां जब डंडे पड़ेंगे, तो अगलापिछला सब याद आ जाएगा.’’
यह सुन कर मु झे पसीना आ गया. कुछ ही देर चलने के बाद आटोरिकशा रुक गया था. आटोरिकशे वाले ने बरतनों का गट्ठर उतारा और मु झे उतरते हुए देखने लगा.
अभी सिपाही मेरा हाथ पकड़ कर उतर ही रहा था कि ड्राइवर ने आटोरिकशा चला दिया. सिपाही गिरतेगिरते बचा. जब तक वह कुछ सम झ पाता, आटोरिकशे वाला छूमंतर हो गया था.
सिपाही गुस्से में बोला, ‘‘चल बे, उठा गट्ठर. अभी आटेदाल का भाव बताता हूं.’’
मैं ने गट्ठर उठाया और उस के पीछेपीछे चल पड़ा.
खजूरा सिंह कुरसी पर पसरे एक हट्टेकट्टे वरदीधारी के सामने खड़ा हो गया. जैसे ही उस की निगाह खजूरा सिंह पर पड़ी, वह तुरंत बोला, ‘‘हां भई खजुरिए, लगता है, कोई बड़ा मुरगा हाथ लगा है?’’
इतना सुनते ही उस का चेहरा खिल गया. वह थोड़ा सा आगे आ कर उस के कान में फुसफुसाया. वह तुरंत गुस्से में बोला, ‘‘ओ शरीफया, जरा आ तो, खजूरा सिंह एक चोर पकड़ कर लाया है, उसे अंदर बंद कर दे.’’
‘‘आया हुजूर,’’ कह कर शरीफ भागता हुआ आया और एक कालकोठरी में लगे ताले को खोलने लगा.
ताला खुलते ही खजूरा सिंह ने मेरा हाथ पकड़ा और सीखचों के पीछे बंद कर दिया.
अभी कुछ ही देर हुई थी कि एक पुलिस वाला बाहर से ललकार कर बोला, ‘‘क्यों बे, कहां से चोरी किए ये बरतन? मैं तु झे 10 मिनट का समय दे रहा हूं. अगर नहीं बताया, तो तेरा ऐसा हाल करूंगा कि तेरा हुलिया देख कर कोई भी पहचान नहीं पाएगा.’’
इतना कह कर वह चला गया, किंतु मेरा हुलिया बिगाड़ गया. मैं बुरी तरह फंस चुका था. उधर घर वालों को तो यह पता भी न चल पाएगा कि मु झे किस तरह इन भेडि़यों ने दबोच लिया है.
मैं ने पुलिस की पिटाई के किस्से सुन रखे थे. किस तरह उलटा लटका कर मारते हैं कि कई बार आदमी मर ही जाता है.
मैं डर के मारे अपना सिर पकड़ कर वहीं फर्श पर बैठ गया था. अभी 10 मिनट भी नहीं हुए थे कि वही सिपाही ताला खोल कर अंदर आया और मेरी पीठ पर जोर से डंडा मारते हुए बोला, ‘‘हां बता, कहां से चोरी किए हैं ये बरतन?’’
‘‘साहब, मैं दादाजी के कहने से इन्हें शहर में बेचने आया था कि हवलदार साहब ने चोर सम झ कर मु झे यहां बंद कर दिया.’’
‘‘वाह बेटा वाह, क्या कहानी बनाई है,’’ इतना कह कर उस ने बीड़ी सुलगाई और उस का अगला सिरा जिस पर आग झलक रही थी, मेरे हाथ पर रगड़ दिया. मेरी चीख निकल गई. फिर मेरे घुटनों पर वह डंडा मारते हुए बोला, ‘‘साले, नाटक करता है. अभी तो छुआ भी नहीं और चीखें मारने लगा.’’
इतना बोलतेबोलते उस ने एक जोरदार डंडा मेरे हाथ पर मारा.
मुझे लगा, मेरे हाथों की हड्डियां टूट गई हैं. अभी मैं इस चोट को सहला ही रहा था कि एक और डंडा मेरी पसलियों पर पड़ा. वह इतनी जोर से पड़ा था कि मेरी आंखों के सामने अंधेरा छा गया. फिर मेरे मुंह को अपने हाथ से जोर से पकड़ कर झटका देते हुए बोला, ‘‘सोच ले, अभी एक और मौका दे रहा हूं.’’
इतना कह कर वह चला गया.
उस के जाते ही मैं ने सोचा कि इस मार से बचने का एक ही रास्ता है कि इन पुलिस महोदय को अपने घर का पता दे देना चाहिए कि इसी घर से बरतन चोरी किए हैं औैर यह सचाई भी है.
अभी 5 मिनट ही बीते थे कि वह फिर आ धमका. जैसे ही उस ने डंडे पर अपनी पकड़ मजबूत की, मैं गिड़गिड़ाते हुए बोला, ‘‘हवलदार साहब, मु झे मत मारो, मैं बताता हूं.’’
इतना सुनना था कि हवलदार की आंखों में एक चमक उतर गई. वह मूंछों पर ताव देते हुए बोला, ‘‘शाबाश बेटा, बता, कहां हाथ मारा?’’
मैं झट से बोला, ‘‘रामपुरा गांव में नोराता राम हैं, उन के घर से.’’ ‘‘क्यों बे, सच बोल रहा है, कहीं बेवकूफ तो नहीं बना रहा.’’ ‘‘नहीं हवलदारजी, मैं भला झूठ क्यों बोलूंगा.’’
वह अपनी तसल्ली कर के बाहर निकल गया.
कुछ देर बाद एक सिपाही ने मेरा हाथ पकड़ा और बाहर निकाल कर गट्ठर के पास ले जा कर बोला, ‘‘चल उठा बरतन और बाहर खड़ी जीप में रख.’’
बरतन रखने के बाद उसी पुलिस वाले ने मेरा हाथ पकड़ कर मु झे जीप में बैठा दिया. एक पुलिस वाला हाथ में बंदूक लिए मेरी बगल में बैठ गया.
जैसे ही पुलिसिया जीप गांव में गई, तो बच्चों का एक रेला उस के पीछे लग गया. मेरे बताए रास्ते से जैसे ही जीप मेरे घर के बाहर आ कर रुकी, तो पुलिसिया गाड़ी से भयभीत हमारे पिताजी, ताऊजी और दादाजी घर से बाहर निकल आए जैसे कोई भूचाल आ गया हो, क्योेंकि गांव में पुलिसिया जीप का आना एक डरावने सपने जैसा था. मैं जीप में से उतारा गया.
मु झे पुलिस वालों के साथ देख कर सभी के चेहरे पीले पड़ गए. वे सोचने लगे कि ये तो बरतन बेचने शहर गया था, पुलिस के हाथ कैसे पड़ गया.
उसी समय एक पुलिस वाला पीछे से उस बरतनों वाले गट्ठर को ले आया और खोल कर दादाजी की तरफ देख कर बोला, ‘‘ताऊ, ये तुम्हारे बरतन हैं?’’
‘‘अरे हां, इस में कोई शक की बात है,’’ दादाजी के इस बात की पुष्टि कर देने के बाद वह सिपाही मेरे गाल पर जोर से थप्पड़ मारता हुआ बोला, ‘‘साला, अब आया काबू में. अब जब थाने में कुटापा चढ़ेगा, तो बताएगा कि आज तक और कहांकहां डाका डाला.’’
यह देख कर दादाजी का चेहरा गुस्से से लाल हो गया. वे पुलिस वाले पर गरजे, ‘‘अरे, इसे थप्पड़ क्यों मार रहे हो? ये बरतन भी हमारे हैं और यह छोरा भी तो हमारा है. इसे हम ने ही तो शहर भेजा था कि इन बरतनों को शहर में बेच आ. ये तो बताओ, इसे पकड़ा क्यों है?’’
अब मेरा हौसला बढ़ चुका था. मैं तुरंत बोला, ‘‘दादाजी, जब मैं बरतन बेच रहा था लाला की दुकान पर, तो सिपाही ने मु झे पकड़ लिया और कहने लगा कि ये बरतन चोरी के हैं.
‘‘मैं ने लाख कहा कि ये हमारे घर के बरतन हैं, मैं इन्हें शहर बेचने आया हूं. पर यह तो मान ही नहीं रहा. जबरदस्ती मु झे थाने में बंद कर दिया. मु झ से बारबार पता पूछ रहे थे कि कहां से बरतन चोरी किए हैं. मैं ने तंग आ कर अपने घर का पता दे दिया.’’
‘‘बेटा, यह तो तू ने अच्छा किया,’’ फिर वह पुलिस वाले को डांटते हुए बोले, ‘‘अरे, जब इस ने सच बोल दिया था, तो इस पर भरोसा क्यों नहीं किया?’’
अभी वे बोल ही रहे थे कि अड़ोसपड़ोस के लोग भी वहां आ गए. वे सभी अपनीअपनी भाषा में सिपाहियों पर टूट पड़े. बस फिर क्या था, समय की नजाकत देख उन्होंने जीप स्टार्ट की और चुपचाप बैठ कर चोरों की तरह वहां से भाग खड़े हुए.
–डा. सुरेंद्र गुप्त




