Railway Accident Story. सुबह के 5 बजे थे. ठंडीठंडी हवा चल रही थी. बांस के जंगल से चिडि़यों के चहचहाने की आवाजें आ रही थीं.
ऐसे सुहावने मौसम में गौरव रेलवे लाइन के किनारेकिनारे टहल रहा था कि अचानक उस के कानों में किसी के कराहने की आवाज सुनाई दी. वह चौंक कर इधरउधर देखने लगा. उस दर्द भरी आवाज को सुन कर वह समझ नहीं पा रहा था कि यह आवाज कहां से आ रही है.
कुछ देर बाद गौरव ने देखा कि रेलवे लाइन के बीचोंबीच एक नौजवान तड़पते हुए करवटें बदल रहा था. शायद वह चलती गाड़ी से नीचे गिर गया था.
हिम्मत बांध कर गौरव उस के नजदीक पहुंचा. उस ने देखा कि 25 साल का एक नौजवान तकरीबन बेहोशी की हालत में आहें भर रहा था.
इसी बीच जब गौरव ने पीछे मुड़ कर देखा, तो उस की नजर आने वाली गाड़ी पर पड़ी. गाड़ी पूर्व केबिन पार कर चंद मिनटों में ही वहां से गुजरने वाली थी. थोड़ी ही देर में उस नौजवान की जिंदगी खत्म हो सकती थी.
गौरव ने उस घायल नौजवान को गोद में उठा कर लाइन के किनारे लिटा दिया. इतने में एक मालगाड़ी रेल की पटरी के सीने को चीरती हुई वहां से गुजर गई.
चूंकि वह नौजवान बहुत घायल था, इसलिए अब गौरव के सामने उस की जिंदगी बचाने का सवाल था.
तभी वहां से एक आदमी गुजरा. गौरव ने उस आदमी से कहा, ‘‘सुनो भाई, यह नौजवान मर रहा है… अगर चाहें, तो हम दोनों इसे बचा सकते हैं.’’
राहगीर बोला, ‘‘गाड़ी से गिरा हुआ आदमी आमतौर पर नहीं बचता. अगर रास्ते में कहीं मर गया, तो पुलिस के सामने बयान देतेदेते मेरी हालत पतली हो जाएगी. मैं आप से हाथ जोड़ता हूं कि मुझे इस लफड़े में न डालिए.’’
‘‘कुछ नहीं होगा भाई. तुम्हारी थोड़ी सी मदद से इसे नई जिंदगी मिल सकती है,’’ गौरव ने समझाने के लहजे में कहा.
पर उस राहगीर ने एक न सुनी. तब गौरव दौड़ादौड़ा पास ही बने रेलवे के पूर्व केबिन पर गया. उस ने केबिनमैन को वारदात के बारे में बताया, ‘‘एक नौजवान किसी ट्रेन से गिर कर बेहोशी की हालत में है. उस के सिर और मुंह पर चोटों के निशान हैं. अगर जल्दी से उसे अस्पताल न पहुंचाया गया, तो उस की मौत हो सकती है.’’
नौजवान की हालत के बारे में सुन कर केबिनमैन का दिल दया से भर उठा. उस ने फौरन स्टेशन मास्टर को फोन किया.
स्टेशन मास्टर ने पूछा, ‘‘तुम्हें इस घटना की जानकारी किस ने दी है?’’
‘‘पास खड़े एक आदमी ने…’’ ‘‘उस का नाम क्या है?’’ ‘‘गौरव.’’
‘‘उस से घटना की एक लिखित रिपोर्ट ले लो. मैं स्टेशन से जल्द ही स्ट्रेचर भिजवा रहा हूं.’’
20 मिनट बाद स्टेशन से स्ट्रेचर उठाए 2 आदमी आ गए. गौरव भी उस घायल नौजवान की मदद के लिए साथ हो लिया.
कुछ ही देर के बाद वे स्टेशन पर पहुंच गए. घायल नौजवान की जेब में दिल्ली से कटिहार तक का टिकट था. पैंट की जेब में 32 सौ रुपए थे. सभी कुछ स्टेशन में जमा हो गया था और उस नौजवान को रेलवे अस्पताल को सौंप दिया गया था.
3 घंटे बाद नौजवान को होश आया. जब उस ने अपना पताठिकाना बताया, तो 2 दिन बाद उस के घर वाले भी आ पहुंचे.
शाम को उस नौजवान ने बताया, ‘‘मैं दिल्ली की एक कंपनी में काम करता हूं. बहिन की शादी में शामिल होने के लिए अपने गांव जा रहा था. दिल्लीकटिहार एक्सप्रेस में बड़ी भीड़ थी. गरमी से बचने के लिए मैं दरवाजे पर हैंडल पकड़ कर बैठ गया. भोर की पुरवइया में झपकी आ गई. इसी वजह से मेरा यह हाल हुआ.
‘‘मेरे गिरने के बाद किसी ने गाड़ी की चेन भी नहीं खींची और रेलगाड़ी हवा से बातें करती हुई अपने मुकाम की ओर बढ़ती रही. आजकल आदमी के भीतर इनसानियत मरती जा रही है. वह दूसरों के दर्द में शरीक नहीं होना चाहता. वह बेकार में परेशानी नहीं उठाना चाहता. सोचता है, कौन मेरा अपना है. हर आदमी खुदगर्ज हो गया है.’’
घर लौटने के बाद गौरव की बीवी ने घबरा कर पूछा, ‘‘तुम्हारे कुरते पर खून के धब्बे कैसे लग गए?’’
‘‘घबराओ नहीं… मुझे कुछ नहीं हुआ है.’’ ‘‘आखिर बताओ भी तो कि कुरते पर खून के धब्बे कहां से लगे?’’
‘‘एक नौजवान को बचाते हुए…’’ ‘‘तुम टहलने जाते हो या बेमतलब परेशानी मोल लेने?’’ बीवी ने तमक कर कहा.
‘‘कैसी बातें करती हो गार्गी. मैं ने एक जख्मी आदमी की जान बचाई है. क्या दुनिया में आदमी की जिंदगी से भी बढ़ कर कोई चीज है?’’ गौरव ने समझाते हुए कहा.
‘‘आजकल आदर्श झाड़ने से काम नहीं चलता.’’ ‘‘क्यों बेकार की बातें करती हो… आखिर इनसानियत भी कोई चीज है या नहीं?’’
‘‘मैं तुम्हारी बात मानती हूं, पर आजकल परोपकार का जमाना नहीं है.’’ ‘‘गार्गी, तुम इतना जान लो कि जो परोपकार करना नहीं जानता, वह इनसान कहलाने का हकदार ही नहीं है.’’
15 दिनों बाद घायल नौजवान को अस्पताल से छुट्टी मिल गई. वह अब ठीक हो गया था. हां, पैर में गहरी चोट आने के चलते वह कुछ लंगड़ा कर चल रहा था. स्टेशन मास्टर ने खबर भिजवाई थी, ‘‘तुम्हारा रुपया मेरे दफ्तर में जमा है, आ कर ले जाओ.’’
शुक्रवार को वह नौजवान स्टेशन आया. गौरव को भी वहां बुलाया गया था. स्टेशन मास्टर ने उस नौजवान को 32 सौ रुपए सौंपते हुए कहा, ‘‘तुम इन्हीं शख्स की मेहरबानी से बचे हो, वरना कट कर मर गए होते त्रिभुवन.’’
वह नौजवान हाथों में रुपए लिए गौरव के पैरों पर गिर गया और आंखों में आंसू भर कर कहने लगा, ‘‘आप का परोपकार मैं कभी नहीं भूल पाऊंगा बाबूजी.’’ Railway Accident Story
–वेदप्रकाश पांडेय




