New Debate. उत्तर प्रदेश के गांवों में इन दिनों एक नई चर्चा धूल उड़ाती गलियों, पान की दुकानों, चाय की केतलियों और पंचायत भवनों के आसपास तेजी से घूम रही है कि ‘अब प्रधान ही प्रशासक बनेंगे.’

यह वाक्य सुनते ही किसी बूढ़े किसान की आंखों में चमक आ जाती है. उसे लगता है कि चलो, अब गांव का आदमी गांव चलाएगा. अब कोई बाहरी बाबू नहीं आएगा जो खेत और खलिहान का फर्क भी ठीक से न जानता हो. अब वही आदमी फैसले करेगा जिस ने बचपन से गंब की टूटी नाली, सूखा हैंडपंप, बदहाल स्कूल और राशन की राजनीति को अपनी आंखों से देखा है.

लेकिन इसी वाक्य के दूसरे हिस्से में एक गहरी बेचैनी भी छिपी हुई है, क्योंकि गांव केवल भोली मिट्टी का नाम नहीं है, बल्कि गांव सत्ता का भी खेल है. गांव रिश्तों, जातियों, दबंगई, अहंकार, कृपा, बदला और छोटेछोटे साम्राज्यों का भी संसार है. वहां ‘प्रधान’ केवल एक संवैधानिक पद नहीं होता, वह कई बार सामाजिक ताकत का दूसरा नाम बन जाता है.

अगर अब वही प्रधान ‘प्रशासक’ कहलाने लगेगा, तब सवाल उठना लाजिमी है कि क्या गांव सचमुच लोकतंत्र की तरफ बढ़ेगा या फिर स्थानीय सामंतवाद का नया संस्करण जन्म लेगा?

गांव का आदमी गांव को सब से ज्यादा सम झता है. इस बहस का सब से मजबूत पक्ष यही है कि गांव को गांव वाला ही सम झ सकता है. लखनऊ के एयरकंडीशंड दफ्तर में बैठा अफसर फाइल देख कर रिपोर्ट बना सकता है, लेकिन उसे यह नहीं मालूम होगा कि बरसात में किस दलित बस्ती में घुटनों तक पानी भर जाता है.

उसे यह भी नहीं पता होगा कि गांव की कौन सी विधवा राशन की दुकान से डरती है, कौन सा किसान कर्ज में डूबा है और कौन सा परिवार सरकारी योजनाओं की सूची में होते हुए भी सालों से लाभ से बाहर है, जबकि ग्राम प्रधान इन सब को जानता है. वह सुबह खेत में भी दिखता है, दोपहर में पंचायत भवन में भी और शाम को किसी बीमार गांव वाले को अस्पताल ले जाते हुए भी. उस के लिए गांव कोई प्रशासनिक इकाई नहीं, रोजमर्रा की जिंदगी है.

यही वजह है कि बहुत से लोग सरकार के इस कदम को लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण की दिशा में अच्छी पहल मान रहे हैं. उन्हें लगता है कि जब तक चुनाव नहीं हो जाते, तब तक गांव की जिम्मेदारी वहां के चुने गए प्रतिनिधि के पास ही रहनी चाहिए.

असली प्रधान कौन

यह सवाल सुनने में अजीब लग सकता है, लेकिन ग्रामीण भारत में यह सब से बड़ा सच है. कागज पर प्रधान कोई और होता है, लेकिन असली सत्ता किसी और के हाथ में होती है.

उत्तर प्रदेश के हजारों गांवों में महिला प्रधान हैं. संविधान ने उन्हें आरक्षण दे कर नेतृत्व का अवसर दिया. मकसद था कि औरतें गांव की राजनीति में भागीदारी बढ़ाएं और इस से सामाजिक बदलाव पैदा हो.

असल में क्या हुआ

‘प्रधानपति’ नाम की एक नई संस्था पैदा हो गई. गांव में लोग महिला प्रधान का नाम कम और उन के पति का नाम ज्यादा जानते हैं. सरकारी अफसर आते हैं तो सामने पति बैठा मिलता है. पंचायत के फैसले पति लेते हैं. ठेके पति तय करते हैं. बैंक खाते तक पर अनौपचारिक कंट्रोल पति का होता है. महिला प्रधान केवल दस्तखत करने तक सीमित रह जाती है.

यह सिर्फ महिला प्रधानों तक सीमित नहीं है. जहां पुरुष प्रधान हैं, वहां ‘प्रधान प्रतिनिधि’ नामक नई सत्ता उभर आती है. कोई भाई, कोई बेटा, कोई भतीजा, कोई खास समर्थक… धीरेधीरे असली पावर वही संभालने लगता है.

गांवों में यह सीन आम है कि पंचायत भवन के बाहर कुरसी पर बैठा इनसान आधिकारिक रूप से कुछ भी नहीं होता, लेकिन बिना उस की इजाजत के पत्ता तक नहीं हिलता.

‘प्रशासक’ शब्द का नशा

भारतीय समाज में शब्द केवल शब्द नहीं होते, वे हैसियत बन जाते हैं. ‘साहब’ शब्द सुनते ही बरताव बदल जाता है. ‘अफसर’ शब्द सुनते ही लोग खड़े हो जाते हैं और ‘प्रशासक’ यह शब्द तो सीधे सत्ता की गंध ले कर आता है. गांव में प्रधान बनते ही आदमी की चाल बदल जाती है. उस के घर के बाहर कुरसियां बढ़ जाती हैं. फोन लगातार बजने लगते हैं. पुलिस वाले भी पहचानने लगते हैं. ब्लौक के मुलाजिम भी इज्जत से बात करते हैं.

अब वही शख्स जब ‘प्रशासक’ कहलाएगा तो उस के आसपास एक नया माहौल बनेगा. उस के समर्थक खुद को सरकार का हिस्सा सम झने लगेंगे. उस के रिश्तेदार गांव में असर दिखाने लगेंगे. उस के विरोधी दबाव महसूस करेंगे और यहीं लोकतंत्र धीरेधीरे ‘स्थानीय सत्ता संस्कृति’ में बदलने लगता है.

लोकतंत्र कम, गुटबाजी ज्यादा

शहरों में बैठ कर लोग अकसर गांव को बहुत मासूम कल्पना की तरह देखते हैं. जैसे वहां केवल पेड़, पोखर, बैलगाड़ी और भोले लोग रहते हों, लेकिन असलियत यह है कि गांवों की राजनीति कई बार शहरों से भी ज्यादा तीखी होती है.

वहां जाति निर्णायक है. वहां निजी रिश्ते राजनीति तय करते हैं. वहां चुनाव केवल विकास पर नहीं, अहंकार और बदले की भावना पर भी लड़े जाते हैं.

ग्राम पंचायत चुनावों में दुश्मनियां पीढि़यों तक चलती हैं. कई गांवों में पंचायत चुनाव के बाद रिश्तेदार अलग हो जाते हैं, शादियां टूट जाती हैं, खेतों के रास्ते बंद हो जाते हैं, मारपीट तक हो जाती है. अब ऐसे माहौल में अगर एक पक्ष को ‘प्रशासक’ जैसी प्रशासनिक ताकत भी मिल जाए तो क्या वह पूरी तरह निष्पक्ष रह पाएगा? यह सवाल गंभीर है.

क्या कम पढ़ालिखा प्रशासन संभाल लेगा

यह बहस बहुत अहम है, इसलिए इसे बहुत ध्यान से सम झना होगा. पढ़ाईलिखाई का मतलब बुद्धिमत्ता नहीं होता. गांव का एक साधारण किसान जिंदगी की जो सम झ रखता है, वह कई डिगरीधारी लोगों में भी नहीं होती, लेकिन प्रशासन केवल अनुभव से नहीं चलता.

आज पंचायत सिस्टम डिजिटल हो चुका है. औनलाइन पोर्टल हैं. ईटैंडरिंग है. सरकारी लेखा प्रणाली है. औडिट है. वित्तीय नियम हैं. तकनीकी मंजूरियां हैं. आरटीआई है. विकास योजनाओं के पेचीदा प्रोसैस हैं. इन सब को सम झना आसान नहीं है.

पंचायत भवन से पैदा होती छोटीछोटी सल्तनतें

ग्रामीण भारत का एक अनकहा सच यह भी है कि सत्ता जहां भी थोड़ी मिलती है, उस के आसपास दरबार बनने लगते हैं. प्रधान के घर के बाहर बैठने वाले कुछ लोग अचानक खुद को गांव का निर्णायक सम झने लगते हैं. वे तय करते हैं किस का काम पहले होगा. किसे आवास मिलेगा. किस की सिफारिश सुनी जाएगी. किसे पंचायत भवन में बैठने दिया जाएगा. ये वही लोग होते हैं जिन के पास कोई संवैधानिक अधिकार नहीं होता, लेकिन व्यवहार में वही ताकत की नुमाइश करते हैं.

अब अगर प्रधान को ‘प्रशासक’ का औपचारिक दर्जा मिल गया तो इन ‘पिछलग्गुओं’ की ताकत और बढ़ेगी या नहीं? बिलकुल बढ़ेगी. गांव में सत्ता हमेशा अकेले शख्स के पास नहीं रहती. उस के आसपास एक पूरा अनौपचारिक नैटवर्क बन जाता है और यह नैटवर्क कई बार लोकतंत्र से ज्यादा डर पैदा करता है.

क्या सरकार के पास दूसरा औप्शन था

यह भी सही है कि केवल आलोचना कर देना आसान है. सरकार की अपनी मजबूरियां हैं. अगर पंचायत चुनाव समय पर नहीं हो पा रहे तो गांवों का कामकाज कैसे चलेगा?

मनरेगा रुकेगी क्या? सड़क निर्माण रुक जाएगा क्या? सफाई व्यवस्था बंद हो जाएगी क्या? आवास योजनाएं ठप कर दी जाएं क्या? निश्चित रूप से नहीं.

सरकार को कोई अंतरिम व्यवस्था तो बनानी ही होगी और अगर जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि को ही कुछ समय के लिए प्रशासनिक जिम्मेदारी दी जा रही है तो इसे पूरी तरह गलत भी नहीं कहा जा सकता, लेकिन समस्या फैसले में नहीं, उस के क्रियान्वयन में है.

बिना ट्रेनिंग सत्ता देना खतरनाक है

भारत में सब से बड़ी विडंबना यह है कि पंचायत प्रतिनिधियों को अधिकार तो दे दिए जाते हैं, लेकिन ट्रेनिंग नहीं. उन्हें बताया ही नहीं जाता कि सरकारी धन का उपयोग कैसे करना है? औडिट से कैसे निबटना है? फर्जी भुगतान से कैसे बचना है? कानूनी विवादों को कैसे संभालना है? डिजिटल व्यवस्था कैसे चलानी है?  प्रशासनिक पारदर्शिता कैसे बनाए रखनी है?

नतीजा यह होता है कि कई प्रधान अनजाने में गलतियों के शिकार हो जाते हैं. कई भ्रष्ट तंत्र का हिस्सा बन जाते हैं और कई ईमानदार लोग भी फाइलों और आरोपों के बीच पिस जाते हैं. New Debate

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