Hindi Story. वह एक बरसाती नदी थी, जो 2 गांवों के बीच बहती थी. नदी के उत्तरी किनारे पर एक लड़की कपड़े धोने के लिए आती थी.
वह लड़की गोरीचिट्टी, गोल चेहरे और बड़ीबड़ी आंखों वाली थी. उस का चेहरा हमेशा हंसतामुसकराता लगता.
नदी के दक्षिणी किनारे पर एक लड़का गायभैंसें चराने आता था. एक दिन नदी के उत्तरी किनारे पर वह लड़की कपड़े धो रही थी.
लड़का अपनी भैंसों को चरातेचराते नदी के किनारे तक आ पहुंचा था. जब उस ने लड़की को देखा, तो अचकचा कर रुक गया.
उस ने गौर से लड़की को एक बार और देखा, फिर चारों तरफ इस अंदाज में घूमा कि कोई देख तो नहीं रहा.
लड़के ने इतमीनान से गहरी सांस ली. आसपास कोई नहीं था. वह वहीं बैठ कर उस लड़की को ताकता रहा.
अब तो यह सिलसिला चल पड़ा. वे दोनों रोज नदी पर आने लगे. उन दोनों की नजरों ने बहुतकुछ कह लिया था, अब जबान की बारी थी. पहल कौन करता? आखिर लड़के ने हिम्मत दिखाई और एक दिन लड़की से पूछा, ‘‘क्या, तुम उतरपाड़ा में रहती हो?’’
लड़की मुसकराते हुए बोली, ‘‘हां, पर तुम्हें क्या? तुम तो अहिरपाड़ा में रहते हो न?’’
‘‘हां, लेकिन तुम कैसे जानती हो?’’ लड़के ने जानना चाहा.
‘‘तुम्हारी तरफ वही तो पहला गांव है. क्या मैं इतना भी नहीं समझती?’’ लड़की बोली.
यह सुन कर लड़का झेंप गया. कुछ देर बाद वह बोला, ‘‘मैं तुम से बात कर रहा हूं… तुम्हें बुरा तो नहीं लगा?’’
‘‘इस में बुरा मानने की क्या बात है?’’ लड़की बोली.
उस लड़के ने पूछा, ‘‘तुम्हारा नाम क्या है?’’ ‘‘नाम का क्या करोगे?’’ लड़की ने सवाल का जवाब सवाल से दिया.
लड़का शायद उतना चालाक नहीं था. वह बेवकूफ की तरह लड़की को ताकता रहा. तब तक लड़की कपड़े धो चुकी थी. वह उठ खड़ी हुई और धुले कपड़ों की गठरी उठाते हुए बोली, ‘‘बुद्धू कहीं के… लड़की से बात करने में इतनी शर्म आती है, तो जा कर गायभैंसें चराओ. मेरा नाम पूनम है और तुम अपना नाम बताना चाहो तो बता दो, वरना मैं जाती हूं.’’
उस लड़के ने हिम्मत जुटाई और लड़खड़ाती आवाज में बोला, ‘‘रंजन.’’
लड़की ने सुना, कनखियों से उस की तरफ देखा और एक कटीली मुसकराहट बिखेर कर अपने गांव की तरफ बढ़ गई.
नदी सूख चुकी थी. दोनों तरफ की दूरियां भी खत्म हो चुकी थीं. अब वे दोनों नदी पार कर एकदूसरे की तरफ आ जाते और ढेर सारी बातें करते.
उस नदी के दक्षिणी किनारे पर बरगद का पेड़ था. लड़का उधर से ही आता था. वे दोनों ज्यादातर उसी पेड़ के नीचे मिलते थे.
लड़के ने लाख कोशिश की, पर लड़की ने अपना जिस्म उस को नहीं सौंपा. वह बस यही कहती, ‘‘शादी के बाद…’’
‘‘पर हमारी शादी होगी कैसे?’’ लड़का पूछता. ‘‘जैसे हम ने प्यार किया है,’’ वह मुसकरा कर कहती.
‘‘यानी…’’ लड़का समझा नहीं पाता और अचकचा कर उस की तरफ देखता.
लड़का परेशान हो कर पूछता, ‘‘मैं यादव, तुम लोध. हैं तो हम दोनों पिछड़ी जाति के, पर क्या हमारे परिवार वाले मानेंगे? कैसे होगी हमारी शादी?’’
‘‘होगी…’’ वह शांत भाव से कहती, ‘‘गांव में तो नहीं होगी, पर अगर तुम में हिम्मत है, तो हम दिल्ली चलते हैं.’’ ‘‘क्या ऐसा हो सकता है?’’ लड़के ने झिझकता हुए पूछा.
वह अपने मांबाप का एकलौता बेटा था. लाड़प्यार में वह पढ़ा नहीं. बैल का बैल रह गया.
लड़के के पिता का दूध का कारोबार था. वे सुबह बड़ेबड़े डब्बों में दूध भर कर साइकिल पर लाद कर पास के स्टेशन जाते और वहां से ट्रेन पकड़ कर शहर जाते. शाम तक सारा दूध बेच कर घर वापस आते.
लड़का भैंसें चरा कर जवान हुआ था. वह कमअक्ल तो नहीं था, पर दुनियादारी की बातें कम जानता था.
लड़की ने जब उसे भगा कर दिल्ली चलने के लिए कहा, तो उस के हाथपांव फूल गए. दिल्ली में वह कहां रहेगा? क्या काम करेगा? क्या घर जैसा सुख वहां मिलेगा? यही सब सोच कर उस के बदन में कंपकंपी छूटने लगी थी.
जब लड़के की समझ में कुछ नहीं आया, तो उस ने गांव के एक लड़के से बात की, ‘‘यार रमेश, तुम तो दिल्ली रह कर आए हो. जरा बताओ, कैसी है वह? तुम वहां क्या करते हो?’’
रमेश ने रंजन से पूछा, ‘‘क्यों भाई, गांव से जी ऊब गया है क्या? दिल्ली क्यों जाना चाहते हो?’’
‘‘कुछ नहीं यार, मैं तो यों ही पूछ रहा था. सुना है, दिल्ली बहुत खूबसूरत है. कभी मौका मिला, तो घूम कर आऊंगा.’’
‘‘अच्छी बात है. दिल्ली सचमुच बहुत खूबसूरत है, पर ऊपर से. अगर आप लाखों में खेल रहे हो तो ठीक है, वरना हमारे जैसे लोगों के लिए दिल्ली बेकार है,’’ रमेश ने दोटूक जवाब दिया.
‘‘लेकिन जब तुम लोग गांव आते हो, तो अच्छाखासा पैसा ले कर आते हो, साफसुथरे कपड़े पहनते हो, हर तरह का शौक करते हो. फिर वहां किस चीज की कमी है, जिस से तुम दुखी होते हो?’’
‘‘यह तुम नहीं समझोगे. एक बार दिल्ली जाओ, सब समझ में आ जाएगा. जब किसी प्लास्टिक या लोहे के कारखाने में काम करना पड़ेगा, तो पता चलेगा कि दिल्ली कैसी है.
‘‘जब 8-10 लड़के एक ही कमरे में रहेंगे, साफसफाई का मौका नहीं मिलेगा, रात में लेटने को धूलमिट्टी से भरे कपड़ों का बिछावन मिलेगा, तो सारे अरमान धूल में मिल जाएंगे.
‘‘महीने में जो तनख्वाह मिलती है, वह तो बस दालरोटी के लिए ही पूरी पड़ती है. अगर हम जैसे लोग वहां अच्छा खाना खाने लगें, तो हमारा घर लौटना मुश्किल हो जाएगा. टिकट खरीदने तक के पैसे भी न बचेंगे.’’
‘‘क्या वहां काम करने के इतने कम पैसे मिलते हैं?’’
‘‘और नहीं तो क्या? शुरुआत में मालिक हजारपंद्रह सौ रुपए महीना ही पगार देता है. अच्छे कारीगर हो गए, तो शायद दोढाई हजार रुपए दे देगा.
‘‘वहां उत्तर प्रदेश और बिहार के मजदूर भरे हुए हैं. काम मिलता ही नहीं है. जो थोड़े पढ़ेलिखे होते हैं, वे किसी दुकान में सेल्समैन लग जाते हैं. वही थोड़ी आराम की नौकरी है. बाकी तो बस किसी तरह गुजारा करते हैं और गांव आ कर ऐसे बनते हैं, जैसे वहां अफसरी कर रहे हों.’’
ऐसी बातें सुन कर रंजन की रहीसही हिम्मत भी जवाब दे गई. पूनम के साथ दिल्ली भाग जाने का सपना भयानक हादसा दिखने लगा.
उस की समझ में नहीं आया कि करे तो क्या करे.
अब रंजन ने नदी की तरफ जाना छोड़ दिया था. दूसरी तरफ पूनम बेचैन और परेशान थी. वह दिल्ली जाने के लिए तैयार बैठी थी.
वह रोज नदी के किनारे जा कर रंजन का इंतजार करती, लेकिन रंजन नहीं आता. धीरेधीरे वह रंजन से नफरत करने लगी थी.
गुस्से में वह एक दिन अहिरपाड़ा पहुंच गई. उसे रंजन का घर मालूम नहीं था, पर पूछतेपूछते पहुंच गई.
रंजन घर के बाहर ही था. पूनम को देख उस का माथा ठनका. उस ने झटपट अपने चारों तरफ देखा, कोई नहीं था. तब तक पूनम उस के पास आ गई थी.
रंजन ने उस की आंखों में तैरते गुस्से और नफरत की आग को महसूस किया, पर कुछ कह न सका.
पूनम उस के पास से गुजरती हुई बोली, ‘‘मैं बरगद के पेड़ के नीचे तुम्हारा इंतजार कर रही हूं. फौरन आ जाओ, वरना तुम्हारे घर में जा बैठूंगी.’’
रंजन की सिट्टीपिट्टी गुम हो गई. वह उलटे पैर खेतों की तरफ निकल गया. दोनों बरगद के पेड़ के पास आमनेसामने खड़े थे.
पूनम गुस्सा होते हुए बोली, ‘‘क्या हुआ है तुम्हें? सारी मर्दानगी और प्यार की कसक धूल में मिल गई? कहां गया तुम्हारा वह प्यार, जिस का तुम दम भरते थे?
‘‘पहले तो जब देखो, तब मेरा बदन नोचने के लिए भेडि़ए की तरह तैयार रहते थे. अब क्यों नहीं आते हो मुझ से मिलने? ऐसी क्या बात हो गई है कि तुम मुझ से मिलना तक नहीं चाहते? मैं ने तुम्हें अपना बदन नहीं सौंपा… इसलिए? बोलो, कब करोगे मुझ से शादी?’’
रंजन चुप रहा. पूनम ठीक उस के सामने खड़ी हो गई. इतनी करीब कि उन दोनों की न केवल सांसें, बल्कि सीने भी आपस में टकराने लगे.
पूनम ने दोनों हाथों से रंजन के कंधे पकड़ कर हिला दिए और बोली, ‘‘मुझे पता है, तुम कभी मुझ से ब्याह नहीं करने वाले. तुम्हें तो मेरे जिस्म से प्यार था. उसे भोगना चाहते थे न.
‘‘ठीक है, अगर हिम्मत है तो आगे बढ़ो और खेलो मेरे बदन से. यहां कोई देखने वाला नहीं है. लूट लो मेरी इज्जत और उसे सरेआम तारतार कर दो. मर्द हो न तुम… कर लो अपनी मनमानी… देखते क्या हो, आगे बढ़ो.’’
सचमुच आसपास कोई नहीं था.
पूनम पर जैसे जुनून सवार था. उस की सांस धौंकनी की तरह चल रही थी. वह रंजन को पकड़ कर हिलाए जा रही थी और वह था कि भीगी बिल्ली की तरह सिकुड़ा था. बदन में जवानी का कोई उबाल, कोई जोश नहीं था. वह पूनम से नजर तक नहीं मिला पा रहा था. उस के पसीने छूट गए थे.
रंजन को वहां से भाग कर बच निकलने का कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था. उस ने चोर नजरों से इधरउधर देखा भी, पर पूनम के हाथों की पकड़ इतनी मजबूत थी कि वह हिल भी नहीं सकता था.
तभी पूनम ने उसे जोर का एक धक्का दिया और उस के मुंह पर थूकते हुए बोली, ‘‘जा, मां का दूध पी. जवान होने में अभी बहुत समय लगेगा तुझे.
‘‘लेकिन एक बात याद रखना, औरत जब अपनी पर आती है, तो एक बरसाती नदी की तरह होती है. वह किनारों को तोड़फोड़ देती है. तब उस पर बांध नहीं बांधा जा सकता. उस को संभालने के लिए आपसी समझदारी और हद से ज्यादा प्यार की जरूरत होती है.’’
रंजन नामर्द की तरह वहीं चुपचाप लेटा रहा. पूनम ने आगे कुछ नहीं कहा. थोड़ी देर बाद वह अपने घर लौट गई.
इस तरह उन दोनों का प्यार बरसाती नदी की तरह सूख गया. Hindi Story




