Hindi Story. पिछले 2 साल से अपने पति से दूर याशिका सिंह गांव की हवेली संभाल रही थी. साथ था उन का नौकर अंशु. एक रात याशिका ने अंशु को अपने कमरे में बुलाया और…

पूर्वांचल के ईश्वरपुर गांव में फैली 100 बरस पुरानी हवेली दूर से ही अपनी पहचान दर्ज कराती थी. ऊंची मेहराबें, चौड़े बरामदे, पार्क में खिले रंगबिरंगे फूल सब मिल कर हवेली की खूबसूरती में चार चांद लगा रहे थे.

इस हवेली के मालिक थे जमींदार शिवकांत सिंह, जो अब बूढ़े हो चले थे और उन का एकलौता बेटा डाक्टर आर्यवर्त सिंह पिछले 2 साल से इंगलैंड में था.

गांव में इस विशाल हवेली को जिंदा रखने वाले केवल 2 लोग थे, डाक्टर आर्यवर्त सिंह की पत्नी याशिका सिंह और हवेली की देखभाल में लगा 25 साल का बांका जवान अंशु.

याशिका सिंह पढ़ीलिखी और खूबसूरत औरत थी. शादी के बाद कुछ ही दिनों में उस का पति विदेश चला गया था. धीरेधीरे 2 साल बीत गए… संदेश आते, वीडियो काल कभीकभार होती, पर दूरी का सन्नाटा कहीं ज्यादा अखरता था.

हवेली जितनी विशाल थी, उतनी ही अकेली. लंबे बरामदे, खाली कमरे, भोर का धीमा उजाला और रात का गहरा अंधेरा, सब मिल कर याशिका सिंह के भीतर एक गहरी चुप्पी उतारते जा रहे थे.

याशिका सिंह अकसर सोचती, ‘क्या सचमुच शादी केवल एक रिश्ता है या एक ऐसा साथ जिसे दूरी खा जाती है?’

इधर अंशु अपना काम ईमानदारी से करता था. उस की हर हरकत में एक सादगी थी. वह बोलता कम, काम ज्यादा करता. जब वह आंगन में झाड़ू लगाता, तो जैसे हवेली भी किसी पुराने दिन को याद कर के मुसकराने लगती.

याशिका सिंह ने कई बार खुद को उसे देखते हुए पाया और हर बार खुद को झिड़क दिया. पर हवेलियों की चुप दीवारें मन पर भी अपना असर डालती हैं. जो बात मन टालना चाहे, वही बात आंखें ढूंढ़ने लगती हैं.

दिन बीतते गए. याशिका सिंह को लगा कि अंशु का होना हवेली के सन्नाटे को थोड़ा हलका कर देता है. वह कभी जरूरत पड़ने पर आंगन से आवाज लगाती और अंशु झट से हाजिर हो जाता. उस की आवाज में, चाल में, बरताव में एक ऐसी विनम्रता थी, जो किसी के भी मन को छू ले.

लेकिन वही विनम्रता अंशु के भीतर डर भी जगाती थी. वह अकसर सोचता, ‘मालकिन की नजरों में कहीं मैं गलत न समझ लिया जाऊं. थोड़ सी भी चूक हुई, तो बरबादी पक्की है.’

पर मन को कौन रोक पाता है? इनसान चाहे कितना भी सावधान हो, भीतर कहीं एक कोना रहता है, जो चुपचाप किसी की ओर खिंचना सीख जाता है, बिना इजाजत के, बिना ऐलान के.

एक रात को हलकी ठंड हवेली में सरक रही थी. बरामदे की लालटेन कांपती लौ के साथ डोल रही थी. अंशु गौशाला से लौट कर कमरे में ही पहुंचा था कि ऊपर से याशिका सिंह ने पुकारा, ‘‘अंशु, सुनो.’’

अंशु एकदम से चौंका. रात के इस समय मालकिन का पुकारना असाधारण था. वह धीमे कदमों से ऊपर चढ़ा. कमरे का दरवाजा आधा खुला था. अंदर पीतल का दीपक जल रहा था, जिस की नरम रोशनी कमरे के कोनों में गिर रही थी.

याशिका सिंह पलंग पर बैठी थी. चेहरे पर थकान थी, आवाज में विनती, ‘‘मेरा पैर बहुत दर्द कर रहा है. प्लीज, जरा दबा दो.’’

अंशु झिझक गया, ‘‘मालकिन यह काम तो.’’

याशिका सिंह ने बीच में ही धीमी पर मजबूत आवाज में कहा, ‘‘यह आदेश नहीं, एक आग्रह है.’’

अंशु ने सिर झुकाया और सावधानी से मालकिन के पैर दबाने लगा. पर कमरे में कुछ बदल रहा था, दीया टिमटिमा रहा था, हवा भारी हो गई थी और हवेली का पुराना सन्नाटा जैसे अचानक करीब आ कर खड़ा हो गया था.

अंशु के हाथ कांप रहे थे, क्योंकि उसे डर था… अपने हाथों से कम अपने धड़कते दिल से ज्यादा. उधर याशिका सिंह अपने भीतर की उस तनहाई से लड़ रही थी, जो इतने महीनों से जमा होतीहोती भारी हो गई थी.

अचानक, बिना चेतावनी, याशिका सिंह ने अंशु की कलाई पकड़ ली. अंशु एकदम कठोर हो गया, जैसे अचानक किसी ने उसे बर्फ में धकेल दिया हो. उस की सांसें अटक गईं.

‘‘अंशु…’’ याशिका सिंह की आवाज धीमी, भारी और अनसुनी सी थी, ‘‘हम तुम्हें चाहते हैं.’’

यह सुनते ही अंशु का चेहरा सफेद पड़ गया. वह कांपती आवाज में बोला, ‘‘मालकिन, अगर मालिक को मालूम हो गया, तो वे मुझे जिंदा नहीं छोड़ेंगे.’’

याशिका सिंह ने अंशु के डर को अपने हाथों में समेटने जैसा कहा, ‘‘तुम डरो मत. हम हैं न.’’

उस पल उन दोनों के बीच खामोशी उतर आई… एक ऐसी खामोशी जिस में हवेली का सन्नाटा भी अपनी सांस रोक ले.

अंशु अपनी सारी हिचक और डर भूल बैठा. उस रात का सन्नाटा हवेली की दीवारों में हमेशा के लिए दर्ज हो गया. बिना शोर के, बिना शब्द के, पर गहरा.

उन दोनों ने उस रात को खूब भोगा.

अगली सुबह अंशु आंगन में बैठा था. चेहरा बुझा  हुआ, आंखों में बेचैनी. उसे खुद से डर लग रहा था. वह डर और उलझन से भरा था.

याशिका सिंह ने बरामदे से उतरते हुए कहा, ‘‘अंशु, कल जो हुआ उस से डरने की कोई जरूरत नहीं.’’

पर अंशु के भीतर का तूफान किसी भी आश्वासन से शांत नहीं हो सकता था, ‘‘मालकिन, हम से पाप हुआ है. हम इस हवेली में मुंह दिखाने लायक नहीं रहे.’’

याशिका ने उसे स्थिर नजरों से देखा और कहा, ‘‘पाप वही है जिसे मन स्वीकार न करे. हम दोनों अकेले थे हालात ने हमें मजबूर किया.’’

लेकिन अंशु जानता था कि समाज हालात नहीं देखता, वह केवल सीमाएं देखता है.

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