Hindi Short Story. छोटी बूआ जब अपनी ससुराल से भागीं, तो अचानक ‘कुलटा’ हो गईं. कई साल बाद एक दिन मेरा उन से सामना हुआ, तो सीना फख्र से चौड़ा हो गया. क्यों?

बरसों पहले एक दिन जब मैं अपने स्कूल से लौटा, तो घर में कुहराम मचा हुआ था. सभी लोग छोटी बूआ को कोसे जा रहे थे कि ‘कुलटा’ ससुराल छोड़ कर भाग गई. उस उम्र में मैं भागने का मतलब तो क्या जानता था, पर बूआ भाग भी लेती हैं, यह जान कर मुझे खुशी हुई थी.

धीरेधीरे लोगों ने बूआ को उसी तरह भुला दिया, जिस तरह नेता अपने चुनावी वादों को भुला देते हैं. न जाने मैं उन्हें क्यों नहीं भुला पाया. बचपन से ही मुझे छोटी बूआ से अजीब सा लगाव था.

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बरसों बाद मुझे गांव में डिगरी कालेज की इमारत की बुनियाद का पत्थर रखने के लिए न्योता दिया गया. उन दिनों मैं विदेश से छुट्टियों में घर आया था.

दरअसल, मुझ जैसे विदेशों में काम कर रहे कुछ भारतीयों की माली मदद से ही यह कालेज बनने जा रहा था, इसलिए कमिश्नर की अगवानी के लिए सरपंचजी मुझे भी डाकबंगला ले गए.

कमिश्नर कोई औरत हैं, यह जान कर मुझे हैरानी सी हुई.

‘‘जी, मुझे शोभा देवी कहते हैं,’’ कहते हुए कमिश्नर साहिबा ने हाथ आगे बढ़ा दिया, तो पलभर के लिए मैं हैरान रह गया. आंखों पर सुनहरे फ्रेम का चश्मा, कटे बाल, सामने के बाल कुछ अधपके से, रेशमी साड़ी में वे इतनी प्यारी व रोबदार लग रही थीं कि नजरें हटाने को जी ही नहीं चाह रहा था.

जानपहचान होने के बाद उन्होंने कहा, ‘‘सरपंचजी, आप चलिए, मैं इन के साथ कुछ जरूरी सलाहमशवरा कर के आती हूं.’’

सरपंच के वहां से जाते ही उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया, तो मैं बुरी तरह सकपका गया.

‘‘क्या बात है रे विशु, अपनी बूआ को भी नहीं पहचान सका?’’ यह कह कर उन की आंखें डबडबा आईं. मैं तो जैसे ठगा सा खड़ा था. ‘‘छोटी बूआ?’’ अचानक मेरे मुंह से निकला, तो उन्होंने मुझे गले से लगा लिया.

‘‘देख रे विशु, जब से मैं यहां आई हूं, तेरे बारे में ही पता कर रही थी. भैयाभाभी तो शायद मुझे से हमेशा के लिए रूठ गए हैं,’’ छोटी बूआ ने कहा.

‘‘नाम बदलने से इनसान नहीं बदल जाया करते…’’ उन्होंने आपबीती शुरू की, ‘‘तू तो तब काफी छोटा था. मुझ जैसी बाल विधवा पर ससुराल में क्याक्या जुल्म नहीं ढाए गए.

‘‘आखिर कब तक सहती. जब हिम्मत जवाब दे गई, तो एक दिन मौका पा कर ससुराल से भागी और बंबई जाने वाली गाड़ी में चढ़ गई. साथ में थोड़े गहने और रुपए रख लिए थे.

‘‘लेकिन बंबई के वीटी रेलवे स्टेशन पर उतरते ही मैं जिस्म के सौदागरों के हत्थे चढ़ गई. अगर वक्त साथ न देता, तो मैं आज किसी कोठे पर बैठी होती.

‘‘सरला देवी नाम की एक दिलेर औरत ने मुझे न केवल बदमाशों से बचाया, बल्कि मेरी लगन देख कर अपने घर पर भी रखा. मुझे सिविल सर्विस के इम्तिहान में कामयाब होने के लिए पूरी मदद की. उन्होंने कानूनी तौर पर मुझे गोद ले कर मेरा नाम भी बदल दिया… यह समझ लो कि एक तरह से मुझे समाज में सिर उठा कर जीने के लायक बना दिया.’’

‘‘पर बूआजी, इस गांव ने तो आप को सिवा रुसवाई और गालियों के कुछ भी नहीं दिया… आप की जगह मैं होता, तो यहां कभी वापस न आता.’’

‘‘नहीं रे विशु, यही तो गलत है. मैं तो चाहती हूं कि हर गांव में लड़कियों के लिए भी कालेज खुलें, औरतों के लिए कल्याण केंद्र खुलें, ताकि वे भी आजाद होने के लिए पढ़लिख सकें, ताकि मुझ जैसी किसी बाल विधवा को असहाय जिंदगी जीने या ससुराल छोड़ कर भागने के लिए मजबूर न होना पड़े. यही तो मेरा प्रतिदान होना चाहिए.’’

मैं डबडबाई आंखों से बूआ के पैर छूने के लिए झुक गया.

–प. विश्वनाथन ‘राचेकविपुरा’

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