Feel-Good Story in Hindi. मुरलीजी की कचौड़ी पूरे इलाके में अपने स्वाद के लिए मशहूर थीं. पर अब उन के बेटों ने वहां रैस्टोरैंट बना दिया. मुरलीजी को लगा कि कुछ तो गलत हो रहा है और इसी चिंता में वे बीमार हो गए. क्या गलत हुआ था?
मुरलीजी की कचौड़ी की दुकान शहर की छोटी, पर बहुत ही पुरानी दुकान थी. यह दुकान जितनी जगह में छोटी थी, उतनी ही मशहूरी में बहुत बड़ी थी. दुकान पर उन के नाम का कोई बोर्ड नहीं लगा था, बस शहर के लोग उसे ‘मुरलीजी की कचौड़ी’ के नाम से जानते थे.
दुकान के बाहर खुद मुरलीजी कोयले की भट्ठी लगा कर गरम तेल की बहुत बड़ी कड़ाही में कचौडि़यां बनाते थे. वे कचौडि़यां बना कर बहुत बड़े बरतन में उन्हें डालते थे, जहां पर उन का बड़ा बेटा मोहन और नौकर पैसे ले कर कचौडि़यां पैक कर के ग्राहकों को देते थे. साथ में बहुत ही चटपटी चटनी भी देते थे. जो लोग वहीं दुकान पर खाना चाहते थे, उन्हें पुराने अखबार के कागज पर कचौड़ी के ऊपर चटनी डाल कर देते थे.
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ज्यादातर ग्राहक दुकान के बाहर खड़े हो कर कचौड़ी को बहुत चाव से स्वाद लेले कर खाते थे, क्योंकि दुकान के अंदर बैठने के लिए बहुत ही कम जगह थी. सिर्फ एक ही बैंच थी. दुकान पर हमेशा लंबी लाइन लगी रहती थी.
लाइन में खड़े लोग कचौडि़यां बनाते हुए मुरलीजी को बड़े ध्यान से देखते थे. वे गुंदे हुए मैदे के बड़े गोले को कटोरी बना कर उस में आलू का मसाला भरते थे, फिर दोबारा उस का गोला बनाते और दोनों हाथों से दबा कर तश्तरी जैसा आकार दे कर गरम तेल की कड़ाही में एकएक कर के डाल देते थे.
जब 50-50 कचौडि़यां एकसाथ कड़ाही में तलती थीं, तो वह छटा देखते ही बनती थी. कचौडि़यों की खुशबू आसपास फैलती थी और सड़क पर चलते हुए लोग उस खुशबू से खिंच कर वहां चले आते थे.
कई लोग तो कचौडि़यां पैक करा कर दूसरे शहरों में अपने सगेसंबंधियों को भेजते थे, क्योंकि वे कचौडि़यां दूसरे दिन और भी अपना स्वाद बरकरार रखती थीं और इसीलिए दिन में मुरलीजी हजारों कचौडि़यां बेचते थे. इस के चलते शाम तक उन की बड़ी मजबूत तिजोरी पैसों से भर जाती थी. पर उन्हें कभी भी पैसे का घमंड नहीं था, न ही इतनी छोटी दुकान चलाते हुए शर्म आती थी.
हालांकि, मुरलीजी के पास 2-3 बहुत बड़े बंगले थे और शहर में दूसरी जगह खरीदी गई दुकानें भाड़े पर दी हुई थीं, पर उन के दोनों बेटों को इस छोटी सी दुकान पर बैठ कर शर्म आती थी.
मुरलीजी ने अपने बेटों के लिए बहुत ही शानदार बंगला रहने को बनवाया था, पर दुकान जैसे 30 साल पहले थी, वैसे ही आज थी. उन के पास वाली बहुत बड़ी दुकान बिक रही थी और उस के ऊपर का हाल भी बिक रहा था. मुरलीजी ने अपने बेटों के कहने पर रैस्टोरैंट बनाने के लिए हाल समेत वह दुकान मुंहमांगे दामों पर खरीद ली.
बेटों ने उस रैस्टोरैंट में महंगा और शानदार फर्नीचर लगवाया और डिजाइनर टेबलकुरसियां भी रखवाईं. साथ में यूनिफौर्म वाले वेटर भी थे.
यह सारा आइडिया मुरलीजी के छोटे बेटे सोहन का था, जो दिल्ली में पढ़ कर आया था. दिल्ली में उसे अच्छी नौकरी मिली भी, पर तनख्वाह उस के पापा की दुकान की रोज की कमाई से काफी कम थी, इसीलिए उस ने 2-3 महीने नौकरी कर के छोड़ दी. इतने में तो शहर के अच्छे मकान का किराया भी मुश्किल से चुकाया जा पाता है.
मुरलीजी के पास पैसों की कोई कमी नहीं थी. रैस्टोरैंट पर पानी की तरह पैसा बहाया गया. एक दिन शहर के बड़ेबड़े लोगों को न्योता दे कर उस रैस्टोरैंट का उद्घाटन किया गया.
सुबह स्थानीय अखबार में पहले पन्ने पर इश्तिहार भी दिया गया. अमीर घर के लोगों के लिए यह अच्छा था, क्योंकि शहर में कोई बड़ा रैस्टोरैंट था भी नहीं. पर रैस्टोरैंट में खाने का बिल ज्यादा आता था, तो छोटेमोटे ग्राहक रोजाना वहां नहीं आ पाते थे.
अब मुरलीजी को सिर्फ कैश काउंटर पर बैठना था और साथ ही रैस्टोरैंट पर नजर रखनी थी कि सभी को सर्विस बराबर मिल रही है या न. कचौडि़यां दुकान के पुराने नौकर बना रहे थे, साथ में उस के लिए 2-3 नए कुक भी रख लिए गए. वे कई बार कचौडि़यां बना कर गरम करने के लिए उन्हें बड़े ओवन में रख देते थे. अब हर काम दुकान की तरह न हो कर कंपनी की तरह होता था.
भट्ठी अब दुकान के पिछले भाग में लगा दी गई, क्योंकि इतने बड़े रैस्टोरैंट के आगे भट्ठी अच्छी नहीं लगती है. भट्ठी आगे नहीं थी, तो कचौडि़यों की खुशबू भी सड़क पर नहीं फैलती थी. लोग अब दुकान के आगे से आतेजाते, तो महसूस करते थे कि कुछ तो कमी है.
इस तरह से शाही अंदाज में खाना हो तो बड़ा बिल भी चुकाना पड़ेगा. रैस्टोरैंट में खाने का बिल ज्यादा आता था, तो मिडिल क्लास ग्राहक वहां रोजरोज नहीं आ पाते थे. सामने एक बहुत बड़ा स्कूल था. उस में बहुत सारे बच्चे पढ़ते थे. पहले वे आधी छुट्टी होते ही काफी तादाद में कचौड़ी खाने आते थे.
उस समय पूरी सड़क ब्लौक हो जाती थी, इसीलिए मुरलीजी एक घंटा पहले ही कचौडि़यां बना कर रख देते थे और दूसरे ग्राहकों को आधी छुट्टी खत्म होने के बाद आने को कहते थे.
पहले कचौड़ी का जितना बिल होता था, उतनी तो अब रैस्टोरैंट में वेटर की टिप हो जाती थी. अब छोटेछोटे बच्चे रोज रैस्टोरैंट में बैठ कर कचौड़ी नहीं खा सकते ठें, क्योंकि इतना ज्यादा बिल देना उन के बस का नहीं था.
इस सब के बावजूद महंगा वाला रैस्टोरैंट अच्छा ही चल रहा था. हालांकि, अब वहां के खर्चे भी बहुत बढ़ गए थे, धीरेधीरे पहले जो कचौड़ी बेचने में मुनाफा रहता था, वह अब रैस्टोरैंट में नहीं रहा. मुरलीजी को पूरे दिन काउंटर पर बैठना और पैसे गिनना और शाम को हिसाब लगाना अच्छा नहीं लगता था. कह सकते हैं कि उन्हें मजा नहीं आ रहा था और न ही उन्हें ग्राहकों के चेहरे पर संतुष्टि दिख रही थी.
ऐसे ही 2-3 महीने निकल गए. एक दिन मुरलीजी बहुत ज्यादा बीमार हो गए. उन्हें जिंदगी में पहली बार हौस्पिटल में भरती कराया गया. उन के बहुत सारे टैस्ट हुए, पर डाक्टर को उन की बीमारी समझ में नहीं आ रही थी. इस वजह से डाक्टर टैस्ट पर टैस्ट कराए जा रहे थे कि शायद कोई कहीं तकलीफ पकड़ में आए.
डाक्टर को मुरलीजी की बीमारी पकड़ में नहीं आई, पर मुरलीजी समझ गए कि वे क्यों बीमार हो गए. उन्हें याद आया कि एक बार वे बिल बनाते समय पैसों को ले कर ग्राहक से ही उलझ गए थे. वह बहुत पुराना ग्राहक था और सालों से दुकान आता रहा था, पर अब दूसरे शहर में नौकरी के चलते उस का कभीकभार आना होता था. वह ग्राहक जब भी घर आता, तो यहां से 100 के आसपास कचौडि़यां पैक करा कर अपने शहर ले जाता था.
वह ग्राहक इस बार मुरलीजी का यह रूप देख कर हैरानी में पड़ गया कि इस आदमी के चेहरे पर हमेशा ही मुसकराहट होती थी, पर आज झुनझुलाहट क्यों दिख रही है.
‘‘मुरलीजी, आप की तबीयत तो ठीक है न?’’ उस ग्राहक ने प्यार व अपनेपन से सिर्फ इतना ही पूछा.
मुरलीजी को हौस्पिटल के बिस्तर पर लेटेलेटे न जाने कितने ही ऐसे किस्से याद आने लगे. फिर एक दिन उन्हें हौस्पिटल से छुट्टी मिल गई.
एक दिन जब दोनों बेटे सुबह 10 बजे रैस्टोरैंट पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि उन के पापा पुरानी दुकान के आगे भट्ठी लगा कर कचौडि़यां तल रहे थे और उस की वही पुरानी खुशबू के चलते दुकान के आगे लोगों की लंबी लाइन लगी हुई थी.
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आज दुकान में वैसा ही इंतजाम था, जैसा रैस्टोरैंट खोलने से पहले था. तमाम लोग हैरानी से दुकान की ओर बढ़ने लगे और देखने लगे कि आज खुद मुरलीजी कचौडि़यां बना रहे हैं. आज मुरलीजी के चेहरे पर वही पहले वाली रौनक थी.
लोग कानाफूसी करते हुए मुरलीजी से बात करने की कोशिश कर रहे थे, पर आज वे अपने मन के अलावा किसी की नहीं सुन रहे थे. बस, किस ग्राहक को कितनी कचौडि़यां चाहिए, वही पूछ रहे थे और यह भी पूछ रहे थे कि कचौडि़यां पहले जैसी ही बनी हैं न?
दोनों बेटे अपने पापा को देख रहे थे, उन पर गुस्सा हो रहे थे, पर इतने ग्राहकों की भीड़ के सामने उन्हें कुछ कहने की हिम्मत नहीं हुई.
दोपहर को जब मुरलीजी थोड़े फ्री हुए तो छोटे बेटे सोहन ने कहा, ‘‘पापा, यह सब क्या है? इतना खर्च किया हम ने रैस्टोरैंट बनाने पर और आप…’’
मुरलीजी मुसकराते हुए बोले, ‘‘पंछी को पिंजरे में बंद हो कर जैसा लगता होगा, वैसा ही मुझे लग रहा था. कह सकते हैं कि बहुत बुरा लग रहा था. शायद इसी वजह से मैं अपनी जिंदगी में पहली बार बीमार हुआ.
‘‘मैं ने 40 साल से इसी तरह काम किया है और बंगले बनवाए, बैंक बैलेंस खड़ा किया. अब इस उम्र में मैं बदल नहीं सकता और न ही अपनेआप से कोई समझोता कर सकता हूं. मैं अगर पहले जैसा नहीं बना, तो शायद जी भी नहीं पाऊंगा.’’
‘‘पर पापा, यह जो इतना बड़ा रैस्टोरैंट खोला है, इस का क्या करना?’’ बड़े बेटे मोहन को कुछ समझ में नहीं आ रहा था.
‘‘बेटा, मैं तो इसलिए तैयार हुआ था कि तुम लोगों को एक छोटी सी दुकान में भट्ठी पर बैठने में शर्म आती है. गलती तुम्हारी नहीं है, क्योंकि तुम ने वह नहीं देखा, जो मैं ने देखा है. तुम लोग पढ़ेलिखे हो, तुम्हारी दोस्ती अच्छे पढ़ेलिखे लोगों से है. तुम लोगों ने शुरू से ही बंगलागाड़ी देखी है, शायद इसीलिए मैं ने रैस्टोरैंट खोलने के लिए तुम लोगों की बात मानी.
‘‘अब यह रैस्टोरैंट तुम लोग चलाओ. जो लोग फास्ट फूड खाना चाहते हैं, पंजाबी और विदेशी खाना खाना चाहते हैं और अच्छी कीमत देना चाहते हैं, उन्हें तुम संभालो. मैं अपनी कचौड़ी की दुकान में ही ठीक हूं.
‘‘मैं कचौडि़यां बनाऊंगा, क्योंकि इस रैस्टोरैंट के चलते मेरे बरसों पुराने कचौड़ी खाने वाले ग्राहक और स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे इस जगह से दूर हो चुके हैं, क्योंकि वे रोजरोज ज्यादा पैसे खर्च नहीं कर सकते हैं. न मेरी कचौड़ी खाने वाले खुश हैं और न ही मैं कचौड़ी बनाने वाला. पर आज हम दोनों ही खुश हैं,’’ लंबी लाइन देख कर वे खुशी से उठते हुए बोले.
इस पर सोहन ने कहा, ‘‘पापा, आप हमें माफ कर दो. हम ने आप को इस उम्र में बदलने की कोशिश की. पर जब हम इस उम्र में नहीं बदल सकते हैं, तो कैसे उम्मीद रखें कि आप को इस उम्र में बदल देंगे.’’ Feel-Good Story in Hindi




