Hindi Motivational Story. अब्बा की मौत के बाद जहूर ही अपनी अम्मां का एकलौता सहारा था, लेकिन शराब की लत ने उसे भटका दिया था. क्या जहूर इस बुरी लत से नजात पा सका?
जहूर रोज की तरह शराब पी कर घर लौटा था. उस की मां जैसे ही कमरे में आईं, शराब की बदबू महसूस करते ही चीख उठीं, ‘‘क्यों रे, तू ने आज फिर शराब पी?’’
‘‘न… नहीं तो अम्मां,’’ शराब के नशे में धुत्त जहूर बोल उठा. ‘‘तू झूठ बोल रहा है,’’ मां की आंखों में आंसू आ गए. वे बोलीं, ‘‘कुदरत ने एक बार फिर हमें अच्छे दिन दिखाए थे, पर तू ने…’’
मां की आंखों में आंसू देख कर जहूर को लगा, मानो सारा नशा ही उतर गया हो. वह चीख उठा, ‘‘हांहां अम्मां, मैं ने शराब पी है… मुझे सजा दो अम्मां, मुझे सजा दो…’’ इतना कह कर वह सिसकने लगा.
मां उसे पलंग पर बैठा कर समझाते हुए बोलीं, ‘‘बेटा, तेरे अब्बा के गुजर जाने के बाद अब तू ही मेरा एकमात्र सहारा है. शराब की खातिर तू ने घर की एकएक चीज बेच दी है… जो बचा है, कम से कम वह तो रहने दे, वक्तजरूरत पर तेरे ही काम आएगा. मेरा क्या?है, आज हूं, कल नहीं.’’
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‘‘बसबस अम्मां, मुझे और शर्मिंदा मत करो…’’ कहता हुआ वह आगे बोला, ‘‘मैं तो इस गंदी शराब को छोड़ना चाहता हूं, पर यह मेरा पीछा ही नहीं छोड़ती. क्या करूं, मजबूर हूं. अब शराब मेरी जरूरत बन गई है. काश, यह बुरी आदत मैं ने न डाली होती.’’
कहतेकहते जहूर पुरानी यादों में खोता चला गया कि दरदर की ठोकरें खाने के बाद कैसे वह एक अच्छी नौकरी पा गया था. बाद में उस ने खुद ही शराब की बुरी लत डाल कर अपनी जिंदगी बरबाद कर ली…
जहूर कमरुद्दीन जुलाहे का लड़का था. कमरुद्दीन का छोटामोटा घरेलू कारोबार था. इस से वह इतना पैसा कमा लेता था कि जहूर की पढ़ाई और घर का खर्च आराम से चल जाता था.
जहूर खूब मन लगा कर पढ़ाई करता. उसे पढ़ाई से जब भी फुरसत मिलती, अब्बा के काम में हाथ बंटाता.
एक बार कमरुद्दीन ऐसा बीमार पड़ा कि ठीक होने की उम्मीद ही न रही.
जहूर की पढ़ाई छूट गई. वह हर वक्त अब्बा की खिदमत में रहने लगा. पैसे न होने की वजह से उसे अपनी मां के साथ मजदूरी भी करनी पड़ती थी.
आखिर एक दिन कमरुद्दीन चल बसा. मां पर तो जैसे मुसीबत की गाज ही गिर पड़ी. घर के हालात बिगड़ते ही चले गए. पैसों की किल्लत हो गई. अब तो जहूर को कोई काम तलाशना था, जिस से वह अपना और मां का पेट भर सकता. वह काम के सिलसिले में भटकता रहा, पर कोई उम्मीद न बंधाता.
रोज शाम को वह घर लौटता, तो मां पूछतीं, ‘बेटा, कहीं कुछ बात बनी?’
इस पर जहूर का जवाब ‘नहीं’ में ही होता था.
एक दिन जहूर बहुत परेशान था. उसे अपनी जिंदगी बोझ महसूस हो रही थी. वह सोच रहा था कि शायद अब उसे कोई काम नहीं मिलेगा. जब आंखों से आंसू बहने लगे, तो वह फुटपाथ पर बैठ गया. तभी वहां एक कार आ कर रुकी. उस में से सांवले रंग का एक आदमी उतरा और जहूर की तरफ बढ़ने लगा.
जहूर समझ नहीं पा रहा था कि आखिर माजरा क्या है?
‘क्या नाम है तुम्हारा?’ उस आदमी ने पूछा, तो वह हड़बड़ाते हुए बोल उठा, ‘जहूर.’
‘घबराओ नहीं…’ वह आदमी शांत लहजे में बोला, ‘मुझे बताओ, तुम्हें क्या परेशानी है?’
तब जहूर ने उसे सारी बातें सचसच बता दीं और बोला, ‘बूढ़ी मां का मैं ही सहारा हूं. मुझे अब तक कहीं कोई काम नहीं मिला…’
इस से पहले कि जहूर पूरी बात बोल पाता, वह आदमी पूछा बैठा, ‘मेरे यहां काम करोगे?’
जहूर को ऐसा लगा, मानो उस ने रुई के ढेर से सूई खोज ली हो. वह चहक उठा, ‘क्या आप मुझे काम देंगे?’
‘हां, मेरी खुद की एक फैक्टरी है, जहां कई आदमी काम करते हैं. तुम भी वहां काम कर सकते हो.’
जहूर काम करने को फौरन तैयार हो गया. वह आदमी उसे ले कर चल पड़ा. पहली बार कार में बैठे जहूर को बड़ा अजीब लग रहा था.
‘बाबूजी, आप ने मुझे गरीब पर इतनी मेहरबानी क्यों की?’ जहूर पूछ बैठा.
वह आदमी कुछ पलों के लिए सोच में डूब गया. उस आदमी की आंखों से आंसू टपक पड़े, फिर बोला, ‘तकरीबन 15 साल पहले मैं भी तुम्हारी ही तरह बेसहारा था.’
‘क्या कहते हैं बाबूजी?’ जहूर कहते हुए चौंक उठा.
‘हां, यह सच है. जब मैं 18 साल का था, तो मेरे वालिद साहब गुजर गए थे. मैं बेसहारा हो गया था… कुछ करताधरता भी नहीं था. कुछ ही दिनों बाद अम्मी भी चल बसीं. मैं दरदर भटकने लगा.
‘भूख के लिए क्याक्या करना पड़ता है, मैं ने पहली बार जाना था. मैं बहुत परेशान हुआ, पर कहीं काम न मिल सका. जहां जाता, दुत्कारा जाता.
‘कभीकभी भिखारियों को देखता, तो सोचता, मुझ से ज्यादा मजे में तो यही हैं. आखिर भीख मांग कर शाम को दालरोटी का जुगाड़ तो बना लेते हैं.
‘इतना सब होने पर भी मैं ने कभी हाथ फैला कर भीख नहीं मांगी और न ही हालात के आगे घुटने टेके.
‘मैं ने सोचा कि कुदरत ने 2 हाथ और 2 पैर दिए हैं, सोचने के लिए दिमाग और रहने के लिए इतनी बड़ी जमीन दी है…कुछ न कुछ तो कर ही लूंगा.
‘मैं ने मेहनतमजदूरी कर के कुछ पैसे इकट्ठे किए, फिर उन्हीं से फल और सब्जियां खरीद कर बेचने लगा. मुझे अच्छा फायदा हुआ और धीरेधीरे मैं तरक्की करता गया…
‘इसीलिए जब भी मैं किसी बेसहारा या लाचार को देखता हूं, तो मुझे अपने पुराने दिन याद आ जाते हैं. फिर सोचता हूं कि यह बेसहारा इनसान उतना ही काम कर सकता है, जितना कि और सब. जरूरत है उसे सहारा देने की…’
अब तक कार फैक्टरी तक पहुंच चुकी थी. मालिक ने जहूर को काम समझा या और घर चला गया.
जहूर की जिंदगी का वह सब से हसीन दिन था. वह इतना खुश था कि मत पूछो. उस की मां भी बहुत खुश थीं.
जहूर लगन व मेहनत के बल पर तरक्की करता गया, मगर कुछ ही समय में चंद ऐसे लोग उस के दोस्त बन गए, जो शराबी थे. उन्होंने दोस्ती के नाम पर शराब पिलाई, तो मारे खुशी के वह पीता ही गया. धीरेधीरे शराब उस की आदत बन गई.
जहूर अच्छा पैसा कमाने लगा था, पर जब से उसे शराब की बुरी लत लगी थी, सारी कमाई इसी में उड़ने लगी थी. अब तो यह नौबत आ गई थी कि उस ने घर के बरतन तक बेच डाले थे…
अचानक सोच में डूबा जहूर जैसे जाग उठा, ‘‘नहीं अम्मां, अब मैं कभी शराब को हाथ नहीं लगाऊंगा. अब मैं कुछ बन कर दिखाऊंगा. मैं मेहनत करूंगा, खुशियां फिर से लौटेंगी. ‘‘शुक्र है, मैं वक्त पर संभल गया, वरना यह शराब मेरा सबकुछ तबाह कर देती.’’
जहूर के मुंह से ऐसी बातें सुन कर मां खुशी से रो पड़ीं. उन्होंने प्यार से उस के सिर पर हाथ फेरा और गले से लगा लिया.
–मोहम्मद साजिद खान




