Rising Border Crime. आतंकियों समेत नकली नोट और ड्रग्स के धंधेबाज भारत और नेपाल के खुले बौर्डर का जम कर फायदा उठा रहे हैं. इस से भारत की सिक्योरिटी और खजाने में सेंध लग रही है.
सीमाई इलाकों में बसे बेरोजगार नौजवानों और गरीब लोगों को रुपए का लालच दे कर पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई, आतंकी संगठन और तस्कर धड़ल्ले से अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं.
नेपाल के बौर्डर से सटे होने की वजह से उत्तर बिहार के कई जिलों में आईएसआई तेजी से पैर पसार कर आतंकी तैयार कर रही है और नकली नोटों के धंधे को चला रही है.
नकली नोटों के तकरीबन 2 दर्जन मामले पिछले साल उत्तर बिहार के कई थानों में दर्ज हो चुके हैं. पिछले नवंबर को रक्सौल पुलिस ने जाली नोटों के साथ भुअर अंसार और मनोज साह को दबोचा, जिन पर आईएसआई के लिए काम करने का केस चल रहा है. सरैया में विनोद और पप्पू, बैरिया के प्रमोद चौधरी, अहियापुर के विश्वजीत मिश्रा जाली नोट के साथ पकड़े जा चुके हैं.
गौरतलब है कि साल 2009 में सीतामढ़ी के बसबरिया इलाके में पहले के फौजी को पुलिस ने पकड़ा था, जो आईएसआई का एजेंट निकला. उस की सीधी पहुंच आईएसआई नेपाल चीफ रहे राणा और डेविड हेडली तक थी.
खुफिया सूत्रों के मुताबिक, आईएसआई की धमक बिहार के सीतामढ़ी जिले तक पहुंच गई है. सीतामढ़ी से सटे नेपाल के जनकपुर, जलेश्वर, मलंगवा गौर, मउराहा और सिरसा इलाकों में 55 किलोमीटर लंबे खुले बौर्डर का आतंकी और तस्कर जम कर फायदा उठा रहे हैं.
अपने कामों में लोकल बेरोजगार नौजवानों को रुपयों का लालच दे कर वे आसानी से फंसा लेते हैं. सीमा सुरक्षा बल, कस्टम और पुलिस के फंदे में गरीब नौजवान फंसते हैं और उन के आका साफ बच निकलते हैं.
पिछले साल लश्कर के आतंकी मदनी के तार भी सीतामढ़ी से जुड़े होने का खुलासा हुआ था. वह नेपाल के जनकपुर शहर में नूर टूर एंड ट्रैवल एजेंसी की आड़ में फर्जी पासपोर्ट बनाने और नौजवानों को आतंक का पाठ पढ़ाने का काम करता था.
पिछले दिनों पैसों के लेनदेन के चक्कर में आईएसआई के 3 बड़े मोहरे माजिद मनिहार, परवेज टांडा और जमीम शाह की हत्या हो गई, जिस से भारत में नकली नोट का जाल फैलाने के आईएसआई के मनसूबे को बड़ा झटका लगा है.
भारतनेपाल बौर्डर के रक्सौल इलाके में कपड़े का कारोबार करने वाले रामचंद सर्राफ बताते हैं कि नेपाल के रास्ते बड़े पैमाने पर नकली नोट के भारत आने से देश की माली हालत को तो नुकसान हो ही रहा है, उस के साथसाथ कारोबारियों और आम आदमी को भी भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है. 5 सौ या एक हजार का नोट लेने से हर कोई डरता है. उसे लेने से पहले सौ बार सोचता है. काफी एहतियात बरतने के बाद भी हर महीने 8-10 हजार रुपए के जाली नोट उन के पास पहुंच ही जाते हैं. बैंक पहुंचने पर पता चलता है कि नोट जाली है. बैंक वाले उस पर क्रौस लगा देते हैं.
खुफिया महकमे के सूत्रों के मुताबिक, जाली नोटों के साथ ड्रग्स के धंधे में भी लोकल नौजवानों को लगाया जा रहा है. इस मामले की पूरी रिपोर्ट हैडक्वार्टर भेजी गई है. ड्रग्स सिंडिकेट सीमांचल इलाकों में अपना कारोबार तेजी से फैला चुका है. बौर्डर पर तैनात कस्टम, एसएसबी और लोकल पुलिस के बीच चलने वाली आपसी खींचातानी तस्करों और आतंकियों को धंधा चलाने में मददगार साबित हो रहे हैं.
बिहार के तकरीबन 750 किलोमीटर तक के भारतनेपाल बौर्डर पर कस्टम और एसएसबी के अलगअलग काम हैं.
कस्टम अफसरों का यह आरोप रहता है कि एसएसबी के लोग हमेशा उन के काम में दखल देते रहते हैं, जिस से काम करने में खासी परेशानी आती रहती है. कस्टम के अफसरों का कहना है कि एसएसबी को न तो तस्करी का सामान जब्त करने और न ही गिरफ्तार करने का हक है. अगर एसएसबी के जवान किसी तस्कर को सामान के साथ पकड़ते हैं, तो उन्हें कस्टम के हवाले कर मामले से अलग हो जाना चाहिए, लेकिन वे इस काम में पूरी तरह से भिड़ जाते हैं.
कस्टम वाले आमतौर पर घरेलू और खुद के इस्तेमाल के लिए छोटेमोटे सामान को इधरउधर ले जाने से नहीं रोकते हैं, पर एसएसबी वाले पकड़ कर कस्टम के पास ले आते हैं. कस्टम वाले इसे बेवजह परेशानियों और काम का बढ़ना मानते हैं.
एसएसबी के सूत्र बताते हैं कि एसएसबी के जवान तस्करों को पकड़ कर कस्टम वालों के पास ले जाते हैं, तो कई बार कस्टम वाले उन्हें छोड़ देते हैं.
सूत्रों की मानें, तो तस्करों से लेनदेन का मसला ही दोनों महकमों के रिश्तों में खटास की वजह है. एसएसबी वाले इस बात से खार खाए रहते हैं कि वे तस्करों को पकड़ते हैं और कस्टम वाले बैठेठाले मलाई खाते रहते हैं.
इस तनातनी पर कस्टम और एसएसबी के लोग बात करने या खुल कर कुछ बोलने से कतराते हैं. इस खटास को दूर करने के लिए दोनों महकमों के आला अफसरों की कई बैठकें हो चुकी हैं, पर अब तक कोई नतीजा नहीं निकल पाया है.




