Hindi Romantic Fiction. दिनेश सोच में डूबा बुदबुदा पड़ा, ‘इतनी आसानी से मैं सबकुछ खत्म नहीं होने दूंगा. 2 दिन में लोन मिलने से रहा, पर कुछ तो करना पड़ेगा. लेकिन क्या कर सकता हूं मैं? एक ही सूरत है कि कोई मुझे 60 हजार रुपए उधार दे दे. पर कोई क्यों देगा?’

ठीक उसी समय दिनेश को याद आया कि गोयल साहब ने एक दिन उस से अपनी बेटी माधुरी को ट्यूशन पढ़ाने के लिए कहा था. दिनेश ने सोच कर बताने के लिए कहा था.

दिनेश ने सोचा कि गोयल साहब को अपनी परेशानी बता कर देखते हैं. उसे लगा कि बैंक में ऊंचे पद पर काम करने वाले गोयल साहब के लिए 60 हजार रुपए की मदद कोई बड़ी बात नहीं होगी.

दिनेश उठा और सीधे गोयल साहब के घर के लिए चल पड़ा. सुबह के 9 बजे थे. गोयल साहब लौन में बैठे चाय पी रहे थे. उन्हें देखते ही दिनेश ने अदब से कहा, ‘‘नमस्ते सर, क्या मैं अंदर आ सकता हूं?’’ ‘‘क्यों नहीं, आओ बेटे.’’

इस तरह की और वीडियो देखने के लिए सरस सलिल का चैनल सब्सक्राइब करें

‘‘अंकल, मैं बहुत बड़ी परेशानी में फंस गया हूं,’’ इतना कह कर दिनेश ने गोयल साहब को सारी बात सचसच बता दी. ‘‘यह तो बहुत गलत हुआ. बताओ, मैं तुम्हारी क्या मदद कर सकता हूं?’’ गोयल साहब ने दिनेश की तरफ हमदर्दी भरी नजरों से देख कर कहा.

‘‘सर, आप मुझे 60 हजार रुपए उधार दे दें तो…’’ दिनेश ने अपना कहा वाक्य अधूरा छोड़ दिया.

‘‘बेटा, यह एक बड़ी रकम है, लेकिन तुम्हारी जरूरत से बड़ी नहीं. मैं तुम्हें 60 हजार रुपए दे दूंगा, पर मैं चाहूंगा कि तुम माधुरी को ट्यूशन पढ़ाओ. बीएससी फर्स्ट ईयर में उस के नंबर बहुत खराब आए हैं और एक सब्जैक्ट में तो बैक पेपर भी है.’’

गोयल साहब ने रुक कर फिर आगे कहना शुरू किया, ‘‘मैं अपनी दोनों बेटियों को पढ़ाई में बहुत आगे तक देखना चाहता हूं. ‘‘मेरा कोई बेटा नहीं है, इसलिए बेटे की कमी उन्हीं से पूरी करना चाहता हूं. उन का कैरियर संवारने के लिए तुम्हें अपनी पूरी ताकत  झोंकनी होगी. मेरे हिसाब से तुम मेरी बात अच्छी तरह समझ रहे हो…’’

दिनेश ने हामी भरते हुए कहा, ‘‘जी, मैं माधुरी से मिलना चाहूंगा. कहां है वह?’’ गोयल साहब थोड़ी तेज आवाज में बोले, ‘‘प्रिया बेटी, दीदी को नीचे भेजो.’’ थोड़ी देर में माधुरी नीचे आई, ‘‘जी पापा.’’ ‘‘बेटी, आप दिनेश हैं, जो पास ही में ममफोर्डगंज में रहते हैं. आप ने बीएससी 80 फीसदी नंबरों से पास किया है.

‘‘आज से आप की पढ़ाई की जिम्मेदारी इन की होगी. आप इन की हर बात मानेंगी. अब से ये आप के गार्जियन हैं. अच्छा बेटा, तुम आपस में बात करो, मैं अभी आया.’’ ‘‘क्या नाम है आप का?’’ ‘‘माधुरी गोयल.’’ ‘‘माधुरी नाम बड़ा लंबा है. मैं आप को मधु बुलाऊंगा.’’  ‘‘जी.’’ ‘‘घर में कौनकौन हैं?’’

‘‘पापा, मम्मी, मैं और मेरी छोटी बहिन प्रिया,’’ माधुरी, जो एक मासूम चेहरे की खूबसूरत लड़की थी, ने अब की बार थोड़ा आराम से जवाब दिया.

‘‘बीएससी में क्याक्या सबजैक्ट्स हैं?’’ ‘‘मैथ्स, फिजिक्स और कैमिस्ट्री.’’ ‘‘कितने नंबर आए सभी में?’’ ‘‘फिजिक्स में 42, कैमिस्ट्री में 45…’’ ‘‘और मैथ्स में?’’ ‘‘17… बैक पेपर है.’’ ‘‘अच्छा, तो हम सब से पहले पढ़ाई मैथ्स से शुरू करेंगे.’’ ‘‘जी, ठीक है.’’

‘‘सर, मैं और मेरी सहेलियां दोपहर को फिल्म देखने जा रही हैं.’’ ‘‘ठीक है, मैं शाम को 7 बजे आऊंगा.’’ ‘‘जी, सर.’’ उसी समय गोयल साहब वहां पहुंचे और पूछा, ‘‘क्यों, हो गया इंटरव्यू?’’ ‘‘जी, अंकल.’’ ‘‘जाओ बेटी.’’ ‘‘जी पापा,’’ कह कर माधुरी वहां से चली गई.

गोयल साहब ने एक पैकेट दिनेश की ओर बढ़ाते हुए कहा, ‘‘जाओ बेटा, पहले जा कर एमबीए में अपना एडमिशन कराओ.’’ ‘‘थैंक यू अंकल,’’ दिनेश एहसानमंद हो कर बोला. ‘‘सिर्फ थैंक यू कहने से कुछ नहीं होगा… तुम्हें मेरी बात तो याद है न?’’ ‘‘जी, वादा रहा. माधुरी अच्छे नंबर लाएगी.’’ ‘‘अच्छा, मुझे बैंक जाना है.’’ ‘‘जी अंकल, नमस्ते,’’ कह कर दिनेश वहां से रुखसत हुआ..

आज ही सब्सक्राइब करें सरिता 
 आपके लिए स्पेशल छूट

सरिता

 

दिनेश ने अपना एमबीए में एडमिशन करवा लिया. रामदीन का परिवार काफी खुश था.

दिनेश साढ़े 6 बजे गोयल साहब के घर के लिए निकल गया. घर पहुंचने पर मिसेज गोयल दिनेश को चाय दे गईं.

‘‘मधु…’’ ‘‘सर, मैं 10 मिनट में आई,’’ माधुरी ने शायद बाथरूम के अंदर से कहा.

10 मिनट बाद वह दिनेश के सामने कुरसी पर बैठी थी. ‘‘कितने बज रहे हैं?’’

‘‘सर, 7 बज कर 10 मिनट.’’ ‘‘मधु, यह मेरी पहली और आखिरी वार्निंग है. 7 बजे का मतलब 7 बजे. समझीं?’’

‘‘माफ कर दीजिए सर,’’ माधुरी मुंह बनाते हुए बोली.

दिनेश माधुरी को 1-2 दिन पढ़ाने में ही जान गया कि उस का मन पढ़ाई में कतई नहीं लगता, इसलिए वह पढ़ना भी नहीं चाहती है.

दिनेश फिर भी उसे पढ़ाने में लगा रहा. मधु को अपनी लापरवाही की वजह से अकसर डांट पड़ती थी. धीरेधीरे ही सही, मधु में कुछ सुधार आ रहा था.

दिनेश मधु को पढ़ाने में 2-3 घंटे रोज लगा ही देता और देखते ही देखते एक महीना गुजर गया. दिनेश आजकल काफी परेशान रहता था. उस की परेशानी की वजह थी, कालेज में चल रही रैगिंग.

दिनेश अपने दोस्त अजीत से कह रहा था, ‘‘परेशान कर के रख दिया है. पढ़ाई नहीं करने देते हैं. मेरे 2-3 घंटे गोयल साहब के यहां निकल जाते हैं, उस के बाद घर का काम. खुद के कई काम और इन अमीरजादों को रैगिंग की पड़ी है.’’

अजीत दबी आवाज में बोला, ‘‘अबे यार, जो करवाते हैं, उसे करता चल, नहीं तो ये हाथ भी उठा सकते हैं.’’  ‘‘मैं किसी से नहीं डरता. अब मैं परेशान हो चुका हूं. अगर आज कुछ हुआ, तो ठीक नहीं होगा,’’ दिनेश की आवाज में भरोसा था.

‘‘हैलो, इधर आओ चिकनो,’’ ठीक उसी समय एक सीनियर ने हाथ दे कर बुलाया. अजीत चुपचाप उस सीनियर की तरफ बढ़ गया, जबकि दिनेश वहीं चुपचाप खड़ा रहा.

यह सब देख कर वह सीनियर ताव में आ गया. उस ने कुछ और सीनियर लड़कों को आवाज दी और वे सब दिनेश की ओर बढ़े. ‘‘क्यों हीरो, क्या दिक्कत है?’’ उन में से एक ने पूछा.

‘‘कोई दिक्कत नहीं है. मेरी क्लास का टाइम हो गया है और मैं वहीं जा रहा हूं,’’ दिनेश सामान्य हो कर बोला. ‘‘बहुत अकड़ है. यहां पढ़ाई करनी है कि नहीं?’’ दूसरे लड़के ने पूछा.

‘‘क्यों, क्या यह तुम्हारे बाप का कालेज है? मैं तुम सब की शिकायत प्रिंसिपल से करूंगा,’’ दिनेश ने जवाब दिया.

ठीक उसी समय बगल से एक लड़की गुजरी. एक सीनियर ने उसे टोका, ‘‘हैलो मैडम, विश करने के लिए आप की मम्मी घर से आएंगी क्या?’’ ‘‘नो सर,’’ लड़की घबराते हुए बोली.

‘‘ऐसा कर, तू इस लड़के को किस कर,’’ एक सीनियर ने शरारत से कहा. दिनेश और वह लड़की आंखें चौड़ी कर के उस सीनियर की तरफ देखने लगे.

ठीक उसी समय वहां एक सीनियर लड़की भी आ गई और बोली, ‘‘क्यों अंजलि, तुम्हें जो बोला गया है, वह सम झ में नहीं आया?’’ सीनियर लड़की पहले ही रैगिंग के दौरान अंजलि का परिचय अच्छी तरह से ले चुकी थी.

अंजलि धीरेधीरे दिनेश की ओर बढ़ने लगी और सभी लड़के ताली बजाते हुए जोश बढ़ाने के लिए चिल्लाने लगे.

अंजलि दिनेश के पास पहुंची. उस की आंखों में आंसू भरे थे. दिनेश का चेहरा गुस्से से तमतमा गया. उस ने अंजलि का हाथ पकड़ा और बोला, ‘‘आप चलो मेरे साथ.’’

वे दोनों एक तरफ बढ़ने लगे. ठीक उसी समय एक सीनियर ने उस का कौलर पकड़ना चाहा कि दिनेश ने उस के चेहरे पर एक जबरदस्त घूसा मारा. वह सीनियर बिलबिलाता हुआ पीछे हटा. तालियोें का शोर बंद हो गया. दूसरे लड़कों में से एक ने एक घूंसा दिनेश के चेहरे पर दे दिया. दिनेश की नाक से खून बहने लगा.

दिनेश ने नाक से आते खून को देखा और अंजलि का हाथ छोड़ कर टूट पड़ा उन पर. सभी उस का गुस्सा देख कर घबरा गए और पीछे हट गए.

दिनेश अंजलि को ले कर भीड़ से अलग चला गया और कुछ दूर जाने के बाद वह अंजलि का हाथ छोड़ता हुआ बोला, ‘‘माफ कीजिए, मेरी वजह से आप को परेशानी हुई. दरअसल, मु झे परेशान करने के लिए उन्होंने आप को वहां बुलाया था.’’

‘‘पर, आप को तो चोट लगी है. चलिए, कुछ फर्स्ट एड ले लीजिए.’’ ‘‘नहीं, ठीक है, मैं अभी क्लास जाना पसंद करूंगा,’’ कह कर दिनेश क्लासरूम की तरफ बढ़ा और अंजलि भी क्लास के लिए दिनेश के पीछे हो ली.

अंजलि दिनेश से काफी प्रभावित थी. शायद रैगिंग वाली घटना को ले कर. दिनेश बहुत ही सीधासादा लड़का था. उस का कालेज आना, अपनी पढ़ाई करना, अपने काम से काम रखना, ये सभी बातें अंजलि को बहुत अच्छी लगती थीं. वह मन ही मन दिनेश से प्यार करने लगी थी, पर दिनेश से कहने की हिम्मत उस में न थी.

स्मिता कालेज से लौट रही थी. अचानक उसे एक लड़का सिगरेट पीता हुआ अपनी ओर बढ़ता दिखाई दिया. स्मिता को उस का चेहरा जानापहचाना सा लगा. याद आते ही स्मिता की आंखें फटी की फटी रह गईं. यह तो वही लड़का था, जिस ने आज से लगभग 45 दिन पहले उस के घर पर चोरी की थी.

स्मिता को यह नहीं सम झ आ रहा कि वह आखिर उस की तरफ ही क्यों आ रहा है. अगले कुछ पलों में  वह स्मिता के ठीक सामने खड़ा था. स्मिता के कदम रुक गए. राजू ने उस के चेहरे को ध्यान से देखते हुए कहा, ‘‘देख, शोर मचाने की कोई जरूरत नहीं है.’’

‘‘अब शोर मचाने से क्या फायदा? जब मैं तुम्हें पकड़वा सकती थी, तब शोर नहीं मचाया, तो अब क्यों…, वैसे भी क्या काम है तुम को?’’ स्मिता ने पूछा.

‘‘मु झे तुम से कुछ बात करनी है. माना कि मैं एक अच्छा लड़का नहीं हूं. चोरी करना बुरी बात है. पर उस रात तुम से की गई छोटी सी बातचीत मु झ पर बहुत असर कर गई. उस दिन घर लौटने के बाद से मैं काफी परेशान हूं. अगर तुम्हारी बात मु झे इतना परेशान कर सकती है, तो तुम्हारी दोस्ती मु झे अच्छा आदमी जरूर बना सकती है…’’

स्मिता ने बात बीच में काटी, ‘‘क्या बकवास कर रहे हो? चलो, हटो. मु झे घर जाने के लिए देर हो रही है.’’

राजू ने कहा, ‘‘देखिए, कई लोगों ने मु झ से यह गंदा काम छोड़ने के लिए कहा और मेरी चोरीचकारी छुड़वाने की कोशिश भी की, पर मु झ पर कोई असर नहीं हुआ, इसलिए आप प्लीज एक बार मेरी बात मान लें. मैं आप को कभी परेशान नहीं करूंगा.’’

स्मिता को शरारत सू झी. उस ने राजू की ओर देखा और कहा, ‘‘ठीक है, मु झे आप की दोस्ती मंजूर है. मेरा नाम स्मिता है. आप का नाम क्या है?’’ यह सुन कर राजू की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. उस ने फौरन जवाब दिया, ‘‘मेरा नाम राजू है. वैसे घर वालों ने मेरा नाम राजेश कुमार रखा था.’’

स्मिता ने घड़ी की ओर देख कर कहा, ‘‘अब मु झे चलना चाहिए. देर हो रही है.’’ राजू बहुत खुश था. वह बोला, ‘‘हां, आप जाइए. बाद में आप से मुलाकात होगी.’’ ‘‘जरूर,’’ इतना कह कर स्मिता चली गई.

दिनेश को आज बुखार था. शायद सर्दी का असर था. फिर भी वह अपने नियमित समय के मुताबिक माधुरी के घर पहुंच गया. ‘‘सर, कल आप ने जो प्रौब्लम दिए, उन में से 2 सुल झ नहीं पाए.’’

ठीक उसी समय दिनेश को एक जबरदस्त छींक आई. माधुरी ने देखा कि उस का चेहरा लाल है और वह काफी सुस्त लग रहा है. ‘‘सर, लगता है, आप की तबीयत ठीक नहीं है?’’ ‘‘नहीं, मेरी तबीयत ठीक है.’’

माधुरी ने हिम्मत कर के अपना हाथ दिनेश के गाल पर रख दिया. यह देख दिनेश हड़बड़ा गया. मधु उस से पहले ही बोल पड़ी, ‘‘सर, वाकई आप की तबीयत ठीक नहीं है. आज आप घर जाइए और आराम कीजिए.’’

‘‘नहीं मधु, बताओ कौन सी प्रौब्लम…’’ माधुरी उस की बात को बीच में काटते हुए बोली, ‘‘सर, आप जो भी पढ़ने के लिए कहेंगे, मैं पढ़ूंगी, पर आप आराम कीजिए.’’

‘‘देखो मधु, तुम…’’ ‘‘सर प्लीज, आज मेरी बात मान लीजिए.’’

दिनेश ने माधुरी के चेहरे की तरफ देखा. वह बहुत उम्मीद भरी निगाहों से देख रही थी. दिनेश कुछ सोच कर बोला, ‘‘ठीक है मधु, पर तुम पढ़ाई करना.’’ ‘‘जी सर, थैंक्यू सर, छुट्टी, छुट्टी…’’

दिनेश माधुरी की बचकानी बातों पर मुसकराता हुआ चला गया. दिनेश जैसे ही कालेज पहुंचा, अंजलि सीधे उस के पास चली आई, ‘‘आप कल आए नहीं.’’ ‘‘ओ अंजलि, कल मेरी तबीयत खराब थी.’’

‘‘अभी कैसी है?’’ ‘‘ठीक है,’’ दिनेश क्लासरूम की तरफ बढ़ता हुआ बोला.

अंजलि डरतेडरते बोली, ‘‘दिनेश, एक बात बोलूं, मना तो नहीं करोगे?’’ ‘‘पहले बताओ तो, फिर देखते हैं,’’ अंजलि को डरता हुआ देख दिनेश ने हंस कर कहा. ‘‘मैं आज आप को अपनी बर्थडे पार्टी पर बुलाना चाहती हूं.’’

‘‘हैप्पी बर्थडे. देखो अंजलि, मैं न तो कभी पार्टी वगैरह में गया हूं और न जाना चाहता हूं. यह सब मेरी औकात के बाहर है,’’ दिनेश संकोच के भाव में बोला.

‘‘प्लीज, प्जीज, प्लीज…’’ ‘‘ठीक है, पर मैं आप के घर आऊंगा कैसे?’’

‘‘आप आज मधु को पढ़ाने तो जाएंगे ही, मैं वहीं से आप को पिकअप कर लूंगी,’’ अंजलि काफी खुश होते हुए बोली. ‘‘स्मिताजी, नमस्ते,’’ यह आवाज सुन कर स्मिता चौंक गई. सामने राजू खड़ा था.

‘‘हाय राजू, कैसे हो?’’ ‘‘कल आप जल्दी में थीं, इसलिए आप से कुछ बात नहीं हो पाई,’’ राजू ने मुसकराते हुए आगे कहा, ‘‘अगर आप के पास कुछ समय हो, तो चलिए उस बाग में बैठते हैं.’’

‘‘ठीक है, चलिए,’’ स्मिता ने कुछ रुक कर कहा. बाग की ओर बढ़ते हुए राजू ने कहा, ‘‘अपने बारे में कुछ बताइए, जैसे परिवार में कौनकौन हैं, आप कोे क्याक्या पसंद है वगैरह.’’

स्मिता ने राजू को अपने बारे में सबकुछ बता दिया, सिर्फ उन बातों पर परदा डाल दिया, जिन का जिक्र उस ने शायद किसी से नहीं किया था. स्मिता ने तकरीबन एक घंटा राजू के साथ बिताया और जैसे ही वह चलने को हुई, राजू ने उस के हाथ में एक पैकेट पकड़ा दिया.

‘‘यह क्या है राजू?’’ ‘‘अब इस का कोई मतलब नहीं है, पर क्या बताऊं… इस पैकेट में आप के घर से चुराए हुए 60 हजार रुपए, अंगूठी और घड़ी है. इसे आप वापस ले लीजिए प्लीज,’’ राजू बोल रहा था और स्मिता हैरान सी खड़ी थी.

राजू ने आगे कहना शुरू किया, ‘‘देखिए, आप मेरे लिए सब से अजीज हैं. मां, बाप, भाई, बहिन कोई नहीं है मेरी जिंदगी में. आज मैं अपने अजीज दोस्त के सामने उस की दोस्ती की सौगंध खा कर कहता हूं कि मैं आज के बाद से कभी चोरी नहीं करूंगा,’’ कहते हुए वह भावुक हो गया.

कहीं उस का भावुक होना स्मिता पकड़ न ले, इसलिए वह दौड़ते हुए एक और भाग गया. स्मिता उसे देखती रह गई.

दिनेश तय समय पर मधु के घर पहुंचा. उस ने उस दिन बाकी दिनों से अच्छी पढ़ाई की थी. दिनेश खुश हो गया और बोला, ‘‘वैरी गुड मधु, वैरी गुड. लगता है, बाकी दिनों की तुलना में तुम ने आज अच्छी पढ़ाई की है.’’

‘‘सर, आखिर आप से प्रौमिस किया था, पढ़ना तो पड़ेगा ही, मधु अपना वादा कभी नहीं तोड़ती,’’ मधु ने एक प्यारी सी मुसकान के साथ कहा.

दिनेश उसे एकटक देखता ही रह गया. फिर जैसे ही उसे याद आया कि वह अपलक मधु को देख रहा है, तो वह  झेंप गया. उस ने तुरंत खामोशी को भंग किया, ‘‘गुड, वादा पूरा करना अच्छी बात है. कल से हम फिजिक्स भी पढ़ना शुरू करेंगे,’’ दिनेश ने थोड़ा रुक कर आगे कहा, ‘‘आप के पापा को आप से जितनी उम्मीदें हैं, मु झे उस से कहीं ज्यादा है.’’ मधु कुछ न बोली, क्योंकि वह पढ़ाई करने में मशगूल हो गई थी.

दिनेश सोच रहा था, ‘शुरू में यह लड़की कितनी लापरवाह थी. पढ़ाईलिखाई में भी ध्यान नहीं था. लेकिन पिछले 50 दिनों में गजब का बदलाव आ चुका है. कितनी अल्हड़ लड़की है यह, पर अपने फर्ज के हाथों मजबूर दिनेश ने कभी उसे लड़की की नजर से नहीं देखा. पर वाकई वह एक बेहतरीन घरेलू लड़की थी.’

ठीक उसी समय मधु ने दिनेश से कुछ पूछा और दिनेश की सोच का तार टूटा. तकरीबन एक घंटे बाद जब रात के करीब साढ़े 8 बज रहे थे कि दरवाजे पर किसी गाड़ी का हौर्न बजा. मधु ने लपक कर खिड़की खोली और गाड़ी की तरफ देखा.

‘‘कोई लड़की लगती है सर.’’ ‘‘अंजलि होगी.’’ ‘‘यह अंजलि कौन है सर?’’ ‘‘मेरी क्लासमेट है.’’ ‘‘पर यह यहां…’’ ‘‘इस की बर्थडे पार्टी पर इस के घर जाना है…’’

‘‘बहुत खास दोस्त है क्या?’’ मधु की आवाज में चिंता थी. ‘‘खास का तो पता नहीं, दोस्त जरूर है.’’

‘‘पैसे वाली लगती है सर, संभल कर रहना…’’ ‘‘बहुत चिंता है तुम्हें…’’

‘‘सो तो है सर, पर आप खाली हाथ हो,’’ मधु ने मजाकिया लहजे में कहा. ‘‘मैं कुछ सम झा नहीं…’’ दिनेश ने सवालिया निगाहों से देखा.

‘‘अरे, बर्थर्ड गर्ल के लिए कोई गिफ्ट नहीं ले जाओगे?’’ ‘‘ओह, पर मेरे पास तो कुछ नहीं है,’’ दिनेश का इतना कहना था कि मधु भीतर कमरे में गई और हाथ में एक किताब ले आई और बोली, ‘‘सर, इस के पन्नों पर दोस्ती की खूबियां लिखी हैं, ये आप अंजलि को गिफ्ट कीजिएगा. मैं इसे पैक करती हूं.’’

‘‘नहीं, मैं ये तुम से नहीं ले सकता.’’ ‘‘क्या सर, चलिए ट्यूशन फीस सम झ कर रख लीजिए,’’ मधु ने शरारत भरे लहजे में कहा. दोनों हंसने लगे और दिनेश वह गिफ्ट ले कर बाहर निकला.

अंजलि कार का दरवाजा खोल कर बड़े अदब से बोली, ‘‘चीफ गेस्ट का हार्दिक अभिनंदन है.’’ दोनों मुसकराते हुए गाड़ी में बैठ गए. अंजलि बड़े आराम से ड्राइव कर रही थी. तकरीबन आधे घंटे बाद ही दिनेश एक महलनुमा घर में पहुंचा.

घर देख कर दिनेश की आंखें चुधियां गईं. दिनेश चुपचाप ही रहा. उस शानदार घर को देख कर उस ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दीं.

अंजलि ने गाड़ी रोकी, दूसरी तरफ जा कर दिनेश की ओर का दरवाजा खोलते हुए बोली, ‘‘आइए.’’ ‘‘जी, चलिए.’’

घर में एक बड़े से हौल में पार्टी पूरे शबाब पर थी. अंजलि को देखते ही वहां मौजूद तमाम लोगों ने तालियों से उस का अभिनंदन किया. ठीक उसी समय एक शानदार लिबास में अधेड़ जोड़ा उस लड़की के पास आया. रोबीली मूंछों वाले एक शख्स ने कहा, ‘‘वैलकम बर्थडे गर्ल.’’ अंजलि खुश हो कर बोली, ‘‘पापा, ये दिनेश हैं, जिन के बारे में मैं ने आप को बताया था.’’

‘‘आप से मिल कर अच्छा लगा जैंटलमैन. अंजलि हमेशा आप के बारे में बातचीत करती रहती है. मैं इस प्यारी लड़की का पापा कोमल सिंह और ये मेरी बीवी गुलाबी देवी हैं,’’ कह कर अंजलि के पापा ने दिनेश की तरफ हाथ बढ़ाया, पर दिनेश ने  झुक कर उन के पैर छू लिए. दोनों हैरान हो कर दिनेश की तरफ देखने लगे.

अपनी ओर देखता पा कर दिनेश ने कहा, ‘‘अंकल, दोस्त के मांबाप भी अपने मांबाप की तरह हुए. अब उन से हाथ मिलाना मु झे सही नहीं लगता.’’

अंजलि के मातापिता प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके थे. हालांकि पार्टी का माहौल दिनेश के लिए असहज हो रहा था, पर वह खुद को सामान्य किए हुए था. दरअसल, इन बड़े लोगों के बीच में दिनेश खुद को बहुत छोटा महसूस कर रहा था.

अजंलि की नजरें सिर्फ दिनेश पर ही थीं. अंजलि के मातापिता भी इस बात पर गौर कर रहे थे. पार्टी में तमाम रस्में पूरी की गईं. केक काटा गया, केक काटने के बाद अंजली ने पहले एक बड़ा सा टुकड़ा उठा कर अपने मम्मीपापा को खिलाया, फिर उस की निगाहें दिनेश को खोजने लगीं, जो इन मौर्डन लोगों के पीछे एक कोने में खड़ा था.

अंजलि भीड़ को चीरते हुए दिनेश के सामने खड़ी हो गई और बोली, ‘‘दिनेश मुंह खोलो.’’

‘‘नहीं, ठीक है… पहले अपने खास मेहमानों को…’’ ‘‘नहींनहीं, मुंह खोलो प्लीज.’’

‘‘उन्हें बुरा लग सकता है…’’ दिनेश धीरे से बोला. ‘‘मेरी बला से.’’

दिनेश ने अंजलि के हाथों में केक के टुकड़े का एक बड़ा सा हिस्सा खा लिया.

‘‘थोड़ा सा बचा है… चलेगा क्या?’’ ‘‘चलेगा नहीं दौड़ेगा. प्लीज खिलाओ,’’ अंजलि ने कहा, तो दिनेश ने केक का बचा हिस्सा अंजलि को खिलाया. ‘‘थैंक्यू.’’ ‘‘हैप्पी बर्थडे.’’ ‘‘दिनेश, थैंक्यू फौर जौइनिंग दि पार्टी.’’

‘‘तुम्हें बड़े शानदार गिफ्ट मिले हैं, मैं ने सोचा कि मेरा गिफ्ट, जो बहुत छोटा है, मेरे दोस्त को मिले इन बड़े तोहफों के बीच खो न जाए, दिस इज फौर यू,’’ कह कर दिनेश ने मधु का दिया हुआ तोहफा अंजलि की तरफ बढ़ाया. अंजलि ने उसे लपक कर ले लिया.

‘‘अंजलि, अब मु झे जाने की इजाजत दो,’’ दिनेश ने कहा. ‘‘नहीं, आप को आज यहीं रुकना होगा,’’ तब तक वहां पहुंच चुकी अंजलि की मम्मी ने कहा. ‘‘नहीं आंटी, मैं घर बता कर नहीं आया.’’

‘‘ठीक है, ड्राइवर आप को छोड़ देगा,’’ अब बोलने की बारी अंजलि के पापा की थी. ‘‘नहीं पापा, मैं ड्रौप कर दूंगी.’’

‘‘पर आप का बर्थडे है. अभी आप कैसे जा सकती हैं?’’ दिनेश ने तपाक से जवाब दिया. ‘‘बात तो सही है बेटी,’’ अंजलि के पापा ने कहा. ‘‘अंकल, मैं चला जाऊंगा.’’

‘‘राम सिंह, साहब को घर तक छोड़ आओ,’’ अंजलि के पापा की यह बात सही थी. दिनेश को अभी घर जाने के लिए कोई साधन न मिलता. अंजलि के मम्मीपापा के पैर छू कर दिनेश वहां से चला गया.

दिनेश के जाने के फौरन बाद अंजलि ने दिनेश का गिफ्ट खोल कर देखा. एकएक कर के उस ने फ्रैंडशिप के सारे स्लोगन पढ़ डाले. उस के चेहरे पर मुसकान तैर रही थी. उस के होंठ बुदबुदा उठे, ‘‘आई लव यू जान.’’ और उस ने उस डायरी को चूम लिया. अंजलि की मां दूर खड़ी यह सब देख रही थीं और मुसकरा रही थीं.

स्मिता ने भैया के कमरे की खिड़की के पास राजू के दिए उस पैकेट को रख दिया और साथ में एक लैटर जो उस ने खुद लिखा था, रख दिया. स्मिता ने उसी रात की तरह खिड़की को भी खोल दिया.

रात के तकरीबन एक बजे दिनेश अंजलि के यहां से आया और अपने कमरे में दाखिल हुआ. उस की मां प्रमिला देवी ने कहा, ‘‘बेटा, हाथमुंह धो ले, खाना ला रही हूं.’’

‘‘मां, थोड़ा सा ही खाना देना. मैं ने खाना खा रखा है. पर तेरे हाथ न खाऊं, तो पचता ही नहीं है.’’ ‘‘कहीं, खाना खा कर आया है क्या?’’

‘‘जी मां, एक दोस्त का जन्मदिन था,’’ कहने के साथ ही दिनेश ने अपने कमरे की लाइट जलाई. खिड़की खुली देख कर वह उसे बंद करने के लिए बढ़ा कि उस के पैर से कुछ टकराया. ‘यह कैसा पैकेट है,’ सोचते हुए जब उस ने पैकेट खोला, तो मारे हैरानी के उस की आंखें फटी की फटी रह गईं. घर का सारा चोरी हुआ सामान पैकेट में उन 60 हजार रुपयों के साथ था.

दिनेश ने आवाज दी, ‘‘मांपापा इधर आओ. कमाल हो गया.’’ ‘‘क्या हुआ बेटा?’’ प्रमिला देवी ने पूछा.

‘‘अरे मां, आओ तो सही, स्मिता को भी ले आओ.’’ ‘‘क्या हुआ भैया?’’ ‘‘देखो, चोर ने हमारा सारा सामान वापस कर दिया है. और हां, एक चिट्ठी भी है,’’ दिनेश हड़बड़ाते हुए बोला. ‘‘क्या लिखा है इस में?’’ यह रामदीन की आवाज थी.

‘‘पापा, लिखा है कि मैं एक पेशेवर चोर हूं, पर कुछ वजह से मैं अपने पुश्तैनी धंधे से संन्यास ले रहा हूं. अब सारा चोरी किया माल तो वापस नहीं कर सकता, पर कुछ लोगों को तो कर ही सकता हूं और उन कुछ लोगोें में से एक आप भी हैं. मु झे माफ कर दीजिएगा और मेरे अच्छा आदमी बनने और उस पर खरा उतरने के लिए दुआ कीजिएगा. एक शराफत भरी जिंदगी की तलाश में… आप का, शुभचिंतक चोर.’’

‘‘अरे वाह, यह तो बड़ा फिल्मी स्टाइल हो गया,’’ स्मिता हंस पड़ी. ‘‘चलो, कुछ भी हो बेटी, जिस खिड़की से मेरा सारा सामान गया था, उसी से वापस आ गया,’’ रामदीन ने राहत की सांस ली.

‘‘चलो, सब आराम करो. जो हुआ अच्छा हुआ. बेटा, तू खाना खा ले.’’ ‘‘ला मां, आज तो गले तक खाऊंगा,’’ दिनेश ने मजाक किया.

दिनेश खाना खा रहा था कि तभी उस के दिमाग में पापा का कहा आखिरी वाक्य याद आया, ‘चलो, जिस खिड़की से सामान गया था, उसी से वापस आ गया.’

दिनेश ने दिमाग पर जोर डाला कि जब से इस खिड़की से चोरी हुई थी, सभी लोग इसे बंद रखते थे. यह खिड़की सिर्फ अंदर से ही बंद हो सकती थी. आज सुबह भी यह खिड़की अंदर से बंद थी.

दिनेश को भरोसा हो गया कि खिड़की घर मेें से ही किसी ने खोली है. पर किस ने? उस ने लपक कर चिट्ठी उठा ली, जो कथित रूप से चोर ने लिखी थी. वह उस पर लिखी लिखावट को पहचानने लगा, पर वह किसी से मेल नहीं खा रही थी. किसी ने बड़ी सम झदारी से लिखा था. फिर दिनेश ने गौर किया कि पैन की स्याही हर 2-3 शब्दों के बाद वह थोड़ी गाढ़ी हो जाती है. दिनेश खाने को एक तरफ रख उठ खड़ा हुआ. सभी लोग सो रहे थे. उस ने पापा की जेब से उस का पैन निकला, कागज पर कुछ लाइनें लिखीं, पर इस में वह बात नहीं थी. फिर वह दबे पांव स्मिता के कमरे में गया. उस के पढ़ने वाली टेबिल पर एक पैन रखा था, दिनेश ने उस से भी कागज पर लिखना शुरू किया. उस की आंखें फैलती चली गईं.

‘स्मिता, पर क्यों…’ उस ने कमरे में सो रही स्मिता की ओर देखा. दिनेश ने स्मिता के कंधे को  झक झोर कर जगाया और बोला, ‘‘स्मिता, बाहर गलियारे में आओ.’’

‘‘क्या हुआ भैया?’’ स्मिता ने डरते हुए पूछा. ‘‘बाहर चलो…’’ दिनेश ने आदेश भरी आवाज में कहा.

स्मिता ने दिनेश की तरफ देखा और उस के पीछे हो ली, घर के बाकी सदस्य सो रहे थे. स्मिता ने देखा कि दिनेश उसे खा जाने वाली नजरों से देख रहा था.

दिनेश ने स्मिता से पूछा, ‘‘तुम्हारे पास यह पैकेट कहां से आया?’’ ‘‘जी, कौन सा पैकेट?’’ ‘‘अभी खींच कर एक थप्पड़ दूंगा. सचसच बताओ…’’

स्मिता ने हिचकिचाते हुए सारी बातें बता दीं, पर इस बार भी उस ने अपनी बुराइयों पर परदा डाल दिया. दिनेश उस की कहानी से संतुष्ट नहीं हो पाया था.

गोयल साहब ने देखा कि दिनेश आ रहा है. ‘‘आओ दिनेश, आज इतनी सुबहसुबह कैसे?’’ ‘‘सर, आप से मिलने आया था.’’ ‘‘हां, बोलो.’’ ‘‘सर, ये आप के 60 हजार रुपए. वो चोर बहुत ईमानदार निकला. उसी ने लौटाए हैं.’’ ‘‘क्या…’’

‘‘हां सर, मैं भी हैरान हूं,’’ दिनेश ने मुसकराते हुए कहा. ‘‘प्रिया बेटी, जरा चाय वगैरह ले आना.’’ ‘‘नहीं सर…’’ दिनेश ने मना किया.

प्रिया रसोई की तरफ जा रही थी. उस ने देखा कि मधु टकटकी बांधें खिड़की की ओट से दिनेश को ही देख कर रही है. वह तकरीबन सम्मोहित सी थी.

प्रिया कुछ देर यों ही मधु को देखती रही और फिर मुसकराते हुए रसोई की ओर बढ़ गई.

प्रिया जब चाय दे रही थी, तब उस ने भी दिनेश को गौर से देखा. तकरीबन 6 फुट लंबाई वाला दिनेश एक अच्छी शख्सियत का मालिक था. वह किसी तरह का नशा भी नहीं करता था. मेहनतकश और शराफत में भी कोई उस का सानी नहीं था. दीदी की पसंद पर नाज कर के प्रिया मुसकरा उठी. दिनेश के जाने के लिए उठने पर प्रिया फौरन दीदी के पास पहुंच गई.

‘‘हैलो दीदी, क्या नैनमटक्का हो रहा है,’’ प्रिया ने मजाक करते हुए कहा. ‘‘नहीं तो, कुछ भी नहीं…’’ मधु, जो दिनेश को जाते हुए देख रही थी, हड़बड़ा कर बोली.

‘‘बहुत पसंद करती हो दिनेशजी को… क्यों?’’ ‘‘मारूंगी तुम्हें अभी…’’ मधु शरमाते हुए बोली.

‘‘अच्छा, मैं ने सोचा कि तुम्हारा कोई चक्कर है,’’ प्रिया ने चुटकी ली. ‘‘क्या बकती है…’’ मधु ने तपाक से कहा.

‘‘अच्छा, मैं बकती हूं, यानी तुम्हें दिनेश से कोई मतलब नहीं. ठीक है, फिर मेरा रास्ता साफ है,’’ प्रिया ने कुटिल मुसकान के साथ कहा. ‘‘क्या मतलब है तेरा…’’ मधु ने प्रिया की तरफ देखा.

‘‘देखो दीदी, मैं भी 17 साल की हो गई हूं और दिनेश मु झे बहुत अच्छे लगते हैं. सोचती हूं कि उन्हें आई लव यू बोल ही दूं,’’ प्रिया ने बड़ी शराफत से कहा. ‘‘मैं तेरी नाक तोड़ दूंगी,’’ मधु ने बनावटी गुस्सा दिखाते हुए कहा.

‘‘तो आप भी दिनेश से प्यार करती हैं?’’ प्रिया ने तुनकते हुए पूछा. ‘‘मैं भी से क्या मतलब है तुम्हारा?’’ मधु ने थोड़ा चकित हो कर पूछा. ‘‘मतलब यह कि अव्वल तो मैं उन से प्यार करती हूं और मेरे बाद तुम…’’ प्रिया अपनी दीदी का दिल टटोल रही थी.

‘‘तुम उन के लिए क्या कर सकती हो?’’ अब की बार मधु ने प्रिया पर सवाल का वार किया. ‘‘जो वे बोलेंगे,’’ प्रिया ने नाटक किया.

‘‘और, मैं उन के लिए अपनी जान भी दे सकती हूं,’’ प्रिया को चुप होना लाजिमी था. मधु ने आगे कहना शुरू किया, ‘‘मैं उन से बहुत प्यार करती हूं और वे सिर्फ मेरे हैं. देखना, ग्रेजुएशन पूरी होते ही मैं उन से शादी करूंगी.’’

प्रिया मुसकरा कर बोली, ‘‘मेरी दुआएं आप के साथ हैं.’’ मधु भी प्यार भरी नजरों से प्रिया की तरफ देख कर मुसकरा रही थी, जो थोड़ी देर पहले तक प्रिया के नाटक को सच सम झ चुकी थी.

दिनेश कालेज में घुसा ही था कि एक लड़की ने उसे देख कर पूछा, ‘‘दिनेश, अंजलि को देखा है क्या?’’

‘‘नहीं, पर आप मु झ से क्यों पूछ रही हैं?’’ ‘‘लो, अब उस के बैस्ट फ्रैंड से नहीं पूछूंगी, तो किस से पूछूंगी.’’

दिनेश बैस्ट फ्रैंड शब्द सुन कर थोड़ा हैरान सा रह गया. ठीक उसी समय सामने से अंजलि आती दिखाई दी. दिनेश ने फौरन उस लड़की से मुखातिब हो कर कहा, ‘‘लीजिए, आप अंजलि को ढूंढ़ रही थीं, वह देखो सामने से आ रही है.’’

‘‘पर मैं चलती हूं. अभी वह आप से मिलने आ रही है,’’ उस लड़की ने शरारत भरे लहजे में कहा.

‘‘हाय दिनेश, गुड मौर्निंग,’’ अंजलि, जो अब तक उस के पास आ चुकी थी, मुसकरा कर बोली.

‘‘गुड मौर्निंग.’’ ‘‘अरे रेखा, कैसी हो?’’ ‘‘अच्छी हूं, आप लोग बात कीजिए, मैं बाद में मिलती हूं,’’ इतना कह कर रेखा वहां से चल पड़ी.

‘‘रेखा को कब से जानते हो?’’ अंजलि ने दिनेश से पूछा. ‘‘हम लोग बचपन से अच्छे फ्रैंड हैं,’’ दिनेश ने उसी अंदाज में जवाब दिया.

‘‘तुम ने कभी पहले नहीं बताया,’’ अंजलि थोड़ा निराश हो कर बोली. ‘‘आप ने कभी पूछा ही नहीं.’’

अंजलि को उदास होता देख दिनेश उसे सम झाते हुए बोला, ‘‘अरे यार, मैं उस को पिछले 5 मिनट से ही जानता हूं. तुम मेरी सब से अच्छी दोस्त हो और इतनी आसानी से कोई तुम्हारी जगह नहीं ले सकता.’’

‘‘अच्छा… हां, तुम्हारा गिफ्ट बहुत प्यारा था,’’ अंजलि काफी खुश हो कर बोली. ‘‘चलिए, इस गरीब का तोहफा आप को पसंद तो आया,’’ यों ही बात करते हुए दोनों क्लासरूम की तरफ बढ़े.

स्मिता ने आज एक फैसला लिया था. राजू उसे अच्छा लगा था और शायद राजू के लिए वह खुद को सुधारना चाहती थी. इसी सिलसिले में उस ने आज अमित को डांटा था और सारे संबंध खत्म करने के लिए कहा, तो अमित, जो थोड़ा डरपोक था, उस की बात मान गया. पर वह स्मिता के ऊपर आखिरी बार संबंध बनाने के लिए दबाव बना रहा था. यही सब सोचते हुए वह चली जा रही थी कि अचानक राजू आ गया.

‘‘कैसी हो स्मिता?’’ ‘‘अच्छी हूं.’’ ‘‘पर चेहरे से काफी परेशान दिख रही हो?’’ ‘‘नहीं, ऐसा कुछ नहीं है,’’ स्मिता ने अपनी परेशानी छिपाते हुए कहा.

‘‘आओ, मैं तुम्हें कुछ दिखाना चाहता हूं,’’ राजू ने स्मिता का हाथ पकड़ते हुए कहा. ‘‘कहां ले जा रहे हो?’’

‘‘आओ तो सही,’’ राजू ने बात को बीच में ही काटा. राजू बाग के बाहर एक नई चमचमाती कार के पास पहुंचा. ‘‘यह क्या है?’’

‘‘यह मेरी गाड़ी है. वैसे तो यह मैं ने अपने चोरी के रुपयों से ही खरीदी है, पर अब इस से जो कमाई आएगी, वह पूरी तरह से मेरी मेहनत की होगी.’’

स्मिता मंत्रमुग्ध सी देख रही थी. राजू ने आगे कहना शुरू किया, ‘‘और अब तुम्हें एक कदम भी पैदल नहीं चलने दूंगा. कल से तुम्हें कालेज ले जाने और वापस ले जाने की जिम्मेदारी मेरी.’’

यह सुन कर स्मिता की आंखों में आंसू भर आए. स्मिता को भावुक होता देख राजू ने बात बदली और उसे गाड़ी में बिठाया. वह गाड़ी चला कर आगे बढ़ा. रास्ते में उस ने अपने बारे में काफीकुछ बताया. मांबाप उस की जिंदगी में नहीं थे. पेट के लिए और गलत संगत में पड़ कर वह एक माहिर चोर बन गया. उस ने स्मिता को उस के घर से थोड़ी दूर छोड़ दिया.

समय बीतता चला गया. तकरीबन 6 महीने और बीत गए. दिनेश, मधु और अंजलि की पढ़ाई अच्छी चल रही थी. मधु और दिनेश के बीच आकर्षण बढ़ता जा रहा था. दिनेश एक टीचर की मर्यादा का पालन करने में मधु से आज तक कुछ न कह पाया. कुछ यही हाल मधु का था. वह अपने दिल की बात कहने के लिए मौके का इंतजार कर रही थी. अंजलि तो दिनेश के लिए लगभग पागल सी थी. कालेज और कालेज के बाहर भी दोनों फ्री टाइम साथ में गुजारते थे. इधर, स्मिता और राजू दोनों मन ही मन एकदूसरे को प्यार करते थे.

आज का दिन बड़ा खास था. आज दिनेश, अंजलि और मधु का रिजल्ट आ रहा था. अंजलि दिनेश के घर आई.

‘‘अरे तुम…’’ दिनेश चौंकते हुए बोला. ‘‘मैं ने सोचा कि क्यों न हम रिजल्ट साथ में देखते हैं,’’ अंजलि ने जवाब दिया और बड़ी अदब से अंजलि ने प्रमिला और रामदीन के पैर छुए और स्मिता की ओर हाथ बढ़ाते हुए कहा, ‘‘हाय स्मिता, कैसी हो?’’

‘‘कमाल है, आप मेरा नाम भी जानती हैं.’’ ‘‘जी, मैं आप के परिवार के बारे में बहुतकुछ जानती हूं, मैं आप के भैया की बहुत अच्छी दोस्त हूं.’’

‘‘मु झे पूरा भरोसा है कि आप लोगों के नंबर बहुत अच्छे आएंगे,’’ स्मिता उन का उत्साह बढ़ाते हुए बोली. ‘‘अंकलजी, हम पास के ही किसी इंटरनैट से रिजल्ट देख कर आते हैं,’’ अंजलि ने रामदीन की ओर देख कर कहा.

‘‘हां बेटी,’’ रामदीन ने सहमति में सिर हिलाया. दिनेश और अंजलि कार में बैठ कर पास के साइबर कैफे की ओर रवाना हो गए. दोनों एक ही कंप्यूटर पर बैठे हुए थे. दिनेश ने फटाफट कालेज के रिजल्ट की साइट खोली और उस में पहले अंजलि का रोल नंबर डाला.

‘‘अरे, पहले तुम अपना रिजल्ट देखो.’’ ‘‘नो मैडम, लेडीज फर्स्ट.’’

अंजलि ने 70 फीसदी अंकों के साथ इम्तिहान पास किया था. अब बारी दिनेश के नंबरों की थी. उस के नंबरों को देखते ही दोनों उछल पड़े. दिनेश के 87 फीसदी अंक आया थे, और उस ने पूरे कालेज में टौप भी किया. कालेज के पिछले 15 सालों का रिकार्ड भी दिनेश के नंबरों के साथ टूट गया.

अंजलि ने मारे खुशी के दिनेश के दोनों गालों पर चुम्मा ले लिया. दिनेश यह देख हड़बड़ा गया. अंजलि को भी फौरन खयाल आया कि उस ने यह क्या कर दिया. ‘‘सौरी…’’ ‘‘नो प्रौबलम. चलो, एक खास रिजल्ट और देखना है… मधु का.’’

‘‘आज तो उस का भी रिजल्ट आ रहा है. मु झे मालूम ही नहीं था. आप ने उस के लिए भी बहुत मेहनत की है. एक तरह से यह आप का भी रिजल्ट होगा.’’ ‘‘बिलकुल सही कहा तुम ने.’’

मधु के नंबर स्क्रीन पर थे. फर्स्ट ईयर के मैथ के बैक पेपर में 65 फीसदी सेकंड ईयर वर्ष के मैथ में 60 फीसदी, फिजिक्स में 61 फीसदी और कैमिस्ट्री में 61 फीसदी.

‘‘मजा आ गया. अब से एक साल पहले अगर कोई टीचर मधु से मिलता, तो ऐसे नंबरों की भविष्यवाणी कभी नहीं कर सकता था. हमें अभी मधु के घर चलना होगा,’’ दिनेश ने कुरसी छोड़ते हुए कहा.

‘‘चलिए,’’ अंजलि और दिनेश अगले 10 मिनट में मधु के घर पर थे. गोयल साहब बाहर ही खड़े थे. लग रहा था कि जैसे उन्हें दिनेश का ही इंतजार था. अंजलि और दिनेश के नमस्ते का जवाब दे कर वे फौरन दिनेश से लिपट गए, ‘‘वाह बेटा, तुम ने कमाल कर दिया. मु झे नाज है तुम पर,’’ गोयल साहब खुश हो गए.

‘‘अंकल, यह कमाल मेरा नहीं, बल्कि मधु का है. मधु कहां है अंकल?’’ दिनेश ने बड़प्पन दिखाते हुए पूछा. ‘‘अंदर है, जाओ मिल लो. बेटी आप भी जाइए,’’ गोयल साहब अंजलि की ओर मुखातिब हो कर बोले. ‘‘नहीं अंकल, मैं यहीं ठीक हूं.’’

दिनेश अंदर चला गया. आसमान में घटाएं घिरी हुई थीं, उसी समय बादलों में कालापन और बढ़ गया. धीमीधीमी हवा बह रही थी. मौसम का तापमान नीचे गिर रहा था. लगता था, बादल कुछ ही देर में  झमा झम बरसेंगे. दिनेश ने मधु को देखा. वह अलग सी लग रही थी, बहुत खुश और बहुत प्यारी.

‘‘गुड, वैलडन, तुम ने कमाल कर दिया.’’ ‘‘सर, यह सब आप की मेहनत से हुआ है. मैं ने कुछ नहीं किया.’’

‘‘चलो, जो भी हो, लेकिन फाइनल ईयर में मु झे और भी अच्छे नंबर चाहिए.’’ ‘‘मिलेंग सर, आप को पार्टी देनी होगी.’’

‘‘वह क्यों?’’ ‘‘यह लीजिए, जनाब, आप इतने अच्छे नंबर लाए हैं कि इतिहास रच दिया है, इसलिए पार्टी चाहिए,’’ मधु ने नखरा दिखाते हुए घूरती नजरों से देखा.

‘‘जब कहोगी, तब मिलेगी,’’ तभी बाहर जोर की बिजली चमकी और बारिश शुरू हो गई. बारिश तेज थी. बारिश की बूंदों को आंगन में देखते ही मधु की आंखें चमक उठीं.

‘‘चलिए, आइए, बारिश में भीगते हैं,’’ मधु ने चंचलता से कहा. ‘‘नहीं, मैं नहीं…’’ दिनेश का कहना था कि मधु बारिश में भीगने जा चुकी थी और आंगन के बीच में खड़ी हो कर खुद को बारिश के पानी से भिगो रही थी.

अपना चेहरा आसमान की ओर कर के उस ने अपनी आंखें बंद कर लीं. बड़ी मासूम सी लगती थी वह. धीरेधीरे उस का सारा शरीर भीग रहा था और कपड़े भीग कर उस के शरीर के आकार को स्पष्ट कर रहे थे. बड़ी मोहनी सी लग रही थी वह और दिनेश जाने किन खयालों में खोया हुआ उसे टकटकी बांध कर देखे जा रहा था.

मधु की नजर भी दिनेश के चेहरे पर पड़ी. दिनेश को अपनी ओर देखता देख वह भी दिनेश की आंखों में खो गई. दोनों के दिलों में प्यार का सैलाब उमड़ रहा था, पर न जाने कौन सी ताकत थी, जो उन्हें रोके हुए थी.

मधु ने अपने दोनों हाथ फैलाए और दिनेश को पानी में आने का न्यौता दिया. दिनेश सुधबुध खोया सा भीगने के लिए पानी में पहुंच गया. कुछ ही देर में वह भी पानी में भीग चुका था और मधु के सामने खड़ा था.

मधु एक कदम आगे बढ़ी और बिना देरी किए दिनेश के होंठों को चूम लिया. दिनेश का सम्मोहन  झटके के साथ टूट गया. उसे लगा, जैसे उस के होंठों पर किसी ने सुलगते अंगारे रख दिए हों. मधु बड़ी मासुमियत से घुटनों पर बैठ गई.

‘‘दिनेश, मैं तुम से बहुत प्यार करती हूं. तुम्हारे लिए अपनी जान भी दे सकती हूं. क्या तुम मु झ से प्यार करते हो?’’ ‘‘मैं भी आप को बहुत पसंद करता हूं, पर आप हमारे रिश्ते को जानती हैं.’’ यह सुन कर मधु की आंखों में आंसू भर गए.

‘‘देखो, मैं इंतजार करूंगी और कुछ भी चोरीछिपे नहीं करूंगी. क्या तुम मेरा इंतजार करोगे?’’ इतना कह कर वह दिनेश की तरफ आशा भरी नजरों से देखने लगी.

दिनेश कुछ देर शांत रहा, फिर उस के मुंह से बोल फूट पड़े, ‘‘मैं तब तक तुम्हारा इंतजार कर सकता हूं, जब तक या तो तुम न मिल जाओ या तुम खुद न मना करो,’’ दिनेश जब आखिरी शब्द कह रहा था, उसी समय प्रिया वहां आ गई.

‘‘अरे, आग तो दोनों तरफ बराबर लगी हुई है.’’ ‘‘वो… वो…’’ दिनेश  झेंप गया. ‘‘दीदी, तुम ने मेरा पत्ता काट दिया,’’ प्रिया ने मजाक किया. ‘‘हां, तेरा पत्ता कट गया,’’ कहने के साथ ही मधु हंस पड़ी.

‘‘चलो, अब दोनों भीगते ही रहोगे या अंदर भी आओगे,’’ प्रिया ने कहा. ‘‘नहीं, अभी मत जाना. थोड़ी देर मेरे सामने यों ही खड़े रहो,’’ मधु की आवाज में मादकता थी. ‘‘अरे बाबा, अब आ भी जाओ. पापा आ जाएंगे,’’ प्रिया ने सम झदारी दिखाई.

दिनेश बारिश से हटते हुए बोला, ‘‘देखो मधु, मैं ने तुम्हारी जिम्मेदारी ली है. आप के पापा को आप से बहुत उम्मीदें हैं और मु झ पर बहुत भरोसा है. मैं उसे तोड़ नहीं सकता…’’

मधु बीच में बोली, ‘‘मैं सम झी नहीं.’’ प्रिया इन बातों को ध्यान से सुन रही थी.

‘‘जब तक आप की ग्रेजुएशन पूरी नहीं हो जाती, मैं तुम्हारे लिए सिर्फ तुम्हारा टीचर और तुम मेरे लिए सिर्फ स्टूडैंट हो,’’ दिनेश गंभीर हो कर बोला.

‘‘ठीक है, पर उस के बाद तो आप पापा से बात करेंगे न?’’ मधु ने प्यार से पूछा. ‘‘हां, जरूर बात करूंगा,’’ दिनेश ने आश्वासन दिया. ‘‘कसम से.’’ ‘‘हां, कसम से.’’ ‘‘हैलो लैलामजनूं, अब चलो भी,’’ प्रिया ने फिर मस्ती की.

बारिश के धीमे होते ही स्मिता मिठाई लाने के लिए घर से निकल पड़ी. रामदीन को भरोसा था कि दिनेश शानदार नंबर लाएगा, इसलिए बिना रिजल्ट देखे ही उस ने स्मिता को मिठाई लाने के लिए भेज दिया.

स्मिता घर से थोड़ी दूर ही गई थी कि एक कार आ कर बगल में रुकी. बिजली की फुरती से राजू ड्राइविंग सीट से उतर कर दूसरी तरफ का दरवाजा खोल कर बोला, ‘‘स्मिताजी, बैठिए. बताइए, आप को कहां जाना है?’’

स्मिता को देखते ही राजू खुश हो जाता था. मौसम ऐसा था कि स्मिता का दिल भी राजू से लिपटने को कर रहा था. पर हाय रे मजबूरी, जिस को इतना चाहती थी, उस से प्यार का इजहार भी नहीं कर सकती.

‘‘कहां खो गईं? बैठिए न,’’ राजू ने स्मिता की सोच के तार को तोड़ते हुए कहा. ‘‘सौरी,’’ कह कर स्मिता गाड़ी में बैठ गई.

स्मिता 4 किलो लड्डू ले कर वापस आई और राजू की गाड़ी में बैठ कर वापस चल दी. राजू चोरीचोरी स्मिता को निहार रहा था. स्मिता का भी कुछ यही हाल था. एक बार अचानक दोनों की नजरें टकरा गईं और दोनों सकपका गए. आगे स्मिता ने ध्यान दिया कि राजू चोरी से उसे देख तो रहा था. घर से कुछ ही दूर स्मिता गाड़ी से उतर गई. राजू देर तक उसे मुसकराते हुए देखता रहा और फिर वापस चल दिया.

स्मिता आगे बढ़ी तो उसे सरोज दिखा. वह घबरा गई. उस ने पीछे मुड़ कर देखा, तो राजू जा चुका था. सरोज उसी की तरफ आ रहा था.

‘‘क्या मजाक है,’’ सरोज ने कहा. ‘‘तुम मेरे पीछे क्यों पड़े हो?’’ स्मिता गुस्से में बोली.

‘‘देख, ज्यादा सतीसावित्री बनने की कोशिश मत कर.’’ ‘‘देखो, प्लीज मु झे परेशान मत करो.’’

‘‘मैं अमित से मिला था. उस के पास तुम्हारे कुछ फोटो भी हैं.’’ ‘‘क्या…?’’

‘‘वह तो डरपोक है, पर मैं जरूर तुम्हें फंसा दूंगा.’’ ‘‘क्या बकवास करते हो?’’

‘‘बकवास नहीं, सच बोल रहा हूं,’’ सरोज की आंखों में चमक थी. स्मिता कुछ बोल नहीं पाई. सरोज ने मौके को ताड़ा और आगे कहा, ‘‘देखो, तुम्हें फोटो और नेगेटिव दोनों मिल जाएंगे, बस एक बार…’’ ‘‘नहीं,’’ स्मिता सहमी सी बोली.

‘‘आज मौसम बहुत सुहावना है. हलकीहलकी बारिश भी है. बाग वाली  झाड़ी में आ जाओ. मैं और अमित वहीं पर तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं. तुम अगर नहीं आई तो तुम्हारा क्या होगा, यह तुम अच्छी तरह जानती हो,’’ इतना कह कर सरोज चलता बना. स्मिता भी धीमेधीमे कदमों से घर की तरफ बढ़ी.

मधु के घर से निकल कर अंजलि और दिनेश घर जाने के लिए चल पड़े. रास्ते में अंजलि ने गाड़ी दूसरी तरफ मोड़ दी. दिनेश बोल पड़ा, ‘‘क्या हुआ… इधर कहां?’’

‘‘सामने वाले बाग में…’’ ‘‘क्यों?’’ दिनेश थोड़ा सोच कर बोला. ‘‘मौसम कितना सुहावना है. पार्क में बहुत अच्छा लगेगा,’’ अंजलि बोली.

‘‘अरे यार, बारिश हो रही है,’’ दिनेश ने कहा. ‘‘तुम भी तो पूरा भीगे हुए हो. मु झे भी थोड़ा भीगना है.’’

‘‘सभी एकजैसी हैं…’’ दिनेश मधु के बारे में सोचते हुए बोला. ‘‘क्या कहा?’’ अंजलि सम झ नहीं पाई.

‘‘कुछ नहीं,’’ तब तक कार पार्क के सामने खड़ी थी. पार्क के अंदर पहुंच कर अंजलि ने बैठने की जगह खोजते हुए कहा, ‘‘चलो, उस पत्थर पर बैठते हैं.’’ ‘‘चलो.’’

अंजलि आज इस रिम िझम बारिश में अपने प्यार का इजहार करना चाहती थी, पर वह डर रही थी. फिर भी वह बड़ी हिम्मत कर के बोली, ‘‘दिनेश, मु झे तुम से एक बात कहनी है.’’

‘‘बोलो, म झे तो ठंड लग रही है.’’ ‘‘आई लव यू.’’ ‘‘क्या…’’ दिनेश का दिमाग चकरा गया. ‘‘मैं तुम से प्यार करती हूं.’’ दिनेश चुप रहा, अंजलि फिर बोली, ‘‘तुम मेरी बात सुन रहे हो कि नहीं?’’

‘‘सुन रहा हूं.’’ ‘‘तो जवाब दो कि तुम मेरे बारे में क्या सोचते हो?’’ ‘‘मैं तुम से प्यार नहीं करता.’’ ‘‘तुम ऐसे नहीं कह सकते,’’ अंजलि की आवाज डूबने लगी.

‘‘मैं मधु से प्यार करता हूं. वह भी मु झ से प्यार करती है. पढ़ाई खत्म होने के बाद हम शादी कर लेंगे. मैं और आप सिर्फ अच्छे दोस्त रह सकते हैं,’’ दिनेश एक सांस में ही सारी बात कह गया.

अंजलि के सारे सपने टूट गए, फिर भी कुछ सोच कर वह बोली, ‘‘ठीक है, तुम मु झ से प्यार नहीं करते, मैं तुम से प्यार करती हूं और करती रहूंगी. मैं तुम्हारा इंतजार करूंगी. अपनी जिंदगी को इस हद तक खाली कर दूंगी कि तुम इस खालीपन को भरने जरूर आओगे,’’ इतना कहने के साथ ही उस की आवाज बैठ गई. दोनों के बीच गहरी खामोशी छा गई.

सरोज के पिता शर्माजी और पड़ोस के गुप्ताजी शायद इस मौसम का मजा लेने के लिए बाग में आने वाले तीसरे और चौथे शख्स थे. उसी बाग में गुमसुम दिनेश और अंजलि भी बैठे थे. शर्माजी और गुप्ताजी इधरउधर की बातें करते हुए बाग के किनारेकिनारे चले जा रहे थे. चलतेचलते शर्माजी ने  झाडि़यों पर नजर डाल कर कहा, ‘‘लगता है, उधर कोई जानवर है.’’

‘‘सांप भी हो सकता है,’’ गुप्ताजी ने कहा. ‘‘मु झे तो कुत्ता वगैरह लगता है,’’ शर्माजी बोले.

‘‘आप की सोच गलत है… वह सांप ही होगा.’’ ‘‘क्या बात करते हैं…’’ शर्माजी की आवाज में जिद का भाव था.

‘‘लगी शर्त…’’ गुप्ताजी ताव में आ गए. ‘‘लगी… लेकिन धीरेधीरे पैर दबा कर आएं, नहीं तो कुत्ता भाग भी सकता है,’’ शर्माजी ने सलाह दी.

और दोनों दबे पांव  झाड़ी के उस तरफ चल पड़े, जिधर हलचल थी. वहां पहुंचते ही शर्माजी के चेहरे की हवाइयां उड़ गईं. गुप्ताजी ने शर्म से आंखें नींचे कर लीं. इन  झाडि़यों के पीछे शर्माजी ने देखा कि उन का लड़का सरोज, पड़ोस का लड़का अमित और रामदीन की बेटी स्मिता थे. सरोज और अमित की हालत भी खराब हो गई. स्मिता सूखे पत्ते की तरह कांप रही थी. उन्होंने जल्दीजल्दी कपड़े समेटे.

शर्माजी गुस्से के मारे थरथर कांप रहे थे. उन्होेंन सरोज को कौलर पकड़ कर  झाड़ी से बाहर निकाला और बेतहाशा मारना शुरू किया. शुरू में तो सरोज चुपचाप बरदाश्त करता रहा, पर बाद में जब ज्यादा चोट लगने लगी, तो उस ने रोना शुरू कर दिया.

दिनेश और अंजलि, जो खामोशी के आगोश में थे, रोने की आवाज सुन कर तुरंत उस तरफ दौड़ पड़े.

दिनेश को वहां पहुंचता देख शर्माजी आगबबूला हो गए और सरोज को छोड़ वे दिनेश से मुखातिब हुए, ‘‘अपनी घटिया बहिन को काबू में रख…’’

दिनेश ने शर्मा का कालर पकड़ लिया, ‘‘क्या बोला…’’ ‘‘बदजात महल्ले के लड़कों के साथ रंगरलियां मनाती फिरती है.’’

दिनेश को मामला कुछकुछ सम झ में आ रहा था. उस ने स्मिता की ओर देखा. वह चुप थी और उस की आंखों से आंसू गिर रहे थे.

‘‘हां पापा, यह रोज गंदेगंदे इशारे करती थी. मु झ से भी गलती हो गई,’’ सरोज ने भी मौके का फायदा उठाया.

दिनेश को जितना सम झ में आया, उस के आने वाले अंजाम से डर गया. वह घिघियाते हुए बोला, ‘‘देखिए, यह बहिन है मेरी. इस की जिंदगी खराब हो जाएगी. प्लीज, मेरी आप से प्रार्थना…’’

शर्माजी ने बात को बीच में काटते हुए कहा, ‘‘नहीं, तुम ने अभी मेरा कौलर पकड़ा था न, अब तमाशा देख,’’ इतना कहते ही वह सरोज को घसीटते हुए कालोनी की तरफ बढ़ा.

अंजलि ने बड़ी मुश्किल से सहारा दे कर दिनेश और स्मिता को कार में बिठाया और उस ने भी रामदीन के घर का रुख किया.

वही हुआ, जिस का डर था. शर्माजी ने अपने लड़के को बेकुसूर साबित करने के लिए पूरी कालोनी के सामने चीखचीख कर स्मिता को बदलचन साबित कर दिया.

अंजलि, स्मिता और दिनेश चुपचाप खड़े हो कर तमाशा देख रहे थे. कुछ मिनटों में कुछ लोगों ने स्मिता की ओर देख कर थूक भी दिया.

बारिश थम चुकी थी, धूप भी खिल कर निकल आई थी. रामदीन का पूरा परिवार गुमसुम बैठा था. धीरेधीरे सारी भीड़ छंट गई. सभी के जाने के बाद रामदीन घर के अंदर जा कर मिठाई के वे पैकेट ले आया, जो कुछ घंटे पहले स्मिता ले कर आई थी.

रामदीन अंजलि की ओर देख कर बोला ‘‘बेटी, अरे नहीं, अब तो मैं किसी को बेटी कहने के लायक भी नहीं बचा हूं.’’

‘‘जी अंकल, कहिए…’’ ‘‘अंजलि, मिठाई के ये डब्बे घर जाते समय रास्ते में कहीं फेंक देना?’’ ‘‘पर अंकल…’’

‘‘बहुत देर हो गई है, तुम घर जाओ,’’ कह कर रामदीन ने मिठाई के डब्बे अंजलि को पकड़ा दिए. अंजलि को कुछ सम झ में नहीं आया और वह वहां से चली गई.

रामदीन ने स्मिता की तरफ देखा, जिस की आंखें रोतेरोते सूज गई थीं. रामदीन बोला, ‘‘देखो स्मिता, मैं जो कह रहा हूं, उसे ध्यान से सुनना,’’ स्मिता समेत सभी का ध्यान रामदीन की ओर गया.

रामदीन ने कहना शुरू किया, ‘‘तुम मेरे घर से निकल जाओ, तुम कहां जाओगी, क्या करोगी, इस से मु झे कोई मतलब नहीं है. बेहतर यह होगा कि तुम जा कर किसी कोठे पर बैठ जाओ.’’ ‘‘पापा…’’ दिनेश के दिल में टीस सी उठी.

‘‘कोई बीच में नहीं बोलेगा. हां, तो मैं कह रहा था कि तुम्हारा कोठे पर बैठना अच्छा रहेगा, क्योंकि इस से तुम्हारा पेट भी पल जाएगा. पर ऐसा करने से पहले तू यह शहर छोड़ देना. हम सब का प्यार पा कर तू ने घर की इज्जत खूब बढ़ाई है, अब इसे में और बरकत मत देना.

‘‘एक और रास्ता है, खुदखुशी कर लेना. पर वह तेरे बस की बात नहीं है. सब से अहम बात, तेरे घर से जाने के बाद मेरा दिल कभी पसीजेगा, यह उम्मीद छोड़ देना. इस परिवार का कोई सदस्य अगर तुम से मिलने या ढूंढ़ने की कोशिश करेगा, तो मेरा मरा मुंह देखेगा. अगले 10 मिनट तक कोई कुछ नहीं बोलेगा.’’

रामदीन स्मिता के पास गया. पहले उस के सिर पर प्यार भरा हाथ फेरा, फिर अगले ही पल उस ने स्मिता की कलाई पकड़ी और उसे तकरीबन घसीटते हुए दरवाजे पर ले गया.

स्मिता के चेहरे पर दर्द के ऐसे भाव थे कि कोई भी रो पड़ता. स्मिता घर की चौखट को पकड़ कर कुछ यों संघर्ष कर रही थी, जैसे कह रही थी कि मु झे माफ कर दो. मु झे अपने से अलग मत करो. पर रामदीन एक बेरहम इनसान की तरह उसे धक्का देने में कामयाब रहा, स्मिता के हाथ से दरवाजे की पकड़ छूट गई, और वह दूर जा कर गिरी. रामदीन के घर का दरवाजा स्मिता के लिए हमेशाहमेशा के लिए बंद हो गया.

लुटीपिटी स्मिता न जाने किधर जा रही थी, उसे खुद नहीं मालूम. आखिर पापा ने शहर छोड़ने के लिए कहा था.

दिनेश घर से बाहर निकला, तो रामदीन ने खास हिदायत दी कि वह स्मिता को खोजने की कोशिश न करे. दिनेश काफी परेशान था. उसे लगा कि शायद मधु से मिलने पर उसे थोड़ी राहत मिलेगी. वह गोयल साहब के घर पहुंचा. गोयल साहब बाहर ही मिल गए.

‘‘यहीं रुको,’’ गोयल साहब बोले. ‘‘जी, मैं कुछ सम झा नहीं,’’ दिनेश ने कहा.

‘‘मैं अभी आया.’’ थोड़ी देर बाद गोयल साहब वापस आए और कुछ रुपए दिनेश की तरफ बढ़ाए.

‘‘यह क्या है सर?’’ ‘‘ये 55 सौ रुपए हैं, तुम ने माधुरी का 11 महीने पढ़ाया था, उस की फीस.’’

‘‘पर सर, इस की क्या जरूरत…’’ ‘‘जरूरत है, अब तुम जा सकते हो.’’

‘‘सर, मैं अभी से मधु को फाइनल ईयर के लिए…’’ ‘‘पर, अब तुम्हें यहां आने की कोई जरूरत नहीं है.’’

‘‘पर क्यों?’’ ‘‘देखो, मैं 2 बेटियों का बाप हूं, तुम्हारे यहां आने से वे बदनाम हो जाएंगी.’’

‘‘यह क्या तमाशा है,’’ अब की बार दिनेश की आवाज में गुस्सा था. ‘‘देखो, मु झे सबकुछ पता चल चुका है. तमाशा तुम कर रहे हो.’’

‘‘सर, मैं मधु से प्यार करता हूं. आप ऐसा नहीं कर सकते,’’ दिनेश का इतना बोलना था कि गोयल साहब ने उसे एक थप्पड़ रसीद कर दिया. मधु, जो अब तक परदे के पीछे खड़ी हो कर सबकुछ सुन रही थी, वह गुस्से में दनदनाते हुए बाहर निकली, ‘‘पापा, यह क्या बात हुई?’’

‘‘मधु तुम अंदर जाओ.’’ ‘‘पापा, मैं दिनेश से प्यार करती हूं.’’

अब की बार का थप्पड़ माधुरी को लगा था, जो इस के साथ ही सहम गई थी. दिनेश भावुक हो गया और बोला, ‘‘मधु या तो मेरे पास चले आना या मना कर देना, अपने वाले के मुताबिक मैं इंतजार करूंगा. और हां, फाइनल ईयर में शानदार रिजल्ट चाहिए मु झे,’’ दिनेश ने गोयल साब की ओर देख कहा, ‘‘सर, आप की वजह से मेरा एडमिशन हो पाया था, मैं ने इस एहसान को उतारने के लिए जीजान से मेहनत की, पर आज आप ने रहीसही कसर पूरी कर दी.’’

‘‘गेट आउट,’’ गोयल की आवाज में रोब था. दिनेश निराश सा वापस जा रहा था. सहारे की तलाश में दिनेश यहां आया था और खुद रुसवा हो कर जा रहा था.

स्मिता बेहोश हो कर गिर पड़ी. पिछले 6 घंटों से वह लगातार चल रही थी. शाम को राजू को सारी घटना एक पान वाले से पता चली थी. वह स्मिता को ढूंढ़ने चल दिया. स्मिता बेहोश पड़ी थी और 3-4 लोग उसे घेरे सोच रहे थे कि इस का क्या किया जाए, अस्पताल ले जाना जरूरी है, पर यह जिम्मेदारी उठाए कौन. तभी वहां राजू पहुंच गया.

स्मिता की हालत देख कर राजू की आंखें भर आईं. उस का इलाज करा कर वह उसे अपने घर ले आया. थोड़ी देर बाद स्मिता को होश आया.

‘‘राजू…’’ ‘‘हां, चुपचाप लेटी रहो, उठने की कोई जरूरत नहीं है.’’

‘‘मैं कहां हूं?’’ स्मिता ने घर को देख कर कहा. ‘‘यह मेरा घर है… यह हमारा घर है…’’

‘‘नहीं राजू, मैं इस घर में रहने लायक…’’ ‘‘चुप, अब जरा भी बोली, तो जीभ काट लूंगा,’’ राजू ने स्मिता को हंसाने की कोशिश की.

‘‘मैं तुम्हें अपने बारे में सबकुछ बताना चाहती हूं,’’ स्मिता ने राजू की तरफ देखते हुए कहा. ‘‘अभी नहीं, बाद में.’’

‘‘नहीं राजू, अभी सुनो.’’ स्मिता ने अपनी जिंदगी के एकएक पन्ने राजू के सामने खोल कर रख दिए.

‘‘मु झ इस शहर से बाहर जाना है,’’ स्मिता की कहानी का आखिरी वाक्य था.

‘‘ठीक है, कल मैं बैंक में जो थोड़ाबहुत पैसा जमा है, निकाल लेता हूं.’’ ‘‘किसलिए?’’ स्मिता ने टोका.

‘‘अरे यार, उस के बाद कुछ सामान बेचना होगा, और सब हिसाबकिताब भी रफादफा करना होगा,’’ ठीक उसी समय स्मिता ने राजू की बात काटी, ‘‘शहर मु झे छोड़ कर जाना है, तुम्हें नहीं.’’

‘‘बनारस में मेरे कुछ जानने वाले हैं. वहां जिंदगी आराम से कट जाएगी. अगर कल निकलना है तो, काम अभी से शुरू करना होगा.’’ स्मिता इस बार थोड़ा गुस्से में बोली, ‘‘तुम क्यों महात्मा बनने की कोशिश कर रहे हो, तुम ने मेरी जान बचाई….शुक्रिया, अब जाने दो.’’

‘‘अब तुम मेरे साथ ही रहोगी,’’ राजू बोला. ‘‘क्यों?’’ स्मिता बोली.

‘‘क्योंकि मैं तुम से प्यार करता हूं और तुम से शादी करना चाहता हूं. तुम्हें कोई तकलीफ नहीं दे सकता हूं,’’ राजू हिचकिचाते हुए बोला.

‘‘राजू, तुम मेरे बारे में सबकुछ जानते हो, मैं तुम्हारे लायक…’’ ‘‘तुम मु झ से प्यार करती हो या नहीं?’’ राजू ने स्मिता का सिर अपनी गोद में रखते हुए पूछा.

‘‘मैं तुम्हारी जिंदगी नरक नहीं बनाना चाहती,’’ स्मिता की आवाज सिसक रही थी. ‘‘तुम मु झ से प्यार करती हो कि नहीं?’’ राजू ने अपना सवाल फिर से दोहराया. ‘‘बाद में… तुम्हें…’’ पर स्मिता बोल नहीं पाई.

‘‘तुम मु झ से प्यार करती हो…’’ राजू ने इतना कहा ही था कि स्मिता राजू से लिपटते हुए बोली, ‘‘मैं तुम्हें बहुत प्यार करती हूं. अपनी जान से भी ज्यादा चाहती हूं तुम्हें.’’

‘‘देखो, जो बीत गया वो बीत गया. मैं चोर था या तुम से कुछ गलतियां हुईं. हम एक शराफत और मेहनत की जिंदगी शुरू करेंगे. भागना क्यों है, मुकाबला करेंगे. आओ, मेरी गोद में सिर रख कर सो जाओ. कल सुबह बनारस जाने की तैयारी भी तो करनी है.’’

एक साल बीत गया. इस बीच रामदीन और प्रमिला दोनों पूरी तरह से स्मिता को भूल गए थे और रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने में लगे थे. आज फिर रिजल्ट आया, पर इस बार दिनेश ने कोई रिकार्ड वगैरह ब्रेक नहीं किया, पर अभी भी उस के नंबर सब से ज्यादा थे.

दिनेश का यह साल गुमसुम सा निकल गया. वह अपनेआप में खोया रहने वाला एक लड़का बन गया था. अंजलि और मधु दोनों उस की जिंदगी में नहीं थीं. मन बेचारा मानता ही नहीं था. दिनेश ने कई बार गोयल साहब को सम झाने की कोशिश की, पर बदले में जिल्लत के सिवाय कुछ नहीं मिला. अब मधु भी काफी कमजोर दिखाई देती थी.

स्मिता खुश थी. वह एक आदर्श बीवी की भूमिका बखूबी निभा रही थी. बनारस आने के 2 दिनों बाद ही राजू और स्मिता एकदूसरे के हो गए थे. स्मिता के दिमाग में बस यही चलता रहता कि कैसे वह राजू के लिए अच्छा कर सकती है.

यही हाल राजू का था. वह स्मिता को दुनिया की तमाम खुशियां देना चाहता था. अब उस के पास 2 गाडि़यां थीं. एक गाड़ी वह खुद चलाता था, दूसरी गाड़ी उस ने भाड़े पर दे रखी थी.

सरोज और अमित ने सारे उलटेसीधे काम बंद कर दिए थे, वैसे अभी भी शर्मा और रामदीन में बोलचाल नहीं थी.

मधु ने कई बार अपने पापा को सम झाने की कोशिश की, पर कोई असर नहीं पड़ा. मधु को गोयल साहब से काफी खरीखोटी सुननी पड़ती थी. मधु हमेशा मायूस रहती थी, प्रिया भी उस की हालत देख कर रो पड़ती थी. इस बार मधु सभी सबजैक्टों में फेल थी.

अंजलि की जितनी तारीफ की जाए, कम है. उस ने पिछले एक साल में एक सच्चे दोस्त का फर्ज अच्छी तरह से निभाया. दिनेश को जब सब से ज्यादा किसी की जरूरत थी, तब अंजलि उस के साथ थी. उस ने अपने असफल प्यार के बारे में अपने मम्मीपापा को सबकुछ बता रखा था.

आज फिर अंजलि ने गाड़ी का रुख उसी बाग की ओर कर दिया. दिनेश ने पूछा, ‘‘उधर क्यों जा रही हो?’’

‘‘मु झे तुम से कुछ बात करनी है,’’ अंजलि ने कहा. ‘‘ठीक है, चलो.’’

दरअसल, अब दिनेश का अंजलि के प्रति रवैया बहुत बदल गया था. उसे मालूम था कि आज की तारीख में अगर कोई उस की रगरग से वाकिफ है, तो वह अंजलि ही है.

‘‘बैठो, यह वही पत्थर है.’’ ‘‘पहचान रहा हूं.’’

‘‘मैं आज फिर वही फरियाद ले कर आई हूं, दिनेश. मैं कम से कम तुम्हारी जिंदगी में इतनी अहमियत तो जरूर रखती हूं कि मेरे बिना…’’ अंजलि की बातों का सिलसिला दिनेश ने तोड़ा.

‘‘मैं जानता हूं अंजलि. तुम कहती हो कि मेरे बिना फर्क नहीं पड़ेगा, तुम्हारे बगैर शायद मैं आगे की जिंदगी भी न काट पाऊं, पर…’’ दिनेश के सामने मधु का चेहरा घूमने लगा.

‘‘मैं तुम्हारा प्यार नहीं छीनना चाहती, पर अगर यह वाकई सच्चा प्यार था, तो उस ने तुम्हें रुसवा होने के लिए क्यों छोड़ दिया? उसे तुम्हारे पास आना था, फिर देखते, कैसे लड़ते दुनिया से तुम. मैं देती तुम्हारा साथ.’’

‘‘पर सिर्फ वही एक वजह नहीं है. अंजलि, मैं और तुम ठीक उसी तरह से हैं, जैसे  झोंपड़ी और महल. इस का फर्क एक खाई की तरह है, जिस को मैं पाट नहीं पाऊंगा.’’

‘‘अपने दिल से पूछ कर देखो कि इन पिछले 2 सालों में तुम ने कभी महसूस किया हो हमारे बीच में एक खाई है?’’ अंजलि की बात सुन कर दिनेश वाकई लाजवाब हो चुका था.

‘‘आई लव यू दिनेश, तुम ने बहुत रुसवाई देखी है. मु झे रुसवा मत करना.’’

दिनेश कुछ देर चुप रहा, चेहरे पर कई भाव आए और गए. फिर दोनों हाथ फैला कर बोले, ‘‘मेरी होने वाली बीवी मु झ से इतनी दूर क्यों है?’’

कुछ दिनों में ही अंजलि और दिनेश की शादी तय हो गई. शादी की सारी तैयारियां हो गई थीं.

आज शाम को ही दिनेश और अंजलि की शादी थी. दिन के तकरीबन एक बजे अंजलि अपने पापा के पास गई.

‘‘पापा, एक बहुत ही जरूरी काम है. मु झे बाहर जाना है.’’ ‘‘कहां बेटी? तेरी शादी है आज,’’ अंजलि के पापा कोमल सिंह ने सम झाते हुए कहा.

‘‘पापा प्लीज.’’ ‘‘ठीक है, संभाल कर. जल्दी आना.’’ ‘‘जी, पापा.’’

अंजलि ने काफी पूछताछ करने के बाद पता कर लिया था कि स्मिता और राजू बनारस में रहते हैं. बनारस में उन का पता भी राजू के दोस्त से चल गया था. उस दोस्त ने ही बताया था कि दोनों ने शादी कर ली है और स्मिता पेट से है.

अंजलि चाहती थी कि स्मिता को उस के परिवार का प्यार वापस किया जाए. क्योंकि यह दिनेश की सब से बड़ी इच्छा थी, पर वह पिता को दिए वादे की वजह से मजबूर था. अंजलि बनारस के लिए निकल चुकी थी.

राजू टैक्सी स्टैंड पर अपनी गाड़ी मैं बैठा था. उसी समय एक लड़की सब से नजरें छुपाती उस की कार का दरवाजा खोल कर पीछे बैठ गई. वह मधु थी. गोयल साहब ने अपना ट्रांसफर बनारस करवा लिया था. आज मधु और प्रिया में काफी बहस हुई थी. देखते ही देखते मधु के दिमाग में चल रहे कई दिनों की लड़ाई ने एक फैसले का रूप ले लिया. मधु घर से भाग गई.

‘‘भैया, इलाहाबाद चलना है.’’ ‘‘पर मैडम, लेट हो सकता है. आप दूसरी टैक्सी देख लें. मेरी बीवी इंतजार कर रही होगी.’’

‘‘प्लीज, अब ज्यादा देर मत कीजिए. वैसे भी मैं ने बहुत देर कर दी है,’’ मधु की परेशानी देखने लायक थी.

‘‘मैडम, लगता है, दिल का मामला है.’’ ‘‘जी.’’

‘‘चलिए,’’ कहते ही राजू ने कार गियर में डाल दी. तकरीबन आधा घंटा बीत गया. गाड़ी सरपट दौड़ रही थी. तभी राजू का मोबाइल बज उठा. मोबाइल पर मधु राजू की बातें सुन रही थी.

‘‘अरे जान, क्या हुआ?’’ ‘‘भाभी, मैं सम झा नहीं…’’

‘‘अच्छाअच्छा, पर वहां कोई तमाशा हो गया, तो…’’ ‘‘नहीं, मैं तुम्हारे खिलाफ एक शब्द भी नहीं सुन सकता.’’

‘‘अरे, उन को तुम्हारी परवाह होती तो… लो, अब तुम्हारी भाभी से क्या बात करूं.’’

‘‘नमस्ते भाभी.’’ ‘‘पर आप…’’ ‘‘ठीक है, आप हमारी मुमताज को ले कर आइए. मैं तो इलाहाबाद ही जा रहा हूं. वैसे मु झे आना कहां है?’’ ‘‘क्वीन इनक्लेव, ग्रीन स्ट्रीट, रामबाग,’’ राजू ने पता दोहराया.

दोपहर के 4 बजने वाले थे. राजू मधु की ओर देख कर बोला, ‘‘मैं आप से आधा ही किराया लूंगा, क्योंकि मेरी बीवी भी इलाहाबाद जा रही है.’’

मधु ने थोड़ी रुचि ली, ‘‘इलाहाबाद में आप की बीवी का क्या है?’’ राजू ने बताया, ‘‘मायका.’’ मधु हंस दी, ‘‘तो साहब ससुराल जा रहे हैं.’’ राजू बोला, ‘‘साले साहब की शादी है.’’ ‘‘लगता है, शादी एकाएक तय हुई है?’’ ‘‘नहीं मैडम, न्यौता एकाएक मिला है,’’ दोनों हंसने लगे.

राजू के पूछने पर मधु ने जो पता बताया, उस को सुन कर राजू के होश उड़ गए. ‘‘ये तो रामदीन साहब के घर का पता है?’’ ‘‘हां, पर आप को कैसे मालूम…’’ मधु ने थोड़ा चकित हो कर पूछा. ‘‘वही तो मेरी ससुराल है.’’

‘‘आप स्मिता के पति हैं?’’ अब चौंकाने की बारी राजू की थी. ‘‘आप स्मिता को कैसे जानती हैं?’’‘‘मैं मधु…’’ तभी मधु ने देखा कि दिनेश का घर सजा हुआ है.

‘‘यह क्या हो रहा है?’’ मधु ने राजू से पूछा. ‘‘मेरे साले दिनेश की शादी है.’’ ‘‘क्या…’’ मधु की आंखों के सामने अंधेरा छा गया, ‘‘दिनेश की शादी किस से हो रही है?’’ ‘‘अंजलि से…’’

मधु की आंखों से आंसू बह रहे थे, ‘‘मु झे… एक मिनट, कागज का टुकड़ा होगा क्या?’’

राजू ने कागज का टुकड़ा मधु की तरफ बढ़ा दिया. मधु ने उस कागज पर कुछ लिखा और राजू को देते हुए बोली, ‘‘यह दिनेश को दे देना.’’

इतना कह कर वह दरवाजा खोल कर एक तरफ बढ़ गई. राजू की हिम्मत भी नहीं हुई कि उस से अपना भाड़ा मांग ले. राजू अपलक मधु को देखता रहा, जो अपने आंसू पोंछते हुए आगे जा रही थी.

मधु के जाने के बाद राजू ने गाड़ी अंजलि के घर की तरफ मोड़ दी. स्मिता और अंजलि घर के बाहर ही राजू का इंतजार करते मिले.

अंजलि के खास मेहमान होने की वजह से सभी लोग उन से बड़े अदब से पेश आ रहे थे. राजू के लिए यह सब एक सपने जैसा था.

थोड़ी देर में बारात आ गई. दिनेश एक खास तौर से तैयार किए हौल में बैठा था कि एक वेटर बड़ी संजीदगी से पास आ कर बोला, ‘‘साहब, आप को और आप के मम्मीपापा को दुलहन ने ऊपर बुलाया है. बहुत जरूरी काम है.’’ ‘‘ठीक है, आप चलिए, हम आते हैं.’’

रामदीन ने एकबारगी सोचा कि भला अंजलि ने अभी क्यों बुलाया है. पर अंजलि इतनी प्यारी थी कि किसी को कुछ सोचने की जरूरत ही नहीं थी. ऊपर कमरे में अंजलि सब का इंतजार कर रही थी, साथ में उस के मम्मीपापा भी थे.

‘‘हां बेटी, किसलिए बुलाया?’’ रामदीन ने सवाल किया. ‘‘पापा, मुझे आप को किसी से मिलाना था,’’ अंजलि ने प्यार से कहा. ‘‘किस से?’’ दिनेश ने अंजलि की ओर देखते हुए कहा. ‘‘अपने जीजाजी और बहिन से,’’ अंजलि ने दरवाजे की ओर रुख कर के कहा, ‘‘आप लोग प्लीज आइए.’’

स्मिता और राजू ने जैसे ही कदम रखा, रामदीन के पूरे परिवार के होश उड़ गए. दिनेश का दिल किया कि जा कर स्मिता से उस का हालचाल पूछे. प्रमिला देवी तो बस अपनी बेटी से लिपट जाना चाहती थीं, पर सभी जड़वत खड़े रहे.

‘‘पापा…’’ इतना कह कर स्मिता की आंखों से आंसू गिरने लगे. राजू ने स्मिता के दोनों कंधों पर हाथ रख कर सम झाते हुए कहा, ‘‘अरे पगली, रोती क्यों है, आज तेरे सारे अपने तेरे साथ हैं, तु झे तो खुश होना चाहिए.’’

प्रमिला देवी के सब्र का बांध टूट गया और जा कर बेटी से लिपट गईं. दोनों फफक कर खूब रोईं. प्रमिला स्मिता का हाथ पकड़ कर एक तरफ जाने लगीं. उन्होंने स्मिता का पेट देखा और पूछा, ‘‘कितने महीने का है?’’

‘‘एक महीने.’’ ‘‘अरे, वाह, मैं मामा बनने वाला हूं,’’ दिनेश जोश में बोला. ‘‘अबे, नाना मैं बन रहा हूं, क्यों बेटा’’ रामदीन ने स्मिता की ओर देख कर कहा.

रामदीन की यह बात सुन कर सभी का खुश होना लाजिमी था. उस ने हाथ फैला कर बेटी को बुलाया. अगले ही पल स्मिता रामदीन के पास थी.

‘‘मु झे माफ कर दीजिए पापा.’’‘‘मु झे माफ कर दो बेटी, बहुत तकलीफ दी है मैं ने तुम्हें…’’ रामदीन का गला भर आया.

मौका देख कर राजू दिनेश के पास गया, ‘‘यह किसी मधु ने दी है, बहुत तकलीफ में है बेचारी.’’

‘‘क्या…’’ दिनेश ने तुरंत वह चिट्ठी ली और पढ़ने लगा.

‘दिनेश, तुम ने  झूठ बोला था. न मैं ने तुम्हें मना किया था और न ही तुम्हारे पास आई थी, फिर भी तुम ने इंतजार खत्म कर दिया. मैं अब भी तुम से उतना ही प्यार करती हूं, जितना पहले करती थी. आज मैं अपना सबकुछ छोड़ कर तुम्हारे पास आई थी, लेकिन तुम मुझ से बहुत दूर जा चुके हो. अब तक तुम लोगों ने स्मिता को स्वीकार कर लिया होगा. थोड़ी देर में तुम्हारी शादी हो जाएगी. आज का यह अंधेरा तुम्हारे और अंजलि के परिवार या स्मिता के लिए दिन के उजाले से भी ज्यादा रोशन होगा. लेकिन जानेमन, हमारी जिंदगी तो पूरी काली रात बन गई. अब मैं घर नहीं जाऊंगी. तुम से मु झे 2 वादे चाहिए. एक तो तुम मु झे ढूंढ़ने की कोशिश नहीं करोगे. दूसरा, अगर तुम्हारी जिंदगी में बेटी आती है, तो उस का नाम मधु रखना. अपने पिछले वाले कल की तरह इन को मत तोड़ना. अंजलि को मेरी दुआएं देना, जाओ वह तुम्हारा इंतजार कर रही होगी.

तुम्हारी मधु.’

चारों तरफ हंसीखुशी के माहौल से दिनेश भागना चाहता है पर वाकई उस के लिए आज अंधेरे के मायने बदल गए थे.  Hindi Romantic Fiction

-मिथिलेश कुमार सिंह

और कहानियां पढ़ने के लिए क्लिक करें...