Special Story. राहुल और नेहा कालेज में साथ पढ़ते थे. दोनों ने नौकरी लगने के बाद शादी कर ली. राहुल के मातापिता इस शादी के खिलाफ थे, लेकिन बेटे की जिद के आगे झुक गए. शादी के बाद नेहा ससुराल में रहने लगी. मगर वहां हर छोटी बात पर उस की तुलना उस की जेठानी से होने लगी.

दरअसल, राहुल के बड़े भाई की शादी उस के मातापिता की पसंद की लड़की से हुई थी, जो दहेज भी खूब लाई थी. ऐसे में नेहा को अपनी ससुराल में खूब तानेउलाहने मिलने लगे. शादी के बाद नेहा नौकरी पर भी जाती थी, मगर सुबह जल्दी उठ कर उसे जेठानी के साथ पूरे घर का काम खत्म करना होता था और फिर भी वह ढेर सारा तनाव ले कर औफिस पहुंचती थी.

शाम को थकीहारी नेहा घर लौटती तो सास की वही जलीकटी कान में गरम सीसे सी घुसती, ‘‘हम ने तो छोटी बहू लाने के लिए बड़े सपने देखे थे. कितने अच्छेअच्छे रिश्ते आ रहे थे राहुल के लिए. इसे तो कुछ करनाधरना ही नहीं आता. अगर हमारी पसंद की लड़की आती तो ऐसा नहीं होता… अपने घर से क्या लाई है? मुंह उठाए खाली हाथ चली आई. मेरा बेटा तो फंस गया.’’

कुछ सालों बाद हालात इतने खराब हो गए कि राहुल को अलग घर लेना पड़ा. अलग रहने के बाद रोज का टकराव खत्म हो गया. नेहा भी अपने औफिस शांति से जाने लगी.

यह कहानी केवल राहुल और नेहा की नहीं है, बल्कि भारत के ऐसे हजारों जोड़ों की है जिन्होंने लव मैरिज की है.

भारत में प्रेम विवाह आज भी केवल 2 लोगों का नहीं, बल्कि 2 विचारधाराओं का टकराव है. एक ओर नई पीढ़ी है, जो अपने जीवनसाथी का चुनाव खुद करना चाहती है, तो दूसरी ओर पारंपरिक परिवार व्यवस्था है, जो शादी को केवल 2 लोगों का नहीं, बल्कि 2 परिवारों का मिलन मानती है. यही कारण है कि प्रेम विवाह करने वाले हजारों नौजवान शादी के बाद ऐसे तनाव का सामना करते हैं, जिस की उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की होती है.

प्रेम विवाह और बहू पर पहला हमला

भारतीय परिवारों में प्रेम विवाह के बाद सब से ज्यादा दबाव लड़की पर पड़ता है. लड़के के मातापिता और रिश्तेदार अकसर यह मानने को तैयार नहीं होते कि उन के बेटे ने उन की इच्छा के खिलाफ अपनी अपनी पसंद से किसी लड़की को चुना है. वे लड़की को ताना मारते हैं कि इस ने हमारे बेटे को फंसा लिया… दानदहेज तो कुछ लाई नहीं… आवारा है, मेरा लड़का फंस गया…

ये केवल शब्द नहीं होते, बल्कि ये धीरेधीरे लड़की को सताने का रूप ले लेते हैं. लड़की को हर छोटीबड़ी बात पर यह एहसास कराया जाता है कि वह इस परिवार में जबरन घुसी है.

इस का नतीजा यह होता है कि शादी के शुरुआती सालों में ही पतिपत्नी का जीवन तनाव से भरा हो जाता है. कई बार पति अपनी पत्नी और मातापिता के बीच संतुलन नहीं बना पाता है. घर 2 गुटों में बंट जाता है और सब से ज्यादा नुकसान उस लड़की का होता है, जिस ने केवल अपने पसंद के इनसान से शादी करने का हौसला दिखाया था.

जब प्रेम विवाह अपराध जैसा लगे

आज भी देश के अनेक हिस्सों में प्रेम विवाह को परिवार की इज्जत से जोड़ कर देखा जाता है. लड़की या लड़का हर अपनी पसंद से शादी कर ले तो इसे मातापिता की हार सम?ा लिया जाता है. अखबार और टीवी चैनल ऐसे समाचारों से भरे पड़े हैं, जिन में प्रेम विवाह करने वाले जोड़ों को सामाजिक बहिष्कार, धमकियों, हिंसा और यहां तक कि औनर किलिंग का सामना करना पड़ा है. अनेक मामलों में लड़की को ससुराल में लगातार सताया जाता है, क्योंकि उसे परिवार की पसंद के बजाय बेटे की पसंद माना जाता है.

संयुक्त परिवार की असली चुनौती

प्रेम विवाह की ज्यादातर समस्याओं का संबंध केवल प्रेम विवाह से नहीं, बल्कि विवाह के बाद की रहने की व्यवस्था से भी है. भारत में अभी भी बड़ी तादाद में नौजवान शादी के बाद अपने मातापिता के साथ ही रहते हैं. यह व्यवस्था अरेंज मैरिज में तो किसी तरह चल जाती है, क्योंकि दोनों परिवारों की मरजी और रजामंदी उस शादी से जुड़ी होती है, लेकिन प्रेम विवाह में अकसर टकराव रहता है.

पश्चिमी देशों में नहीं होता ऐसा

पश्चिमी देशों में भी परिवार होते हैं, मातापिता होते हैं और पीढि़यों के बीच मतभेद भी होते हैं. लेकिन वहां शादी के बाद एक खास फर्क दिखाई देता है. पश्चिमी देशों में यहां की तरह अपने जवान बच्चों के लिए दूल्हा या दुलहन मातापिता नहीं ढूंढ़ते, बल्कि वहां ज्यादातर प्रेम विवाह ही होते हैं. कालेज में, औफिस में लड़कालड़की एकदूसरे को पसंद कर लेते हैं, डेट करते हैं और बात बन गई तो शादी कर लेते हैं. शादी के बाद ज्यादातर जोड़े अपना घर बसाते हैं. वे अपने मातापिता से प्यार और इज्जत का रिश्ता बनाए रखते हैं, लेकिन उन की रोजमर्रा की घरेलू जिंदगी अलग होती है.

इस व्यवस्था के चलते सासबहू, बहूननद या दामादससुर के बीच होने वाले दैनिक टकराव का डर बहुत कम हो जाता है. नया शादीशुदा जोड़ा अपनी शर्तों पर जिंदगी शुरू करता है और अपने रिश्ते को विकसित होने का समय देता है.

इस का मतलब यह नहीं है कि पश्चिमी समाज में कोई समस्या नहीं है. वहां तलाक की दर ज्यादा है और दूसरी तमाम सामाजिक चुनौतियां भी हैं. लेकिन प्रेम विवाह को ले कर पारिवारिक दुश्मनी काफी कम दिखाई देती है, क्योंकि शादी के बाद निजी आजादी को अहमियत दी जाती है. वहां दहेज हत्याएं नहीं होती हैं, बहू को जला कर नहीं मार डालते हैं, उस को फांसी पर नहीं लटका देते हैं या उसे समाज के सामने बेइज्जत नहीं करते हैं.

अलग रहना है हल

भारतीय संस्कृति में मातापिता से अलग रहने की बात अकसर लालच या काहिली से जोड़ दी जाती है. लेकिन हर  बार ऐसा नहीं होता है. अगर 2 पीढि़यों के विचारों में लगातार टकराव हो रहा हो, अगर घर का माहौल जहरीला बन चुका हो, अगर पतिपत्नी का रिश्ता लगातार दबाव में हो, तो अलग रहना कई बार रिश्तों को बचाने का अच्छा जरीया बन सकता है.

अलग रहने का मतलब मातापिता को छोड़ देना नहीं है. इस का मतलब केवल इतना है कि हर परिवार को अपनी निजता और आजादी मिले. कई परिवारों में देखा गया है कि अलग घर में रहने के बाद बहू और सास के संबंध पहले से बेहतर हो जाते हैं, क्योंकि रोजरोज की दखलअंदाजी खत्म हो जाती है.

कुछ बातों पर गौर कर लें

आज प्रेम विवाह करने वाले नौजवानों के सामने सब से बड़ा मुद्दा केवल प्यार नहीं, बल्कि माली और सामाजिक समस्याओं का भी है, इसलिए शादी से पहले कुछ सवालों पर विचार कर लेना जरूरी है, जैसे :

* क्या लड़का और लड़की दोनों अपने पैरों पर खड़े हैं?

* क्या दोनों नौकरी या किसी कारोबार से अपना घर चला सकते हैं?

* क्या वे किराए का घर लेने या अलग रहने के हालात में हैं?

* क्या वे परिवार के विरोध का मानसिक दबाव झेल सकते हैं?

* क्या वे दोनों एकदूसरे के प्रति इतने प्रतिबद्ध हैं कि मुश्किल समय में साथ खड़े रह सकें?

केवल प्यार की बुनियाद पर लिया गया फैसला कई बार जिंदगी की चुनौतियों के सामने कमजोर पड़ जाता है, इसलिए प्रेम विवाह करने से पहले भावनाओं के साथसाथ माली और सामाजिक तैयारी भी जरूरी है.

मांबाप को भी बदलना होगा

सारी जिम्मेदारी केवल नौजवान पीढ़ी पर नहीं डाली जा सकती है. मातापिता को भी यह सम?ाना होगा कि बच्चे कोई जायदाद नहीं हैं, जिन की जिंदगी के हर फैसले पर उन का आखिरी हक हो. अगर बेटा या बेटी पढ़लिख कर अपने जीवनसाथी का चुनाव करता है, तो उसे अपराध की तरह नहीं देखा जाना चाहिए. जो बहू या दामाद परिवार में आया है, उसे इज्जत मिलनी चाहिए, फिर चाहे शादी लव मैरिज हो या पारंपरिक तरीके से की गई हो.

आखिरकार किसी भी शादी की कामयाबी इस बात से तय नहीं होती कि रिश्ता किस ने तय किया था. उस की कामयाबी इस बात से तय होती है कि उस में प्यार, इज्जत और विश्वास कितना है.

प्रेम विवाह न तो सभी समस्याओं का समाधान है और न ही सभी समस्याओं की जड़. लेकिन एक सच बारबार सामने आता है कि प्रेम विवाह करने वाले अनेक जोड़े पारिवारिक टकराव का सामना करते हैं, खासकर तब जब वे ऐसे घर में रहते हैं जहां उन्हें पूरी स्वीकृति नहीं मिलती है, इसलिए आज के नौजवानों को प्रेम विवाह करने से पहले केवल दिल की नहीं, बल्कि दिमाग की भी सुननी चाहिए. अपनी जेब पर भी नजर डाल लेनी चाहिए.

नएनवेले जोड़े किराए के घर में रह कर भी अपनी नई जिंदगी शुरू कर सकते हैं. रिश्तों की कामयाबी की बुनियाद मकान का मालिक होना नहीं, बल्कि आपसी इज्जत, आर्थिक सम?ादारी और पारिवारिक सहयोग होता है. जब आप किसी तीसरेचौथे शख्स की दखलअंदाजी के बिना एकदूसरे के साथ होते हैं और एकदूसरे को वक्त देते हैं, तो आप का आपसी रिश्ता, जो अभी नयानया बना है, जल्दी ही मजबूत होने लगता है. एकदूसरे पर विश्वास जमता है, जो लंबी और कामयाब शादीशुदा जिंदगी के लिए जरूरी है. आप अलग घर ले कर रहेंगे तो तनाव से दूर रहेंगे. खुश रहेंगे, जिम्मेदार बनेंगे और भविष्य की प्लानिंग बेहतर तरीके से कर पाएंगे. Special Story

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