Editorial. पौराणिक राजाओं की तरह नरेंद्र मोदी भी आजकल चक्रवर्ती राजा बनने के लिए अश्वमेध यज्ञ कर रहे हैं और उन्होंने घोड़े दौड़ा रखे हैं कि जो भी दिल्ली के राजधिराज का विरोध करेगा उसे उन की ईडी, सीबीआई, इलैक्शन कमीशन, सुप्रीम कोर्ट की सेनाओं के सेना प्रमुख तहसनहस कर देंगे. इस दौरान देश में गरीबी फैले तो फैले, भाईभाई में दुश्मनी हो तो हो, पड़ोसी से झगड़ा हो तो हो, रुपया बेताशा गिरे तो गिरे.
जब तक ऋषिमुनियों को पैसा मिल रहा है, उन के आश्रमों के बड़े विशाल मंदिर बन रहे हैं, सब ठीक है. किसान का यूरिया महंगा हो रहा है, कोई फिक्र नहीं. लाखों 18 साल के लड़केलड़कियों को राजधिराज की सरकार के निकम्मेपन की वजह से दोबारा नीट का एग्जाम देना पड़े तो पड़े, विदेशों में मेहनत कर रहे और घरों में कुछ सिक्के भेजने वालों को लौटना पड़े तो पड़े, राज फैलना चाहिए.
लोगों को रामायण, महाभारत और पुराणों की कहानियां इतनी बार सुना दी गई हैं कि उन्हें लगता है कि उसी समय धरती पर स्वर्ग था जबकि रामायण और महाभारत दोनों में हर पन्ने पर अपनों से ही लड़ाई का गुणगान है.
रामायण में कहीं नहीं लिखा कि दानव या राक्षस समुद्र लांघ कर पहाड़ों के दर्रों से आए थे. वे यहीं के थे. वे पड़ोस में रहते थे. वे दिखने में अलग थे. उन की शक्ल अलग सी थी. यही आज हो रहा है. जो तिलक नहीं लगा रहा, जो पूजा नहीं कर रहा, जो मंदिरों में चढ़ावा नहीं चढ़ा रहा, जो गद्दी के बराबर किसी संतमहंत को नहीं बैठा रहा, उस को दुर्वासा के श्राप की तरह भस्म कर दो.
देश की मूर्ख जनता 101 रुपए का चढ़ावा दे कर सम?ाती है कि उस के दिन फिर आएंगे क्योंकि उस को पाढ़ पढ़ाया जा रहा है कि इस मंदिर में जाओ, उस में जाओ. छोेटे मंदिरों में भीड़ बढ़ गई है, बड़े मंदिरों के पास हैलीकौप्टर उतरने लगे हैं और बड़ों के आसपास रहने वालों के घर तोड़ दिए गए हैं ताकि मंदिर तक हजारोंलाखों की भीड़ ले जाई जाए.
जो जनता खेतों में पसीना बहा रही है, कारखानों में काम कर रही है, मोटरबाइकों पर सामान घरोंदफ्तरों में पहुंच रही है, रातरातभर ट्रक चला रही है, वह चक्रवर्ती राजा के घोड़ों से और ज्यादा परेशान है. उस की और कम सुनी जा रही है. उस को न्याय अब अदालतों से नहीं मिलता, राजा के बुलडोजरों से मिलता है. आम जनता को दड़बों में रहना पड़ रहा है, राजा और राजा के अधिकारी महान हैं इसलिए बड़े मकानों में रहते हैं.
इंद्रप्रस्थ, माफ करना, दिल्ली में सरकारी मकानों को तोड़तोड़ कर पहले से भी भद्दे मकानों और औफिस बिल्डिंगों को बनाने का काम जारी है. साथ ही बरसों से बसी ?ाग्गियों के रहने वालों को सर्दी, गरमी, बरसात की चिंता किए बिना बेघर किया जा रहा है. जयजयकार में कमी नहीं हो रही है, स्कूलों में साइंस नहीं पढ़ा रहे हैं, जयकार करने के तरीके लिखा रहे हैं.
यही अच्छे दिन हैं. यही वे दिन हैं जब न वोट का हक बच रहा है, न अदालत का दरवाजा खटखटाने का. Editorial




