Relationship Story. नितिन ने लंच शुरू किया. पत्नी ने परांठे, दही और आलूमटर की सब्जी दी हुई थी. तभी उसे कढ़ीचावल की खूशबू आई. उस ने नजर घुमा कर देखा, पास वाली मेज पर वर्माजी खाना खा रहे थे. उस का मन भी कढ़ीचावल खाने का होने लगा. उस ने सोचा कि लंच के बाद घर फोन कर देगा, लेकिन वह खाना खा भी नहीं पाया था कि बौस के पीए का फोन आ गया, ‘‘सर ने तुरंत बुलाया है.’’

नितिन जल्दीजल्दी लंच कर के बौस के केबिन में चला गया. बौस ने एक फाइल पकड़ाते हुए कहा, ‘‘इसे देख कर रिपोर्ट बना दो. शाम को 5 बजे एमडी साहब के साथ मीटिंग है. उस में रिपोर्ट देनी है. समय कम है. सारे काम छोड़ कर पहले इसे तैयार करो.’’

नितिन रिपोर्ट तैयार करतेकरते घर फोन करना भूल गया.  रात के 8 बज गए थे. नितिन मैट्रो से उतर कर घर की ओर जा रहा था, तब उसे कढ़ीचावल की याद आई. उस ने सोचा कि सुनीता ने खाने की तैयारी कर ली होगी. दूसरा, कढ़ी बनाने के लिए दहीमट्ठा लाना होगा. घर में बेसन है भी या नहीं. उसे खाने बनाने की दोबारा से तैयारी करनी होगी. उस ने घर फोन नहीं किया.

घर जा कर नितिन ने चाय पी. उसे थकान महसूस हो रही थी. वह कमरे में जा कर लेट गया. उसे झपकी आ गई. करीब एक घंटे बाद सुनीता ने खाना खाने के लिए आवाज दी. वह उनींदा डाइनिंग टेबल पर आ कर बैठ गया.

सुनीता ने उस के सामने खाने की प्लेट रख दी. उसे हैरानी हुई कि सुनीता ने उस की पसंद की पकौड़ी वाली कढ़ी और जीरे में छौंके हुए चावल बनाए थे. उस की थकान दूर हो गई और पत्नी के लिए प्यार उमड़ पड़ा.

पति की आंखों के आमंत्रण को देख सुनीता मुसकराई और अपनी थाली लेने के लिए रसोई में चली गई.

नितिन शनिवार को औफिस से घर आते ही बोला, ‘‘सोमवार और मंगलवार की छुट्टी ली हुई है. दिलशाद गार्डन चलते हैं.’’

यह सुनते ही सुनीता का चेहरा खिल उठा. वह बोली, ‘‘परसों मम्मी का फोन आया था. उन्हें हलका बुखार है. बुला रही थीं. हम जाएंगे तो वे खुश हो जाएंगी.’’

‘‘यह बात तुम ने बताई नहीं. मिल आती,’’ नितिन ने नाराजगी जताई. ‘‘मेरे मायके जाने से आप को परेशानी होगी, इसलिए नहीं कहा,’’ कह कर सुनीता तैयार होने चली गई.

नितिन के औफिस में नया बौस आया था. वह अपने पुराने संस्थान से कुछ सहयोगियों को लाना चाहता था. दूसरा, उसे बौसगीरी भी दिखानी थी. वह काम में कमियां निकालने लगा. इस की चपेट में नितिन भी आ गया. कई लोगों को नौकरी जाने का खतरा लगने लगा.

कुछ प्रैक्टिकल और सम?ादार मुलाजिमों ने समय की नजाकत को सम?ाते हुए नए बौस का चरण वंदन शुरू कर दिया. वे औफिस आतेजाते समय बौस के केबिन में मत्था टेक देते.

नितिन को यह सब पसंद नहीं था. इस में उस का अहंकार नहीं, बल्कि स्वभाव था. वह काम से काम रखता.

एक दिन नए बौस ने नितिन को मामूली सी गलती पर नकारा कह दिया. उन्होंने कहा, ‘‘तुम किसी काम के नहीं हो. तुम्हें कुछ नहीं आता. बैठेबैठे रोटी तोड़ते हो.’’

नौकरी के दौरान डांटफटकार कोई नई बात नहीं थी, लेकिन बौस का यह कहना कि ‘बैठेबैठे रोटी तोड़ते हो’ नितिन को अखर रहा था. उस ने कुरसी से सिर टिका लिया. उस के सामने सुनीता का मुसकराताखिलखिलाता चेहरा घूमने लगा. उसे डर सताने लगा कि नौकरी चली गई, तो सुनीता का सामना कैसे करेगा. मकान और बाइक की किस्त कैसे जाएगी.

नितिन की मेज पर रखी कौफी ठंडी हो गई थी. औफिस असिस्टैंट सुरेश कप लेने आया. वह बोला, ‘‘आप ने कौफी नहीं पी. ठंडी हो गई. दूसरी ले आऊं?’’ ‘‘नहीं,’’ नितिन ने सिर हिला दिया.

सुरेश ने माहौल को हलका करने के लिए हंसते हुए कहा, ‘‘साहब का मूड ठीक नहीं लग रहा. हमारे कहने से एक कप कौफी पी तो लीजिए, मूड फ्रैश हो जाएगा.’’

‘‘कहा न, नहीं पीनी. एक बार में बात समझ में नहीं आती,’’ नितिन तेज आवाज में बोला. ‘‘जैसी आप की मरजी,’’ कह कर सुरेश मुंह लटका कर चला गया.

औफिस के सभी लोग नितिन की ओर देखने लगे थे. उसे अपनी   झुंझलाहट पर गुस्सा आने लगा.

नितिन सुनीता को परेशान नहीं करना चाहता था, इसलिए उसे कुछ नहीं बताया. वह गुमसुम और चिंतित रहने लगा. उस का खानेपीने और घूमने यानी किसी भी काम में मन नहीं लगता.

एक दिन सुनीता ने चाय पीते हुए पूछा, ‘‘क्या बात है… आजकल तनाव में रहते हो? औफिस में कोई दिक्कत तो नहीं?’’ नितिन ने रूखा सा जवाब दिया, ‘‘कुछ नहीं, सब ठीक है.’’

सुनीता ने खाली कप उठा लिए. वह सोचने लगी, ‘मैं कितना प्यार करती हूं. हर बात का ध्यान रखती हूं, फिर भी मुझे अपनी परेशानी नहीं बता रहे. ऐसा लगता है कि मेरा होना या न होना इन के लिए कोई माने नहीं रखता.’

सुनीता 1-2 बार प्यार से पूछती तो शायद नितिन के दिल का गुबार निकाल जाता, लेकिन उस ने तन और मन से दूरी बना ली. वह घर के कामों और बाकी समय में मोबाइल में खुद को बिजी रखती.

नितिन सोचने लगा, ‘मैं परेशान हूं, पर इसे कोई फर्क नहीं पड़ता. ऐसे कैसे जिंदगी कटेगी…’

नितिन रविवार को देर से उठा. सुनीता ने ब्रैड पकौड़े बनाए थे. 11 बजे नाश्ता किया. दोपहर में सुनीता ने छोलेभटूरे बना लिए. उस ने करीब 1 बजे खाने में छोलेभटूरे परोस दिए.

नितिन छोलेभटूरे देखते ही भड़क गया, ‘‘तुम्हें कुछ अक्ल भी है या नहीं. सुबह ब्रैड पकौड़े और अब छोलेभटूरे बना दिए. इतनी चिकनाई खिलाखिला कर तुम तो मार डालोगी.’’

सुनीता ने बडे़ मन से पति की पसंद के छोलेभटूरे बनाए थे. वह सम?ा नहीं पाई कि इस में क्या गलत किया. वह नाराजगी से बोली, ‘‘इस में अक्ल या बेअक्ल की क्या बता है. बड़ी मेहनत कर मन से बनाए हैं.’’

‘‘हां, मेहनत तो तुम्हीं करती हो. हम तो निकम्मे हैं,’’ नितिन तैश में बोला.

‘‘लेकिन मैं ने ऐसा कब कहा,’’ सुनीता बोली. ‘‘कहा तो नहीं, लेकिन मन में तो यही है. यहां दिनभर खपते रहो. तुम्हारी तो सिर्फ जबान चलती है.’’

‘‘तुम नौकरी करती हो तो मैं भी दिनभर घर के काम में लगी रहती हूं.’’ ‘‘तो क्या मुझ पर अहसान करती हो.’’ ‘‘अहसान तो कोई किसी पर नहीं करता. सब अपनाअपना काम करते हैं.’’

‘‘तुम्हें तो मुझ  से बहस करने का मौका मिल गया.’’ ‘‘बहस मैं ने शुरू की या आप ने… पता नहीं आप को क्या हो गया है…’’

‘‘मैं पागल हो गया हूं. तुम्हें रहना है तो रहो, नहीं तो तुम्हारी मरजी,’’ नितिन गुस्से में बोला.

अब तो सुनीता को भी गुस्सा आ गया. वह बोली, ‘‘मैं अब इस घर में एक पल भी नहीं रहना चाहती. जा रही हूं.’’

सुनीता रसोई में अपने लिए रखी छोलेभटूरे की थाली को यों ही छोड़ कर कपड़े लेने कमरे में चली गई. वह 10-15 मिनट में बैग ले कर बाहर आ गई. उस ने गेट पर जा कर नितिन की ओर देखा. उसे घूर रहे नितिन ने गुस्से में मुंह दूसरी ओर कर लिया. सुनीता जोर से दरवाजा पटक कर बाहर निकल गई.

नितिन ने बिना खाए छोलेभटूरे की थाली रसोई में रख दी. वह सोफे पर लेट गया और छत को घूरने लगा. पलकें भारी हो कर कब बंद हो गईं, उसे पता ही नहीं चला.

नितिन शाम को उठा. 6 बज चुके थे. नितिन ‘सुनीता, पानी लाना’ कहने ही वाला था कि ‘सुनीता’ कहते ही उसे याद आ गया कि वह तो घर में है ही नहीं. वह दोपहर के मामले को याद कर उदास हो गया. पानी लेने के लिए रसोई में गया तो देखा कि दोनों की थाली वहां रखी हुई थीं.

नितिन का मन हुआ कि सुनीता को फोन कर बुला ले, फिर सोचा कि उसे मेरी जरूरत होगी तो खुद ही आ जाएगी. उस ने छोलेभटूरे डब्बे में रखे और गाय को दे आया. वह खाना बाहर से ही खा कर आ गया.

सुनीता अपने मायके आ गई. मां, भाईभाभी, भतीजेभतीजी सभी बहुत खुश हो गए. बच्चे उस के चारों ओर चक्कर काटने और उछलकूद करने लगे. भाभी ने शाम को समोसेकचौड़ी मंगा लिए और रात को सुनीता की पसंद के छोलेचावल बनाए.

रात को भाभी ने खाना परोसा तो सुनीता के मन में आया कि नितिन को फोन कर पूछ ले कि उन्होंने खाना खाया है या नहीं, फिर विचार आया कि वे भी तो फोन कर सकते थे. उन्होंने नहीं किया तो वह भी क्यों करे.  सुनीता ने भरपेट खाना खाया और चादर तान कर सो गई.

नितिन औफिस से आया. वह बैडरूम में जा कर लेट गया. उस ने देखा कि घर तो वही है, जो 3 दिन पहले था… 2 कमरे, रसोई, चमचमाती दीवारें, फ्रिज, एसी सभी कुछ तो पहले जैसा है, लेकिन अपने मन की तरह उसे यहां भी खालीपन महसूस हुआ.

नितिन को बौस का ईमेल मिला था. उस की बनाई रिपोर्ट एमडी साहब को पसंद आई थी. उन्होंने ईमेल कर उस की तारीफ की थी. वह निश्चिंत हुआ कि फिलहाल नौकरी जाने का खतरा नहीं है. वह चाहता था कि अपनी इस खुशी को किसी के साथ साझा करे.

नितिन का मन हुआ कि सुनीता को फोन कर दे, फिर सोचा कि वह अपनी मरजी से गई है, वह क्यों फोन करे. अगर गुस्से में कुछ कह भी दिया था तो क्या उसे चले जाना चाहिए था? वह भले ही मु?ा से लड़ती?ागड़ती, लेकिन गई क्यों? क्या यह घर उस का नहीं है?

नितिन होटल से खाना पैक करा कर लाया था. उस का मन खाना खाने का नहीं हुआ. वह लेटालेटा नींद आने का इंतजार करने लगा.

सुनीता ने 2-3 दिन खुद को खुश दिखाने की भरसक कोशिश की, लेकिन धीरेधीरे उस के चेहरे पर उदासी का असर दिखने लिखा और यह उस की मां और भाभी से छिप न सका.

भाभी ने अकेले में सुनीता से उस की परेशानी पूछी. पहले तो सुनीता टालती रहती, लेकिन बहुत जिद करने पर उस ने बता दिया.

भाभी धीरे से बोली, ‘‘दीदी, परेशान होने की कोई बात नहीं. यह घर आप का ही है, जब तक चाहे रहो.’’ सुनीता हलकी सी मुसकराई, लेकिन कुछ नहीं बोली.

सुनीता को आए हुए एक हफ्ता हो गया था. उस का मन अब यहां बिलकुल भी नहीं लगता था. कुछ खाने का मन नहीं करता था. रात को उस की नींद बारबार उचट जाती थी.

12 बज चुके थे. सभी सोए हुए थे. सुनीता ने फोन उठा लिया. वे दोनों सगाई के बाद रोज रात को फोन पर घंटों बातें किया करते थे. किसी दिन नितिन को फोन करने में देर हो जाती तो सुनीता फोन कर देती और झगड़ती कि देर क्यों की.

आज सुनीता ने नितिन का नंबर निकाला, लेकिन डायल किए बिना फोन सिरहाने की मेज पर रख दिया. भाभी ने खीर बनाई थी. सुनीता मुंह तक चम्मच ले जाते हुए ठिठक गई. उसे याद आया कि नितिन खीर खाने से पहले एक चम्मच उसे खिलाता और कहता कि ‘तेरे खाने से खीर की मिठास बढ़ जाती है’.

भाईभाभी बच्चों के साथ सामान खरीदने के लिए बाजार गए थे. उन्होंने सुनीता से भी साथ चलने के लिए कहा था, लेकिन उस ने मना कर दिया. वह कमरे में आ कर बिस्तर पर लेट गई.

थोड़ी देर में मां सुनीता के पास आ कर बैठ गईं और प्यार से उस के सिर पर हाथ फेरने लगीं. सुनीता ने मां की हथेली अपने गाल के नीचे रख ली. कुछ देर बाद उस के आंसू टपकने लगे.

मां प्यार से बोलीं, ‘‘बेटी, मैं यह नहीं पूछूंगी कि क्या हुआ. मैं तुम्हें कोई सलाह भी नहीं दे रही. तुम्हें जो सही लगे, वही करो. लेकिन मेरी एक बात पर ध्यान देना. पहले तो इस दुनिया में हमें जानते ही कितने लोग हैं. जो 4-6 निकट के लोग हमें जानतेसमझते हैं, उन से हम छोटीछोटी बातों पर रिश्ते खराब कर लेते हैं. धीरेधीरे जिंदगी यों ही बीत जाती है.’’

मां थोड़ी देर बाद उठ गईं और बोलीं, ‘‘हाथमुंह धो ले. मैं चाय बना कर लाती हूं.’’ नितिन लंच करने के बाद कैंटीन की खिड़की के पास आ कर खड़ा हो गया. पार्क में माली राकेश और उस की पत्नी मीना खाना खा रहे थे. दोनों बात करतेकरते खिलखिला भी रहे थे. नितिन को याद आया कि आज सुबह औफिस खुलने के कुछ देर बाद ही दोनों उस के पास आए थे.

दरअसल, कल रात राकेश शराब पी कर घर आया था. इस का मीना ने विरोध किया तो उस ने थप्पड़ मार दिया. मीना रोटी बना रही थी. उस ने गुस्से में राकेश के कंधे पर बेलन दे मारा. इस से उस का कंधा सूज गया. दोनों रातभर लड़ते रहे. उन्होंने खाना भी नहीं खाया. दोनों इसी का फैसला कराने उस के पास आए थे.

नितिन ने दोनों को समझाया कि आपस में झगड़ा नहीं करते. प्यार से रहते हैं. एकदूसरे की इच्छाअनिच्छा का खयाल रखेंगे तो झगड़ा होगा ही नहीं. अगर झगडा़ हो भी जाए तो एकदूसरे को मना लेना चाहिए. इसे नाक का सवाल नहीं बनाना चाहिए.

नितिन सोचने लगा कि दूसरों को सलाह देना कितना आसान है. राकेश और मीना कम पढ़लिखे हैं. यह बात उन की समझ  में आ गई. और हम तथाकथित ज्यादा पढ़ेलिखे जराजरा सी बात को अहम का मुद्दा बना कर अपनी जिंदगी में खुद ही जहर घोल रहे हैं.

यह सब सोचतेसोचते नितिन को बेचैनी होने लगी. उस ने औफिस से छुट्टी ले ली. उस ने सोचा कि आज इस झंझट से हमेशा के लिए झूटकारा पा लेगा. उस ने घर जाने के बजाय बाइक दूसरी ओर मोड़ ली.

नितिन ने दरवाजे पर लगी घंटी बजाई. दरवाजा सुनीता ने खोला. दोनों कुछ पल एकदूसरे की आंखों में अपलक देखते रहे. नितिन ने पूछा, ‘‘कैसी हो?’’ सुनीता ने जवाब दिया, ‘‘अच्छी हूं. और आप?’’ ‘‘मैं भी मजे में हूं,’’ नितिन ने मुसकराने की कोशिश की.

सुनीता की आंखों के नीचे के कालापन और नितिन की बढ़ी बेतरतीब दाढ़ी से दोनों एकदूसरे की असलियत जान गए. अब कुछ गिलेशिकवे की गुंजाइश ही नहीं बची थी. दोनों ने नजरें झुका लीं, जैसे कोई झूठ पकड़ा गया हो.

जो बात सुनने के लिए सुनीता इंतजार कर रही थी, आखिरकार नितिन ने कह दी. वह बोला, ‘‘चलो.’’ सुनीता शरारती ढंग से मुसकराई, ‘‘सोच लो, रात को छोलेभटूरे बनाऊंगी.’’

‘‘हुजूर, जो बनाएंगी, सब मंजूर,’’ नितिन ने दरबारी की तरह हलके से झुकते हुए कहा और सुनीता की कमर पर चिकोटी काट ली. तब तक सुनीता की मां दूसरे कमरे से आ गईं. सुनीता मां के गले से लिपट गई.

मां सुनीता को झीड़कते हुई बोलीं, ‘‘कैसे पगली लड़की है. दामादजी को बैठने के लिए भी नहीं कहा.’’

नितिन बोला, ‘‘अभी बैठना नहीं है. सुनीता, जल्दी चलो.’’  मां बोलीं, ‘‘बिना कुछ खाएपीए कैसे जाओगे. बेटाबहू आने वाले हैं. उन से भी मिल कर जाना.’’

जवाब सुनीता ने दिया, ‘‘भैयाभाभी से मिलने फिर आ जाएंगे. अभी हम जा रहे हैं.’’

मां कुछ बोलतीं इस से पहले ही सुनीता दूसरे कमरे में गई और बैग में जल्दीजल्दी अपने कुछ कपड़े ठूंस कर ले आई.

मां ने प्यार से बेटी का माथा चूम लिया. नितिन की आंखें अपराधी की तरह झु की थीं. वह बीचबीच में नजरें उठा कर सुनीता को देखता और मुसकरा जाता.

नितिन के बाइक स्टार्ट करते ही सुनीता फुरती से पीछे बैठ गई. उस ने सिर पति की कमर से लगा कर उसे बांहों में भर लिया. सुबह से मौसम गरम था. अब बूंदाबांदी होने लगी थी. शायद कहीं आसपास तेज बारिश भी हुई थी.

एक ठंडी हवा का झोका आया. नितिन को तन ही नहीं, मन में भी ठंडक महसूस हुई. उस ने ब्रेक छोड़ते हुए एक्सलेटर को दबाया और बाइक की रफ्तार बढ़ा दी.

लेखक : नरसिंह प्रसाद शर्मा

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