Society . ऐसा माना जाता है कि हरियाणा में 21 फीसदी दलित आबादी है और 90 सीटों वाली विधानसभा में उन के लिए 17 सीटें रिजर्व्ड हैं. 35 सीटों पर दलित समुदाय उम्मीदवार को जिताने की ताकत रखते हैं. इस के बावजूद हरियाणा में दलितों का कोई बड़ा चेहरा नहीं उभर सका. इस की सब से बड़ी वजह यह है कि यहां जातिवाद की जड़ें बड़ी गहरी हैं.

पर हम यहां दलित राजनीति पर बात नहीं कर रहे हैं, बल्कि एक ऐसे दलित नौजवान के सोशल मीडिया पर दिए गए बयान को खंगालने की कोशिश करेंगे, जिस ने जातिवाद पर नए तरीके का दंगल छेड़ दिया है.

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हरियाणा में सोनीपत जिले के एक गांव बैयांपुर के रहने वाले अंकित बैयांपुरिया के सोशल मीडिया पर कई लाख फौलोअर्स हैं. वे खुद को एथीलट बताते हैं और सोशल मीडिया पर उन्होंने ‘75 डेज हार्ड चैलेंज’ वीडियो के जरीए लोकप्रियता हासिल की थी. इतना ही नहीं, अंकित अखाड़ों में पारंपरिक कुश्ती लड़ते थे और गरीबी के चलते उन्होंने डिलीवरी बौय समेत कई काम किए थे.

अंकित की मानें तो उन्होंने तकरीबन 16 साल पहले कुश्ती की शुरुआत की थी. गांव के पहलवान कृष्ण उर्फ खलीफा पहलवान से प्रेरित हो कर उन्होंने अखाड़े का रास्ता चुना था.

वीडियो पर क्या बोले अंकित

हाल ही में अंकित की इंस्टाग्राम लाइव के दौरान रिकौर्ड हुई एक वीडियो क्लिप सामने आई है. 37 सैकंड की इस वीडियो क्लिप में अंकित ने कहा कि उन्होंने तकरीबन 10 से 12 साल रैसलिंग की है. इस बीच उन्हें कई बार जातिगत भेदभाव का सामना करना पड़ा. हरियाणा में खेलों के अंदर काफी कास्टिज्म है. जब भी वे अखाड़े में जाते थे, तो उन की जाति पूछी जाती थी. अखाड़ों में कई बार कुश्ती के दौरान जानबूझ कर चोट पहुंचाई गई. कोच खिलाडि़यों से कहते थे कि इसे चोट मार दो.

अंकित बैयांपुरिया के इस वीडियो के बाद सोशल मीडिया पर तीखी बहस शुरू हो गई. कई सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स और फैंस अंकित के समर्थन में आए हैं, जिन का मानना है कि खेल और राजनीति में लौबी सिस्टम एक कड़वी सच्चाई है और अंकित ने इस पर खुल कर बात कर के बहुत हिम्मत दिखाई है.

लेकिन कुछ यूजर्स ने अंकित बैयांपुरिया आलोचना करते हुए पूछा है कि उन्होंने यह बात इतने सालों बाद क्यों उठाई कुछ लोगों ने उन्हें पब्लिसिटी स्टंट या लाइमलाइट पाने वाला बताया है. उन का आरोप है कि कामयाबी हासिल करने के बाद ऐसी बातें विवाद पैदा करने के लिए कही जा रही हैं. कुछ पहलवानों ने इस बात से असहमति जताई है कि अखाड़ों में जाति या धर्म को ले कर भेदभाव किया जाता है.

चलो, मान लिया कि खेल का मैदान जाति से ऊपर होता है, पर इस से यह साबित नहीं होता कि अंकित बैयांपुरिया ने सोशल मीडिया पर सुर्खियां पाने के लिए ऐसा वीडियो बनाया है. एक ताजा उदाहरण से समझाते हैं कि हरियाणा में जाति की बुनियाद पर कैसे किसी नौजवान से उस की नौकरी छीन ली जाती है.

हरियाणा के पानीपत में एक नौजवान को नौकरी से केवल इसलिए निकाल दिया, क्योंकि वह दलित जाति से था.

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बाबरपुर मंडी के रहने वाले रिजुल कुमार  ने बताया कि पानीपत जीटी रोड बनी इला होम फैशन कंपनी में इंटरव्यू के बाद उस का एचआर की पोस्ट के लिए चयन हुआ था. चयन के बाद रिजुल को कंपनी के जीएम से मिलने को कह गया. जब वह जीएम से मिलने उन के केबिन में गया, तो जीएम ने उस की जाति पूछी. अपनी जाति बताने के बाद रिजुल घर आ गया.

तकरीबन 2 घंटे बाद कंपनी के अफसर ने फोन कर के रिजुल को कहा, ‘आई एम सौरी, हम आप को नौकरी पर नहीं रख सकते क्योंकि आप शैड्यूल कास्ट से हैं. यह हमारी पौलिसी में नहीं आता.’

रिजुल ने यह आरोप भी लगाया कि कंपनी मालिक की मां ने भी उन्हें जातिसूचक शब्द बोले ओर दोनों भाईबहन को धक्के मार कर कंपनी से बाहर निकाल दिया. इस के बाद पीडि़त ने थाने में अपनी रिपोर्ट दर्ज कराई.

यह तो महज एक उदाहरण है. हरियाणा में औनर किलिंग के नाम पर जितने भी अपराध हुए हैं, उन में जाति और गौत्र की गहरी पैठ है. राजनीति से ले कर रस्मोरिवाज तक, हर जगह जाति का ही बोलबाला है. छत्तीस बिरादरी के हिमायती मौका मिलते हैं अपनी बिरादरी का झंडा उठा लेते हैं.

अंकित बैयांपुरिया ने जाति पर जो जबान खोली है, उस में उन का दर्द छिपा है. भले ही वे कुश्ती में ज्यादा नाम नहीं कमा पाए हैं, लेकिन उन की फिटनैस गजब की है, हौसला भी शानदार है और जब इस तरह का कोई सोशल इंफ्लुएंसर वीडियो बना कर अपना दर्द जाहिर करता है, तो सम?ा लीजिए कि बिना आग लगे धुआं नहीं उठता है.

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