Education Inequality. कहते हैं, मेहनत करने वालों की हार नहीं होती. लेकिन जब मेहनत करने के बाद भी सपने की मंजिल तक पहुंचने में सब से बड़ा रोड़ा पैसे की दीवार बन जाए, तो हार का अहसास भीतर तक चुभ जाता है.

आज के भारत का यही सब से बड़ा विरोधाभास है, हुनर सब के पास है, मौके नहीं. हर साल लाखों नौजवान अच्छे नंबर ला कर नामी कालेजों और इंस्टीट्यूटों में दाखिला पाते हैं, पर जब फीस, होस्टल और रोजमर्रा के खर्चों की बात आती है, तो वही नौजवान हालात के आगे झुक जाते हैं.

सपनों का आगाज और हकीकत की दीवार

हर गांवकसबे में कुछ आंखें होती हैं जो बड़े शहरों के कालेजों की ओर टकटकी लगाए रहती हैं. कभी नीट की तैयारी करने वाला सुदीप, कभी आईआईटी का सपना देखने वाली आरती, तो कभी बीएड की डिगरी पाने को बेताब मनीषा, सब की मंजिल एक है, अपना और अपने परिवार का भविष्य बदलना.

पर जब ये बच्चे अपनी मेहनत से एडमिशन लैटर ले कर लौटते हैं, तो घर में खुशी और चिंता दोनों साथ आती हैं. खुशी इसलिए कि बेटाबेटी अब ‘काबिल’ कहलाएंगे और इसलिए कि अब फीस, किताबें, चिंता होस्टल, लैपटौप, कपड़े और सफर का खर्च कैसे उठेगा?

छात्रों के अनुभव, दर्द जो शब्दों से परे है

अभिषेक बिहार के गया जिले का रहने वाला है. उस के पिता किसान हैं, जिन की सालाना आमदनी मुश्किल से एक लाख रुपए है. अभिषेक ने जेईई एडवांस्ड में शानदार रैंक पाई और आईआईटी कानपुर में दाखिला मिला. लेकिन एडमिशन फीस समेत दूसरे खर्च के 90,000 रुपए कहां से आएं?

अभिषेक बताता है, ‘‘मैं ने पापा की आंखों में पहली बार बेबसी देखी. उन्होंने हमारी 2 गायें बेच दीं, ताकि मेरे पहले सैमेस्टर का पैसा भर सकें. होस्टल और मैस की फीस मैं बाद में ट्यूशन पढ़ा कर चुकाता रहा.’’ अभिषेक दिन में क्लास करता और रात को औनलाइन बच्चों को गणित पढ़ाता था. 2 साल तक उस के पास लैपटौप नहीं था. वह दोस्तों के कंप्यूटर पर प्रोजैक्ट पूरे करता रहा. अभिषेक कहता है, ‘‘मैं हर बार जब दोस्तों को कैफे में कौफी पीते देखता था, तो सोचता था कि मेरी दुनिया इतनी अलग क्यों है?’’

प्रिया बिहार के अरवल जिले की रहने वाली है. 12वीं जमात में उस ने 95 फीसदी अंक ला कर दिल्ली यूनिवर्सिटी के नामी कालेज में दाखिला पाया. मगर दिल्ली आकर उसे महसूस हुआ कि सपनों का शहर जितना चमकता है, उतना महंगा भी है. पहले महीने रूम रैंट और किताबों में ही सब पैसे चले गए. उस ने लाइब्रेरी में असिस्टैंट की पार्टटाइम नौकरी कर ली. वहीं पढ़ाई भी होती और थोड़ा जेबखर्च भी निकल आता. प्रिया कहती है, ‘‘जब दोस्त ब्रांडेड कपड़े या फूड कोर्ट में पार्टी करते थे, मैं उन की तसवीरें देख कर मुसकराती थी, लेकिन मन में एक खालीपन होता था. पर मैं ने खुद से वादा किया था कि गरीबी मुझे हरा नहीं सकती.’’ आज वही प्रिया दिल्ली यूनिवर्सिटी में अच्छे नंबर लाई है और अपने गांव की लड़कियों के लिए औनलाइन मुफ्त काउंसलिंग चलाती है.

फैज ने क्लास 12वीं में 94 फीसदी अंक ला कर निजी इंजीनियरिंग कालेज में एडमिशन लिया. पहले साल उस ने पिता के रिटायरमैंट फंड से फीस भरी, लेकिन दूसरे साल फीस बढ़ गई. फैज ने बताया, ‘‘मैं ने जोमैटो में पार्टटाइम डिलीवरी का काम शुरू किया. दिन में क्लास, रात में बाइक ले कर और्डर की डिलीवरी. कई बार थक कर सो भी जाता था. लेकिन जब किसी ने कहा कि ‘इंजीनियर बनने चला था, डिलीवरी बौय बन गया’, तो दिल टूट गया.’’ फैज की आवाज में वह दर्द है जो किसी आंकड़े में नहीं दिखता. उसे कभीकभी लगता था कि मेहनत बेकार चली गई, लेकिन मां के एक शब्द ‘बेटा, हिम्मत मत हार’ ने सब थकान मिटा दी.

बराबर मौका, सिर्फ किताबों की बात नहीं

हमारा संविधान कहता है कि पढ़ाईलिखाई पर सब का हक है, पर क्या वाकई सब के लिए बराबर मौके हैं? सिर्फ एडमिशन मिल जाना बराबरी का मौका नहीं है. उसे पूरा करने के साधन मिलना ही असली बराबरी है.

कई सरकारी और निजी कालेजों मे स्कौलरशिप मिलती है, पर यह प्रोसैस इतना पेचीदा है कि छात्र कई बार पढ़ाई के साथसाथ दफ्तरों के चक्कर काटते रहते हैं. कुछ को स्कौलरशिप समय पर नहीं मिलती, तो कुछ को इसलिए नहीं मिलती क्योंकि उन का पिता ‘गरीबी रेखा से ऊपर’ दिखाया गया होता है, जबकि असल में घर में खाने तक की कमी होती है.

मानसिक बोझ और आत्मसम्मान की कसौटी

पैसे की कमी का असर केवल जेब पर नहीं, आत्मविश्वास पर भी पड़ता है. कई छात्र ऐसे हैं जो भीड़ में भी अकेले पड़ जाते हैं. क्लास में किसी से बात करने में झिझक, कालेज फैस्ट में जाने में संकोच और बाहर खाने में अपराधबोध, यह सब उन के भीतर एक दीवार बना देता है.

मनोवैज्ञानिक डाक्टर पंकज अग्रवाल कहते हैं कि आर्थिक असमानता शिक्षा संस्थानों में अदृश्य मानसिक विभाजन पैदा करती है. जो छात्र खर्च नहीं उठा पाते, वे अकसर खुद को कमतर मानने लगते हैं. ऐसे कई केस आए हैं जहां आर्थिक दबाव ने छात्रों को डिप्रैशन के कगार तक पहुंचा दिया.

साल 2023 में हुए एक सर्वे के मुताबिक, भारत में तकरीबन 35 फीसदी छात्र पैसे की कमी से मानसिक तनाव झेलते हैं.

संघर्ष से निकली रोशनी

लेकिन इस संघर्ष की धरती पर भी कुछ फूल खिलते हैं. आईआईटी मुंबई के अमोल जगताप की कहानी प्रेरणा देती है. वह किसान परिवार से था. खेतों में काम करते हुए उस ने आईआईटी की परीक्षा पास की. पर कैंपस में एडमिशन लेने के बाद पैसे नहीं थे, तो उस ने लैब में रिसर्च असिस्टैंट बन कर काम किया. आज वही अमोल अमेरिका की एक नामी कंपनी में सौफ्टवेयर इंजीनियर है.

अमोल कहता है, ‘‘ मुझे किसी ने कुछ दिया नहीं, मैं ने हर चीज खुद बनाई. जब मुश्किलें हों, तो याद रखना कि तुम्हारे सपनों की कीमत कोई और नहीं चुकाएगा, तुम्हें ही चुकानी होगी.’’

क्या कर सकते हैं संस्थान और समाज

अगर देश को सच्चे माने में ‘शिक्षित भारत’ बनाना है, तो हमें केवल डिगरियां बांटने वाली व्यवस्था नहीं, समान अवसरों वाली व्यवस्था बनानी होगी. इस के लिए कुछ ठोस कदम हो सकते हैं, जैसे फीस ढांचे में लचीलापन. आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों को इंस्टौलमैंट या स्लैब पर आधारित भुगतान की सुविधा मिले.

कौर्पोरेट सोशल रिस्पौंन्सिबिलिटी. बड़ी कंपनियां गरीब विद्यार्थियों को गोद लेने की योजना चलाएं, जहां वे एक छात्र की शिक्षा का पूरा खर्च उठाएं. स्कौलरशिप वितरण की पारदर्शिता, आवेदन प्रक्रिया सरल और डिजिटल हो, ताकि छात्र परेशान न हों.

मैंटल हैल्थ सैल

कौलेजों में ऐसे काउंसलर हों जो आर्थिक दबाव झेल रहे छात्रों की मदद कर सकें. हर वह नौजवान जो आर्थिक अभाव में पढ़ रहा है, वह असल में भारत की आत्मा है. वह ही है जो अपने हालात से लड़ कर समाज को नई दिशा देता है.

पैसे की कमी उसे रोक सकती है, लेकिन हरा नहीं सकती. कठिनाइयां इनसान को तोड़ती नहीं, गढ़ती हैं. और जो संघर्ष में गढ़ा जाता है, वह इतिहास में दर्ज होता है.

शिक्षा का हक सब का है, सुविधा कुछ की नहीं

शिक्षा अगर रोशनी है, तो वह किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं होनी चाहिए. आज जरूरत है कि हम सिर्फ मेधावी नहीं, मेहनती छात्रों को भी पहचानें.

जो छात्र गरीबी में भी हौसला रखते हैं, वही असली राष्ट्रनिर्माता हैं. देश तभी आगे बढ़ेगा जब हर अभिषेक, प्रिया और फैज को बराबर मौका मिलेगा. फीस भरने की चिंता से मुक्त हो कर सपने पूरे करने की आजादी मिलेगी. डिगरी सब ले लेते हैं, मगर असली शिक्षा वही पाता है जो संघर्ष की आग में जल कर अपने सपनों को सच कर दिखाता है. Education Inequality

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