Love Story. होली के दिन ज्यादातर स्टाफ छुट्टी पर था, जिस कारण सुहाना को ओवरटाइम ड्यूटी करनी पड़ रही थी. स्टेशन से गुजरती ट्रेन की बाहरी दीवारों पर रंग और कीचड़ के छींटे देख कर वह अनायास ही 3 साल पहले की होली में लौट गई, अपनी शादीशुदा जिंदगी की पहली होली में.

सुबह उठते ही जब सुहाना ने आईने में चेहरा देखा था, तो वह डर गई थी. चेहरा काले रंग से पूरी तरह पुता हुआ था. आईने के कोने में लिपस्टिक से लिखा था, ‘हैप्पी होली डियर.’ सुहाना समझ गई थी कि यह उस के पति प्रतीक की शरारत है, जो उस पर होली की रंग चढ़ा कर मौर्निंग शिफ्ट की ड्यूटी के लिए सैक्शन निकल चुका था.

बाथरूम में नहाने के लिए जैसे ही सुहाना ने शौवर खोला, लाल रंग की बौछार ने पूरे बदन को रंगीन कर  दिया. सुहाना को गुस्सा भी आया और प्यार भी.

शाम को प्रतीक बाजार से गुझिया ले कर लौटा था. अपने हाथों से ‘हैप्पी होली’ कहते हुए जब उस ने गुझिया  खिलाई, तो गुझिया के भीतर पीली गुलाल भरी थी. प्रतीक के इस प्रैंक में छिपे प्यार और शरारत भरे मजाक पर सुहाना ने उस की छाती पर हलके से हाथ मारते हुए नाराजगी जताई और फिर हंस पड़ी.

‘‘मैम, बेगूसराय की एक टिकट’’ एक मुसाफिर की आवाज ने सुहाना को वर्तमान में लौटा दिया. वह कुरसी पर बैठ कर यूटीएस से टिकट काटने लगी. वैसे भी होली के चलते मुसाफिरों की तादाद नाममात्र की थी. समस्तीपुर की रहने वाली सुहाना के मातापिता ने 3 साल पहले भारतीय रेलवे के दानापुर डिवीजन में इंजीनियरिंग सैक्शन के सुपरवाइजर पद पर नौकरी कर रहे प्रतीक से उस की शादी तय कर दी थी.

दिल्ली यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन के बाद मुखर्जी नगर में रह कर सिविल सेवा की तैयारी कर रही सुहाना की शादी में कोई खास दिलचस्पी नहीं थी. वह यूपीएससी क्रैक कर आईएएस बनना चाहती थी. उस ने विरोध भी किया, पर घर वालों के भावनात्मक दबाव में झुक गई.

शुरुआत में मन में खटास रही, पर शादी के बाद सुहाना की शादीशुदा जिंदगी धीरेधीरे आसान होती चली गई. उस का जीवन रंगोली सा सज गया था. चांदी सी सफेद सुहाना की सिंदूरी मांग, हरी चूडि़यों की खनक, आंखों में काजल, होंठों पर लाली, गुलाबी गालों पर पीली हया… कुलमिला कर कुदरत के सारे रंग उस की जिंदगी में उतर आए थे.

प्रतीक की माता बचपन में ही गुजर चुकी थीं और 2 साल पहले पिता की मौत के बाद प्रतीक का सुहाना के अलावा कोई अपना नहीं था. वह जितना अपनी विभागीय जिम्मेदारियों के प्रति सजग था, उतनी ही निष्ठा से शादीशुदा जिंदगी भी निभाता था. हर 6 महीने में रेलवे पास पर वह सुहाना के साथ पर्यटक स्थलों पर घूमने निकल जाता.

त्योहारों पर उस का प्यार खुल कर सामने आता, दीवाली में अनार जलाना, करवाचौथ पर लोटे से जल पिलाना, दशहरे में कन्या भोज… सबकुछ साथसाथ. सभी मौकों पर प्रतीक का सुहाना के प्रति प्यार रेलवे कालोनी वालों को भी दिख जाता था.

धीरेधीरे सुहाना भी गृहस्थी में रम गई. 2 साल बाद बेटी सुप्रिया ने उस की जिंदगी को जैसे पूरा कर दिया. सबकुछ ठीक चल रहा था कि पिछले साल दिसंबर महीने की दूसरी तारीख को घटित एक घटना ने सुहाना की जिंदगी में उथलपुथल मचा दी.

2 दिसंबर की घने कोहरे वाली सुबह सुहाना की जिंदगी में धुंध बन कर छा गई. रेलवे ट्रैक के रखरखाव के दौरान प्रतीक की ट्रौली सामने से आ रही ट्रेन से टकरा गई. ट्रौली पर सवार ट्रैकमैन को तो मामूली चोटें आईं, लेकिन रेलवे ट्रैक के पास रखी कंक्रीट स्लीपर से सिर टकराने के चलते प्रतीक की मौके पर ही मौत हो गई.

यह खबर सुनते ही सुहाना टूट गई. एक पल में उस की दुनिया उजड़ गई. कुछ समय बाद अनुकंपा के आधार पर उस की नियुक्ति दानापुर स्टेशन पर टिकट बुकिंग क्लर्क के रूप में हो गई. वह बिजी रहना चाहती थी, पर प्रतीक की कमी हर पल सालती रहती थी. ड्यूटी के दौरान सुप्रिया और रेलवे कर्मियों के साथ किसी तरह समय गुजर जाता, किंतु रात का अकेलापन और प्रतीक की यादें उसे काटने को दौड़तीं. उस की जिंदगी की रंगोली पर विधवा होने की सफेदी पूरी तरह जम गई थी.

टिकट देने के बाद सुहाना अपनी बेटी सुप्रिया के साथ प्लेटफार्म के शैड के नीचे बैठ कर फर्श को निहारती हुई यादों में खो गई. थोड़ी देर में प्लेटफार्म नंबर 2 पर इंटरसिटी एक्सप्रैस ट्रेन आ कर रुकी. कुछ मुसाफिर उतरे और कुछ चढ़े. ‘‘मैम, बिहटा वाली ट्रेन कितने बजे आएगी?’’ सैनिक की वरदी में ट्रेन से उतरे एक जवान की आवाज ने सुहाना का ध्यान भंग किया.

‘‘तकरीबन 2 बजे, एक घंटा देर से चल रही है,’’ अनमना सा जवाब देते हुए जैसे ही सुहाना ने नजर उठाई, वह चौंक गई, ‘‘अरे, वैभव… तुम?’’  ‘‘सु… सुहाना…’’ दिल्ली कालेज के दिन जैसे दानापुर स्टेशन पर लौट आए. वैभव सुहाना का पुराना दोस्त था.

वाराणसी के वैभव और समस्तीपुर की सुहाना की पहचान दिल्ली कालेज में हुई थी. दोनों बैचमेट थे और समय के साथ अच्छे दोस्त बन गए थे. दोनों एकदूसरे को पसंद भी करते थे, पर कभी किसी ने इजहार नहीं किया.

ग्रेजुएशन के बाद वैभव का चयन इंडियन एयरफोर्स में हो गया और वह ट्रेनिंग में चला गया, जबकि सुहाना यूपीएससी की तैयारी में लग गई. इसी बीच संपर्क टूट गया और उस की शादी भी हो गई. ‘‘अरे यार, तुम दानापुर में कैसे?’’ सुहाना ने वैभव के कंधे पर हाथ रखते हुए पूछा. ‘‘दरअसल, मेरी पोस्टिंग अगले 3 साल के लिए बिहटा एयरफोर्स स्टेशन पर हो गई है. वहीं योगदान देने जा रहा हूं. सहयात्री ने बताया कि दानापुर से बिहटा के लिए पैसेंजर ट्रेन मिल जाती है, इसलिए यहां उतर गया. और बताओ… यूपीएससी छोड़ कर यह रेलवे की नौकरी कब कर ली?’’ वैभव ने हैरानी से भरी खुशी से पूछा.

सुहाना ने मुखर्जी नगर से दानापुर तक की पूरी दास्तान वैभव को सुनाई. उस की कहानी सुन कर वैभव की आंखें नम हो गईं. वैभव ने सुहाना के पास बैठी सुप्रिया के सिर पर हाथ फेर कर हिचकिचाते हुए कहा, ‘‘सुहाना, अगर बुरा न मानो, तो कुछ कहना चाहता हूं… मैं 5 साल से एक बात दिल में दबाए बैठा हूं. कालेज के दिनों में कई बार कहने की कोशिश की, लेकिन कह नहीं पाया आई लव यू.’’

वैभव की बात सुन कर सुहाना खामोश रह गई. कालेज के दिनों में वह भी वैभव को पसंद करती थी, लेकिन प्रतीक से जुड़ने के बाद उन भावनाओं को उस ने कभी याद नहीं किया. ‘‘सुहाना, मेरा यकीन करो. मैं तुम्हें और सुप्रिया को हमेशा खुश रखूंगा. सच कहूं तो तुम्हारे लिए ही मैं ने अब तक शादी नहीं की. सोचा था ट्रेनिंग से लौट कर तुम्हें प्रपोज करूंगा, लेकिन लौटने पर तुम से संपर्क नहीं हो पाया. बहुत ढूंढ़ा, सोशल मीडिया पर भी सर्च किया, लेकिन कोई जानकारी नहीं मिली. बस इतना पता था कि तुम समस्तीपुर से हो.

‘‘बिहार में रह कर तुम्हें तलाश सकूं, इसलिए बिहटा पोस्टिंग की रिक्वैस्ट डाली. और देखो, तुम मिल भी गईं मुझ से शादी करोगी? ‘‘बोलतेबोलते वैभव का गला रुंध गया. ‘‘सुहाना, इस की बात मान लो,’’ यह आवाज स्टेशन मास्टर की थी, जो अनजाने में उन की बातें सुन चुके थे. उन की आवाज सुन कर सुहाना और वैभव दोनों चौंक गए.

‘‘सुहाना, प्रतीक मुझे सर या बड़ा बाबू के बजाय हमेशा ‘अंकल’ पुकारता था. वह हमेशा तुम्हें हंसते हुए देखना चाहता था. लेकिन उस के जाने के बाद तुम मुसकराना ही भूल गई. महीनों बाद आज तुम फिर मुसकरा रही हो. ‘‘इस लड़के में मुझे प्रतीक सा अपनापन और सच्चाई दिखती है. एक अभिभावक के रूप में मेरी यही सलाह है कि इसे स्वीकार कर लो और अपनी बदरंग जिंदगी में फिर से रंग भर लो.’’

स्टेशन मास्टर इस बात से सुहाना की आंखों में आंसू थे और होंठों पर मुसकान. उस ने आंसू पोंछते हुए वैभव को गले लगा लिया.  Love Story

लेखक : विनोद कुमार विक्की

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