Bhojpuri Celebrity Interview: भोजपुरी सिनेमा के शानदार और संजीदा एक्टरों में शुमार अनूप अरोरा ने अपनी एक्टिंग से एक अलग पहचान बनाई है. उन्होंने अब तक सैकड़ों फिल्मों में अलगअलग किस्म के किरदार निभा कर यह साबित किया है कि वे केवल एक एक्टर नहीं हैं, बल्कि एक्टिंग के प्रति समर्पित कलाकार हैं. अदाकारी के प्रति उन का जुनून और अनुशासन ही उन्हें भीड़ से अलग बनाता है. 7वें सरस सलिल भोजपुरी सिने अवार्ड्स शो के दौरान उन से बातचीत हुई. पेश हैं, उस के खास अंश :
इतने लंबे समय तक भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री में टिके रहना, आप इसे कैसे देखते हैं?
यह एक लगातार चलने वाला सफर है. यहां हर दिन खुद को साबित करना पड़ता है, वरना लोग बहुत जल्दी भूल जाते हैं.
भोजपुरी सिनेमा की मौजूदा दशा और दिशा को आप कैसे देखते हैं?
आज हमारे पास प्लेटफार्म और पहुंच दोनों हैं, लेकिन कंटैंट की सोच कमजोर हो रही है. हमें अच्छे कंटैंट से जुड़ना होगा. भोजपुरी में कम बजट में भी दमदार फिल्में बन सकती हैं. भोजपुरी सिनेमा के कुछ ऐसे चेहरे हैं, जो दर्शकों के दिल और दिमाग में बसते हैं. उन्हीं चुनिंदा लोगों में आप का नाम शामिल है.
आप इस उपलब्धि को कैसे देखते हैं?
मेरे लिए यह किसी अवार्ड से कम नहीं है. दर्शकों के दिल और दिमाग में जगह बनाना बहुत बड़ी जिम्मेदारी भी है और खुशी भी. मैं ने हमेशा कोशिश की है कि जो भी किरदार करूं, उस में सच्चाई हो, बनावटीपन न हो. कलाकार वही होता है जिसे लोग स्वीकार करें.
अगर आप को किसी फिल्म में पूरी तरह लीड रोल चुनने का मौका मिले, तो आप किस तरह की कहानी और किरदार को चुनेंगे?
हर कलाकार के अंदर कहीं न कहीं एक सपना होता है कि वह ऐसा किरदार निभाए जो दर्शकों के दिल में लंबे समय तक जिंदा रहे. अगर लीड रोल चुनने का मौका मिले, तो मैं ऐसी कहानी करना चाहूंगा, जो समाज से जुड़ी हो, जिस में मनोरंजन के साथसाथ एक मजबूत संदेश भी हो. किरदार की बात करूं तो मैं एक आम इनसान की असाधारण कहानी निभाना चाहूंगा, जो हालात से लड़ कर अपनी पहचान बनाता है. ऐसा रोल जिस में इमोशन, एक्शन और ग्रे शेड्स तीनों हों.
कौमेडियन को अलग पहचान मिले – रोहित सिंह ‘मटरू’
भोजपुरी फिल्मों में जब भी परदे पर हंसी की फुहार छूटती है, तो अकसर उस के पीछे किसी कौमेडियन की मेहनत छिपी होती है. लेकिन सच्चाई यह भी है कि कौमेडियन को अकसर उतना सम्मान नहीं मिलता जितना किसी हीरो या विलेन को मिलता है.
भोजपुरी फिल्मों के चर्चित हास्य कलाकार रोहित सिंह ‘मटरू’ इस सच्चाई को खुल कर स्वीकार करते हैं. अपनी देशी शैली, सहज संवाद और सटीक कौमिक टाइमिंग से दर्शकों को हंसाने वाले ‘मटरू’ से पटना में हुई मुलाकात में हुई लंबी बातचीत में उन्होंने न सिर्फ अपने संघर्षों की कहानी सुनाई, बल्कि भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री की कई अनकही बातों पर भी बेबाक राय रखी. पेश हैं, उसी के खास अंश :
आप की पहचान आज एक कौमेडियन के रूप में बन रही है. लेकिन इस की शुरुआत कैसे हुई?
सच कहूं तो मैं ने कभी प्लान कर के कौमेडियन बनने का फैसला नहीं किया था. बचपन से ही मेरी आदत थी कि माहौल गंभीर हो जाए तो मैं कोई मजाक कर देता था. परिवार वाले कहते थे कि तुम जहां जाते हो, वहां हंसी का माहौल बन जाता है. धीरेधीरे लगा कि अगर यही काम लोगों को खुशी देता है, तो इसे ही अपना रास्ता क्यों न बनाया जाए. बस, वही आदत आज मेरा पेशा बन गई. अकसर कहा जाता है कि
भोजपुरी फिल्मों में कौमेडियन को सिर्फ हलके मनोरंजन के लिए रखा जाता है. आप क्या सोचते हैं?
यह बात काफी हद तक सच है. कई फिल्में ऐसी होती हैं जहां कौमेडियन को सिर्फ 2-3 सीन दे कर कहा जाता है कि बस लोगों को हंसा देना. लेकिन कौमेडी करना इतना आसान नहीं है. एक कौमेडियन पूरी फिल्म का मूड बदल सकता है. अगर कहानी में सही तरीके से कौमेडी जोड़ी जाए, तो फिल्म और भी मजबूत हो सकती है.
आप की कौमिक टाइमिंग की काफी तारीफ होती है. इस का राज क्या है?
कौमेडी में सब से जरूरी चीज टाइमिंग है. अगर संवाद एक सैकंड पहले या बाद में बोल दिया, तो पूरा मजाक खराब हो सकता है. मैं हमेशा कोशिश करता हूं कि सीन को महसूस करूं. जब कलाकार सीन को जीता है, तब ही असली कौमेडी निकलती है.
आप को सरस सलिल भोजपुरी सिने अवार्ड्स जैसे मंच पर सम्मान मिलता है तो आप को कैसा लगता है?
अवार्ड मिलना हर कलाकार का सपना होता है. अगर ऐसा सम्मान मिलता है तो निश्चित रूप से खुशी होती है. लेकिन सच कहूं तो जब कोई दर्शक मिल कर कहता है कि आप की वजह से हम हंसे, तो वह मेरे लिए किसी भी ट्रौफी से बड़ा पुरस्कार होता है.
आने वाले समय में आप का सपना क्या है?
मैं चाहता हूं कि भोजपुरी फिल्मों में कौमेडी को अलग पहचान मिले. हमारे यहां इतने अच्छे कौमेडियन हैं, लेकिन उन्हें सही मौके नहीं मिलते. अगर उन्हें अच्छे किरदार और मजबूत कहानी मिले, तो भोजपुरी कौमेडी पूरे देश में लोकप्रिय हो सकती है. आज की जिंदगी में तनाव बहुत बढ़ गया है. अगर मेरी कौमेडी से किसी के चेहरे पर दो मिनट की मुसकान आ जाती है, तो लगता है कि मेरा मकसद कामयाब हो गया है.




