Hindi Story: राम सजीवन यादव की अपने गांव में ज्यादा इज्जत नहीं थी. वह अवारागर्दी के चलते बदनाम हो रहा था, तो पढ़ाई करने बाहर चला गया. पर वहां भी वह सुधरा नहीं. कालेज में एक दिन ऐसा हुआ कि राम सजीवन की जिंदगी बदल गई. क्या हुआ था उस के साथ?
एक सियासी परिवार में जनमे 20 साल के नौजवान राम सजीवन यादव ने जब आजमगढ़ से इलाहबाद का रुख किया तो उस के जेहन में केवल 2 बातें थीं. पहला घर के बाहर वह मौजमस्ती करना जो यहां मुमकिन नहीं होता और दूसरा अपनी जातबिरादरी के लिए लिए काम करना. चूंकि उस के बाबा उलटफेर सिंह ने खपसी ग्राम पंचायत का मुखिया रहते सामाजिक और सियासी जमीन बना दी थी, इसलिए उस का प्लान बी यह था कि अगर इस ट्रैक पर नाकाम रहा तो भी, बाबा वाली जगह तो मिल ही जाएगी.
राम सजीवन यादव के पिता राम बक्स सिंह यादव इलाके के दूध के बड़े सप्लायर थे, इसलिए उन्हें पैसे की कमी नहीं हुई. हवेली जैसा घर, 2 बहनों के बीच एकलौता भाई और 5 बीघे की पुश्तैनी जोत का भावी मालिक बहुत ही बनठन कर रहता था और महंगी सिगरेट पीने का शौकीन था. राम सजीवन यादव को उस के बाबा गांव से इसलिए भी हटाना चाहते थे क्योंकि बगल की दलित बस्ती की 3 लड़कियों के साथ इस के गहरे रिश्ते थे. गांव में यह बात चर्चा ए आम हो गई थी, जिस का गांव के विरोधी लोग पंचायत चुनाव में इस्तेमाल कर सकते थे.
हालांकि, इलाके में उन के असर, उन की जातबिरादरी की दबंगई और मजबूत सामाजिक एकता के चलते गांव का कोई दलित, डोम, ब्राह्मण और राजपूत इस बाबत मुंह नहीं खोल सकता था, क्योंकि इस बिरादरी के लोग आएदिन किसी न किसी निचली जाति वाले को पीटते और सताते रहते थे. खुद अपनी जवानी में उलटफेर सिंह इस के बड़े शौकीन थे. वे इसे मर्दानगी जिंदा रखने की कला से जोड़ते थे. वे कहते थे कि यह सब क्षत्रिय वंशियों के लिए आम बात है, जिस की चर्चा का कोई मतलब नहीं है. खपसी गांव में कुल 3 जातियां ही मुख्य थीं.
यादव 70 फीसदी से ज्यादा थे, फिर एससी और फिर ब्रह्माण थे. 4 घर राजपूतों के थे, लेकिन ज्यादातर की माली हैसियत गांव के एससी तबके से भी बुरी थी, इसलिए उन का कोई मतलब नहीं था. ब्राह्मण भी यादवों के यहां से मट्ठा ला कर भात खाते थे, इसलिए उन की और यादवों की कोई तुलना नहीं थी. यादवों का खेत बंटाई पर निचली जातियों के लोग जोतते थे. इस का डर भी इन समुदायों में बना रहता था. खैर, राम सजीवन यादव अपना बोरियाबिस्तर बांध कर इलाहबाद पहुंचा और कटरा महल्ले में किराए का कमरा एक हफ्ते में ही खोज कर शिफ्ट हो गया.
इस में उस के ही इलाके के एक क्रिमिनल ने मदद की थी, जिस के केंद्र में यह था कि जरूरत पड़ने पर इस कमरे को एक छिपने की जगह के तौर पर कभीकभार इस्तेमाल किया जाएगा. राम सजीवन यादव का मन कभी पढ़नेलिखने में नहीं लगा. वह यूनिवर्सिटी में जाता जरूर था, लेकिन घूमना और बकैती ही मुख्य काम था. इस तरह जल्द ही वह खलिहर मठाधीशों की मंडली का प्रिय बन गया. दिनभर राजनीति की बातें करता और शाम को बीयर का केन खाली कर के सो जाता. बाकी मन करने पर अपने गांव के कुछ हमउम्र लंपट टाइप लड़कों से फोन पर एससी तबके और ब्राह्मणों की बस्ती की कुछ लड़कियों और औरतों के नाजुक अंगों के साइज की चर्चा करता था और सिगरेट के कश लेता था.
मठाधीशों के बीच पिछले 3 महीने की जातिगत और सामाजिक सियासी चर्चा से राम सजीवन यादव इस नतीजे पर पहुंचा था कि आंदोलनवांदोलन कर के सियासत में कुछ नहीं कर सकता. नेता से पहचान और पूंजी ही टिकट की रेस में एंट्री देती है और बिना सदन में घुसे न खुद का कोई विकास होगा और न ही समाज का बदलाव होगा. पौलिटिक्स में प्रौफिटलौस स्टेटमैंट ही असली बात है. बाकी सब है, टाइमपास है. एक दिन यूनिवर्सिटी में लड़कों ने फीस बढ़ने के खिलाफ अचानक आंदोलन कर दिया. इस आंदोलन में राम सजीवन यादव को भी पुलिस ने इसलिए पकड़ लिया, क्योंकि वह वहां खड़े हो कर आंदोलन कर रहे लड़कों का भाषण सुन रहा था.
हालांकि, उस के लाख कहने के बावजूद पुलिस ने उन्हें नहीं छोड़ा और उन छात्रों के साथ राम सजीवन यादव का भी चालान कर जेल भेज दिया. इस तरह राम सजीवन यादव भी 7 दिन जेल में बंद रहा. इस के बाद, विपक्षी जनशक्ति पार्टी से जुड़े वकीलों ने इन सभी की जमानत कराई. जेल से लौटने के बाद उन सब को जनशक्ति पार्टी के अध्यक्ष की तरफ से मुलाकात के लिए बुलाया गया, जो उन की जातबिरादरी के ही थे. उन सब ने वहां पहुंचते ही अध्यक्ष के पैर छुए. चीफ ने उन सभी लड़कों के साथ राम सजीवन यादव की भी हौसला अफजाई की और माला पहनाई. विपक्ष के नेता से मिले इस सम्मान के चलते राम सजीवन को हाथोंहाथ लिया गया.
अब उस के लिए पार्टी अध्यक्ष का दरवाजा हमेशा के लिए खुल गया था और बिना रोकटोक वह उन से कभी भी मिल सकता था. राम सजीवन यादव जनशक्ति पार्टी के लिए यूनिवर्सिटी में छात्रों के बीच काम करने लगा. राम सजीवन यादव को यह सब करते हुए एक साल से ज्यादा का समय बीत गया. अब वह जनशक्ति पार्टी की छात्र विंग में पदाधिकारी हो गया था और बड़ा चंदाखोर भी. वहां चारों तरफ उस की जातबिरादरी और उस के जैसी दिलचस्पी वाले कई लोग थे. अपने पुराने मिजाज के चलते कुछ हमजाति लड़कियों का भी शिकार राम सजीवन यादव ने किया. यह राज है कि इस के पीछे उन की रजामंदी थी या फिर कोई लालच. बात आज तक खुल नहीं पाई.
खैर, अब विधानसभा के चुनाव आ गए थे. राम सजीवन यादव ने अपनी टीम लगा कर जनशक्ति पार्टी के लिए चुनाव प्रचार किया. पार्टी सत्ता में आ गई. अब राम सजीवन का कद बढ़ चुका था. ट्रांसफरपोस्टिंग के कारोबार से ले कर ठेकापट्टा दिलवाने में उस का दखल रोज बढ़ रहा था. इस तरह उस की जेब में खूब पैसा घुसने लगा. अब वह लखनऊ राजधानी में फ्लैट ले कर शिफ्ट हो गया, जो कभीकभी इलाहाबाद के खलिहर मठाधीशों की आरामगाह भी बनता था. वहां पहुंच कर राम सजीवन यादव ने अपने एक सिक्योरिटी कंपनी भी बनाई और सरकारी संस्थानों में सिक्योरिटी गार्ड का ठेका भी लेने लगा. इस तरह से उस की चौतरफा कमाई होने लगी.
पार्टी अध्यक्ष या सीधे मुख्यमंत्री का नजदीकी होने की जो हनक थी उस का एक अलग ही नशा था, जो राम सजीवन जैसे घोर जातिवादी और कम पढ़ेलिखे नौजवान के बरताव में हर समय दिखाई पड़ जाता था.
दौलत और सत्ता का नशा थामे नहीं थमता. अब राम सजीवन यादव भी मसाज के लिए बैंकाक जाता था, विदेशी शराब पीता था. इस तरह से 5 साल बीत गए. सड़क पर संघर्ष भी बीते दौर की बात हो गई थी. सब बदल चुका था. अब राम सजीवन यादव अपने गांव की औरतों के फिगर की चर्चा की जगह इस पर चर्चा करता कि कौन सा नौकरशाह किस काम से कहां जाता है और क्या करता है. कितनी पूंजी उठाता है और पार्टी को कितना देता है. इस दौरान पावर और लक्ष्मी दोनों ने उस पर खूब कृपा बरसाई. गांव में उस की जो ठसक थी, उस का बखान ही नहीं किया जा सकता.
सरकार के 5 साल बीत गए. फिर से चुनाव का मौसम आ गया था. इस चुनाव में राम सजीवन यादव ने पार्टी के लिए चुनाव प्रचार के साथ अपनी कमाई पूंजी से भी पार्टी फंड में मदद की. उस की सोच थी कि सरकार बनने पर यह सब घाटा पूरा हो जाएगा. हालांकि, जनशक्ति पार्टी यह चुनाव बुरी तरह हार गई. यह राम सजीवन यादव के लिए ?ाटका था, क्योंकि इस ?ाटके का कोई अनुभव उसे नहीं था. अब सरकार बदल चुकी थी. नौकरशाही नए निजाम के मुताबिक ढलने लगी. इस निजाम में अब राम सजीवन यादव को अपना कारोबार सुरक्षित रखने में भी समस्याएं आने लगीं. कुछ कारोबार तो एक साल के भीतर ही बंद करने पड़े और कई ठेकों में जांच शुरू हो गई, जिसे सैटल करने में मोटी रकम खर्च हुई.
अब इन ठेकों में तगड़ा कमीशन सत्ता के लोगों को देना मजबूरी बन गया. खुद की आदतों पर भी उस का मोटा पैसा खर्च हो रहा था. खैर, इस तरह 5 सालों में राम सजीवन यादव की जमा पूंजी का आधा से ज्यादा खर्च हो गया. हालांकि, उसे इस बात का पूरा यकीन था कि अगली सरकार में यह सब खर्च निकाल लेगा. टैंशन की कोई बात नहीं है. वह 5 साल जनशक्ति पार्टी के साथ पूरी तरह लगा रहा. एक बार फिर से चुनाव आ गए. इस बार पार्टी अध्यक्ष ने उन सब को याद किया जिन्होंने पार्टी के सत्ता में रहते मुनाफा कमाया था, क्योंकि पार्टी की माली जड़ें बहुत सिमट गई थीं और चुनाव के लिए पैसा चाहिए था.
राम सजीवन यादव ने इस चुनाव में पार्टी के लिए 10 गाडि़यां दीं और जीजान लगा कर खुद भी काम किया. जनशक्ति पार्टी फिर चुनाव हार गई. यह राम सजीवन यादव के लिए दूसरा बड़ा टका था. केवल जमा पूंजी के सहारे अब वह कितने दिन सियासत में चल सकता था. जातबिरादरी की चेतना के आगे उसे कुछ आता भी नहीं था. अब उस की जेब का बड़ा हिस्सा खाली था. जो धंधापानी था वह भी तकरीबन सिमट गया था. साथ में चलने वाले सिक्योरिटी गार्डों को 5 महीने से तनख्वाह नहीं मिलने के चलते वह सब भाग गए थे. दिनोंदिन उस का भौकाल कमजोर हो रहा था और उसे कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था.
बहुत हताशा में, एक दिन राम सजीवन यादव अपने कुलगुरु का दर्शन करने गया. कुलगुरु ने समस्या सुनी. फिर उसे सम?ाया कि पार्टी को छोड़ कर अपना देखो नहीं तबाह हो जाओगे. उन के मुताबिक गतिशीलता समाज का नियम है. जड़ मत बनो नहीं तो सड़गल जाओगे. उन्होंने सूखे पेड़ का उदाहरण दे कर बातें सम?ाई और जल्द ही उन्हें कुछ मदद का भरोसा दिया. 2 महीने के अज्ञातवास के बाद, एक दिन एक अनजान फोन राम सजीवन यादव को आया. अचानक उस ने सत्ताधारी प्रजा पार्टी की सदस्यता ले ली और मुख्यमंत्री आवास के इर्दगिर्द दिखाई देने लगा. उसे लगा कि जातबिरादरी के चक्कर में अपना फालूदा बनवाने का कोई फायदा नहीं है. जिस दल में रहो वहीं अपना कद मजबूत करो.
पौलिटिक्स में जो प्रैक्टिकल होते हैं वही आगे बढ़ते हैं. दलबदल पर भ्रष्ट जनता क्या बोलेगी? उसे चमत्कार चाहिए बस. किसी भी तरह से चमकने वाला ही उस का हीरो हो सकता है. फिर, एक दिन राम सजीवन यादव ने राष्ट्रवादी यादव मंच का गठन किया और अपनी बिरादरी को राष्ट्रवाद का फायदा सम?ाने वाली प्रदेशव्यापी यात्रा शुरू की. इस के लिए उसे 40 लाख की फंडिंग समाज से हुई. इस तरह से उस ने न केवल खुद को बदला, बल्कि अपने समाज के लिए भी इस सत्ता में घुसने के नए रास्ते खोले. आजकल राम सजीवन यादव राज्य सरकार में बीज विकास विभाग में आमंत्रित सदस्य है और बिरादरी को राष्ट्रवाद की ट्रेनिंग देते हुए दारू के 4 अड्डे और खनन के 3 ठेके चला कर अपना विकास कर रहा है.




