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लेखक-उषा किरण सोनी

मैं मदन की प्रतीक्षा में थी पर आया उन का मात्र 2 पंक्तियों का पत्र, ‘रीतू, मैं युद्ध में कश्मीर जा रहा हूं, मेरी कीर्ति को संभाल कर रखना. तुम्हारा मदन.’

इस समाचार के पाते ही मेरे सास- ससुर मुझे लेने आ गए पर मेरे पिता के अनुरोध पर प्रसव तक यहीं रहने की अनुमति दे चले गए.

मेरे भीतर जीवन कुलबुलाने लगा था. मैं उस सुख को जी रही थी. आखिर वह प्रतीक्षित क्षण भी आ गया. कीर्ति का संसार में पदार्पण मांपापा और अम्मांबाबूजी के आनंद को सीमित नहीं कर पा रहा था पर मेरी खुशी तो मदन के बिना अधूरी थी. नन्हे मदन के रूप में बगल में सोई बेटी को देख मैं सुख से अभिभूत हो गई.

कुदरत ने यहां भी मेरी व राज की जीवन जिंदगी की जीवनी एक ही लेखनी से, एक ही स्याही से लिखी थी. अस्पताल से आए अभी 15 दिन ही हुए थे कि कश्मीर में गिरे बम के टुकड़े मेरी छाती पर आ गिरे और मेरा सिंदूर पोंछ, चूडि़यां तोड़ गए. मैं हतबुद्धि हो कल्पना में मदन को देखती रही. मांपापा का कं्रदन और कीर्ति की चीखें भी मेरा ध्यान विचलित न कर सकीं.

मां ने चीखती कीर्ति को मेरी गोद में डाल दिया. बच्ची के दूध पीने के उपक्रम में दर्द मेरी छाती में रेंग उठा. जड़ता टूट चली और बांध टूट गया. पापा ने कहा, ‘इसे रो लेने दो, जितना रोएगी उतनी ही शांति पाएगी और बच्ची से जुड़ती चली जाएगी.’

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