लेखक- सरिता गर्ग

सुहासिनी का जी कर रहा था कि वह चीखचीख कर अपने दिल में छिपा दर्द सारे जहान के सामने रख दे. आंखों से लगातार आंसू बह रहे थे तो अपमान की चोट खाया मन अंदर से सांप की तरह फुफकार रहा था. वह हाथ में रिसीवर थामे पत्थर की मूर्ति सी खड़ी रही.

कुछ महीने पहले यही एजेंट था जो आवाज में शहद की मिठास घोल कर बातें करता था. कहता था, ‘मैडम, गरीबी में जन्म लेना पाप नहीं, गरीबी में अपने को एडजस्ट करना पाप है. अब सोचें कि उस छोटी, गंदी सरस्वती बाई चाल में आप के बच्चे का भविष्य क्या होगा. ऐसा सुनहरा अवसर फिर हाथ नहीं आएगा इसलिए हर माह की आसान किस्तों पर इंद्रप्रस्थ कालोनी में एक फ्लैट बुक करा लीजिए.’ और आज वही एजेंट फोन पर लगभग गुर्राते हुए फ्लैट की मासिक किस्त मांग रहा था.

दरवाजे की घंटी बजते ही सुहासिनी का ध्यान उधर गया. उस ने दरवाजा खोल कर देखा तो सामने डाकिया खड़ा था, जिस ने एकसाथ 3 लिफाफे उसे पकड़ाए. पहला लिफाफा मिकी के पोस्टपेड सेलफोन के बिल का था. दूसरा मासिक किस्त पर खरीदी गई कार की किस्त चुकाने का था और तीसरा सोमेश के क्रेडिट कार्ड से की गई खरीदारी का विवरण था. इतनी देनदारी एकसाथ देख कर सुहासिनी का सिर चकरा गया और वह धम से वहीं बैठ गई. उसे लगा कि वह ऐसे चक्रव्यूह में फंस गई है जिस में अंदर घुसने का रास्ता तो वह जानती थी, बाहर निकलने का नहीं.

सुहासिनी को उस शाम की याद आई जब सोमेश उसे समझा रहे थे, ‘घर में सुखशांति बनाए रखने के लिए आलीशान चारदीवारी की नहीं संतोष और संतुष्टि की जरूरत है.’

सुहासिनी तब अपने पति की बात काटती हुई बोली थी, ‘सोमेश, यह हद और हैसियत की बातें पुराने जमाने की हैं. आज के जमाने का नया चलन है, असंतुष्टि का बीज बो कर हद और हैसियत की बाड़ पार करना और सुखसाधन के वृक्ष की जड़ों को जीवन रूपी जमीन में बहुत गहरे तक पहुंचाना.’

पत्नी की महत्त्वाकांक्षा की उड़ान को देख कर सोमेश को लगा था कि गिरने के बाद चोट उसे तो लगेगी ही उस की पीड़ा का एहसास उन्हें भी तो होगा, इसीलिए पत्नी को समझाने का प्रयास किया, ‘‘देखो, सुहास, बडे़बूढे़  कह गए हैं कि जितनी चादर हो उतने ही पैर फैलाओ.’’

इस पर सुहासिनी ने पलटवार किया, ‘‘सोमू, तुम अपना नजरिया बदलो, ऐसा भी तो हो सकता है कि पहले पैर फैला कर सो जाओ फिर जितनी चादर खींची जा सकती है उसे खींच कर लंबी कर लो, नींद तो आ ही जाएगी. समय के साथ दौड़ना सीखो सोमू, वरना बहुत पीछे रह जाओगे.

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‘‘सोमू, मैं नहीं चाहती कि हमारे बच्चे तंगहाली की जिंदगी जीएं या आज की तेज भागती जिंदगी में किसी कमी के चलते पीछे रह जाएं. तंगहाली में रहने वालों की सोच भी तंग हो जाती है इसलिए आओ, हम उन्हें एक विशाल आसमान दें.’’

सुहासिनी शुरू से महत्त्वाकांक्षी रही हो ऐसा भी नहीं था. हां, वह जब से विभा के घर से आई थी, पूरी तरह

बदल गई थी. विभा के घर

का ऐशोआराम, सुखसुविधाएं, आलीशान बंगला, शानदार सोफे, कंप्यूटर, महंगी क्राकरी देख कर सुहासिनी भौचक्की रह गई थी.

चाय पर विभा ने अपनी अमीरी का राज उस के सामने इस तरह से खोला, ‘‘नहींनहीं, हमारी ऊपर की कोई कमाई नहीं है. भई, हम ने तो जीवन में सुखसुविधा का लाभ उठाने के लिए जोखिम और दिमाग दोनों से काम लिया है.’’

सुहासिनी ने पूछा, ‘‘वह कैसे?’’

सरस सलिल विशेष

विभा विजय भरी मुसकान सब पर फेंकती हुई भाषण देने के अंदाज में बोली, ‘‘समाज का एक बहुत बड़ा तबका मध्यम वर्ग है, लेकिन यह तबका हमेशा से ही डरा, दबा और संकुचित रहा है, कुछ बचाने के चक्कर में अपनी इच्छाओं को मारता रहा है लेकिन जब से देश में उदारीकरण आया है और विश्व का वैश्वीकरण हुआ है, इस ने मध्यम आय वर्ग के लोगों के लिए तरक्की के नए द्वार खोल दिए हैं. आज वह हर वस्तु जो कल तक लोमड़ी के खट्टे अंगूर की तरह थी, हथेली पर चांद की तरह मध्यम आय वर्ग के हाथों में है, चाहे वह कार, फ्लैट, एसी, विदेश भ्रमण या फिर सेलफोन ही क्यों न हो,’’ विभा ने अपनी बात खत्म की तो उस के पति ने बात को आगे बढ़ाया, ‘‘भई, चार दिन की जिंदगी में शार्ट टर्म बेनिफिट्स ही सोचना चाहिए, लांग टर्म प्लानिंग नहीं.’’

सोमेश भी बहस के बीच में पड़ता हुआ बोला, ‘‘भाईसाहब, ये कंपनियां उन शिकारियों की तरह हैं जो भूखे कबूतरों को पहले दाना डालती हैं, फिर जाल बिछा कर उन को कैद कर लेती हैं. अब आप क्रेडिट कार्ड को ही ले लें, पहले तो वह हमें कर्ज लेने के लिए पटाते हैं, और आप पट गए तो उस कर्ज पर मनचाहा ब्याज वसूलते हैं.’’

डिनर के बाद पार्टी समाप्त हो गई. मेहमान अपनेअपने घरों को चले गए. उस पार्टी ने सुहासिनी की सोच में क्रांतिकारी बदलाव ला दिया. सुहासिनी और सोमेश ने पहले इंद्रप्रस्थ कालोनी में फ्लैट बुक करवाया, फिर कार, धीरेधीरे कंप्यूटर, एअर कंडीशनर, सोफे आदि सामानों से घर को आधुनिक सुखसुविधायुक्त कर दिया.

अब सोमेश के परिवार के सामने दिक्कत यह आई कि पहले जहां उस अकेले की आमदनी से घर मजे से चल जाता था, मासिक किस्तों को चुकाने के लिए सुहासिनी को भी नौकरी करनी पड़ी. सोमेश किस्तों को ले कर तनाव में रहने लगा. अच्छे खाने का उन्हें शुरू से ही शौक था, पर कर्र्जाें को पूरा करने के चक्कर में उन्हें अपने खर्चों में कटौती करनी पड़ी.

सरस्वती बाई चाल से सोमेश का दफ्तर काफी पास था. यही वजह थी कि सोमेश हर शाम कभी मुन्नू हलवाई की कचौरी, कभी जलेबी का दोना ले कर घर जाते और सब मिल कर खाते थे. अब इंद्रप्रस्थ कालोनी से सोमेश का दफ्तर काफी दूर पड़ता था. ट्रैफिक जाम से बच कर वह घर पहुंचते तो इतना थके होते कि हंसने या बात करने का कतई मन न करता था.

सुहासिनी कभीकभी सोचती, आकाश के तारों से घर रोशन करने के लिए उस ने घर का दीपक बुझा दिया, किंतु कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है, ऐसा सोच कर खयालों को झटक कर अलग कर देती.

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एक दिन अचानक उस का सेलफोन बजा. सोमेश के दफ्तर से फोन था. सोमेश को अचानक हार्टअटैक हुआ था. दफ्तर वालों की मदद से सोमेश को स्थानीय नर्सिंगहोम में भरती करवा दिया गया था. सुहासिनी भागीभागी अस्पताल पहुंची. सोमेश गहन चिकित्सा कक्ष में थे. सुहासिनी की आंखें भर आईं. उसे लगा सोमेश की इस हालत की जिम्मेदार वह खुद है. अगले दिन सोमेश को होश आया. सुहासिनी उन से आंखें नहीं मिला पा रही थी.

उस को अब चिंता सोमेश की नहीं, अस्पताल का बिल भरने की थी. उन का बैंक बैलेंस तो निल था ही ऊपर से हजारों के पेंडिंग बिल पडे़ थे. अस्पताल का बिल कैसे चुकाया जाएगा, सोच कर उसे चक्कर आ रहे थे.   द्य

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