जी हां, इस वक्त बच्च चोरी की अफवाह इतनी ज्यादा फैल गई है कि मौब लिंचिंग जैसी घटना को होते देर नहीं लग रही है. जहां देखो हर जगह से खबर आ रही है कि बच्चा चोरी के शक में भीड़ ने व्यक्ति को पीटा. और केवल बच्चा चोरी का इल्जाम ही नहीं बल्की दूसरे इल्जाम लगा कर भी भीड़तंत्र इस कदर लोगों पर हावी हो जाती है कि फिर उस व्यक्ति की जान ले कर ही छोड़ती है. इधर कुछ दिनों में कुछ ऐसे मामले सामने आए हैं जिन्होंने तूल पकड़ा हुआ है.

असम के जोरहाट जीले में चाय बागान में काम करने वाले मजदूरों ने एक डौक्टर की पीट-पीट कर हत्या कर दी सिर्फ इसलिए क्योंकि उनमें से एक मजदूर की हालत ठीक न होने की वजह से उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया था और उसकी जान वो डौक्टर नहीं बचा पाया और मजदूरों की भीड़ ने डौक्टर की लापरवाही बताते हुए उसे पीटा.

बच्चा चोरी की अफवाह भी पूरे देश में तेजी से फैल रही है और इसके चलते बकसूरों की जान जा रही है. हरियाणा के रेवाड़ी में एक ऐसी ही घटना हुई. तीन साल की एक बच्ची अपने मामा के साथ बाजार गई थी और वहां पर मामा को ही बच्चा चोर समझ कर पकड़ लिया और पीटना शुरु कर दिया. बात बस इतनी सी थी कि देर रात बच्ची किसी समान के लिए रोने लगी और लोगों ने उसके मामा को बच्चा चोर समझ कर घेर लिया.

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दिल्ली में भी बच्चा चोरी के आरोप में पिटाई का एक मामला सामने आया. इसमें एक मूक बाधिर महिला को भीड़ पीट रही है. कोई लात-घूसे मार रहा है तो कोई थप्पड़ लगा रहा है. बात सिर्फ इतनी सी थी कि महिला तुगलकाबाद की रहने वाली है. वो उत्तर-पूर्वी दिल्ली में किसी काम से आई थी और वहां कुछ बच्चों को टौफी देने लगी बस फिर क्या था लोगों ने उसे बच्चा चोर समझा और पीटना शुरू कर दिया. महिला ने बचने की पूरी कोशिश की लेकिन भीड़ ने उसे घेर रखा था.

गाजीपुर के बहरियाबाद कस्बे में भी इसी तरह की घटना घटी वहां पर भी देर रात बच्चा चोर- बच्चा चोर का हंगामा हुआ और बेकाबू भीड़ ने एक व्यक्ति को मार-मार कर अधमरा कर दिया. कुछ समय पहले की ही बात है जब गौ तस्करी के शक में भीड़ लोगों को पीटा करती थी लेकिन आज कल तो बच्चा चोरी की अफवाह ने तूल पकड़ा है.

यहां बात सिर्फ ये नहीं है कि बच्चा चोरी का इल्जाम है या गौ तस्करी का इल्जाम है बात तो ये है कि चाहे जो भी हो लेकिन ये भीड़तंत्र भला कानून को अपने हांथ में कैसे ले सकती है और ये इस कदर किसी पर भी कैसे हावी हो सकती है कि व्यक्ति की जान ले ले वो भी सिर्फ शक के आधार पर. क्या किसी का जीवन इस भीड़ के लिए मायने नहीं रखता है? ये भीड़ होती कौन है फैसला लेने वाली कि किस के साथ क्या करना है. आज तो सरकार भले ही कई नेक और अच्छे काम कर रही हो लेकिन इस भीड़तंत्र का क्या? सरकार को जल्दी ही इसका कुछ इलाज करना होगा वरना इसी तरह भीड़तंत्र लोगों पर हावी होता रहेगा और मासूम और बगुनाह लोगों की जान जाती रहेगी. इस मौब लिंचिंग को रोकने के लिए सरकार को कोई कड़ा कदम उठाना ही होगा.

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