लोकतंत्र में बढ़ती तानाशाही

लोकतंत्र का मतलब यह माना जाता है कि जो भी काम होंगे, वे जनता के हित में उन के चुने हुए प्रतिनिधि करेंगे. जिस देश में जितने ज्यादा नागरिकों को वोट देने का हक रहता है, उस देश को उतना ही ज्यादा लोकतांत्रिक समझ जाता है. इस तरह भारत दुनिया के लोकतांत्रिक देशों में सब से बड़ा है. यहां वोट देने वाले नागरिकों की तादाद दुनियाभर में सब से बड़ी है.

भारतीय संविधान ने अनुच्छेद 326 के तहत बालिगों को वोट डालने का हक दिया है. वोटर के लिए जरूरी है कि वह 18 साल या उस से ज्यादा उम्र का हो, साथ ही भारत का निवासी भी हो.

भारत में 1935 के ‘गवर्नमैंट औफ इंडिया ऐक्ट’ के मुताबिक, तब केवल 13 फीसदी जनता को वोट का हक हासिल था. वोटर का हक हासिल करने की बड़ीबड़ी शर्तें थीं. केवल अच्छी सामाजिक और माली हालत वाले नागरिकों को यह हक दिया जाता था. इस में खासतौर पर वे लोग ही थे, जिन के कंधों पर विदेशी शासन टिका हुआ था. पर आजाद भारत में वोट का हक सभी को दिया गया.

लोकतंत्र के बाद भी हमारे देश में लोक यानी जनता की जगह पर तंत्र यानी अफसर और नेताओं का राज चलता है. इस में जनता घरेलू मामलों से ले कर अदालतों तक के बीच चक्की में गेहूं की तरह पिसती है. आखिर में उस का आटा ही बन जाता है. अब शायद कोई ही ऐसा हो, जो इस चक्की में पिस न रहा हो. घर के अंदर तक कानून घुस गया है. पतिपत्नी के बीच से ले कर घर के बाहर सीढ़ी और छत आप की अपनी नहीं है. जो जमीन आप अपनी समझ कर रखते हैं, असल में वह आप की नहीं होती है.

लोकतंत्र में जो तंत्र का हिस्सा है, वह लोक को अपनी जायदाद समझाता है. कानून लोक के लिए तंत्र के हिसाब से चलता है. अगर हम इस को घर के अंदर से देखें तो आप अपनी सुविधा के मुताबिक न तो छत पर कोई कमरा बनवा सकते हैं और न ही घर से बाहर निकलने के लिए सीढ़ियां. तंत्र को देख रहे अफसर अपने हिसाब से नियम बनाते हैं. हाउस टैक्स, प्रौपर्टी टैक्स जैसे नियम अफसर बनाते हैं. जनता से कभी पूछा नहीं जाता है. यही अफसर जनता के हित में अलग तरह से काम करते हैं, जबकि अफसरों, नेताओं के हित में अलग तरह से काम होता है.

लोकतंत्र में तानाशाही बढ़ती जा रही है. वोट पाने के लिए वोटर को लुभाया जा रहा है और विपक्ष को डराया जा रहा है. यह उसी तरह से है, जैसे घर के मालिक को तमाम तरह के टैक्स से परेशान किया जा रहा है. रोजगार पाने के लिए भटक रहे छात्रों को परेशान किया जा रहा है.

नौकरी के लिए इम्तिहान होता है, तो पेपर आउट करा दिया जाता है. बेरोजगारी का आलम यह है कि चपरासी की नौकरी के लिए पीएचडी वाले छात्र लाइन लगा कर खड़े होते हैं. नेताओं के पास इतना पैसा है कि वे वोट को मैनेज करते हैं.

सत्ता को बनाए रखने के लिए यह कोशिश होती है कि विपक्षी को चुनाव न लड़ने दिया जाए. बाहुबली नेता धनंजय सिंह के मसले में उन का कहना है कि ‘चुनाव लड़ने से रोकने के लिए यह किया जा रहा है’. ऐसे उदाहरण कई हैं, जहां लोकतंत्र में तानाशाही दिखती है.

आम आदमी पार्टी का मसला हो, सांसद महुआ मोइत्रा का मामला हो, तमाम उदाहरण सामने हैं. कांग्रेस नेता राहुल गांधी को ले कर भी उन की ऐसी ही घेराबंदी की गई थी.

असल में लोकतंत्र की बात करने वाला या लोकतंत्र के जरीए ही सत्ता संभालने वाला कब तानाशाह बन जाता है, इस का पता नहीं चलता.

दुनियाभर में इस के तमाम उदाहरण भरे पड़े हैं. नैपोलियन, हिटलर और पुतिन जैसे शासकों ने अपनी शुरुआत लोकतंत्र से की, बाद में तानाशाह बन गए. भारत में जिस तरह से विरोधी नेताओें को चुनाव लड़ने से रोका जा रहा है, उस से तानाशाही बढ़ने का खतरा साफतौर पर दिख रहा है.

क्या जेल से चलेगी दिल्ली सरकार या लगेगा राष्ट्रपति शासन? जानिए, क्या हैं नियम

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को पद से हटाने की मांग को ले कर दायर जनहित याचिका को दिल्ली हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया है. साथ ही कहा है कि अरविंद केजरीवाल को मुख्यमंत्री पद से हटाने के मामले में न्यायिक दखल की जरूरत नहीं है. कोर्ट ने कहा, ‘हमें राजनीतिक दायरे में नहीं घुसना चाहिए और इस में न्यायिक हस्तक्षेप की कोई गुंजाइश नहीं है.’

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी के बाद से ही दिल्ली की सरकार चलाने को ले कर कई सवाल खड़े होने लगे हैं, जिस में कई तरह के कयासों के साथसाथ कई महत्वपूर्ण सवाल भी सामने आ रहे हैं. सब से मुख्य सवाल यह है कि क्या अरविंद केजरीवाल जेल से ही सरकार चलाएंगे? और अगर हां, तो क्या जेल से सरकार चलाना संभव है? हालांकि, गिरफ्तारी के बाद से अरविंद केजरीवाल की पत्नी सुनीता केजरीवाल को मुख्यमंत्री बनाए जाने की खबरें भी लगातार सामने आ रही हैं. लेकिन ये बातें कितनी सही हैं, यह आने वाले दिनों में साफ हो जाएगा.

क्या जेल से सरकार चलाएंगे केजरीवाल?

दिल्ली के मुख्यमंत्री की गिरफ्तारी के पहले से ही आम आदमी पार्टी नेता दावा करते रहे हैं कि अगर केजरीवाल की गिरफ्तारी हुई तो दिल्ली की सरकार जेल से चलेगी. दिल्ली सरकार की मंत्री आतिशी ने कहा कि दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल हैं और आगे भी बने रहेंगे, चाहे जेल से सरकार चलानी पड़ी तो चलाएंगे.

आतिशी की मानें तो देश के इतिहास में पहली बार ऐसा देखने को मिलेगा कि किसी राज्य के मुख्यमंत्री जेल से सरकार चलाएंगे और अब अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी के बाद भी उन का पद से इस्तीफा न देना काफी हद तक इस बात को सही साबित करता है.

क्या केजरीवाल इस्तीफा देंगे?

अगर कानून के जानकारों की मानें तो दोषी ठहराए जाने तक अरविंद केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के लिए बाध्य नहीं हैं. लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951, अयोग्यता प्रावधानों की रूपरेखा देता है, लेकिन पद से हटाने के लिए दोषसिद्धि आवश्यक है यानी यह साबित करना होगा कि वे दोषी हैं.

आज तक के इतिहास में अब तक ऐसा नहीं हुआ कि कोई मौजूदा मुख्यमंत्री ऐसा रहा हो, जिस ने जेल से सरकार चलाई हो. कानून के जानकारों के मुताबिक, जेल से सरकार नहीं चला करती. संविधान में ऐसा कहीं नहीं लिखा है कि सरकार का मुखिया जेल में चला जाए और वहीं से सरकार चलती रहे, क्योंकि मुख्यमंत्री पद के तौर पर ऐसे कई काम होते हैं, जिन के लिए मुख्यमंत्री की उपस्थिति अनिवार्य होती है.

साथ ही जेल की बात करें, तो अगर कोई शख्स जेल में है तो उस के लिए जेल का मैन्युअल फौलो करना अनिवार्य है, क्योंकि पद के अनुसार जेल में कोई अलग नियम नहीं हैं. ऐसे में विधायकों, मंत्रियों से मिलना या बैठक करने पर रोक लग सकती है. इसे ले कर आम आदमी पार्टी के मंत्री सौरभ भारद्वाज का कहना है कि अगर मुख्यमंत्री जेल में हैं तो बैठक और और्डर भी वहीं से दिए जाएंगे.

हाल ही में आई खबरों के मुताबिक, मुख्यमंत्री जेल से ही कई आदेश भी जारी कर रहे हैं. हालांकि ये सभी बातें राजनीतिक भाषण के लिए तो बिलकुल सही हैं, लेकिन प्रैक्टिल तौर पर फिट नहीं बैठती हैं. इस बात पर आम आदमी पार्टी के नेता कहते हैं कि इसे ले कर वे कोर्ट में याचिका दायर करेंगे. अगर कोर्ट इस मामले पर विचार करता है तो भी इस में वक्त लगेगा.

क्या लागू होगा राष्ट्रपति शासन?

आप नेताओं का कहना है कि हमारे पास पूर्ण बहुमत है. ऐसे में मुख्यमंत्री इस्तीफा क्यों दें? इस के बाद सिर्फ एक ही रास्ता बनता है, जिस में मुख्यमंत्री को बरखास्त कर दिया जाए. कानून में अनुच्छेद 239एए में ऐसा प्रावधान है, जिस में दिल्ली के उपराज्यपाल राष्ट्रपति को पत्र लिख कर मुख्यमंत्री के पद छोड़ने की बात कहें. ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति उन्हें पद से हटा सकते हैं.

इस के अलावा संविधान का अनुच्छेद 356 कहता है कि किसी भी राज्य में संवैधानिक तंत्र विफल होने या इस में किसी तरह का व्यवधान पैदा होने पर राष्ट्रपति शासन लागू किया जा सकता है. 2 बातों को इसमें आधार बनाया जा सकता है. पहली, जब सरकार संविधान के मुताबिक, सरकार चलाने में सक्षम न हो. दूसरी, जब राज्य सरकार केंद्र सरकार के निर्देशों को लागू करने में विफल रहती है.

राष्ट्रपति शासन लगने पर कैबिनेट भंग कर दी जाती है. राज्य की पावर राष्ट्रपति के पास आ जाती है. इन के आदेश पर ही राज्यपाल, मुख्य सचिव और दूसरे प्रशासकों या सलाहकारों की नियुक्ति की जाती है.

क्या केजरीवाल को पद से हटाने का जोखिम लेगा केंद्र?

अब राजनीति तौर पर बात करें, जो राजनीति जानकारों का मानना है, कि केजरीवाल को मुख्यमंत्री पद से हटाना लोकसभा चुनाव में उलटा पर सकता है, क्योंकि अगर अरविंद केजरीवाल पद से हटाए जाएंगे, तो जनता का इमोशनल सपोर्ट उन्हें मिलेगा. ऐसे में केंद्र सरकार कभी भी इस बात का जोखिम नहीं उठाएगी. इस के पीछे राजनीति के अतीत में हुए लालू यादव और जयललिता का केस है, जिस में उन के जेल जाने के बाद उन्हें जनता की सहानुभूति मिली थी.

दलबदल का खेल

दलबदल और क्रौस वोटिंग भी उसी तरह से गलत है, जिस तरह ‘महाभारत’ में शकुनि और समुद्र मंथन में देवताओं ने गलत किया था. इस के लिए बेईमानी सिखाने वाला जिम्मेदार होता है. दलबदल करने के लिए उकसाने वाला दलबदल करने वालों से ज्यादा कुसूरवार होता है.

जब भगवा चोले वाले दक्षिणापंथी इस काम को करते हैं, तो वे भेड़ के भेष में भेडि़ए लगते हैं. राज्यसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश से ले कर हिमाचल प्रदेश तक जो हुआ, वह दलबदल की परिभाषा में भले ही पूरी तरह से फिट न हो, पर यह भ्रष्ट आचरण का उदाहरण है.

भारतीय राजनीति में दलबदल करने वालों को ‘आया राम गया राम’ के नाम से भी जाना जाता है. पहले यह कहावत ‘आया लाल गया लाल’ के नाम से मशहूर थी, फिर यह ‘आया राम गया राम’ में बदल गई. इस का मतलब राजनीतिक दलों में आने और जाने से होता है.

मजेदार बात यह है कि गया लाल नाम का एक विधायक था, जिस के नाम पर यह कहावत पड़ी थी. 55 साल के बाद आज भी यह कहावत पूरी तरह से हकीकत को दिखाती है.

बात साल 1967 की है. उस समय हरियाणा के हसनपुर निर्वाचन क्षेत्र, जिसे अब होडल के नाम से जाना जाता है, विधानसभा के सदस्य गया लाल ने एक आजाद उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीता था. इस के बाद वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हो गए थे.

इस के बाद गया लाल ने एक पखवारे में 3 बार पार्टियां बदली थीं. पहले राजनीतिक रूप से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से संयुक्त मोरचे में दलबदल कर के, फिर वहां से वे वापस कांग्रेस में शामिल हो गए और फिर 9 घंटे के भीतर संयुक्त मोरचे में शामिल हो गए.

जब गया लाल ने संयुक्त मोरचा छोड़ दिया और कांग्रेस में शामिल हो गए, तो कांग्रेस नेता राव बीरेंद्र सिंह, जिन्होंने गया लाल के कांग्रेस में दलबदल की योजना बनाई थी, चंडीगढ़ में एक  सम्मेलन में गया लाल को लाए और घोषणा की थी कि ‘गया लाल अब आया लाल’ हो गए हैं. इस से राजनीतिक दलबदल का खेल शुरू हो गया था. उस के बाद हरियाणा विधानसभा भंग हो गई और राष्ट्रपति शासन लगाया गया.

साल 1967 के बाद भी गया लाल लगातार राजनीतिक दल बदलते रहे. साल 1972 में वे अखिल भारतीय आर्य सभा के साथ हरियाणा में विधानसभा चुनाव लड़े. साल 1974 में चौधरी चरण सिंह के नेतृत्व में भारतीय लोक दल में शामिल हुए. साल 1977 में लोकदल के जनता पार्टी में विलय के बाद जनता पार्टी के उम्मीदवार के रूप में सीट जीती.

गया लाल के बेटे उदय भान भी दलबदल करते रहे. साल 1987 में आजाद उम्मीदवार के रूप में विधानसभा चुनाव जीता. साल 1991 में जनता पार्टी के उम्मीदवार के रूप में चुनाव हार गए. साल 1996 में आजाद उम्मीदवार के रूप में हार गए. साल 2000 में चुनाव जीतने के बाद इंडियन नैशनल लोकदल में शामिल हो गए. साल 2004 में दलबदल विरोधी कानून के तहत आरोपों का सामना करना पड़ा. इस के बाद वे कांग्रेस में शामिल हुए. साल 2005 में कांग्रेस के उम्मीदवार के रूप में जीत हासिल की.

हरियाणा रहा दलबदल का जनक

राजनीति का असर समाज और घरपरिवार पर भी पड़ता है. बाद में यह कहावत बहुत मशहूर हो गई. अपने वादों और दावों से बदलने वालों को ‘आया राम, गया राम’ के नाम से पहचाना जा सका. राजनीति की नजर से देखें, तो हरियाणा इस का केंद्र रहा है.

साल 1980 में भजनलाल जनता पार्टी छोड़ कर 37 विधायकों के साथ कांग्रेस में शामिल हो गए थे और बाद में राज्य के मुख्यमंत्री बने. साल 1990 में उस समय भजनलाल की ही हरियाणा में सरकार थी.

भाजपा के केएल शर्मा कांग्रेस में शामिल हो गए थे. उस के बाद हरियाणा विकास पार्टी के 4 विधायक धर्मपाल सांगवान, लहरी सिंह, पीर चंद और अमर सिंह धानक भी कांग्रेस में शामिल हो गए.

साल 1996 में हरियाणा विकास पार्टी और बीजेपी गठबंधन ने सरकार बनाई. बाद में हरियाणा विकास पार्टी के 22 विधायकों के पार्टी छोड़ने की वजह से बंसीलाल को इस्तीफा देना पड़ा. हरियाणा विकास पार्टी के 22 विधायक इनेलो में शामिल हो गए थे. उस के बाद भाजपा की मदद से ओम प्रकाश चौटाला ने राज्य में सरकार बनाई थी.

साल 2009 के चुनाव में किसी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था. कांग्रेस और इंडियन नैशनल लोक दल दोनों सरकार बनाने की कोशिश कर रही थीं. उस समय हरियाणा जनहित कांग्रेस के

5 विधायक सतपाल सांगवान, विनोद भयाना, राव नरेंद्र सिंह, जिले राम शर्मा और धर्म सिंह कांग्रेस में शामिल हो गए थे.

दूसरे प्रदेश भी चले दलबदल की राह

‘आया राम गया राम’ की शुरुआत भले ही हरियाणा से हुई हो, पर दलबदल की जलेबी हर दल को पसंद आने लगी. इस की मिठास में सभी सराबोर हो गए. साल 1995 के बाद से उत्तर प्रदेश में यह दौर तेज हुआ. पहली बार बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती भारतीय जनता पार्टी के सहयोग से मुख्यमंत्री बनीं.

साल 1996 में उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में किसी एक दल को बहुमत नहीं मिला. पहले 6 महीने राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा रहा. इस के बाद भाजपा और बसपा ने 6-6 महीने का फार्मूला तय किया, जिस के तहत पहले 6 महीने बसपा की मायावती को मुख्यमंत्री बनना था, उस के बाद भाजपा का नंबर आता.

दूसरी बार प्रदेश की मुख्यमंत्री बनने के बाद मायावती ने अपनी 6 महीने सरकार चलाई. जब सत्ता भाजपा को सौंपने का नंबर आया, तो मायावती ने राज्यपाल से विधानसभा भंग करने की सिफारिश कर दी. राज्यपाल रोमेश भंडारी कोई फैसला लें, इस के पहले भाजपा ने अपना समर्थन वापस ले कर सरकार गिरा दी.

अब सरकार बनाने का दावा पेश कर दिया कांग्रेस के नेता जगदंबिका पाल ने. राज्यपाल ने जगदंबिका पाल को मुख्यमंत्री बना दिया. इस के खिलाफ भाजपा हाईकोर्ट गई. तब कल्याण सिंह को मुख्यमंत्री बना कर बहुमत साबित करने का आदेश दिया गया. कोर्ट ने जगदंबिका पाल के मुख्यमंत्री बनाने के फैसले को रद्द कर दिया.

कल्याण सिंह और भाजपा ने बहुमत साबित करने के लिए बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस को तोड़ दिया. दलबदल कानून से बचने के लिए पार्टी टूट कर नई पार्टी बनी. विधासभा अध्यक्ष ने नई पार्टी को मंजूरी दी. बसपा से टूटी बहुजन समाज दल और कांग्रेस से अलग हुई लोकतांत्रिक कांग्रेस ने भाजपा को समर्थन दिया और कल्याण सिंह मुख्यमंत्री बने. 4 साल के कार्यकाल में भाजपा ने पहले कल्याण सिंह, इस के बाद राम प्रकाश गुप्ता और आखिर में राजनाथ सिंह मुख्यमंत्री बने.

साल 2003 में भी पहले बसपा और भाजपा का 6-6 महीने का फार्मूला बना, फिर वही कहानी दोहराई गई. इस बार भाजपा ने सरकार नहीं बनाई. लोकदल और भाजपा से अलग हुए कल्याण सिंह की पार्टी ने मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी को समर्थन दिया और सरकार बनाई.

कश्मीर में साल 2016 में पीपल्स डैमोक्रेटिक पार्टी के 43 में से 33 विधायक भाजपा में शामिल हो गए थे. पहले कांग्रेस विधायक पीपल्स पार्टी में चले गए थे और बाद में भाजपा में चले गए थे. साल 2018 में गोवा में कांग्रेस के 2 विधायक भाजपा में शामिल हो गए थे.

मध्य प्रदेश के दिग्गज नेता और कांग्रेस से सांसद व केंद्रीय मंत्री रहे ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस से अपना 18 साल पुराना नाता तोड़ कर भाजपा का दामन थाम लिया. कांग्रेस की सरकार गिर गई. बिहार में भी ‘आया राम गया राम’ का खेल चलता रहा. नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाने के लिए दलबदल हुआ.

काम नहीं आया दलबदल विरोधी कानून

साल 1985 में केंद्र की राजीव गांधी सरकार ने दलबदल रोकने के लिए ‘दलबदल विरोधी कानून’ बनाया. राजीव गांधी सरकार द्वारा भारतीय संविधान की 10वीं अनुसूची के रूप में इस को शामिल किया गया था.

इस दलबदल विरोधी अधिनियम को संसद और राज्य विधानसभाओं दोनों पर लागू किया गया, जो सदन के किसी अन्य सदस्य की याचिका के आधार पर दलबदल के तहत विधायकों को अयोग्य घोषित करने के लिए विधायिका के पीठासीन अधिकारी (विधानसभा अध्यक्ष) को अधिकार देता है. दलबदल तभी मान्य होता है, जब पार्टी के कम से कम दोतिहाई विधायक विलय के पक्ष में हों. राज्यसभा के चुनाव में पार्टी के उम्मीदवार से अलग किसी दूसरे उम्मीदवार को वोट दिया जाए, तो विधायक की सदस्यता खुद से नहीं जाती है. यहां केवल पार्टी के चुनाव अधिकारी को वोट दिखाना होता है कि किस को वोट कर रहे हैं.

उत्तर प्रदेश में राज्यसभा चुनाव के लिए वोट करते समय पार्टी विधायकों ने सपा नेता शिवपाल यादव को अपना वोट दिखा दिया था. इस से यह साफ हो गया कि सपा के किन विधायकों ने वोट दिया. इन की सदस्यता खुद ही नहीं जाएगी. अब समाजवादी पार्टी विधानसभा अध्यक्ष से अपील करेगी. विधानसभा अध्यक्ष पूरा मामला मुकदमे की तरह से सुनेंगे. फिर जैसा वे फैसला देंगे, वह माना जाएगा.

विधानसभा के अंदर किसी भी मामले में विधानसभा अध्यक्ष की भूमिका खास होती है. उस के फैसले पर आमतौर पर कोर्ट भी कोई बचाव नहीं करता है.

अंतरात्मा नहीं, लालच है यह दलबदल आज की समस्या नहीं है. यह हमेशा से रही है. दलबदल कानून बनने के बाद भी इस को रोका नहीं जा सका है. यह अंतरात्मा की आवाज पर नहीं, लालच और बेईमानी की वजह से किया जाता है. जिस तरह से ‘महाभारत’ में शकुनि ने पांडवों के खिलाफ काम किया, लाक्षागृह, पांडवों को जुए में धोखे से हराना जैसे बहुत से काम किए. पांडवों का साथ दे रहे कृष्ण ने बात तो धर्मयुद्ध की की, पर कर्ण, अश्वत्थामा जैसों को मारने के लिए अधर्म का सहारा लिया.

पौराणिक कथाओं में ऐसे तमाम उदाहरण हैं, जहां अपनी जीत के लिए साम, दाम, दंड, भेद का सहारा लिया गया. समुद्र मंथन भी इस का एक उदाहरण है, जिस में अमृत पीने के लिए देवताओं ने दानवों को धोखा दिया.

यहां इन घटनाओं से तुलना इसलिए जरूरी है, क्योंकि दक्षिणापंथी लोग खुद को बहुत पाकसाफ कहते हैं. भारतीय जनता पार्टी खुद को ‘पार्टी विद डिफरैंस’ कहती थी. उस का दावा था कि वह ‘चाल, चरित्र और चेहरा’ सामने रख कर काम करती है.

अगर दलबदल की घटनाओं को देखेंगे, तो साफ दिखेगा कि भाजपा जीत के लिए दलबदल खूब कराती है. राज्यसभा चुनाव में हार के बाद सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने कहा, ‘भाजपा जीत के लिए किसी भी स्तर तक जा सकती है. विधायकों को तमाम तरह के लालच दे सकती है. कुछ पाने की चाह में विधायक भटक जाते हैं.’

दरअसल, यह राजनीतिक भ्रष्टाचार का हिस्सा है. यह जनता को धोखा देने के समान है. कोई विधायक एक दल से चुनाव लड़ता है. उस दल की विचारधारा और उस के वोटर से वोट ले कर जीतता है. बाद में वह दल बदल कर दूसरे दल की खिलाफ विचारधारा से हाथ मिला लेता है. इस से उस को वोट दे कर चुनाव जिताने वाली जनता खुद को ठगा सा महसूस करती है.

यह काम भगवाधारी करते हैं, तो खड़ग सिंह और बाबा भारती की कहानी याद आती है, जिस में डाकू खड़ग सिंह ने भेष बदल कर बाबा भारती को धोखा देते हुए उन का घोड़ा छीन लिया था.

लोकसभा चुनाव की तारीख का ऐलान, जानिए कौन, कब, कहां डालेगा वोट

भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार ने आज 16 मार्च, 2024 को लोकसभा चुनाव 2024 की तारीखों का ऐलान कर दिया है. दिल्ली के विज्ञान भवन में हुई निर्वाचन आयोग की प्रैस वार्ता में मुख्य चुनाव आयुक्त ने लोकसभा चुनाव 2024 को ले कर कहा कि 543 लोकसभा सीटों के लिए 7 चरणों में मतदान होगा, जबकि चुनाव के नतीजे 4 जून, 2024 को आएंगे.

आज हुई घोषणा के अनुसार, पहले चरण में 19 अप्रैल, 2024 को 21 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की कुल 102 लोकसभा सीटों के लिए मतदान होगा. इस चरण में 10 राज्य और केंद्रशासित प्रदेश ऐसे हैं, जिन की सभी लोकसभा सीटों पर मतदान की प्रक्रिया पूरी हो जाएगी.

दूसरे चरण में 26 अप्रैल, 2024 को 13 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की 89 लोकसभा सीटों के लिए मतदान कराया जाएगा. इस चरण में 4 राज्य और केंद्रशासित प्रदेश ऐसे हैं, जहां की सभी सीटों पर मतदान होगा.

तीसरे चरण में 7 मई, 2024 को 12 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेश की 94 लोकसभा सीटों के लिए मतदान होगा, जिस में 6 राज्यों की सभी सीटें शामिल हैं. चौथे चरण में 13 मई, 2024 को 3 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की सभी लोकसभा सीटों के साथ ही कुल 96 लोकसभा सीटों पर मतदान होगा.

5वें चरण में 20 मई, 2024 को 3 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की सभी सीटों के साथ ही कुल 8 राज्यों की 49 लोकसभा सीटों पर मतदान होगा. छठे चरण में 25 मई, 2024 को 2 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की सभी सीटों पर मतदान होगा. इस चरण में 7 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की कुल 57 सीटों पर मतदान होगा. 7वें और आखिरी चरण में 1 जून, 2024 को 8 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की 57 लोकसभा सीटों पर मतदान होगा.

लोकसभा के साथसाथ 4 राज्यों आंध्र प्रदेश, ओडिशा, अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम के विधानसभा चुनाव की तारीखें भी जारी कर दी गई हैं. ओडिशा में 13 मई, 20 मई, 25 मई और 1 जून को मतदान होगा. बाकी 3 राज्यों में एक चरण में चुनाव होंगे. अरुणाचल और सिक्किम में 19 अप्रैल, 2024 और आंध्र प्रदेश में 13 मई, 2024 को वोट डाले जाएंगे.

मौजूदा लोकसभा का कार्यकाल 16 जून, 2024 को खत्म हो रहा है और नई लोकसभा का गठन उस से पहले होना है.

धर्म ने जकड़ा औरत को बेड़ियों में

आम औरतों के लिए घर की चारदीवारी बनी रहे, यह सब से बड़ी नियामत होती है और इसीलिए करोड़ों औरतें अपने शराबी, पीटने वाले, निकम्मे, गंदे, बदबूदार मर्द को झेलती ही नहीं हैं, उसे कुछ होने लगे तो बचाने के लिए जीजान लगा देती हैं. औरतों में मांग में सिंदूर की इतनी ज्यादा इच्छा रहती है कि वे घर छोड़ कर चले गए और दूसरी औरत के पास रहने वाले पति को भी अपना मर्द मानती हैं.

इस की वजह साधारण है. यह कोई त्याग का मामला नहीं है और न ही पति से प्यार का है. हर औरत को बचपन से सिखा दिया जाता है कि मर्द नाम की हस्ती ही उस को दुनिया से बचा सकती है और यह बात उस के मन में इस कदर बैठ जाती है कि चाहे मर्द के दूसरी औरतों के साथ संबंध बनें या खुद औरत के दूसरे मर्दों से संबंध बने हों, वे शादी का ठप्पा नहीं छोड़ पातीं. इस का कहीं कोई फायदा होता है, ऐसा नहीं लगता. यह शादी का बिल्ला, ये हाथ की चूडि़यां, यह मांग का सिंदूर असल में औरतों की गुलामी की निशानी बन जाता है जिस का मर्द, उस का परिवार और दूसरे लोग खूब जम कर फायदा उठाते हैं.

अगर औरत चार पैसे कमा रही है तो उस के पास एक पैसा नहीं छोड़ा जाता. अगर वह अकेले रह रही है तो साजिश के तौर पर दूसरे मर्द उस से अश्लील मजाक करने लगते हैं ताकि वह जैसे भी उसी मर्द की छांव में चली जाए. हर कानून में लिखा गया है कि मर्द का नाम बीवी के साथ लिखा जाएगा जबकि मर्द की पहचान उस के पिता से होती है. समाज ने इस तरह के फंदे बना रखे हैं कि पति को छोड़ चुकी अकेली औरत को, चाहे किसी उम्र की हो, मकान किराए पर नहीं मिलता, रेलवे का टिकट नहीं बनता, राशनकार्ड नहीं बनता, बच्चे हैं तो स्कूल में उन्हें तब तक दाखिला नहीं मिलता, जब तक मर्द का नाम न हो.

मर्द को औरत की चाबी पकड़ाने में धर्मों ने बहुत बड़ा काम किया है. हिंदू धर्म में मर्द परमेश्वर है, इसलाम में वह जब चाहे तलाक दे दे, जब चाहे सौतन ले आए. ईसाई धर्म में ईश्वरी जोड़ा बना डाला. तीनों धर्मों ने शादी अपनी निगरानी में करवानी शुरू कर दी पर औरतों के हकों पर तीनों बड़े धर्मों ने भेदभाव खुल कर रखा.

दुनियाभर में शहरों में ही नहीं गांवों तक में वेश्याएं हैं. यह दोतरफा वार है औरतों पर. एक तो जिन्हें वेश्या बनाया जाता है, उन्हें मशीन की तरह पैसा कमाने का साधन रखा जाता है. ये गरीब घरों की ही होती हैं, जिन्हें लीपपोत कर सजाया जाता है. जैसे ही जवानी घटती है, बीमारी होती है, मरने के लिए छोड़ दिया जाता है. दूसरी तरफ मर्दों को इनाम दिया गया है कि वे अपनी बीवियों के होते हुए इन वेश्याओं के पास जा सकते हैं. किसी धर्म ने इस वेश्या बाजार को बंद नहीं किया.

जो औरत वेश्या बनती है वह सताई जाती है. जिस का मर्द वेश्या के पास जाता है वह भी लुटती है. कहीं भी मर्दों के बाजार क्यों नहीं हैं? अगर औरत मर्द की कोई जरूरत पूरी करती है तो औरतों की भी तो जरूरतें हो सकती हैं. उन्हें ऐसा करते ही मार डाला जाता है.

औरतों को आज भी किसी भी लोकतंत्र में बराबरी के हक नहीं मिल रहे. उन के सारे फैसले मर्द करते हैं या उन के खाविंद हों, समाज के नेता, धर्म के दुकानदार हों या सरकार चलाने वाले नेता, अफसर, जज, पुलिस के डंडे. इन में कहीं भी औरतों का कोई जोर नहीं, कोई दम नहीं, कोई जगह नहीं. जाहिर है, औरत को छिपने के लिए एक ही जगह छोड़ी गई है, उस का अपना शादीशुदा मर्द, वह भी एकलौता.

लोकतंत्र में या उसे वोटतंत्र कहें, औरतों के पास बराबर के हक हैं पर मजाल है कि कोई बीवी अपने मर्द की इजाजत के बिना किसी को वोट दे दे. जब वह घर से बाहर कदम नहीं रख सकती तो भला अपना नेता खुद कैसे चुन सकती है, अपना धर्म दुकानदार खुद कैसे चुन सकती है, अपना घर खुद कैसे बना सकती है. दुनियाभर के लोकतंत्र भी धर्म की आड़ में चल रहे हैं. यहां तो बहुतकुछ धर्म के नाम पर ही हो रहा है. धर्म कायम है तो औरतों की गुलामी कायम है, रही थी और रहेगी.

हर मुद्दे पर खुल कर बोल रहे हैं राहुल गांधी

उत्तर प्रदेश में अपनी ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ के दौरान कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने सेना में अग्निवीर योजना, बेरोजगारी, अडानी, राम मंदिर और जातीय गणना पर खुल कर बोला. प्रदेश में इस यात्रा में पार्टी नेता प्रियंका गांधी को भी शामिल होना था, लेकिन तबीयत ठीक न होने के चलते वे शामिल नहीं हो सकी थीं.

16 फरवरी, 2024 को ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ ने देश के सब से ज्यादा लोकसभा सीटों वाले राज्य उत्तर प्रदेश में प्रवेश किया था. यह यात्रा बिहार से चंदौली के रास्ते उत्तर प्रदेश पहुंची थी, जहां यात्रा का तय कार्यक्रम ‘तिरंगा सैरेमनी’ हुआ, जिस में बिहार कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश प्रसाद सिंह ने उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय को तिरंगा सौंपा था.

इस मौके पर राष्ट्रीय महासचिव व प्रदेश प्रभारी अविनाश पांडे, कांग्रेस विधानमंडल दल की नेता आराधना मिश्रा मोना और दूसरे कई नेता हाजिर रहे थे.

चंदौली पहुंच कर राहुल गांधी ने सैयद राजा शहीद स्मारक पर शहीदों को नमन किया. राहुल गांधी ने कहा, ‘‘एक विचारधारा भाई को भाई से लड़ाती है और आप की जेब से पैसा निकाल कर चुनिंदा अरबपतियों को दे देती है, वहीं दूसरी विचारधारा नफरत के बाजार में मुहब्बत की दुकान खोलती है और आप का हक आप को वापस लौटाती है.’’

‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ के दौरान राहुल गांधी ने लोगों से पूछा कि देश में फैली नफरत की क्या वजह है? इस पर जवाब मिला कि देश में फैल रही नफरत की वजह डर है और इस डर की वजह नाइंसाफी है.

आज देश के हर हिस्से में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक लैवल पर नाइंसाफी हो रही है. देश में किसानों और गरीबों की जमीनें छीन कर अरबपतियों को दी जा रही हैं. महंगाई और बेरोजगारी बढ़ती जा रही है.

मोदी सरकार की अग्निपथ योजना को नौजवानों के साथ धोखा बताते हुए राहुल गांधी ने कहा कि अग्निवीर को न कैंटीन सुविधा मिलेगी, न पैंशन मिलेगी और न शहीद का दर्जा मिलेगा. यह नौजवानों के साथ धोखा है.

मोदी सरकार अग्निपथ योजना इसलिए लाई, ताकि देश के रक्षा बजट से पैसा हमारे जवानों की रक्षा, उन की ट्रेनिंग और पैंशन में न जाए. रक्षा के सभी कौंट्रैक्ट अडानी की कंपनी के पास हैं. मोदी सरकार हिंदुस्तान के बजट का पूरा पैसा अडानी को देना चाहती है, इसलिए अग्निवीर योजना लाई गई.

राहुल गांधी ने आगे कहा कि मोदी सरकार चाहती है कि सब लोग ठेके के मजदूर बनें. नौजवानों को सेना, रेलवे और पब्लिक सैक्टर में नौकरी नहीं मिल रही, क्योंकि मोदी सरकार चाहती है कि नौजवान ठेके पर ही काम करें.

आज हिंदुस्तान में 2-3 अरबपतियों को पूरा फायदा मिल रहा है और नौजवानों का ध्यान भटका कर उन का भविष्य छीना जा रहा है. केंद्र में ‘इंडिया’ की सरकार आने पर पूरे हिंदुस्तान में खाली पड़े सरकारी पदों पर भरती की जाएगी.

राहुल गांधी ने आगे यह भी कहा, ‘‘कुछ ही दिनों पहले हम ने किसानों के लिए एमएसपी की लीगल गारंटी दी है. हम कानूनी गारंटी देंगे कि हिंदुस्तान के किसानों को सही एमएसपी दी जाए.

‘‘मैं आप से यह कहना चाहता हूं कि सामाजिक अन्याय हो रहा है, आर्थिक अन्याय हो रहा है, किसानों के खिलाफ अन्याय हो रहा है.’’

राहुल गांधी ने जनता से सवाल किया कि नरेंद्र मोदी ने किसानों का कितना कर्जा माफ किया?

जनता की भीड़ ने कहा, ‘जीरो. एक रुपया नहीं किया.’

राहुल गांधी ने दूसरा सवाल किया, ‘हिंदुस्तान के 20-25 अरबपतियों का कितना कर्जा माफ किया?’

भीड़ से जवाब आया, ‘16 लाख करोड़ रुपए.’

मीडिया पर तंज कसते हुए राहुल गांधी बोले, ‘‘हम ने किसानों का कर्जा माफ किया, 72,000 करोड़ रुपए हम ने माफ किए और उस टाइम सारे मीडिया ने कहा कि देखो, यूपीए की सरकार पैसा जाया कर रही है, किसानों को आलसी बना रही है. तो जब किसानों का कर्जा माफ होता है तो मीडिया कहती है कि किसानों को आलसी बनाया जा रहा है और जब नरेंद्र मोदी 15-20 लोगों का 16 लाख करोड़ रुपए का कर्जा माफ करते हैं, तो फिर ये एक शब्द नहीं कहते.’’

जनता की भीड़ ने कहा, ‘मोदी मीडिया, गोदी मीडिया एक शब्द नहीं कहता.’

जनता के यह कहने पर राहुल गांधी बोले, ‘‘तो इसी अन्याय के खिलाफ हम ने यह यात्रा निकाली है.’’

कांग्रेस के अध्यक्ष रह चुके राहुल गांधी ने आगे कहा कि मीडिया में कभी किसान या मजदूर का चेहरा नहीं दिखाई देगा. राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में अडानी, अंबानी, अरबपति, फिल्मी सितारे दिखे, लेकिन कोई गरीब, किसान, बेरोजगार, दुकानदार या मजदूर नहीं दिखा.

भागीदारी न्याय का मुद्दा उठाते हुए कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कहा कि देश में पिछड़ों, दलितों और आदिवासियों की आबादी 73 फीसदी है. मगर इन वर्गों की कहीं भी भागीदारी नहीं है.

इन वर्गों को कुछ नहीं मिल रहा है. यह नाइंसाफी है. जाति जनगणना से पता चलेगा कि देश में कितने पिछड़े, दलित और आदिवासी हैं. किस वर्ग के पास कितना पैसा है.

जाति जनगणना देश का ऐक्सरे है. इस से पता लग जाएगा कि सोने की चिडि़या का पैसा किस के हाथ में है. यह क्रांतिकारी कदम है. केंद्र में ‘इंडिया’ की सरकार आने पर पूरे देश में जाति जनगणना कराई जाएगी.

मंदिर दर्शन में न भटक जाए ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’

‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ के 9वें दिन राहुल गांधी असम के बरगांव पहुंचे. यहां वे बोर्दोवा में संत शंकरदेव के जन्मस्थल पर दर्शन करने जाना चाहते थे. सुरक्षाबलों ने राहुल गांधी और दूसरे कांग्रेसी नेताओं को बरगांव में रोक दिया.

सुरक्षाबलों से बहस के बाद राहुल गांधी और बाकी कांग्रेसी नेता धरने पर बैठ गए. सभी को अयोध्या में प्राण प्रतिष्ठा के बाद 3 बजे मंदिर आने के लिए कहा गया.

कांग्रेस के कुछ नेताओं ने राहुल गांधी के मंदिर दर्शन को मुद्दा बना दिया. पुलिस ने गुवाहाटी सिटी जाने वाली सड़क पर बैरिकेडिंग कर दी. इस के बाद कांग्रेस समर्थक पुलिस से भिड़ गए. उन्होंने बैरिकेडिंग तोड़ दी. इस धक्कामुक्की में कइयों को चोटें भी आईं.

राहुल गांधी की ‘न्याय यात्रा’

18 जनवरी, 2024 को नागालैंड से असम पहुंची थी. 20 जनवरी, 2024 को यात्रा अरुणाचल प्रदेश गई, फिर 21 जनवरी, 2024 को फिर असम लौट आई.

इस के बाद यात्रा 22 जनवरी, 2024 को मेघालय निकली और अगले दिन यानी 23 जनवरी को एक बार फिर असम पहुंची.

‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ के बारे में राहुल गांधी ने कहा, ‘‘भाजपा देश में आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक अन्याय कर रही है. ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ का लक्ष्य हर धर्म, हर जाति के लोगों को एकजुट करने के साथ इस अन्याय के खिलाफ लड़ना भी है.’’

राहुल गांधी मैतेई और कुकी दोनों समुदायों के इलाकों से गुजरे. उन्होंने कांगपोकपी जिले की भी यात्रा की, जहां पिछले साल मई में 2 औरतों को बिना कपड़ों के घुमाया गया था.

अपनी इस यात्रा के बारे में राहुल गांधी ने कहा था, ‘‘इस यात्रा को मणिपुर से शुरू करने की वजह यह है कि मणिपुर में भाजपा ने नफरत की राजनीति को बढ़ावा दिया है. मणिपुर में भाईबहन, मातापिता की आंखों के सामने उन के अपने मरे और आज तक हिंदुस्तान के प्रधानमंत्री मणिपुर में आप के आंसू पोंछने, गले मिलने नहीं आए. यह शर्म की बात है.’’

मंदिर दर्शन विवाद में फंसे

66 दिनों तक चलने वाली ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ देश के 15 राज्यों और 110 जिलों में 337 विधानसभा और 100 लोकसभा सीटों से हो कर गुजरेगी. इन राज्यों में मणिपुर, नागालैंड, असम, मेघालय, पश्चिम बंगाल, बिहार, ?ारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र शामिल हैं. राहुल गांधी जगहजगह रुक कर स्थानीय लोगों से संवाद करेंगे. इस दौरान राहुल 6,700 किलोमीटर का सफर तय करेंगे.

‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ 20 मार्च, 2024 को मुंबई में खत्म होगी. मगर इस यात्रा के बीच ही 22 जनवरी, 2024 को मोदी और योगी सरकार द्वारा आयोजित अयोध्या के राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा का कार्यक्रम आ गया, जिस में कांग्रेस के नेताओं को भी बुलाया गया था.

कांग्रेस ने अपनी धर्मनिरपेक्ष नीति के उलट राम मंदिर न जाने के पीछे की वजह मंदिर का पूरा न बनना और राजनीति में धर्म का प्रयोग बताया. लेकिन इस को ले कर पूरी पार्टी 2 भागों में बंटी दिखी. एक तरफ केंद्रीय नेताओं ने राम मंदिर समारोह में हिस्सा लेने से मना किया, तो दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश कांग्रेस की पूरी टीम प्रचारप्रसार के साथ अयोध्या गई, मंदिर दर्शन किया और सरयू में स्नान भी किया.

यही ऊहापोह राहुल गांधी की ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ में भी दिखी. राहुल गांधी की यह मुहिम भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की नीतियों के खिलाफ है. भाजपा और संघ देश को हिंदू राष्ट्र बनाना चाहते हैं. कांग्रेस इस का विरोध करती आ रही थी.

ऐसे में मंदिर दर्शन और धार्मिक आस्था की बातों को इस यात्रा से अलग रखना चाहिए था, मगर राहुल खुद मंदिर जाने की जिद में धरने पर बैठ गए. उन्हें धर्मनिरपेक्ष नीतियों पर चल कर अपनी यात्रा जारी रखनी चाहिए थी, तो वे इस जिद पर अड़ गए कि उन्हें मंदिर जाना है. इस ने यात्रा में खलल डाल दिया.

धर्म से कैसे मिलेगा न्याय

कांग्रेस सौफ्ट हिंदुत्व की राह पर चल रही है. इस से उस की धर्मनिरपेक्ष छवि प्रभावित होगी और वह धर्म की राजनीति का विरोध पुरजोर तरीके से नहीं कर पाएगी. इस समय बहुत जरूरी है कि कांग्रेस भाजपा और संघ के हिंदू राष्ट्र के खिलाफ लोगों का आह्वान करे.

आज भी तमाम मिले वोटों के मुकाबले आधे से कम वोट ही भाजपा को मिलते हैं. ऐसे में यह साफ है कि देश के आधे से ज्यादा लोग भाजपा की धर्म वाली नीतियों से खुश नहीं हैं.

दुनिया में जितने लोग या देश धार्मिक कट्टरता की राह पर चल रहे हैं, वे विकास की राह पर बहुत पीछे हैं और आतंकी गतिविधियों के शिकार हैं. पाकिस्तान और अफगानिस्तान इस का मुख्य उदाहरण हैं.

पाकिस्तान और बंगलादेश की तुलना करें, तो पाकिस्तान के मुकाबले कम कट्टरता वाला बंगलादेश ज्यादा तरक्की कर गया है. बंगलादेश की प्रति व्यक्ति आय 2,688 डौलर भारत की 2,085 डौलर से (साल 2022 के आंकड़े) कहीं ज्यादा है. भाजपा और संघ ने जब से देश को मंदिर आंदोलन में धकेला है, उस के बाद से देश का धार्मिक ढांचा ही प्रभावित नहीं हुआ है, बल्कि यहां की माली हालत भी प्रभावित हुई है.

साल 2007 में भारत की प्रति व्यक्ति आय 1,070 डौलर थी. उस समय भारत की प्रति व्यक्ति आय बंगलादेश की 550 डौलर से दोगुनी थी. मतलब, धर्म से न तो माली तौर पर प्रगति हो सकती है और न ही न्याय मिल सकता है. अगर धर्म से ही लोगों को न्याय मिल जाता, तो आईपीसी बनाने की जरूरत ही नहीं पड़ती.

धर्म औरतों की आजादी की बात नहीं करता है. औरतों की सारी परेशानियां धर्म के ही कारण चलती हैं. धार्मिक कुप्रथाएं और रूढि़यां औरतों के पैरों में बेडि़यों की तरह जकड़ी हैं. दहेज प्रथा, सती प्रथा, पेट में लड़की की हत्या, विधवाओं की बढ़ती संख्या इस के सुबूत हैं. धर्म ने औरतों को पढ़नेलिखने और नौकरी करने के हक से दूर कर उन्हें कम उम्र में पत्नी के रूप में मर्द की गुलाम और बच्चा पैदा करने वाली मशीन बना दिया है.

धार्मिक सत्ता से देश को आजादी दिलाने का काम कांग्रेस की जिम्मेदारी है. अब अगर कांग्रेस ही मंदिरमंदिर घूमेगी तो वह भाजपा और संघ की राह पर चल कर धर्म की सत्ता को मजबूत करने का ही काम करेगी. राहुल गांधी

11 दिन की तपस्या करने में होड़ न करें. वे धर्म के शिकंजे में बारबार फंसने से खुद को बचाएं.

राहुल गांधी को चाहिए कि वे अपनी ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ को मजबूत कर देश को धार्मिक सत्ता से बाहर निकालने का काम करें, ताकि देश की गरीब जनता को रोटी, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार मिल सके.

लोकतंत्र: कीचड़ में भाजपा और चंडीगढ़ का संदेश

कहा जाता है कि कुछ लोग होते हैं जो 100 जूते खाकर भी हंसते हैं. भारतीय राजनीति में भी अब धीरे-धीरे कुछ यही स्थितियां बनती चली जा रही हैं जहां राजनीति में शुचिता और जनता का भय खत्म होता चला जा रहा है. यही कारण है कि देश भर ने देखा कि चंडीगढ़ में महापौर चुनाव में किस तरह नग्न खेल हुआ. अच्छा होता कि भारतीय जनता पार्टी जो देशभक्ति की बात करती है, सिद्धांतों की बात करती थी स्वयं आगे आकर के चंडीगढ़ में हुए महापौर चुनाव पर पहले प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए अपने मेयर, चुने गए व्यक्ति को हटाकर संदेश देती की निष्पक्ष चुनाव नहीं हुए हैं. और पापा यह सब पसंद नहीं करती है. मगर हुआ यह की मामला उच्चतम न्यायालय पहुंच गया देश भर में धांधली का वीडियो प्रसारित हो गया मगर भाजपा के छोटे से बड़े नेता तक के मुंह से एक शब्द नहीं निकला.

उल्टा हुआ यह की आप पार्टी के तीन पार्षदों को तोड़ने का प्रयास जारी हो गया. अब वह समय आ गया है जब चुनाव के बाद किसी भी तरह की दल बदल को गैरकानूनी घोषित कर दिया जाए चंडीगढ़ में महापौर चुनाव का यही संदेश है कि देश की राजनीति में आज स्वच्छता और ईमानदारी भाईचारे की स्थापना की जाए. यह नहीं होना चाहिए कि अगर कोई एक दल सत्ता में है तो दूसरा दल, रुपए पैसों और पदों की लालच देकर विधायकों, पार्षदों या सांसदों को तोड़े.

यही कारण है कि आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने चंडीगढ़ महापौर चुनाव पर आए सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को ऐतिहासिक बताते हुए भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पर तीखा हमला बोला है. केजरीवाल ने कहा- ” न्यायालय के फैसले के बाद भाजपा पूरे देश में बेनकाब हो गई है. यह भारतीय राष्ट्रीय विकासात्मक समावेशी (इंडिया) गठबंधन की पहली और बहुत बड़ी जीत है. मैं इसके लिए शीर्ष न्यायालय का बहुत-बहुत शुक्रिया करता हूं. ”

इससे पहले सोशल मीडिया मंच एक्स पर एक पोस्ट साझा कर केजरीवाल ने कहा -” कुलदीप कुमार एक गरीब घर का लड़का है. इंडिया गठबंधन की ओर से चंड़ीगढ़ का महापौर बनने पर बहुत-बहुत बधाई. ये केवल भारतीय जनतंत्र और माननीय सर्वोच्च न्यायालय की वजह से संभव हुआ है. हमें किसी भी हालत में अपने जनतंत्र और स्वायत्त संस्थाओं की निष्पक्षता को बचाकर रखना है. सर्वोच्च न्यायालय का फैसला एक ऐसे समय में आया है जब देश में हालात बहुत कठिन है, तानाशाही चल रही है और स्वायत्त संस्थानों को कुचला जा रहा है.ऐसे में जनतंत्र को बचाने के लिए यह फैसला काफी मायने रखता है.”

राजनीति का चंडीगढ़ बॉर्डर 

भारतीय राजनीति में पंजाब के चंडीगढ़ महापौर चुनाव , उसके परिणाम और उच्चतम न्यायालय में मामले के पहुंचने के बाद कुलदीप कुमार के महापौर पर मोहर लगाया जाना,अपने आप में एक ऐसा संदेश है जिसे हर राजनीतिक पार्टी को सहर्ष स्वीकार करना चाहिए और देश की जनता को याद रखना चाहिए कि आगे कभी कोई ऐसा मामला न होने पाए.

संभव तो यही कारण है कि आप पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष केजरीवाल ने कहा -” चंड़ीगढ़ में बीस वोट इंडिया गठबंधन के थे, सोलह वोट भाजपा के थे. सबने यह देखा है कि किस तरह से गठबंधन के वोट गलत तरीके से अवैध घोषित कर दिए गए और हमारे उम्मीदवार कुलदीप कुमार को हारा हुआ और भाजपा उम्मीदवार को जीता हुआ घोषित कर दिया गया. लेकिन न्यायालय ने तीव्र गति से मामले की सुनवाई में ‘दूध का दूध और पानी का पानी’ कर दिया.यह भारतीय राष्ट्रीय विकासात्मक समावेशी (इंडिया) गठबंधन की पहली और बहुत बड़ी जीत है.”

सच तो यह है कि सारे देश और दुनिया ने देखा है कि उच्चतम न्यायालय ने लोकतंत्र को निरंकुश भाजपा के जबड़े से बचाया है भाजपा चुनावी हेर फेर का सहारा लिया . यह भारतीय जनता पार्टी के नेताओं की हट धर्मिता है कि मामला उच्चतम न्यायालय में होने के बावजूद आप पार्टी के तीन पार्षदों को तोड़ने का प्रयास चलता रहा. अब जब उच्चतम न्यायालय से फैसला आ गया है तब भी सवाल यह है कि क्या भारतीय जनता पार्टी मौन रहेगी या फिर आप या कांग्रेस पार्टी के पार्षदों को तोड़कर महापौर बनने का प्रयास करवाएगी.

गौरतलब है कि पीठ ने अदालत के समक्ष गलत बयान देने के लिए चंडीगढ़ महापौर चुनाव के पीठासीन अधिकारी अनिल मसीह के खिलाफ अपराध प्रक्रिया संहिता की धारा 340 के तहत आपराधिक कार्यवाही भी कर दी है. अदालत ने सुनवाई के दौरान मतपत्र और रिकार्ड पेश करने का आदेश दिया था. इन्हें पांच फरवरी को पिछले आदेश के अनुसार पंजाब व हरियाणा उच्च न्यायालय ने अपने कब्जे में ले लिया था. उच्चतम न्यायालय द्वारा चंडीगढ़ का महापौर घोषित किए जाने के बाद आम आदमी पार्टी (आप) के पार्षद कुलदीप कुमार ने कहा -” यह लोकतंत्र और शहर के निवासियों की जीत है.” कुमार ने न्यायालय के फैसले पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा अगर चंडीगढ़ महापौर चुनाव में भाजपा ने धांधली नहीं की होती तो यह पहले ही महापौर बन गए होते कुमार ने कहा, ‘यह लोकतंत्र की जीत है, चंडीगढ़ निवासियों की जीत है और सच्चाई की जीत है.”न्यायालय के फैसले के बाद महापौर बने कुमार ने कहा-“‘आज, मेरी आंखों में खुशी के आंसू हैं.”

कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न, पिछड़ों और दलितों को फंसाने का खेल

बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न सम्मान नरेंद्र मोदी सरकार के हाथों से मिलना कोई ताली बजाने वाली बात नहीं है. यह सिर्फ मई, 2024 के चुनावों की दांवपेंच वाली बात है. नरेंद्र मोदी सरकार उसी तरह कुरुक्षेत्र का युद्ध जीतने की कोशिश कर रही है जैसे कृष्ण ने महाभारत की कहानी में किया था. कृष्ण ने युद्ध से हिचक रहे अर्जुन को पट्टी पढ़ाई, दांवपेंच खेले, अपनों को कौरवों की तरफ भेजा, कौरवों के साथियों को फोड़ा, नियमरिवाज ताक पर रखे ताकि कौरव और पांडव दोनों के परिवार खत्म हो जाएं.

आज जो हो रहा है वह पिछड़ों और दलितों को फंसाने के लिए हो रहा है. कर्पूरी ठाकुर से भारतीय जनता पार्टी या कांग्रेस को कोई प्रेम नहीं है क्योंकि उन्होंने बिहार के अमीर, जमींदार, ऊंची जातियों के दबदबे को खत्म करने की बात उठाई थी. उन्होंने भारतीय जनसंघ (तब भारतीय जनता पार्टी का यही नाम था) और कांग्रेस के खिलाफ दबीकुचली जनता को जमा किया था.

आज भारत रत्न दे कर उन्हें असल में मरने के बाद इस्तेमाल किया जा रहा है जैसे कांगे्रसी वल्लभभाई पटेल और सुभाषचंद्र बोस को किया गया था. मंदिर की राजनीति भी पुरानी हार के गड़े मुरदों के पुतले खड़े कर के वोट जमा करना है. भारतीय जनता पार्टी हमेशा दूसरे घरों में तोड़फोड़ करा कर सत्ता में बने रहने की कोशिश करती है. यह हमारी धार्मिक कला है जिस में घरों में आने वाला पुरोहित बड़ेबड़े शब्दों में जजमान की तारीफ करता है और पड़ोसियों के राज जगजाहिर करता है ताकि उसे मोटी दक्षिणा मिल सके. भारतीय जनता पार्टी इसी बात को राष्ट्रीय पैमाने पर कर रही है और कर्पूरी ठाकुर के गुणगान कर के अब बिहार के पिछड़ों से वोट दक्षिणा में मांग रही है.

यह काबिलेतारीफ है कि धर्म के दुकानदार आसानी से हार नहीं मानते. ईसाई मिशनरी हों या इसलामी मौलवी या बौद्ध भिक्षु या निरंकारी सिख, उन्होंने धर्म के नाम पर हर तरह की आफतें झेली हैं ताकि इन के भाईबंदों को हलवापूरी मिलती रहे. यही वजह है कि 2000 साल की गुलामी के बावजूद गांवों से दक्षिणा देने का रिवाज कभी कम नहीं हुआ. जो हिंदू अपने धर्म को छोड़ कर गए, उन्हें नए धर्म में उसी तरह दक्षिणा देना शुरू करना पड़ा.

कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न देकर उन के परिवार वालों को राष्ट्रपति भवन में बुला कर फोटो हर जगह छपवा और चिपकवा दी जाएगी पर चुनावों के बाद कर्पूरी ठाकुर ने जो कहा था, जो करना चाहा था वह कभी नहीं किया जाएगा. हमारे दक्षिणापंथी कभी भी राजपाट पिछड़ों व दलितों के हाथों में नहीं जाने देंगे, चाहे वे पढ़लिख जाएं, पार्टियां बना लें, चुनाव जीत जाएं. पार्टियों में तोड़फोड़, मुकदमे, जीभर के पैसा लुटाना इसीलिए किया जाता है न.

400 पार : दावा या महज शिगूफा

भारतीय जनता पार्टी ने अपने अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा खोल दिया है. साल 2024 में वह पूरे भारत को जीतना चाहती है. इस के लिए उस ने लोकसभा की 400 सीटें जीतने का टारगेट रखा है.

भारत के इतिहास में 400 सांसदों की जीत केवल साल 1984 में मिली थी, जब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या हुई थी. राजीव गांधी उस समय कांग्रेस के नेता थे. इस हमदर्दी वाले चुनाव में कांग्रेस को लोकसभा की 404 सीटें मिली थीं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना नाम इतिहास में लिखवाने का शौक है. ऐसे में वे 2024 के लोकसभा चुनाव में राजग गठबंधन को 400 से ज्यादा सीटें हासिल करने का टारगेट ले कर चल रहे हैं.

पौराणिक कहानियों में तमाम ऐसे राजाओं की कहानियां दर्ज हैं, जो अपनी ताकत दिखाने के लिए अश्वमेध यज्ञ करते थे. इस के लिए वे अपना एक घोड़ा छोड़ते थे. घोड़ा जो भी पकड़ता था, उसे राजा से लड़ना होता था.

मजेदार बात यह है कि यह घोड़ा केवल कमजोर राज्यों की तरफ जाता था. भारत के किसी भी राजा ने दूसरे देशों पर अपना ?ांडा नहीं लहराया है. जिस तरह से मुगलों ने भारत पर हमला किया, उस तरह भारत के किसी राजा ने दूसरे देश को अपने कब्जे में नहीं किया. इस से यह पता चलता है कि अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा अपने ही आसपास के राज्य के राजाओं के लिए छोड़ा जाता था.

खोया चाल, चरित्र और चिंतन

लोकतंत्र में अश्वमेध घोड़ा तो नहीं छोड़ा जा सकता, ऐसे में इस के लिए दूसरी पार्टियों को खत्म करना जरूरी हो गया है. इस के लिए भाजपा तोड़फोड़ और दलबदल को बढ़ावा दे रही है. बिहार में जद (यू) और राजद गठबंधन को तोड़ कर नीतीश कुमार को भाजपा ने अपनी तरफ मिला लिया.

उत्तर प्रदेश में भाजपा के जयंत चौधरी की पार्टी राष्ट्रीय लोकदल पर डोरे डाल रही है. महाराष्ट्र में शिवसेना को तोड़ कर एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री बनाया गया. इस के साथ ही विरोधी नेताओं को दबाने के लिए सीबीआई और ईडी का सहारा लेना पड़ रहा है.

इस तरह के काम हमेशा कमजोर लोग करते हैं. भाजपा खुद को ताकतवर कहती है, सिद्धांतों पर चलने वाली पार्टी बताती है, लेकिन इस के बाद भी उसे छोटे दलों में तोड़फोड़ करनी पड़ती है.

चंडीगढ़ में मेयर का चुनाव जीतने के लिए इसी तरह का काम किया गया, जिस पर सुप्रीम कोर्ट तक को कड़ी टिप्पणी करनी पड़ी है.

चुनाव में दलबदल कोई नई बात नहीं है. हरियाणा में 1980 के दशक में ‘आयाराम गयाराम’ नाम से दलबदल मशहूर था. उत्तर प्रदेश में भाजपा, बसपा और सपा की सरकार के दौर में साल 1989 के बाद से साल 2007 तक यह खूब हुआ. इस में संस्कारवान कही जाने वाली भाजपा का बड़ा योगदान रहा है.

बिना विपक्ष कैसा लोकतंत्र

राजनीति में पालाबदल संस्कृति धर्म के रास्ते आई. पौराणिक कहानियों में कई जगहों पर यह बताया गया है कि देवता भी एकदूसरे के पक्ष में पालाबदल करते रहते थे. उन की कहानियां सुना कर नेता अपने पालाबदल को सही ठहराते हैं. वे कहते हैं कि इंसाफ के लिए बोला गया झठ कभी झठ नहीं होता.

‘रामायण’ में राम ने छिप कर राजा बाली को मारा. बाली ने अपना कुसूर पूछा, तो राम ने कहा कि अपने भाई का राज्य और पत्नी हासिल करने के अपराध का दंड है. विभीषण ने रावण के अधर्म को ढाल बना कर पाला बदल लिया. ‘महाभारत’ में कृष्ण ने दोनों पाले में रहने का फैसला करते समय कहा कि वे युद्ध नहीं करेंगे. इस के बाद भी वे परोक्ष रूप से युद्ध में हिस्सा लेते रहे.

आज भी नेता जब पाला बदलते हैं, तो कहते हैं कि उस पार्टी का लोकतंत्र खत्म हो गया था, वहां दम घुट रहा था. अब आजादी की सांस ले रहे हैं, घरवापसी हो गई है. संविधान बचाने के लिए दलबदल जरूरी था.

नेताओं के जैसे ही घर, परिवार और महल्लों में अलगअलग पाले बन जा रहे हैं. घरों में 2 ही भाई हैं, तो दोनों के बीच पाले बन गए हैं. उन के बीच खींचतान होती है. पालाबदल की यह संस्कृति धर्म से राजनीति, राजनीति से घरों तक फैल रही है. इस से घर का अमनचैन बिगड़ रहा है.

लोकतंत्र में अगर विधायकों, सांसदों को बचाने के लिए कभी हैदराबाद, कभी गोवा और कभी गुवाहाटी के रिजौर्ट में कैद रखना पड़े, तो यह कैसा लोकतंत्र और कैसी आजादी? दलबदल करने वाला नेता तो इस का जिम्मेदार है ही, जो ताकत इस के लिए मजबूर कर रही है, वह और भी ज्यादा जिम्मेदार है.

केवल 400 के पार जाने से क्या हासिल होगा? लोकतंत्र में संख्या का बल तो अहमियत रखता ही है, उस से ज्यादा अहमियत विपक्ष भी रखता है. सब सांसद हां में हां ही मिलाते रहेंगे, तो जनता की आवाज को कौन उठाएगा?

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