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दोहरी जिंदगी: शादीशुदा मोनू और रिहाना का क्या रिश्ता था

मोनू की शादी कुछ महीने पहले सायरा से हुई थी, जो काफी खूबसूरत थी, पर उस की छोटी बहन रिहाना कहीं ज्यादा खूबसूरत थी. सायरा पेट से हो चुकी थी. कुछ ही महीने में उस की डिलीवरी होने वाली थी. इस वजह से घर का कामकाज करना अब सायरा के बस की बात नहीं थी. लिहाजा, सायरा ने अपने काम में हाथ बंटाने के लिए रिहाना को बुला लिया.

रिहाना मेहनती होने के साथसाथ चंचल और खुली सोच वाली लड़की थी. यही वजह थी कि जल्दी ही रिहाना अपने जीजा मोनू से काफी घुलमिल गई और दोनों आपस में हंसीमजाक करने लगे.

एक दिन रिहाना बाथरूम में नहा रही थी और जानबूझ कर तौलिया बाहर भूल गई थी. उस ने अपनी दीदी को आवाज लगाई, पर वह सो रही थी. मोनू सामने सोफे पर बैठा कुछ काम कर रहा था.

इतने में रिहाना ने अपने जीजा मोनू से कहा, ‘‘जीजू, बाहर तौलिया रखा है, जरा मुझे दे दो.’’

मोनू ने कहा, ‘‘क्यों? तुम खुद आ कर ले लो.’’

रिहाना बोली, ‘‘अगर मैं ऐसे ही आ गई, तो आप के होश उड़ जाएंगे.’’

मोनू बोला, ‘‘क्यों…? ऐसा क्या है तुम में?’’

रिहाना ने कहा, ‘‘वह तो मुझे देख कर ही पता चलेगा.’’

मोनू ने जोश में आते हुए कहा, ‘‘ठीक है, तुम आ जाओ. मैं भी तो देखूं कि आखिर कैसी लगती है मेरी साली बिना कपड़ों के.’’

रिहाना बोली, ‘‘जीजू, मजाक मत करो. जल्दी से तौलिया दो. कभी मौका मिलेगा, तो मैं आप को अपना जलवा जरूर दिखाऊंगी.’’

मोनू ने कहा, ‘‘ठीक है, मैं तुम्हारे जलवे का इंतजार करूंगा. मैं भी तो देखना चाहता हूं कि आखिर हमारी साली कैसे जलवा दिखाएगी,’’ यह कहते हुए उस ने तौलिया रिहाना को देते हुए उस का हाथ पकड़ लिया.

रिहाना ने घबराते हुए कहा, ‘‘क्या कर रहे हो आप? दीदी आ जाएंगी.’’

मोनू ने कुछ नहीं सुना और बोला, ‘‘कितना कमसिन हाथ है,’’ कहते हुए उस ने रिहाना के दोनों हाथ चूम लिए.

रिहाना सिहर उठी और जल्दी से उस ने अपना हाथ अंदर खींच लिया. मोनू सायरा के पास चला गया, जो गहरी नींद में सो रही थी.

कुछ ही देर में रिहाना बाथरूम से बाहर आई और सीधे सायरा के कमरे में पहुंची. मोनू वहीं बैठा था.

मोनू की नजर जैसे ही रिहाना पर पड़ी, उस के होश उड़ गए. रिहाना के गोरे गालों पर पानी की बूंदें ऐसे लग रही थीं मानो मोतियों से उस का चेहरा सजा हो. गीले कपड़ों में उस का गुलाबी बदन ऐसे दिख रहा था मानो कोई हूर जन्नत से उतर कर उस के सामने आ गई हो.

तभी रिहाना ने चुटकी बजा कर अपने जीजा का ध्यान तोड़ा और बोली, ‘‘क्या हुआ? अभी यह हाल है कि अपनी सुधबुध खो बैठे हो, तो गौर करो कि जब कभी मुझे उस हालत में देख लिया, जिस हालत में दीदी को रात को बिस्तर पर देखते हो, तो आप का क्या हाल होगा.’’

मोनू के पास रिहाना के इस सवाल का कोई जवाब न था. वह तो रिहाना का मस्त हुस्न देख कर उस का दीवाना बन बैठा था.

तभी रिहाना ने सायरा को उठाया और कहा, ‘‘दीदी, नाश्ता कर लो. जीजू कब से तुम्हारे उठने का इंतजार कर रहे हैं.’’

सायरा जल्दी से उठी और फ्रैश हुई. इतने में रिहाना नाश्ता ले कर आ गई. उस ने अपनी दीदी को नाश्ता कराया और एक नजर अपने जीजू पर डाली तो देखा कि उस के जीजू किसी खयाल में गुम हैं.

दरअसल, मोनू तो रिहाना के गदराए बदन और उस के हुस्न को पाने का तानाबाना बुन रहा था. रिहाना समझ चुकी थी कि जीजू उस के हुस्न के दीवाने हो गए हैं.

तभी सायरा बोली, ‘‘क्या हुआ? तबीयत तो सही है न? आज काम पर नहीं जाना है क्या? अभी तक नाश्ता लिए ऐसे ही बैठे हो… कोई टैंशन है क्या?’’

मोनू ने हड़बड़ा कर कहा, ‘‘नहीं… औफिस में एक जरूरी काम था, उसे पूरा नहीं किया और मैं भूल गया. सोच रहा हूं कि उसे पूरा कैसे करूं…’’

सायरा बोली, ‘‘ठीक है, अब तुम औफिस जाओ और अपना अधूरा काम पूरा करो.’’

थोड़ी देर में मोनू औफिस चला गया, पर आज उस का मन काम में

नहीं लग रहा था. वह तो अपनी साली रिहाना की याद में गुमसुम हो कर रह गया था.

जल्द ही वह समय भी आ गया, जब सायरा को डिलीवरी के लिए अस्पताल में भरती करना पड़ा. कुछ ही घंटों में सायरा ने एक प्यारी सी बेटी को जन्म दिया, जिसे पा कर पूरा घर खुश हो गया.

2-3 दिन बाद सायरा और उस की बच्ची अस्पताल से घर वापस आ गईं. रिहाना अब अपनी बहन सायरा के साथ उस के कमरे में ही सोती थी, क्योंकि देर रात किसी चीज की जरूरत होती तो रिहाना ही उसे लाती थी.

रिहाना मौका देख कर अपने मोनू को छेड़ती रहती थी, ‘‘क्या बात है जीजू, रातभर सोए नहीं क्या, जो आंखें लाल हो रही हैं… लगता है कि दीदी के बिना नींद नहीं आई. और आएगी भी कैसे, उन से लिपट कर सोने की जो आदत पड़ी है,’’ कह कर उस ने अंगड़ाई लेते हुए आगे कहा, ‘‘मु?ा से आप का यह दुख देखा नहीं जा रहा है. दिल करता है कि दीदी की कमी को मैं तुम्हारी बांहों में आ कर पूरी कर दूं, ताकि आप को चैन की नींद आ सके.’’

मोनू बोला, ‘‘अगर तुम्हें मेरा इतना ही खयाल है, तो रात को मेरे पास आती क्यों नहीं?’’

रिहाना ने रिझाते हुए कहा, ‘‘आ तो जाऊं, पर डर लगता है कि कहीं मेरे कुंआरे बदन की तपिश से आप जल न जाओ. मेरे बदन की एक झलक से तो आप अपनी सुधबुध ही खो बैठे थे.’’

मोनू ने ताना मारते हुए कहा, ‘‘तुम बस अपनी दीदी का ही खयाल रखोगी, कुछ खयाल अपने जीजू का भी रख लिया करो. क्यों इस बेचारे को तड़पा रही हो.’’

रिहाना ने कहा, ‘‘तरस तो बहुत आता है आप पर, मगर डर लगता है कि कहीं मुझ कुंआरी को भी मां न बना दो, तब मैं किसी को मुंह दिखाने के लायक भी नहीं रहूंगी.’’

मोनू ने रिहाना से कहा, ‘‘तुम मुझ पर भरोसा रखो. तुम बिनब्याही मां नहीं बनोगी, मैं इस बात का पूरा खयाल रखूंगा.’’

रिहाना चहक कर बोली, ‘‘तो ठीक है, आप इंतजाम करो. मैं मौका देख कर आज आप का अकेलापन दूर कर दूंगी,’’ कहते हुए वह दूसरे कमरे में चली गई.

रात को मोनू औफिस से आ कर सायरा के कमरे में गया. सायरा और बच्ची सो रही थी.

मोनू अपने कमरे में गया और कपड़े बदलने लगा, तभी रिहाना खाना ले कर उस के कमरे में पहुंच गई और जैसे ही उस की नजर बिना कमीज के मोनू पर पड़ी, तो वह शरमा कर वापस मुड़ी.

तभी मोनू ने उस का हाथ पकड़ लिया और उसे अपनी बांहों में खींचता हुआ बोला, ‘‘हमें कब अपने हुस्न का जलवा दिखाओगी मेरी जान…’’

रिहाना ने मोनू की बांहों से आजाद होते हुए कहा, ‘‘सब्र करो. सब्र का फल मीठा होता है,’’ फिर वह कमरे से बाहर चली गई.

रात का 1 बजा था. सायरा और बच्ची दोनों गहरी नींद में सो रही थीं. रिहाना चुपके से उठी और मोनू के कमरे के पास जा कर? झाकने लगी.

मोनू की आंखों से भी नींद कोसों दूर थी. वह मोबाइल फोन पर ब्लू फिल्म देख रहा था. कान में ईयरफोन लगा था. रिहाना कब उस के कमरे में दाखिल हुई, उसे पता ही नहीं चला.

रिहाना ने भी चुपके से मोनू के मोबाइल पर अपनी नजरें जमा दीं. जैसे ही उस ने स्क्रीन पर सैक्सलीला देखी, उस की हवस भड़कने लगी और वह सिसकियां भरने लगी. करवट बदलते समय मोनू की नजर रिहाना पर पड़ी, तो वह हड़बड़ा कर बैठ गया.

रिहाना हवस भरी नजरों से मोनू को देखने लगी. मोनू ने फौरन रिहाना का हाथ पकड़ा और उसे अपने बिस्तर पर खींचते हुए अपनी बांहों में भर लिया.

रिहाना ने पूछा, ‘‘क्या देख रहे थे?’’

मोनू बोला, ‘‘कुछ नहीं… नींद नहीं आ रही थी, तो टाइमपास कर रहा था.’’

रिहाना ने हंसते हुए कहा, ‘‘बहुत अच्छा टाइमपास कर रहे थे.’’

मोनू ने बिना कुछ जवाब दिए रिहाना के होंठों पर अपने होंठ रख दिए. रिहाना सिहर उठी. मोनू ने उस के होंठों को आजाद करते हुए उस की गरदन पर चुम्मों की बौछार कर दी.

रिहाना बोली, ‘‘क्या इरादा है जनाब का…’’

मोनू ने कहा, ‘‘आज इरादा मत पूछो. मुझे वह सब करने दो, जिस के लिए मैं बेकरार हूं.’’

रिहाना ने कहा, ‘‘मुझे डर लगता है कि कहीं मैं पेट से हो गई तो…?’’

‘‘मैं ने उस का इंतजाम कर लिया है,’’ मोनू ने उसे कंडोम का पैकेट दिखाते हुए कहा.

रिहाना शरमा गई और मोनू के गले लग गई. मोनू भी मचल उठा और वह रिहाना के एकएक कर के सारे कपड़े उतारने लगा.

रिहाना का गोरा और गदराया बदन देख कर मोनू मचल उठा और उस के बदन के हर हिस्से को चूमने और चाटने लगा. मोनू की इस हरकत ने रिहाना को इस कदर तड़पा दिया कि वह अपने होश ही खो बैठी और मोनू को अपने ऊपर खींचने लगी.

मोनू पूरी तरह जोश में भरा हुआ था. उस ने उसे अपनी बांहों में कस कर पकड़ा. रिहाना शुरू में तो तड़प उठी, पर जल्द ही उसे भी मजा आने लगा.

थोड़ी देर में वे दोनों बिस्तर पर निढाल पड़े थे. रिहाना ने एक अलग ही मजा महसूस किया. उस ने मोनू के गाल को चूमते हुए कहा, ‘‘मजा आ गया. आप ने जो सुख मुझे दिया है, उसे मैं कभी नहीं भूल सकती. मैं आप से बहुत प्यार करती हूं, कभी मुझे अपने से दूर मत करना.’’

मोनू बोला, ‘‘मैं भी तुम से बहुत प्यार करता हूं. मुझे छोड़ कर कभी मत जाना.’’

इस के बाद रिहाना चुपचाप अपने कमरे में चली गई और अपनी बहन सायरा के पास जा कर लेट गई, जो अभी तक गहरी नींद में सोई हुई थी.

इस तरह मोनू अपनी घरवाली और साली दोनों के मजे लूट रहा था. सायरा इन सब बातों से अनजान थी. पर यह राज कब तक छिपता.

हर रात की तरह आज भी रिहाना चुपके से मोनू के कमरे में आई. उन

दोनों ने अपनेअपने कपड़े उतारे और कामलीला में मगन हो गए.

तभी सायरा की आंख खुल गई. उसे प्यास लगी थी. रिहाना का कुछ अतापता न था, इसलिए वह खुद उठ कर पानी लेने रसोईघर में चली गई.

रसोईघर से लग कर ही मोनू का वह कमरा था, जहां आजकल वह सो रहा था. सायरा जब दरवाजे के पास से गुजरी तो उस ने कमरे के भीतर से एक अजीब सी आवाज आती हुई सुनी. उस के पैर वहीं थम गए और वह कान लगा कर गौर से सुनने लगी.

रिहाना की सिसकियां सुन कर सायरा दंग रह गई. जैसे ही उस ने दरवाजे पर हाथ लगा कर धकेला, वह खुल गया. अंदर का नजारा देख कर सायरा दंग रह गई. मोनू और रिहाना सैक्स करने में इस तरह मदहोश थे कि उन्हें सायरा के आने का पता ही न चला.

सायरा चीखी, ‘‘तुम दोनों को शर्म नहीं आती.’’

मोनू और रिहाना सायरा की आवाज सुन कर एकदूसरे से अलग होते हुए अपनेअपने कपड़े उठाने लगे.

सायरा मोनू से बोली, ‘‘मुझे धोखा दे कर अपनी साली से नाजायज रिश्ता कायम करते हुए तुम्हें शर्म नहीं आई.

‘‘और रिहाना, तुम तो मेरी बहन थी. अपनी ही बहन के सुहाग के साथ यह सब करने से पहले तुम्हें एक बार भी अपनी बहन का खयाल नहीं आया.

मैं अभी अब्बा को तुम दोनों की यह घिनौनी हरकत बताती हूं.’’

मोनू के पास अपनी सफाई के कोई शब्द नहीं थे. वह चोर की तरह चुप खड़ा रहा.

रिहाना ने कहा, ‘‘मैं इन से प्यार करती हूं और ये भी मुझ से प्यार करते हैं.’’

तभी मोनू भी तपाक से बोला, ‘‘मैं रिहाना से प्यार करता हूं और उस के बिना नहीं रह सकता.’’

सायरा चिल्लाई, ‘‘और मेरा और मेरी बच्ची का क्या?’’

मोनू ने कहा, ‘‘मैं तुम्हें भी अपने साथ रखूंगा. तुम्हारा पूरा खर्च उठाऊंगा और तुम्हें भी बराबर प्यार दूंगा.’’

सायरा गुस्से से लालपीली होती हुई बोली, ‘‘रखो अपना खर्चा अपने पास. और रही प्यार की बात, अगर तुम मुझ से प्यार करते तो मुझे धोखा दे कर मेरी ही बहन के साथ मुंह काला नहीं करते. प्यार करने वाले अपने प्यार को धोखा नहीं देते. मुझे तुम्हारे साथ एक पल भी नहीं रहना.’’

कुछ देर के बाद सायरा के अब्बू और भाई आ गए और मोनू को बुराभला कहते हुए सायरा और रिहाना को वहां से ले गए.

कुछ दिन बाद सायरा ने मोनू पर केस कर दिया और वह मुकदमे में उलझ कर रह गया.

इस दोहरे प्यार ने मोनू से उस का सबकुछ छीन लिया. उस की इस हरकत से उस की बीवी सायरा, साली रिहाना और वह मासूम बच्ची, जो अभी पैदा ही हुई थी, सब की जिंदगी बरबाद हो कर रह गई.

मेहमान : कर्ज में डूबा मुकेश

बड़ी कड़की के दिन थे. महीने की 20 तारीख आतेआते मुकेश की पगार के रुपए उड़नछू हो गए थे और मुसीबत यह कि पिछले महीने की उधारी भी नहीं निबटी थी. हिसाब साफ होता तो आटा, दाल, चावल, तेल तो उधार मिल ही जाता, सब्जी वगैरह की देखी जाती. बालों में कड़वा तेल ही लगा लिया जाता, चाय काली ही चल जाती, दूध वाला पिछले महीने से ही मुंह फुलाए बैठा है. मुसीबत पर मुसीबत.

मुकेश तो सब बातों से बेखबर लेनदारों के मारे जो सवेरे 8 बजे घर से निकलता तो रात के 11 बजे से पहले आने का नाम ही न लेता. झेलना तो सब शुभा को पड़ता था. कभी टैलीविजन की किस्त, तो कभी लाला के तकाजे.

दूध वाला तो जैसे धरने पर ही बैठ गया था. बड़ी मुश्किल से अगले दिन पर टाला था. वह जातेजाते बड़बड़ा रहा था, ‘‘बड़े रईसजादे बनते हैं. फोकट

का दूध बड़ा अच्छा लगता है. पराया पैसा बाप का पैसा समझते हैं. मुफ्तखोर कहीं के…’’

शुभा आगे न सुन सकी थी. सुबह से ही सोचने लगी थी कि आज दूध वाला जरूर ही आएगा. क्या बहाना बनाया जाएगा? यह सोच कर उस ने बड़ी बेटी सुधा को तैयार किया कि कह देना घर में मेहमान आए हैं, मेहमानों की नजर में तो हमें न गिराइए.’’

यह कह कर सुधा को मुसकराने की हिदायत भी शुभा ने दे दी थी. उस के मोती जैसे दांतों की मुसकान कुछ न कुछ रियायत करवा देगी, शुभा को ऐसा यकीन था. लाला के आने के बारे में उस ने खुद को तसल्ली दी कि उसे तो वह खुद ही टरका देगी.

यह सोचने के साथ ही शुभा ने आईना ले कर अपना चेहरा देखा. बालों की सफेद हो आई लटों को बड़ी होशियारी से काली लटों में दबाया और होंठों पर मुसकान लाने की कोशिश करने लगी. उसे लगा जैसे अभी इस उम्र में भी वह काफी खूबसूरत है और बूढ़े रंडुए लाला के दिल की डोर आसानी से पहली तारीख तक नचा सकती है.

पर दूसरे ही पल शुभा को अपने इस नीच खयाल पर शर्मिंदगी महसूस हुई. देहात के चौधरी, जिन की भैंसें 10-10 लिटर दूध देती हैं, जहां अन्न के भंडार भरे रहते हैं, जिन की बात पर लोग जान देने को तैयार रहते हैं, क्या उन की बेटी को अपनी मुसकान का सौदा कर के रसद का जुगाड़ करना होगा?

शुभा उस घड़ी को कोसने लगी, जब नौकरीपेशा मुकेश के साथ भारी दानदहेज दे कर उस का ब्याह कर बापू ने अपनी समझ में जंग जीत ली थी. शुरू के कुछ सालों तक वह भी खुश रही, पर जब एक के बाद एक 3 बेटियां हो गईं और पगार कम पड़ने लगी, तो उसे बड़ा अटपटा लगा. जिन चीजों को गांव में गैरजरूरी समझा जाता था, यहां उन्हें लेना मजबूरी बन गया.

शुभा एकदम चौंकी. वह कहां बेकार के खयालों में फंस गई थी. जमाना इतना आगे निकल चुका है और वह मुसकरा कर किसी को देख लेने में भी गलती समझती है. अगर किसी की ओर मुसकरा कर देख लेने से तकलीफ दूर होती हो तो इस में क्या हर्ज है? फिर इस के अलावा उस के पास चारा भी क्या है?

मुकेश को तो इन पचड़ों में पड़ना ही नहीं है. वह पड़े भी तो कैसे? सारी तनख्वाह पत्नी को दे कर जो उसी के दिए पैसों से अपना काम चलाए, उस से शुभा शिकवा भी कैसे करे? कोई उपजाऊ नौकरी पर तो वह है नहीं. शुभा के कहने से ही जाने कितनी बार दफ्तर से कर्ज ले चुका है. सब काटछांट के बाद जो पगार बचती है, वह गुजरबसर लायक नहीं रह जाती. अब उसी को कोई रास्ता ढूंढ़ना होगा.

शुभा ने बड़े प्यार से बेटी सुधा को पुचकार कर उस की कंघी कर दी और याद दिलाया कि वह दूधिए के आने पर क्या कहेगी. उस ने यह भी कहा, ‘‘क्या मातमी सूरत बना रखी है. जब देखो, मुंह लटकाए रहती हो? मुसकराते चेहरे का अपना असर होता है. कई बार जो काम सिफारिशें नहीं कर पाती हैं, वह एक मुसकान से हो जाता है.’’

सुधा की समझ में नहीं आ रहा था कि मां क्या कह रही हैं. रोज तो तनिक हंसी पर नाक चढ़ा लेती थीं, आज उसे हंसने की याद दिला रही हैं. वह सोच ही रही थी कि तभी नीचे से दूधिए की आवाज आई, ‘‘है कोई घर में कि सब बाहर गए हैं? जब देखो बाहर… मर्द बाहर जाता है, तो क्या सारा घर उठा कर साथ ले जाता है?’’

दूधिए का भाषण चालू हुआ ही था कि सुधा होंठों पर उंगली रखे अपनी मां को खामोश रहने का इशारा करते हुए आंखों में ही मुसकराती अंदर से आ गई. दूधिए को दरवाजे के अंदर से टका सा जवाब पाने की उम्मीद थी. इस तरह सुधा के आ जाने पर वह कुछ नरम पड़ गया.

दूधिया कुछ कहना चाहता था कि सुधा बोली, ‘‘चाचा, आज मेहमान आए हुए हैं. आप भी चलिए न ऊपर चाय पी लीजिए. खैर यह हुई कि मेहमान सो रहे हैं, नहीं तो हमारी गरदन ही कट जाती शर्म से,’’ उस के चेहरे पर एक शोख मुसकराहट थी.

हालांकि मां ने मुसकराने भर को ही कहा था, दूधिए को ऊपर लाने को नहीं. पर वह हड़बड़ी में कह गई. दूधिया भी मुसकान बिखेरती छरहरी सुधा के साथ ही ऊपर चढ़ आया. जो पड़ोसी झगड़ा सुनने के लिए दरवाजों के बाहर निकल आए थे, वे बड़े निराश हुए.

पंखे की हवा में दूधिया सपनों की दुनिया में तैरने लगा. सुधा और शुभा अपनी कामयाबी पर खुश थीं.

शुभा को आज सुधा पर बहुत दुलार आ रहा था. दूधिए के सामने वाली कुरसी पर बैठ कर वह बोली, ‘‘देख ले बेटी, दूध भी है या चाचा को काली चाय ही पिलाएगी? न हो तो गणेशी की दुकान से दूध ले आ.’’

‘‘नहींनहीं, इस की कोई जरूरत नहीं है. पतीला दे दीजिए, मैं दूध लिए आता हूं,’’ दूधिया, जो कुछ पल पहले तमतमा रहा था, पालतू जानवर की तरह इशारा समझने लगा था.

नीचे जा कर दूधिया एक खालिस दूध ले आया. शुद्ध दूध वाले डब्बे से. ऐसा दूध तो शुभा को उस ने कभी दिया ही नहीं था.

ज्यादा खालिस दूध की चाय पीते समय शुभा स्वाद से चटखारे ले रही थी. तो सुधा अपनी मां की नजर बचा कर दूधिए की तरफ देख कर मुसकरा देती थी.

दूसरी बच्चियां भी पास ही बैठीं चाय का स्वाद ले रही थीं. अचानक शुभा बोली, ‘‘क्या कहें भैया, आप का पिछला रुपया तो दे नहीं पाए, एक लिटर और चढ़ गया. अब की पगार मिलेगी तो जल्दी निबटा देंगे.

‘‘इस बार तंगी में काली चाय पीतेपीते परेशान हो गए हैं,’’ कहतेकहते वह हंस पड़ी, जैसे काली चाय पीना भी खुशी की बात हो.

‘‘यह लो, आप काली चाय पी रही थीं? हमें क्यों नहीं बताया? हम कोई गैर हैं क्या? रुपयों की आप फिक्र न कीजिए, कल से मैं दूध देने खुद ही आ जाया करूंगा,’’ दूधिया का दिल बीन पर नाचने वाले सांप की तरह झूम रहा था.

दूधिया जाने को उठा तो शुभा ने कहा, ‘‘ऐसी भी क्या जल्दी है? हां, याद आया, तुम्हारा दूध बांटने का समय बीत रहा होगा. जा बेटी, चाचा को नीचे तक छोड़ आ,’’ शुभा ने सुधा की ओर देख कर हौले से मुसकरा कर कहा.

सुधा ने जाते समय दूधिए की तरफ मुसकरा कर देखा और कहा, ‘‘चाचा, कल थोड़ा फुरसत से आना.’’

दूधिया साइकिल पर बैठा तो उसे लगा जैसे उस के पैरों में पंख लग चुके हैं. उस ने 2 बार पीछे मुड़ कर देखा, दरवाजे पर खड़ी सुधा हाथ हिला कर उसे विदा कर रही थी. सुधा के चेहरे पर मुसकान थी, दूधिए के चेहरे पर वहां से जाने का दर्द.

बच्चियां चाय पी कर बहुत खुश थीं. 2-3 दिन में ही बिना दूध की चाय ने जीभ का स्वाद ही छीन लिया था. दूधिए के जाने के बाद उन्होंने रूखी रोटियां भी चाय के साथ शामिल कर लीं. इस से अच्छा रोटी निगलने का साधन घर में था ही नहीं और अब तो रोटियों का जुगाड़ भी बंद होने को था.

शाम का अंधेरा गली में फैलने लगा था और सामने के खंभे में लगा बल्ब फ्यूज हो गया था. शुभा इस अंधेरे में खुश ही थी, क्योंकि लाला अकसर रात 9 बजे के आसपास दुकान बंद कर के ही उस का दरवाजा खटखटाता था.

लाला हैरान रहता था कि 9 बजे भी मुकेश कभी घर पर नहीं मिला. अब वह बिला नागा वसूली के लिए आने लगा था. सोचता, कितने दिन भागोगे बच्चू, दुकानदारी इसलिए तो नहीं है कि सौदा लुटाया जाए.

शुभा उस से कई बार कह चुकी थी कि वे लोग कहीं भागे नहीं जा रहे हैं. वह नया सौदा देता जाए, पुराना और नया हिसाब एकदम चुकता कर दिया जाएगा. लेकिन लाला ने एक नहीं सुनी थी. वह दहाड़ा था, ‘‘जब पुराना हिसाब नहीं चुका सकते, तो नया क्या खाक चुकाओगे?’’

शुभा जानती थी कि लाला अपनी तोंद पर धोती की फेंट सही करता हुआ कुछ देर के बाद आने ही वाला है. पर वह 7 बजे ही आ कर दरवाजा खटखटाने लगा. उस ने सोचा था कि मुकेश 9 बजे तक खापी कर टहलने निकल जाता होगा, इसलिए उस के पहले ही पहुंचना ठीक रहेगा. रुपए न दिए तो ऐसी खरीखरी सुनाऊंगा कि कान बंद कर लेगा बच्चू. ऐसे मौकों पर दरवाजा ही बंद रहता था और ऊपर से कोई बच्ची कह देती थी, ‘‘पिताजी घर में नहीं हैं.’’

तब लाला चीख उठता था, ‘‘पिताजी जाएं जहन्नुम में, मेरा पैसा मुझे अभी चाहिए.’’

पर इस के आगे लाला बेबस हो जाता था, क्योंकि ऊपर से झांकने वाली बच्ची तब तक गायब हो चुकी होती. लिहाजा, वह भुनभुनाता हुआ लौट जाता. लेकिन अब वह इन्हें इतने सस्ते में छोड़ने को तैयार नहीं था.

उधर अब की बार कमान सुधा के बजाय उस की मां ने संभाली. मुसकराने की कोशिश करते हुए वह दरवाजे तक गई, फिर लाला को गुस्से में देख कर बोली, ‘‘सेठजी, मेहमान आए हुए हैं. मेहरबानी कर के कुछ कहिएगा नहीं, इज्जत का सवाल है.’’

मीठी मुसकान के साथ मीठी बोली सुन कर सेठ कुछ नरम पड़ गया.

धोती की फेंट से वह मुंह का पसीना पोंछने लगा. अपनी कंजी आंखों से वह शुभा को घूरता हुआ बोला, ‘‘ठीक है, फिर कब आऊं यही बता दो?’’

‘‘चाहे जब आइए, घर आप का है और अभी जाने की इतनी जल्दी भी क्या है. दुकान के काम से दिनभर के थकेमांदे होंगे. एक प्याला चाय पी लीजिए, फिर जाइएगा,’’ शुभा मुसकराई. उस की आंखों में भी बुलावा था. सेठ में इतनी हिम्मत नहीं थी कि ऐसे प्यार भरे बुलावे को ठुकरा सकता.

सेठ पंखे के नीचे बैठ गया. जीना चढ़ने से हांफ गया था. उस की तोंद ऊपरनीचे हो रही थी, जिस को काबू में करने की कोशिश में वह दम साध रहा था कि सुधा ने मुसकरा कर पानी का गिलास सामने रख दिया.

एक घूंट में गिलास का पानी गटक कर सेठ कमरे की सजावट देखने लगा. 5 मिनट में चाय हाजिर थी. इस बार शुभा ने सामने की कुरसी पर बैठतेहुए चाय पीना शुरू किया तो पढ़ने का वास्ता दे कर लड़कियां कमरे से बाहर हो गईं.

चाय के साथसाथ शुभा के गुदाज जिस्म पर नजर गड़ा कर बैठे सेठ को लगा कि वह एक अरसे से ऐसे प्यार भरे माहौल के लिए तरस गया है. दिनरात बैल की तरह खटो, फिर भी बहुएं रोटी के साथ जलीकटी बातें परोसने से बाज नहीं आतीं. एक यह है जो कुछ भी नहीं लगती, लेकिन अपनेपन का झरना बहा रही है.

बातों ही बातों में समय की रफ्तार का उसे तब पता चला, जब एक घंटा बीत गया. न चाहते हुए भी सेठ उठ कर बोला, ‘‘अच्छा शुभाजी… अब चलूंगा. तनख्वाह तक रुपए मिल सकें तो ठीक है, न मिल सकें तो ज्यादा परेशान होने की कोई जरूरत नहीं है. फिर देखा जाएगा.’’

‘‘मैं तो चाहती थी कि आप खाना खा कर जाते. देख सुधा, आटे के कनस्तर में कुछ है? न हो तो बाजार से दौड़ कर आटा ले आ. चाचा पहली दफा यहां आए हैं, क्या भूखा भेजेगी?’’ शुभा मुसकरा कर अंगड़ाई लेते हुए बोली.

‘‘क्या आटा तक घर में नहीं है? मैं कोई पराया हूं, जो मुझे नहीं बताया. मैं जानता हूं, महीने के आखिरी दिन ऐसे ही कड़की के होते हैं. खैर, आज तो मैं नहीं खाऊंगा. हां, थोड़ी देर में मेरा नौकर सामान दे जाएगा. जब जरूरत हो, बता दिया करना,’’ कहते हुए लाला उठ खड़ा हुआ.

इस बार सुधा बोली, ‘‘हाय मां, चाचाजी जा रहे हैं. कम से कम दरवाजे तक इन्हें छोड़ तो आइए.’’

शुभा लाला को दरवाजे तक छोड़ने गई. उस ने हंस कर लाला से कहा, ‘‘फिर आइएगा कभी, आज तो आप की कोई सेवा न कर सकी.’’

लाला जातेजाते मुड़ कर देखता गया. शुभा दरवाजे पर खड़ी उसे देख रही थी. लाला की धोती कई बार पैरों में फंसने को हुई.

थोड़ी ही देर में लाला का नौकर आटा, दाल, चावल के साथ रिफांइड तेल और सब्जी भी दे गया था.

मुकेश के आने में अभी देर थी. रसोई में पकवानों की खुशबू बच्चियों के पेट की भूख और बढ़ा रही थी. यह सारा महाभोज उन की नजर में नकारा बाप को और भी नकारा कर गया था, मां का वजन उस की निगाहों में कुछ ज्यादा ही बढ़ गया था.

सब से छोटी बेटी तो हैरानी से पूछ ही बैठी, ‘‘मां, कहां आज रोटी का जुगाड़ भी नहीं था और कहां इतनी सारी अच्छीअच्छी खाने की चीजें तैयार हो गईं. यह सब कैसे हो गया?’’

‘‘बेटी, सब वक्त की मेहरबानी है. जिस घर में मेहमान आते रहते हैं, उस घर में बरकत रहती है. बड़े अच्छे लोग होते हैं, जिन के घर मेहमान आते हैं,’’ शुभा ने मासूम बच्चियों को समझाया.

दूसरी बच्ची बोली, ‘‘मां, चाय और खानेपीने का सामान देने वाले मेहमानों के अलावा नोट देने वाले, कपड़े देने वाले और सुंदरसुंदर खिलौने देने वाले मेहमान क्या हमारे घर कभी नहीं आएंगे?’’

बच्ची को तसल्ली देते हुए शुभा बोली, ‘‘आएंगे बेटी, नोटों वाले मेहमान भी आएंगे. तुम अपने पिता से कहना कि अपने दोस्तों को भी कभीकभी घर लाया करें. क्या पता, उन्हीं के आने से रुपएपैसे भी मिलने लगें.’’

वैसे, बच्ची के मासूम सवाल पर शुभा का गला भर आया था. फिर आंसू छिपाने के लिए वह खिड़की की तरफ चली गई.

मुकेश के आने में अभी देर थी. दरवाजे के पास एक शराबी मदहोशी में लड़खड़ा रहा था. उस की जेब में नोटों की गड्डी झांक रही थी.

शुभा को लगा, अब बच्ची की चाह पूरी होने को है. उस ने झांक कर गली के दोनों छोरों की ओर देखा. अंधेरे में दूरदूर तक किसी आदमी की परछाईं भी नहीं थी. उस के चेहरे पर दिनभर की कामयाबी को याद कर एक मुसकान छा गई. अब वह जीना उतर कर नीचे जाने को तैयार थी.

सलमान ने सोचा न था

सलमान की शादी को 10 साल हो गए थे. वह अपने परिवार के साथ मुंबई में जिंदगी गुजार रहा था. उस के इस परिवार में बीवी रेशमा और 4 बच्चे बड़ी बेटी आयशा 9 साल की, दूसरी बेटी

7 साल की, बेटा अयान 2 साल का और सब से छोटी बेटी, जो महज सालभर की थी. इस परिवार के साथ सलमान की सास भी पिछले 3 साल से रह रही थीं. जिंदगी अच्छी गुजर रही थी. काम भी अच्छा चल रहा था. घर में किसी चीज की कोई कमी न थी.

लौकडाउन के दौरान सलमान की जिंदगी में एक ऐसा मोड़ आया, जिस से उस की जिंदगी पत?ाड़ पेड़ के समान बिखर कर रह गई.

कारोबार खत्म हो चुका था. बीवी रेशमा ने अचानक नईनई मांगें शुरू कर दीं. पहला लौकडाउन खुल चुका था. कारोबार सही नहीं चल पा रहा था. उधर रेशमा जिम जाने लगी. जिम जाने में सलमान को कोई एतराज नहीं था, लेकिन वह जिम से 5-6 घंटे में वापस आती. न टाइम पर खाना, न बच्चों की कोई परवाह.

घर में ?ागड़ा बढ़ने लगा. सलमान ने अपनी सास से भी कहा, ‘‘रेशमा को सम?ाओ. बच्चों को टाइम पर न खाना मिल रहा है और न ही उन की औनलाइन ठीक से पढ़ाई हो पा रही है. मेरा भी काम अभीअभी शुरू हुआ है. मैं भी बच्चों को टाइम नहीं दे पा रहा हूं.’’

इस पर सलमान की सास बोलीं, ‘‘तुम मेरी बेटी के फिट होने से जल रहे हो. उसे अभी अपनी फिटनैस का खयाल रखना है. अभी उस की उम्र ही क्या है.’’

मांबेटी ने सलमान की एक न सुनी. सलमान चुप हो कर रह गया.

जिंदगी यों ही गुजर रही थी. फिर अचानक एक दिन सलमान की जिंदगी में नया भूचाल आ गया. रेशमा ने सलमान के सामने सारी प्रोपर्टी अपने नाम करने की शर्त रख दी. सलमान ने ऐसा करने से मना कर दिया, तो रेशमा का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया. उस ने सलमान से बात करना छोड़ दिया. उसे वह अब अपने पास फटकने भी नहीं देती.

इस के चलते सलमान परेशान रहने लगा. उस ने अपनी सास से कहा, ‘‘रेशमा को सम?ाओ. छोटेछोटे बच्चे हैं. इन की जिंदगी पर क्या असर पड़ेगा.’’

इस पर सलमान की सास बोलीं, ‘‘तुम उस के नाम प्रोपर्टी कर दो. रेशमा के अब्बा ने मेरे नाम कुछ नहीं किया, तो आज मैं तुम्हारे पास पड़ी हूं.’’

सलमान ने कहा, ‘‘वे तुम्हें बुलाते हैं, तुम क्यों नहीं जातीं?’’

उस पर सास बोलीं, ‘‘अब उन के बस की बात ही क्या है. सब तो उन्होंने बेच दिया.’’

इस पर सलमान बोला, ‘‘मैं तो कमा रहा हूं. मैं ने तो अब तक कुछ बेचा नहीं, उलटे खरीदा ही है. मेरे अब्बा भी अभी जिंदा हैं. मैं उन की प्रोपर्टी इस के नाम कैसे कर सकता हूं. जो मेरे नाम है, मैं उस की वसीयत रेशमा के नाम कर देता हूं.’’

सास बोलीं, ‘‘ठीक है.’’

कुछ ही घंटों में उन्होंने एक वकील को घर पर बुला लिया. वकील से बात करने के बाद सलमान की बीवी रेशमा और सास बोलीं कि वसीयत नहीं, गिफ्ट डीड बनाओ.

इस पर सलमान बोला, ‘‘गिफ्ट डीड बनने से तो मेरा कोई हक नहीं रहेगा.

यह गलत है. मैं केवल वसीयत कर सकता हूं.’’

इस पर मांबेटी दोनों भड़क गईं और सलमान को बुराभला कहने लगीं.

सलमान ने उन दोनों को बच्चों का वास्ता दिया. इस पर सलमान की सास बोलीं, ‘‘ये बच्चे घर से लाई थी क्या…? तेरे बच्चे हैं, तू संभाल.’’

सलमान उन की यह बात सुन कर हक्काबक्का रह गया. वक्त इसी तरह गुजर रहा था कि मांबेटी ने घर से पैसे और जेवर उठा लिए और चंपत हो गईं.

दांव पर जिंदगी : आरती को बहू भात खाना क्यों पड़ा भारी

आरती को बहू भात खाने जाना बहुत महंगा पड़ा. उस ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि इतनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी.

‘‘लाल, तुम्हारी पत्नी तो बड़ी मस्त है. बहुत मजा आया, पूरा वसूल हो गया,’’ उस आदमी के मुंह से निकलने वाले ये वे शब्द थे, जो बेहोश होने के पहले आरती के कानों में समाए थे.

आवाज सुनीसुनी सी लगी थी. उस के पहले के वे 3 आदमी कौन थे, आरती जान नहीं पाई थी. सब ने अपने चेहरों को ढक रखा था. कोई कुछ बोल भी नहीं रहा था,

जैसे सबकुछ योजना बना कर हो रहा था. एक के बाद एक चढ़े, कूदे और उतर गए. जैसे बेटिकट लफंगे बसों में चढ़तेउतरते हैं.

न आरती चीख पा रही थी और न हिलडुल पा रही थी. पहले ही मुंह में कपड़ा ठूंस दिया गया था. दम घुट रहा था. जो आता जोश से भरा हुआ होता और उस की जान हलक में आ जाती थी.

फिर वहां क्याकुछ हुआ, आरती को कुछ भी पता नहीं. होश आया, तो घर के बिस्तर में पड़ी थी और घर वाले उसे घेरे खड़े थे.

आरती की आंखें लाल को ढूंढ़ रही थीं. वह एक ओर कोने में दुबका सा खड़ा था… चुपचाप. उसे देख कर आरती का मन नफरत से भर उठा. दिल में एक हूक सी उठी, एक सैलाब सा उमड़ा, उस दर्द का, जो वह अभीअभी भोग कर आई थी.

‘‘थाने चलो,’’ अगले दिन सुबह उठते ही आरती ने लाल से कहा.

‘‘होश में आओ, पागल मत बनो, लोग जानेंगेसुनेंगे तो क्या कहेंगे? बाकी की जिंदगी बदनामी ओढ़ कर जीना पड़ेगा. मुंह बंद रखो और रात की घटना को एक डरावना सपना समझ कर भूल जाओ,’’ लाल ने धीरे से कहा.

‘‘यह मेरी जिंदगी का सवाल है. मैं गायबकरी नहीं हूं, तुम थाने चलो,’’ आरती ने जोर दिया और घर से बाहर निकल आई.

आरती ने अपना लिखित बयान थाने में दर्ज करा दिया.

‘‘आप ने लिखा है कि आखिरी वाले आदमी की आवाज सुनीसुनी सी लगी थी?’’ थानेदार रंजन चौधरी ने आरती से पूछा.

‘‘जी हां सर, कुछ दिन पहले एक शाम को ‘लाल’ कह कर घर के बाहर से किसी आदमी ने आवाज दी थी, तब मैं आंगन में थी. यह वही आवाज थी.’’

‘‘घटना के पहले की कुछ बातें बता सकती हैं आप?’’

‘‘सर, घर से हम दोनों 9 बजे चल दिए थे. नर्रा गांव के बाद ही जंगल शुरू हो जाता है. सिंगारी मोड़ पर हमें मुड़ना था. लाल ने हौर्न बजाया, तो मैं ने

पूछा था, ‘रात को हौर्न बजाने का क्या मतलब?’

‘‘लाल ने कहा था, ‘गलती से बज गया था.’’’

आरती का बयान दर्ज कर लिया गया. थानेदार रंजन चौधरी ने लाल पर एक नजर डाली, लेकिन कुछ कहा नहीं. लाल उन की चुभती नजरों का सामना न कर सका. उस का गला सूखने लगा था.

बाद में एक महिला कांस्टेबल की निगरानी में मैडिकल टैस्ट के लिए आरती को सदर अस्पताल भेज दिया गया. शाम को मैडिकल रिपोर्ट मिल गई थी. सामूहिक बलात्कार की तसदीक हो चुकी थी.

अगले दिन पुलिस ने लाल को उस के घर से उठा लिया. घर वालों ने इस का कड़ा विरोध किया. लाल के बड़े भाई ने मंत्री से शिकायत करने की धमकी तक दे डाली, ‘‘गुनाहगारों को पकड़ने की जगह मेरे भाई को ले जा रहे हैं. यह आप अच्छा नहीं कर रहे हैं. आप को मंत्रीजी के सामने इस का जवाब देना पड़ेगा.’’

‘‘आप को जहां शिकायत करनी है, कीजिए, पर इतना जान लीजिए कि इस कांड की गुत्थी आप के भाई से जुड़ी हुई है,’’ थानेदार रंजन चौधरी ने कहा.

आरती बलात्कार कांड में उस वक्त एक नया मोड़ आ गया, जब लाल की गिरफ्तारी के कुछ घंटे बाद उस की निशानदेही पर गुप्त छापामारी कर पुलिस ने उन चारों बलात्कारियों को एकसाथ धर दबोचा.

उस के पहले थाने ले जा कर पुलिस ने लाल का अच्छे ढंग से स्वागत किया था. पहले पानी और फिर चाय पिलाई गई, फिर पूछा गया, ‘‘तुम्हारा कहना है कि उस बलात्कारी को तुम नहीं जानते हो, जो तुम्हारा नाम जानता है?’’

‘‘मैं सच कहता हूं सर, मैं उसे नहीं जानता.’’

‘‘तुम सब जानते हो…’’ बाकी शब्दों को लाल के गाल पर पड़े थानेदार रंजन चौधरी के जोरदार चांटे ने पूरा कर दिया था. फिर तो वह तोते की तरह बोलना चालू हो गया था.

इस के बाद कुछ घंटे चली धर पकड़ के बाद उन चारों के बयान ने पूरे इलाके में एक सनसनी सी फैला दी थी. गलीमहल्लों में जिसे देखो वही लाल और आरती के संबंधों की बाल की खाल उतारने में लगा हुआ था.

आरती के भीतर भी एक तूफान उठा हुआ था, जो उस के दिलोदिमाग को मथ रहा था. एक दागदार जिंदगी की चादर को ओढ़े वह किस तरह जी पाएगी? लोगों की चुभती नजरों का सामना वह कैसे करेगी? यही सब सोचसोच कर उस का दिमाग फटा जा रहा था.

अब तो राजेश भी आरती से दूर जा चुका था. 10 साल पहले उस की बेरंग जिंदगी में एक बदलाव आया था. वह पैंशन डिपार्टमैंट में राजेश की असिस्टैंट थी. काम करतेकरते दोनों कब इतने करीब आ गए कि एकदूसरे को देखे बिना रहना मुश्किल हो गया.

यह सिलसिला 10 साल तक बड़े आराम से चला कि अचानक एक दिन आरती ने राजेश से कहा, ‘‘अब हम  एक ही औफिस में एकसाथ रह कर काम नहीं कर सकते. लाल को हमारे रिश्ते की भनक लग चुकी है.’’

आरती डर गई थी. अपने लिए नहीं, बल्कि राजेश के लिए. वह राजेश से बेइंतिहा प्यार जो करने लगी थी.

लोग भी कहते हैं कि जुआरी और शराबियों से जितना दूर रहो, उतना ही बेहतर है, फिर आरती का पति लाल तो एक अव्वल दर्जे का जुआरी था और शराबी भी.

कुलमिला कर आरती एक बेस्वाद जिंदगी जी रही थी, जिस में न प्यार का गुलकंद था और न उमंग की कोई तरंग. इस उबाऊ जिंदगी से राजेश ने अपनी बांहों में भर कर उसे उबार लिया था.

पति के दबाव में आ कर आरती ने राजेश से एक दिन दूरी बना ली, पर राजेश हर हाल में आरती के साथ जुड़ा रहना चाहता था, ‘‘आरती, मैं तुम्हें आसमान के चांदतारे तो ला कर नहीं दे सकता, पर अपनी पलकों पर जरूर बिठा कर रखूंगा. मैं तुम्हें कभी धोखा नहीं दूंगा, यह मैं वादा करता हूं.

‘‘तुम मु?ो छोड़ने की बात मत करो, मैं तुम्हारे बगैर जी नहीं पाऊंगा,’’ राजेश रोने लगा था.

‘‘राजेश, मैं तुम्हारी जुदाई बरदाश्त कर लूंगी. हर हाल में जी लूंगी, लेकिन तुम्हें कुछ हो जाए, यह मैं सहन नहीं कर सकूंगी. लाल गुस्से में पागल हो चुका है, मैं उस पर भरोसा नहीं कर सकती. हमारा प्यार जिंदा रहे, इस के लिए तुम्हें जिंदा रहना होगा.’’

‘‘तुम्हारी खुशी में ही मेरी खुशी है,’’ आंसू पोंछते हुए राजेश चला गया था.

एक हफ्ते बाद ही राजेश ने अपना तबादला दूसरे एरिया में करवा लिया था. फिर दोनों कभी नहीं मिले.

अखबार से ही राजेश को आरती के साथ हुए बलात्कार की जानकारी हुई. वह गुस्से से सुलग उठा और कभी फोन न करने की अपनी कसम तोड़ डाली, ‘‘आखिर उस जल्लाद ने अपना असली रूप दिखा ही दिया न. मैं कहता रहा, वह तुम्हें धोखा देगा. अब क्या कहूं…’’

‘तुम कैसे हो?’ फोन रिसीव करते ही आरती की आंखों से आंसू झरने लगे थे.

‘‘यह सब जान कर कैसे कहूं कि मैं ठीक हूं.’’

राजेश का फोन आना आरती के घायल तनमन पर चंदन के लेप जैसा था. एक पल के लिए वह अपने जख्मों को भूल गई थी.

आरती बिस्तर पर लेटे हुए कभी ऊपर छत को, तो कभी उस छिपकली को देख रही थी, जिस ने अभीअभी एक कीड़े को निगला था. वह खुद को समझने और समझाने में लग गई थी.

आज ही सभी अखबारों में आरती बलात्कार कांड को ले कर खबरें छपी थीं. पर उन चारों आरोपियों के बयान खटिया के 4 पायों की तरह थे. देह से वे चारों अलग थे, लेकिन बयान उन चारों के अलग नहीं थे. सब ने एकसुर में कहा था, ‘हम ने कोई बलात्कार नहीं किया है. हम ने इस के लिए पैसे दिए थे.’

बयान की शुरुआत पहले आरोपी घनश्याम साहू से हुई थी, ‘‘हमेशा की तरह उस दिन भी हम पांचों जुआ खेल रहे थे. लाल सारा पैसा हार चुका था. वह उठ कर जाने लगा. थोड़ी दूर जा कर रुक गया. फिर पीछे मुड़ा और सामने आ कर बोला, ‘मैं एक दांव और खेलूंगा, एक लाख का. बोलो, खेलते हो?’

‘‘लेकिन, मैं ने साफ मना कर दिया कि उधार का हम नहीं खेलेंगे. यह सुन कर लाल एकदम से बोल उठा,

‘10 लाख हैं मेरे पास.’

‘‘यह सुन कर फूचा बोला, ‘अभी तुम्हारी जेब में 10 टका नहीं था, यह

10 लाख कहां से आ गया?’

‘‘यह सुन कर लाल ने कहा, ‘मेरी पत्नी कितने लाख की है, मालूम है न तुम लोगों को…’

‘‘मैं ने उस का मजाक उड़ाते हुए कहा, ‘हांहां, मालूम है, पर उस से क्या? जुआ खेलने के लिए तो तुम्हें वह 100 का नोट भी नहीं देती.’

‘‘तभी लाल ऊंची आवाज में बोला, ‘एक लाख के रूप में मैं उसी पत्नी को आज दांव पर लगाता हूं.’

‘‘मैं ने हैरान हो कर कहा, ‘होश में तो है? पत्नी को दांव पर लगाएगा? महाभारत याद है न?’

‘‘पर जुए का नशा लाल पर भूत की तरह चढ़ गया था. वह नहीं माना. मैं सोच में पड़ गया था. मैं लाल की पत्नी और उस के स्वभाव को जानता था. जान लेगी तो सब की जान ले लेगी. कोई भी उस के सामने जाने से डरता था, मजाक करना तो दूर की बात.

‘‘हम चारों अभी कुछ सोच ही रहे थे कि तभी सोमा मोदी बोल उठा, ‘अगर लाल इतना बोल रहा है तो मान जाओ. हमारा क्या जाएगा, हारेंगे तो उस का पैसा उसे लौटा देंगे… और अगर जीत गए तो…’ बोलतेबोलते वह रुक गया था.

‘‘फिर उसी जगह हम पांचों बैठ गए थे. ताश की नई बाजी बिछ गई. खेल शुरू हो गया. हम देह की नसों में तनाव महसूस करने लगे थे. लाल का और भी बुरा हाल था.’’

‘‘फिर क्या हुआ था?’’ थानेदार रंजन चौधरी ने पूछा.

‘‘पहले की 2 बाजी में हारजीत का फैसला न हो सका,’’ घनश्याम ने कहना जारी रखा, ‘‘फिर हम तीसरी बाजी खेलने बैठे. लाल ने 3 बार खेल को बीच में रोका. हर बार उस की सोच बदलीबदली सी लगी. हम उस की ओर देखते, तो वह जाहिल की माफिक हंस देता.

‘‘यही आखिरी बाजी होगी, इस के बाद हम नहीं खेलेंगे. जब मैं ने ऐसा कहा, तो लाल ने मुझे घूर कर देखा.

‘‘खेल शुरू हुआ… 5 मिनट…

10 मिनट.. और 15 मिनट… अब की जीत का इक्का मेरे हाथ में था. खेल खत्म हो चुका था. लाल बाजी और दांव पर लगाई पत्नी को हार चुका था.

‘‘लाल ने कुछ नहीं कहा. मैं ने आहिस्ता से नजरें उठा कर लाल को देखा. वह शांत नहीं दिख रहा था.

‘‘तभी मैं ने कहा, ‘लाल, जुए में हम ने तुम्हारी पत्नी जीत तो ली है, पर फायदा क्या? यह बात जो भी उसे कहने जाएगा, उसे चप्पल खानी पड़ेगी और हम नहीं चाहते हैं कि जीत कर किसी की चप्पल खाएं.’

‘‘इस पर लाल ने कहा, ‘तो तुम्हें जीत का फायदा चाहिए?’

‘‘यह सुन कर हम चारों साथियों ने लार टपकाते हुए हामी भरी. लाल ने कहा, ‘ठीक है, तुम चारों मेरे बैंक अकाउंट में अभी एक लाख रुपए भेजो.’

‘‘मैं ने कहा, ‘हम चारों तुम्हें एक लाख रुपए क्यों दें?’

‘‘यह सुन कर लाल ने कहा, ‘तब फिर मेरी पत्नी से जा कर कहो कि हम ने तुम्हें जुए में जीता है.’

‘‘हम चारों एकदूसरे का मुंह देखने लगे. आखिर में हम ने लाल की बात मान ली और उस के खाते में एक लाख रुपए भेज दिए.

‘‘लाल ने कहा,

‘4 दिन बाद इस पैसे

का मजा लेने के लिए तैयार रहना.’’’

‘‘तुम ने अपनी ही पत्नी के साथ ऐसा खेल क्यों खेला..?’’ थानेदार रंजन चौधरी ने लाल से पूछा.

‘‘वह मेरी नाम की ही पत्नी है. उस की जिंदगी के साथ मेरा कोई मेल नहीं है. वह हमारे घर में रहती जरूर है, लेकिन मैं उस के दिल में नहीं रहता.

‘‘मेरी पत्नी हो कर भी वह मेरे साथ एक बंटी हुई जिंदगी जी रही है. उस की आंखों में तो राजेश बसा हुआ है. उस के साथ जोकुछ भी हुआ, उस पर मुझे जरा भी अफसोस नहीं है. वह इसी लायक है.’’

‘बंटी हुई जिंदगी जी रहा हूं, इसीलिए ऐसा किया,’ कुछ अखबारों में लाल के इसी बयान को हैडलाइन बनाया था.

दूसरे दिन चारों बलात्कारियों के साथ लाल को भी टेनुघाट जेल भेज दिया गया. बलात्कारियों के बयान और पुलिस चार्जशीट को अदालत ने गंभीर अपराध माना और इसी को आधार बनाया. हफ्तेभर में कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला भी सामने आ गया.

अपने फैसलों की वजह से चर्चित जज मोहन मलिक के सामने बचाव पक्ष के धाकड़ वकील सतीश मेहता की एक भी दलील काम नहीं आई. जज साहब ने उन की एक नहीं सुनी और चारों आरोपियों को 20-20 साल की और मुख्य आरोपी मानते हुए लाल को आजीवन कारावास की सजा सुना दी.

2 बेटों की मां आरती को अब अपनी जिंदगी का फैसला करना था, जो आसान नहीं था. उसे अपनों के द्वारा छला गया था और शरीर को जलील किया गया था.

घर के बाहर काफी भीड़ जमा हो गई थी. तभी आरती का बड़ा बेटा रूपेश बाहर आ कर बोला, ‘‘लाल हमारा बाप है, पर अब वह हमारे लिए मर चुका है. उस ने हमारी मां और हमें भी समाज में जलील किया है.’’

40वां बसंत पार कर चुकी आरती का बदन आज भी लोगों को लुभा रहा था और यह उसे भी बखूबी पता था, पर उसे यह पता नहीं था कि जिंदगी एक दिन उसे ऐसे मोड़ पर ला खड़ा कर देगी, जहां टैलीविजन चैनल वालों के सामने उसे अपनी बात रखने की नौबत आ पड़ेगी.

आरती ने एक नजर बाहर खड़ी भीड़ को देखा और इतना भर कहा, ‘‘घर और इज्जत जब दांव पर लग जाए, तब उस बंधन को तोड़ कर बाहर निकल जाना ही बेहतर है. औरतें ताश का पत्ता नहीं होती हैं, उन का भी अपना वजूद होता है,’’ बोलतेबोलते आरती की आवाज गंभीर होती चली गई. इसी के साथ वह कमरे की ओर मुड़ गई.

‘‘इस तरह का हिम्मत से भरा फैसला हर औरत नहीं ले सकती,’’ बाहर खड़ी भीड़ में से किसी ने कहा.

सुख की गारंटी : एक हकीकत

एक दिन काफी लंबे समय बाद अनु ने महक को फोन किया और बोली, “महक, जब तुम दिल्ली आना तो मुझ से मिलने जरूर आना.”

“हां, मिलते हैं, कितना लंबा समय गुजर गया है. मुलाकात ही नहीं हुई है हमारी.”

कुछ ही दिनों बाद मैं अकेली ही दिल्ली जा रही थी. अनु से बात करने के बाद पुरानी यादें, पुराने दिन याद आने लगे. मैं ने तय किया कि कुछ समय पुराने मित्रों से मिल कर उन पलों को फिर से जिया जाए. दोस्तों के साथ बिताए पल, यादें जीवन की नीरसता को कुछ कम करते हैं.

शादी के बाद जीवन बहुत बदल गया व बचपन के दिन, यादें व बहुत कुछ पीछे छूट गया था. मन पर जमी हुई समय की धूल साफ होने लगी…

कितने सुहाने दिन थे. न किसी बात की चिंता न फिक्र. दोस्तों के साथ हंसीठिठोली और भविष्य के सतरंगी सपने लिए, बचपन की मासूम पलों को पीछे छोड़ कर हम भी समय की घुड़दौड़ में शामिल हो गए थे. अनु और मैं ने अपने जीवन के सुखदुख एकसाथ साझा किए थे. उस से मिलने के लिए दिल बेकरार  था.

मैं दिल्ली पहुंचने का इंतजार कर रही थी. दिल्ली पहुंचते ही  मैं ने सब से पहले अनु को फोन किया. वह स्कूल में पढ़ाती है. नौकरी में समय निकालना भी मुश्किल भरा काम है.

“अनु मै आ गई हूं… बताओ कब मिलोगी तुम? तुम घर ही आ जाओ, आराम से बैठैंगे. सब से मिलना भी हो जाएगा…”

“नहीं यार, घर पर नही मिलेंगे, न तुम्हारे घर न ही मेरे घर. शाम को 3 बजे मिलते हैं. मैं स्कूल समाप्त होने के बाद सीधे वहीं आती हूं, कौफी हाउस, अपने वही पुराने रैस्टोरेंट में…”

“ठीक है शाम को मिलते हैं.“

आज दिल में न जाने क्यों अजीब सी बैचेनी हो रही थी. इतने वर्षों में हम मशीनी जीवन जीते संवादहीन हो गए थे. अपने लिए जीना भूल गए थे.   जीवन एक परिधि में सिमट गया था. एक भूलभूलैया जहां खुद को भूलने की कवायत शुरू हो गई थी. जीवन सिर्फ ससुराल, पति व बच्चों में सिमट कर रह गया था. सब को खुश रखने की कवायत में मैं खुद को भूल बैठी थी. लेकिन यह परम सत्य है कि सब को खुश रखना नामुमकिन सा होता है.

दुनिया गोल है, कहते हैं न एक न एक दिन चक्र पूरा हो ही जाता है. इसी चक्र में आज बिछडे साथी मिल रहे थे. घर से बाहर औपचारिकताओं से परे. अपने लिए हम अपनी आजादी को तलाशने का प्रयत्न करते हैं. अपने लिए पलों को एक सुख की अनुभूति होती है.

मैं समझ गई कि आज हमारे बीच कहने सुनने के लिए बहुत कुछ होगा. सालों से मौन की यह दीवार अब ढहने वाली है.

नियत समय पर मैं वहां पहुंच गई. शीघ्र ही अनु भी आ गई. वही प्यारी सी मुसकान, चेहरे पर गंभीरता के भाव, पर हां शरीर थोडा सा भर गया था, लेकिन आवाज में वही खनक थी. आंखे पहले की तरह प्रश्नों को तलाशती हुई नजर आईं, जैसे पहले सपनों को तलाशती थीं.

समय ने अपने अनुभव की लकीरें चेहरे पर खींच दी थीं. वह देखते ही गले मिली तो मौन की जमी हुई बर्फ स्वत: ही पिघलने लगी…

“कैसी हो अनु, कितने वर्षों बाद तुम्हें  देखा है. यार तुम तो बिलकुल भी नहीं बदलीं…”

“कहां यार, मोटी हो गई हूं… तुम बताओ कैसी हो? तुम्हारी जिंदगी तो मजे में गुजर रही है, तुम जीवन में कितनी सफल हो गई हो… चलो आराम से बैठते हैं…”

आज वर्षो बाद भी हमें संवादहीनता का एहसास नहीं हुआ… बात जैसे वहीं से शुरू हो गई, जहां खत्म हुई थी. अब हम रैस्टोरेंट में अपने लिए कोना तलाश रहे थे, जहां हमारे संवादों में किसी की दखलंदाजी न हो. इंसानी फितरत होती है कि वह भीड़ में भी अपना कोना तलाश लेता है. कोना जहां आप सब से दुबक कर बैठे हों, जैसेकि आसपास बैठी 4 निगाहें भी उस अदृश्य दीवार को भेद न सकें. वैसे यह सब मन का भ्रमजाल ही है.

अाखिरकार हमें कोना मिल ही गया. रैस्टोरेंट के उपरी भाग में कोने की खाली मेज जैसे हमारा ही इंतजार कर रही थी. यह कोना दिल को सुकून दे रहा था. चायनाश्ते का और्डर देने के बाद अनु सीधे मुद्दे पर आ गई. बोली,”और सुनाओ कैसी हो, जीवन में बहुत कुछ हासिल कर लिया है. आज इतना बड़ा मुकाम, पति, बच्चे सब मनमाफिक मिल गए तुम्हें. मुझे बहुत खुशी है…”

यह सुनते ही महक की आंखो में दर्द की लहर चुपके से आ कर गुजर गई व पलकों के कोर कुछ नम से हो गए. पर मुसकान का बनावटीपन कायम रखने की चेष्टा में चेहरे के मिश्रित हावभाव कुछ अनकही कहानी बयां कर रही थी.

“बस अनु सब ठीक है. अपने अकेलेपन से लड़ते हुए सफर को तय कर रही हूं, जीवन  में बहुत उतारचढाव देखें हैं. तुम तो खुश हो न? नौकरी करती हो, अच्छा कमा रही हो, अपनी जिंदगी अपने हिसाब से जी रही हो… सबकुछ अपनी पंसद का मिला है और क्या सुख चाहिए? मैं तो बस यों ही समय काटने के लिए लिखनेपढ़ने लगी,” मैं ने बात को घुमा कर उस का हाल जानने की कोशिश करनी चाही.

“मै भी बढ़िया हूं. जीवन कट रहा है. मैं पहले भी अकेली थी, आज भी अकेली हूं.  हम साथ जरूर हैं पर कितनी अलग राहें हैं जैसे नदी के 2 किनारे…

“यथार्थ की पथरीली जमीन बहुत कठोर है. पर जीना पडता है… इसलिए मैं ने खुद को काम में डूबो दिया है…”

“क्या हुआ, ऐसे क्यों बोल रही हो? तुम दोनों के बीच कुछ हुआ है क्या?”

“नहीं यार, पूरा जीवन बीत जाए तो भी हम एकदूसरे को समझ नहीं  सकेंगे. कितने वैचारिक मतभेद हैं, शादी का चार्म, प्रेम पता नही कहां 1 साल ही खत्म हो गया. अब पछतावा होता है. सच है, इंसान प्यार में अंधा हो जाता है.”

“हां, सही कहा. सब एक ही नाव पर सवार होते हैं पर परिवार के लिए जीना पड़ता है.”

“हां, तुम्हारी बात सही है, पर यह समझौते अंतहीन होते हैं, जिन्हें निभाने में जिंदगी का ही अंत हो जाता है.  तुम्हें तो शायद कुदरत से यह सब मिला है पर मैं ने तो अपने पैरों पर खुद कुल्हाडी मारी है. प्रेमविवाह जो किया है.

“सब ने मना किया था कि यह शादी मत करो, पर अाज समझ में आया कि मेरा फैसला गलत था. यार,  विनय का व्यवहार समझ से परे है. रिश्ता टूटने की कगार पर है. उस के पास मेरे लिए समय ही नहीं है या फिर वह देना नहीं चाहता… याद नहीं कब दोपल सुकून से बैठै हों. हर बात में अलगाव वाली स्थिति होती है.”

“अनु सब को मनचाहा जीवनसाथी नहीं मिलता.  जिंदगी उतनी आसान नहीं होती, जितना हम सोचते हैं. सुख अपरिभाषित है. रिश्ते निभाना इतना भी अासान नहीं है. हर रिश्ता आप से समय व त्याग मांगता है. पति के लिए जैसे पत्नी उन की संपत्ति होती है जिस पर जितनी चाहे मरजी चला लो. हम पहले मातापिता की मरजी से जीते थे, अब पति की मरजी से जीते हैं. शादी समझौते का दूसरा नाम ही है, हां कभीकभी मुझे भी गुस्सा आता है तो मां से शिकायत कर देती हूं पर अब मैं ने स्थिति को स्वीकार करना सीख लिया है. अब दुख नहीं होता. तुम भी हौंसला रखो, सब ठीक हो जाएगा.”

“नहीं महक, अब उम्मीद बाकी नहीं है. शादी करो तो मुश्किल, न करो तो भी मुश्किल. सब को शादी ही अंतिम पडाव क्यों लगता है? मैं ने भी समझौता कर लिया है कि रोनेधोने से समस्या हल नहीं होगी.

“अनु, तुम्हारे पास तो कला का हुनर है उसे और निखारो. अपने शौक पूरे करो. एक ही बिंदू पर खड़ी रहोगी तो घुटन होने लगेगी.

“एक बात बताओ कि एक आदमी किसी के सुख का पैमाना कैसे हो सकता है? अरैंज्ड मैरिज में पगपग पर असहमति होती है, यहां हर रिश्ता आग की दहलीज पर खड़ा होता है, हरकोई आप से संतुष्ट नहीं होता.”

“महक बात तो तुम्हारी सही है, पर विवाह में कोई एक व्यक्ति, किसी दूसरे के जीने का मापदंड कैसे तय कर सकता है? समय बदल गया है, कानून में भी दंड का प्रावधान है. हमें अपने अधिकारों के लिए सजग रहना चाहिए. कब तक अपनी इच्छाओं का गला घोटें… यहां तो भावनाओं का भी रेप हो जाता है, जहां बिना अपनी मरजी के आप वेदना से गुजरते रहो और कोई इस की परवाह भी न करे.”

“अनु, जब विवाह किया है तो निभाना भी पङेगा. क्या हमें मातापिता, बच्चे, पङोसी हमेशा मनचाहे ही मिलते हैं?  क्या सब जगह आप तालमेल नहीं  बैठाते? तो फिर पतिपत्नी के रिश्ते में वैचारिक मदभेद होना लाजिमी है.  हाथ की सारी उंगलिया भी एकसमान नहीं होतीं, तो 2 लिंग कैसे समान हो सकते हैं?

“इन मैरिज रेप इज इनविजिवल, सो रिलैक्स ऐंड ऐंजौय. मुंह सूजा कर रहने में कोई मजा नहीं है. दोनों पक्षों को थोड़ाथोङा झुकना पडता है. किसी ने कहा है न कि यह आग का दरिया है और डूब कर जाना है, तो विवाह में धूप व छांव के मोड़ मिलते रहते हैं.“

“हां, महक तुम शायद सही हो. कितना सहज सोचती हो. अब मुझे भी लगता है कि हमें फिर से एकदूसरे को मौका देना चाहिए. धूपछांव तो आतीजाती रहती हैं…”

“अनु देख यार, जब हम किसी को उस की कमी के साथ स्वीकार करते हैं तो पीडा का एहसास नहीं होता. सकारात्मक सोच कर अब आगे बढ़, परिवार को पूर्ण करो, यही जीवन है…”

विषय किसी उत्कर्षनिष्कर्ष तक पहुंचती कि तभी वेटर आ गया और दोनों चुप हो गईं.

“मैडम, आप को कुछ और चाहिए?” कहने के साथ ही मेज पर रखे खाली कपप्लेटें समेटने लगा. उन के हावभाव से लग रहा था कि खाली बैठे ग्राहक जल्दी से अपनी जगह छोङे.

“हम ने बातोंबातों में पहले ही चाय के कप पी कर खाली कर दिए.”

“हां, 2 कप कौफी के साथ बिल ले कर आना,”अनु के कहा.

“अनु, समय का भान नहीं हुआ कि 2 घंटे कैसे बीत गए. सच में गरमगरम कौफी की जरूरत महसूस हो रही है.”

मन में यही भाव था कि काश वक्त हमारे लिए ठहर जाए. पर ऐसा होता नहीं है. वर्षो बाद मिलीं सहेलियों के लिए बातों का बाजार खत्म करना भी मुश्किल भरा काम है. गरमगरम कौफी हलक में उतरने के बाद मस्तिष्क को राहत महसूस हो रही थी. मन की भड़ास विषय की गरमी, कौफी की गरम चुसकियों के साथ विलिन होने लगी. बातों का रूख बदल गया.

आज दोनों शांत मन से अदृश्य उदासी व पीड़ा के बंधन को मुक्त कर के चुपचाप यहीं छोड रही थीं.

मन में कडवाहट का बीज  जैसे मरने लगा. महक घर जाते हुए सोच रही थी कि प्रेमविवाह में भी मतभेद हो सकते हैं तो अरैंज्ड मैरिज में पगपग पर इम्तिहान है. एकदूसरे को समझने में जीवन गुजर जाता है. हर दिन नया होता है. जब आशा नहीं रखेंगे तो  वेदना नामक शराब से स्वत: मुक्ति मिल जाएगी.

अनु से बात करके मैं यह सोचने पर मजबूर हो गई थी कि हर शादीशुदा कपल परेशानी से गुजरता है. शादी के कुछ दिनों बाद जब प्यार का खुमार उतर जाता है तो धरातल की उबड़खाबड़ जमीन उन्हें चैन की नींद सोने नहीं देती है. फिर वहीं से शुरू हो जाता है आरोप प्रत्यारोपों का दौर. क्यों हम अपने हर सुखदुख की गारंटी अपने साथी को समझते हैं? हर पल मजाक उड़ाना व उन में खोट निकालना प्यार की परिभाषा को बदल देता है. जरा सा नजरिया बदलने की देर है .

सामाजिक बंधन को क्यों न हंस कर जिया जाए. पलों को गुनगुनाया जाए? एक पुरुष या एक स्त्री किसी के सुख की गांरटी का कारण कैसे बन सकते हैं? हां, सुख तलाश सकते हैं और बंधन निभाने में ही समझदारी है.

आज मैं ने भी अपने मन में जीवनसाथी के प्रति पल रही कसक को वहीं छोड़ दिया, तो मन का मौसम सुहाना लगने लगा. घर वापसी सुखद थी. शादी का बंधन मजबूरी नहीं प्यार का बंधन बन सकता है, बस सोच बदलने की देर है.

कुछ दिनों बाद अनु का फोन आया, “शुक्रिया महक, तुम्हारे कारण मेरा जीवन अब महकने लगा है. हम दोनों ने नई शुरुआत कर दी है. आपसी तालमेल निभाना सीख लिया है. अब मेरे आंगन में बेला के फूल महक रहे हैं. सुख की गांरटी एकदूसरे के पास है.” दोनों खिलखिला कर हंसने लगीं.

दुर्गाजी : बलदेव पर कौन सा दुखों का पहाड़ टूटा

शादी के 7-8 साल बाद रमिया के पैर भारी हुए थे. बलदेव ने तो आस ही छोड़ दी थी, मगर अब उस के कदम जमीन पर नहीं पड़ते थे.

दोनों पतिपत्नी मजदूरी करते थे. काम मिल जाता तो ठीक, नहीं तो कई बार फाका करने की नौबत आ जाती. मगर थे तो इनसान ही, उन के अंदर भी मांबाप बनने की चाह थी.

ब्याह के सालभर बाद ही बलदेव की अम्मां ने रमिया को ‘बांझ’ कहना शुरू कर दिया था. आतेजाते टोले की औरतें अम्मां से पूछतीं, ‘बलदेव की अम्मां, कोई खुशखबरी है क्या?’

यह बात सुन कर वे कुढ़ जातीं. घर में रोज कलह मचने लगा था. रमिया तो कुछ कहती न थी, चुपचाप सारी कड़वाहट झेल जाती, पर बलदेव उस के हक में मां से लड़ पड़ता.

तब मां उसे गाली देतीं, ‘कमबख्त, मेरी कोख का जना कैसे उस के लिए मुझ से ही लड़ रहा है. करमजली ने मेरे छोरे को मुझ से छीन लिया.’

जब बलदेव और रमिया के सब्र का पैमाना छलकने लगा, तो उन्होंने घर? छोड़ दिया और दूसरे शहर में जा कर मजदूरी करने लगे.

जचगी का समय नजदीक आता जा रहा था. उन की खुशी और चिंता का दिलों में संगम सा हो रहा था. रमिया ने बच्चे के लिए छोटेछोटे कपड़े तैयार कर रखे थे.

‘‘ओ रमिया, मुझे तो बेटी चाहिए, बिलकुल तेरे जैसी,’’ बलदेव अकसर उस से चुहल करता.

रमिया कहती, ‘‘अगर छोरा होगा, तो क्या उसे प्यार न करोगे?’’

‘‘नहीं.’’

‘‘क्यों?’’ यह सुन कर रमिया रूठ जाती.

बलदेव कहता, ‘‘छोरे कमबख्त किसी की बात नहीं सुनते, दिनभर ऊधम मचाते हैं…’’

‘‘पर तुम भी तो मरद हो?’’

‘‘तभी तो कह रहा हूं कि छोरा नहीं चाहिए.’’

हलकीफुलकी नोकझोंक, प्यार व तकरार के साथ दिन बीत रहे थे. बलदेव अपनी पत्नी का खूब खयाल रखता. अब तो उस ने दारू पर भी रोक सी लगा दी थी और दोगुनी मेहनत करने लगा था.

आधी रात के वक्त रमिया के दर्द शुरू हो गया. बलदेव भाग कर शांति चाची को बुला लाया.

शांति चाची ने पड़ोस की 2 औरतों को साथ ले लिया. अस्पताल के बरामदे में बैठा बलदेव भीतर से आने वाली नन्ही आवाज का इंतजार कर रहा था.

जब सुबह होने को आई, तभी एक दर्दनाक चीख के साथ ही नन्ही सी आवाज सुनाई पड़ी.

डाक्टर ने दरवाजा खोला और शांति चाची को अंदर बुला लिया. 15-20 मिनट तक फुसफुसाहटें आती रहीं, फिर डाक्टर की आवाज आई, ‘‘तुम लोग पागल हो… करो जो मरजी हो.’’

‘‘अरे बलदेव, तेरी तो तकदीर खुल गई रे, तेरे घर में तो देवी मां खुद पधारी हैं. जा, दर्शन कर के आ,’’ शांति चाची बोलीं.

‘‘बेटी हुई है न?’’ बलदेव उतावला हो उठा.

‘‘बेटी नहीं, देवी है, चल जल्दी,’’ शांति चाची उसे खींचते हुए अंदर ले गईं.

बच्ची को देखते ही बलदेव भौचक्का रह गया. बच्ची के 4 हाथ थे, 3 पूरे और एक अधूरा. रमिया बेहोश थी और वह नवजात बच्ची टुकुरटुकुर उसे देख रही थी.

बलदेव ने सोचा कि नवरात्र के दिनों में दुर्गा मां उसे दर्शन देने खुद पधारी हैं. उस की हिम्मत न हुई कि बच्ची को गोद में उठाए. वह हैरानी से बस एकटक उसे देखे जा रहा था.

बचपन में कई बार उस ने सुना था कि किसी गांव में किसी के घर दुर्गाजी ने जन्म लिया, बाद में उन के नाम का मंदिर भी बना दिया गया.

खुद बलदेव अपनी तकदीर पर गर्व कर रहा था कि ‘मां’ ने उसे इस काबिल समझ. रमिया की कोख धन्य हो गई.

शांति चाची बोलीं, ‘‘डाक्टर कह रहा था कि बच्ची ठीक है, आपरेशन कर के फालतू हाथ हटा देंगे, पता तक न चलेगा. पर मैं ने कह दिया, यह देवी है, इसे हाथ भी न लगाना.’’

सुबह हो ही चुकी थी. थोड़ी देर में दूरदराज के गांवों तक में यह खबर फैल गई कि बलदेव के घर ‘मैया’ ने जन्म लिया है.

डाक्टरों ने रमिया को घर भेज दिया, घर में रमिया को तो कमरे में लिटा दिया गया. लोग आते, बच्ची के दर्शन करते, चढ़ावा चढ़ाते और मैया का गुणगान करते हुए चले जाते.

यह देख कर बच्ची लगातार रोए जा रही थी. इस से सब को लगा कि मैया नाराज हैं, इसलिए ढोलक, मंजीरे के साथ कीर्तन शुरू हो गया. मैया को खुश करने की कोशिश की जाने लगी.

कुछ देर बाद बच्ची शांत हो गई. तब तक दोपहर हो चुकी थी. देखभाल न होने के कारण बच्ची मर गई थी. मां के दूध के तो उसे दर्शन भी न हुए थे.

बच्ची के मरने के बाद कहा जाने लगा, ‘मां का काम पूरा हुआ, इसलिए वे चली गईं.’

एक बुजुर्ग ने नसीहत दी, ‘‘देख बलदेव, मैया के नाम पर पीपल के नीचे पत्थर रख देना या यहीं घर के बाहर उन की समाधि बनवा देना.’’

बलदेव एक मुद्दत के बाद पिता बना, लेकिन फिर से बेऔलाद हो गया. बच्ची के अंतिम संस्कार के बाद जब वह घर लौटा तो देखा कि रमिया फूटफूट कर रो रही है. उसे तो यही दुख था कि वह अपनी बच्ची को सीने से भी न लगा पाई, उसे दूध तक न पिला पाई, मां बनने का सुख भी न उठा पाई.

कुदरत ने उसे मां बना कर फिर से बांझ बना दिया.

‘‘अरी, रोती क्यों है?’’ बलदेव ने पूछा, तो वह और भी जोर से रोने लगी.

‘‘तुम लोगों ने मेरी बच्ची को मार दिया…’’ कुछ देर बाद शांत होने पर रमिया बोली, ‘‘उसे न दूध मिला, न कपड़ा. मेरी बेटी को उठा कर बाहर डाल दिया. तुम्हीं उस के हत्यारे हो,’’ रमिया चीख पड़ी.

‘‘अरे, वह देवी मैया थीं… देखा नहीं उन के 4 हाथ थे. क्या किसी साधारण बच्चे के 4 हाथ होते हैं? नवरात्र के दिनों में वे हमें दर्शन दे कर चली गईं… हमारी तकदीर खुल गई. तेरी कोख धन्य हो गई,’’ बलदेव खुश होता हुआ बोला, फिर रमिया को रोता छोड़ कर वह चढ़ावे की रकम गिनने लगा.

थोड़ी देर बाद वह बोला, ‘‘रमिया, देख तो कितने रुपए हैं… तू ने पहले कभी न देखे होंगे… पूरे 8 हजार रुपए हैं. एक दिन में इतना चढ़ावा… बाहर एक पत्थर आएगा… हमारे दिन फिर जाएंगे.’’

‘‘क्यों, देवी के नाम पर पैसा बटोरोगे…’’ रमिया सिसकते हुए बोली.

‘‘चुप कर, बड़ेबड़े पंडेपुजारी भी इसी तरह पैसा बटोरते हैं. अगर हम ने ऐसा कर लिया, तो भला कौन सा पाप लगेगा?’’

तभी उस ने रमिया की ओर देखा, वह आंचल में मुंह छिपाए रो रही थी. उसे एक नहीं कई दुख लग गए थे, कोख उजड़ने का, पति के लालच का और उस की बेटी के नाम किए जाने वाले पाप या जुर्म का…

मझधार: जिंदगी के भंवर में फंसी नेहा

पूरे 15 वर्ष हो गए मुझे स्कूल में नौकरी करते हुए. इन वर्षों में कितने ही बच्चे होस्टल आए और गए, किंतु नेहा उन सब में कुछ अलग ही थी. बड़ी ही शांत, अपनेआप में रहने वाली. न किसी से बोलती न ही कक्षा में शैतानी करती. जब सारे बच्चे टीचर की गैरमौजूदगी में इधरउधर कूदतेफांदते होते, वह अकेले बैठे कोई किताब पढ़ती होती या सादे कागज पर कोई चित्रकारी करती होती. विद्यालय में होने वाले सारे कार्यक्रमों में अव्वल रहती. बहुमखी प्रतिभा की धनी थी वह. फिर भी एक अलग सी खामोशी नजर आती थी मुझे उस के चेहरे पर. किंतु कभीकभी वह खामोशी उदासी का रूप ले लेती. मैं उस पर कई दिनों से ध्यान दे रही थी. जब स्पोर्ट्स का पीरियड होता, वह किसी कोने में बैठ गुमनाम सी कुछ सोचती रहती.

कभीकभी वह कक्षा में पढ़ते हुए बोर्ड को ताकती रहती और उस की सुंदर सीप सी आंखें आंसुओं से चमक उठतीं. मेरे से रहा न गया, सो मैं ने एक दिन उस से पूछ ही लिया, ‘‘नेहा, तुम बहुत अच्छी लड़की हो. विद्यालय के कार्यक्रमों में हर क्षेत्र में अव्वल आती हो. फिर तुम उदास, गुमसुम क्यों रहती हो? अपने दोस्तों के साथ खेलती भी नहीं. क्या तुम्हें होस्टल या स्कूल में कोई परेशानी है?’’

वह बोली, ‘‘जी नहीं मैडम, ऐसी कोई बात नहीं. बस, मुझे अच्छा नहीं लगता. ’’

उस के इस जवाब ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया जहां बच्चे खेलते नहीं थकते, उन्हें बारबार अनुशासित करना पड़ता है, उन्हें उन की जिम्मेदारियां समझानी पड़ती हैं वहां इस लड़की के बचपन में यह सब क्यों नहीं? मुझे लगा, कुछ तो ऐसा है जो इसे अंदर ही अंदर काट रहा है. सो, मैं ने उस का पहले से ज्यादा ध्यान रखना शुरू कर दिया. मैं देखती थी कि जब सारे बच्चों के मातापिता महीने में एक बार अपने बच्चों से मिलने आते तो उस से मिलने कोई नहीं आता था. तब वह दूर से सब के मातापिता को अपने बच्चों को पुचकारते देखती और उस की आंखों में पानी आ जाता. वह दौड़ कर अपने होस्टल के कमरे में जाती और एक तसवीर निकाल कर देखती, फिर वापस रख देती.

जब बच्चों के जन्मदिन होते तो उन के मातापिता उन के लिए व उन के दोस्तों के लिए चौकलेट व उपहार ले कर आते लेकिन उस के जन्मदिन पर किसी का कोई फोन भी न आता. हद तो तब हो गई जब गरमी की छुट्टियां हुईं. सब के मातापिता अपने बच्चों को लेने आए लेकिन उसे कोई लेने नहीं आया. मुझे लगा, कोई मांबाप इतने गैर जिम्मेदार कैसे हो सकते हैं? तब मैं ने औफिस से उस का फोन नंबर ले कर उस के घर फोन किया और पूछा कि आप इसे लेने आएंगे या मैं ले जाऊं?

जवाब बहुत ही हैरान करने वाला था. उस की दादी ने कहा, ‘‘आप अपने साथ ले जा सकती हैं.’’ मैं समझ गई थी कोई बड़ी गड़बड़ जरूर है वरना इतनी प्यारी बच्ची के साथ ऐसा व्यवहार? खैर, उन छुट्टियों में मैं उसे अपने साथ ले गई. कुछ दिन तो वह चुपचाप रही, फिर धीरेधीरे मेरे साथ घुलनेमिलने लगी थी. मुझे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे मैं किसी बड़ी जंग को जीतने वाली हूं. छुट्टियों के बाद जब स्कूल खुले वह 8वीं कक्षा में आ गई थी. उस की शारीरिक बनावट में भी परिवर्तन होने लगा था. मैं भलीभांति समझती थी कि उसे बहुत प्यार की जरूरत है. सो, अब तो मैं ने बीड़ा उठा लिया था उस की उदासी को दूर करने का. कभीकभी मैं देखती थी कि स्कूल के कुछ शैतान बच्चे उसे ‘रोतली’ कह कर चिढ़ाते थे. खैर, उन्हें तो मैं ने बड़ी सख्ती से कह दिया था कि यदि अगली बार वे नेहा को चिढ़ाते पाए गए तो उन्हें सजा मिलेगी.

हां, उस की कुछ बच्चों से अच्छी पटती थी. वे उसे अपने घरों से लौटने के बाद अपने मातापिता के संग बिताए पलों के बारे में बता रहे थे तो उस ने भी अपनी इस बार की छुट्टियां मेरे साथ कैसे बिताईं, सब को बड़ी खुशीखुशी बताया. मुझे ऐसा लगा जैसे मैं अपनी मंजिल का आधा रास्ता तय कर चुकी हूं. इस बार दीवाली की छुट्टियां थीं और मैं चाहती थी कि वह मेरे साथ दीवाली मनाए. सो, मैं ने पहले ही उस के घर फोन कर कहा कि क्या मैं नेहा को अपने साथ ले जाऊं छुट्टियों में? मैं जानती थी कि जवाब ‘हां’ ही मिलेगा और वही हुआ. दीवाली पर मैं ने उसे नई ड्रैस दिलवाई और पटाखों की दुकान पर ले गई. उस ने पटाखे खरीदने से इनकार कर दिया. वह कहने लगी, उसे शोर पसंद नहीं. मैं ने भी जिद करना उचित न समझा और कुछ फुलझड़ियों के पैकेट उस के लिए खरीद लिए. दीवाली की रात जब दिए जले, वह बहुत खुश थी और जैसे ही मैं ने एक फुलझड़ी सुलगा कर उसे थमाने की कोशिश की, वह नहींनहीं कह रोने लगी और साथ ही, उस के मुंह से ‘मम्मी’ शब्द निकल गया. मैं यही चाहती थी और मैं ने मौका देख उसे गले लगा लिया और कहा, ‘मैं हूं तुम्हारी मम्मी. मुझे बताओ तुम्हें क्या परेशानी है?’ आज वह मेरी छाती से चिपक कर रो रही थी और सबकुछ अपनेआप ही बताने लगी थी.

वह कहने लगी, ‘‘मेरे मां व पिताजी की अरेंज्ड मैरिज थी. मेरे पिताजी अपने मातापिता की इकलौती संतान हैं, इसीलिए शायद थोड़े बदमिजाज भी. मेरी मां की शादी के 1 वर्ष बाद ही मेरा जन्म हुआ. मां व पिताजी के छोटेछोटे झगड़े चलते रहते थे. तब मैं कुछ समझती नहीं थी. झगड़े बढ़ते गए और मैं 5 वर्ष की हो गई. दिनप्रतिदिन पिताजी का मां के साथ बरताव बुरा होता जा रहा था. लेकिन मां भी क्या करतीं? उन्हें तो सब सहन करना था मेरे कारण, वरना मां शायद पिताजी को छोड़ भी देतीं.

‘‘पिताजी अच्छी तरह जानते थे कि मां उन को छोड़ कर कहीं नहीं जाएगी. पिताजी को सिगरेट पीने की बुरी आदत थी. कई बार वे गुस्से में मां को जलती सिगरेट से जला भी देते थे. और वे बेचारी अपनी कमर पर लगे सिगरेट के निशान साड़ी से छिपाने की कोशिश करती रहतीं. पिताजी की मां के प्रति बेरुखी बढ़ती जा रही थी और अब वे दूसरी लड़कियों को भी घर में लाने लगे थे. वे लड़कियां पिताजी के साथ उन के कमरे में होतीं और मैं व मां दूसरे कमरे में. ‘‘ये सब देख कर भी दादी पिताजी को कुछ न कहतीं. एक दिन मां ने पिताजी के अत्याचारों से तंग आ कर घर छोड़ने का फैसला कर लिया और मुझे ले कर अपने मायके आ गईं. वहां उन्होंने एक प्राइवेट स्कूल में नौकरी भी कर ली. मेरे नानानानी पर तो मानो मुसीबत के पहाड़ टूट पड़े. मेरे मामा भी हैं किंतु वे मां से छोटे हैं. सो, चाह कर भी कोई मदद नहीं कर पाए. जो नानानानी कहते वे वही करते. कई महीने बीत गए. अब नानानानी को लगने लगा कि बेटी मायके आ कर बैठ गई है, इसे समझाबुझा कर भेज देना चाहिए. वे मां को समझाते कि पिताजी के पास वापस चली जाएं.

‘‘एक तरह से उन का कहना भी  सही था कि जब तक वे हैं ठीक है. उन के न रहने पर मुझे और मां को कौन संभालेगा? किंतु मां कहतीं, ‘मैं मर जाऊंगी लेकिन उस के पास वापस नहीं जाऊंगी.’

‘‘दादादादी के समझाने पर एक बार पिताजी मुझे व मां को लेने आए और तब मेरे नानानानी ने मुझे व मां को इस शर्त पर भेज दिया कि पिताजी अब मां को और नहीं सताएंगे. हम फिर से पिताजी के पास उन के घर आ गए. कुछ दिन पिताजी ठीक रहे. किंतु पिताजी ने फिर अपने पहले वाले रंगढंग दिखाने शुरू कर दिए. अब मैं धीरेधीरे सबकुछ समझने लगी थी. लेकिन पिताजी के व्यवहार में कोई फर्क नहीं आया. वे उसी तरह मां से झगड़ा करते और उन्हें परेशान करते. इस बार जब मां ने नानानानी को सारी बातें बताईं तो उन्होंने थोड़ा दिमाग से काम लिया और मां से कहा कि मुझे पिताजी के पास छोड़ कर मायके आ जाएं. ‘‘मां ने नानानानी की बात मानी और मुझे पिताजी के घर में छोड़ नानानानी के पास चली गईं. उन्हें लगा शायद मुझे बिन मां के देख पिताजी व दादादादी का मन कुछ बदल जाएगा. किंतु ऐसा न हुआ. उन्होंने कभी मां को याद भी न किया और मुझे होस्टल में डाल दिया. नानानानी को फिर लगने लगा कि उन के बाद मां को कौन संभालेगा और उन्होंने पिताजी व मां का तलाक करवा दिया और मां की दूसरी शादी कर दी गई. मां के नए पति के पहले से 2 बच्चे थे और एक बूढ़ी मां. सो, मां उन में व्यस्त हो गईं.

‘‘इधर, मुझे होस्टल में डाल दादादादी व पिताजी आजाद हो गए. छुट्टियों में भी न मुझे कोई बुलाता, न ही मिलने आते. मां व पिताजी दोनों के मातापिता ने सिर्फ अपने बच्चों के बारे में सोचा, मेरे बारे में किसी ने नहीं. दोनों परिवारों और मेरे अपने मातापिता ने मुझे मझधार में छोड़ दिया.’’ इतना कह कर नेहा फूटफूट कर रोने लगी और कहने लगी, ‘‘आज फुलझड़ी से जल न जाऊं. मुझे मां की सिगरेट से जली कमर याद आ गई. मैडम, मैं रोज अपनी मां को याद करती हूं, चाहती हूं कि वे मेरे सपने में आएं और मुझे प्यार करें.

‘‘क्या मेरी मां भी मुझे कभी याद करती होंगी? क्यों वे मुझे मेरी दादी, दादा, पापा के पास छोड़ गईं? वे तो जानती थीं कि उन के सिवा कोई नहीं था मेरा इस दुनिया में. दादादादी, क्या उन से मेरा कोई रिश्ता नहीं? वे लोग मुझे क्यों नहीं प्यार करते? अगर मेरे पापा, मम्मी का झगड़ा होता था तो उस में मेरा क्या कुसूर? और नाना, नानी उन्होंने भी मुझे अपने पास नहीं रखा. बल्कि मेरी मां की दूसरी शादी करवा दी. और मुझ से मेरी मां छीन ली. मैं उन सब से नफरत करती हूं मैडम. मुझे कोई अच्छा नहीं लगता. कोई मुझ से प्यार नहीं करता.’’

वह कहे जा रही थी और मैं सुने जा रही थी. मैं नेहा की पूरी बात सुन कर सोचती रह गई, ‘क्या बच्चे से रिश्ता तब तक होता है जब तक उस के मातापिता उसे पालने में सक्षम हों? जो दादादादी, नानानानी अपने बच्चों से ज्यादा अपने नातीपोतों पर प्यार उड़ेला करते थे, क्या आज वे सिर्फ एक ढकोसला हैं? उन का उस बच्चे से रिश्ता सिर्फ अपने बच्चों से जुड़ा है? यदि किसी कारणवश वह बीच की कड़ी टूट जाए तो क्या उन दादादादी, नानानानी की बच्चे के प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं? और क्या मातापिता अपने गैरजिम्मेदार बच्चों का विवाह कर एक पवित्र बंधन को बोझ में बदल देते हैं? क्या नेहा की दादी अपने बेटे पर नियंत्रण नहीं रख सकती थी और यदि नहीं तो उस ने नेहा की मां की जिंदगी क्यों बरबाद की, और क्यों नेहा की मां अपने मातापिता की बातों में आ गई और नेहा के भविष्य के बारे में न सोचते हुए दूसरे विवाह को राजी हो गई?

‘कैसे गैरजिम्मेदार होते हैं वे मातापिता जो अपने बच्चों को इस तरह अकेला घुटघुट कर जीने के लिए छोड़ देते हैं. यदि उन की आपस में नहीं बनती तो उस का खमियाजा बच्चे क्यों भुगतें. क्या हक होता है उन्हें बच्चे पैदा करने का जो उन की परवरिश नहीं कर सकते.’ मैं चाहती थी आज नेहा वह सब कह डाले जो उस के मन में नासूर बन उसे अंदर ही अंदर खाए जा रहा है. जब वह सब कह चुप हुई तो मैं ने उसे मुसकरा कर देखा और पूछा, ‘‘मैं तुम्हें कैसी लगती हूं? क्या तुम समझती हो मैं तुम्हें प्यार करती हूं?’’ उस ने अपनी गरदन हिलाते हुए कहा, ‘‘हां.’’ और मैं ने पूछ लिया, ‘‘क्या तुम मुझे अपनी मां बनाओगी?’’ वह समझ न सकी मैं क्या कह रही हूं. मैं ने पूछा, ‘‘क्या तुम हमेशा के लिए मेरे साथ रहोगी?’’

जवाब में वह मुसकरा रही थी. और मैं ने झट से उस के दादादादी को बुलवा भेजा. जब वे आए, मैं ने कहा, ‘‘देखिए, आप की तो उम्र हो चुकी है और मैं इसे सदा के लिए अपने पास रखना चाहती हूं. क्यों नहीं आप इसे मुझे गोद दे देते?’’

दादादादी ने कहा, ‘‘जैसा आप उचित समझें.’’ फिर क्या था, मैं ने झट से कागजी कार्यवाही पूरी की और नेहा को सदा के लिए अपने पास रख लिया. मैं नहीं चाहती थी कि मझधार में हिचकोले खाती वह मासूम जिंदगी किसी तेज रेले के साथ बह जाए.

चुग गई खेत : बाप जातेजाते बेटे को बना गया भिखारी

राम कुमार काफी देर से बहू मालती को बारबार कह रहा था कि उसे बड़े जोरों की भूख लगी है. खाली पेट उस की जान निकली जा रही है.

मालती पहले तो कपड़े धोने का बहाना बनाती रही, फिर पड़ोस की धन्नो मौसी अपना समय गुजारने के लिए उस के पास आ बैठी.

धन्नो मौसी गांव में दाई का काम करती थी. वह जवान औरतों और मनचली लड़कियों के नाजायज संबंधों की भी पूरी जानकारी रखती थी.

इस समय भी धन्नो मौसी किसी औरत के अपने जेठ से नाजायज संबंधों की रसीली दास्तान मिर्चमसाला लगा कर मालती को सुना रही थी.

मालती भी अपने भूखे ससुर की जरूरत को अंगूठा दिखाते हुए धन्नो मौसी की बेहूदा बातें चटखारे ले कर सुन रही थी.

जिस्मानी संबंधों की दास्तान सुन कर मालती अपनी सैक्स भावनाओं को भड़का रही थी.

मालती का पति नरपाल सुबह से किसी काम से शहर गया था. उस के पास जो जमीन थी, उसे किसी को बंटाई पर दे रखा था. फसल तैयार होने पर वह आधी फसल लेता था.

मालती की शादी को 5 साल हो चुके थे, पर अभी तक बच्चा नहीं हुआ था. इस के बावजूद नरपाल दिनरात मालती की जवानी में ही खोया रहता था. मेहनत कर के रुपयापैसा कमाना उस की आदत में नहीं था. बाप की जमीन से जो कमाई होती थी, उसी को खा रहा था.

राम कुमार बारबार समझाता था कि खेतों को बंटाई पर देने के बजाय खुद मेहनत करे, मगर नरपाल ने बाप की सीख पर ध्यान नहीं दिया. उसे तो हर तरफ मालती की मचलती जवानी नजर आती थी.

राम कुमार की उम्र 55 साल की हो चुकी थी. उस की पत्नी को मरे 10 साल हो चुके थे.

पत्नी का अचानक साथ छोड़ जाना, बेटे की लापरवाही व निकम्मेपन ने उसे परेशान कर दिया था. इसी परेशानी, तनाव व घर में आएदिन क्लेश के चलते वह लकवे का शिकार हो गया था.

राम कुमार अपने छोटेछोटे कामों के लिए दूसरों का मुहताज हो गया था. नरपाल तो अपने बाप की तरफ जरा भी ध्यान नहीं देता था.

राम कुमार ने नरपाल की शादी यह सोच कर की थी कि बेटा नहीं तो बहू ही उस की देखभाल करेगी. मगर उस की उम्मीदों पर पानी फिर गया.

लाचार और बेबस राम कुमार काफी देर तक गिड़गिड़ाता रहा कि दोपहर को खाना बना दे, उसे भूख लगी है. मगर मालती जानबूझ कर उस की फरियाद को अनसुना करती रही.

‘‘अरे बहू, अगर खाना नहीं बनाती, तो एक गिलास पानी ही दे दे. क्यों मुझे भूखाप्यासा मारने पर तुली है?’’ राम कुमार की आवाज भर्रा उठी थी.

‘‘अरे मालती, तुम्हारा ससुर तो तुम्हें दो घड़ी आराम से बैठने नहीं देगा. बेचारे की प्यास बुझ, मैं चली अपने घर. यहां बैठना तो मुश्किल हो रहा है,’’ हाथ नचाते हुए धन्नो मौसी चली गई.

‘‘इस बूढ़े ने तो नाक में दम कर दिया है,’’ मालती पैर पटकते हुए रसोईघर में गई और पानी का लोटा राम कुमार के सामने मेज पर रख दिया. पानी रख कर वह बड़बड़ाते हुए दूसरे कमरे में जा कर लेट गई.

पानी देखा, तो राम कुमार के मुरझाए चेहरे पर चमक आ गई. उस ने थोड़ा झाक कर हाथ बढ़ाया, तो पानी के लोटे तक हाथ पहुंच तो गया, मगर आधे जिस्म से अपना संतुलन नहीं बना पाया.

पानी का लोटा हाथ में न आने की वजह से मेज पर ही लुढ़क गया और सारा पानी मेज पर बिखर गया.

अपनी बेबसी और बहू की लापरवाही पर राम कुमार रो पड़ा. लाचार बूढ़े की सिसकियां घर में मातम और अनहोनी का माहौल पैदा कर रही थीं. कमरे में पानी बिखरने पर बिगड़ी मालती छाती पर हाथ मारते हुए ससुर को कोसने लगी.

घर में शोर सुन कर पड़ोस में रहने वाली एक 40 साला विधवा विमला आ गई. पड़ोस की औरतें और बच्चे भी वहां जमा हो गए.

फर्श पर बिखरा पानी देख कर विमला समझ गई कि माजरा क्या है. उस ने फौरन अपने घर से पानी ला कर राम कुमार को पिलाया, तो मालती उस के पीछे पड़ गई और आरोप लगा दिया कि बूढ़े के विमला के साथ नाजायज संबंध हैं.

यह सुन कर बेचारी विधवा विमला अपने घर चली गई. वह अपनी बदनामी से परेशान हो गई थी. शाम को नरपाल जैसे ही घर आया, कुछ औरतों ने मालती की शिकायत की कि वह उस के अपाहिज बाप पर जुल्म कर रही है. आज तो उस ने ससुर को सारा दिन खाना भी नहीं दिया.

महल्ले की औरतों की बातें सुन कर नरपाल का जमीर जागा. वह घर में घुसते ही मालती पर बरस पड़ा.

पति के बदले तेवर देख कर मोटेमोटे आंसू बहाती हुई मालती ससुर पर गलत आरोप लगाने लगी कि इस घर में रह कर अपनी बेइज्जती नहीं कराएगी. घर में अपने बाप को रखे या उसे. जब तक वह अपने बाप को घर से नहीं निकालेगा, तब तक वह लौट कर नहीं आएगी.

ऐसा सुन कर नरपाल नरम पड़ गया, मगर मालती अपनी जिद पर अड़ गई थी. उस ने पति की बात नहीं मानी और कंधे पर बैग उठाए आटोरिकशे में बैठ कर बसअड्डे पहुंच गई.

नरपाल ने तो यह सोच कर मालती को धमकाया था कि उसे अपनी गलती का एहसास होगा, मगर यहां तो पासा ही पलट गया था.

नरपाल भी बस में बैठा और मालती को मनाने ससुराल चला गया. वहां पहुंच कर मालती से माफी मांगते हुए घर चलने को कहा, तो नरपाल की सास ने बेटी का पक्ष लेते हुए कहा, ‘‘देखो दामादजी, मेरी बेटी को आप का बाप तंग करता है. जब तक वह जिंदा है, तब तक मालती वहां नहीं जाएगी.’’

‘‘मगर मांजी, मैं तो मालती के बगैर एक रात भी अकेला नहीं रह सकता. मालती में तो मेरी जान अटकी है,’’ नरपाल ने मालती का हाथ थाम कर अपनी दीवानगी जाहिर की.

सास मन ही मन खुश हुई. उसे लगा कि बेटी ने नरपाल को अपने रंगरूप का दीवाना बना रखा है. अब तो बूढ़ा जल्दी ही मरेगा. तब उस की बेटी अपने घर में मजे से रहेगी.

उस ने नरपाल से कहा, ‘‘अगर ऐसा है, तो तुम भी यहां रहने आ जाओ. तब तो दोनों की समस्या ही खत्म हो जाएगी.’’

नरपाल भी तो यही चाहता था. इधर मालती का छोटा भाई कालेज जाने लगा था. बापू के साथ खेतों में काम करने वाले आदमी की जरूरत थी. नरपाल ने वह कमी पूरी कर दी थी.

रात के 10 बजने को थे. अपाहिज राम कुमार आंसू बहा रहा था. उसे लगा कि बुरे समय में बहू ने तो साथ छोड़ा, अपना पैदा किया बेटा भी उसे भूल गया.

अचानक राम कुमार के जेहन में खयाल आया. उस ने मेज पर टेबल फैन चलता देखा. उस ने माचिस की तीली जला कर तार को जला दिया. तार जलने से चिनगारियां निकलीं, तो उस ने तार को पकड़ कर अपनेआप को फर्श पर गिरा लिया.

तभी एक दर्दनाक चीख कमरे में गूंजी. बिजली के तार ने राम कुमार को दूर झटक दिया. वह गेंद की तरह लुढ़कता हुआ कमरे की दीवार से जा टकराया और बेहोश हो गया.

किसी के चीखने की आवाज सुन कर पड़ोस में रहने वाली विधवा विमला भागी आई. वह राम कुमार को बेहोश देख कर सहम गई. उसे लगा कि कहीं बूढ़ा मर गया, तो उस के सिर पर हत्या का आरोप न लग जाए.

विमला ने गौर से देखा. राम कुमार की सांसें चल रही थीं. उस ने सीने पर हाथ रख के देखा, तो दिल धड़क रहा था. वह फौरन दूसरी गली में रहने वाले डाक्टर को बुला लाई.

डाक्टर ने बेहोशी हटाने का टीका लगाया, तो राम कुमार को होश आ गया. होश में आते ही उस ने उठने की कोशिश की, तो वह अपनेआप उठ खड़ा हुआ और खुशी के मारे चीख उठा, ‘‘डाक्टर साहब, मैं खड़ा हो सकता हूं… मेरे हाथ और पैर में जान आ गई है.’’

डाक्टर के पूछने पर राम कुमार ने बिजली के करंट लगने की बात बताई.

डाक्टर ने चैकअप कर के बताया, ‘‘बिजली का करंट लगने से तुम्हारे जिस्म का जो आधा हिस्सा बेकार हो गया था, अब उस में जान आ गई है. अगर सही समय पर दवा दी जाए, तो तुम 5-10 दिनों में ठीक हो सकते हो.’’

यह सुन कर राम कुमार के चेहरे पर खुशी उभर आई.

‘‘आप दवा दीजिए डाक्टर साहब, इन के बेटाबहू तो यहां पर हैं नहीं, फिर भी इनसानियत के नाते मैं इन की देखभाल करूंगी,’’ विमला ने मदद करने का भरोसा दिया.

डाक्टर दवाएं दे कर चला गया. विमला ने राम कुमार को हलका खाना बना कर खिलाया और दवा दे कर अपने घर चली गई.

4-5 दिन गुजर गए थे. विमला राम कुमार को सुबहशाम दवा देती, खाना बना कर खिलाती. वह धीरेधीरे अच्छा होने लगा.

राम कुमार मन ही मन विमला का एहसानमंद था. मगर गांव के कुछ लोगों ने नीची जाति की विमला के ऊंची जाति के जमींदार के घर के रसोईघर में खाना बना कर खिलाने पर नाराजगी जताई.

गांव में पंचायत हुई कि विमला को सजा के रूप में गांव से निकाल दिया जाए.

यह खबर राम कुमार को लगी, तो उस ने फौरन विमला को बुला कर पूछा, ‘‘गांव वाले तुझे भलाई करने की सजा देना चाहते हैं. मगर मेरी मजबूरी किसी ने नहीं देखी. क्या तुम गांव छोड़ कर चली जाओगी?’’

‘‘अगर मेरी मदद करने कोई नहीं आया, तो मैं गांव छोड़ दूंगी,’’ विमला ने मायूस होते हुए कहा.

‘‘ठीक है, तुम ने मुझे नई जिंदगी दी है. मेरे बेटाबहू तो मुझे मरने के लिए छोड़ गए थे. तुम भाग कर कहीं मत जाओ, दुनिया का मुंह बंद करने के लिए मेरे पास एक हथियार है,’’ राम कुमार ने कहा, तो विमला के मायूस चेहरे पर उम्मीद की रेखा उभरी.

‘‘ऐसा कौन सा रास्ता है आप के सामने, जिस से गांव वाले चुप हो जाएंगे?’’

‘‘हम अभी चल कर शादी कर लेते हैं. औरत की कोई जाति नहीं होती. मेरी पत्नी बन कर तुम भी मेरे समान हो जाओगी. फिर देखूंगा एक अच्छे इनसान को दुनिया परेशान कैसे करती है?’’ कहते हुए राम कुमार ने विमला का हाथ थाम लिया.

‘‘लेकिन, बेटाबहू भी तो आप के खिलाफ हो जाएंगे,’’ विमला ने अपना डर जताया.

‘‘मुझे ऐसे बेटाबहू की परवाह नहीं है,’’ राम कुमार ने कहा और कुछ दिनों बाद शादी कर के विमला को बीवी का दर्जा दे दिया.

गांव वाले फिर भी नहीं माने. अब तो वे किसी भी हालत में राम कुमार को भी गांव से निकालने पर आमादा हो गए.

राम कुमार ने भी गांव छोड़ना ही मुनासिब समझ. वह अपनी जमीन और घरबार बेच कर सारा रुपयापैसा समेट कर किसी अजनबी शहर में जा बसा, जहां कोई भी उसे नहीं जानता था.

नरपाल और मालती को खबर लगी, तो वे भागे आए. गांव में तो सबकुछ लुट चुका था. न जमीन, न घरबार. बाप जातेजाते अपने बेटे को भिखारी बना गया था.

हृदय परिवर्तन: क्या सुनंदा अपने सौतेले बच्चों को मां जैसा प्यार दे पाई

इसी को कहते हैं जीना : कैसा था नेहा का तरीका -भाग 3

‘‘ललिता का तो स्वभाव ही है. कोई एक कदम इस की तरफ बढ़ाए तो यह 10 कदम आगे बढ़ कर उस का साथ देती है. हम नएनए इस शहर में आए थे. यह लड़की एक शाम फोन करने आई थी. उस का फोन काम नहीं कर रहा था… गलती तो ललिता की ही थी… किसी की भी तरफ बहुत जल्दी झुक जाती है.’’

स्तब्ध था मैं. अगर मुझ से भी नहीं मिलती तो किस से मिलती है आजकल?

4 दिन और बीत गए. मैं आफिस के बाद हर शाम अस्पताल चला जाता. मुझे देखते ही ललिताजी का चेहरा खिल जाता. एक बार तो ठिठोली भी की उन्होंने.

‘‘बेचारा बच्चा फंस गया हम बूढ़ों के चक्कर में.’’

‘‘आप मेरी मां जैसी हैं. घर पर होता और मां बीमार होतीं तो क्या उन के पास नहीं जाता मैं?’’

‘‘नेहा से कब मिलते हो तुम? हर शाम तो यहां चले आते हो?’’

‘‘वह मिलती ही नहीं.’’

‘‘कोई काम नहीं होगा न. काम पड़ेगा तो दौड़ी चली आएगी,’’ ललिताजी ने ही उत्तर दिया.

शर्माजी कुछ समय के लिए घर गए तब ललिताजी ने इशारे से पास बुलाया और कहने लगीं, ‘‘मुझे माफ कर देना बेटा, मेरी वजह से ही तुम नेहा के करीब आए. वह अच्छी लड़की है लेकिन बेहद स्वार्थी है. मोहममता जरा भी नहीं है उस में. हम इनसान हैं बेटा, सामाजिक जीव हैं हम… अकेले नहीं जी सकते. एकदूसरे की मदद करनी पड़ती है हमें. शायद यही वजह है, नेहा अकेली है. किसी की पीड़ा से उसे कोई मतलब नहीं है.’’

‘‘वह आप से मिलने एक बार भी नहीं आई?’’

‘‘उसे पता ही नहीं होगा. पता होता तो शायद आती…और पता वह कभी लेती ही नहीं. जरूरत ही नहीं समझती वह. तुम मिलना चाहो तो जाओ उस के घर, इच्छा होगी तो बात करेगी वरना नहीं करेगी… दोस्ती तक ही रखना तुम अपना रिश्ता, उस से आगे मत जाना. इस तरह के लोग रिश्तों में बंधने लायक नहीं होते, क्योंकि रिश्ते तो बहुत कुछ मांगते हैं न. प्यार भी, स्नेह भी, अपनापन भी और ये सब उस के पास हैं ही नहीं.’’

शर्माजी आए तो ललिताजी चुप हो गईं. शायद उन के सामने वह अपने स्नेह, अपने ममत्व को ठगा जाना स्वीकार नहीं करना चाहती थीं या अपनी पीड़ा दर्शाना नहीं चाहती थीं.

3-4 दिन और बीत गए. ललिताजी घर आ चुकी थीं. नेहा एक बार भी उन से मिलने नहीं आई. लगभग 3 दिन बाद वह लंच में मुझ से मिलने मेरे आफिस चली आई. बड़े प्यार से मिली.

‘‘कहां रहीं तुम इतने दिन? मेरी याद नहीं आई तुम्हें?’’ जरा सा गिला किया था मैं ने.

‘‘जरा व्यस्त थी मैं. घर की सफाई करवा रही थी.’’

‘‘10 दिन से तुम्हारे घर की सफाई ही चल रही है. ऐसी कौन सी सफाई है भई.’’

मन में सोच रहा था कि देखते हैं आज कौन सा काम पड़ गया है इसे, जो जबान में मिठास घुल रही है.

‘‘क्या लोगी खाने में, क्या मंगवाऊं?’’

खाने का आर्डर दिया मैं ने. इस से पहले भी जब हम मिलते थे खाना मैं ही मंगवाता था. अपनी पसंद का खाना मंगवा लिया नेहा ने. खाने के दौरान कभी मेरी कमीज की तारीफ करती तो कभी मेरी.

‘‘शर्माजी और ललिताजी कैसी हैं? शर्माजी छुट्टी पर हैं न, कहीं बाहर गए हैं क्या?’’

‘‘पता नहीं, मैं ने बहुत दिन से उन्हें देखा नहीं.’’

‘‘अरे भई, तुम इस देश की प्रधानमंत्री हो क्या जो इतना काम रहता है तुम्हें. 2 घर छोड़ कर तो रहते हैं वह…और तुम्हारा इतना खयाल भी रखते हैं. 10 दिन से वह तुम से मिले नहीं.’’

‘‘मेरे पास इतना समय नहीं होता. 2 बजे तो स्कूल से आती हूं. 4 बजे बच्चे ट्यूशन पढ़ने आ जाते हैं. 7 बजे तक उस में व्यस्त रहती हूं. इस बीच काम वाली बाई भी आ जाती है…’’

‘‘किसी का हालचाल पूछने के लिए आखिर कितना समय चाहिए नेहा. एक फोन काल या 4-5 मिनट में जा कर भी इनसान वापस आ जाता है. उन के और तुम्हारे घर में आखिर दूरी ही कितनी है.’’

‘‘मुझे बेकार इधरउधर जाना अच्छा नहीं लगता और फिर ललिताजी तो हर पल खाली रहती हैं. उन के साथ बैठ कर गपशप लगाने का समय नहीं होता मेरे पास.’’

नेहा बड़ी तल्खी में जवाब दे रही थी. खाना समाप्त हुआ और वह अपने मुद्दे पर आ गई. अपने पर्स से राशन कार्ड और पैन कार्ड निकाल उस ने मेरे सामने रख दिए.

‘‘यह देखो, इन दोनों में मेरी जन्मतिथि सही नहीं लिखी है. 7 की जगह पर 1 लिखी गई है. जरा इसे ठीक करवा दो.’’

हंस पड़ा मैं. इतनी हंसी आई मुझे कि स्वयं पर काबू पाना ही मुश्किल सा हो गया. किसी तरह संभला मैं.

‘‘तुम ने क्या सोचा था कि तुम्हारा काम हो गया और अब कभी किसी की जरूरत नहीं पड़ेगी. मत भूलो नेहा कि जब तक इनसान जिंदा है उसे किसी न किसी की जरूरत पड़ती है. जिंदा ही क्यों उसे तो मरने के बाद भी 4 आदमी चाहिए, जो उठा कर श्मशान तक ले जाएं. राशन कार्ड और पैन कार्ड जब तक नहीं बना था तुम्हारा मुझ से मिलना चलता रहा. 10 दिन से तुम मिलीं नहीं, क्योंकि तुम्हें मेरी जरूरत नहीं थी. आज तुम्हें पता चला इन में तुम्हारी जन्मतिथि सही नहीं तो मेरी याद आ गई …फार्म तुम ने भरा था न, जन्मतिथि तुम ने भरी थी…उस में मैं क्या कर सकता हूं.’’

‘‘यह क्या कह रहे हो तुम?’’ अवाक्  तो रहना ही था नेहा को.

‘‘अंधे को अंधा कैसे कहूं…उसे बुरा लग सकता है न.’’

‘‘क्या मतलब?’’

‘‘मतलब साफ है…’’

उसी शाम ललिताजी से मिलने गया. उन्हें हलका बुखार था. शर्माजी भी थकेथके से लग रहे थे. वह बाजार जाने वाले थे, दवाइयां और फल लाने. जिद कर के मैं ही चला गया बाजार. वापस आया और आतेआते खाना भी लेता आया. ललिताजी के लिए तो रोज उबला खाना बनता था जिसे शर्माजी बनाते भी थे और खाते भी थे. उस दिन मेरे साथ उन्होंने तीखा खाना खाया तो लगा बरसों के भूखे हों.

‘‘मैं कहती थी न अपने लिए अलग बनाया करें. उबला खाना खाया तो जाता नहीं, उस पर भूखे रह कर कमजोर भी हो गए हैं.’’

ललिताजी ने पहली बार भेद खोला. दूसरे दिन से मैं रोज ही अपना और शर्माजी का खाना पैक करा कर ले जाने लगा. नेहा की हिम्मत अब भी नहीं हुई कि वह एक बार हम से आ कर मिल जाती. हिम्मत कर के मैं ने सारी आपबीती उन्हें सुना दी. दोनों मेरी कथा सुनने के बाद चुप थे. कुछ देर बाद शर्माजी कहने लगे, ‘‘सोचा था, प्यारी सी बच्ची का साथ रहेगा तो अच्छा लगेगा. उसे हमारा सहारा रहेगा हमें उस का.’’

‘‘सहारा दिया है न हमें प्रकृति ने. बच्ची का सहारा तो सिर्फ हम ही थे… बदले में सहारा देने वाला मिला है हमें… यह बच्चा मिला है न.’’

ललिताजी की आंखें नम थीं, मेरी बांह थपथपा रही थीं वह. मेरा मन भी परिवार के साथ रहने को होता था पर घर दूर था. मुझे भी तो परिवार मिल गया था परदेस में. कौन किस का सहारा था, मैं समझ नहीं पा रहा था. दोनों मुझे मेरे मातापिता जैसे ही लग रहे थे. वे मुझे सहारा मान रहे थे और मैं उन्हें अपना सहारा मान रहा था, क्योंकि शाम होते ही मन होता भाग कर दोनों के पास चला जाऊं.

क्या कहूं मैं? अपनाअपना तरीका है जीने का. कुदरत ने लाखों, करोड़ों जीव बनाए हैं, जो आपस में कभी मिलते हैं और कभी नहीं भी मिलते. नेहा का जीने का अपना तरीका है जिस में वह भी किसी तरह जी ही लेगी. बस, इतना मान सकते हैं हम तीनों कि हम जैसे लोग नेहा जैसों के लिए नहीं बने, सो कैसा अफसोस? सोच सकते हैं कि हमारा चुनाव ही गलत था. कल फिर समय आएगा…कल फिर से कुछ नया तलाश करेंगे, यही तो जीवन है, इसी को तो कहते हैं जीना.

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