दांव पर जिंदगी : आरती को बहू भात खाना क्यों पड़ा भारी

आरती को बहू भात खाने जाना बहुत महंगा पड़ा. उस ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि इतनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी.

‘‘लाल, तुम्हारी पत्नी तो बड़ी मस्त है. बहुत मजा आया, पूरा वसूल हो गया,’’ उस आदमी के मुंह से निकलने वाले ये वे शब्द थे, जो बेहोश होने के पहले आरती के कानों में समाए थे.

आवाज सुनीसुनी सी लगी थी. उस के पहले के वे 3 आदमी कौन थे, आरती जान नहीं पाई थी. सब ने अपने चेहरों को ढक रखा था. कोई कुछ बोल भी नहीं रहा था,

जैसे सबकुछ योजना बना कर हो रहा था. एक के बाद एक चढ़े, कूदे और उतर गए. जैसे बेटिकट लफंगे बसों में चढ़तेउतरते हैं.

न आरती चीख पा रही थी और न हिलडुल पा रही थी. पहले ही मुंह में कपड़ा ठूंस दिया गया था. दम घुट रहा था. जो आता जोश से भरा हुआ होता और उस की जान हलक में आ जाती थी.

फिर वहां क्याकुछ हुआ, आरती को कुछ भी पता नहीं. होश आया, तो घर के बिस्तर में पड़ी थी और घर वाले उसे घेरे खड़े थे.

आरती की आंखें लाल को ढूंढ़ रही थीं. वह एक ओर कोने में दुबका सा खड़ा था… चुपचाप. उसे देख कर आरती का मन नफरत से भर उठा. दिल में एक हूक सी उठी, एक सैलाब सा उमड़ा, उस दर्द का, जो वह अभीअभी भोग कर आई थी.

‘‘थाने चलो,’’ अगले दिन सुबह उठते ही आरती ने लाल से कहा.

‘‘होश में आओ, पागल मत बनो, लोग जानेंगेसुनेंगे तो क्या कहेंगे? बाकी की जिंदगी बदनामी ओढ़ कर जीना पड़ेगा. मुंह बंद रखो और रात की घटना को एक डरावना सपना समझ कर भूल जाओ,’’ लाल ने धीरे से कहा.

‘‘यह मेरी जिंदगी का सवाल है. मैं गायबकरी नहीं हूं, तुम थाने चलो,’’ आरती ने जोर दिया और घर से बाहर निकल आई.

आरती ने अपना लिखित बयान थाने में दर्ज करा दिया.

‘‘आप ने लिखा है कि आखिरी वाले आदमी की आवाज सुनीसुनी सी लगी थी?’’ थानेदार रंजन चौधरी ने आरती से पूछा.

‘‘जी हां सर, कुछ दिन पहले एक शाम को ‘लाल’ कह कर घर के बाहर से किसी आदमी ने आवाज दी थी, तब मैं आंगन में थी. यह वही आवाज थी.’’

‘‘घटना के पहले की कुछ बातें बता सकती हैं आप?’’

‘‘सर, घर से हम दोनों 9 बजे चल दिए थे. नर्रा गांव के बाद ही जंगल शुरू हो जाता है. सिंगारी मोड़ पर हमें मुड़ना था. लाल ने हौर्न बजाया, तो मैं ने

पूछा था, ‘रात को हौर्न बजाने का क्या मतलब?’

‘‘लाल ने कहा था, ‘गलती से बज गया था.’’’

आरती का बयान दर्ज कर लिया गया. थानेदार रंजन चौधरी ने लाल पर एक नजर डाली, लेकिन कुछ कहा नहीं. लाल उन की चुभती नजरों का सामना न कर सका. उस का गला सूखने लगा था.

बाद में एक महिला कांस्टेबल की निगरानी में मैडिकल टैस्ट के लिए आरती को सदर अस्पताल भेज दिया गया. शाम को मैडिकल रिपोर्ट मिल गई थी. सामूहिक बलात्कार की तसदीक हो चुकी थी.

अगले दिन पुलिस ने लाल को उस के घर से उठा लिया. घर वालों ने इस का कड़ा विरोध किया. लाल के बड़े भाई ने मंत्री से शिकायत करने की धमकी तक दे डाली, ‘‘गुनाहगारों को पकड़ने की जगह मेरे भाई को ले जा रहे हैं. यह आप अच्छा नहीं कर रहे हैं. आप को मंत्रीजी के सामने इस का जवाब देना पड़ेगा.’’

‘‘आप को जहां शिकायत करनी है, कीजिए, पर इतना जान लीजिए कि इस कांड की गुत्थी आप के भाई से जुड़ी हुई है,’’ थानेदार रंजन चौधरी ने कहा.

आरती बलात्कार कांड में उस वक्त एक नया मोड़ आ गया, जब लाल की गिरफ्तारी के कुछ घंटे बाद उस की निशानदेही पर गुप्त छापामारी कर पुलिस ने उन चारों बलात्कारियों को एकसाथ धर दबोचा.

उस के पहले थाने ले जा कर पुलिस ने लाल का अच्छे ढंग से स्वागत किया था. पहले पानी और फिर चाय पिलाई गई, फिर पूछा गया, ‘‘तुम्हारा कहना है कि उस बलात्कारी को तुम नहीं जानते हो, जो तुम्हारा नाम जानता है?’’

‘‘मैं सच कहता हूं सर, मैं उसे नहीं जानता.’’

‘‘तुम सब जानते हो…’’ बाकी शब्दों को लाल के गाल पर पड़े थानेदार रंजन चौधरी के जोरदार चांटे ने पूरा कर दिया था. फिर तो वह तोते की तरह बोलना चालू हो गया था.

इस के बाद कुछ घंटे चली धर पकड़ के बाद उन चारों के बयान ने पूरे इलाके में एक सनसनी सी फैला दी थी. गलीमहल्लों में जिसे देखो वही लाल और आरती के संबंधों की बाल की खाल उतारने में लगा हुआ था.

आरती के भीतर भी एक तूफान उठा हुआ था, जो उस के दिलोदिमाग को मथ रहा था. एक दागदार जिंदगी की चादर को ओढ़े वह किस तरह जी पाएगी? लोगों की चुभती नजरों का सामना वह कैसे करेगी? यही सब सोचसोच कर उस का दिमाग फटा जा रहा था.

अब तो राजेश भी आरती से दूर जा चुका था. 10 साल पहले उस की बेरंग जिंदगी में एक बदलाव आया था. वह पैंशन डिपार्टमैंट में राजेश की असिस्टैंट थी. काम करतेकरते दोनों कब इतने करीब आ गए कि एकदूसरे को देखे बिना रहना मुश्किल हो गया.

यह सिलसिला 10 साल तक बड़े आराम से चला कि अचानक एक दिन आरती ने राजेश से कहा, ‘‘अब हम  एक ही औफिस में एकसाथ रह कर काम नहीं कर सकते. लाल को हमारे रिश्ते की भनक लग चुकी है.’’

आरती डर गई थी. अपने लिए नहीं, बल्कि राजेश के लिए. वह राजेश से बेइंतिहा प्यार जो करने लगी थी.

लोग भी कहते हैं कि जुआरी और शराबियों से जितना दूर रहो, उतना ही बेहतर है, फिर आरती का पति लाल तो एक अव्वल दर्जे का जुआरी था और शराबी भी.

कुलमिला कर आरती एक बेस्वाद जिंदगी जी रही थी, जिस में न प्यार का गुलकंद था और न उमंग की कोई तरंग. इस उबाऊ जिंदगी से राजेश ने अपनी बांहों में भर कर उसे उबार लिया था.

पति के दबाव में आ कर आरती ने राजेश से एक दिन दूरी बना ली, पर राजेश हर हाल में आरती के साथ जुड़ा रहना चाहता था, ‘‘आरती, मैं तुम्हें आसमान के चांदतारे तो ला कर नहीं दे सकता, पर अपनी पलकों पर जरूर बिठा कर रखूंगा. मैं तुम्हें कभी धोखा नहीं दूंगा, यह मैं वादा करता हूं.

‘‘तुम मु?ो छोड़ने की बात मत करो, मैं तुम्हारे बगैर जी नहीं पाऊंगा,’’ राजेश रोने लगा था.

‘‘राजेश, मैं तुम्हारी जुदाई बरदाश्त कर लूंगी. हर हाल में जी लूंगी, लेकिन तुम्हें कुछ हो जाए, यह मैं सहन नहीं कर सकूंगी. लाल गुस्से में पागल हो चुका है, मैं उस पर भरोसा नहीं कर सकती. हमारा प्यार जिंदा रहे, इस के लिए तुम्हें जिंदा रहना होगा.’’

‘‘तुम्हारी खुशी में ही मेरी खुशी है,’’ आंसू पोंछते हुए राजेश चला गया था.

एक हफ्ते बाद ही राजेश ने अपना तबादला दूसरे एरिया में करवा लिया था. फिर दोनों कभी नहीं मिले.

अखबार से ही राजेश को आरती के साथ हुए बलात्कार की जानकारी हुई. वह गुस्से से सुलग उठा और कभी फोन न करने की अपनी कसम तोड़ डाली, ‘‘आखिर उस जल्लाद ने अपना असली रूप दिखा ही दिया न. मैं कहता रहा, वह तुम्हें धोखा देगा. अब क्या कहूं…’’

‘तुम कैसे हो?’ फोन रिसीव करते ही आरती की आंखों से आंसू झरने लगे थे.

‘‘यह सब जान कर कैसे कहूं कि मैं ठीक हूं.’’

राजेश का फोन आना आरती के घायल तनमन पर चंदन के लेप जैसा था. एक पल के लिए वह अपने जख्मों को भूल गई थी.

आरती बिस्तर पर लेटे हुए कभी ऊपर छत को, तो कभी उस छिपकली को देख रही थी, जिस ने अभीअभी एक कीड़े को निगला था. वह खुद को समझने और समझाने में लग गई थी.

आज ही सभी अखबारों में आरती बलात्कार कांड को ले कर खबरें छपी थीं. पर उन चारों आरोपियों के बयान खटिया के 4 पायों की तरह थे. देह से वे चारों अलग थे, लेकिन बयान उन चारों के अलग नहीं थे. सब ने एकसुर में कहा था, ‘हम ने कोई बलात्कार नहीं किया है. हम ने इस के लिए पैसे दिए थे.’

बयान की शुरुआत पहले आरोपी घनश्याम साहू से हुई थी, ‘‘हमेशा की तरह उस दिन भी हम पांचों जुआ खेल रहे थे. लाल सारा पैसा हार चुका था. वह उठ कर जाने लगा. थोड़ी दूर जा कर रुक गया. फिर पीछे मुड़ा और सामने आ कर बोला, ‘मैं एक दांव और खेलूंगा, एक लाख का. बोलो, खेलते हो?’

‘‘लेकिन, मैं ने साफ मना कर दिया कि उधार का हम नहीं खेलेंगे. यह सुन कर लाल एकदम से बोल उठा,

‘10 लाख हैं मेरे पास.’

‘‘यह सुन कर फूचा बोला, ‘अभी तुम्हारी जेब में 10 टका नहीं था, यह

10 लाख कहां से आ गया?’

‘‘यह सुन कर लाल ने कहा, ‘मेरी पत्नी कितने लाख की है, मालूम है न तुम लोगों को…’

‘‘मैं ने उस का मजाक उड़ाते हुए कहा, ‘हांहां, मालूम है, पर उस से क्या? जुआ खेलने के लिए तो तुम्हें वह 100 का नोट भी नहीं देती.’

‘‘तभी लाल ऊंची आवाज में बोला, ‘एक लाख के रूप में मैं उसी पत्नी को आज दांव पर लगाता हूं.’

‘‘मैं ने हैरान हो कर कहा, ‘होश में तो है? पत्नी को दांव पर लगाएगा? महाभारत याद है न?’

‘‘पर जुए का नशा लाल पर भूत की तरह चढ़ गया था. वह नहीं माना. मैं सोच में पड़ गया था. मैं लाल की पत्नी और उस के स्वभाव को जानता था. जान लेगी तो सब की जान ले लेगी. कोई भी उस के सामने जाने से डरता था, मजाक करना तो दूर की बात.

‘‘हम चारों अभी कुछ सोच ही रहे थे कि तभी सोमा मोदी बोल उठा, ‘अगर लाल इतना बोल रहा है तो मान जाओ. हमारा क्या जाएगा, हारेंगे तो उस का पैसा उसे लौटा देंगे… और अगर जीत गए तो…’ बोलतेबोलते वह रुक गया था.

‘‘फिर उसी जगह हम पांचों बैठ गए थे. ताश की नई बाजी बिछ गई. खेल शुरू हो गया. हम देह की नसों में तनाव महसूस करने लगे थे. लाल का और भी बुरा हाल था.’’

‘‘फिर क्या हुआ था?’’ थानेदार रंजन चौधरी ने पूछा.

‘‘पहले की 2 बाजी में हारजीत का फैसला न हो सका,’’ घनश्याम ने कहना जारी रखा, ‘‘फिर हम तीसरी बाजी खेलने बैठे. लाल ने 3 बार खेल को बीच में रोका. हर बार उस की सोच बदलीबदली सी लगी. हम उस की ओर देखते, तो वह जाहिल की माफिक हंस देता.

‘‘यही आखिरी बाजी होगी, इस के बाद हम नहीं खेलेंगे. जब मैं ने ऐसा कहा, तो लाल ने मुझे घूर कर देखा.

‘‘खेल शुरू हुआ… 5 मिनट…

10 मिनट.. और 15 मिनट… अब की जीत का इक्का मेरे हाथ में था. खेल खत्म हो चुका था. लाल बाजी और दांव पर लगाई पत्नी को हार चुका था.

‘‘लाल ने कुछ नहीं कहा. मैं ने आहिस्ता से नजरें उठा कर लाल को देखा. वह शांत नहीं दिख रहा था.

‘‘तभी मैं ने कहा, ‘लाल, जुए में हम ने तुम्हारी पत्नी जीत तो ली है, पर फायदा क्या? यह बात जो भी उसे कहने जाएगा, उसे चप्पल खानी पड़ेगी और हम नहीं चाहते हैं कि जीत कर किसी की चप्पल खाएं.’

‘‘इस पर लाल ने कहा, ‘तो तुम्हें जीत का फायदा चाहिए?’

‘‘यह सुन कर हम चारों साथियों ने लार टपकाते हुए हामी भरी. लाल ने कहा, ‘ठीक है, तुम चारों मेरे बैंक अकाउंट में अभी एक लाख रुपए भेजो.’

‘‘मैं ने कहा, ‘हम चारों तुम्हें एक लाख रुपए क्यों दें?’

‘‘यह सुन कर लाल ने कहा, ‘तब फिर मेरी पत्नी से जा कर कहो कि हम ने तुम्हें जुए में जीता है.’

‘‘हम चारों एकदूसरे का मुंह देखने लगे. आखिर में हम ने लाल की बात मान ली और उस के खाते में एक लाख रुपए भेज दिए.

‘‘लाल ने कहा,

‘4 दिन बाद इस पैसे

का मजा लेने के लिए तैयार रहना.’’’

‘‘तुम ने अपनी ही पत्नी के साथ ऐसा खेल क्यों खेला..?’’ थानेदार रंजन चौधरी ने लाल से पूछा.

‘‘वह मेरी नाम की ही पत्नी है. उस की जिंदगी के साथ मेरा कोई मेल नहीं है. वह हमारे घर में रहती जरूर है, लेकिन मैं उस के दिल में नहीं रहता.

‘‘मेरी पत्नी हो कर भी वह मेरे साथ एक बंटी हुई जिंदगी जी रही है. उस की आंखों में तो राजेश बसा हुआ है. उस के साथ जोकुछ भी हुआ, उस पर मुझे जरा भी अफसोस नहीं है. वह इसी लायक है.’’

‘बंटी हुई जिंदगी जी रहा हूं, इसीलिए ऐसा किया,’ कुछ अखबारों में लाल के इसी बयान को हैडलाइन बनाया था.

दूसरे दिन चारों बलात्कारियों के साथ लाल को भी टेनुघाट जेल भेज दिया गया. बलात्कारियों के बयान और पुलिस चार्जशीट को अदालत ने गंभीर अपराध माना और इसी को आधार बनाया. हफ्तेभर में कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला भी सामने आ गया.

अपने फैसलों की वजह से चर्चित जज मोहन मलिक के सामने बचाव पक्ष के धाकड़ वकील सतीश मेहता की एक भी दलील काम नहीं आई. जज साहब ने उन की एक नहीं सुनी और चारों आरोपियों को 20-20 साल की और मुख्य आरोपी मानते हुए लाल को आजीवन कारावास की सजा सुना दी.

2 बेटों की मां आरती को अब अपनी जिंदगी का फैसला करना था, जो आसान नहीं था. उसे अपनों के द्वारा छला गया था और शरीर को जलील किया गया था.

घर के बाहर काफी भीड़ जमा हो गई थी. तभी आरती का बड़ा बेटा रूपेश बाहर आ कर बोला, ‘‘लाल हमारा बाप है, पर अब वह हमारे लिए मर चुका है. उस ने हमारी मां और हमें भी समाज में जलील किया है.’’

40वां बसंत पार कर चुकी आरती का बदन आज भी लोगों को लुभा रहा था और यह उसे भी बखूबी पता था, पर उसे यह पता नहीं था कि जिंदगी एक दिन उसे ऐसे मोड़ पर ला खड़ा कर देगी, जहां टैलीविजन चैनल वालों के सामने उसे अपनी बात रखने की नौबत आ पड़ेगी.

आरती ने एक नजर बाहर खड़ी भीड़ को देखा और इतना भर कहा, ‘‘घर और इज्जत जब दांव पर लग जाए, तब उस बंधन को तोड़ कर बाहर निकल जाना ही बेहतर है. औरतें ताश का पत्ता नहीं होती हैं, उन का भी अपना वजूद होता है,’’ बोलतेबोलते आरती की आवाज गंभीर होती चली गई. इसी के साथ वह कमरे की ओर मुड़ गई.

‘‘इस तरह का हिम्मत से भरा फैसला हर औरत नहीं ले सकती,’’ बाहर खड़ी भीड़ में से किसी ने कहा.

सुख की गारंटी : एक हकीकत

एक दिन काफी लंबे समय बाद अनु ने महक को फोन किया और बोली, “महक, जब तुम दिल्ली आना तो मुझ से मिलने जरूर आना.”

“हां, मिलते हैं, कितना लंबा समय गुजर गया है. मुलाकात ही नहीं हुई है हमारी.”

कुछ ही दिनों बाद मैं अकेली ही दिल्ली जा रही थी. अनु से बात करने के बाद पुरानी यादें, पुराने दिन याद आने लगे. मैं ने तय किया कि कुछ समय पुराने मित्रों से मिल कर उन पलों को फिर से जिया जाए. दोस्तों के साथ बिताए पल, यादें जीवन की नीरसता को कुछ कम करते हैं.

शादी के बाद जीवन बहुत बदल गया व बचपन के दिन, यादें व बहुत कुछ पीछे छूट गया था. मन पर जमी हुई समय की धूल साफ होने लगी…

कितने सुहाने दिन थे. न किसी बात की चिंता न फिक्र. दोस्तों के साथ हंसीठिठोली और भविष्य के सतरंगी सपने लिए, बचपन की मासूम पलों को पीछे छोड़ कर हम भी समय की घुड़दौड़ में शामिल हो गए थे. अनु और मैं ने अपने जीवन के सुखदुख एकसाथ साझा किए थे. उस से मिलने के लिए दिल बेकरार  था.

मैं दिल्ली पहुंचने का इंतजार कर रही थी. दिल्ली पहुंचते ही  मैं ने सब से पहले अनु को फोन किया. वह स्कूल में पढ़ाती है. नौकरी में समय निकालना भी मुश्किल भरा काम है.

“अनु मै आ गई हूं… बताओ कब मिलोगी तुम? तुम घर ही आ जाओ, आराम से बैठैंगे. सब से मिलना भी हो जाएगा…”

“नहीं यार, घर पर नही मिलेंगे, न तुम्हारे घर न ही मेरे घर. शाम को 3 बजे मिलते हैं. मैं स्कूल समाप्त होने के बाद सीधे वहीं आती हूं, कौफी हाउस, अपने वही पुराने रैस्टोरेंट में…”

“ठीक है शाम को मिलते हैं.“

आज दिल में न जाने क्यों अजीब सी बैचेनी हो रही थी. इतने वर्षों में हम मशीनी जीवन जीते संवादहीन हो गए थे. अपने लिए जीना भूल गए थे.   जीवन एक परिधि में सिमट गया था. एक भूलभूलैया जहां खुद को भूलने की कवायत शुरू हो गई थी. जीवन सिर्फ ससुराल, पति व बच्चों में सिमट कर रह गया था. सब को खुश रखने की कवायत में मैं खुद को भूल बैठी थी. लेकिन यह परम सत्य है कि सब को खुश रखना नामुमकिन सा होता है.

दुनिया गोल है, कहते हैं न एक न एक दिन चक्र पूरा हो ही जाता है. इसी चक्र में आज बिछडे साथी मिल रहे थे. घर से बाहर औपचारिकताओं से परे. अपने लिए हम अपनी आजादी को तलाशने का प्रयत्न करते हैं. अपने लिए पलों को एक सुख की अनुभूति होती है.

मैं समझ गई कि आज हमारे बीच कहने सुनने के लिए बहुत कुछ होगा. सालों से मौन की यह दीवार अब ढहने वाली है.

नियत समय पर मैं वहां पहुंच गई. शीघ्र ही अनु भी आ गई. वही प्यारी सी मुसकान, चेहरे पर गंभीरता के भाव, पर हां शरीर थोडा सा भर गया था, लेकिन आवाज में वही खनक थी. आंखे पहले की तरह प्रश्नों को तलाशती हुई नजर आईं, जैसे पहले सपनों को तलाशती थीं.

समय ने अपने अनुभव की लकीरें चेहरे पर खींच दी थीं. वह देखते ही गले मिली तो मौन की जमी हुई बर्फ स्वत: ही पिघलने लगी…

“कैसी हो अनु, कितने वर्षों बाद तुम्हें  देखा है. यार तुम तो बिलकुल भी नहीं बदलीं…”

“कहां यार, मोटी हो गई हूं… तुम बताओ कैसी हो? तुम्हारी जिंदगी तो मजे में गुजर रही है, तुम जीवन में कितनी सफल हो गई हो… चलो आराम से बैठते हैं…”

आज वर्षो बाद भी हमें संवादहीनता का एहसास नहीं हुआ… बात जैसे वहीं से शुरू हो गई, जहां खत्म हुई थी. अब हम रैस्टोरेंट में अपने लिए कोना तलाश रहे थे, जहां हमारे संवादों में किसी की दखलंदाजी न हो. इंसानी फितरत होती है कि वह भीड़ में भी अपना कोना तलाश लेता है. कोना जहां आप सब से दुबक कर बैठे हों, जैसेकि आसपास बैठी 4 निगाहें भी उस अदृश्य दीवार को भेद न सकें. वैसे यह सब मन का भ्रमजाल ही है.

अाखिरकार हमें कोना मिल ही गया. रैस्टोरेंट के उपरी भाग में कोने की खाली मेज जैसे हमारा ही इंतजार कर रही थी. यह कोना दिल को सुकून दे रहा था. चायनाश्ते का और्डर देने के बाद अनु सीधे मुद्दे पर आ गई. बोली,”और सुनाओ कैसी हो, जीवन में बहुत कुछ हासिल कर लिया है. आज इतना बड़ा मुकाम, पति, बच्चे सब मनमाफिक मिल गए तुम्हें. मुझे बहुत खुशी है…”

यह सुनते ही महक की आंखो में दर्द की लहर चुपके से आ कर गुजर गई व पलकों के कोर कुछ नम से हो गए. पर मुसकान का बनावटीपन कायम रखने की चेष्टा में चेहरे के मिश्रित हावभाव कुछ अनकही कहानी बयां कर रही थी.

“बस अनु सब ठीक है. अपने अकेलेपन से लड़ते हुए सफर को तय कर रही हूं, जीवन  में बहुत उतारचढाव देखें हैं. तुम तो खुश हो न? नौकरी करती हो, अच्छा कमा रही हो, अपनी जिंदगी अपने हिसाब से जी रही हो… सबकुछ अपनी पंसद का मिला है और क्या सुख चाहिए? मैं तो बस यों ही समय काटने के लिए लिखनेपढ़ने लगी,” मैं ने बात को घुमा कर उस का हाल जानने की कोशिश करनी चाही.

“मै भी बढ़िया हूं. जीवन कट रहा है. मैं पहले भी अकेली थी, आज भी अकेली हूं.  हम साथ जरूर हैं पर कितनी अलग राहें हैं जैसे नदी के 2 किनारे…

“यथार्थ की पथरीली जमीन बहुत कठोर है. पर जीना पडता है… इसलिए मैं ने खुद को काम में डूबो दिया है…”

“क्या हुआ, ऐसे क्यों बोल रही हो? तुम दोनों के बीच कुछ हुआ है क्या?”

“नहीं यार, पूरा जीवन बीत जाए तो भी हम एकदूसरे को समझ नहीं  सकेंगे. कितने वैचारिक मतभेद हैं, शादी का चार्म, प्रेम पता नही कहां 1 साल ही खत्म हो गया. अब पछतावा होता है. सच है, इंसान प्यार में अंधा हो जाता है.”

“हां, सही कहा. सब एक ही नाव पर सवार होते हैं पर परिवार के लिए जीना पड़ता है.”

“हां, तुम्हारी बात सही है, पर यह समझौते अंतहीन होते हैं, जिन्हें निभाने में जिंदगी का ही अंत हो जाता है.  तुम्हें तो शायद कुदरत से यह सब मिला है पर मैं ने तो अपने पैरों पर खुद कुल्हाडी मारी है. प्रेमविवाह जो किया है.

“सब ने मना किया था कि यह शादी मत करो, पर अाज समझ में आया कि मेरा फैसला गलत था. यार,  विनय का व्यवहार समझ से परे है. रिश्ता टूटने की कगार पर है. उस के पास मेरे लिए समय ही नहीं है या फिर वह देना नहीं चाहता… याद नहीं कब दोपल सुकून से बैठै हों. हर बात में अलगाव वाली स्थिति होती है.”

“अनु सब को मनचाहा जीवनसाथी नहीं मिलता.  जिंदगी उतनी आसान नहीं होती, जितना हम सोचते हैं. सुख अपरिभाषित है. रिश्ते निभाना इतना भी अासान नहीं है. हर रिश्ता आप से समय व त्याग मांगता है. पति के लिए जैसे पत्नी उन की संपत्ति होती है जिस पर जितनी चाहे मरजी चला लो. हम पहले मातापिता की मरजी से जीते थे, अब पति की मरजी से जीते हैं. शादी समझौते का दूसरा नाम ही है, हां कभीकभी मुझे भी गुस्सा आता है तो मां से शिकायत कर देती हूं पर अब मैं ने स्थिति को स्वीकार करना सीख लिया है. अब दुख नहीं होता. तुम भी हौंसला रखो, सब ठीक हो जाएगा.”

“नहीं महक, अब उम्मीद बाकी नहीं है. शादी करो तो मुश्किल, न करो तो भी मुश्किल. सब को शादी ही अंतिम पडाव क्यों लगता है? मैं ने भी समझौता कर लिया है कि रोनेधोने से समस्या हल नहीं होगी.

“अनु, तुम्हारे पास तो कला का हुनर है उसे और निखारो. अपने शौक पूरे करो. एक ही बिंदू पर खड़ी रहोगी तो घुटन होने लगेगी.

“एक बात बताओ कि एक आदमी किसी के सुख का पैमाना कैसे हो सकता है? अरैंज्ड मैरिज में पगपग पर असहमति होती है, यहां हर रिश्ता आग की दहलीज पर खड़ा होता है, हरकोई आप से संतुष्ट नहीं होता.”

“महक बात तो तुम्हारी सही है, पर विवाह में कोई एक व्यक्ति, किसी दूसरे के जीने का मापदंड कैसे तय कर सकता है? समय बदल गया है, कानून में भी दंड का प्रावधान है. हमें अपने अधिकारों के लिए सजग रहना चाहिए. कब तक अपनी इच्छाओं का गला घोटें… यहां तो भावनाओं का भी रेप हो जाता है, जहां बिना अपनी मरजी के आप वेदना से गुजरते रहो और कोई इस की परवाह भी न करे.”

“अनु, जब विवाह किया है तो निभाना भी पङेगा. क्या हमें मातापिता, बच्चे, पङोसी हमेशा मनचाहे ही मिलते हैं?  क्या सब जगह आप तालमेल नहीं  बैठाते? तो फिर पतिपत्नी के रिश्ते में वैचारिक मदभेद होना लाजिमी है.  हाथ की सारी उंगलिया भी एकसमान नहीं होतीं, तो 2 लिंग कैसे समान हो सकते हैं?

“इन मैरिज रेप इज इनविजिवल, सो रिलैक्स ऐंड ऐंजौय. मुंह सूजा कर रहने में कोई मजा नहीं है. दोनों पक्षों को थोड़ाथोङा झुकना पडता है. किसी ने कहा है न कि यह आग का दरिया है और डूब कर जाना है, तो विवाह में धूप व छांव के मोड़ मिलते रहते हैं.“

“हां, महक तुम शायद सही हो. कितना सहज सोचती हो. अब मुझे भी लगता है कि हमें फिर से एकदूसरे को मौका देना चाहिए. धूपछांव तो आतीजाती रहती हैं…”

“अनु देख यार, जब हम किसी को उस की कमी के साथ स्वीकार करते हैं तो पीडा का एहसास नहीं होता. सकारात्मक सोच कर अब आगे बढ़, परिवार को पूर्ण करो, यही जीवन है…”

विषय किसी उत्कर्षनिष्कर्ष तक पहुंचती कि तभी वेटर आ गया और दोनों चुप हो गईं.

“मैडम, आप को कुछ और चाहिए?” कहने के साथ ही मेज पर रखे खाली कपप्लेटें समेटने लगा. उन के हावभाव से लग रहा था कि खाली बैठे ग्राहक जल्दी से अपनी जगह छोङे.

“हम ने बातोंबातों में पहले ही चाय के कप पी कर खाली कर दिए.”

“हां, 2 कप कौफी के साथ बिल ले कर आना,”अनु के कहा.

“अनु, समय का भान नहीं हुआ कि 2 घंटे कैसे बीत गए. सच में गरमगरम कौफी की जरूरत महसूस हो रही है.”

मन में यही भाव था कि काश वक्त हमारे लिए ठहर जाए. पर ऐसा होता नहीं है. वर्षो बाद मिलीं सहेलियों के लिए बातों का बाजार खत्म करना भी मुश्किल भरा काम है. गरमगरम कौफी हलक में उतरने के बाद मस्तिष्क को राहत महसूस हो रही थी. मन की भड़ास विषय की गरमी, कौफी की गरम चुसकियों के साथ विलिन होने लगी. बातों का रूख बदल गया.

आज दोनों शांत मन से अदृश्य उदासी व पीड़ा के बंधन को मुक्त कर के चुपचाप यहीं छोड रही थीं.

मन में कडवाहट का बीज  जैसे मरने लगा. महक घर जाते हुए सोच रही थी कि प्रेमविवाह में भी मतभेद हो सकते हैं तो अरैंज्ड मैरिज में पगपग पर इम्तिहान है. एकदूसरे को समझने में जीवन गुजर जाता है. हर दिन नया होता है. जब आशा नहीं रखेंगे तो  वेदना नामक शराब से स्वत: मुक्ति मिल जाएगी.

अनु से बात करके मैं यह सोचने पर मजबूर हो गई थी कि हर शादीशुदा कपल परेशानी से गुजरता है. शादी के कुछ दिनों बाद जब प्यार का खुमार उतर जाता है तो धरातल की उबड़खाबड़ जमीन उन्हें चैन की नींद सोने नहीं देती है. फिर वहीं से शुरू हो जाता है आरोप प्रत्यारोपों का दौर. क्यों हम अपने हर सुखदुख की गारंटी अपने साथी को समझते हैं? हर पल मजाक उड़ाना व उन में खोट निकालना प्यार की परिभाषा को बदल देता है. जरा सा नजरिया बदलने की देर है .

सामाजिक बंधन को क्यों न हंस कर जिया जाए. पलों को गुनगुनाया जाए? एक पुरुष या एक स्त्री किसी के सुख की गांरटी का कारण कैसे बन सकते हैं? हां, सुख तलाश सकते हैं और बंधन निभाने में ही समझदारी है.

आज मैं ने भी अपने मन में जीवनसाथी के प्रति पल रही कसक को वहीं छोड़ दिया, तो मन का मौसम सुहाना लगने लगा. घर वापसी सुखद थी. शादी का बंधन मजबूरी नहीं प्यार का बंधन बन सकता है, बस सोच बदलने की देर है.

कुछ दिनों बाद अनु का फोन आया, “शुक्रिया महक, तुम्हारे कारण मेरा जीवन अब महकने लगा है. हम दोनों ने नई शुरुआत कर दी है. आपसी तालमेल निभाना सीख लिया है. अब मेरे आंगन में बेला के फूल महक रहे हैं. सुख की गांरटी एकदूसरे के पास है.” दोनों खिलखिला कर हंसने लगीं.

बदनसीब बाप : साबिर क्यों था अपने बेटों का कुसूरवार

साबिर बिजनौर जिले के एक शहर में अपने परिवार के साथ रहता था. घर में बीवी शबनम और 2 बेटों तसलीम और शमीम के अलावा कोई और नहीं था.

साबिर का लकड़ी पर नक्काशी करने का कारोबार था. वह लकड़ी की जूलरी बनाता और उन पर नक्काशी कर के खूबसूरत डिजाइन तैयार करता था, जिसे वह ऐक्सपोर्ट कर के अच्छाखासा पैसा कमा लेता था.

घर में किसी चीज की कोई कमी न थी. उस के दोनों बेटे भी बड़े होशियार थे और बचपन से ही उस के काम में हाथ बंटाते थे. यही वजह थी कि जवान होतेहोते वे भी अच्छे कारीगर बन गए थे.

साबिर बचपन से ही अपने बड़े बेटे तसलीम से ज्यादा प्यार करता था. इस की वजह यह थी कि छोटा बेटा शमीम पिछले कुछ समय से आवारा लड़कों की संगत में रहता था और खूब फुजूलखर्ची करता था, जबकि तसलीम अपने बाप की हर बात मानता था और बिना उन की मरजी के कोई काम नहीं करता था.

ज्योंज्यों छोटा बेटा शमीम बड़ा होता जा रहा था, उस के खर्चे भी बढ़ते जा रहे थे. आवारा दोस्तों ने उसे निकम्मा बना दिया था. बाप की डांटडपट से तंग आ कर वह अपने दोस्तों के साथ मुरादाबाद चला गया और काफी अरसे तक वहीं रहा. वह जो कमाता था उसे अपने आवारा दोस्तों के साथ रह कर घूमनेफिरने पर खर्च कर देता था.

बड़ा बेटा तसलीम अपने अब्बा के साथ रह कर उन के हर काम में हाथ बंटाता था, जिस की वजह से उन का कामधंधा जोरों पर था और खूब तरक्की हो रही थी. अब्बा ने अपने भाई की बेटी सायरा से तसलीम का रिश्ता तय कर दिया था.

कुछ महीनों के बाद तसलीम की शादी थी, इसलिए छोटा बेटा शमीम भी घर आया हुआ था. घर में खुशी का माहौल था, पर शमीम मुरादाबाद जा कर और ज्यादा बिगड़ गया था. वह बदचलन भी हो गया था.

घर में मेहमानों का आनाजाना शुरू हो गया था. शादी में कुछ दिन बाकी रह गए थे. शमीम अपने चाचा के घर अपनी होने वाली भाभी सायरा से मिलने गया था.

जब शमीम घर पहुंचा, तो घर पर कोई नहीं था. बस, सायरा ही अकेली वहां थी, बाकि सब लोग शादी की खरीदारी के लिए बाजार गए थे.

सायरा शमीम को जानती थी, इसलिए उस ने शमीम को अंदर आने दिया और उसे बैठा कर चाय बनाने रसोईघर में चली गई.

कुछ देर बाद जब सायरा चाय बना कर वापस आई, तो पसीने की बूंदें उस के चेहरे पर मोतियों की तरह चमक रही थीं. रसोईघर की गरमी की वजह से उस का चेहरा सुर्ख हो गया था. गुलाबी होंठ ऐसे खिल रहे थे, जैसे कोई गुलाब हो.

शमीम सायरा को एकटक देखता रहा. इतनी हसीन लड़की को देख कर उस के अंदर का शैतान जाग उठा.

शमीम के दिल में हलचल मच चुकी थी. उस ने बिना वक्त गंवाए सायरा को अपनी बांहों में भर लिया और उस के होंठों पर चुंबनों की बौछार कर दी. उस की यह हरकत देख कर सायरा ने शोर मचाना शुरू कर दिया.

आवाज सुन कर आसपास के लोग आ गए और शमीम को पकड़ कर उस के घर ले गए और पूरा वाकिआ साबिर को बताना शुरू कर दिया.

साबिर ने शमीम को डांटते हुए घर से धक्के मार कर भगा दिया और बाद में अपनी जायदाद से भी बेदखल कर दिया. उस ने अपना घर अपने बड़े बेटे तसलीम के नाम कर दिया.

अगले दिन तसलीम की बरात जाने वाली थी. घर के सभी लोग अपनेअपने काम में मसरूफ थे कि तभी घर के पास एक गली से तसलीम के चीखने की आवाज आई.

लोग उधर दौड़े तो देखा कि तसलीम खून में लथपथ पड़ा कराह रहा था और उस के पास हाथ में चाकू लिए शमीम खड़ा हुआ चिल्ला रहा था, ‘‘मेरा हिस्सा तू कैसे ले सकता है? यह घर मेरा भी है. तू अकेला इस का मालिक कैसे बन सकता है? मैं अपने हिस्से के लिए किसी की भी जान ले सकता हूं…’’

किसी ने फौरन पुलिस को फोन कर दिया और कुछ लोगों ने हिम्मत कर के शमीम को पकड़ लिया.

तसलीम को अस्पताल में भरती कराया गया, पर कुछ ही देर में ही उस ने दम तोड़ दिया.

शमीम को पुलिस ने गिरफ्तार कर हत्या का मुकदमा दर्ज कर उसे जेल भेज दिया.

बदनसीब बाप की दोनों औलादें उस से जुदा हो गईं. एक जेल पहुंच गया और दूसरा दुनिया ही छोड़ कर चला गया.

साबिर इस घटना के लिए खुद को कुसूरवार मान रहा था और लोगों से कहता फिरता था, ‘‘मैं ने खुद अपने बेटे को मार डाला. छोटे बेटे का हिस्सा अगर बड़े बेटे के नाम न करता, तो आज वह उस के खून का प्यासा न होता और ऐसा कदम न उठाता…’’

दुर्गाजी : बलदेव पर कौन सा दुखों का पहाड़ टूटा

शादी के 7-8 साल बाद रमिया के पैर भारी हुए थे. बलदेव ने तो आस ही छोड़ दी थी, मगर अब उस के कदम जमीन पर नहीं पड़ते थे.

दोनों पतिपत्नी मजदूरी करते थे. काम मिल जाता तो ठीक, नहीं तो कई बार फाका करने की नौबत आ जाती. मगर थे तो इनसान ही, उन के अंदर भी मांबाप बनने की चाह थी.

ब्याह के सालभर बाद ही बलदेव की अम्मां ने रमिया को ‘बांझ’ कहना शुरू कर दिया था. आतेजाते टोले की औरतें अम्मां से पूछतीं, ‘बलदेव की अम्मां, कोई खुशखबरी है क्या?’

यह बात सुन कर वे कुढ़ जातीं. घर में रोज कलह मचने लगा था. रमिया तो कुछ कहती न थी, चुपचाप सारी कड़वाहट झेल जाती, पर बलदेव उस के हक में मां से लड़ पड़ता.

तब मां उसे गाली देतीं, ‘कमबख्त, मेरी कोख का जना कैसे उस के लिए मुझ से ही लड़ रहा है. करमजली ने मेरे छोरे को मुझ से छीन लिया.’

जब बलदेव और रमिया के सब्र का पैमाना छलकने लगा, तो उन्होंने घर? छोड़ दिया और दूसरे शहर में जा कर मजदूरी करने लगे.

जचगी का समय नजदीक आता जा रहा था. उन की खुशी और चिंता का दिलों में संगम सा हो रहा था. रमिया ने बच्चे के लिए छोटेछोटे कपड़े तैयार कर रखे थे.

‘‘ओ रमिया, मुझे तो बेटी चाहिए, बिलकुल तेरे जैसी,’’ बलदेव अकसर उस से चुहल करता.

रमिया कहती, ‘‘अगर छोरा होगा, तो क्या उसे प्यार न करोगे?’’

‘‘नहीं.’’

‘‘क्यों?’’ यह सुन कर रमिया रूठ जाती.

बलदेव कहता, ‘‘छोरे कमबख्त किसी की बात नहीं सुनते, दिनभर ऊधम मचाते हैं…’’

‘‘पर तुम भी तो मरद हो?’’

‘‘तभी तो कह रहा हूं कि छोरा नहीं चाहिए.’’

हलकीफुलकी नोकझोंक, प्यार व तकरार के साथ दिन बीत रहे थे. बलदेव अपनी पत्नी का खूब खयाल रखता. अब तो उस ने दारू पर भी रोक सी लगा दी थी और दोगुनी मेहनत करने लगा था.

आधी रात के वक्त रमिया के दर्द शुरू हो गया. बलदेव भाग कर शांति चाची को बुला लाया.

शांति चाची ने पड़ोस की 2 औरतों को साथ ले लिया. अस्पताल के बरामदे में बैठा बलदेव भीतर से आने वाली नन्ही आवाज का इंतजार कर रहा था.

जब सुबह होने को आई, तभी एक दर्दनाक चीख के साथ ही नन्ही सी आवाज सुनाई पड़ी.

डाक्टर ने दरवाजा खोला और शांति चाची को अंदर बुला लिया. 15-20 मिनट तक फुसफुसाहटें आती रहीं, फिर डाक्टर की आवाज आई, ‘‘तुम लोग पागल हो… करो जो मरजी हो.’’

‘‘अरे बलदेव, तेरी तो तकदीर खुल गई रे, तेरे घर में तो देवी मां खुद पधारी हैं. जा, दर्शन कर के आ,’’ शांति चाची बोलीं.

‘‘बेटी हुई है न?’’ बलदेव उतावला हो उठा.

‘‘बेटी नहीं, देवी है, चल जल्दी,’’ शांति चाची उसे खींचते हुए अंदर ले गईं.

बच्ची को देखते ही बलदेव भौचक्का रह गया. बच्ची के 4 हाथ थे, 3 पूरे और एक अधूरा. रमिया बेहोश थी और वह नवजात बच्ची टुकुरटुकुर उसे देख रही थी.

बलदेव ने सोचा कि नवरात्र के दिनों में दुर्गा मां उसे दर्शन देने खुद पधारी हैं. उस की हिम्मत न हुई कि बच्ची को गोद में उठाए. वह हैरानी से बस एकटक उसे देखे जा रहा था.

बचपन में कई बार उस ने सुना था कि किसी गांव में किसी के घर दुर्गाजी ने जन्म लिया, बाद में उन के नाम का मंदिर भी बना दिया गया.

खुद बलदेव अपनी तकदीर पर गर्व कर रहा था कि ‘मां’ ने उसे इस काबिल समझ. रमिया की कोख धन्य हो गई.

शांति चाची बोलीं, ‘‘डाक्टर कह रहा था कि बच्ची ठीक है, आपरेशन कर के फालतू हाथ हटा देंगे, पता तक न चलेगा. पर मैं ने कह दिया, यह देवी है, इसे हाथ भी न लगाना.’’

सुबह हो ही चुकी थी. थोड़ी देर में दूरदराज के गांवों तक में यह खबर फैल गई कि बलदेव के घर ‘मैया’ ने जन्म लिया है.

डाक्टरों ने रमिया को घर भेज दिया, घर में रमिया को तो कमरे में लिटा दिया गया. लोग आते, बच्ची के दर्शन करते, चढ़ावा चढ़ाते और मैया का गुणगान करते हुए चले जाते.

यह देख कर बच्ची लगातार रोए जा रही थी. इस से सब को लगा कि मैया नाराज हैं, इसलिए ढोलक, मंजीरे के साथ कीर्तन शुरू हो गया. मैया को खुश करने की कोशिश की जाने लगी.

कुछ देर बाद बच्ची शांत हो गई. तब तक दोपहर हो चुकी थी. देखभाल न होने के कारण बच्ची मर गई थी. मां के दूध के तो उसे दर्शन भी न हुए थे.

बच्ची के मरने के बाद कहा जाने लगा, ‘मां का काम पूरा हुआ, इसलिए वे चली गईं.’

एक बुजुर्ग ने नसीहत दी, ‘‘देख बलदेव, मैया के नाम पर पीपल के नीचे पत्थर रख देना या यहीं घर के बाहर उन की समाधि बनवा देना.’’

बलदेव एक मुद्दत के बाद पिता बना, लेकिन फिर से बेऔलाद हो गया. बच्ची के अंतिम संस्कार के बाद जब वह घर लौटा तो देखा कि रमिया फूटफूट कर रो रही है. उसे तो यही दुख था कि वह अपनी बच्ची को सीने से भी न लगा पाई, उसे दूध तक न पिला पाई, मां बनने का सुख भी न उठा पाई.

कुदरत ने उसे मां बना कर फिर से बांझ बना दिया.

‘‘अरी, रोती क्यों है?’’ बलदेव ने पूछा, तो वह और भी जोर से रोने लगी.

‘‘तुम लोगों ने मेरी बच्ची को मार दिया…’’ कुछ देर बाद शांत होने पर रमिया बोली, ‘‘उसे न दूध मिला, न कपड़ा. मेरी बेटी को उठा कर बाहर डाल दिया. तुम्हीं उस के हत्यारे हो,’’ रमिया चीख पड़ी.

‘‘अरे, वह देवी मैया थीं… देखा नहीं उन के 4 हाथ थे. क्या किसी साधारण बच्चे के 4 हाथ होते हैं? नवरात्र के दिनों में वे हमें दर्शन दे कर चली गईं… हमारी तकदीर खुल गई. तेरी कोख धन्य हो गई,’’ बलदेव खुश होता हुआ बोला, फिर रमिया को रोता छोड़ कर वह चढ़ावे की रकम गिनने लगा.

थोड़ी देर बाद वह बोला, ‘‘रमिया, देख तो कितने रुपए हैं… तू ने पहले कभी न देखे होंगे… पूरे 8 हजार रुपए हैं. एक दिन में इतना चढ़ावा… बाहर एक पत्थर आएगा… हमारे दिन फिर जाएंगे.’’

‘‘क्यों, देवी के नाम पर पैसा बटोरोगे…’’ रमिया सिसकते हुए बोली.

‘‘चुप कर, बड़ेबड़े पंडेपुजारी भी इसी तरह पैसा बटोरते हैं. अगर हम ने ऐसा कर लिया, तो भला कौन सा पाप लगेगा?’’

तभी उस ने रमिया की ओर देखा, वह आंचल में मुंह छिपाए रो रही थी. उसे एक नहीं कई दुख लग गए थे, कोख उजड़ने का, पति के लालच का और उस की बेटी के नाम किए जाने वाले पाप या जुर्म का…

मझधार: जिंदगी के भंवर में फंसी नेहा

पूरे 15 वर्ष हो गए मुझे स्कूल में नौकरी करते हुए. इन वर्षों में कितने ही बच्चे होस्टल आए और गए, किंतु नेहा उन सब में कुछ अलग ही थी. बड़ी ही शांत, अपनेआप में रहने वाली. न किसी से बोलती न ही कक्षा में शैतानी करती. जब सारे बच्चे टीचर की गैरमौजूदगी में इधरउधर कूदतेफांदते होते, वह अकेले बैठे कोई किताब पढ़ती होती या सादे कागज पर कोई चित्रकारी करती होती. विद्यालय में होने वाले सारे कार्यक्रमों में अव्वल रहती. बहुमखी प्रतिभा की धनी थी वह. फिर भी एक अलग सी खामोशी नजर आती थी मुझे उस के चेहरे पर. किंतु कभीकभी वह खामोशी उदासी का रूप ले लेती. मैं उस पर कई दिनों से ध्यान दे रही थी. जब स्पोर्ट्स का पीरियड होता, वह किसी कोने में बैठ गुमनाम सी कुछ सोचती रहती.

कभीकभी वह कक्षा में पढ़ते हुए बोर्ड को ताकती रहती और उस की सुंदर सीप सी आंखें आंसुओं से चमक उठतीं. मेरे से रहा न गया, सो मैं ने एक दिन उस से पूछ ही लिया, ‘‘नेहा, तुम बहुत अच्छी लड़की हो. विद्यालय के कार्यक्रमों में हर क्षेत्र में अव्वल आती हो. फिर तुम उदास, गुमसुम क्यों रहती हो? अपने दोस्तों के साथ खेलती भी नहीं. क्या तुम्हें होस्टल या स्कूल में कोई परेशानी है?’’

वह बोली, ‘‘जी नहीं मैडम, ऐसी कोई बात नहीं. बस, मुझे अच्छा नहीं लगता. ’’

उस के इस जवाब ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया जहां बच्चे खेलते नहीं थकते, उन्हें बारबार अनुशासित करना पड़ता है, उन्हें उन की जिम्मेदारियां समझानी पड़ती हैं वहां इस लड़की के बचपन में यह सब क्यों नहीं? मुझे लगा, कुछ तो ऐसा है जो इसे अंदर ही अंदर काट रहा है. सो, मैं ने उस का पहले से ज्यादा ध्यान रखना शुरू कर दिया. मैं देखती थी कि जब सारे बच्चों के मातापिता महीने में एक बार अपने बच्चों से मिलने आते तो उस से मिलने कोई नहीं आता था. तब वह दूर से सब के मातापिता को अपने बच्चों को पुचकारते देखती और उस की आंखों में पानी आ जाता. वह दौड़ कर अपने होस्टल के कमरे में जाती और एक तसवीर निकाल कर देखती, फिर वापस रख देती.

जब बच्चों के जन्मदिन होते तो उन के मातापिता उन के लिए व उन के दोस्तों के लिए चौकलेट व उपहार ले कर आते लेकिन उस के जन्मदिन पर किसी का कोई फोन भी न आता. हद तो तब हो गई जब गरमी की छुट्टियां हुईं. सब के मातापिता अपने बच्चों को लेने आए लेकिन उसे कोई लेने नहीं आया. मुझे लगा, कोई मांबाप इतने गैर जिम्मेदार कैसे हो सकते हैं? तब मैं ने औफिस से उस का फोन नंबर ले कर उस के घर फोन किया और पूछा कि आप इसे लेने आएंगे या मैं ले जाऊं?

जवाब बहुत ही हैरान करने वाला था. उस की दादी ने कहा, ‘‘आप अपने साथ ले जा सकती हैं.’’ मैं समझ गई थी कोई बड़ी गड़बड़ जरूर है वरना इतनी प्यारी बच्ची के साथ ऐसा व्यवहार? खैर, उन छुट्टियों में मैं उसे अपने साथ ले गई. कुछ दिन तो वह चुपचाप रही, फिर धीरेधीरे मेरे साथ घुलनेमिलने लगी थी. मुझे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे मैं किसी बड़ी जंग को जीतने वाली हूं. छुट्टियों के बाद जब स्कूल खुले वह 8वीं कक्षा में आ गई थी. उस की शारीरिक बनावट में भी परिवर्तन होने लगा था. मैं भलीभांति समझती थी कि उसे बहुत प्यार की जरूरत है. सो, अब तो मैं ने बीड़ा उठा लिया था उस की उदासी को दूर करने का. कभीकभी मैं देखती थी कि स्कूल के कुछ शैतान बच्चे उसे ‘रोतली’ कह कर चिढ़ाते थे. खैर, उन्हें तो मैं ने बड़ी सख्ती से कह दिया था कि यदि अगली बार वे नेहा को चिढ़ाते पाए गए तो उन्हें सजा मिलेगी.

हां, उस की कुछ बच्चों से अच्छी पटती थी. वे उसे अपने घरों से लौटने के बाद अपने मातापिता के संग बिताए पलों के बारे में बता रहे थे तो उस ने भी अपनी इस बार की छुट्टियां मेरे साथ कैसे बिताईं, सब को बड़ी खुशीखुशी बताया. मुझे ऐसा लगा जैसे मैं अपनी मंजिल का आधा रास्ता तय कर चुकी हूं. इस बार दीवाली की छुट्टियां थीं और मैं चाहती थी कि वह मेरे साथ दीवाली मनाए. सो, मैं ने पहले ही उस के घर फोन कर कहा कि क्या मैं नेहा को अपने साथ ले जाऊं छुट्टियों में? मैं जानती थी कि जवाब ‘हां’ ही मिलेगा और वही हुआ. दीवाली पर मैं ने उसे नई ड्रैस दिलवाई और पटाखों की दुकान पर ले गई. उस ने पटाखे खरीदने से इनकार कर दिया. वह कहने लगी, उसे शोर पसंद नहीं. मैं ने भी जिद करना उचित न समझा और कुछ फुलझड़ियों के पैकेट उस के लिए खरीद लिए. दीवाली की रात जब दिए जले, वह बहुत खुश थी और जैसे ही मैं ने एक फुलझड़ी सुलगा कर उसे थमाने की कोशिश की, वह नहींनहीं कह रोने लगी और साथ ही, उस के मुंह से ‘मम्मी’ शब्द निकल गया. मैं यही चाहती थी और मैं ने मौका देख उसे गले लगा लिया और कहा, ‘मैं हूं तुम्हारी मम्मी. मुझे बताओ तुम्हें क्या परेशानी है?’ आज वह मेरी छाती से चिपक कर रो रही थी और सबकुछ अपनेआप ही बताने लगी थी.

वह कहने लगी, ‘‘मेरे मां व पिताजी की अरेंज्ड मैरिज थी. मेरे पिताजी अपने मातापिता की इकलौती संतान हैं, इसीलिए शायद थोड़े बदमिजाज भी. मेरी मां की शादी के 1 वर्ष बाद ही मेरा जन्म हुआ. मां व पिताजी के छोटेछोटे झगड़े चलते रहते थे. तब मैं कुछ समझती नहीं थी. झगड़े बढ़ते गए और मैं 5 वर्ष की हो गई. दिनप्रतिदिन पिताजी का मां के साथ बरताव बुरा होता जा रहा था. लेकिन मां भी क्या करतीं? उन्हें तो सब सहन करना था मेरे कारण, वरना मां शायद पिताजी को छोड़ भी देतीं.

‘‘पिताजी अच्छी तरह जानते थे कि मां उन को छोड़ कर कहीं नहीं जाएगी. पिताजी को सिगरेट पीने की बुरी आदत थी. कई बार वे गुस्से में मां को जलती सिगरेट से जला भी देते थे. और वे बेचारी अपनी कमर पर लगे सिगरेट के निशान साड़ी से छिपाने की कोशिश करती रहतीं. पिताजी की मां के प्रति बेरुखी बढ़ती जा रही थी और अब वे दूसरी लड़कियों को भी घर में लाने लगे थे. वे लड़कियां पिताजी के साथ उन के कमरे में होतीं और मैं व मां दूसरे कमरे में. ‘‘ये सब देख कर भी दादी पिताजी को कुछ न कहतीं. एक दिन मां ने पिताजी के अत्याचारों से तंग आ कर घर छोड़ने का फैसला कर लिया और मुझे ले कर अपने मायके आ गईं. वहां उन्होंने एक प्राइवेट स्कूल में नौकरी भी कर ली. मेरे नानानानी पर तो मानो मुसीबत के पहाड़ टूट पड़े. मेरे मामा भी हैं किंतु वे मां से छोटे हैं. सो, चाह कर भी कोई मदद नहीं कर पाए. जो नानानानी कहते वे वही करते. कई महीने बीत गए. अब नानानानी को लगने लगा कि बेटी मायके आ कर बैठ गई है, इसे समझाबुझा कर भेज देना चाहिए. वे मां को समझाते कि पिताजी के पास वापस चली जाएं.

‘‘एक तरह से उन का कहना भी  सही था कि जब तक वे हैं ठीक है. उन के न रहने पर मुझे और मां को कौन संभालेगा? किंतु मां कहतीं, ‘मैं मर जाऊंगी लेकिन उस के पास वापस नहीं जाऊंगी.’

‘‘दादादादी के समझाने पर एक बार पिताजी मुझे व मां को लेने आए और तब मेरे नानानानी ने मुझे व मां को इस शर्त पर भेज दिया कि पिताजी अब मां को और नहीं सताएंगे. हम फिर से पिताजी के पास उन के घर आ गए. कुछ दिन पिताजी ठीक रहे. किंतु पिताजी ने फिर अपने पहले वाले रंगढंग दिखाने शुरू कर दिए. अब मैं धीरेधीरे सबकुछ समझने लगी थी. लेकिन पिताजी के व्यवहार में कोई फर्क नहीं आया. वे उसी तरह मां से झगड़ा करते और उन्हें परेशान करते. इस बार जब मां ने नानानानी को सारी बातें बताईं तो उन्होंने थोड़ा दिमाग से काम लिया और मां से कहा कि मुझे पिताजी के पास छोड़ कर मायके आ जाएं. ‘‘मां ने नानानानी की बात मानी और मुझे पिताजी के घर में छोड़ नानानानी के पास चली गईं. उन्हें लगा शायद मुझे बिन मां के देख पिताजी व दादादादी का मन कुछ बदल जाएगा. किंतु ऐसा न हुआ. उन्होंने कभी मां को याद भी न किया और मुझे होस्टल में डाल दिया. नानानानी को फिर लगने लगा कि उन के बाद मां को कौन संभालेगा और उन्होंने पिताजी व मां का तलाक करवा दिया और मां की दूसरी शादी कर दी गई. मां के नए पति के पहले से 2 बच्चे थे और एक बूढ़ी मां. सो, मां उन में व्यस्त हो गईं.

‘‘इधर, मुझे होस्टल में डाल दादादादी व पिताजी आजाद हो गए. छुट्टियों में भी न मुझे कोई बुलाता, न ही मिलने आते. मां व पिताजी दोनों के मातापिता ने सिर्फ अपने बच्चों के बारे में सोचा, मेरे बारे में किसी ने नहीं. दोनों परिवारों और मेरे अपने मातापिता ने मुझे मझधार में छोड़ दिया.’’ इतना कह कर नेहा फूटफूट कर रोने लगी और कहने लगी, ‘‘आज फुलझड़ी से जल न जाऊं. मुझे मां की सिगरेट से जली कमर याद आ गई. मैडम, मैं रोज अपनी मां को याद करती हूं, चाहती हूं कि वे मेरे सपने में आएं और मुझे प्यार करें.

‘‘क्या मेरी मां भी मुझे कभी याद करती होंगी? क्यों वे मुझे मेरी दादी, दादा, पापा के पास छोड़ गईं? वे तो जानती थीं कि उन के सिवा कोई नहीं था मेरा इस दुनिया में. दादादादी, क्या उन से मेरा कोई रिश्ता नहीं? वे लोग मुझे क्यों नहीं प्यार करते? अगर मेरे पापा, मम्मी का झगड़ा होता था तो उस में मेरा क्या कुसूर? और नाना, नानी उन्होंने भी मुझे अपने पास नहीं रखा. बल्कि मेरी मां की दूसरी शादी करवा दी. और मुझ से मेरी मां छीन ली. मैं उन सब से नफरत करती हूं मैडम. मुझे कोई अच्छा नहीं लगता. कोई मुझ से प्यार नहीं करता.’’

वह कहे जा रही थी और मैं सुने जा रही थी. मैं नेहा की पूरी बात सुन कर सोचती रह गई, ‘क्या बच्चे से रिश्ता तब तक होता है जब तक उस के मातापिता उसे पालने में सक्षम हों? जो दादादादी, नानानानी अपने बच्चों से ज्यादा अपने नातीपोतों पर प्यार उड़ेला करते थे, क्या आज वे सिर्फ एक ढकोसला हैं? उन का उस बच्चे से रिश्ता सिर्फ अपने बच्चों से जुड़ा है? यदि किसी कारणवश वह बीच की कड़ी टूट जाए तो क्या उन दादादादी, नानानानी की बच्चे के प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं? और क्या मातापिता अपने गैरजिम्मेदार बच्चों का विवाह कर एक पवित्र बंधन को बोझ में बदल देते हैं? क्या नेहा की दादी अपने बेटे पर नियंत्रण नहीं रख सकती थी और यदि नहीं तो उस ने नेहा की मां की जिंदगी क्यों बरबाद की, और क्यों नेहा की मां अपने मातापिता की बातों में आ गई और नेहा के भविष्य के बारे में न सोचते हुए दूसरे विवाह को राजी हो गई?

‘कैसे गैरजिम्मेदार होते हैं वे मातापिता जो अपने बच्चों को इस तरह अकेला घुटघुट कर जीने के लिए छोड़ देते हैं. यदि उन की आपस में नहीं बनती तो उस का खमियाजा बच्चे क्यों भुगतें. क्या हक होता है उन्हें बच्चे पैदा करने का जो उन की परवरिश नहीं कर सकते.’ मैं चाहती थी आज नेहा वह सब कह डाले जो उस के मन में नासूर बन उसे अंदर ही अंदर खाए जा रहा है. जब वह सब कह चुप हुई तो मैं ने उसे मुसकरा कर देखा और पूछा, ‘‘मैं तुम्हें कैसी लगती हूं? क्या तुम समझती हो मैं तुम्हें प्यार करती हूं?’’ उस ने अपनी गरदन हिलाते हुए कहा, ‘‘हां.’’ और मैं ने पूछ लिया, ‘‘क्या तुम मुझे अपनी मां बनाओगी?’’ वह समझ न सकी मैं क्या कह रही हूं. मैं ने पूछा, ‘‘क्या तुम हमेशा के लिए मेरे साथ रहोगी?’’

जवाब में वह मुसकरा रही थी. और मैं ने झट से उस के दादादादी को बुलवा भेजा. जब वे आए, मैं ने कहा, ‘‘देखिए, आप की तो उम्र हो चुकी है और मैं इसे सदा के लिए अपने पास रखना चाहती हूं. क्यों नहीं आप इसे मुझे गोद दे देते?’’

दादादादी ने कहा, ‘‘जैसा आप उचित समझें.’’ फिर क्या था, मैं ने झट से कागजी कार्यवाही पूरी की और नेहा को सदा के लिए अपने पास रख लिया. मैं नहीं चाहती थी कि मझधार में हिचकोले खाती वह मासूम जिंदगी किसी तेज रेले के साथ बह जाए.

दाढ़ी की आड़ में : क्या मिल पाया शेखू मियां को औलाद का सुख

शेखू मियां के घर पर ठहरे मौलाना ने बताया कि हर मुसलिम को शौक के साथ दाढ़ी रखना लाजिम है. यह खुदा का नूर है. इस से मोमिन की अलग पहचान होती है.

‘बात हक और सच की है,’ कहते हुए सभी ने हां में हां मिलाई.

मौलाना रोज शरीअत की बातें बताते. धीरेधीरे यह बात फैली और आसपास के लोग इकट्ठा हो कर उन की हर बात ध्यान से सुनते और उन पर अमल करते.

जब भी उन के चाहने वालों ने उन से उन का नामपता जानना चाहा, तो वे बात को टाल देते. खुद शेखू मियां को नहीं मालूम कि वे कहां से आए?

शेखू मियां के औलाद नहीं थी. गांव के आसपास के इलाकों में उन की काफी शोहरत थी. वे नौकरचाकर, खेती को देखते और 5 वक्त की नमाज करते. मौलाना की बातों से वे उन के दीवाने हो गए.

मौलाना ने कहा, ‘‘मेरा दुनिया में कोई नहीं. दो वक्त का खाना और कपड़े, सिर छिपाने के लिए छत और इबादत… इस के सिवा मुझे कुछ नहीं चाहिए.’’

मौलाना की बात पर यकीन कर शेखू मियां ने उन्हें मसजिद में रख लिया.

‘‘शादाब बेटा, तुम्हें हम आलिम बनाना चाहते हैं,’’ अब्बू ने कहा.

‘‘ठीक है अब्बू, मैं मदरसे में जाने को तैयार हूं.’’

‘‘तो ठीक है,’’ अब्बा ने कहा.

2 दिन बाद शादाब के अब्बू शहर के मदरसे में उसे भरती करा आए.

‘‘देखो बेगम, तुम्हें परेशान होने की जरूरत नहीं. मैं ने खाने व रहने का बंदोबस्त मदरसे में ही कर दिया है. वहां और भी लड़के हैं, जो तालीम ले रहे हैं,’’ मौलाना ने बीवी को सम?ाया.

उन का बेटा शादाब शहर में तालीम पाने लगा. अभी उस की तालीम पूरी भी नहीं हो पाई थी कि एक सड़क हादसे में उस के अब्बूअम्मी का इंतकाल हो गया. शादाब पढ़ाई छोड़ कर घर आ गया.

घर पर उस के चाचाचाची, 2 बच्चे थे. शादाब वहीं उन के साथ रहने लगा. शादाब की चाची पढ़ीलिखी, निहायत खूबसूरत, चुस्तचालाक व आजाद खयालों की औरत थी.

वह शादाब से खूब हंसीमजाक करती, उस के आसपास मंडराती रहती. घर पर उस का ही हुक्म चलता.

‘‘सुनो शादाब मियां, जवानी में बु?ाबु?ा सा चेहरा, दाढ़ी अच्छी नहीं लगती. नए जमाने के साथ चलो. अब कौन मदरसे में पढ़ाई कर रहे हो.’’

चाची के कहने पर उस ने दाढ़ी साफ करा ली. नए फैशन के कपड़े पहनना शुरू कर दिया. वह चाची का दिल नहीं तोड़ना चाहता था, बल्कि वह चाची को मन ही मन चाहने लगा था.

चाचा को शादाब की यह हरकत बिलकुल पसंद नहीं थी कि वह उस की बीवी के पास रहे.

तभी एक दिन नौकरानी ने कहा, ‘‘अंदर जा कर देखिए… क्या तमाशा हो रहा है?’’

इधर एक कचरा उड़ कर शादाब की चाची की आंख में चला गया था.

‘‘शादाब देखना… मेरी आंख में कचरा चला गया है, जरा निकाल दो,’’ कह कर वह पलंग पर लेट गई और शादाब ?ाक कर उस की आंख से कचरा निकालने लगा.

शादाब का पूरा जिस्म चाची पर ?ाका देख कर चाचा जोर से चिल्लाया, ‘‘यह क्या हो रहा है?’’

‘‘कुछ नहीं, आंख में कचरा चला गया था. शादाब से निकालने को कहा… और क्या?’’ कह कर वह पलंग से उठ कर खड़ी हो गई.

चाचा शादाब की खोटी नीयत को पहचान गया. उस ने गांव वालों के साथ मिल कर ऐसी चाल चली कि उस की खूबसूरत बीवी शादाब की बुरी नीयत से बच जाए और शादाब की जायदाद भी हड़पी जा सके.

‘‘क्यों मियां, मदरसे में यही तालीम मिली है कि तुम मदरसा छोड़ते ही दाढ़ीमूंछ रखना भूल जाओ? कौन कहेगा तुम्हें आलिमहाफिज?’’

खोटी नीयत, नए पहनावे, बगैर दाढ़ी के पा कर पंचायत ने उसे खूब खरीखोटी सुनाई. पंचायत में मौजूद मुल्लामौलवी

ने शादाब को गांव से बाहर रहने का तालिबानी हुक्म सुना दिया.

शादाब भटकता हुआ शेखू मियां के गांव पहुंचा. उस ने सालभर में नमाजियों की तादाद बढ़ा ली. उस के चाहने वालों की तादाद में इजाफा होता गया. इसी बीच उस ने ऐसी शैतानी हरकत की, जिसे सुन कर इनसानियत भी शर्मसार

हो गई.

वह शेखू मियां को भाई साहब और उस की बीवी को भाभीजान कहता था.

एक दिन उस ने शेखू मियां से कहा, ‘‘भाभी बीमारी से परेशान हैं. इन्हें दवा के साथ दुआ की भी जरूरत है. भाभी जल्दी ठीक हो जाएंगी.’’

‘‘वह तो ठीक है. आदमी ढूंढ़ना पड़ेगा,’’ शेखू ने कहा.

‘‘उस की जरूरत नहीं. मैं जो हूं…’’ शादाब ने कहा, ‘‘आप कहें, तो मैं कल से भाभीजान के लिए तावीज फूंकने का इंतजाम करा दूं.’’

‘‘ठीक है,’’ शेखू मियां ने कहा.

अगले दिन शादाब ने भाभीजान को तावीज दिया. इस से शेखू की बीवी को आराम लगने लगा. उन्होंने राहत की सांस ली.

अब दवा और दुआ दोनों साथसाथ चलने लगीं.

शेखू मियां की खूबसूरत बीवी के बदन पर सोने के गहने को देख कर शादाब के अंदर का शैतान जाग उठा. वह भूल गया कि मदरसे में बच्चों को तालीम देने के साथसाथ नमाज भी पढ़ता है. नमाजी परहेजी मौलाना है. लोग उस की इज्जत करते हैं.

‘‘मौलाना, आज मेरा पूरा जिस्म दर्द कर रहा है. सीने में जलन हो रही है,’’ शेखू मियां की बीवी ने कहा.

‘‘ठीक है, मैं राख से ?ाड़ देता हूं,’’

और फिर हाथ में कुछ राख ले कर शादाब बुदबुदाया. फिर राख को ही बेगम की बांहों पर मलने लगा. पराए मर्द के हाथ लगाते ही उसे अजीब सा महसूस हुआ, पर उसे अच्छा लगा शादाब का जिस्म छूना.

और फिर सिलसिला चल पड़ा. दोनों करीब आते गए और उन में जिस्मानी ताल्लुकात बन गए.

दोनों के बीच सालभर रंगरलियां चलीं. धीरेधीरे उन के बीच इतनी मुहब्बत बढ़ गई कि वे दुनिया को भूल बैठे.

यह खबर शेखू मियां तक पहुंची, पर वह मौलाना को नेकनीयत, काबिल इनसान, नमाजीपरहेजी सम?ा कर इसे सिर्फ बदनाम करने की साजिश सम?ा बैठा और जब बात हद से ज्यादा गुजर गई, तो उस ने इस की आजमाइश करनी चाही.

‘‘सुनो बेगम, मैं एक हफ्ते के लिए बाहर जा रहा हूं. तुम घरखेती पर नजर रखना. नौकर भी मेरे साथ जा रहा है. हफ्तेभर की तो बात है,’’ शेखू ने कहा.

‘‘जी, आप बेफिक्र रहें, मैं सब संभाल लूंगी,’’ बेगम ने कहा.

‘‘देखो मौलाना, अब हम एक हफ्ते के लिए बेफिक्र हैं. तुम्हारे भाई साहब एक हफ्ते बाद लौटेंगे, तब तक हम जी भर के मिलेंगे. डर की कोई बात नहीं,’’ बेगम ने मौलाना शादाब से कहा.

अब शेखू की गैरहाजिरी में दिल खोल कर मिलनेजुलने का सिलसिला चला. तीसरे दिन शेखू मियां अचानक रात में घर आ पहुंचे.

अपनी बीवी को मौलाना की गिरफ्त में देख कर शेखू मियां का खून खौल उठा. गवाही के लिए नौकर को भी बुला कर अपनी मालकिन का नजारा दिखा दिया. फिर चुपके से वह खेत के घर में जा कर सो गए.

सुबह गांव की पंचायत शेखू के बुलावे पर जमा हुई. कानाफूसी का दौर चला.

‘‘पंचायत की कार्यवाही शुरू की जाए,’’ एक बुजुर्ग ने कहा.

‘‘अरे भई, मौलाना को तो आने दो,’’ एक सदस्य ने कहा.

‘‘उन की ही तो पंचायत है,’’ एक नौजवान ने कहा.

‘वह कैसे?’ सभी एकसाथ कह उठे.

शेखू मियां ने तफसील से बात पंचों को बताई. लोगों का शक ठीक था.

‘‘बीवी का शौहर रहते हुए पराए मर्द से हमबिस्तरी करना, दाढ़ी की आड़ में एक नमाजी का मसजिदमदरसे में तालीम के नाम पर वहशीपन करना मजहब की आड़ में घिनौनी साजिश है.’’

‘‘अनपढ़ औरतें जल्दी ही मजहब के नाम पर ढोंग, अंधविश्वास, तांत्रिक के बहकावे में तावीज, गंडे, ?ाड़नेफूंकने के नाम पर अपना सबकुछ लुटा देती हैं, इसलिए औरतमर्द का पढ़ालिखा, सम?ादार होना जरूरी है, ताकि वे धर्म के इन ठेकेदारों, शैतानों के बहकावे में न आ सकें,’’ कह कर शेखू चुप हो गए.

तभी एक बुजुर्ग ने कहा, ‘‘दोनों को पंचायत में बुलाया जाए.’’

जमात के कहने पर 2 आदमी मौलाना और शेखू की बीवी को लेने गए.

लौट के आ कर उन्होंने बताया कि मसजिद में न तो मौलाना है और न घर पर शेखू की बेगम.

 

चुग गई खेत : बाप जातेजाते बेटे को बना गया भिखारी

राम कुमार काफी देर से बहू मालती को बारबार कह रहा था कि उसे बड़े जोरों की भूख लगी है. खाली पेट उस की जान निकली जा रही है.

मालती पहले तो कपड़े धोने का बहाना बनाती रही, फिर पड़ोस की धन्नो मौसी अपना समय गुजारने के लिए उस के पास आ बैठी.

धन्नो मौसी गांव में दाई का काम करती थी. वह जवान औरतों और मनचली लड़कियों के नाजायज संबंधों की भी पूरी जानकारी रखती थी.

इस समय भी धन्नो मौसी किसी औरत के अपने जेठ से नाजायज संबंधों की रसीली दास्तान मिर्चमसाला लगा कर मालती को सुना रही थी.

मालती भी अपने भूखे ससुर की जरूरत को अंगूठा दिखाते हुए धन्नो मौसी की बेहूदा बातें चटखारे ले कर सुन रही थी.

जिस्मानी संबंधों की दास्तान सुन कर मालती अपनी सैक्स भावनाओं को भड़का रही थी.

मालती का पति नरपाल सुबह से किसी काम से शहर गया था. उस के पास जो जमीन थी, उसे किसी को बंटाई पर दे रखा था. फसल तैयार होने पर वह आधी फसल लेता था.

मालती की शादी को 5 साल हो चुके थे, पर अभी तक बच्चा नहीं हुआ था. इस के बावजूद नरपाल दिनरात मालती की जवानी में ही खोया रहता था. मेहनत कर के रुपयापैसा कमाना उस की आदत में नहीं था. बाप की जमीन से जो कमाई होती थी, उसी को खा रहा था.

राम कुमार बारबार समझाता था कि खेतों को बंटाई पर देने के बजाय खुद मेहनत करे, मगर नरपाल ने बाप की सीख पर ध्यान नहीं दिया. उसे तो हर तरफ मालती की मचलती जवानी नजर आती थी.

राम कुमार की उम्र 55 साल की हो चुकी थी. उस की पत्नी को मरे 10 साल हो चुके थे.

पत्नी का अचानक साथ छोड़ जाना, बेटे की लापरवाही व निकम्मेपन ने उसे परेशान कर दिया था. इसी परेशानी, तनाव व घर में आएदिन क्लेश के चलते वह लकवे का शिकार हो गया था.

राम कुमार अपने छोटेछोटे कामों के लिए दूसरों का मुहताज हो गया था. नरपाल तो अपने बाप की तरफ जरा भी ध्यान नहीं देता था.

राम कुमार ने नरपाल की शादी यह सोच कर की थी कि बेटा नहीं तो बहू ही उस की देखभाल करेगी. मगर उस की उम्मीदों पर पानी फिर गया.

लाचार और बेबस राम कुमार काफी देर तक गिड़गिड़ाता रहा कि दोपहर को खाना बना दे, उसे भूख लगी है. मगर मालती जानबूझ कर उस की फरियाद को अनसुना करती रही.

‘‘अरे बहू, अगर खाना नहीं बनाती, तो एक गिलास पानी ही दे दे. क्यों मुझे भूखाप्यासा मारने पर तुली है?’’ राम कुमार की आवाज भर्रा उठी थी.

‘‘अरे मालती, तुम्हारा ससुर तो तुम्हें दो घड़ी आराम से बैठने नहीं देगा. बेचारे की प्यास बुझ, मैं चली अपने घर. यहां बैठना तो मुश्किल हो रहा है,’’ हाथ नचाते हुए धन्नो मौसी चली गई.

‘‘इस बूढ़े ने तो नाक में दम कर दिया है,’’ मालती पैर पटकते हुए रसोईघर में गई और पानी का लोटा राम कुमार के सामने मेज पर रख दिया. पानी रख कर वह बड़बड़ाते हुए दूसरे कमरे में जा कर लेट गई.

पानी देखा, तो राम कुमार के मुरझाए चेहरे पर चमक आ गई. उस ने थोड़ा झाक कर हाथ बढ़ाया, तो पानी के लोटे तक हाथ पहुंच तो गया, मगर आधे जिस्म से अपना संतुलन नहीं बना पाया.

पानी का लोटा हाथ में न आने की वजह से मेज पर ही लुढ़क गया और सारा पानी मेज पर बिखर गया.

अपनी बेबसी और बहू की लापरवाही पर राम कुमार रो पड़ा. लाचार बूढ़े की सिसकियां घर में मातम और अनहोनी का माहौल पैदा कर रही थीं. कमरे में पानी बिखरने पर बिगड़ी मालती छाती पर हाथ मारते हुए ससुर को कोसने लगी.

घर में शोर सुन कर पड़ोस में रहने वाली एक 40 साला विधवा विमला आ गई. पड़ोस की औरतें और बच्चे भी वहां जमा हो गए.

फर्श पर बिखरा पानी देख कर विमला समझ गई कि माजरा क्या है. उस ने फौरन अपने घर से पानी ला कर राम कुमार को पिलाया, तो मालती उस के पीछे पड़ गई और आरोप लगा दिया कि बूढ़े के विमला के साथ नाजायज संबंध हैं.

यह सुन कर बेचारी विधवा विमला अपने घर चली गई. वह अपनी बदनामी से परेशान हो गई थी. शाम को नरपाल जैसे ही घर आया, कुछ औरतों ने मालती की शिकायत की कि वह उस के अपाहिज बाप पर जुल्म कर रही है. आज तो उस ने ससुर को सारा दिन खाना भी नहीं दिया.

महल्ले की औरतों की बातें सुन कर नरपाल का जमीर जागा. वह घर में घुसते ही मालती पर बरस पड़ा.

पति के बदले तेवर देख कर मोटेमोटे आंसू बहाती हुई मालती ससुर पर गलत आरोप लगाने लगी कि इस घर में रह कर अपनी बेइज्जती नहीं कराएगी. घर में अपने बाप को रखे या उसे. जब तक वह अपने बाप को घर से नहीं निकालेगा, तब तक वह लौट कर नहीं आएगी.

ऐसा सुन कर नरपाल नरम पड़ गया, मगर मालती अपनी जिद पर अड़ गई थी. उस ने पति की बात नहीं मानी और कंधे पर बैग उठाए आटोरिकशे में बैठ कर बसअड्डे पहुंच गई.

नरपाल ने तो यह सोच कर मालती को धमकाया था कि उसे अपनी गलती का एहसास होगा, मगर यहां तो पासा ही पलट गया था.

नरपाल भी बस में बैठा और मालती को मनाने ससुराल चला गया. वहां पहुंच कर मालती से माफी मांगते हुए घर चलने को कहा, तो नरपाल की सास ने बेटी का पक्ष लेते हुए कहा, ‘‘देखो दामादजी, मेरी बेटी को आप का बाप तंग करता है. जब तक वह जिंदा है, तब तक मालती वहां नहीं जाएगी.’’

‘‘मगर मांजी, मैं तो मालती के बगैर एक रात भी अकेला नहीं रह सकता. मालती में तो मेरी जान अटकी है,’’ नरपाल ने मालती का हाथ थाम कर अपनी दीवानगी जाहिर की.

सास मन ही मन खुश हुई. उसे लगा कि बेटी ने नरपाल को अपने रंगरूप का दीवाना बना रखा है. अब तो बूढ़ा जल्दी ही मरेगा. तब उस की बेटी अपने घर में मजे से रहेगी.

उस ने नरपाल से कहा, ‘‘अगर ऐसा है, तो तुम भी यहां रहने आ जाओ. तब तो दोनों की समस्या ही खत्म हो जाएगी.’’

नरपाल भी तो यही चाहता था. इधर मालती का छोटा भाई कालेज जाने लगा था. बापू के साथ खेतों में काम करने वाले आदमी की जरूरत थी. नरपाल ने वह कमी पूरी कर दी थी.

रात के 10 बजने को थे. अपाहिज राम कुमार आंसू बहा रहा था. उसे लगा कि बुरे समय में बहू ने तो साथ छोड़ा, अपना पैदा किया बेटा भी उसे भूल गया.

अचानक राम कुमार के जेहन में खयाल आया. उस ने मेज पर टेबल फैन चलता देखा. उस ने माचिस की तीली जला कर तार को जला दिया. तार जलने से चिनगारियां निकलीं, तो उस ने तार को पकड़ कर अपनेआप को फर्श पर गिरा लिया.

तभी एक दर्दनाक चीख कमरे में गूंजी. बिजली के तार ने राम कुमार को दूर झटक दिया. वह गेंद की तरह लुढ़कता हुआ कमरे की दीवार से जा टकराया और बेहोश हो गया.

किसी के चीखने की आवाज सुन कर पड़ोस में रहने वाली विधवा विमला भागी आई. वह राम कुमार को बेहोश देख कर सहम गई. उसे लगा कि कहीं बूढ़ा मर गया, तो उस के सिर पर हत्या का आरोप न लग जाए.

विमला ने गौर से देखा. राम कुमार की सांसें चल रही थीं. उस ने सीने पर हाथ रख के देखा, तो दिल धड़क रहा था. वह फौरन दूसरी गली में रहने वाले डाक्टर को बुला लाई.

डाक्टर ने बेहोशी हटाने का टीका लगाया, तो राम कुमार को होश आ गया. होश में आते ही उस ने उठने की कोशिश की, तो वह अपनेआप उठ खड़ा हुआ और खुशी के मारे चीख उठा, ‘‘डाक्टर साहब, मैं खड़ा हो सकता हूं… मेरे हाथ और पैर में जान आ गई है.’’

डाक्टर के पूछने पर राम कुमार ने बिजली के करंट लगने की बात बताई.

डाक्टर ने चैकअप कर के बताया, ‘‘बिजली का करंट लगने से तुम्हारे जिस्म का जो आधा हिस्सा बेकार हो गया था, अब उस में जान आ गई है. अगर सही समय पर दवा दी जाए, तो तुम 5-10 दिनों में ठीक हो सकते हो.’’

यह सुन कर राम कुमार के चेहरे पर खुशी उभर आई.

‘‘आप दवा दीजिए डाक्टर साहब, इन के बेटाबहू तो यहां पर हैं नहीं, फिर भी इनसानियत के नाते मैं इन की देखभाल करूंगी,’’ विमला ने मदद करने का भरोसा दिया.

डाक्टर दवाएं दे कर चला गया. विमला ने राम कुमार को हलका खाना बना कर खिलाया और दवा दे कर अपने घर चली गई.

4-5 दिन गुजर गए थे. विमला राम कुमार को सुबहशाम दवा देती, खाना बना कर खिलाती. वह धीरेधीरे अच्छा होने लगा.

राम कुमार मन ही मन विमला का एहसानमंद था. मगर गांव के कुछ लोगों ने नीची जाति की विमला के ऊंची जाति के जमींदार के घर के रसोईघर में खाना बना कर खिलाने पर नाराजगी जताई.

गांव में पंचायत हुई कि विमला को सजा के रूप में गांव से निकाल दिया जाए.

यह खबर राम कुमार को लगी, तो उस ने फौरन विमला को बुला कर पूछा, ‘‘गांव वाले तुझे भलाई करने की सजा देना चाहते हैं. मगर मेरी मजबूरी किसी ने नहीं देखी. क्या तुम गांव छोड़ कर चली जाओगी?’’

‘‘अगर मेरी मदद करने कोई नहीं आया, तो मैं गांव छोड़ दूंगी,’’ विमला ने मायूस होते हुए कहा.

‘‘ठीक है, तुम ने मुझे नई जिंदगी दी है. मेरे बेटाबहू तो मुझे मरने के लिए छोड़ गए थे. तुम भाग कर कहीं मत जाओ, दुनिया का मुंह बंद करने के लिए मेरे पास एक हथियार है,’’ राम कुमार ने कहा, तो विमला के मायूस चेहरे पर उम्मीद की रेखा उभरी.

‘‘ऐसा कौन सा रास्ता है आप के सामने, जिस से गांव वाले चुप हो जाएंगे?’’

‘‘हम अभी चल कर शादी कर लेते हैं. औरत की कोई जाति नहीं होती. मेरी पत्नी बन कर तुम भी मेरे समान हो जाओगी. फिर देखूंगा एक अच्छे इनसान को दुनिया परेशान कैसे करती है?’’ कहते हुए राम कुमार ने विमला का हाथ थाम लिया.

‘‘लेकिन, बेटाबहू भी तो आप के खिलाफ हो जाएंगे,’’ विमला ने अपना डर जताया.

‘‘मुझे ऐसे बेटाबहू की परवाह नहीं है,’’ राम कुमार ने कहा और कुछ दिनों बाद शादी कर के विमला को बीवी का दर्जा दे दिया.

गांव वाले फिर भी नहीं माने. अब तो वे किसी भी हालत में राम कुमार को भी गांव से निकालने पर आमादा हो गए.

राम कुमार ने भी गांव छोड़ना ही मुनासिब समझ. वह अपनी जमीन और घरबार बेच कर सारा रुपयापैसा समेट कर किसी अजनबी शहर में जा बसा, जहां कोई भी उसे नहीं जानता था.

नरपाल और मालती को खबर लगी, तो वे भागे आए. गांव में तो सबकुछ लुट चुका था. न जमीन, न घरबार. बाप जातेजाते अपने बेटे को भिखारी बना गया था.

हृदय परिवर्तन: क्या सुनंदा अपने सौतेले बच्चों को मां जैसा प्यार दे पाई

इसी को कहते हैं जीना : कैसा था नेहा का तरीका -भाग 3

‘‘ललिता का तो स्वभाव ही है. कोई एक कदम इस की तरफ बढ़ाए तो यह 10 कदम आगे बढ़ कर उस का साथ देती है. हम नएनए इस शहर में आए थे. यह लड़की एक शाम फोन करने आई थी. उस का फोन काम नहीं कर रहा था… गलती तो ललिता की ही थी… किसी की भी तरफ बहुत जल्दी झुक जाती है.’’

स्तब्ध था मैं. अगर मुझ से भी नहीं मिलती तो किस से मिलती है आजकल?

4 दिन और बीत गए. मैं आफिस के बाद हर शाम अस्पताल चला जाता. मुझे देखते ही ललिताजी का चेहरा खिल जाता. एक बार तो ठिठोली भी की उन्होंने.

‘‘बेचारा बच्चा फंस गया हम बूढ़ों के चक्कर में.’’

‘‘आप मेरी मां जैसी हैं. घर पर होता और मां बीमार होतीं तो क्या उन के पास नहीं जाता मैं?’’

‘‘नेहा से कब मिलते हो तुम? हर शाम तो यहां चले आते हो?’’

‘‘वह मिलती ही नहीं.’’

‘‘कोई काम नहीं होगा न. काम पड़ेगा तो दौड़ी चली आएगी,’’ ललिताजी ने ही उत्तर दिया.

शर्माजी कुछ समय के लिए घर गए तब ललिताजी ने इशारे से पास बुलाया और कहने लगीं, ‘‘मुझे माफ कर देना बेटा, मेरी वजह से ही तुम नेहा के करीब आए. वह अच्छी लड़की है लेकिन बेहद स्वार्थी है. मोहममता जरा भी नहीं है उस में. हम इनसान हैं बेटा, सामाजिक जीव हैं हम… अकेले नहीं जी सकते. एकदूसरे की मदद करनी पड़ती है हमें. शायद यही वजह है, नेहा अकेली है. किसी की पीड़ा से उसे कोई मतलब नहीं है.’’

‘‘वह आप से मिलने एक बार भी नहीं आई?’’

‘‘उसे पता ही नहीं होगा. पता होता तो शायद आती…और पता वह कभी लेती ही नहीं. जरूरत ही नहीं समझती वह. तुम मिलना चाहो तो जाओ उस के घर, इच्छा होगी तो बात करेगी वरना नहीं करेगी… दोस्ती तक ही रखना तुम अपना रिश्ता, उस से आगे मत जाना. इस तरह के लोग रिश्तों में बंधने लायक नहीं होते, क्योंकि रिश्ते तो बहुत कुछ मांगते हैं न. प्यार भी, स्नेह भी, अपनापन भी और ये सब उस के पास हैं ही नहीं.’’

शर्माजी आए तो ललिताजी चुप हो गईं. शायद उन के सामने वह अपने स्नेह, अपने ममत्व को ठगा जाना स्वीकार नहीं करना चाहती थीं या अपनी पीड़ा दर्शाना नहीं चाहती थीं.

3-4 दिन और बीत गए. ललिताजी घर आ चुकी थीं. नेहा एक बार भी उन से मिलने नहीं आई. लगभग 3 दिन बाद वह लंच में मुझ से मिलने मेरे आफिस चली आई. बड़े प्यार से मिली.

‘‘कहां रहीं तुम इतने दिन? मेरी याद नहीं आई तुम्हें?’’ जरा सा गिला किया था मैं ने.

‘‘जरा व्यस्त थी मैं. घर की सफाई करवा रही थी.’’

‘‘10 दिन से तुम्हारे घर की सफाई ही चल रही है. ऐसी कौन सी सफाई है भई.’’

मन में सोच रहा था कि देखते हैं आज कौन सा काम पड़ गया है इसे, जो जबान में मिठास घुल रही है.

‘‘क्या लोगी खाने में, क्या मंगवाऊं?’’

खाने का आर्डर दिया मैं ने. इस से पहले भी जब हम मिलते थे खाना मैं ही मंगवाता था. अपनी पसंद का खाना मंगवा लिया नेहा ने. खाने के दौरान कभी मेरी कमीज की तारीफ करती तो कभी मेरी.

‘‘शर्माजी और ललिताजी कैसी हैं? शर्माजी छुट्टी पर हैं न, कहीं बाहर गए हैं क्या?’’

‘‘पता नहीं, मैं ने बहुत दिन से उन्हें देखा नहीं.’’

‘‘अरे भई, तुम इस देश की प्रधानमंत्री हो क्या जो इतना काम रहता है तुम्हें. 2 घर छोड़ कर तो रहते हैं वह…और तुम्हारा इतना खयाल भी रखते हैं. 10 दिन से वह तुम से मिले नहीं.’’

‘‘मेरे पास इतना समय नहीं होता. 2 बजे तो स्कूल से आती हूं. 4 बजे बच्चे ट्यूशन पढ़ने आ जाते हैं. 7 बजे तक उस में व्यस्त रहती हूं. इस बीच काम वाली बाई भी आ जाती है…’’

‘‘किसी का हालचाल पूछने के लिए आखिर कितना समय चाहिए नेहा. एक फोन काल या 4-5 मिनट में जा कर भी इनसान वापस आ जाता है. उन के और तुम्हारे घर में आखिर दूरी ही कितनी है.’’

‘‘मुझे बेकार इधरउधर जाना अच्छा नहीं लगता और फिर ललिताजी तो हर पल खाली रहती हैं. उन के साथ बैठ कर गपशप लगाने का समय नहीं होता मेरे पास.’’

नेहा बड़ी तल्खी में जवाब दे रही थी. खाना समाप्त हुआ और वह अपने मुद्दे पर आ गई. अपने पर्स से राशन कार्ड और पैन कार्ड निकाल उस ने मेरे सामने रख दिए.

‘‘यह देखो, इन दोनों में मेरी जन्मतिथि सही नहीं लिखी है. 7 की जगह पर 1 लिखी गई है. जरा इसे ठीक करवा दो.’’

हंस पड़ा मैं. इतनी हंसी आई मुझे कि स्वयं पर काबू पाना ही मुश्किल सा हो गया. किसी तरह संभला मैं.

‘‘तुम ने क्या सोचा था कि तुम्हारा काम हो गया और अब कभी किसी की जरूरत नहीं पड़ेगी. मत भूलो नेहा कि जब तक इनसान जिंदा है उसे किसी न किसी की जरूरत पड़ती है. जिंदा ही क्यों उसे तो मरने के बाद भी 4 आदमी चाहिए, जो उठा कर श्मशान तक ले जाएं. राशन कार्ड और पैन कार्ड जब तक नहीं बना था तुम्हारा मुझ से मिलना चलता रहा. 10 दिन से तुम मिलीं नहीं, क्योंकि तुम्हें मेरी जरूरत नहीं थी. आज तुम्हें पता चला इन में तुम्हारी जन्मतिथि सही नहीं तो मेरी याद आ गई …फार्म तुम ने भरा था न, जन्मतिथि तुम ने भरी थी…उस में मैं क्या कर सकता हूं.’’

‘‘यह क्या कह रहे हो तुम?’’ अवाक्  तो रहना ही था नेहा को.

‘‘अंधे को अंधा कैसे कहूं…उसे बुरा लग सकता है न.’’

‘‘क्या मतलब?’’

‘‘मतलब साफ है…’’

उसी शाम ललिताजी से मिलने गया. उन्हें हलका बुखार था. शर्माजी भी थकेथके से लग रहे थे. वह बाजार जाने वाले थे, दवाइयां और फल लाने. जिद कर के मैं ही चला गया बाजार. वापस आया और आतेआते खाना भी लेता आया. ललिताजी के लिए तो रोज उबला खाना बनता था जिसे शर्माजी बनाते भी थे और खाते भी थे. उस दिन मेरे साथ उन्होंने तीखा खाना खाया तो लगा बरसों के भूखे हों.

‘‘मैं कहती थी न अपने लिए अलग बनाया करें. उबला खाना खाया तो जाता नहीं, उस पर भूखे रह कर कमजोर भी हो गए हैं.’’

ललिताजी ने पहली बार भेद खोला. दूसरे दिन से मैं रोज ही अपना और शर्माजी का खाना पैक करा कर ले जाने लगा. नेहा की हिम्मत अब भी नहीं हुई कि वह एक बार हम से आ कर मिल जाती. हिम्मत कर के मैं ने सारी आपबीती उन्हें सुना दी. दोनों मेरी कथा सुनने के बाद चुप थे. कुछ देर बाद शर्माजी कहने लगे, ‘‘सोचा था, प्यारी सी बच्ची का साथ रहेगा तो अच्छा लगेगा. उसे हमारा सहारा रहेगा हमें उस का.’’

‘‘सहारा दिया है न हमें प्रकृति ने. बच्ची का सहारा तो सिर्फ हम ही थे… बदले में सहारा देने वाला मिला है हमें… यह बच्चा मिला है न.’’

ललिताजी की आंखें नम थीं, मेरी बांह थपथपा रही थीं वह. मेरा मन भी परिवार के साथ रहने को होता था पर घर दूर था. मुझे भी तो परिवार मिल गया था परदेस में. कौन किस का सहारा था, मैं समझ नहीं पा रहा था. दोनों मुझे मेरे मातापिता जैसे ही लग रहे थे. वे मुझे सहारा मान रहे थे और मैं उन्हें अपना सहारा मान रहा था, क्योंकि शाम होते ही मन होता भाग कर दोनों के पास चला जाऊं.

क्या कहूं मैं? अपनाअपना तरीका है जीने का. कुदरत ने लाखों, करोड़ों जीव बनाए हैं, जो आपस में कभी मिलते हैं और कभी नहीं भी मिलते. नेहा का जीने का अपना तरीका है जिस में वह भी किसी तरह जी ही लेगी. बस, इतना मान सकते हैं हम तीनों कि हम जैसे लोग नेहा जैसों के लिए नहीं बने, सो कैसा अफसोस? सोच सकते हैं कि हमारा चुनाव ही गलत था. कल फिर समय आएगा…कल फिर से कुछ नया तलाश करेंगे, यही तो जीवन है, इसी को तो कहते हैं जीना.

बचाने वाला महान : क्यों खतरे में थी गुलाबो की जिंदगी

पंच मेलाराम की नजरें काफी दिनों से अपने घर के साथ चौराहे पर नुक्कड़ वाली जगह पर लगी हुई थीं. वहां पर गरीब हरिया की विधवा बहू गुलाबो मिट्टी की कच्ची झोंपड़ी में बच्चों के लिए टौफीबिसकुट, पैनपैंसिलों, कौपियों वगैरह की दुकान चलाती थी.

पंच मेलाराम नुक्कड़ वाली वह जगह हरिया से खरीदना चाहता था. दरअसल, उस का मझला बेटा निकम्मा व आवारा था, इसलिए मेलाराम गुलाबो की दुकान की जगह पर अपने उस बेटे को शराब की दुकान खोल कर देना चाहता था.

विधवा गुलाबो के घर में अपाहिज सास व 2 बेटियों के अलावा बूढ़ा शराबी ससुर हरिया भी था, जो दो घूंट शराब पीने के लिए कुछ भी करने को तैयार रहता था.

पंच मेलाराम ने हरिया को शीशे में उतार लिया था. उसे हर रोज खूब देशी दारू पिला रहा था, ताकि नुक्कड़ वाली जगह उसे मिल जाए.

वह जगह हरिया के नाम नहीं थी. मकान की मालकिन पहले हरिया की अपाहिज पत्नी संतरा थी. बेटे नरपाल की शादी हो गई, तो बहू गुलाबो आ गई.

गुलाबो बेहद मेहनती, गुणवान, अच्छे चरित्र की औरत थी. वह अपनी सास की प्यारी बहू बन गई थी.

नरपाल भी बाप की तरह शराबी था. कभीकभी जंगल में जंगली जानवरों का शिकार कर के मांस बेच कर वह कुछ पैसे कमाता था.

सास ने मकान बहू गुलाबो के नाम कर दिया था. उसे यकीन था कि मकान बहू के नाम होगा तो बचा रहेगा, नहीं तो बापबेटा शराब के लालच में उसे बेच खाएंगे.

नरपाल एक दिन घने जंगल में जंगली जानवर का शिकार करने गया और वापस नहीं आया. 4 दिन बाद तलाश करने पर नरपाल के कपड़े मिले. कपड़े मिलने का सब ने यही मतलब लगाया कि कोई जंगली जानवर उसे खा गया है. अब वह दुनिया में नहीं रहा. बेचारी गुलाबो जवानी में विधवा हो गई. जवान होती बेटियों और अपाहिज सास की जिम्मेदारी उस पर आ गई थी.

एक दिन शाम के समय हरिया ने बहू से कहा कि अगर दुकान वाली जगह मेलाराम को बेच दी जाए, तो अच्छे पैसे मिल जाएंगे. अपने रहने वाले दोनों कच्चे मिट्टी के बने कमरे पक्के हो जाएंगे. खर्चे के लिए पैसा बच जाएगा.

‘‘पिताजी, दुकान वाली जगह बेच दी, तो घर का चूल्हा नहीं जलेगा. कच्चे मकान में रहा जा सकता है, पर भूखे पेट जिंदा रहना मुश्किल है. जगह बेच कर पैसा कितने दिन चलेगा?’’ गुलाबो ने दूर की बात सोचते हुए कहा, तो हरिया कुछ देर के लिए चुप हो गया.

दुकान के बाहर पंच मेलाराम खड़ा ससुरबहू की बातें सुन रहा था. वह भीतर आ गया और गुलाबो की भरीपूरी छाती पर नजरें टिकाते हुए चापलूसी भरे लहजे में बोला, ‘‘देखो हरिया, तुम्हारी बहू विधवा हो गई तो क्या हुआ, हमारे गांव की इज्जत है. शाम होते ही यहां चौक में कितने आवारा किस्म के लोग खड़े हो कर बेहूदा इशारे करते हैं.’’

‘‘यही बात तो मैं इसे समझ रहा हूं. नुक्कड़ वाली जगह बेच कर जो पैसा मिलेगा, उस से पक्का मकान बनवा लेंगे. कुछ पैसा जरूरत के लिए बच भी जाएगा. आगे की आगे देखी जाएगी. मेरी दोनों पोतियां बड़ी हो रही हैं. सभी मिल कर काम करेंगे, तो हमारे बुरे दिन गुजर जाएंगे,’’ हरिया ने अपनी बात कही.

‘‘पिताजी, जगह बेचने का पैसा तो सालभर का खर्चा नहीं चला पाएगा. दोनों बेटियां जवान हो रही हैं. इन की शादियां भी करनी हैं. सासू मां भी दूसरों की मुहताज हैं,’’ गुलाबो ने कहा.

गुलाबो की बात पर मेलाराम हमदर्दी जताते हुए बोला, ‘‘गुलाबो, तू अपने रोजगार की चिंता मत कर. मैं सरकारी स्टांप पेपर पर लिख कर दूंगा. तुम्हारी दुकान पर मैं शराब की दुकान खोलूंगा. महीनेभर मैं कम से कम 10-12 लाख रुपए की आमदनी होगी. उस कमाई में से 25 फीसदी हिस्सा तुम्हारा होगा. महीने के महीने तुम्हें तुम्हारा हिस्सा मिल जाएगा.’’

‘‘वह तो बाद की बात है काका. काम चलने में सालभर लग जाएगा. इस से पहले हम खाएंगे क्या?’’

‘‘उस की चिंता मत कर गुलाबो. तुम हमारे खेतों में काम करो. 5 हजार रुपए हर महीना दूंगा. जब हमारी शराब की दुकान चल पड़ेगी, तुम काम छोड़ देना. लाखों रुपए तुम्हें तुम्हारा हिस्सा मिला करेगा. देखना मौज करोगी,’’ कहते हुए मेलाराम ने 5 हजार रुपए उस के सामने लहरा दिए.

‘‘रुपए रख लो बहू. 5 हजार रुपए हर महीने मिलेंगे. जब हमारी दुकान में दारू का कारोबार चल निकलेगा, तो तुम्हारा हिस्सा लाखों में मिलेगा. तब खेतों में काम करना छोड़ देना,’’ ससुर हरिया ने हरेहरे नोटों को ललचाई नजरों से देखते हुए कहा.

इधर गुलाबो भी सोच में पड़ गई. वह छोटी सी दुकान में हर महीने मुश्किल से हजारबारह सौ रुपए ही कमा पाती थी. इसी मामूली से काम में उस का सारा दिन खत्म हो जाता था.

अगर मेलाराम के खेतों में काम करने से 5 हजार रुपए महीना मिल जाए, तो

2 हजार रुपए में घर का खर्चा चला कर वह 3 हजार रुपए बचा सकती है. इस तरह 2-3 साल काम करेगी, तो अपनी दुकान की जगह बेचे बगैर ही वह अपने दोनों कमरे पक्के बनवा सकती है.

अभी गुलाबो सोच ही रही थी कि मेलाराम ने 5 हजार रुपए गुलाबो के सामने रख दिए. जब उस ने दूसरे दिन काम पर आने को कहा, तो गुलाबो ने गंभीर लहजे में अपने मन की बात कही, ‘‘ठीक है काका, आप के खेतों में काम जरूर करूंगी, मगर मैं अपनी सास और पति की निशानी अपने मकान का एक कोना तक नहीं बेचूंगी. पहले ही कहे देती हूं.’’

‘‘अरे हरिया, तू अपनी बहू को ठंडे दिमाग से समझना. मैं जो भी काम करूंगा, उस में तुम्हारा भी फायदा होगा,’’ कहते हुए मेलाराम चला गया.

‘‘बहू सारे रुपए संभाल ले. कल से काम पर जाना शुरू कर दे. तुम्हारी दुकान पर मैं काम कर लूंगा. बूढ़ा आदमी हूं, बैठा रहूंगा,’’ हरिया ने आगे की योजना बनाते हुए कहा.

रुपए ले कर गुलाबो सास के पास गई और सारी बात बताई, तो सास ने नुक्कड़ वाली दुकान की जगह बेचने से साफ मना कर दिया. वह बहू के मेलाराम के खेतों में काम करने के पक्ष में नहीं थी, मगर उसे अपनी बहू पर यकीन था.

गुलाबो को काम करते हुए महीनेभर से ऊपर हो गया था. दूसरे महीने का पैसा भी मेलाराम ने दिया नहीं था. शाम को जाते समय गुलाबो ने पैसे मांगे, तो मेलाराम ने उसे रुकने को कहा. उस के साथ काम करने वाली दूसरी औरतें जा चुकी थीं.

दरअसल, मेलाराम ने खेत पर भी मकान बना रखा था. वह उस में खेतों की रखवाली करने या फसल में रात को पानी देने के लिए रुकता था.

शाम हो चली थी. दूरदूर तक सन्नाटा पसरा था. गुलाबो को लगा कि अगर ज्यादा देर हो गई, तो अकेले गांव जाना मुश्किल होगा.

मेलाराम अपने कमरे में था. वह काफी समय से बाहर निकल नहीं रहा था. गुलाबो परेशान हो कर कमरे में घुस गई. महीने का पैसा मांगा, तो मेलाराम ने झपट कर उसे अपनी बांहों में कस लिया और उस की साड़ी खोलने लगा.

गुलाबो ने मेलाराम को अपने से दूर कर उसे उस की बूढ़ी उम्र का एहसास कराना चाहा, ‘‘यह क्या पागलपन है? तुम मेरे बाप की उम्र के हो. ऐसी घिनौनी हरकत तुम्हें शोभा नहीं देती.’’

तभी बाहर से गुलाबो की 12 साला बेटी उसे तलाश करती हुई वहां आ गई. उस ने अपनी मां से छेड़छाड़ करते मेलाराम को पीछे से काट खाया, तो वह गाली बकते हुए बुरी तरह बिदक गया.

मेलाराम ने मासूम बच्ची को जोर से धक्का दिया. वह दीवार से जा टकराई. उस के सिर से खून बह निकला. चोट लगने से वह बेहोश हो गई.

गुस्से में मेलाराम दूसरे कमरे से तलवार उठा लाया, जो उस ने पहले से छिपा कर रखी थी. वह दहाड़ते हुए बोला, ‘‘देख गुलाबो, अगर तू अपनी जवानी का खजाना मुझ पर नहीं लुटाएगी, तो मैं तेरी हत्या कर के तेरी जवान होती बेटी की इज्जत लूट लूंगा.’’

‘‘बेटी के साथ मुंह काला मत करना. हम मांबेटी तो पहले ही मुसीबत की मारी हैं,’’ बेचारी गुलाबो अपनी हालत पर सिसक उठी.

मेलाराम के हाथ में चमकती तलवार देख कर वह घबरा उठी थी. अगर उस की हत्या हो गई, तो उस की बेटी को बचाने कौन आएगा?

‘‘ठीक है. अगर अपनी जवान होती बेटी की आबरू बचाना चाहती है, तो तू पहले सफेद कागज पर लिख कि अपनी नुक्कड़ वाली दुकान मुझे बेच रही है. साथ ही, जिस्म से सारे कपड़े उतार दे.

‘‘बूढ़ा आदमी हूं, थोड़ेबहुत मजे लूटूंगा. तेरी बेटी को तेरे साथ हिफाजत से घर छोड़ आऊंगा. तेरा महीने का पैसा इस शर्त पर दूंगा कि हर शाम मेरी इच्छा पूरी कर के जाया करेगी.’’

‘‘कमीने, अपने घर की एक इंच जगह नहीं बेचूंगी. तेरी यह इच्छा कभी पूरी नहीं होगी,’’ गुलाबो नफरत से गरजी.

‘‘ठीक है, तू ऐसे नहीं मानेगी. पहले तेरी बेटी का गला धड़ से अलग करता हूं,’’ गुर्राते हुए उस ने चमकती तलवार उस की बेटी की गरदन पर रख दी.

ऐसा दिल दहला देने वाला नजारा देख कर गुलाबो कांप उठी. वह नीच गांव से दूर खेतों में मांबेटी की हत्या कर के लाशें दबा देगा. कोई पूछेगा नहीं. उन दोनों का खात्मा हो जाएगा. उस का पति जिंदा नहीं है. ससुर शराबी है. अपाहिज सास भीख मांगती फिरेगी.

अभी गुलाबो सोच में उलझ थी कि मेलाराम फिर गरजा, ‘‘अरे, सोच क्या रही है? जल्दी से सादा कागज पर अपना नाम लिख. अपने सुलगतेमचलते जिस्म से कपड़े उतार, नहीं तो तेरी बेटी का खात्मा हो गया, समझ ले.’’

मजबूर गुलाबो ने सामने पड़े कागज पर दस्तखत कर अपना बदन मेलाराम को सौंप दिया.

गुलाबो का मादक बदन मेलाराम के दिलोदिमाग में वासना का तूफान जगाने लगा था.

मेलाराम ने जवानी में ऐसा मचलता हुस्न नहीं देखा था. वह अभी आगे बढ़ता कि बाहर से आती कुछ आवाजें सुन कर चौंक उठा. आवाजें उस के मकान के नजदीक से आ रही थीं.

गुलाबो ने फटाफट अपने कपड़े पहन लिए, तभी उस की छोटी बेटी हांफती हुई आई और मां से लिपटते हुए बोली, ‘‘मां… मां, बाहर देखो, पापा आ रहे हैं. अपने साथ पुलिस को भी ला रहे हैं.’’

‘‘यह तू क्या कह रही है गुड़िया? तेरे पापा को तो जंगली जानवर…’’ गुलाबो इतना कह पाई थी कि आंधीतूफान की तरह गुस्से की आग में सुलगता हुआ उस का पति नरपाल वहां आ पहुंचा.

उस ने मेलाराम को देखते ही दबोच लिया और उसे इतना मारा कि उस के दोनों हाथ टूट गए और एक आंख फूट गई. अगर पुलिस वाले नहीं बचाते, तो नरपाल मेलाराम को मार ही डालता.

हैरानी में डूबी गुलाबो ने नरपाल से पूछा, ‘‘तुम्हें तो जंगली जानवर…’’

‘‘नहीं…नहीं, मुझे जंगली जानवर क्या खाएंगे, मुझे तो मेलाराम और इस के दोनों बेटों ने जंगल में पकड़ लिया था. मैं नशे में था. ये तीनों हमारा मकान हड़पना चाहते थे.

‘‘मना करने पर इन लोगों ने मुझे बुरी तरह मारापीटा और बेहोशी की हालत में नंगा कर के नदी में बहा दिया. इन का अंदाजा था कि लोग समझोंगे कि मुझे जंगली जानवर खा गए.’’

नरपाल की बात सुन कर तो गुलाबो ने वह कागज फाड़ डाला, जिस पर मेलाराम ने उस से दस्तखत कराए थे.

गुलाबो आगे बढ़ कर नरपाल से लिपट गई.

‘‘ऐसा हादसा तुम्हारे शराब पीने की आदत के चलते हुए था. पंच मेलाराम हमारे मकान की नुक्कड़ वाली जगह पर शराब की दुकान खोलना चाहता था,’’ गुलाबो ने पति की शराब पीने की आदत पर अपना विरोध जताया.

‘‘गुलाबो, नशा समाज के लिए अभिशाप है. मैं इस का बुरा नतीजा भुगत चुका हूं. अगर एक भला आदमी मुझे बेहोशी की हालत में बहती नदी से न बचाता, तो मेरी बेटी और पत्नी के साथ पता नहीं क्या हो जाता.

‘‘अब मैं न शराब पीऊंगा और न ही शराब की दुकान खुलेगी. अब ये शैतान जेल जाएंगे,’’ नरपाल ने इतना कहा, तो गुलाबो पति की बांहों में समा गई.

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