बढ़ती उम्र में रहें जोशीले

म ध्य प्रदेश के इंदौर में रहने वाली शोभा की उम्र तकरीबन 48 साल है. उस का पति दिलीप 52 साल का है. उन के 2 बच्चे हैं. देखने में तो यह एक सुखी परिवार लगता है, पर रात होते ही शोभा बिस्तर पर जाने से घबराती है. वजह, दिलीप अब भी खुद को 25 साल का बांका जवान समझता है और चाहता है कि शोभा उस की हर रात रंगीन कर दे.

पर शोभा का शरीर उस का साथ नहीं दे रहा है. मेनोपौज ने दस्तक दे दी है. नतीजतन, वह अब थकीथकी सी रहती है. मूड अपनेआप खराब हो जाता है. बिस्तर पर जाने के नाम पर खीज मचने लगती है. उस ने इशारे से दिलीप को बताने की कोशिश भी की, पर सब बेकार.

दरअसल, मेनोपौज की वजह से शोभा के अंग में सूखापन रहने लगा है. सैक्स करते हुए तेज दर्द होता है. दिन में काम करते हुए उसे अचानक से पसीना आ जाता है. माहवारी अनियमित रहती है. इस वजह से उसे रात को नींद नहीं आती है.

शोभा की समस्या जायज तो है, पर सवाल उठता है कि क्या बढ़ती उम्र में सैक्स सुख लिया जा सकता है? अगर पतिपत्नी में से कोई एक बिस्तर पर गरमी न दिखाए, तो दूसरे पार्टनर को क्या करना चाहिए? अगर पति ही पत्नी से दूरी बनाने लगे, तो पत्नी को क्या करना चाहिए?

सच तो यह है कि बढ़ती उम्र का सैक्स लाइफ से कुछ लेनादेना नहीं है. अगर पत्नी मन से तैयार नहीं होती है, तो पति का फर्ज बनता है कि पहले वह उस की बात सुने और उसे समझाए कि सैक्स को ले कर उस की उदासीनता तन से कम, बल्कि मन से ज्यादा है.

बहुत सी बार पत्नी घरेलू जिंदगी में इतनी ज्यादा उलझ कर रह जाती है कि बढ़ती उम्र उस के मन पर छा जाती है. अगर वह कामकाजी नहीं है, तो समस्या और ज्यादा बड़ी हो जाती है. पति को चाहिए कि वह उसे कहीं बाहर घुमाने ले जाए. यह एक तरह का दूसरा हनीमून कहा जाएगा, जहां पतिपत्नी अपने पुराने रोमांस को दोबारा हासिल कर सकते हैं.

किसी औरत को बढ़ती उम्र के साथ ज्यादा ही थकान रहने लगती है, तो वह डाक्टर की सलाह पर थायराइड और ब्लड सैल काउंट टैस्ट करा सकती है. अकसर बच्चे के जन्म या मेनोपौज के बाद औरतों में थायराइड की समस्या हो जाती है. ब्लड सैल काउंट टैस्ट से शरीर के अंदर खून की कमी के बारे में पता चल जाता है. फिर बीमारी के हिसाब से उस का इलाज शुरू किया जा सकता है.

अब मर्दों की बात करते हैं. उम्र बढ़ने के साथसाथ बहुत से मर्दों में जल्दी पस्त होने का डर मन में बैठ जाता है. अगर पति और पत्नी में उम्र का फर्क ज्यादा है, तो यह समस्या और ज्यादा बढ़ सकती है. अंग में पूरा तनाव न होना या संबंध बनाते समय अंग में जलन होना भी मर्दों को सैक्स से दूर करने लगता है.

इतना ही नहीं, ब्लड प्रैशर और डायबिटीज जैसी बीमारियां भी मर्दाना ताकत पर बुरा असर डालती हैं. काम का तनाव भी उन्हें बिस्तरबाजी से दूर करने की वजह बनता है.

50 साल की उम्र के बाद मर्दों में भी मेनोपौज जैसी समस्या उभर सकती है, जिसे एंड्रोपौज कहते हैं. इस में उम्र बढ़ने के साथसाथ उन में टैस्टोस्टैरोन की कमी होने लगती है. तो फिर इस सब का हल क्या है?

इस का हल है खुद पर उम्र को हावी न होने देना. रात को बिस्तर पर पतिपत्नी दिनभर की बोर कर देनी वाली बातें भूल जाएं और उन पलों को भरपूर जिएं. अपने खानपान का खास खयाल रखें. रात का भोजन हलका ही रखें और जल्दी खा लें. अगर दोनों के पास समय है, तो सुबह एकसाथ कसरत करें.

रात को बिस्तर पर जाने का मतलब यह नहीं होता कि बढ़ती उम्र में रोजाना सैक्स होगा ही, पर कपड़े ऐसे पहनें जो एकदूसरे को लुभाने वाले हों. रात को नहाने से शरीर की सुस्ती और बदबू दूर हो जाती है, तनाव भी दूर रहता है. ऐसा कर के आप एकदूसरे की बांहों में खो सकते हैं.

याद रखें कि अंगूर तो खट्टे भी निकल सकते हैं, पर किशमिश हमेशा मीठी ही होती है. बढ़ती हुई जिंदगी को किशमिश समझ कर स्वीकार करना चाहिए और पतिपत्नी को उम्र के इस पड़ाव पर अपने जिस्मानी रिश्ते का लुत्फ उठाना चाहिए.

अगर फिर भी जोश में कोई कमी है, तो डाक्टर से सलाह जरूर लें. बाजार में भी जोश बढ़ाने वाले तमाम साधन मौजूद हैं.

 

सैक्स ऐजुकेशन का कमाल खुशहाल रहें नौनिहाल

यह बेहद आसान होता जा रहा है कि गलत समझ या बिना समझ के बच्चे सैक्स से जुड़ी कुंठा में फंस जाते हैं और बहुत बार कुछ ऐसा करने पर मजबूर हो जाते हैं, जो उन्हें मानसिक तनाव में धकेल देता है. दूसरी ओर बहुत से बच्चे किसी घटिया इनसान द्वारा काफी देर तक अपने साथ होने वाले बुरे बरताव को बरदाश्त करते रहते हैं.

इसी सब्जैक्ट पर बनी एक बेहतरीन फिल्म ‘ओएमजी 2’ आप को यह समझाती है कि इस मुद्दे पर बात करना और इस के साथ ऐजूकेशन सिस्टम में सैक्स ऐजूकेशन पर बात करना कितना जरूरी है.

बातबात पर लोग बच्चों में अपराधबोध पैदा करते हैं. बच्चों को यह तो बताया जाता है कि वह गलत है, पर यह नहीं बताया जाता कि सही क्या है? बिना यह समझे कि उन्हें सही और गलत समझाएगा कौन.

बढ़ते अपराधों के बीच सुधार पर कोई भी काम को छोड़ आजकल अधिकतर लोग पौक्सो ऐक्ट लगा कर ज्यादातर बच्चों को अपराधी बना कर जेल में डाल देना चाहते हैं.

‘ओएमजी-2’ इन सभी सवालों पर बात करती एक उम्दा फिल्म है, जिसे पूरे परिवार के साथ देखना चाहिए. मगर ‘ओएमजी-2’ एडल्ट सर्टिफिकेट के साथ रिलीज हुई है. सैंसर बोर्ड ने ऐसा करने से पहले क्या सोचा होगा, यह समझना मुश्किल है, जबकि फिल्म अपनेआप में यह जवाब देती है कि समाज ने कैसे इस सब्जैक्ट पर बात करने को भी टैबू बना दिया है.

हमें यह समझना होगा कि बच्चे पर सवाल उठाने की जगह उसे समझना और सही शिक्षा देना समाज के लिए ज्यादा कारगर होगा. ऐसे सब्जैक्ट पर अगर कोई फिल्म आती है तो वह हमारे समाज की जरूरतों को सही दिशा में दिखाने की कोशिश करती है.

दरअसल, भारत में सैक्स ऐजूकेशन की शुरुआत होने के बाद भी इस पर बहुत काम करना बाकी है. आज भी बच्चो में इस सब्जैक्ट की समझ बहुत ज्यादा नहीं बढ़ पाई है, जिस की बड़ी वजह इस पर परिवार, समाज और सभी स्कूलों में अभी भी बच्चों के साथ खुल कर बातचीत नहीं होती है और न ही उन की जरूरतों को समझने की कोशिश ही की जा रही है.

जिस तरह औरतों और बच्चों के साथ होने वाले अपराधों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है, ऐसे में सामाजिक रूप से हमें यह समझने की जरूरत है कि यह हो क्यों रहा है? एनसीआरबी की साल 2022 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, बच्चों के खिलाफ अपराध से संबंधित कुल 1,49,404 मामले दर्ज किए गए थे, जबकि साल 2021 में 1,28,531 मामले दर्ज किए गए, जो 16.2 फीसदी की बढ़ोतरी है.

किसी बच्चे के खिलाफ हर तीसरा अपराध पौक्सो अधिनियम के तहत दर्ज किया गया था, वहीं महिलाओं के खिलाफ अपराध की दर (प्रति 1 लाख जनसंख्या पर घटनाओं की संख्या) में बढ़ोतरी हुई है और साल 2022 में 4,28,278 मामले दर्ज किए थे.

बैन हल नहीं एक न्यूज रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में बच्चे कम उम्र में ही पोर्नोग्राफी के संपर्क में आ रहे हैं. पहली बार पोर्नोग्राफी के संपर्क में आने की औसत उम्र 13 साल है. पोर्न साइटों को ब्लौक करने की कोशिशों के बावजूद इस में बढ़ोतरी जारी है और ऐसे बैन ने अनजाने में ही बच्चों की जिज्ञासा बढ़ा दी है.

माहिरों की मानें, तो जो बच्चे पारिवारिक टूट का शिकार ज्यादा होते हैं, उन में पोर्नोग्राफी की लत लगने का खतरा ज्यादा होता है.

इस के अलावा खराब पारिवारिक माहौल बच्चों को पोर्न की लत की ओर ले जाने में खास रोल निभाता है.

अपने ही कर रहे जुल्म इस के अलावा ये बच्चे किसी भी अनहोनी का आसान शिकार भी होते हैं. जो लोग बच्चों को टारगेट करना चाहते हैं, वे ऐसे मौकों का फायदा उठाने में पीछे नहीं हटते हैं, जहां कोई बच्चा पारिवारिक टूट का शिकार हो रहा हो या वह किसी मानसिक तनाव से गुजर रहा हो, जिसे उस के आसपास के करीबी लोग अनदेखा कर रहे हों.

हम सब बहुत सी ऐसी खबरें पढ़ते हैं, जिन में बच्चों को गलत तरीके से बहला कर कोई उन के साथ शोषण करता है या उन में पोर्नोग्राफी की लत लगा कर उन का वीडियो बना कर वायरल कर देता है और यह सब होना कोई भी बच्चा जिंदगीभर भूल नहीं पाता है.

क्यों जरूरी है सैक्स ऐजूकेशन

साल 2007 में भारत सरकार ने किशोर शिक्षा कार्यक्रम की शुरुआत की थी. इस का लगातार विरोध होता रहा था. कुछ राज्यों ने तो इस पर बैन लगा दिया था. इस के बावजूद भी यह कार्यक्रम कुछ चुनिंदा सरकारी और निजी स्कूलों में लागू किया गया.

हालांकि अब यह समझने की जरूरत है कि इस सब्जैक्ट से हिचकिचाने से काम नहीं चलेगा. अगर बच्चों को सही यौन शिक्षा नहीं दी गई, तो लिंग से जुड़ी हिंसा, गैरबराबरी, अनचाहा गर्भधारण, एचआईवी और दूसरे यौन संचारित संक्रमण बढ़ते जाएंगे और उन्हें रोकना मुश्किल हो जाएगा. ऐसे में जरूरी है कि स्कूल में सिर्फ टीचर ही नहीं,बल्कि मातापिता भी झिझक को दूर रख कर अपने बच्चे से इस सब्जैक्ट पर बात करें.

जब बचपन से जवानी में कदम रखते हैं, तो बहुत से नौजवानों को रिश्तों और सैक्स के बारे में भ्रमित और गलत जानकारी होती है. इसी वजह से पुख्ता जानकारी की मांग बढ़ी है, जो उन्हें एक अच्छी जिंदगी के लिए तैयार करता है.

लिहाजा, यह जरूरी है कि परिवार और समाज के साथ स्कूलों में बच्चों के लिए उन की उम्र के मुताबिक शैक्षिक सामग्री तैयार करने और पाठ्यक्रम के साथ नौजवानों को शामिल किया जाए.

कुछ नागरिक समाज और संगठनों ने इस क्षेत्र में बहुत अच्छा काम किया है. उन की पहचान की जानी चाहिए और उन्हें स्कूलों में सभी श्रेणियों के छात्रों और शिक्षकों के साथ काम करने के लिए बढ़ावा दिया जाना चाहिए. अगर उन्हें समयसमय पर ब्रीफिंग मिले और कार्यशालाओं से गुजरना पड़े, तो वे ज्यादा असरदार होंगे.

इस के साथ ही यह याद रखने की भी जरूरत है कि भारत साल 1994 में जनसंख्या और विकास पर संयुक्त राष्ट्र अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का एक हस्ताक्षरकर्ता देश होने के नाते उस के तहत की गई प्रतिबद्धताओं के रूप में किशोरों और नौजवानों के लिए मुफ्त और अनिवार्य सैक्स ऐजूकेशन देने के लिए बाध्य है.

अपने शरीर और उस की जरूरतों को समझने के लिए अगर किसी बच्चे को उचित ऐजूकेशन दी जाए, तो वह अपनी बीवी, मां, बहन, बेटी, प्रेमिका को बेहतर समझ पाएगा. जिस हिसाब से बच्चों को मोबाइल और इंटरनैट पर गलत जानकारी और पोर्न देखने को मिल जाता है, अगर वहीं स्कूलों में सही जानकारी दी जाए तो क्या गलत है?

नई तकनीक से उम्मीद : तनाव की कमी

मनोहर की शादी को एक हफ्ता हुआ था. वह रात को अपनी नईनवेली दुलहन के पास जाने से कतरा रहा था. इस की वजह थी उस के अंग में तनाव की कमी और वह सैक्स सुख के सागर में गोते नहीं लगा पा रहा था.

मनोहर अकेला ऐसा नहीं है, जो इस तरह की समस्या से जूझ रहा है. दुनियाभर में ऐसे बहुत सारे मर्द हैं, जो अपने अंग में मनचाहे तनाव की कमी के चलते अपने सैक्स पार्टनर के सामने शर्मिंदगी झेलते हैं. इस की सब से बड़ी वजह है कि हम किस तरह से जिंदगी जी रहे हैं.

अगर कोई बीड़ीसिगरेट ज्यादा पीता है, तो उस के अंग में ढीलापन हो सकता है. साथ ही, जो लोग ज्यादा शराब पीते हैं या कोई और नशा करते हैं, वे भी इस समस्या से दोचार हो सकते हैं.

जरूरत से ज्यादा दिमागी तनाव भी सैक्स लाइफ पर बुरा असर डालता है. अपने काम से जुड़े विचारों को बिस्तर पर लाने से मर्द अपने अंग में तनाव की कमी को बढ़ा सकता है. इतना ही नहीं, बढ़ती उम्र भी इस तकलीफ में इजाफा ही करती है.

इस के लक्षण

* शुरुआत में अंग में तनाव पाने में मुश्किल होना.

* सैक्स के लिए पूरे समय तक तनाव बनाए रखने में नाकाम होना.

* प्रवेश के तुरंत बाद तनाव में कमी.

* मनमुताबिक सैक्स न हो पाना.

* सैक्स में दिलचस्पी की कमी.

* आत्मसम्मान में कमी.

* गुस्सा, चिढ़चिढ़ापन, उदासी का होना, खुद को नामर्द महसूस करना.

अंग में तनाव की कमी के मुद्दे पर जब प्लास्टिक, कौस्मैटिक सर्जन और एंड्रोलौजिस्ट डाक्टर अनूप धीर से बात की गई, तो उन्होंने बताया, ‘‘अंग में तनाव की कमी को इंगलिश में ‘इरैक्टाइल डिस्फंक्शन’ कहते हैं. यह ऐसी आम कंडीशन है, जो दुनियाभर में मर्दों को प्रभावित करती है और इस की वजह से उन की जिंदगी की क्वालिटी के साथसाथ रिलेशनशिप भी बिगड़ती है.

‘‘इरैक्टाइल डिस्फंक्शन ऐसी मैडिकल कंडीशन है, जिस में मर्द सैक्स के लिए जरूरी इरैक्शन (तनाव) को हासिल करने या उसे बनाए रखने में नाकाम होता है. यह कई बार किसी शारीरिक या मनोवैज्ञानिक वजह के चलते होता है और आमतौर पर 40 साल से ज्यादा उम्र के लोगों को प्रभावित करता है. लेकिन ऐसा जरूरी नहीं है, क्योंकि यह समस्या किसी भी उम्र के मर्दों को अपना शिकार बना सकती है.

‘‘दिक्कत यह है कि इस समस्या से पीडि़त कई लोग शर्मिंदगी या संकोच के चलते इलाज कराने की पहल भी नहीं करते हैं. लिहाजा, उन के रिश्ते लगातार बिगड़ते रहते हैं. पर अगर समस्या है, तो उस का हल भी है.

‘‘हालांकि इरैक्टाइल डिस्फंक्शन के लिए फास्फोडिस्टेरेज (पीडीई5) 5 इंहिबिटर्स के साथ ओरल फार्मोकोथैरेपी ही अभी तक प्रमुख इलाज मानी जाती रही है, लेकिन इस समस्या का सामना कर रहे मर्दों को बेहतर समाधान देने के लिए नए उपायों की तलाश लगातार जारी है.

‘‘ऐसा ही एक नया उपाय है टौपिकल जैल इरौक्सौन, जो अंग में तनाव की कमी से जूझ रहे मर्दों के लिए अच्छे नतीजे दिला रहा है.

‘‘फूड ऐंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन यानी एफडीए द्वारा स्वीकृत इरौक्सौन एक ऐसा टौपिकल जैल है, जो इरैक्टाइल की समस्या से जूझ रहे मर्दों के लिए उम्मीद की नई किरण है. इस जैल को सैक्स करने से ठीक पहले अंग के मुख पर सीधे लगा सकते हैं.

‘‘स्टडी से यह बात सामने आई है कि इरौक्सौन का इस्तेमाल करने वाले 65 फीसदी मर्दों ने 10 मिनट के भीतर इरैक्शन महसूस किया और वे सैक्स करने के लिए जरूरी इरैक्शन (तनाव) को बरकरार रख सके.

‘‘फिलहाल इसे एक क्रीम (विटारौस/विरिरेक) के तौर पर भी दिया जाता है, जिस में अंग के सक्रिय भाग पर ऐक्टिव दवा (एल्प्रोस्टेडिल, जो सिंथैटिक प्रोस्टाग्लैंडिन ई1 है) के तौर पर स्किन एन्हान्सर के साथ इस्तेमाल किया जाता है.

‘‘याद रहे कि दिल से जुड़ी बीमारी और डायबिटीज को अंग में तनाव संबंधी दोष का प्रमुख कारण माना जाता है, इसलिए ईडी संबंधी लक्षणों के दिखाई देने पर इन रोगों के लक्षणों पर गौर करें और डाक्टर से मिल कर जरूरी मैडिकल सलाह लें.

‘‘नियमित रूप से अपनी सेहत की जांच करवाएं, ब्लड प्रैशर पर नजर रखें और डायबिटीज की जांच करवाएं, ताकि ईडी के इन संभावित कारणों का पता लगा कर इन का समय पर इलाज किया जा सके.

‘‘इरैक्टाइल डिस्फंक्शन (ईडी) के उपचार के लिए इरौक्सौन नया टौपिकल जैल है, जो अंग में तनाव की समस्या, इस के उपचार और प्रबंधन के तौरतरीकों में क्रांति कर सकता है.

‘‘इरौक्सौन को अमेरिका में स्वीकृति मिल चुकी है और फिलहाल यह ब्रिटेन में भी उपलब्ध है. हालफिलहाल भारत में यह नहीं मिलता है, लेकिन जल्द ही भविष्य में यह उपलब्ध हो सकता है. यह अंग में तनाव लाने में क्रांतिकारी कदम साबित हो सकता है.

‘‘इस के अलावा अंग में तनाव लाने का एक और तरीका है, जिसे लिंग प्रत्यारोपण यानी पेनाइल इंप्लांट कहते हैं. यह एक ऐसा उपकरण है, जिसे आपरेशन द्वारा मर्दाना अंग के अंदर रखा जाता है, ताकि कम इरैक्शन वाले मर्दों को सही इरैक्शन मिल सके. ईडी के लिए दूसरे इलाज नाकाम होने के बाद आमतौर पर पेनाइल इंप्लांट की सिफारिश की जाती है.

‘‘पेनाइल इंप्लांट के 2 खास प्रकार हैं, अर्धकठोर और फुलाने लायक. हर तरह का पेनाइल इंप्लांट अलग तरीके से काम करता है और इस के अलगअलग फायदे और नुकसान हैं. यह अंग में तनाव की कमी के लिए आखिरी इलाज माना है. जब दूसरे इलाज खासतौर पर डायबिटीज वाले मर्दों में इलाज नाकाम हो जाते हैं, तब पेनाइल इंप्लांट किया जाता है.

‘‘अंग में तनाव की कमी की समस्या में एक और उम्मीद भरा जो तरीका दिख रहा है, वह शौकवेव थैरेपी है, जहां ईडी में सुधार के लिए अल्ट्रासाउंड तरंगों का इस्तेमाल किया जाता है.’’

4 साल पहले मैने बौयफ्रेंड के साथ सेक्स किया था, क्या मेरे पति को इस बात का पता चल सकता है?

सवाल

मैं 25 वर्षीय अविवाहित युवती हूं. इसी वर्ष के अंत तक घर वाले मेरी शादी कर देना चाहते हैं. मैं बहुत परेशान हूं, क्योंकि कालेज के दिनों में मेरे बौयफ्रैंड ने मुझे बरगला कर एक बार शारीरिक संबंध बना लिया था. उस के बाद मैं ने उस से सारे संबंध तोड़ लिए. इस बात को 4 साल हो चुके हैं. मैंने सुना है कि सुहागरात को ही पति को ज्ञात हो जाता है कि लड़की का कौमार्य भंग हो चुका है. यदि ऐसा हुआ और पति ने मुझे अपमानित कर के छोड़ दिया तो क्या होगा? इस से तो अच्छा यही होगा कि मैं शादी ही न करूं? पर घर वालों से क्या कहूं कि मैं शादी क्यों नहीं करना चाहती? बड़ी उलझन में हूं. बताएं क्या करूं?

जवाब

अतीत में आप के साथ जो हुआ उसे भूल जाएं. कौमार्य या शील भंग जैसे शब्द आज बेमानी हो गए हैं. आप जब तक अपने मुंह से नहीं कहेंगी आप के भावी पति नहीं जान पाएंगे कि आप का किसी से संबंध बन चुका है. सुनीसुनाई बातों पर ध्यान न दें और भविष्य की सुखद कल्पना करें. सब अच्छा होगा. जरूरी है विवाह के बाद पतिपत्नी का एकदूसरे पर विश्वास हो. रिश्तों को ईमानदारी से निभाएंगे तो कोई समस्या नहीं होगी.

इस उम्र में बढ़ती जाती है सेक्स की इच्छा

60 साल से अधिक उम्र के बुजुर्ग यौन संबंध बनाने को लेकर ज्यादा इच्छुक रहते हैं. हालिया शोध में यह बात सामने आई है. अध्ययन के प्रमुख लेखक डॉ. क्रिस्टीन मिलरोड द्वारा किए गए शोध के मुताबिक, 60 की उम्र लांघने के बाद बुजुर्ग यौन संबंध बनाते वक्त अनिवार्य सुरक्षा लेना भी जरूरी नहीं समझते.

पैसे देकर यौन संबंध बनाने वाले 60 से 84 वर्ष के बुजुर्गो में यह देखने को मिला है कि जैसे-जैसे उम्र बढ़ती जाती है, उनकी यौन संबंध बनाने की इच्छा भी बढ़ती जाती है. वे बार-बार यौन संबंध बनाने के लिए पैसे खर्च करते हैं. वे ज्यादा से ज्यादा बार अपने पेड-पार्टनर के साथ असुरक्षित यौन संबंध बनाने के इच्छुक रहते हैं.

मिलरोड के मुताबिक, लोगों के बीच यह आम धारणा है कि बुजुर्गो में यौन संबंध बनाने के प्रति रुचि कम हो जाती है और वे रुपये खर्च कर संबंध बनाने के लिए साथी की तलाश नहीं करते हैं. परन्तु यह सही नहीं है. युवाओं के मुकाबले बुजुर्ग अपने पेड पार्टनर के साथ संबंध बनाते वक्त कम से कम एहतियात बरतने का प्रयास करते हैं.

डॉक्टर क्रिस्टीन मिलरोड व पोर्टलैंड विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र के प्रोफेसर मार्टिन मोंटो ने 60 से 84 वर्ष की उम्र के बीच के उन 208 बुजुर्गो पर यह सर्वेक्षण किया, जो पैसे देकर यौन सबंध बनाते हैं. अध्ययन के दौरान पाया गया कि 59.2 प्रतिशत बुजुर्ग ऐसे हैं, जो हमेशा सबंध बनाते वक्त कंडोम का इस्तेमाल करना जरूरी नहीं समझते. करीब 95 प्रतिशत बुजुर्ग हस्तमैथुन करते वक्त सुरक्षा नहीं बरतते. जबकि 91 प्रतिशत मुखमैथुन के दौरान सुरक्षा लेना जरूरी नहीं समझते.

31.1 प्रतिशत बुजुर्गों ने बताया कि जीवन काल के दौरान वे यौन संक्रमण का शिकार हुए, जबकि 29.2 प्रतिशत लोगों ने बताया कि वे अपनी पसंदीदा पेड पार्टनर के साथ बार-बार संबंध बनाते हैं.

मिलरोड और मोंटो ने यह सलाह दी कि स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े लोग बुजुर्गो में संक्रमण संबंधित बीमारी का इलाज करते वक्त उनके पार्टनर के बारे में जरूर पूछें और उनसे सुरक्षित यौन संबंध बनाने के तरीकों के बारे में बताएं. चिकित्सकीय एवं मानसिक स्वास्थ्य केंद्रों को यह कभी भी मान कर नहीं चलना चाहिए कि व्यक्ति बुजुर्ग है, तो वह पेड-संबंध नहीं बनाएगा.

मेरा बेटा जो भी याद करता है उसे कुछ ही देर में भूल जाता है, मैं क्या करूं?

सवाल

मेरा बेटा 10 साल का है और 5वीं क्लास में पढ़ताहै. दिक्कत यह है कि वह जो भी याद करता है, उसे कुछ ही देर में भूल जाता है. इस समस्या का क्या हल हो सकता है?

जवाब

बच्चे कई बार होमवर्क करना भूल जाते हैं और यह पूरी तरह सामान्य है. इसी तरह वे क्लासरूप में दिन में बैठेबैठे सपनों की दुनिया में खो सकते हैं या खाने की मेज पर बेचैन हो सकते हैं. लेकिन साथ ही, एकाग्रता में कमी, आवेश से भरा होना और हाइपरएक्टिविटी जैसे लक्षण बच्चों में अटैंशन डैफिसिट डिसऔर्डर की निशानी भी हो सकते हैं. एकाग्रता में कमी और आनाकानी करना इस बात का लक्षण हो सकता है कि बच्चे को एकाग्र होने में परेशानी है. उस का ध्यान जरा-जरा सी बात पर बंट जाता है या वह काम पूरा होने से पहले ही उस से बोर हो जाता है.

बच्चे को पढ़ने के लिए सही माहौल व जगह दें. आप को अपने भुलक्कड़ बच्चे को शोरशराबा या टैलीविजन से दूर रखना होगा. वह जगह आरामदायक होनी चाहिए ताकि बच्चा बेचैन न हो. किसी मनोवैज्ञानिक से भी सलाह ले सकते हैं.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz
 
सब्जेक्ट में लिखे…  सरस सलिल- व्यक्तिगत समस्याएं/ Personal Problem

 

खुशहाल सेक्स लाइफ यानी खुशियों का खजाना

सफल सेक्स जीवन सचमुच खुशियों का खजाना है. यह बात सिर्फ मनोविद ही नहीं कहते बल्कि शरीर विज्ञानी भी इस सच्चाई की तस्दीक करते हैं. सेक्स हमारे लिए फायदेमंद क्यों हैै यह जानना किसी रहस्य को उद्घाटित करना नहीं है बल्कि सहज और खुशियों से भरी जिंदगी को जीना है.

सेक्स एक अद्भुत अनुभूति है, जो न सिर्फ हमें मानसिक रूप से मजबूत बनाती है, बल्कि कई रोगों से भी हमारा बचाव करती है. यदि लोग इस तथ्य को समझ जाएं तो समाज की बहुत-सी समस्याएं हल हो सकती हैं साथ ही लोगों में एक सकारात्मक ऊर्जा संचरित हो उसका इस्तेमाल रचनात्मक कार्यों में किया जा सकता है.

सेक्स पति-पत्नी के रिश्ते की प्रगाढ़ता का आईना है. यदि सेक्स-जीवन अच्छा है तो जाहिर है पूरा दांपत्य-जीवन भी सुखी होगा और जब दांपत्य-जीवन सुखमय होगा तो उसका सकारात्मक प्रभाव जीवन के हर क्षेत्र पर पड़ेगा. क्योंकि सेक्स एक बहुत बड़ा -स्ट्रेस रिलीवर’ है. शरीर में तनाव पैदा करने वाले जो हार्मोंस होते हैं, सेक्स के जरिए उनका स्तर काफी हद तक कम हो जाता है और व्यक्ति तनावमुक्त हो जाता है. इसके अलावा तनाव से होनेवाली बीमारियों से भी वह बचा रहता है. जैसे सोरायसिस, अस्थमा, उच्च रक्तचाप आदि.

सेक्स एक बेहतरीन व्यायाम भी है. खासतौर से हृदय के लिए यह एक अच्छा व्यायाम साबित होता है. शोधों से यह साबित हो चुका है कि जिन लोगों के सेक्स-संबंध अच्छे व सामान्य होते हैं, उनमें हार्ट-अटैक की संभावना बहुत कम हो जाती है क्योंकि सेक्स की क्रिया कार्डियो पल्मोनरी एक्सरसाइज के समान ही होती है जिससे रक्त संचारण अच्छा होता है तथा धमनियों में कोलेस्ट्राॅल भी नहीं जमता. सेक्स को जितना शारीरिक फायदा है उतना ही मानिसक फायदा भी है.

सेक्स साथी की नज़दीकी से अकेलेपन की भावना दूर होती है और मन प्रफुल्लित रहता है. सेक्स के दौरान या उससे पहले जो ‘फोर प्ले’ होता है, वह रक्तसंचार में वृद्धि कर वही लाभ देता है जो मालिश से मिलता है. अधिकतर पुरुष बिना फोर प्ले के ही अपनी पत्नी से संबंध बना लेते हैं जिससे उनकी पत्नियों को काफी तकलीफ होती है, क्योंकि पुरुष सेक्स के लिए जल्दी तैयार हो जाते हैं, जबकि स्त्रियां प्यार भरी बातें व स्पर्श को महसूस करकें इस क्रिया के लिए तैयार होती हैं. पर पुरुष इसे समझे बिना यही सोचते हैं कि वे जैसा महसूस करते हैं, उनकी पत्नियां भी वही उत्तेजना महसूस करती होंगी.

इन सबके अलावा जिन लोगों का सेक्स जीवन अच्छा होता है, वे स्वभाव से शांत व खुशमिज़ाज रहते हैं, क्योंकि सेक्स जीवन का असर जीवन के हर क्षेत्र पर पड़ता है. जिसका सेक्स जीवन अच्छा नहीं होता, वे आगे चलकर चिड़चिड़े हो जाते हैं.

फायदों की फेहरिस्त

– अच्छे सेक्स के बाद अच्छी नींद आती है और अच्छी नींद के अपने अनंत फायदे होते हैं.

– उच्च रक्तचाप वालों के लिए भी अच्छा व नियमित सेक्स बहुत फायदेमंद होता है.

– स्वस्थ व सामान्य सेक्स संबंध व्यक्ति के स्वाभिमान तथा आत्मविश्वास को बढ़ाता है. यह आत्मविश्वास जीवन के अन्य क्षेत्रों में बहुत लाभ पहुंचाता है.

– सेक्स ‘माइग्रेन’ की एक बहुत ही अच्छी दवा है. अक्सर शादी से पहले लड़कियां माइग्रेन से पीड़ित होती हैं, इसकी प्रमुख वजह होती है काम-वासना का दमन. इसके अलावा काम-भावना के दमन से और भी कई शारीरिक व मानसिक समस्याएं पैदा हो जाती हैं. जैसे हिस्टीरिया, स्प्लिट पर्सनैलिटी. यदि शादी के बाद सेक्स जीवन अच्छा हो तो इन समस्याओें से दूर-दूर तक वास्ता नहीं पड़ता.

– लड़कियों को मासिक के दौरान पेडू में जो दर्द होता है, वह शादी के बाद सेक्स से दूर हो सकता है, क्योंकि पुरुषों के वीर्य में  ‘प्रोस्टा ग्लैंडिन’ होता है जो एक दर्दनिवारक हार्मोन होता है.

– जो लोग नियमित रूप से सप्ताह में दो बार सेक्स करते हैं, उनके शरीर में इक्यूलोब्यूलिन की मात्रा अधिक पाई जाती है, जो सर्दी से शरीर की सुरक्षा करता है.

– अच्छे सेक्स से फर्टिलिटी भी बढ़ जाती है. यदि आप बच्चा चाहते हैं, तो सेक्स के दौरान पोजीशन बदलते रहें. सेक्स जितना अधिक आनंददायक होता है, पुरुष के शुक्राणु उतने ही फर्टाइल होते हैं.

– सेक्स एक बेहतरीन पेनकिलर होता है. शरीर के किसी भी अंग में दर्द हो और उसी समय आप अच्छे सेक्स का आनंद उठा लें, तो आपका दर्द गायब हो जाएगा.

उदासी, सेक्स का मजा भी किरकिरा कर देती है

वसीम बरेलवी का एक शेर है-हमारे घर का पता पूछने से क्या हासिल / उदासियों की कोई शहरियत नहीं होती. मतलब यह कि उदास होंगे तो कुछ भी अच्छा नहीं लगेगा. उदासी एक ऐसी नकारात्मकता है जो हर चीज को अपने रंग में रंग लेती है . यहां तक कि सेक्स जैसी सनसनाती चाहत भी उदासी के मनोभाव में न सिर्फ फीकी बल्कि जोशहीन हो जाती है. क्योंकि उदासी होती ही इतनी नकारात्मक भावना है . इसलिए उदास हों तो सेक्स करने से बचें क्योंकि उदासी सेक्स का मजा तो किरकिरा कर ही देगी,भविष्य के लिए भी इसके प्रति अरुचि की गांठ बना सकती है.

लेकिन कई बार दांपत्य जीवन में विशेषकर महिलाओं का व्यवहार उदासीनता बढ़ाने वाला होता है. कई स्त्रियां यौनक्रिया आरंभ होने से पूर्व या इसके दौरान भी प्यार का माहौल बनाने  की जगह शिकवे-शिकायतें शुरू कर देती हैं या दूसरी निरर्थक घरेलू बातें ले बैठती हैं.स्त्री का ऐसा व्यवहार पुरुष में सहवास के प्रति उदासीनता भर देती है. उसकी यौनेच्छा कमजोर हो जाती है. पुरुष की भावनाएं पूरी तरह ऊफान पर नहीं आ पातीं. जिस वेग से उसे सहवास करना चाहिए, वह कर नहीं पाता है. ऐसा भी प्रायः देखा गया है कि शिश्न में उत्थान तक नहीं आता या कमजोर होता है. ऐसी स्थितियां बार-बार आने पर पुरुष को सहवास से उदासीनता होने लगती है. संसर्ग से उसका मन उचाट हो जाता है. ऐसी बात नहीं कि स्त्री को ऐसी अवस्था नहीं भुगतनी पड़ती. उपर्युक्त हालात बनने से उसे भी पुरुष से शारीरिक संबंध बनाने में खुशी की बजाय परेशानी होने लगती है. सहवास में उसे भी रुचि नहीं रह जाती. यही अरुचि उसे उदासीनता की अवस्था में ला पटकती है.

स्त्री चाहती है कि उसके शरीर रूपी पुस्तक में, जिसमें अनेकानेक अध्याय हैं, उनके महज पन्ने पलटकर न छोड़ दिये जाएं. वह रोज बदले हुए पुरुष (कहने का मतलब हर बार नये तरीके से) के साथ संबंध बनाने की कामनाओं को अपने मन में समेटे होती है. पुरुष के कई रूपों को देखने की उसे इच्छा होती है. यह तभी संभव हो सकता है, जब उसका पति या प्रेमी हर बार नये तरीके से सहवास करे. अगर आप छोटी-छोटी बातों पर उदास हो जाते हैं तो यह जीवन के प्रति नैराश्य की भावना है और आपके सेक्स व्यवहार के लिए बेहद हानिकारक. उदासी और उत्तेजना एक-दूसरे के जन्मजात शत्रु हैं. उदास रहने वाला व्यक्ति कभी भी बिस्तर पर बहुत सफल नहीं हो पाता . अतः उदासी ओढ़े रखना कतई अच्छा नहीं है.

तनावों को शयनकक्ष से दूर रखें

चूँकि आज तनाव के कारण हैं मसलन- आर्थिक विषमताएं बढ़ गई हैं. हर कोई अपने में फोकस है. जीवन में जबरदस्त प्रतिस्पर्धा है. सवाल है क्या इस तनावों के बीच उदासी से बचा जा सकता है ? क्या इस सबके बीच लरजता हुआ सेक्स करना संभव है. जवाब है नहीं . सेक्स की तो छोड़िये लगातार तनाव में रहने के चलते कई तरह की बीमारियों से भी ग्रस्त हो सकते हैं. मसलन ब्लड प्रेशर का बढ़ना, हृदय रोग, पागलपन तथा कई मानसिक बीमारियां भी निरंतर तनाव में रहने के चलते हो जाती हैं. ऐसे में यह तनाव सहवास के लिए बिल्कुल प्रतिकूल है. यहां तक कि तनाव से ग्रस्त व्यक्ति हस्तमैथुन करके भी पूरी तरह से चैन नहीं पता.

इसीलिए विशेषज्ञ कहते हैं कि तनाव में हों तो सेक्स कभी न करें. क्योंकि तनाव के कारण सहवास को सफलतापूर्वक संपन्न करना संभव नहीं है. ऐसी अवस्था में यौन क्रिया करने से कई गलतफहमियां हो जाएंगी, जो बाद में मानसिक यौन रोग में परिवर्तित हो सकती हैं. इस तथ्य को जान लेना अति आवश्यक है कि अगर मस्तिष्क तनावों से भरा रहेगा तो सेक्स की भावनाएं ही नहीं आयेंगी. इसका मतलब है कि व्यक्ति सेक्स के लिए भावनात्मक रूप से तैयार ही नहीं होगा. ऐसा व्यक्ति पूरी क्षमता से सहवास को सम्पन्न नहीं कर सकता. अगर सहवास क्रिया से शारीरिक और मानसिक संतुष्टि नहीं होती तो इसके अनेक दुष्परिणाम सामने आ सकते हैं. शरीर में थकान का बना रहना भी इसका एक दुष्परिणाम है. इससे स्वभाव में चिड़चिड़ापन आ सकता है. काम में दिल का न लगना मानसिक तनाव का ही कारण है.

तनावमुक्त सहवास को ही एक किस्म की संभोग समाधि कहते हैं. समाधि का अर्थ होता है-सांसारिक तनावों से मुक्त होकर क्रिया करना. यौन की क्रिया को भी तनावों से मुक्त रहकर करना सुखद माना गया है. तनावमुक्त सहवास से व्यक्ति स्वच्छ तथा ताजा हो जाता है. नींद अच्छी से आती है. मस्तिष्क पूर्ण रूप से क्रियाशील बना रहता है. जिस तरह मंदिर के भीतर प्रवेश करने से पूर्व जूते उतारकर पांव साफ किए जाते हैं और फिर भीतर जाया जाता है, ठीक इसी प्रकार रात को शयनकक्ष में पत्नी के पास जाने से पूर्व मानसिक तनावों की गर्द को हटा देना चाहिए. निश्चय ही इससे मनवांछित सुख की प्राप्ति होगी. ऐसा न करने की स्थिति में निश्चित रूप से सहवास में पुरुष को ही विफलता नहीं मिलेगी बल्कि स्त्री को भी संतुष्टि प्राप्त नहीं हो पायेगी.

क्या है जेंडर इक्वैलिटी और ज्यादा सेक्स का संबंध

औस्टेलियाई महिलाओं के औसतन 11 सेक्स पार्टनर्स होते हैं और अमेरिकी महिलाओं के 4. भारतीय महिलाओं का एक ही सेक्स पार्टनर होता है. ये आंकड़े फ्लोरिडा स्टेट यूनिवर्सिटी के रौय बौमीस्टर के अध्ययन को सही साबित करते हैं. उनका अध्ययन, सेक्शुअल इकोनौमिक्स : ए रिसर्च बेस्ड थ्योरी औफ सेक्शुअल इंटरैक्शन और व्हाय दि मैन बायज डिनर, कहता है कि ऐसे देश, जहां लैंगिक समानता (जेंडर इक्वैलिटी) का स्तर ऊंचा है, वहां महिलाओं के एक से अधिक सेक्शुअल पार्टनर्स बनते हैं.

वे जनरल औफ सोशल साइकोलौजी सर्वेइंग में प्रकाशित उस रिसर्च की ओर ध्यान दिलाते हैं, जिसमें 37 देशों के 3 लाख लोगों पर सर्वे करने के बाद पाया गया था कि जिन देशों में लैंगिक समानता का स्तर ऊंचा है, वहां महिलाएं कैशुअल सेक्स में ज्यादा लिप्त थीं. हमने जानने की कोशिश की कि भारतीय महिलाओं के संदर्भ में इसका क्या औचित्य है?

सेक्स, आपूर्ति व मांग से अछूता नहीं है

इस असमानता के पीछे कई सांस्कृतिक और आर्थिक कारण हैं. रौय की थ्योरी कहती है कि (औसतन) महिलाओं की तुलना में पुरुषों में सेक्स की चाहत ज्यादा होती है और रिश्तों में सेक्स तभी संभव है, जब महिला यह चाहे. यहां भी आपूर्ति और मांग का नियम लागू होता है. जिस लिंग का अभाव होता है, उसके पास शक्ति होती है. ‘‘यदि महिलाओं के पास खुद पैसे कमाने के ज्यादा अवसर नहीं हैं तो वे सेक्स को बहुत मूल्यवान बनाए रखना चाहेंगी, क्योंकि सेक्स ही वह मुख्य चीज है, जो वे किसी पुरुष को दे सकती हैं,’’ रौय कहते हैं.

पुरुषों के लिए महिलाओं की सेक्शुएलिटी की बहुत अहमियत होती है; एक पुरुष जिसे किसी महिला से सेक्स की जरूरत है, उसे इसके बदले में उस महिला को कोई मूल्यवान चीज देनी होगी, जैसे-विवाह का प्रस्ताव. ‘‘ऐसे देश, जहां महिलाओं की दशा अच्छी नहीं है, महिलाएं सेक्स पर अंकुश रखती हैं, ताकि इसका मूल्य ऊंचा रहे और पुरुष सेक्स पाने के लिए ताउम्र प्रतिबद्घता का वचन दें,’’ रौय कहते हैं. ‘‘और पुरुष सेक्स के लिए कुछ भी कर सकते हैं.’’

साइकोलौजिस्ट की राय में

साइकोलौजिस्ट डा. छवि खन्ना रौय के निष्कर्षों से पूरी तरह सहमत हैं. ‘‘अध्ययन बताते हैं कि जहां लैंगिक समानता का स्तर ऊंचा है, वहां महिलाएं वर्जनाओं को तोड़ती हैं और वहां के सामाजिक नियम भी सेक्शुअल गतिविधियों को प्रतिबंधित नहीं करते. ऐसे समाज में महिलाएं कैशुअल सेक्स में लिप्त भी रहती हैं और उन्हें सेक्स संबंधों का पहला अनुभव भी अपेक्षाकृत कम उम्र में हो जाता है,’’ यह बताते हुए वे कहती हैं, ‘‘लैंगिक समानता से महिलाओं को अपनी सेक्शुएलिटी को अपनी इच्छा के अनुसार व्यक्त करने का अवसर मिलता है.’’

आम लोगों की राय में

इन्वेस्टमेंट बैंकर, प्रिया नायर, 28, कहती हैं कि मेरी परवरिश ऐसे परिवार में हुई है, जहां महिलाओं को बिल्कुल बराबरी के अधिकार मिलते हैं. उन्हें हमेशा से पता था कि उनकी इच्छाओं को उतना ही महत्व मिलेगा, जितना किसी पुरुष की इच्छा को मिलता. ‘‘इस अध्ययन के बारे में जानकर मुझे लगता है कि, क्योंकि मैं आत्मनिर्भर और बुद्घिमान हूं इसलिए मेरे पास पुरुष को देने के लिए सेक्स के अलावा भी बहुत कुछ है,’’ वे कहती हैं. ‘‘इसका ये भी मतलब है कि मैं इतनी आत्मविश्वासी और खुले विचारों की हूं कि किसी पुरुष को ये बता सकती हूं कि मैं क्या चाहती हूं.’’

वहीं मीडिया कंसल्टेंट, पुरंजय मेहता, 26, का मानना है कि भारत के संदर्भ में ये अध्ययन केवल शहरों के लिए सही है. ‘‘जब महिलाएं आत्मविश्वास के साथ अपनी सेक्शुएलिटी का अन्वेषण करती हैं, तब उनके ज्यादा सेक्शुअल पार्टनर्स बनते हैं. ऐसा छोटे कस्बों की युवतियों के साथ नहीं होता, क्योंकि उन्हें अब भी पारंपरिक, लैंगिक असमानता वाले मूल्यों के साथ परवरिश मिलती है.’’

वहीं साइकोलौजिस्ट डा. सोनाली गुप्ता रोहित की बातों से सहमत हैं. ‘‘यह सच है कि शहरों में लैंगिक समानता ज्यादा होती है और महिलाएं जो पाना चाहती हैं, खुलकर उसे पाने का प्रयास करती हैं,’’ वे कहती हैं. ‘‘मैं उनके एक से अधिक सेक्शुअल पार्टनर्स होने के बारे में तो नहीं कह सकती, पर ये जरूर कह सकती हूं कि ऐसी महिलाओं के साथ सेक्स एक आनंददायक प्रक्रिया होती है, क्योंकि उन्हें पता होता है कि उन्हें क्या चाहिए.’’

उम्र के साथ ऐसे बदलता है सेक्स बिहेवियर

शादीशुदा जिंदगी में दूरियां बढ़ाने में सेक्स का भी अहम रोल होता है. अगर परिवार कोर्ट में आए विवादों की जड़ में जाएं तो पता चलता है कि ज्यादातर झगड़ों की शुरुआत इसी को ले कर होती है. बच्चों के बड़े होने पर पतिपत्नी को एकांत नहीं मिल पाता. ऐसे में धीरेधीरे पतिपत्नी में मनमुटाव रहने लगता है, जो कई बार बड़े झगड़े का रूप भी ले लेता है. इस से तलाक की नौबत भी आ जाती है. विवाहेतर संबंध भी कई बार इसी वजह से बनते हैं.

मनोचिकित्सक डाक्टर मधु पाठक कहती हैं, ‘‘उम्र के हिसाब से पति और पत्नी के सेक्स का गणित अलगअलग होता है. यही अंतर कई बार उन में दूरियां बढ़ाने का काम करता है. पतिपत्नी के सेक्स संबंधों में तालमेल को समझने के लिए इस गणित को समझना जरूरी होता है. इसी वजह से पतिपत्नी में सेक्स की इच्छा कम अथवा ज्यादा होती है. पत्नियां इसे न समझ कर यह मान लेती हैं कि उन के पति का कहीं चक्कर चल रहा है. यही सोच उन के वैवाहिक जीवन में जहर घोलने का काम करती है. अगर उम्र को 10-10 साल के गु्रपटाइम में बांध कर देखा जाए तो यह बात आसानी से समझ आ सकती है.’’

शादी के पहले

आजकल शादी की औसत उम्र लड़कियों के लिए 25 से 35 के बीच हो गई है. दूसरी ओर खानपान और बदलते परिवेश में लड़केलड़कियों को 15 साल की उम्र में ही सेक्स का ज्ञान होने लगता है. 15 से 30 साल की आयुवर्ग की लड़कियों में नियमित पीरियड्स होने लगते हैं, जिस से उन में हारमोनल बदलाव होने लगते हैं. ऐसे में उन के अंदर सेक्स की इच्छा बढ़ने लगती है. वे इस इच्छा को पूरी तरह से दबाने का प्रयास करती हैं. उन पर सामाजिक और घरेलू दबाव तो होता ही है, कैरियर और शादी के लिए सही लड़के की तलाश भी मन पर हावी रहती है. ऐसे में सेक्स कहीं दब सा जाता है.

इसी आयुवर्ग के लड़कों में सेक्स के लिए जोश भरा होता है. कुछ नया करने की इच्छा मन पर हावी रहती है. उन की सेहत अच्छी होती है. वे हर तरह से फिट होते हैं. ऐसे में शादी, रिलेशनशिप का खयाल उन में नई ऊर्जा भर देता है. वे सेक्स के लिए तैयार रहते हैं, जबकि लड़कियां इस उम्र में अपनी इच्छाओं को दबाने में लगी रहती हैं.

30 के पार बदल जाते हैं हालात

महिलाओं की स्थिति: 30 के बाद शादी हो जाने के बाद महिलाओं में शादीशुदा रिलेशनशिप बन जाने से सेक्स को ले कर कोई परेशानी नहीं होती है. वे और्गेज्म हासिल करने के लिए पूरी तरह तैयार होती हैं. महिलाएं कैरियर बनाने के दबाव में नहीं होती. घरपरिवार में भी ज्यादा जिम्मेदारी नहीं होती. ऐसे में सेक्स की उन की इच्छा पूरी तरह से बलवती रहती है. बच्चों के होने से शरीर में तमाम तरह के बदलाव आते हैं, जिन के चलते महिलाओं को अपने अंदर के सेक्सभाव को समझने में आसानी होती है. वे बेफिक्र अंदाज में संबंधों का स्वागत करने को तैयार रहती हैं.

पुरुषों की स्थिति: उम्र के इसी दौर में पति तमाम तरह की परेशानियों से जूझ रहा होता है. शादी के बाद बच्चों और परिवार पर होने वाला खर्च, कैरियर में ग्रोथ आदि मन पर हावी होने लगता है, जिस के चलते वह खुद को थका सा महसूस करने लगते हैं. यही वह दौर होता है जिस में ज्यादातर पति नशा करने लगते हैं. ऐसे में सेक्स की इच्छा कम हो जाती है.

महिला रोग विशेषज्ञा, डाक्टर सुनीता चंद्रा कहती हैं, ‘‘हमारे पास बांझपन को दूर करने के लिए जितनी भी महिलाएं आती हैं उन में से आधी महिलाओं में बांझपन का कारण उन के पतियों में शुक्राणुओं की सही क्वालिटी का न होना होता है. इस का बड़ा कारण पति का मानसिक तनाव और काम का बोझ होता है. इस के कारण वे पत्नी के साथ सही तरह से सेक्स संबंध स्थापित नहीं कर पाते.’’

नौटी 40 एट

40 के बाद की आयुसीमा एक बार फिर शारीरिक बदलाव की चौखट पर खड़ी होती है. महिलाओं में इस उम्र में हारमोन लैवल कम होना शुरू हो जाता है. उन में सेक्स की इच्छा दोबारा जाग्रत होने लगती है. कई महिलाएं अपने को बच्चों की जिम्मेदारियों से मुक्त पाती हैं, जिस की वजह से सेक्स की इच्छा बढ़ने लगती है. मगर यह बदलाव उन्हीं औरतों में दिखता है जो पूरी तरह से स्वस्थ रहती हैं. जो महिलाएं किसी बीमारी का शिकार या बेडौल होती हैं, वे सेक्स संबंधों से बचने का प्रयास करती हैं.

40 प्लस का यह समय पुरुषों के लिए भी नए बदलाव लाता है. उन का कैरियर सैटल हो चुका होता है. वे इस समय को अपने अनुरूप महसूस करने लगते हैं. जो पुरुष सेहतमंद होते हैं, बीमारियों से दूर होते हैं वे पहले से ज्यादा टाइम और ऐनर्जी फील करने लगते हैं. उन के लिए सेक्स में नयापन लाने के विचार तेजी से बढ़ने लगते हैं.

50 के बाद महिलाओं में पीरियड्स का बोझ खत्म हो जाता है. वे सेक्स के प्रति अच्छा फील करने लगती हैं. इस के बाद भी उन के मन में तमाम तरह के सवाल आ जाते हैं. बच्चों के बड़े होने का सवाल मन पर हावी रहता है. हारमोनल चेंज के कारण बौडी फिट नहीं रहती. घुटने की बीमारियां होने लगती हैं. इन परेशानियों के बीच सेक्स की इच्छा दब जाती है.

इस उम्र के पुरुषों में भी ब्लडप्रैशर, डायबिटीज, कोलैस्ट्रौल जैसी बीमारियां और इन को दूर करने में प्रयोग होने वाली दवाएं सेक्स की इच्छा को दबा देती हैं. बौडी का यह सेक्स गणित ही पतिपत्नी के बीच सेक्स संबंधों में दूरी का सब से बड़ा कारण होता है.

डाक्टर मधु पाठक कहती हैं, ‘‘ऐसे में जरूरत इस बात की होती है कि सेक्स के इस गणित को मन पर हावी न होने दें ताकि सेक्स जीवन को सही तरह से चलाया जा सके.’’

रिलेशनशिप में सेक्स का अपना अलग महत्त्व होता है. हमारे समाज में सेक्स पर बात करने को बुरा माना जाता है, जिस के चलते वैवाहिक जीवन में तमाम तरह की परेशानियां आने लगती हैं. इन का दवाओं में इलाज तलाश करने के बजाय अगर बातचीत कर के हल निकाला जाए तो समस्या आसानी से दूर हो सकती है. लड़कालड़की सही मानो में विवाह के बाद ही सेक्स लाइफ का आनंद ले पाते हैं. जरूरत इस बात की होती है कि दोनों एक मानसिक लैवल पर चीजों को देखें और एकदूसरे को सहयोग करें. इस से आपसी दूरियां कम करने और वैवाहिक जीवन को सुचारु रूप से चलाने में मदद मिलती है.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें