Father’s Day Special – हमारी अमृता- भाग 1: क्या अमृता को पापा का प्यार मिला?

हमेशा की तरह आज भी बंगले के लान में पार्टी का आयोजन किया गया था. वीना सुबह से व्यस्त थीं. उन के घर की हर पार्टी यादगार होती है. दोनों बेटियां, कविता और वनिता भी तैयार हो कर आ गई थीं. वीना के पति अमरनाथ विशिष्ट मेहमानों को लाने होटल गए थे. मद्धिम रोशनी, लान में लगाई गई खूबसूरत कुरसियां और गरमागरम पकवानों से आती खुशबू, कहीं कुछ भी कम न था.

अमर मेहमानों को ले कर लान में दाखिल हुए. उन के स्वागत के बाद वीना सूप सर्व कर रही थीं कि अंदर से जोरजोर से चीखने की आवाज आने लगी, ‘मम्मी…मम्मी, मुझे बाहर निकालो.’ वीना हाथ का सामान छोड़ कर अंदर भागीं. इधर पार्टी में कानाफूसी होने लगी. कविता और वनिता चकित रह गईं. अमरनाथ के चेहरे पर अजीब हावभाव आजा रहे थे. लोग भी कुतूहल से अंदर की ओर देखने लगे. वीना ने फुरती से अमृता को संभाल लिया और पार्टी फिर शुरू हो गई.

यह अमृता कौन है? अमृता, वीना की तीसरी बेटी है. वह मानसिक रूप से अपंग है, पर यह बात बहुत कम लोग ही जानते हैं. ज्यादातर लोग उन की दोनों बड़ी बेटियों के बारे में ही जानते हैं.

अमृता की अपंगता को ले कर इस परिवार में एक तरह की हीनभावना है. हर कोई अमृता के बारे में चर्चा करने से कतराता है. वीना तो मां है और मां का हृदय संतान के लिए, भले ही वह कैसी भी हो, तड़पता है. किंतु परिवार के अन्य सदस्यों के आगे वह भी मजबूर हो जाती है.

वीना ने तीसरा चांस बेटे के लिए लिया था. कविता और वनिता जैसी सुंदर बच्चियों से घर की बगिया खिली हुई थी. इस बगिया में यदि प्यार से एक बेटे का समावेश हो जाए तो कितना अच्छा रहे, यही पतिपत्नी दोनों की इच्छा थी, पर बेटा नहीं हुआ. उन की आशाओं पर तुषारापात करने के लिए फिर बेटी हुई, वह भी मानसिक रूप से अपंग. शुरू में वह जान ही न पाए कि उन की बेटी में कोई कमी है, पर ज्योंज्यों समय गुजरता गया, उस की एकएक कमी सामने आने लगी.

अमृता अभी 14 साल की है किंतु मस्तिष्क 5-6 साल के बच्चे के समान ही है. घर की व्यवस्था, पति और बच्चे, इन सब के साथ अमृता को संभालना, वीना के लिए अच्छी कसरत हो जाती है. कहने को तो घर में कई नौकरचाकर थे पर अमृता, उसे तो मां चाहिए, मां का पल्लू थामे वह स्वयं को सुरक्षित महसूस करती है.

पार्टी समाप्त होने पर अमर ने जूते उतारते हुए वीना से कहा, ‘‘तुम पार्टी के समय अमृता की ठीक से व्यवस्था क्यों नहीं करतीं, चाहो तो मैं आफिस से सर्वेंटस भेज देता हूं. मगर मैं कोई व्यवधान नहीं चाहता.’’

थकी हुई वीना की आंखों में आंसू आ गए. वह धीरे से बोलीं, ‘‘आप के आफिस की फौज अमृता के लिए कुछ नहीं कर सकती, अमृता मेरे बिना एक पल भी नहीं रह सकती.’’

‘‘अमृता…अमृता…’’ अमर ने चिल्ला कर कहा, ‘‘न जाने तुम ने इस विषवेल का नाम अमृता क्यों रखा है. कई बार कहा कि कई मिशनरियां ऐसे बच्चों की अच्छी तरह देखभाल करती हैं. इसे तुम वहां क्यों नहीं छोड़ देतीं.’’

‘‘अमृता इस घर से कहीं नहीं जाएगी,’’ वीना ने सख्ती से कहा, ‘‘यदि वह गई तो मैं भी चली जाऊंगी.’’

कविता और वनिता ने मम्मीपापा की बहस सुनी तो वे चुपचाप अपने कमरे में चली गईं. इस घर में ऐसी बहस अकसर होती है. कविता के हृदय में अमृता के प्रति असीम प्रेम है किंतु वनिता को वह फूटी आंख नहीं भाती क्योंकि मम्मी अमृता के साथ इतनी व्यस्त रहती हैं कि उस का जरा भी ध्यान नहीं रखतीं.

16 साल की वनिता 11वीं की छात्रा है. अमृता के जन्म के बाद उसे मां की ओर से कम ही समय मिलता था इसलिए अभी भी वह स्वयं को अतृप्त महसूस करती है.

18 वर्षीय कविता बी.ए. द्वितीय वर्ष की छात्रा है. वह बेहद खूबसूरत और भावुक स्वभाव की है. किसी का भी दुख देख कर उस की आंखों में आंसू आ जाते हैं. अमृता को संभालने में वह मां की पूरी मदद करती है.

पति की बहस के बाद वीना अमृता के कमरे में चली गईं. उसे संभालने वाली बाई वहां थी. अमृता खिलौनों से खेल रही थी. कभीकभी उन्हें उठा कर फेंक भी देती. वीना को देख कर वह उन से लिपट गई. आंखों से आंसू और मुंह से लार बहने लगी. वीना ने पहले तो रूमाल से उस का चेहरा पोंछा, फिर बाई को वहां से जाने को कहा. उन्होंने अपने हाथों से अमृता को खाना खिलाया और उसे साथ ले कर सुलाने लगीं.

अमृता के साथ वीना इतनी जुड़ी हुई हैं कि वह अकसर घर के कई जरूरी काम भूल जातीं. उन्हें अमृता जब भी नजर नहीं आती है तो वह घबरा जाती हैं.

अमृता ने किशोरावस्था में प्रवेश कर लिया था. शरीर की वृद्धि बराबर हो रही थी किंतु मस्तिष्क अभी भी छोटे बच्चे की तरह ही था. कई बार वह बिछौना भी गीला कर देती. आंखों में दवा डाल कर वीना को उस की देखभाल करनी पड़ती थी. ज्यादा काम से वह कई बार चिड़चिड़ी भी हो जाती थीं.

परसों ही जब वनिता की सहेलियां आई थीं और वीना किचन में व्यस्त थीं, बाई को चकमा दे कर अमृता वहां आ पहुंची और टेबल पर रखी पेस्ट्री इस तरह खाने लगी कि पूरा मुंह गंदा हो गया. वनिता को ज्यादा शर्मिंदगी महसूस हो रही थी. वह सहेलियों को ले कर अपने कमरे में चली गई. सहेलियों के बारबार पूछने पर भी वनिता ने नहीं बताया कि ऐसी हरकत करने वाली लड़की और कोई नहीं उस की बहन है.

सहेलियों के जाने के बाद उस ने अमृता को 2 थप्पड़ लगा दिए. अचानक पड़ी इस मार से अमृता का चेहरा लाल हो गया. वह सिर पटकपटक कर रोने लगी. वीना को सारा काम छोड़ कर आना पड़ा. जब उन्हें वनिता के दुर्व्यवहार के बारे में पता चला तब उन्होंने वनिता को खूब लताड़ा. वनिता गुस्से से बिफर पड़ी, ‘‘मम्मी, आप सुन लीजिए, इस घर में मैं रहूंगी या यह आप की लाड़ली रहेगी,’’ और पैर पटकते हुए अपने कमरे में चली गई. वीना के हृदय पर क्या वज्रघात हुआ, यह वनिता जान न सकी.

इतना बड़ा घर, नौकरचाकर, सुखसुविधाओं का हर सामान होने पर भी इस घर में मानसिक शांति नहीं है. अमर के अहंकार के आगे वीना को हर बार झुकना पड़ता है. एक अमृता की बात पर ही वह अड़ जाती हैं, बाकी हर बातें वह अमर की मानती हैं.

कभी वीना के मन में विचार आता है कि सभी के बच्चे पूर्णत्व ले कर आते हैं, एक मेरी अमृता ही क्यों अपूर्ण रह गई. पल भर के लिए ऐसे विचार आने पर वह तुरंत उन्हें झटक देतीं और फिर नए उत्साह से अमृता की सेवा में जुट जातीं, पर पति का असहयोग उन्हें पलपल खलता.

ऐसा नहीं था कि अमर के मन में अमृता के प्रति बिलकुल प्रेम न था किंतु जहां सोसायटी के सामने आने की बात आती वह अमृता का परिचय देने से कतराते थे. कल सुबह ही जब अमर चाय पी रहे थे, अमृता छोटी सी गुडि़या ले कर उन के पास आ गई. हर दम चीख कर बोलने वाली अमृता आज धीरे से अस्पष्ट शब्दों में बोली, ‘‘पापा, मेरी गुडि़या के लिए नई फ्राक लाइए न.’’ तब पापा को भी उस पर प्यार उमड़ आया था. उस के गाल थपथपा कर बोले, ‘‘जरूर ला देंगे.’’

Father’s Day Special- मुट्ठीभर स्वाभिमान: भाग 1

15 वर्ष हो चुके थे उसे विदेश में रहते. इसलिए इन खोखली औपचारिकताओं से उसे सख्त परहेज था. चाचा से मालूम हुआ कि अंतिम संस्कार के लिए रुपयों का प्रबंध करना है, दीनानाथजी की जेब से कुल 270 रुपए मिले हैं और अलमारी में ताला बंद है, जिसे खोलने का हक केवल सुकांत को है.

पड़ोस के घर से चाय बन कर आ गई थी, किंतु सुकांत ने पीने से मना कर दिया. अपने बाबूजी के मृतशरीर के पास खामोश बैठा उन्हें देखता रहा. उन के ढके चेहरे को खोलने का उस में साहस नहीं हो रहा था. जिस जीवंत पुरुष को सदा हंसतेहंसाते ही देखा हो, उस का भावहीन, स्पंदनहीन चेहरा देखने की कल्पना मर्मांतक थी. सुकांत ने अपने बटुए से 200 डौलर निकाल कर चाचा के हाथ में रखते हुए कहा, ‘‘इन्हें आप बैंक से रुपयों में भुना कर अंतिम संस्कार के सामान का इंतजाम कर लीजिए.’’

‘‘तुम नहीं चलोगे सामान लेने?’’

‘‘आप ही ले आइए, चाचा,’’ सिर झुकाए धीमे स्वर में बोला सुकांत.

‘‘ठीक है,’’ कह कर चाचा पड़ोस के व्यक्तियों को साथ ले कर चले गए.

घर में घुसने के बाद से ले कर अब तक पलपल सुकांत को मां का चेहरा हर ओर नजर आ रहा था. अपने बचपन को यहीं छोड़ कर वह जवानी की जिस अंधीदौड़ में शामिल हो विदेश जा बसा था, वह उसे बहुत महंगी पड़ी. लेकिन कभीकभी अपने ही लिए फैसलों को बदलना कितना कठिन हो जाता है.

पास ही बैठी चाची बीचबीच में रो पड़ती थीं. किंतु सुकांत की आंखों में आंसू नहीं थे. वह एक सकते की सी हालत में था. 2 वर्षों पूर्व जब मां का देहांत हुआ था तो वह आ भी न पाया था. अंतिम बार मां का मुख न देख पाने की कसक अभी भी उस के हृदय में बाकी थी. उस समय वह ट्रेनिंग के सिलसिले में जरमनी गया हुआ था. पत्नी भी घूमने के लिए साथ ही चली गई थी. दीनानाथजी फोन पर फोन करते रहे. घंटी बजती रहती पर कौन था जो उठाता. खत और तार भी अनुत्तरित ही रहे.

पत्नी के शव को बर्फ की सिल्लियों पर रखे 2 दिनों तक दीनानाथजी प्रतीक्षा करते रहे कि शायद कहीं से सुकांत का कोई संदेश मिले. फिर निराश, निरुपाय दीनानाथजी ने अकेले ही पत्नी का दाहसंस्कार किया और खामोशी की एक चादर सी ओढ़ ली.

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जरमनी से वापस आ कर जब सुकांत को अपने बाबूजी का पत्र मिला तो वह दुख के आवेग में मानो पागल हो उठा कि यह क्या हो गया, कैसे हो गया. उस के दिमाग की नसें मानो झनझना उठीं. मां के प्रति बेटा होने का अपना फर्ज भी वह पूरा न कर पाया. उस का हताश मन रो उठा. किंतु अब भारत जाने का कोई अर्थ नहीं बनता था. सो, एक मित्र को उस के घर पर फोन कर के सुकांत ने उस से आग्रह किया कि वह वापसी में बाबूजी को अपने साथ ले आए. न चाहते हुए भी दीनानाथजी चले गए.

बेटे का आग्रह ठुकरा न सके. पत्नी के इस आकस्मिक निधन पर अपनेआप को बहुत असहाय सा पा रहे थे. बेटे के पास पहुंच उस की बांहों में मुंह छिपा कर रो लेने का मन था उन का. बेटे के सिवा और कौन बांट सकता था उन के इस दुख को?

चले तो गए, किंतु वहां अधिक दिन रह न सके. बुढ़ापे की कुछ अपनी समस्याएं होती हैं, जिस तरह बच्चों की होती हैं. पहले तो हमेशा पत्नी साथ होती थी, जो उन की हर जरूरत का ध्यान रखती थी. किंतु अब कौन रखता? सुबह 4 बजे जब आंख खुलती और चाय की तलब होती तो चुपचाप मुंह ढांप कर सोए रहते.

पत्नी साथ आती थी तो बिना आहट किए दबे पांव जा कर रसोई से चाय बना कर ले आती थी. किंतु अब जब एक बार उन्होंने खुद सुबह चाय बनाने की कोशिश की थी तो बरतनों की खटपट से बेटाबहू दोनों जाग कर उठ आए थे और दीनानाथजी संकुचित हो कर अपने कमरे में लौट गए थे. फिर दोपहर होते न होते बड़े तरीके से बहू ने उन्हें समझा भी दिया, ‘बाबूजी, मैं उठ कर चाय बना दिया करूंगी.’

और उस के बाद दीनानाथजी ने दोबारा रसोई में पांव नहीं रखा. बहू कितनी भी देर से सो कर क्यों न उठे, वे अपने कमरे में ही चाय का इंतजार करते रहते थे.

सुकांत अपने काम में अत्यधिक व्यस्त रहता था. घर में दीनानाथजी बहू के साथ अकेले ही होते थे. उन की इच्छा होती कि बेटी समान बहू उन के  पास बैठ कर दो बातें करे क्योंकि पत्नी की मृत्यु का घाव अभी हरा था और उसे मरहम चाहिए था, किंतु ऐसा न हो पाता. 2-4 मिनट उन के पास बैठ कर ही बहू किसी न किसी बहाने से उठ जाती और दीनानाथजी अपनेआप को अखबार व किताबों में डुबो लेते. वे परिमार्जित रुचियों के व्यक्ति थे. बेटे ने भी उन से विरासत में शालीन संस्कार ही पाए थे. सो, किताबों से कितनी ही अलमारियां भरी पड़ी थीं.

अपने दफ्तर की ओर से सुकांत को फिर 1 महीने के लिए जरमनी जाना था और सदा की तरह इस बार भी उस की पत्नी शांता साथ जाना चाहती थी. वह सुकांत के बिना 1 महीना रहने को तैयार न थी. रात की निस्तब्धता में दीनानाथजी के कानों में बहू एवं सुकांत के बीच चल रही तकरार के कुछ शब्द पड़े, ‘बाबूजी को इस अवस्था में यहां अकेले छोड़ना उचित है क्या?’ सुकांत का स्वर था.

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बंद कमरे में हुई बाबू दीनानाथ की मृत्यु रिश्तेदारों व महल्ले वालों को आश्चर्य व सदमे की हालत में छोड़ गई थी. स्वभाव से ही हंसमुख व्यक्ति थे दीनानाथ. रोज सुबहसुबह ही घर के सामने से निकलते हर जानपहचान वाले का हालचाल पूछना व एकाध को घर ले आ कर पत्नी को चाय के लिए आवाज देना उन की दिनचर्या में शामिल था. पैसे से संपन्न भी थे. किंतु 2 वर्ष पूर्व पत्नी के निधन के बाद वे एकदम खामोश हो गए थे. महल्ले वाले उन का आदर करते थे. सो, कोई न कोई हालचाल पूछने आताजाता रहता. किंतु सभी महसूस करते थे कि बाबू दीनानाथ ने अपनेआप को मानो अपने अंदर ही कैद कर लिया था. शायद पत्नी की असमय मृत्यु के दुख से सदमे में थे. 70 वर्ष की आयु में अपने जीवनसाथी से बिछुड़ना वेदनामय तो होता ही है, स्मृतियों की आंधी भी मन को मथती रहती है. पीड़ा के दंश सदा चुभते रहते हैं.

जब तक पत्नी जिंदा थी, बेटे के बुलाने पर वे अमेरिका भी जाते थे, किंतु वापस लौटते तो बुझेबुझे से होते थे. जिस मायानगरी की चमकदमक औरों के लिए जादू थी, वह उन्हें कभी रास न आई. वापस अपने देश पहुंच कर ही वे चैन की सांस लेते थे. अपने छोटे से शांत घर में पहुंच कर निश्ंिचत हो जाते. किंतु अब यों उन का आकस्मिक निधन, वह भी इस तरह अकेले बंद कमरे में, सभी अपनेअपने ढंग से सोच रहे थे. सब से अधिक दुखी थे योगेश साहब, जो दीनानाथजी के परममित्र थे.

दीनानाथजी के छोटे भाई ने फोन पर यह दुखद समाचार अपने भतीजे को दिया. फिर मृतशरीर को बर्फ पर रखने की तैयारी शुरू कर दी. वे जानते थे कि उन के भतीजे सुकांत को तुरंत चल पड़ने पर भी आने में 2 दिन लगने ही थे.

हवाईअड्डे पर हाथ में एक छोटी अटैची थामे सुकांत इधरउधर देख रहा था कि शायद उस के घर का कोई लेने आया होगा, लेकिन किसी को न पा कर वह टैक्सी ले कर चल पड़ा. घर के सामने काफी लोग जमा थे. कुछ उसे पहचानते थे, कुछ नहीं. आज 7 वर्षों के बाद वह आया था. अंदर पहुंच कर नम आंखों से उस ने चाचा के पांव छुए.

‘‘बहू और बिटिया को नहीं लाए बेटा?’’ चाचा ने पूछा.

‘‘जी, नहीं. इतनी जल्दी सब का आना कठिन था,’’ सुकांत ने संक्षिप्त सा उत्तर दिया.

आंखों से पल्लू लगाए रोने का अभिनय सा करती चाची ने आगे आ कर सुकांत को गले लगाना चाहा, किंतु वह उन के पांव छू कर पीछे हट गया.

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आई हेट हर – भाग 3 : मां से नाराजगी

धीरेधीरे वह अपनेआप में सिमटने लगी थी. उस का आत्मविश्वास हिल चुका था. वह हर समय अपनेआप में ही उलझी रहने लगी थी. क्लास में टीचर जब समझातीं तो सबकुछ उस के सिर के ऊपर से निकल जाता.

वह हकलाने लगी थी. मां के सामने जाते ही वह कंपकंपाने लगती. पिता की अपनी दुनिया थी. वे उसे प्यार तो करते थे, पिता को देख कर गूंज खुश तो होती थी लेकिन बात नहीं कर पाती थी. वह कभीकभी प्यार से उस के सिर पर अपना हाथ फेर देते तो  वह खुशी से निहाल हो उठती थी.

उधर मां की कुंठा बढती जा रही थी. वे नौकरों पर चिल्लातीं, उन्हें गालियां  देतीं और फिर गूंज की पिटाई कर के स्वयं रोने लगतीं,”गूंज, आखिर मुझे क्यों तंग करती रहती हो?‘’

तब वह ढिठाई से हंस देती थी. उसे मालूम था कि ज्यादा से ज्यादा मां फिर से उस की पिटाई कर देंगी और क्या? पिटपिट कर वह मजबूत हो  चुकी थी. अब पिटने को ले कर उस के मन में कोई खौफ नहीं था.

वह कक्षा 7वीं में थी. गणित के पेपर में फेल हो गई थी. जुलाई में उस की फिर से परीक्षा होनी थी. वह स्कूल से अपमानित हो कर आई थी, क्योंकि गणित के कठिन सवाल उस के दिमाग में घुसता ही नहीं था.

घर के अंदर घुसते ही सभी के व्यंग्यबाणों से उस का स्वागत हुआ था,”अब तो घर में नएनए काम होने लगे हैं… गूंज से इस घर में झाड़ूपोंछा लगवाओ. वह इसी के लायक है…”

एक दिन ताईजी ने भी गूंज को व्यंग्य से कुछ बोलीं तो वह उन से चिढ़ कर कुछ बोल पङी. फिर क्या था, उसे जोरदार थप्पड़ पङे थे.

इस घटना के बाद उस की आंखों के आंसू सूख चुके थे… अब वह मां को परेशान करने के नएनए तरीके सोच रही थी. कुछ देर में मां आईं और फूटफूट कर रोने लगीं थीं. कुछ देर तक उस के मन में यह प्रश्न घुमड़ता रहा कि जब पीट कर रोना ही है तो पीटती क्यों हैं?

मां के लिए उस के दिल में क्रोध और घृणा बढ़ती गई थी.

लेकिन उस दिन पहली बार मां के चेहरे पर बेचारगी का भाव देख कर वह व्याकुल हो उठी थी.

व्यथित स्वर में वे बोली थीं, “गूंज, पढ़लिख कर इस नरक से निकल जाओ, मेरी बेटी.‘’

उस दिन मजबूरी से कहे इन प्यारभरे शब्दों ने उस के जीवन में पढ़ाई के प्रति रुचि जाग्रत कर दी थी.

अब पढ़ाई में रुझान के कारण उस का रिजल्ट अच्छा आने लगा तो मां की शिकायत दूर हो गई थी.

वह 10वीं में थी. बोर्ड की परीक्षा का तनाव लगा रहता था… साथ ही अब उस की उम्र की ऐसी दहलीज थी, जब किशोर मन उड़ान भरने लगता है. फिल्म, टीवी के साथसाथ हीरोहीरोइन से जुड़ी खबरें मन को आकर्षित करने लगती हैं.

पड़ोस की सुनिता आंटी का बेटा कमल भैया का दोस्त था. अकसर वह घर आया करता था. वह बीएससी में था, इसलिए वह कई बार उस से कभी इंग्लिश तो कभी गणित के सवाल पूछ लिया करती थी.

वह उस के लिए कोई गाइड ले कर आया था. उस ने अकसर उसे अपनी ओर देख कर मुसकराते हुए देखा था. वह भी शरमा कर मुसकरा दिया करती थी.

एक दिन वह उस के कमरे में बैठ कर उसे गणित के सवाल समझा रहा था. वह उठ कर अलमारी से किताब निकाल रही थी कि तभी उस ने उसे अपनी बांहों में भर लिया था. वह सिटपिटा कर उस की पकड़ से छूटने का प्रयास कर रही थी कि तभी कमरे में कमल भैया आ गए और बस फिर तो घर में जो हंगामा हुआ कि पूछो मत…

वह बिलकुल भी दोषी नहीं थी लेकिन घर वालों की नजरों मे सारा दोष उसी का था…

“कब से चल रहा है यह ड्रामा? वही मैं कहूं कि यह सलिल आजकल क्यों बारबार यहां का चक्कर काट रहा है… सही कहा है… कहीं पर निगाहें कहीं पर निशाना…

मां ने भी उस की एक नहीं सुनी, न ही कुछ पूछा और लगीं पीटने,”कलमुंही, पढ़ाई के नाम पर तुम्हारा यह नाटक चल रहा है…”

वह पिटती रही और ढिठाई से कहती रही,”पीट ही तो लोगी… एक दिन इतना मारो कि मेरी जान ही चली जाए…”

मां का हाथ पकड़ कर अपने गले पर ले जा कर बोलती,”लो मेरा गला दबा दो… तुम्हें हमेशाहमेशा के लिए मुझ मुक्ति मिल जाएगी.”

उस दिन जाने कैसे पापा घर आ गए थे… उस को रोता देख मां से डांट कर बोले,”तुम इस को इतना क्यों मारती हो?”

तो वे छूटते ही बोलीं,”मेरी मां मुझे पीटती थीं इसलिए मैं भी इसे पीटती हूं.”

पापा ने अपना माथा ठोंक लिया था.

अब मां के प्रति उस की घृणा जड़ जमाती जा रही थी. वह उन के साथ ढिठाई से पेश आती. उन से बातबात पर उलझ पड़ती.

मगर गुमसुम रह कर अपनी पढाई में लगी रहती. वह मां का कोई कहना नहीं मानती न ही किसी की इज्जत करती. उस की हरकतों से पापा भी परेशान हो जाते. दिनबदिन वह अपने मन की मालिक होती जा रही थी.

उस के मन में पक्का विश्वास था कि यह पूजापाठ, बाबा केवल पैसा ऐंठने के लिए ही आते हैं… यही वजह थी कि वह पापा से भी जबान लड़ाती. वह किसी भी हवनपूजन, पूजापाठ में न तो शामिल होती और न ही सहयोग करती.

इस कारण अकसर घर में कहासुनी होती लेकिन वह अपनी जिद पर अड़ी रहती.

इसी बीच उस का हाईस्कूल का रिजल्ट आया. उस की मेहनत रंग लाई थी. उस ने स्कूल में टौप किया था. उस के 92% अंक आए थे. बस, फिर क्या था, उस ने कह दिया कि उसे कोटा जा कर आगे की पढ़ाई करनी है. इस बात पर एक बार फिर से मां ने हंगामा करना शुरू कर दिया था,”नहीं जाना है…किसी भी हालत में नहीं…”

लेकिन पापा ने उसे भेज दिया और वहां अपने मेहनत के बलबूते वह इंजीनियरिंग की प्रतियोगिता पास कर बाद में इंजीनियर बन गई.

उधर पापा की अपनी लापरवाही के कारण उन का स्टाफ उन्हें धोखा देता रहा… वे सत्संग में मगन रह कर पूजापाठ में लगे रहे.

जब तक पापा को होश आया उन का बिजनैस बाबा लोगों द्वारा आयोजित पूजापाठ, चढ़ावे के हवनकुंड में स्वाह हो चुका था. अब वे नितांत अकेले हो गए. फिर उन्हें पैरालिसिस का अटैक हुआ. कोई गुरूजी, बाबा या फिर पूजापाठ काम नहीं आया. तब गूंज ने खूब दौड़भाग की लेकिन निराश पापा जीवन की जंग हार गए…

मां अकेली रह गईं तो वह बीना को उन के पास रख कर उस ने अपना कर्तव्य निभा दिया.

गूंज का चेहरा रोष से लाल हो रहा था तो आंखों से अश्रुधारा को भी वह रोक सकने में समर्थ नहीं हो पाई थी.

‘’पार्थ, आई हेट हर…’’

“आई अंडरस्टैंड गूंज, तुम्हारे सिवा उन का इस दुनिया में कोई नहीं है, इसलिए तुम्हें उन के पास जाना चाहिए. शायद उन के मन में पश्चाताप  हो, इसलिए वे तुम से माफी मांगना चाहती हों…यदि तुम्हें मंजूर हो तो उन्हें बैंगलुरू शिफ्ट करने में मैं तुम्हारी मदद कर सकता हूं. यहां के ओल्ड एज होम का नंबर मुझे मालूम है. यदि तुम कहो तो मैं बात करूं?”

“पार्थ, मैं उन की शक्ल तक देखना नहीं चाहती…”

“मगर डियर, सोचो कि एक मजबूर बुजुर्ग, वह भी तुम्हारी अपनी मां, बैड पर लेटी हुईं तुम्हारी ओर नजरें लगाए तुम्हें आशा भरी निगाहों से निहार रही हैं…”

वह बुदबुदा कर बोली थी, ‘’कहीं पहुंचने में हम लोगों को देर न हो जाए.‘’

गूंज सिसकती हुई मोबाइल से फ्लाइट की टिकट बुक करने में लग गई…

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