Social Story: डियो और काना हर समय साथसाथ ही दिखाई देते थे. डियो जरमनी से थी और काना जापान से. दोनों बेंगलुरु के एक आश्रम में मिले थे. इंग्लिश दोनों को आती थी. आज आश्रम का आखिरी दिन था. काना ने डियो को बताया था कि आश्रम का एक सहयोगी उस पर आश्रम को अनुदान देने का अनुचित दबाव बना रहा है.
वहीं, डियो कुछ भारतीय परिधान खरीदने के लिए जाना चाहती थी. अभी कल ही काना ने डियो को एक साथी भारतीय योगी को बेइज्जत करते देखा था. किसी की पर्सनल बात पूछना वैसे भी उस की आदत या जापानी संस्कारों के खिलाफ था. एक योगिनी राधिका ने बीचबचाव करवाया था.
शांत होने पर राधिका ने डियो को भारतीय परिधान पहनने की भी सलाह दे दी थी. डियो इस के बाद जयपुर, अजमेर और पुष्कर घूमने जाना चाहती थी. काना दक्षिण भारत में कुछ दिन और रुकना चाहती थी. रात को खाना खा कर आश्रम में बनी एक दुकान पर दोनों रुक गईं. अचानक, डियो एक डीवीडी कैसेट उठा कर देखने लगी. यह देख कर दुकानदार ने हंसते हुए एक दूसरी डीवीडी थमा दी. यह इंग्लिश में थी. उत्सुकतावश, दोनों कमरे में आ कर देखने लगीं. आश्रम के संचालक अलगअलग तरह से विदेशियों से चंदे के लिए अपील कर रहे थे. गरीब बच्चों, असहाय महिलाओं, इलाज की प्रतीक्षा कर रहे मरीज, सभी तो थे डीवीडी में. काना को कहीं न कहीं ग्लानि का अनुभव हो रहा था. ‘‘शायद ये सब विदेशियों को अमीर मानते हैं. और अमीर लोगों से लोग अपेक्षा करते ही हैं कि वे गरीबों की मदद करें,’’ काना ने दुखी स्वर में कहा.
‘‘हां, पर हम लोग तो खुद ही अभी पढ़ रहे हैं. कोई हाईप्रोफाइल लोग नहीं हैं. मैं पार्टटाइम जौब कर के अपनी पढ़ाई का खर्र्च खुद ही निकालती हूं. साउथ एशिया घूमने इसलिए आई हूं कि कम खर्च में घूमनाफिरना हो जाएगा,’’ डियो का कहना था.
डियो और काना दोनों ही अपनेअपने देशों में मैडिसिन की पढ़ाई कर रही थी. शायद, इसीलिए दोनों की खास जमती थी.
काना अपनी दादी की दुकान में काम करती थी. वह वीकैंड पर टैक्सी चलाती थी. उच्च शिक्षा के लिए उस ने जीतोड़ मेहनत की थी. लगातार 3 साल टैक्सी चला कर पैसे बचाए थे. तब जा कर मैडिसिन पढ़ रही थी. बेहद मेहनती काना ने आश्रम में भी कुछ कार्य करने की संभावना तलाश की थी.
आश्रम के संचालक ने उसे फंड इकट्ठा करने की जिम्मेदारी देना स्वीकार भी किया था. परंतु इस से पहले वह काना से भरपूर चंदा लेना चाहता था. दरअसल, विदेशियों की वजह से ही आश्रम में सभी ऐश्वर्य के साधन उपलब्ध थे.
आश्रम छोड़ते समय विदेशियों को रोका गया. उन से आश्रम के बारे में, गुरुजी के बारे में कुछ बोलने को कहा गया.
स्वाभाविक तौर पर, विदेशी पराए देश में कुछ बुरा क्यों बोलते. अनुभव कैसा भी रहा हो, सभी ने लाइफचेंजिंग बताया. फिर, एक अन्य बिल आया. डियो और काना समेत सभी बेहद हैरान हुए. क्योंकि अपनी समझ से वे सभी बिलों का भुगतान कर चुके थे. उस के बाद अनुदान राशि के लिए प्रार्थनापत्र, काना और डियो को दिया गया. सिर्फ यही 2 विदेशी ऐसे थे जिन्होंने अभी तक आश्रम संचालक को कुछ नहीं दिया था.
न चाहते हुए भी दोनों ने सौ डौलर के चैक दे दिए. राशि देख कर चैक लेने वाले व्यक्ति ने बुरा सा मुंह बनाया और आश्रम के संचालक के कान में फुसफुसाने लगा. इस के बाद डियो और काना को रुखाई से विदा कर दिया गया.
दोनों ने तय किया कि साथ में मैसूर घूमने जाया जाए. डियो के पास 2 दिन शेष थे. उस के बाद राजस्थान घूमने जाना चाहती थी. एकदो अन्य पर्यटक भी उन के साथ शामिल हो गए. डियो ने रास्ते में आश्रम में हुई घटना के बारे में विस्तार से बताया, ‘‘वह तथाकथित गुरुजी का सहायक है. उस ने मुझ से कई बार अपने कक्ष में आने को कहा. एक बार मैं अकेली शाम को लौंग वौक के लिए निकली थी. पता नहीं कहां से आ गया. उस ने मुझे बताया कि उसे गुरुजी ने बताया था कि जरमनी से आई युवती ही मेरा उद्धार करेगी. इतना कह कर वह मुझे गले लगाने लगा.
‘‘मैं उस से पीछा छुड़ा कर भागी. अगले दिन वह मुझे छोटे कपड़ों को ले कर सब के सामने जलील करने लगा. उस ने कहा कि मैं आश्रम की सभ्यता और संस्कृति के खिलाफ कपड़े पहन रही हूं.’’
‘‘परंतु सिर्फ हमीं लोगों को इस तरह क्यों प्रताडि़त किया. तुम्हें उसी समय उस सहायक की शिकायत करनी चाहिए थी,’’ काना ने रोष से कहा.
‘‘करना तो चाहती थी परंतु उस ने अगले दिन सुबह खुद ही ड्रामा शुरू कर दिया,’’ डियो ने सोचते हुए कहा.
‘‘तुम जानती हो जब मैं ने चंदा देने से मना किया तो मुझे भी गलत इशारे किए गए. इन भारतीयों को ऐसा क्यों लगता है कि हम विदेशी किसी के साथ भी बैड शेयर कर सकते हैं,’’ काना ने दुख से कहा.
‘‘खैर, कुछ भी हो, पर तुम मेल जरूर करना आश्रम को इन सभी के बारे में. मैं भी शिकायती मेल जरूर डालूंगी,’’ काना ने डियो को समझाया.
दोनों ने रवि नामक गाइड को मैसूर दर्शन के लिए साथ लिया. दोनों जब गाइड के लिए मोलभाव कर रही थीं तो उस ने सब से कम दाम बताए थे. घूमने के बाद जब वापसी का समय आया तो खीसें निपोरते हुए उस ने कहा, ‘‘मैम, एनी अदर सर्विस यू वौंट. आई एम अबेलएबल एट फ्री औफ कौस्ट.’’
दोनों ने हैरानी से एकदूसरे की तरफ देखा. अध्यात्म की अनुभूति तो आश्रम में ही खत्म हो चुकी थी. अब घूमनेफिरने का उत्साह भी ठंडा हो गया था. तभी एक वृद्धा उन के पास आ कर हालचाल पूछने लगी. फर्राटेदार इंग्लिश बोलती वृद्ध महिला बैंक में औफिसर रह चुकी थी.
‘‘नैक्स्ट टाइम, कम एटलीस्ट विद वन मेल फ्रैंड,’’ वृद्धा ने बिना मांगी सलाह देना जारी रखा, ‘‘ऐंड वियर इंडियन वियर औल द टाइम.’’
‘‘अब मुझे अच्छी तरह समझ में आ गया कि इंडिया में पर्यटक इतने कम क्यों आते हैं. मैं दूसरी बार नहीं आना चाहती, इसलिए राजस्थान घूमने जरूर जाऊंगी,’’ डियो ने काना के कान में फुसफुसाते हुए कहा.
‘‘हां, मैं भी केरल घूम कर वापस जाऊंगी. सोचती हूं, वियतनाम घूम आती हूं,’’ काना ने अपनी योजना बताई.
दोनों ने एक नेक काम जरूर किया, वह था अपने बैंक में फोन कर के चैक की स्टौप पेमैंट कराना.
Social Story: अलका औफिस में सब के लिए जिज्ञासा का विषय बनी हुई थी. वह किस से, क्यों, कहां जाती है, इस बारे में सब अटकलें लगाते थे लेकिन असलियत कुछ और ही थी.
अलका को जैसे ही यह खबर लगी कि उस का तबादला फिर भोपाल होने का मेल हैडऔफिस से आया है, तो उस की आंखें छलक पड़ीं. वह तो फिर से भोपाल जाने के लिए जैसे रातदिन बाट ही जोह रही थी.
उस के तबादले पर इंदौर कार्यालय के उस के सहकर्मियों ने उस का बाकायदा विदाई समारोह आयोजित किया. विदाई समारोह के भाषण में वह अपने बारे में बहुतकुछ कहना चाहती थी, लेकिन यह सोच कर उस ने कुछ नहीं कहा कि बनर्जी साहब को सबकुछ पता चल ही गया है, तो अब सारी बात बाकी के लोगों को भी पता चल ही जाएगी. तब, यह सबकुछ जान कर शायद किसी के दिल में यह बात आ जाए कि
‘माफ करना अलका,’ हम तुम्हें समझ नहीं पाए.
वह जल्दी से घर आई. उस ने अपने 2 सूटकेसों में सारा सामान भरा और रेलवे स्टेशन पहुंची. भोपाल जाने के लिए 2 साल पहले किन हालात से गुजर कर उसे भोपाल से इंदौर कार्यालय में आना पड़ा. जब वह इंदौर आई, तब इस शहर से पूरी तरह अनजान थी.
इंदौर कार्यालय में जब वह पहुंची तो उस ने एक मैडम से कहा, ‘मुझे बनर्जी साहब से मिलना है,’ वह मैडम उस के सौम्य रूप को देख कर उस पर एकदम से मुग्ध सी हो गई. फिर बोली, ‘मैडम, आप किसलिए उन से मिलना चाहती हैं?’ जवाब में वह बोली, ‘मैं अलका हूं और भोपाल कार्यालय से ट्रांसफर हो कर यहां आई हूं और मुझे अपनी जौइनिंग रिपोर्ट देनी है.’
‘सामने वाला केबिन बनर्र्जी साहब का है और मैं उन की पीए श्वेता शर्मा हूं. आप उन से जा कर मिल सकती हैं,’ उस के केबिन में जाने के 5 मिनट बाद बनर्र्जी साहब ने अपनी पीए श्वेता को केबिन में बुलाया और कहा, ‘मैडम, ये अलका हैं, आज ही भोपाल दफ्तर से आई हैं. आप इन्हें आज अपने साथ बैठाइए और कविता जोकि मैटरनिटी लीव पर हैं. उन की सीट का काम इन्हें समझा दीजिए.’
‘देखिए अलकाजी, मिसेस कविता की डिलिवरी हुई है, इसलिए शायद वे 6 माह तक अवकाश पर रहेंगी. इस सीट का कार्यभार आप को संभालना है,’ श्वेता ने कहा.
‘देखिए, कृपया आप मुझे अलकाजी और आप वगैरह मत कहिए. हम एक ही दफ्तर में काम करते हैं, इसलिए हम सब एकदूसरे के कलीग हैं. यदि तुम मुझे अलका कहोगी तो ज्यादा अच्छा लगेगा,’ फिर श्वेता ने उसे उस सीट के कार्यभार की पूरी जानकारी दी. अब लंच होने को था, इसलिए उस ने कहा, ‘अलका, लंच के लिए टिफिन लाई हो या रैस्टोरैंट में जाने का इरादा है?’
‘मैं तो भोपाल की बस से उतरी और सीधे यहां औफिस में आ गई, इसलिए मेरे पास लंच की व्यवस्था नहीं है.’
‘‘देखो अलका, आज तुम मेरे साथ लंच लो, फिर कल से व्यवस्था कर लेना.’’
लंच करने के दौरान श्वेता ने सहज ही पूछ लिया, ‘अलका, भोपाल से तुम्हारे साथ कोई आया है और तुम्हारे रहने की क्या व्यवस्था है?’
‘मैं अकेली ही भोपाल से आई हूं और मेरे पास रहने का अभी कोई इंतजाम नहीं है. सोच रही हूं कि आज किसी होटल में स्टे कर लूं और फिर किसी की सहायता से कहीं मकान किराए पर ले लूंगी.’
‘ठीक है, तो फिर आज रात तुम मेरी मेहमान बन कर मेरे घर चलो. कल कहीं तुम्हारे लिए मकान की व्यवस्था कर लेंगे.’
अगले दिन श्वेता ने एक मकान उसे दिखाया, जो उसे पसंद आ गया और वह उसी दिन उस में शिफ्ट भी हो गई. जब अलका उस मकान से शिफ्ट होने के लिए श्वेता के घर से निकली तब वह बोली, ‘अलका, तुम अलग मकान में शिफ्ट हो रही हो, इस का मतलब यह नहीं कि हमारी दोस्ती खत्म हो गई. तुम मेरी एक अच्छी सहेली हो और हमेशा रहोगी. यदि तुम्हें कभी भी मेरी सहायता की जरूरत पड़े तो मुझे जरूर बताना.’
कुछ ही दिनों में अलका को इंदौर कार्यालय का माहौल भा गया. वह रोजाना नियत समय पर दफ्तर जाने लगी. लेकिन उस की एक बात पर दफ्तर के सहकर्मियों की नजर थी कि कभीकभी वह अचानक सीट से उठ कर बाहर जाती है और किसी से मोबाइल पर देर तक बातें करती रहती है. यह सिलसिला तकरीबन रोजाना ही होता है. वह इतनी देर तक किस से, क्या बातें करती है, यह सब के लिए चौंकाने वाली बात थी.
चूंकि वह जवान है, बेहद सुंदर है और कदकाठी बहुत आकर्षक है, इसलिए सब के मन में एक भ्रम यह था कि यह किसी लड़के से प्यार करती है और उसी से इतनी देर तक बातें करती है. दफ्तर में 5 दिन का सप्ताह है और हर शनिवाररविवार अवकाश रहता है, इसलिए वह शनिवाररविवार को अवकाश के दिन क्या करती होगी, यह उन सब के लिए जिज्ञासा का विषय था.
एक दिन रात 11 बजे वह उठी और अपने मकान की बालकनी में जा कर किसी से धीमी आवाज में बातें करने लगी. अब दफ्तर में अचानक अपनी सीट से उठ कर उस का किसी से देर तक बातें करना और देररात एक बालकनी में खड़े हो कर धीमी आवाज में बातें करना कुछ रहस्यमय सा लगने लगा था.
दफ्तर के कुछ सहकर्मियों के मन में यह बात आई भी कि अलका से पूछा जाए कि सीट पर से अचानक उठ कर बाहर जा कर वह इतनी देर तक किस से, क्या बातें करती है? लेकिन किसी से मोबाइल पर बातें करना एक पर्सनल मामला है, इसलिए किसी ने उस से यह पूछने की हिम्मत नहीं की. हां, उस के इस बरताव से सब के मन में एक शंका अवश्य हो गई कि वह किसी लड़के के प्रेमजाल में पड़ी हुई है.
अब अलका हर शनिवाररविवार अवकाश के दिन भोपाल जाने लगी. अकसर शुक्रवार की शाम दफ्तर छूटते ही वह वहां से ही रिकशा पकड़ कर बसस्टैंड चली जाती और भोपाल पहुंच जाती. वह इंदौर में नौकरी अवश्य कर रही थी, लेकिन उस का मन और ध्यान भोपाल में ही लगा रहता था. हर महीने वह अपनी पगार की राशि का अधिकांश हिस्सा भोपाल भिजवा देती थी.
एक दिन जैसे ही वह भोपाल से इंदौर लौटी, कार्यालय में आते ही उस ने कार्यालय की सोसाइटी से 10 हजार रुपए का कर्ज लिया और वे रुपए तत्काल भोपाल भिजवा दिए. वह अपनी पगार की राशि का अधिकांश हिस्सा भोपाल में किसे भेजती है और दफ्तर की सोसाइटी से लिए 10 हजार रुपए के कर्ज की राशि उस ने किसे भेजी, यह रहस्य ही था.
एक दिन वह दफ्तर आई और उस ने अपने भविष्यनिधि खाते में से 20 हजार रुपए निकलवाने के लिए आवेदन दिया. कैशियर ने उसे 20 हजार रुपयों का भुगतान उसी दिन दोपहर को कर दिया. कैशियर से रुपए ले कर सीधे बनर्जी साहब के केबिन में गई और अगले एक दिन का अवकाश स्वीकृत कराते हुए वह भोपाल चली गई.
उस के द्वारा बारबार इतनी बड़ी राशि का इंतजाम करना और फिर तत्काल भोपाल रवाना हो जाने की बात अब एक गहरे रहस्य को जन्म देने लगी थी. दफ्तर के सहकर्मियों के दिल में कई बार यह विचार भी कौंध गया कि जवानी के इस दौर में उस से कोई गलती तो नहीं हो गई? क्योंकि वह दिखने में बहुत सुंदर थी. कहीं कोई उस का एमएमएस (वीडियो) बना कर उसे ब्लैकमेल तो नहीं कर रहा है? क्योंकि कहते हैं न कि जब कहीं प्रकाश होता है तो परछाईं भी उस के साथसाथ रहती है. वह सुंदर है, गोरीचिट्टी है, सो, संभव है कुछ ‘काला’ उस के आसपास मंडरा रहा हो?’
अलका भोपाल से वापस लौटी तो बहुत गुमसुम थी. उस के मन के भीतर का दर्द अब उस के चेहरे पर साफ नजर आने लगा था. वह दफ्तर में अपनी सीट पर बैठी थी. लेकिन उस का मन काम में नहीं लग रहा था. वह ठीक से निर्णय नहीं कर पा रही थी कि ऐसी स्थिति में वह क्या करे? वह तत्काल उठ कर बनर्जी साहब के केबिन में गई और उन से बोली, ‘सर, मैं आज फिर भोपाल जाना चाहती हूं, प्लीज, मेरी कुछ दिनों की छुट्टी स्वीकृत कर दीजिए.’
‘लेकिन मैडम, दफ्तर में औडिट पार्टी आई है, इसलिए किसी को भी छुट्टी नहीं दी जा रही है, तब मैं आप को छुट्टी कैसे दे सकता हूं?’
जब साहब ने उसे छुट्टी देने में असमर्थता व्यक्त की तो वह असमंजस में पड़ गई कि अब क्या करे? वह फिर बनर्जी साहब के केबिन में गई और उस ने सविनय निवेदन किया, ‘सर, मेरा रुपए ले कर भोपाल जाना बहुत जरूरी है. यदि रुपए समय पर भोपाल नहीं पहुंच सके तो मेरे जीने का मकसद ही खत्म हो जाएगा.’
‘सौरी मैडम, मैं आप को छुट्टी नहीं दे सकता, लेकिन मानवीयता के नाते इतना कर सकता हूं कि भोपाल में मेरे एक मित्र हैं, उन को संदेश दे कर आप के रुपए भिजवाने का इंतजाम करवा सकता हूं.’
अलका ने तत्काल एक कागज पर नाम व पता लिख कर बनर्जी साहब के हाथ में दिया और कहा, ‘इस स्थान पर 20 हजार रुपए तत्काल पहुंचाने हैं.’
बनर्जी साहब ने तत्काल मोबाइल पर अपने मित्र से बात की कि ‘मैं तुम को एक मैसेज कर रहा हूं, कृपया उस के अनुसार बताए नियत स्थान पर रुपए तत्काल पहुंचवा दें.’
बनर्जी साहब के मित्र ने भी रुपए तत्काल नियत स्थान पर पहुंचा दिए और फिर मोबाइल पर उन को बताया कि, ‘जहां मैडम ने रुपए पहुंचाने के लिए कहा था, वास्तव में वह एक निजी हौस्पिटल है. जब मैं ने हौस्पिटल के काउंटर पर आप के बताए नाम का जिक्र किया तो उन्होंने मुझे एक प्राइवेट रूम में पहुंचा दिया. उस रूम में पहुंचते ही मैं ने देखा कि 4-5 वार्ड बौय मिल कर एक आदमी को पकड़ कर रस्सी से बांध रहे हैं. मुझे उस रूप में देखते ही एक नर्स ने पूछा, ‘सर, आप को किस से मिलना है, क्या आप अभिषेक से मिलने आए हैं?’ मेरे ‘हां’ कहते ही उस ने मुझे बताया कि इन का 3 वर्षों से यहां इलाज चल रहा है. ये एक भयंकर मानसिक रोगी हैं. सर, अभिषेक की हालत देख कर तो मुझ जैसे पत्थर दिल की आंख भी नम हो गई. डाक्टरों से बात करने पर उन्होंने बताया कि ऐसे मरीज कब ठीक होंगे, यह कहना बहुत मुश्किल होता है.’
यह सारी बात जान कर बनर्जी साहब भी स्तब्ध रह गए.
अगले दिन उन्होंने अलका को अपने केबिन में बुलवाया और कहा, ‘मैडम, आप के बताए हौस्पिटल में मेरे मित्र ने रुपए जमा करा दिए हैं और उस ने अभिषेक की स्थिति के बारे में जो मुझे बताया उसे सुन कर मुझे भी बहुत दुख हुआ,’ बनर्जी साहब उस से कुछ पूछते उस के पहले ही वह बोल पड़ी, ‘सर, अभिषेक और मैं ने लवमैरिज की है. हमारी शादी को 5 साल हो गए. अभिषेक का बिल्ंिडग कंस्ट्रक्शन का व्यवसाय था. उस का एक पार्टनर था. उस का नाम कैलाश था. उस ने अभिषेक को विश्वास में ले कर चालाकी से सारा व्यवसाय अपने नाम कर लिया और उस को बाहर का रास्ता दिखा दिया.
‘बिल्ंिडग कंस्ट्रक्शन के व्यवसाय में अभिषेक के भी 2 करोड़ रुपए लगे हुए थे. पार्टनर द्वारा इतनी बड़ी रकम अचानक हड़पने का सदमा वह सह नहीं पाया और उस के दिलोदिमाग पर इतना बुरा और गहरा असर हुआ कि वह पागल हो गया. सर, चूंकि मैं ने और अभिषेक ने लवमैरिज की थी, इसलिए हम दोनों के परिवार हम पर नाराज हैं और उन्होंने हम से रिश्ता तोड़ दिया है. ‘वे हैं या नहीं,’ यह हमारे लिए कोई माने नहीं रखता. रही बात मेरे द्वारा मोबाइल पर देर तक बातें करने की, तो मैं अभिषेक के इलाज के लिए पूरी तरह डाक्टरों और वहां की नर्सों पर निर्भर हूं.
‘मैं ने उन को अपना मोबाइल नंबर दे रखा है. जब भी कोई सीरियस बात होती है तो वे मुझे समयअसमय मोबाइल पर सूचित करते हैं और मुझे तत्काल सीट से उठ कर उन से बात करनी पड़ती है. चूंकि अभिषेक का इलाज एक निजी हौस्पिटल में चल रहा है. इसीलिए आप समझ सकते हैं कि निजी हौस्पिटल में इलाज कराना कितना महंगा होता है.
‘सर, मैं भोपाल दफ्तर में काम करते हुए उस का इलाज करा रही थी. मेरी यह कहानी अपने दफ्तर के डिप्टी डायरैक्टर को पता चल गई. एक दिन, रात को वे मेरे घर आए और उन्होंने अपनी बुरी नियत का साया मेरे पर डालने की कोशिश की, तब मैं ने गुस्से में लालपीली होते हुए उन के गाल पर चारपांच थप्पड़ जड़ दिए. उन के गाल पर थप्पड़ों की झड़ी लगते वे बौखला उठे. उन्होंने अपनी जेब से रुपयों की गड्डी निकाली और कमरेभर में रुपए उड़ाते हुए जोरजोर से चिल्लाने लगे कि एक तो धंधा करती है उस पर भी मारपीट करती है.
‘यह सब देख कर मैं बुरी तरह घबरा गई, उस पर भी उन की चिल्लाहट सुन कर हमारी बिल्ंिडग के सारे रहवासी इकट्ठा हो गए और वे मेरे विरुद्ध ही बातें करने लगे कि अब यह पति का इलाज कराने के लिए रुपए जुटाने के चक्कर में धंधा भी करने लगी है.’
‘पुरुषप्रधान व्यवस्था में अकसर लोग पुरुषों का ही साथ देते हैं. सर, मैं चाहती भी थी कि उन डिप्टी डायरैक्टर के खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराऊं. लेकिन जब हमारे बिल्ंिडग वाले ही मेरे खिलाफ बोलने लगे तो मैं पुलिस के सामने गवाह या साक्ष्य के रूप में किन लोगों को पेश करती? मैं वहां अकेली पड़ गई. इसीलिए यह बदनामी सह कर मुझे चुप रहना पड़ा. मैं मन ही मन समझ गई थी कि अब भोपाल दफ्तर में काम करना मेरे लिए मुश्किलोंभरा होगा, इसीलिए मैं ने अपना तबादला इंदौर करा लिया. इस के बाद यहां जौइनिंग देने के बाद की सारी कहानी आप के सामने है ही.’
करीब 2 वर्षों बाद भोपाल के उस डिप्टी डायरैक्टर का तबादला नई दिल्ली हो गया. इसलिए अलका ने भी अपना तबादला फिर भोपाल करवा लिया.
अंत में बनर्जी साहब बोले, माफ करना अलका, मैं ने भी तुम्हें गलत समझा था. शायद सारा स्टाफ ऐसा ही गलत समझता था क्योंकि डिप्टी डायरैक्टर के सूत्र यहां हैं जो तुम्हारे बारे में बहुतकुछ बताते रहते थे. तुम्हें अपने ध्येय में सफलता मिले, यही मेरी कामना है.
Social Story: घंटी की आवाज सुन कर अलका के दरवाजा खोलते ही नवागुंतक ने कहा, ‘‘नमस्कार, आप मुझे नहीं जानतीं, मेरा नाम पूनम है. मैं इसी अपार्टमैंट में रहती हूं.’’
‘‘नमस्कार, मैं अलका, आइए,’’ कहते हुए अलका ने पूनम को अंदर आने का निमंत्रण दिया.
‘‘फिर कभी, आज जरा जल्दी में हूं. कल गुरुपूर्णिमा है, गुरुजी के आश्रम से गुरुजी के अनुयाई आए हैं. उन के सान्निध्य से लाभ उठाने के लिए गुरुपूर्णिमा के अवसर पर हम ने घर में सत्संग का आयोजन किया है. उस के बाद महाप्रसाद की भी व्यवस्था है. आप सपरिवार आइएगा,’’ पूनम ने अलका से कहा.
‘‘सत्संग…’’ अलका ने वाक्य अधूरा छोड़ते हुए कहा.
‘‘हमारी गुरुमाता हैं, उन का मुंबई में आश्रम है. वे तो देशविदेश धर्म के प्रचारप्रसार के लिए जाती रहती हैं, लेकिन उन के अनुशासित शिष्य उन के काम को आगे बढ़ाते रहते हैं. हम उन के प्रवचन औडियो, वीडियो सीडी के जरिए दिखाते हैं. हम चाहते हैं ज्यादा से ज्यादा लोग गुरुमाई के विचारों को आत्मसात कर धर्मकर्म को अपनाएं. इस से उन के जीवन में सुख व शांति का प्रवाह होने के साथ उन का जीवन सफल होगा. यही नहीं दूसरों को भी उन के विचारों से अवगत करा कर उन के जीवन को भी सफल बनाने में सहयोग दें.’’
अलका इस अपार्टमैंट में कुछ दिनों पहले आई थी. सो, अभी तक उस का किसी से ज्यादा परिचय नहीं हुआ था. पूनम के निमंत्रण पर सोच में पड़ गई. वह कभी सत्संग में नहीं गई थी. उस ने अपनी सासुमां को टीवी पर कई बाबाओं का सत्संग सुनते देखा था. सब की एक ही बातें. एक ही चालें. अपनी करनी के चलते जब आसाराम जेल गए तो सासुमां को तो विश्वास ही नहीं हो रहा था. बारबार वे यही कहती रहीं कि उन को फंसाया गया है. कई बार उस ने उन्हें सचाई बतानी चाही, तो उन्होंने उसे धर्म, कर्म से विमुख की उपाधि से विभूषित कर उस का मुंह बंद कर दिया था. नतीजा यह हुआ कि वह उन की बातें चुपचाप सुनती रहती थी, लेकिन कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करती थी. वैसे भी, उस का मानना था जिस ने अपने मनमस्तिष्क के दरवाजे बंद कर रखे हैं, उस को समझा पाना बेहद कठिन है.
अलका को इन बाबाओं पर कोई विश्वास नहीं था, क्योंकि उसे लगता था कि ये आम भोलेभाले इंसानों को फंसा कर उन्हें कर्म से विमुख कर, अकर्मण्य बना कर सिर्फ धर्म की अफीम चटा कर ही जीवनरूपी नाव को वैतरणी पार करने के लिए विवश कर रहे हैं.
साधुसंन्यासियों से सदा दूर रहने वाली अलका को इस समय पूनम के आग्रह को ठुकरा पाना उचित नहीं लग रहा था. अब उसे यहीं रहना है, सो, जल में रह कर मगर से बैर लेना उचित नहीं है. यह सोच कर उस ने जाने का मन बना लिया था. वैसे भी, इस अपार्टमैंट वालों से मेलजोल बढ़ाने का सुनहरा अवसर वह खोना नहीं चाहती थी.
सुबह 10 बजे से ही अपार्टमैंट में गहमागहमी शुरू हो गई. लगभग 11 बजे ढोलमंजीरों की आवाज सुनाई देने लगी. आवाज सुन कर घर का दरवाजा बंद कर वह पूनम के घर गई. वहां पूनम के अतिरिक्त कई अन्य स्त्रियां सुंदरसुंदर परिधानों में उपस्थित थीं, जबकि पुरुष बाहर खड़े थे, साधुओं के दल का इंतजार कर रहे थे.
कुछ ही देर में उस ने एक युवा को हाथ में चरणपादुकाएं तथा उस के पीछे भगवा वस्त्र पहने हुए लगभग 15-20 युवा युवकयुवती आते देखे. सभी लगभग 25 से 40 वर्ष की उम्र के होंगे. उन को देख कर अलका को आश्चर्य हुआ. जो उम्र किसी भी इंसान के कैरियर के लिए अत्यंत मूल्यवान होती है, उस उम्र में संन्यास लेना क्या उचित है? अभी वह सोच ही रही थी कि चरणपादुकाएं पकड़े युवक ने घर में प्रवेश किया. गृहस्वामिनी उस का स्वागत करते हुए उसे उस स्थान तक ले गई जहां गुरुमाई का एक बड़ा सा तैलीय चित्र एक लाल कपड़े वाले आसन पर रखा था. आगे वाले युवक ने चरणपादुकाएं आसन पर चित्र के सामने रख दीं.
दीप प्रज्ज्वलित कर सभी मेहमानों ने गुरुमाई के चित्र तथा चरणपादुका को फूलमालाएं पहना कर पूजा की. इस के बाद सभी लोगों ने अपनेअपने आसन ग्रहण किए. लगभग 2 घंटे तक पूजासत्संग चला. सब से पहले गुरुमाई की औडियो, वीडियो, सीडी द्वारा सभी अनुयाइयों को उन के संदेश सुनाए गए. आधा घंटा भजन चला तथा 10 मिनट का ध्यान व उस के बाद आरती हुई. आरती का थाल 50-100 रुपए के नोटों से भर गया था. आश्चर्य तो यह था कि किसी को 10-20 रुपए देने में आनाकानी करने वाली स्त्रियां थाल में बड़ेबड़े नोट डाल कर गर्वोन्मुक्त हो रही थीं.
आरती के बाद गुरुमाई का भोग लगा कर उन के शिष्यों को प्रसाद दिया गया. फिर दूसरे लोग महाप्रसाद के लिए बैठे. जो महिलाएं अभी आस्था से ओतप्रोत थीं, वही अब कपड़े, गहनों के साथ, सासबहू तो कुछ पतिपुराण पर भी आ गईं.
एक महिला ने अपना परिचय देते हुए अलका का परिचय पूछा. अलका के परिचय देने के बाद उस महिला ने जिस ने अपना नाम अर्चना बताया था, कहा, ‘‘आप यहां नएनए आए हो. गृहप्रवेश की पूजा करा ली होगी. आप ने किसी को बुलाया नहीं?’’
उस की बात सुन कर कई दूसरी महिलाओं के चेहरे अलका की ओर घूमे.
‘‘अर्चना जी, मैं तथा आलोक इन सब में विश्वास नहीं करते. हमारे लिए तो हर दिन एकसमान है. जिस दिन हमें सुविधा लगी, उस दिन हम ने शिफ्ट कर लिया.’’
‘‘अच्छा, विवाह तो शुभ मुहूर्त देख कर ही किया होगा,’’ अर्चना के बगल में बैठी शोभना ने पूछा.
‘‘विवाह का फैसला तो मेरे तथा आलोक के मातापिता का था, किंतु गृहप्रवेश का हमारा अपना,’’ अलका ने शोभना की आंखों में व्यंग्नात्मक मुसकान देख कर कहा.
‘‘क्या गृहप्रवेश में आप के और भाईसाहब के मातापिता नहीं आए थे?’’ शोभना ने फिर पूछा.
‘‘आए थे.’’
‘‘क्या उन्होंने विरोध नहीं किया?’’
‘‘नहीं,’’ कह कर अलका ने बेकार की चलती बहस को खत्म करने की कोशिश की.
‘‘शुभ समय देख कर किया हर काम अच्छा होता है वरना बाद में परेशानी आती है,’’ शोभना की बात सुन कर उस की पड़ोसिन रूचि भी कह उठी.
अलका ने किसी की भी बात का उत्तर देना अब उचित नहीं समझा. वैसे भी, उन लोगों की बात का क्या उत्तर देना जो अपनी सोच में इतने जकड़े हों कि दूसरों की बात व्यर्थ लगे.
पूनम के घर हर सोमवार, शाम को 7 से 8 बजे सत्संग होता था. 10 मिनट के ध्यान के समय वह दरवाजे के बाहर आ कर खड़ी हो जाती, जिस से वह हर आनेजाने वाले पर निगाह रख कर ध्यान करने वालों का ध्यान भंग होने से बचा सके. इस सत्संग में पुरुषों से ज्यादा महिलाओं की भागीदारी होती थी वह भी उन महिलाओं की जो स्वयं को अत्याधुनिक मानती थीं. कुछ तो जौब भी करती थीं. पूनम स्वयं महिला विद्यालय में रसायनशास्त्र की प्रवक्ता थी, इस के बावजूद उस की इतनी अंधभक्ति अलका को आश्चर्यचकित कर रही थी.
इस से अधिक आश्चर्य तो अलका को तब हुआ जब उस की पड़ोसिन रुचि ने उसे अपार्टमैंट में चल रही ‘सुंदरकांड किटी’ में सम्मिलित होने के लिए आमंत्रण दिया. महिलाओं की सामान्य किटी तो उस ने सुनी थी, पर ‘सुंदरकांड किटी…’ वह सोच ही रही थी कि रुचि ने कहा, ‘‘अलकाजी, इस किटी में सुंदरकांड के पाठ के साथ सामान्य किटी की तरह ही आयोजक को आए अतिथियों के लिए खानपान का भी आयोजन करना होता है. इस बहाने धर्मकर्म के साथ हम महिलाएं अपना मनोरंजन भी कर लेती हैं.’’
अलका ने रुचि को नम्रतापूर्वक मना कर दिया था. लखनऊ में जेठ के महीने का हर मंगल ‘बड़ा मंगल’ माना जाता है. हर मंगल को किसी न किसी के घर से भंडारे का न्योता आ जाता. सुंदरकांड के साथ खानेपीने की अच्छीखासी व्यवस्था रहती थी.
प्रारंभ में अलका सामाजिकता निभाने चली जाती थी, किंतु धीरेधीरे उसे इन आयोजनों में अरुचि होने लगी. आस्था मन की चीज है, न कि दिखाने की. यही कारण था कि हर आयोजन उसे उस के करने वाले की प्रतिष्ठा का द्योतक लगने लगा था. आखिरकार, पहनावे से आधुनिक व विचारों से दकियानूसी महिलाओं का अपनी आस्था का भौंड़ा प्रदर्शन कर दूसरों को नीचा दिखाने को आतुर रहना उसे पसंद न था इसलिए ऐसी महिलाओं से उस ने दूरी बना लेना ही बेहतर समझा.
नतीजा यह हुआ कि धीरेधीरे आस्था के रंग में डूबी महिलाओं ने उसे नास्तिक की उपाधि से विभूषित कर उस का सामाजिक बहिष्कार करना प्रारंभ कर दिया. लेकिन, उस ने उन की इस मनोवृत्ति को भी सहजता से लिया. कम से कम अब उसे ऐसे आयोजनों में सम्मिलित न हो पाने पर बहाना बनाने से मुक्ति मिल गई थी.
Hindi Story: सतीश लंबा, गोरा और छरहरे बदन का नौजवान था. जब वह सीनियर क्लर्क बन कर टैलीफोन महकमे में पहुंचा, तो राधा उसे देखती ही रह गई. शायद वह उस के सपनों के राजकुमार सरीखा था.
कुछ देर बाद बड़े बाबू ने पूरे स्टाफ को अपने केबिन में बुलाकर सतीश से मिलवाया.
राधा को सतीश से मिलवाते हुए बड़े बाबू ने कहा, ‘‘सतीश, ये हैं हमारी स्टैनो राधा. और राधा ये हैं हमारे औफिस के नए क्लर्क सतीश.’’
राधा ने एक बार फिर सतीश को ऊपर से नीचे तक देखा और मुसकरा दी.
औफिस में सतीश का आना राधा की जिंदगी में भूचाल लाने जैसा था. वह घर जा कर सतीश के सपनों में खो गई. दिन में हुई मुलाकात को भूलना उस के बस में नहीं था.
सतीश और राधा हमउम्र थे. राधा के मन में उधेड़बुन चल रही थी. उसे लग रहा था कि काश, सतीश उस की जिंदगी में 2 साल पहले आया होता.
राधा की शादी 2 साल पहले मोहन के साथ हुई थी. वह एक प्राइवेट कंपनी में असिस्टैंट मैनेजर था. घर में किसी चीज की कमी नहीं थी, मगर मोहन को कंपनी के काम से अकसर बाहर ही रहना पड़ता था. घर में रहते हुए भी वह राधा पर कम ही ध्यान दे पाता था.
यों तो राधा एक अच्छी बीवी थी, पर मोहन का बारबार शहर से बाहर जाना उसे पसंद नहीं था. मोहन का सपाट रवैया उसे अच्छा नहीं लगता था. वह तो एक ऐसे पति का सपना ले कर आई थी, जो उस के इर्दगिर्द चक्कर काटता रहे. लेकिन मोहन हमेशा अपने काम में लगा रहता था.
अगले दिन सतीश समय से पहले औफिस पहुंच गया. वह अपनी सीट पर बैठा कुछ सोच रहा था कि तभी राधा ने अंदर कदम रखा.
सतीश को सामने देख राधा ने उस से पूछा, ‘‘कैसे हैं आप? इस शहर में पहला दिन कैसा रहा?’’
सतीश ने सहज हो कर जवाब दिया, ‘‘मैं ठीक हूं. पहला दिन तो अच्छा ही रहा. आप कैसी हैं?’’
राधा ने चहकते हुए कहा, ‘‘खुद ही देख लो, एकदम ठीक हूं.’’
इस के बाद राधा लगातार सतीश के करीब आने की कोशिश करने लगी. धीरेधीरे सतीश भी खुलने लगा. दोनों औफिस में हंसतेबतियाते रहते थे.
हालांकि औफिस के दूसरे लोग उन की इस बढ़ती दोस्ती से अंदर ही अंदर जलते थे. वे पीठ पीछे जलीकटी बातें भी करने लगे थे.
राधा के जन्मदिन पर सतीश ने उसे एक बढि़या सा तोहफा दिया और कैंटीन में ले जा कर लंच भी कराया.
राधा एक नई कशिश का एहसास कर रही थी. समय पंख लगा कर उड़ता गया. सतीश और राधा की दोस्ती गहराती चली गई.
राधा शादीशुदा है, सतीश यह बात बखूबी जानता था. वह अपनी सीमाओं को भी जानता था. उसे तो एक अजनबी शहर में कोई अपना मिल गया था, जिस के साथ वह अपने सुखदुख की बातें कर सकता था.
सतीश की मां ने कई अच्छे रिश्तों की बात अपने खत में लिखी थी, मगर वह जल्दी शादी करने के मूड में नहीं था. अभी तो उस की नौकरी लगे केवल 8 महीने ही हुए थे. वह राधा के साथ पक्की दोस्ती निभा रहा था, लेकिन राधा इस दोस्ती का कुछ और ही मतलब लगा रही थी.
राधा को लगने लगा था कि सतीश उस से प्यार करने लगा है. वह पहले से ज्यादा खुश रहने लगी थी. वह अपने मेकअप और कपड़ों पर भी ज्यादा ध्यान देने लगी थी. उस पर सतीश का नशा छाने लगा था. वह मोहन का वजूद भूलती जा रही थी.
सतीश हमेशा राधा की पसंदनापसंद का खयाल रखता था. वह उस की हर बात की तारीफ किए बिना नहीं रहता था. यही तो राधा चाहती थी. उसे अपना सपना सच होता दिखाई दे रहा था.
एक दिन राधा ने सतीश को डिनर पर अपने घर बुलाया. सतीश सही समय पर राधा के घर पहुंच गया.
नीली जींस व सफेद शर्ट में वह बेहद सजीला जवान लग रहा था. उधर राधा भी किसी परी से कम नहीं लग रही थी. उस ने नीले रंग की बनारसी साड़ी बांध रखी थी, जो उस के गोरे व हसीन बदन पर खूब फब रही थी.
सतीश के दरवाजे की घंटी बजाते ही राधा की बांछें खिल उठीं. उस ने मीठी मुसकान बिखेरते हुए दरवाजा खोला और उसे भीतर बुलाया.
ड्राइंगरूम में बैठा सतीश इधरउधर देख रहा था कि तभी राधा चाय ले कर आ गई.
‘‘मैडम, मोहनजी कहां हैं? वे कहीं दिखाई नहीं दे रहे,’’ सतीश ने पूछा.
राधा खीज कर बोली, ‘‘वे कंपनी के काम से हफ्तेभर के लिए हैदराबाद गए हैं. उन्हें मेरी जरा भी फिक्र नहीं रहती है. मैं अकेली दीवारों से बातें करती रहती हूं. खैर छोड़ो, चाय ठंडी हो रही है.’’
सतीश को लगा कि उस ने राधा की किसी दुखती रग पर हाथ रख दिया है. बातोंबातों में चाय कब खत्म हो गई, पता ही नहीं चला.
राधा को लग रहा था कि सतीश ने आ कर कुछ हद तक उस की तनहाई दूर की है. सतीश कितना अच्छा है. बातबात पर हंसतामुसकराता है. उस का कितना खयाल रखता है.
तभी सतीश ने टोकते हुए पूछा, ‘‘राधा, कहां खो गई तुम?’’
‘‘अरे, कहीं नहीं. सोच रही थी कि तुम्हें खाने में क्याक्या पसंद हैं?’’
सतीश ने चुटकी लेते हुए जवाब दिया, ‘‘बस यही राजमा, पुलाव, रायता, पूरीपरांठे और मूंग का हलवा. बाकी जो आप खिलाएंगी, वही खा लेंगे.’’
‘‘क्या बात है. आज तो मेरी पसंद हम दोनों की पसंद बन गई,’’ राधा ने खुश होते हुए कहा.
राधा सतीश को डाइनिंग टेबल पर ले गई. दोनों आमनेसामने जा बैठे. वहां काफी पकवान रखे थे.
खाते हुए बीचबीच में सतीश कोई चुटकुला सुना देता, तो राधा खुल कर ठहाका लगा देती. माहौल खुशनुमा हो गया था.
‘काश, सब दिन ऐसे ही होते,’ राधा सोच रही थी.
सतीश ने खाने की तारीफ करते हुए कहा, ‘‘वाह, क्या खाना बनाया है, मैं तो उंगली चाटता रह गया. तुम इसी तरह खिलाती रही तो मैं जरूर मोटा हो जाऊंगा.’’
‘‘शुक्रिया जनाब, और मेरे बारे में आप का क्या खयाल है?’’ कहते हुए राधा ने सतीश पर सवालिया निगाह डाली.
‘‘अरे, आप तो कयामत हैं, कयामत. कहीं मेरी नजर न लग जाए आप को,’’ सतीश ने मुसकरा कर जवाब दिया.
सतीश की बात सुन कर राधा झम उठी. उस की आंखों के डोरे लाल होने लगे थे. वह रोमांटिक अंदाज में अपनी कुरसी से उठी और सतीश के पास जा कर स्टाइल से कहने लगी, ‘‘सतीश, आज मौसम कितना हसीन है. बाहर बूंदों की रिमझिम हो रही है और यहां हमारी बातोें की. चलो, एक कदम और आगे बढ़ाएं. क्यों न प्यारमुहब्बत की बातें करें…’’
इतना कह कर राधा ने अपनी गोरीगोरी बांहें सतीश के गले में डाल दीं. सतीश राधा का इरादा समझ गया. एक बार तो उस के कदम लड़खड़ाए, मगर जल्दी ही उस ने खुद पर काबू पा लिया और राधा को अपने से अलग करता हुआ बोला, ‘‘राधाजी, आप यह क्या कर रही हैं? क्यों अपनी जिंदगी पर दाग लगाने पर तुली हैं? पलभर की मौजमस्ती आप को तबाह कर देगी.
‘‘अपने जज्बातों पर काबू कीजिए. मैं आप का दोस्त हूं, अंधी राहों पर धकेलने वाला हवस का गुलाम नहीं.
‘‘आप अपनी खुशियां मोहनजी में तलाशिए. आप के इस रूप पर उन्हीं का हक है. उन्हें अपनाने की कोशिश कीजिए,’’ इतना कह कर सतीश तेज कदमों से बाहर निकल गया.
राधा ठगी सी उसे देखती रह गई. उसे अपने किए पर अफसोस हो रहा था. वह सोचने लगी, ‘मैं क्यों इतनी कमजोर हो गई? क्यों सतीश को अपना सबकुछ मान बैठी? क्यों इस कदर उतावली हो गई?
‘अगर सतीश ने मुझे न रोका होता तो आज मैं कहीं की न रहती. बाद में वह मुझे ब्लैकमेल भी कर सकता था. मगर वह ऐसा नहीं है. उस ने मुझे भटकने से रोक लिया. कितना महान है सतीश. मुझे उस की दोस्ती पर नाज है.’
Hindi Story: यकीन करना मुश्किल था कि 20 साल पहले मैं उस कमरे में रहता था. पर बात तो सच थी. साल 1990 से ले कर साल 1993 तक छपरा में पढ़ाई के दौरान मैं ने रहने के कई ठिकाने बदले, पर जो लगाव पंडित शिव शंकर के मकान से हुआ, वह बहुत हद तक आज भी कायम है.
वह खपरैल के छोटेछोटे 8-10 कमरों का लौज था. उन्हीं में से एक कमरे में मैं रहता था. किराया 70 रुपए से शुरू हो कर मेरे वहां से हटतेहटते 110 रुपए तक पहुंच गया था. यह बात दीगर है कि मैं ने कभी समय पर किराया दिया नहीं. पंडित का बस चले तो आज भी सूद समेत मुझ से कुछ उगाही कर लें.
एक बार तो पंडित ने मेरे कुछ दोस्तों से कह भी दिया था कि भाई उन से कहिए कि उलटा हम से 2 महीने का किराया ले लें और हमारा मकान खाली कर दें.
पंडित का होटल भी था, जहां 5 रुपए में भरपेट खाने का इंतजाम था. मेरा खाना भी अकसर वहीं होता था. पंडिताइन तकरीबन आधा दिन गोबर और मिट्टी में ही लगी रहतीं. कभी उपले बनातीं, कभी मिट्टी के बरतन.
जब खाने जाओ, झट से हाथ धोतीं और चावल परोसने लगतीं. सच कहूं, उस वक्त बिलकुल नफरत नहीं होती थी, बल्कि गोबर और मिट्टी की खुशबू से खाने में और स्वाद आ जाता.
उन की एक बेटी थी मालती. साल 1993 में उधर उस की शादी हुई, इधर मैं ने मकान खाली किया. वैसे, मालती से मेरा कोई खास नजदीकी रिश्ता नहीं था, मगर उस के जाने के बाद एक अजीब सा सूनापन नजर आ रहा था. मन उचट सा गया था, इसलिए मैं ने वहां से जाने का तय किया.
इस के पहले कि दूसरा ठिकाना खोजता, मेरी नौकरी लग गई और मैं ने छपरा को अलविदा कह दिया.
20 साल बाद छपरा में एक दिन मैं बारिश में बुरी तरह घिर गया और मेरी मोटरसाइकिल बंद हो गई. सोचा, क्यों न मोटरसाइकिल को पंडित के घर रख दें, कल फिर आ कर ले जाएंगे.
मैं मोटरसाइकिल को धकेलते और बारिश में भीगता हुआ वहां पहुंचा. पंडित का होटल अब मिठाई की दुकान में तबदील हो गया था.
पंडिताइन मुझे देखते ही पहचान गईं. वे चाय बनाने लगीं. मैं ने उन से कहा, ‘‘आप चाय बनाइए, तब तक मैं अपना कमरा देख कर आता हूं जहां मैं रहता था.’’
मैं पीछे लौज की ओर गया. सारे कमरे तकरीबन गिर चुके थे. अपने कमरे के दरवाजे को मैं प्यार से सहलाने लगा, तभी मेरी नजर एक चित्र पर गई. दिल का रेखाचित्र और बीच में इंगलिश का एम देख कर यादें ताजा हो गईं.
एक दिन मैं ने मालती से कहा था, ‘अबे ओ बौनी, नकचढ़ी, नाक से बोलने वाली लड़की, तेरा यह कमरा मैं तभी खाली करूंगा, जब तू ससुराल चली जाएगी.’
इस पर मालती बनावटी गुस्से में बोली थी, ‘यह मेरा मकान है. जब चाहें तब निकाल दें तुम्हें… यह लो…’ और उस ने खुरपी से दरवाजे पर दिल का रेखाचित्र बनाया और बीच में एम लिख दिया.
मालती का कद काफी छोटा था. लौज के सारे लड़के उसे बौनी कहते थे, मगर उस के पीछे. वे जानते थे कि मालती बड़ी गुस्सैल है, सुन लेगी तो खुरपी चला देगी.
पर, यह हिम्मत मैं ने की. एक दिन उस से कहा, ‘ऐ तीनफुटिया, जरा अपनी दुकान से चाय ला कर तो दे.’
उस ने भी पलट कर कहा था, ‘चाय नहीं, जहर ला कर दूंगी भालू…’
हमारे नहाने का कार्यक्रम खुले में होता था नल के नीचे और मालती ने बालों से भरा मेरा बदन देख लिया था, इसलिए वह मुझे भालू कहती थी.
मैं समझ गया कि उसे बुरा नहीं लगा था. कुछ मस्ती मैं कर रहा था, कुछ वह. फिर तो मस्ती का सिलसिला चल पड़ा.
पंडित के घर के पिछले हिस्से में लौज था. अगले हिस्से में वे रहते थे. बीच में एक पतली गली थी.
मालती हम लोगों के लिए अलार्म का काम भी करती थी. सुबहसुबह गाय ले कर उस गली से गुजरती तो जोर से आवाज लगाती थी, ‘कौनकौन जिंदा है? जो जिंदा है, वह उठ जाए. जो मर गया, उस का राम नाम सत्य.’
मैं जानता था कि मरने वाली बात वह मेरे लिए बोलती थी, क्योंकि मैं सुबह देर तक सोता था. खैर, उस के इसी डायलौग से मेरी नींद खुलती थी. फिर भी कभी अगर नींद नहीं खुलती तो मारटन टौफी चला कर मारती. उन दिनों बिहार में मारटन टौफी का खूब प्रचलन था.
पंडित की एक राशन की दुकान भी थी, जहां उन का बेटा यानी मालती का बड़ा भाई बैठता था. उस समय मैं महज 19 साल का था. इतनी समझ नहीं थी. मैं ने मालती की राशन की दुकान का भरपूर फायदा उठाया. जब कभी वह गली से गुजरती, मैं अपनेआप से ही जोरजोर से कहता, ‘यार, कोलगेट खत्म हो गया. पैसे भी नहीं हैं. मालती बहुत अच्छी लड़की है. उस से कह दो तो कोलगेट क्या पूरी दुकान ला कर दे दे…’
फिर क्या था. थोड़ी देर बाद दरवाजे पर कोलगेट पड़ा मिलता. फिर तो कभी साबुन, कभीकभी चीनी, कभी कुछ मैं अपनी जुगत से हासिल करने लगा.
एक दिन मालती गली में टकरा गई. वह बोली, ‘तुम मेरे बारे में क्या सोचते हो, दिनरात जो तारीफ करते हो. क्या सचमुच मैं उतनी अच्छी और सुंदर हूं?’
मैं ने उस से मुसकरा कर कहा, ‘तुम तो बहुत सुंदर हो. सिर्फ थोड़ा कद छोटा है, नाक थोड़ी टेढ़ी है, दांत खुरपी जैसे हैं और गरदन कबूतर जैसी. बाकी कोई कमी नहीं. सर्वांग सुंदरी हो.’
वह लपकी, ‘तुम किसी दिन मेरी खुरपी से कटोगे. अब खा लेना मारटन टौफी…’
शरारतों का सिलसिला यों ही चलता रहा. एक दिन उस का रिश्ता आया. बाद में पता चला कि लड़के वालों ने उसे नापसंद कर दिया. यह मालती के लिए सदमे जैसा था. कई दिनों तक वह घर से नहीं निकली और जब निकली तो बदल चुकी थी. वह चंचल लड़की अब मूक गुडि़या बन चुकी थी.
एक दिन मैं ने उसे गली में घेर लिया और पूछा, ‘तू आजकल इतनी शांत कैसे हो गई?’
वह बोली, ‘तुम झूठे हो. कहते थे कि मालती सुंदर है, पर लड़के वाले रिजैक्ट कर के चले गए.’
मैं ने उसे समझाया, ‘धत पगली, वह लड़का ही तेरे लायक नहीं था. तेरे नसीब में तो कोई राजकुमार है.’
वह भोलीभाली मालती फिर से मेरी बातों का यकीन कर बैठी. अब फिर वह पहले की तरह चहकने लगी और कुछ दिनों बाद सचमुच उस की शादी तय हो गई.
उस ने मुझ से पूछा, ‘तुम मेरी शादी में आओगे न?’
मैं ने चिरपरिचित अंदाज में जवाब दिया, ‘चाहे धरती इधर की उधर हो जाए, मैं तेरी शादी जरूर अटैंड करूंगा.’
उस की शादी हो गई. संयोग देखिए, जिस दिन शादी थी, उसी दिन मेरा पटना में इम्तिहान था. मैं शादी अटैंड नहीं कर सका. मालती चली गई थी अपने साथ सारी ऊर्जा ले कर.
मालती के जाने के बाद कुछ खालीखाली सा लगने लगा था. समझ में नहीं आ रहा था कि हुआ क्या है. कहां चली गई ऊर्जा. ऐसा कब तक चल सकता था? कुछ दिनों बाद मैं ने भी वह कमरा खाली कर दिया.
मैं अपनी यादों से लौट आया. पंडिताइन की चाय तैयार थी. मैं चाय पी ही रहा था कि पंडितजी भी आ गए.
बातोंबातों में मैं ने उन से पूछा, ‘‘मालती कैसी है? आजकल वे कहां रहती है?’
तब पंडिताइन ने डबडबाई आंखों से बताया, ‘‘मालती… वह अब इस दुनिया में नहीं है.’’
यह सुन कर मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई. कांपती आवाज में मैं ने पूछा, ‘‘कब हुआ यह सब?’’
पंडिताइन ने आंखें पोंछते हुए कहा, ‘‘शादी के 2 साल बाद ही. डिलीवरी के दौरान जच्चाबच्चा दोनों.’’
ओह… तब मैं ने सोचा कि कितना बदनसीब हूं मैं. एक लड़की, जो मुझे बेइंतिहा चाहती थी, न मैं उस की शादी में शामिल हो सका और न ही जनाजे में. और तो और उस की मौत की खबर भी मिली उस के मरने के इतने साल बाद. Hindi Story
Hindi Story: महेश के कमरे से बाहर निकलते ही आभा के हृदय की धड़कन धीमी होने लगी. उस ने सोफे पर गरदन टिका कर आंखें बंद कर लीं.
आभा ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि महेश आज उसे ऐसा उत्तर देगा जिस से उस के विश्वास का महल रेत का घरौंदा बन कर ढह जाएगा. महेश ने उस की गुडि़या सी लाड़ली बेटी मिन्नी के बारे में ऐसा कह कर उस के सपनों को चूरचूर कर दिया. पता नहीं वह कैसे सहन कर पाई उन शब्दों को जो अभीअभी महेश कह कर गया था.
वह काफी देर तक चिंतित बैठी रही. कुछ देर बाद दूसरे कमरे में गई जहां मिन्नी सो रही थी. मिन्नी को देखते ही उस के दिल में एक हूक सी उठी और रुलाई आ गई. नहीं, वह अपनी बेटी को अपने से अलग नहीं करेगी. मासूम भोली सी मिन्नी अभी 3 वर्ष की ही तो है. वह मिन्नी के बराबर में लेट गई और उसे अपने सीने से लगा लिया.
5 वर्ष पहले उस का विवाह प्रशांत से हुआ था. परिवार के नाम पर प्रशांत व उस की मां थी, जिसे वह मांजी कहती थी.
प्रशांत एक प्राइवेट कंपनी में प्रबंधक था.
वह स्वयं एक अन्य कंपनी में काम करती थी.
2 वर्षों बाद ही उन के घरपरिवार में एक प्यारी सी बेटी का जन्म हुआ. बेटी का मिन्नी नाम रखा मांजी ने. मांजी को तो जैसे कोई खिलौना मिल गया हो. मांजी और प्रशांत मिन्नी को बहुत प्यार करते थे.
एक दिन उस के हंसते, खुशियोंभरे जीवन पर बिजली गिर पड़ी थी. औफिस से घर लौटते हुए प्रशांत की एक दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी. सुन कर उसे लगा था मानो कोई भयंकर सपना देख लिया हो. पोस्टमार्टम के बाद जब प्रशांत का शव घर पर आया तो वह एक पत्थर की प्रतिमा की तरह निर्जीव हो गई थी.
मिन्नी अभी केवल 2 वर्ष की थी. उस की हंसीखुशी, सुखचैन मानो प्रशांत के साथ ही चला गया था. जब भी वह अपना शृंगारविहीन चेहरा शीशे में देखती तो उसे रुलाई आ जाती थी. कभीकभी तो वह अकेली देर तक रोती रहती.
उस के मां व बाबूजी आते रहते थे उस के दुख को कुछ कम करने के लिए. उस ने औफिस से लंबी छुट्टी ले ली थी.
एक दिन उस के बाबूजी ने उसे सम झाते हुए कहा था, ‘देख बेटी, जो दुख तु झे मिला है उस से बढ़ कर कोई दुख हो ही नहीं सकता. अब तो इस दुख को सहन करना ही होगा. यह तेरा ही नहीं, हमारा भी दुख है.’
वह चुपचाप सुनती रही.
‘बेटी, मिन्नी अभी बहुत छोटी है. तेरी आयु भी केवल 30 साल की है. अभी तो तेरे जीवन का सफर लंबा है. हम चाहते हैं कि फिर से तु झे कोई जीवनसाथी मिल जाए.’
‘नहीं, मु झे नहीं चाहिए कोई जीवनसाथी. अब तो मैं मिन्नी के सहारे ही अपना जीवन गुजार लूंगी. मैं इसे पढ़ालिखा कर किसी योग्य बना दूंगी. अगर मेरे जीवन में जीवनसाथी का सुख होता तो प्रशांत हमें छोड़ कर जाता ही क्यों?’ उस ने कहा था.
तब मां व बाबूजी ने उसे बहुत सम झाया था, पर उस ने दूसरी शादी करने से मना कर दिया था.
4 महीने बाद कंपनी ने उस का ट्रांस्फर देहरादून कर दिया था. वह बेटी मिन्नी के साथ देहरादून पहुंच गई थी.
देहरादून में उस की एक सहेली लीना थी. लीना का 4-5 कमरों का मकान था. लीना तो कहती थी कि उसे किराए का मकान लेने की क्या जरूरत है. यहीं उस के साथ रहे, जिस से उसे अकेलेपन का भी एहसास नहीं होगा. पर वह नहीं मानी थी.
उस ने हरिद्वार रोड पर 2 कमरों का एक फ्लैट किराए पर ले लिया था.
कुछ दिनों में उसे ऐसा लगने लगा था कि एक व्यक्ति उस में कुछ ज्यादा रुचि ले रहा है. वह व्यक्ति था महेश. कंपनी का सहायक प्रबंधक. महेश उसे किसी न किसी बहाने केबिन में बुलाता और उस से औफिस के काम के बारे में बातचीत करता.
एक दिन सुबह वह सो कर भी नहीं उठी थी कि मोबाइल फोन की घंटी बजने लगी. सुबहसुबह किस का फोन आ गया.
उस ने मोबाइल स्क्रीन पर पढ़ा – महेश.
महेश ने सुबहसुबह क्यों फोन किया? आखिर क्या कहना चाहता है वह? उस ने फोन एक तरफ रख दिया. आंखें बंद कर लेटी रही. फोन की घंटी बजती रही. दूसरी बार फिर फोन की घंटी बजी, तो उस ने झुं झला कर फोन उठा कर कहा, ‘हैलो…’
‘आभाजी, आप सोच रही होंगी कि पता नहीं क्यों सुबहसुबह डिस्टर्ब कर रहा हूं जबकि हो सकता है आप सो रही हों. पर बात ही ऐसी है कि…’
‘ऐसी क्या बात है जो आप को इतनी सुबह फोन करने की जरूरत आ पड़ी. यह सब तो आप औफिस में भी…’
‘नहीं आभाजी, औफिस खुलने में अभी 3 घंटे हैं और मैं 3 घंटे प्रतीक्षा नहीं कर सकता.’
‘अच्छा, तो कहिए.’ वह सम झ नहीं पा रही थी कि वह कौन सी बात है जिसे कहने के लिए महेश 3 घंटे भी प्रतीक्षा नहीं कर पा रहा है.
‘जन्मदिन की शुभकामनाएं आप को व बेटी मिन्नी को. आप दोनों के जन्मदिन की तारीख भी एक ही है,’ उधर से महेश का स्वर सुनाई दिया.
चौंक उठी थी वह. अरे हां, आज तो उस का व बेटी मिन्नी का जन्मदिन है. वह तो भूल गई थी पर महेश को कैसे पता चला? हो सकता है औफिस की कंप्यूटर डिजाइनर संगीता ने बता दिया हो क्योंकि उस ने संगीता को ही बताया था कि उस की व मिन्नी के जन्म की तिथि एक ही है.
‘थैंक्स सर,’ उस ने कहा था.
‘केवल थैंक्स कहने से काम नहीं चलेगा, आज शाम की दावत मेरी तरफ से होगी. जिस रैस्टोरैंट में आप कहो, वहीं चलेंगे तीनों.’
‘तीनों कौन?’
‘आप, मिन्नी और मैं.’
सुन कर वह चुप हो गई थी. सम झ नहीं पा रही थी कि क्या उत्तर दे.
‘आभाजी, प्लीज मना न करना, वरना इस बेचारे का यह छोटा सा दिल टूट जाएगा,’ बहुत ही विनम्र शब्द सुनाई दिए थे महेश के.
वह मना न कर सकी. मुसकराते हुए उस ने कहा था, ‘ओके.’
शाम को वह मिन्नी के साथ रैस्टोरैंट में पहुंच गई थी जहां महेश उस की प्रतीक्षा कर रहा था. खाने के बाद जब वह घर वापस लौटी तो 10 बज रहे थे.
बिस्तर पर लेटते ही मिन्नी सो गई थी. पर उस की आंखों में नींद न थी. वह आज महेश के बारे में बहुतकुछ जान चुकी थी कि महेश के पापा एक व्यापारी हैं. वह अपने घरपरिवार में इकलौता है. मम्मीपापा उस की शादी के लिए बारबार कह रहे हैं. कई लड़कियों को वह नापसंद कर चुका है. उस ने मम्मीपापा से साफ कह दिया है कि वह जब भी शादी करेगा तो अपनी मरजी से करेगा.
वह सम झ नहीं पा रही थी कि महेश उस की ओर इतना आकर्षित क्यों हो रहा है. महेश युवा है, अविवाहित और सुंदर है. अच्छीखासी नौकरी है. उस के लिए लड़कियों की कमी नहीं. महेश कहीं इस दोस्ती की आड़ में उसे छलना तो नहीं चाहता? पर वह इतनी कमजोर नहीं है जो यों किसी के बहकावे में आ जाए. उस के अंदर एक मजबूत नारी है. वह कभी ऐसा कोई गलत काम नहीं करेगी जिस से आजीवन प्रायश्चित्त करना पड़े.
कमल उस का मकान मालिक था. उस का फ्लैट भी बराबर में ही था. वह एक सरकारी विभाग में कार्यरत था. परिवार के नाम पर कमल, मां और 5 वर्षीय बेटा राजू थे. कमल की पत्नी बहुत तेज व झगड़ालू स्वभाव की थी. वह कभी भी आत्महत्या करने और कमल व मांजी को जेल पहुंचाने की धमकी भी दे देती थी. रोजाना घर में किसी न किसी बात पर क्लेश करती थी. कमल ने रोजाना के झगड़ों से परेशान हो कर पत्नी से तलाक ले लिया था.
आभा मिन्नी को सुबह औफिस जाते समय एक महिला के घर छोड़ आती थी, जहां कुछ कामकाजी परिवार अपने छोटे बच्चों को छोड़ आते थे. शाम को औफिस से लौटते समय वह मिन्नी को वहां से ले आती थी.
एक दिन मांजी ने आभा के पास आ कर कहा था, ‘बेटी, तुम औफिस जाते समय मिन्नी को हमारे पास छोड़ जाया करो. वह राजू के साथ खेलेगी. दोनों का मन लगा रहेगा. हमारे होते हुए तुम किसी तरह की चिंता न करना, आभा.’
उस दिन के बाद वह मिन्नी को मांजी के पास छोड़ कर औफिस जाने लगी.
रविवार छुट्टी का दिन था. वह मिन्नी के साथ एक शौपिंग मौल में पहुंची. लौट कर बाहर सड़क पर खड़ी औटो की प्रतीक्षा कर रही थी, तभी एक बाइक उस के सामने रुकी, बाइक पर बैठे कमल ने कहा, ‘आभाजी, आइए बैठिए.’
वह चौंकी, ‘अरे आप? नहींनहीं, कोई बात नहीं, मैं चली जाऊंगी. थ्रीव्हीलर मिल जाएगा.’
‘क्यों, टूव्हीलर से काम नहीं चलेगा क्या? इस ओर मेरा एक मित्र रहता है. बस, उसी से मिल कर आ रहा हूं. यहां आप को देखा तो मैं सम झ गया कि आप किसी बस या औटो की प्रतीक्षा में हैं. आइए, आप जहां कहेंगी, मैं आप को छोड़ दूंगा.’
‘मु झे पलटन बाजार जाना है,’ उस ने बाइक पर बैठते हुए कहा.
‘ओके मैडम. घर पहुंच कर मां को मेरे लिए भी एक रस्क का पैकेट दे देना.’ उस ने रस्क के कई पैकेट खरीदे थे जो कमल ने देख लिए थे.
‘ठीक है,’ उस ने कहा था.
कमल उसे व मिन्नी को पलटन बाजार में छोड़ कर चला गया.
आभा कभीकभी मांजी व कमल के बारे में सोचती कि कितना अच्छा स्वभाव है दोनों का. हमेशा दूसरों की भलाई के बारे में सोचते हैं. दोनों ही बहुत मिलनसार व परोपकारी हैं.
अकसर मांजी राजू को साथ ले कर उस के पास आ जाती थीं. राजू और मिन्नी खेलते रहते. वह मांजी के साथ बातों में लगी रहती.
एक दिन मांजी ने कहा था, ‘आभा, हमारे साथ तो कुछ भी ठीक नहीं हुआ. ऐसी झगड़ालू बहू घर में आ गई थी कि क्या बताऊं. बहू थी या जान का क्लेश. हमें तो तुम जैसी सुशील बहू चाहिए थी.’
वह कुछ नहीं बोली. बस, इधरउधर देखने लगी.
धीरेधीरे उस के व महेश के संबंधों की दूरी घटने लगी थी. महेश ने उस से कह दिया था कि वह जल्द ही उस के जीवन का हमसफर बन जाएगा. उसे भी लग रहा था कि उस ने महेश की ओर हाथ बढ़ा कर कुछ गलत नहीं किया है.
आज शाम जब वह रसोई में थी तो महेश का फोन आ गया था, ‘मैं कुछ देर बाद आ रहा हूं. कुछ जरूरी बात करनी है.’ ऐसी क्या जरूरी बात है जो महेश घर आ कर ही बताना चाहता है. उस ने जानना भी चाहा, परंतु महेश ने कह दिया था कि वहीं घर आ कर बताएगा.
एक घंटे बाद महेश उस के पास आ गया.
‘क्या लोगे? ठंडा या गरम?’ उस ने पूछा था.
‘कुछ नहीं.’
‘ऐसा कैसे हो सकता है? कोल्डडिं्रक्स ले लीजिए,’ कहते हुए वह रसोई की ओर चली गई. जब लौटी तो ट्रे में 2 गिलास कोल्डडिं्रक्स के साथ खाने का कुछ सामान था.
‘अब कहिए अपनी जरूरी बात,’ उस ने मुसकरा कर महेश की ओर देखते हुए कहा.
‘आज मम्मीपापा आए हैं दिल्ली से. मैं ने उन को सबकुछ बता दिया था. यह भी कह दिया था कि शादी करूंगा तो केवल आभा से. कल वे तुम से मिलने आ रहे हैं,’ महेश ने उस की ओर देखते हुए कहा था. उस के चेहरे पर प्रसन्नता की रेखाएं फैलने लगीं.
‘मम्मीपापा ने इस शादी की स्वीकृति तो दे दी है, परंतु एक शर्त रख दी है.’
वह चौंक उठी, ‘शर्त, कैसी शर्त?’
‘वे कहते हैं कि शादी के बाद मिन्नी किसी होस्टल में रहेगी या नानानानी के पास रहेगी.’
यह सुन कर मन ही मन तड़प उठी थी वह. उस ने कहा, ‘यह तो मम्मीपापा की शर्त है, आप का क्या कहना है?’
‘देखो आभा, मेरी बात को सम झने की कोशिश करो. मिन्नी को अच्छे स्कूल व होस्टल में भेज देंगे. हम उस से मिलते भी रहेंगे.’
‘नहीं, महेश ऐसा नहीं हो सकता. मैं मिन्नी के बिना और मिन्नी मेरे बिना नहीं रह सकती.’
‘ओह आभा, तुम सम झती क्यों नहीं.’
‘मु झे कुछ नहीं सम झना है. मैं एक मां हूं. मिन्नी मेरी बेटी है. आप ने यह कैसे कह दिया कि मिन्नी होस्टल में रह लेगी. मैं अपनी मिन्नी को अपने से दूर नहीं कर सकती.’
‘तब तो बहुत कठिन हो जाएगा, आभा. मम्मीपापा नहीं मानेंगे.’
‘कोई बात नहीं. आप अपने मम्मीपापा का कहना मानो. वैसे भी शर्तों के आधार पर जीवन में साथसाथ नहीं चला जा सकता,’ उस ने दुखी मन से कहा था.
‘सोच लेना, आभा, सारी रात है. कल मु झे जवाब दे देना.’
‘मेरा निर्णय तो सदा यही रहेगा कि जो मु झे मेरी बेटी से दूर करना चाहता है उस के साथ मैं सपने में भी नहीं रह सकती.’ उस ने दृढ़ स्वर में कहा था.
कुछ देर बाद महेश उठ कर कमरे से बाहर निकल गया था.
विचारों में डूबतेतैरते आभा को नींद आ गई थी. सुबह आभा की आंख खुली तो सिर में दर्द हो रहा था और उठने को मन भी नहीं कर रहा था. रात की बातें याद आने लगीं. हृदय पर फिर से भारी बो झ पड़ने लगा. क्या महेश ऊपरी मन से मिन्नी को प्रेम व दुलार देता था? मिन्नी को बेटीबेटी कहना केवल दिखावा था. यदि वह पहले ही यह सब जान जाती तो महेश की ओर कदम ही न बढ़ाती. महेश भी तो मिन्नी को उस से दूर करना चाहता है.
नहीं, वह मिन्नी को कभी स्वयं से दूर नहीं करेगी. प्रशांत के जाने के बाद उस ने मिन्नी को पढ़ालिखा कर किसी योग्य बनाने का लक्ष्य बनाया था. पर जब महेश ने उस की ओर हाथ बढ़ाया तो वह स्वयं को रोक नहीं पाई थी.
दोपहर को आभा के मोबाइल की घंटी बजी. स्क्रीन पर महेश का नाम था. उस ने कहा, ‘‘हैलो.’’
‘‘आभा, आज आप औफिस नहीं आईं?’’ स्वर महेश का था.
‘‘हां, आज तबीयत ठीक नहीं है, औफिस नहीं आ पाऊंगी.’’
‘‘दवा ले लेना. मेरी जरूरत हो तो फोन कर देना. मैं डाक्टर के यहां ले चलूंगा.’’
‘‘ठीक है.’’
उधर से मोबाइल बंद हो गया. आभा मन ही मन तड़प कर रह गई. उस ने सोचा था कि शायद महेश यह कह देगा कि मिन्नी हमारे साथ ही रहेगी, पर ऐसा नहीं हुआ. अब वह एक अंतिम निर्णय लेने पर विवश हो गई. ठीक है जब महेश को उस की बेटी मिन्नी की जरा भी चिंता नहीं है तो उसे क्या जरूरत है महेश के बारे में सोचने की.
दोपहर बाद मांजी आभा के पास आईं और बोलीं, ‘‘अरे बेटी, आज तुम औफिस नहीं गईं?’’
‘‘मांजी, आज तबीयत कुछ खराब थी, इसलिए औफिस से छुट्टी कर ली.’’
‘‘क्यों, क्या हुआ? मु झे बता देती. मैं कमल से कह कर दवा मंगा देती. कहीं डाक्टर को दिखाना है तो मैं शाम को तेरे साथ चलूंगी.’’
‘‘नहींनहीं, मांजी. मामूली सा सिरदर्द था, अब तो ठीक भी हो गया है. आप चिंता न करें.’’
‘‘तू मेरी बेटी की तरह है. बेटी की चिंता मां को नहीं होगी तो फिर किसे होगी?’’ मांजी ने आभा की ओर देखते हुए कहा.
आभा मांजी की ओर देखती रह गई. ठीक ही तो कह रही हैं मांजी. बेटी की चिंता मां नहीं करेगी तो कौन करेगा. उस के चेहरे पर प्रसन्नता फैल गई. वह कुछ नहीं बोली.
‘‘बेटी, बहुत दिनों से एक बात कहना चाह रही थी, पर डर रही थी कि कहीं तुम बुरा न मान जाओ,’’ मांजी बोलीं.
‘‘मांजी, आप कहिए. मां की बात का बेटी भी कहीं बुरा मानती है क्या?’’
‘‘बेटी, तुम तो हमारे छोटे से घरपरिवार के बारे में जानती हो. कमल में कोई ऐब नहीं है. उस की आयु भी ज्यादा नहीं है. जब भी उस से दूसरी शादी की बात करती हूं तो मना कर देता है. उसे डर है कि दूसरी लड़की भी तेज झगड़ालू आदत की आ गई तो यह घर घर न रहेगा.’’
आभा सम झ गई जो मांजी कहना चाहती हैं लेकिन वह चुप रही.
मांजी आगे बोलीं, ‘‘बेटी, जब से तुम हमारे यहां किराएदार बन कर आई हो, मैं तुम्हारा व्यवहार अच्छी तरह परख चुकी हूं. राजू और मिन्नी भी आपस में हिलमिल गए हैं. तुम्हारे औफिस जाने के बाद दोनों आपस में खूब खेलते हैं. मैं चाहती हूं कि तुम हमारे घर में बहू बन कर आ जाओ. राजू को बहन और मिन्नी को भाई मिल जाएगा. कमल भी ऐसा ही चाहता है. मैं बहुत आशाएं ले कर आई हूं, निराश न करना अपनी इस मांजी को.’’
सुनते ही आभा की आंखों के सामने महेश और कमल के चेहरे आ गए. कितना अंतर है दोनों में. महेश तो अपने मम्मीपापा के कहने में आ कर बेटी मिन्नी को उस से दूर करना चाहता है जबकि मांजी मिन्नी को अपने पास ही रखना चाहती हैं. इस में तो कमल की भी स्वीकृति है.
‘‘क्या सोच रही हो, बेटी? मु झे तुम्हारा उत्तर चाहिए. यदि तुम ने हमारे राजू को अपना बेटा बना लिया तो मेरी बहुत बड़ी चिंता दूर हो जाएगी,’’ मांजी ने आभा की ओर देखा.
आभा कुछ नहीं बोली. वह चुपचाप उठी, साड़ी का पल्लू सिर पर किया और मुड़ कर मांजी के चरण छू लिए.
मांजी को उत्तर मिल गया था. वे प्रसन्नता से गदगद हो कर बोलीं, ‘‘मु झे तुम से ऐसी ही आशा थी, बेटी. सदा सुखी रहो. तुम अपने मम्मीपापा को बुला लेना. उन से भी बात करनी है.’’
‘‘अच्छा मांजी.’’
‘‘और हां, आज रात का खाना हम सभी इकट्ठा खाएंगे.’’
‘‘खाना मैं बनाऊंगी, मांजी. मैं आप की और कमल की पसंद जानती हूं.’’
‘‘ठीक है, बेटी. अब मैं चलती हूं. कमल को भी यह खुशखबरी सुनाना चाहती हूं. उस से कह दूंगी कि औफिस से लौटते समय मिठाई का डब्बा लेता आए क्योंकि आज सभी का मुंह मीठा कराना है,’’ मांजी ने कहा और कमरे से बाहर निकल गईं.
अगले दिन सुबह जब आभा की नींद खुली तो 7 बज रहे थे. रात की बातें याद आते ही उस के चेहरे पर प्रसन्नता दौड़ने लगी. रात खाने की मेज पर कमल, मांजी, वह, राजू और मिन्नी बैठे थे. खाना खाते समय कमल व मांजी ने बहुत तारीफ की थी कि कितना स्वादिष्ठ खाना बनाया है. हंसी, मजाक व बातों के बीच पता भी न चला कि कब 2 घंटे व्यतीत हो गए. उसे बहुत अच्छा लगा था.
वह आंखें बंद किए अलसाई सी लेटी रही. बराबर में मिन्नी सो रही थी.
अगली सुबह आभा नाश्ता कर रही थी. तभी मोबाइल की घंटी बज उठी. उस ने देखा कौल महेश की थी.
‘‘हैलो,’’ वह बोली.
‘‘अब कैसी हो, आभा?’’
‘‘मैं ठीक हूं.’’
‘‘मैं ने मम्मीपापा को मना लिया है. वे बहुत मुश्किल से तैयार हुए हैं. अब मिन्नी हमारे साथ रह सकती है.’’
‘‘आप को अपने मम्मीपापा को जबरदस्ती मनाने की जरूरत नहीं थी.’’
‘‘मैं कुछ सम झा नहीं?’’
‘‘सौरी महेश, आप ने थोड़ी सी देर कर दी. अब तो मैं अपनी मिन्नी के साथ काफी दूर निकल चुकी हूं. अब लौट कर नहीं आ पाऊंगी.’’
‘‘आभा, तुम क्या कह रही हो, मेरी सम झ में कुछ नहीं आ रहा है,’’ महेश का परेशान व चिंतित सा स्वर सुनाई दिया.
‘‘अभी आप इतना ही सम झ लीजिए कि मु झे बिना शर्त का रिश्ता यानी अपना घरपरिवार मिल गया है, जहां मिन्नी को ले कर कोई शर्त नहीं. मिन्नी भी साथ रहेगी. आप अविवाहित हैं, आप की शादी भी जल्द हो जाएगी. मैं आज औफिस आ रही हूं, बाकी बातें वहां आ कर सम झा दूंगी,’’ यह कह कर आभा ने मोबाइल बंद कर दिया और निश्चिंत हो कर नाश्ता करने लगी. Hindi Story
Hindi Story: रवि को फ्लैट अच्छा लगा. हवादार, सारे दिन की धूप, बड़े कमरे, बड़ी रसोई, बड़े बाथरूम. पहली नजर में ही रवि को पसंद आ गया. दाम कुछ अधिक लग रहा है, दूसरे ब्रोकर्स कम कीमत में फ्लैट दिलाने को कह रहे थे परंतु रवि मनपसंद फ्लैट, जैसे उस की कल्पना थी वैसा, पा कर कुछ अधिक कीमत देने को तैयार हो गया. पत्नी रीना और बच्चों को भी फ्लैट पसंद आया. लोकेशन औफिस के पास होने के कारण रवि ने उस फ्लैट को खरीदने के लिए ब्रोकर से कहा. फ्लैट के मालिक से शाम को डील फाइनल करने के लिए समय तय हो गया.
रवि ने ब्रीफकेस में चैकबुक रखी और कैश निकालने के लिए बैंक गया. कार को बैंक के बाहर पार्क कर रवि ने बैंक से कैश निकाला. लगभग 10 मिनट बाद रवि जब बैंक से बाहर आया तब उस समय बहुत सी कारें आड़ीतिरछी पार्क थीं.
रवि सोचने लगा कि कार पार्किंग से कैसे बाहर आए. 2 कारों के बीच जगह थी. रवि कार को वहां से निकालने के लिए कार को उन 2 कारों के बीच में करने लगा, परंतु तेजी से एक बड़ी सी महंगी कार उन 2 कारों के बीच खाली जगह पर गोली की रफ्तार से दनदनाती हुई आई और रवि की कार के सामने तेजी से ब्रेक मार कर रुक गई.
कार में बैठा नवयुवक कीमती मोबाइल फोन पर बात कर रहा था और हाथ से कुछ इशारे कर रहा था जो रवि समझ नहीं सका. नवयुवक मोबाइल पर बात करता हुआ इशारे करता जा रहा था. रवि ने कार से उतर कर नवयुवक से अनुरोध किया कि उसे अपनी कार को निकालना है, सो प्लीज, उसे निकलने दीजिए, फिर आप इसी जगह पार्क कर लीजिए.
तभी वह युवक ताव में आ कर कहने लगा, ‘‘बुड्ढे, कार यहीं खड़ी होगी, इतनी देर से इशारा कर रहा हूं, कार पीछे कर. मेरी कार यहीं खड़ी होगी. समझा बुड्ढे या दूसरे तरीके से समझाना पड़ेगा. मेरे से बहस कर रहा है. पीछे हटा मच्छर को, नहीं तो मसल दूंगा, जरा सी आगे की तो उड़ जाएगी, पीछे हट. मेरी कार यहीं पार्क होगी.’’
इतना सुन कर रवि ने किसी अनहोनी से घबरा कर कार पीछे की और नवयुवक ने कार वहां पार्क की और गोली की रफ्तार से कार को लौक कर के मोबाइल पर बात करता हुआ चला गया. महंगी कार, सिरफिरा नवयुवक शायद कोई चाकू, पिस्तौल जेब में हो, चला दे. आजकल कुछ पता नहीं चलता. छोटीछोटी बातों पर आपा खो कर नवयुवक गोलीचाकू चला देते हैं. यही सोच कर रवि ने कार पीछे कर ली और लुटेपिटे खिलाड़ी की तरह होंठ पर हाथ रख कर सोचने लगा.
एक आम व्यक्ति की कोई औकात नहीं है. माना अमीर नहीं है, नौकरी करता है, मध्यवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखता है. एक छोटी सी कार उस की नजर में बड़ी संपति है, मगर एक मगरूर इंसान ने उसे मच्छर बना दिया. कोई कीमत नहीं है छोटी कार की. अमीर आदमी की नजर में वह और उस की कार की कोई कीमत नहीं. न सही, किसी के बारे में वह क्या कर सकता है. उस नवयुवक के घमंड को देख कर उस ने दांतों तले उंगली दबा ली.
वह इंतजार करने लगा कि आसपास खड़ी कोई कार हिले, तो वह अपनी कार को हिलाए. लगभग 20 मिनट बाद उस के पास खड़ी कार हटी, तब रवि को शांति मिली. उस का दिमाग, जो अब तक कई सौ मील दूर तक की कल्पना कर चुका था, जमीन पर आया, कार स्टार्ट की और घर वापस आया.शाम को रवि, रीना ब्रोकर सतीश के साथ फ्लैट मालिक ओंकारनाथ के औफिस पहुंचे. सतीश ने सेठ ओंकारनाथ का गुणगान शुरू किया. ‘‘सेठजी का क्या कहना, धन्ना सेठ हैं. प्रौपर्टी में निवेश करते हैं. पूरे देश में, हर कोने में सेठजी की प्रौपर्टी मिलेगी. बस, शहर का नाम लो, प्रौपर्टी हाजिर है. 100 से अधिक प्रौपर्टी हैं सेठजी की.’’
‘‘आज इस समय 140 प्रौपर्टीज हैं,’’ सेठजी ने पुष्टि की. ‘लोन मेरा पास हो गया है. आप प्रौपर्टी के कागजों की कौपी दे दें. मुझे पेमैंट की कोई चिंता नहीं है. अधिक से अधिक एक सप्ताह में पूरी पेमैंट हो जाएगी. प्रौपर्टी के कागज बैंक में दिखा कर लोन की पेमैंट हो जाएगी. बयाना मैं अभी दे देता हूं. सौदा पक्का कर लेते हैं. बस, आप एक बार कागज दिखा दीजिए,’’ रवि ने सेठजी से कहा.
‘‘ठीक है. अलमारी की चाबी मेरे लड़के के पास है. फोन कर के बुलाता हूं,’’ कह कर सेठजी ने फोन किया. 2 मिनट बाद सेठजी के लड़के ने औफिस में प्रवेश किया. मोबाइल पर बात करतेकरते अलमारी खोली और फाइल टेबल पर रखी. रवि ने लड़के को देखा. लड़का वही सुबह वाला नवयुवक था, जिस की महंगी कार ने उस की कार को निकलने नहीं दिया और घमंड में रवि का उपहास किया. रवि ने उसे पहचान लिया. बुड्ढा, मच्छर, उड़ा दूंगा, कार यहीं पार्क करूंगा, नहीं निकलने दूंगा कार, ये शब्द उस के कानों में बारबार गूंज रहे थे. रवि उस लड़के को लगातार देखता रहा. सतीश ने फाइल रवि की ओर करते हुए चुप्पी तोड़ी.
‘‘तसल्ली कर लीजिए और बयाना दे कर सौदा पक्का कीजिए.’’
‘‘सतीशजी, अब इस की कोई जरूरत नहीं है. आप कोई दूसरा सौदा बताना.’’
‘‘क्या बात है, रविजी, आप के सपने का फ्लैट आप को मिल रहा है, जिस की तलाश कर रहे थे, वह आप के सामने है.’’ रवि ने ब्रीफकेस को बंद किया और सौदा न करने पर खेद व्यक्त किया और जाने के लिए कुरसी से उठा, ‘‘रीना, कोई दूसरा फ्लैट देखेंगे, अब चलते हैं.’’
‘‘मिस्टर रवि, कोई बात नहीं, आप फ्लैट खरीदना नहीं चाहते, यह आप का निर्णय है. परंतु मैं इस का कारण जानना चाहता हूं, क्योंकि आप इस फ्लैट के लिए उत्सुक थे. फाइल देखना चाहते थे. जब फाइल सामने रखी, तो बिना फाइल देखे इरादा बदल लिया,’’ सेठजी ने रवि से बैठने के लिए कहा.
‘‘सेठजी, यह मत पूछिए.’’
‘‘कोई बात नहीं. यदि कोई कड़वी बात है, वह भी बताओ. कारण जानना चाहता हूं.’’ ‘‘सेठजी, बात आत्मसम्मान की है. आज सुबह बहुत गालियां सुनी हैं. ठेस पहुंची है. कलेजे को चीर गई हैं बातें,’’ कह कर सुबह का किस्सा सुनाया, ‘‘वह नवयुवक और कोई नहीं, आप के सुपुत्र हैं. इसी कारण मैं ने अपने सपने को तोड़ा. जिस तरह के फ्लैट की चाह थी, जिस के लिए अधिक रकम देने को तैयार था, वही सौदा तोड़ रहा हूं. मेरा आत्मसम्मान मुझे सौदा करने की इजाजत नहीं देता. आप के सामने आर्थिक रूप में मेरी कोई औकात नहीं है. परंतु अमीरों का गरीबों की बिना बात के तौहीन करना उचित नहीं है. सिर्फ विनती की थी, कार निकालने के लिए, 10-15 सैकंड में क्या फर्क पड़ता. कार मुझे तो निकालनी थी, पार्क तो आप की कार ही होती, परंतु आप के बरखुरदार ने मेरी खूब बेइज्जती की.’’ उठतेउठते रवि ने एक बात कही, ‘‘सेठजी, आप ने रुपएपैसों से अपने लड़के की जेबें भर रखी हैं. थोड़ी समझदारी, दुनियादारी की तालीम दीजिए. संयम रखना सिखाइए. इज्जत दीजिए और इज्जत लीजिए.’’
रवि चला गया. औफिस में रह गए सेठजी और उन के सुपुत्र. सेठजी कुछ कह नहीं सके. लड़के ने मोबाइल से फोन मिलाया और दनदनाता हुआ औफिस से बाहर चला गया. Hindi Story
Hindi Story: चढ़ती हुई बेल… कैसी दीवानी होती है… नयानया जोबन, अल्हड़पन, बदहवास सी, बस अपनी मस्ती में सरसराती हुई छुईमुई सी हिलोरें लेती है… जिस का सहारा मिल गया, उसी से लिपट जाती है.ऐसा ही तो नव्या के साथ हो रहा था. अभीअभी जवानी की दहलीज पर कदम रखा था मानो एक नशा सा चढ़ने लगा था. एक खुमारी सी…
आईने में खुद को कईकई बार देखना, उभरते अंगों को देख कर मुसकराना और अकेले में उभारों को हलके से छूना और मस्त हो जाना. नहीं संभाल पा रही थी वह अपनी भावनाओं को, अब तो बस वह समा जाना चाहती थी किसी की मजबूत बांहों में, जहां उस के हर अंग पर पा सके वह किसी का चुंबन और सैक्स की गहराई का मजा ले सके.‘‘नव्या, यह क्या तू हर समय आईने के सामने खड़ी रहती है… स्कूल नहीं जाना है क्या? इम्तिहान सिर पर हैं…’’
अचानक तनुजा की आवाज से नव्या चौंक गई.‘‘अरे मम्मी, जा रही हूं न. चोटी कर रही थी…’’ नव्या ने कहा और आईने में अपने उभारों को देख कर मुसकराती हुई यूनिफार्म की कमीज ठीक करने लगी.‘‘चल, जल्दी कर. तेरी फ्रैंड बुला रही है,’’ तनुजा ने लंच बौक्स उस के स्कूल बैग में रखते हुए कहा.‘‘ओके, बाय मम्मी. लव यू…’’ तनुजा को गाल पर किस करते हुए नव्या ने कहा और बैग उठा कर बाहर भाग गई.‘‘यह लड़की भी न, घोड़े पर सवार रहती है,’’ तनुजा बोली और काम में लग गई.
‘‘वाह यार, आज तो तू झकास लग रही है… फेशियल किया है क्या?’’ नव्या की फ्रैंड सुहानी ने उस के दमकते हुए चेहरे को देखते हुए कहा.‘‘नहीं तो, यह तो नैचुरल ग्लो है,’’ नव्या ने इतराते हुए कहा.‘‘आज तो देखना कि विपुल सर तुझे ही ताड़ेंगे. नजरें नहीं हटेंगी उन की तुझ पर से. क्या इरादा है नव्या मैडम…’’ सुहानी ने आंख मारते हुए कहा.‘‘अरे यार, अपने ऐसे नसीब कहां…
मैं तो कब से उन्हें लाइन दे रही हूं, लेकिन वे तो भाव ही नहीं देते. काश, एक बार नजरें इनायत कर लें इस बंदी पर तो लाइफ बन जाए यार,’’ नव्या ने आह भरते हुए कहा और दोनों हंस पड़ीं.‘‘अरे, देख तो यह सिम्मी किस के साथ आई है… चलचल देखते हैं कौन है यह बंदा…’’ स्कूल के सामने एक क्लासमेट को किसी लड़के की बाइक से उतरते देख कर सुहानी बोली.‘‘इस की तो…
चल देखते हैं,’’ नव्या ने खीजते हुए कहा.‘हाय सिम्मी…’ दोनों ने पास पहुंच कर एकसाथ कहा.‘‘हाय फ्रैंड्स, यह है मेरा कजिन वासु. और वासु, ये मेरी फ्रैंड्स हैं नव्या और सुहानी,’’ सिम्मी ने उन्हें आपस में मिलवाया.‘‘हैलो, प्रिटी गर्ल्स,’’ वासु ने सनग्लासेस को बालों पर चढ़ाते हुए कहा.‘‘हैलो,’’ नव्या ने कहा और दावत देती हुई निगाहों से उस की आंखों में देखा, जवाब में वासु ने भी पलकें झपका कर मानो उस का आमंत्रण कबूल किया.‘‘चलोचलो, क्लास शुरू हो जाएगी.
ओके वासु, बायबाय… ऐंड थैंक्यू, तुम नहीं आते तो आज मैं लेट हो जाती,’’ सिम्मी ने कहा.‘‘ओके, बायबाय,’’ वासु ने बाइक स्टार्ट करते हुए कहा और चला गया.नव्या उसे जाते हुए देख रही थी कि सुहानी उस को खींचते हुए स्कूल के अंदर ले गई.क्लास चल रही थी. सभी लड़कियां नोट्स लिखने में मगन थीं, लेकिन नव्या की आंखों के सामने वासु का चेहरा घूम रहा था.‘‘नव्या चौधरी…’’ तभी टीचर की आवाज से वह सहम गई. उसे लगा कि उस की चोरी पकड़ी गई है.‘‘जी मैडम,’’
नव्या अपनी जगह पर खड़े होते हुए बोली.‘‘ध्यान कहां है तुम्हारा? बताओ, क्या पढ़ा रही हूं मैं?’’ टीचर ने गुस्से से तमतमा कर कहा.‘‘मैडम… वह… ये… आप…’’ नव्या कुछ बता नहीं पाई.‘‘चुप रहो, मुझे पता है कि तुम्हारा ध्यान नहीं था. एग्जाम टाइम में यह हाल है, बैठो और अब फोकस करो,’’ टीचर ने हिदायत दी.‘‘जी मैडम,’’ कह कर नव्या बैठ गई. अगला पीरियड विपुल सर का था.
वे बिजनैस एडमिनिस्ट्रेशन पढ़ाते थे. नव्या अब उन के आने का बेसब्री से इंतजार करने लगी.‘‘नव्या, विपुल सर आने वाले हैं,’’ सुहानी ने चुटकी ली.‘‘हां यार, मुझे पता है,’’ बालों को झटकते हुए नव्या बोली.‘‘गुड मौर्निंग गर्ल्स…’’ विपुल सर की आवाज सुनते ही नव्या के कानों में सीटियां बजने लगीं. शरीर को एकदम टाइट कर के, पैर पर पैर चढ़ा कर वह ऐसे बैठी, जिस से स्कर्ट से उस की दूधिया और मांसल जांघें साफ नजर आ रही थीं.विपुल सर की निगाहें एक बार उन्हीं पर जा टिकीं, लेकिन जल्दी ही उन्होंने खुद पर काबू करते हुए पढ़ाना शुरू कर दिया.नव्या का बारबार पहलू बदलना, जांघों को हाईलाइट करना, विपुल सर को खुला आमंत्रण लगा. उन्होंने भी क्लास खत्म होने के बाद नव्या को बुलाया.
नव्या की तो धड़कनें आपे से बाहर हो गईं. वह सर के पास पहुंच कर बोली, ‘‘जी सर?’’‘‘नव्या, तुम्हें कोई प्रौब्लम तो नहीं आ रही है न? अगर कोई कंफ्यूजन हो तो तुम मेरे घर आ सकती हो. मैं तुम्हारे सारे डाउट क्लियर कर दूंगा. अगर तुम चाहो तो…’’ सर ने न्योता देने के अंदाज में कहा. नव्या तो यही चाहती थी. उस ने तपाक से कहा, ‘‘सर, मैं कब आप के घर आ सकती हूं?’’
‘‘आज शाम को ही, स्कूल के बाद.’’‘‘सर, आज तो मुश्किल होगी, क्योंकि मम्मी को बता कर नहीं आई हूं. कल शाम को आऊं क्या?’’ नव्या ने पूछा.‘‘देखो नव्या, ऐसा है कि डाउट जितनी जल्दी क्लियर हो जाए तो अच्छा है. आज मेरी वाइफ भी घर पर नहीं रहेगी तो अकेले में मैं तुम्हें बहुत अच्छे से समझा पाऊंगा. समझ गई न तुम…’’ विपुल सर ने उस के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा.
विपुल सर का हाथ लगते ही नव्या के तनबदन में जैसे चिनगारियां फूटने लगीं, सांसें तेज और गरम हो गईं, गाल दहकने लगे. अब तो जैसे उस का खुद पर काबू पाना मुश्किल हो गया.नव्या ने मन ही मन सोचा, ‘मम्मी को तो कुछ भी बहाना सुना दूंगी, लेकिन आज का यह मौका हाथ से नहीं जाने दूंगी.’वह बोली, ‘‘ठीक है सर, मैं आज ही आती हूं आप के घर. सुहानी से बोल दूंगी कि वह मेरी मम्मी से कह दे कि वीक स्टूडैंट्स की ऐक्स्ट्रा क्लास है.’’‘‘तो तुम मेरे साथ ही चलना.
मैं गाड़ी से अकेले ही तो जाता हूं,’’ विपुल सर ने कहा.‘‘ओके सर,’’ नव्या बोली.‘‘तो शाम को स्कूल के गेट से निकल कर जो पीसीओ है, वहां से मैं तुम्हें पिक करूंगा. ठीक है?’’ विपुल सर ने फिर नव्या का कंधा दबाया और हाथ को पीठ पर फेरते हुए कहा.नव्या का शरीर कड़क हो गया. मुंह से बस इतना ही निकला, ‘‘ओके सर.’’नव्या जल्दी से सुहानी के पास पहुंची और बोली, ‘‘सुन, विपुल सर ने आज मुझे डाउट क्लियर करने के लिए घर बुलाया है. तू मेरी मम्मी को बता देना कि वीक स्टूडैंट्स की ऐक्स्ट्रा क्लास है, तो मैं 2 घंटे लेट हो जाऊंगी.’’
‘‘वाह रे नव्या, तेरी तो लौटरी लग गई. विपुल सर के घर… डाउट क्लियर… मौजां ही मौजां…’’ सुहानी ने नव्या को छेड़ा. नव्या ने भी उसे आंख मार दी.स्कूल के बाद नव्या धड़कते दिल से गेट के बाहर निकली. कुछ दूर चलने पर ही विपुल सर की कार दिखाई दी. नव्या कार के नजदीक पहुंची, तो सर ने आगे का गेट खोल दिया. नव्या तुरंत गाड़ी में बैठ गई.‘‘तुम रिलैक्स हो न नव्या?’’ विपुल सर ने पूछा.‘‘जी सर…’’
नव्या ने बैग पीछे रखते हुए कहा.‘‘सो स्वीट,’’
विपुल सर ने कहा और उस की जांघों को सहला दिया. नव्या का शरीर कंपकंपा गया.‘‘मैं तुम्हें बहुत दिनों से नोटिस कर रहा था,’’ विपुल सर ने कहा.‘‘क्या सर?’’
नव्या ने डर के लहजे में पूछा.‘‘क्या तुम नहीं जानती?’’ विपुल सर ने सवाल किया.
‘‘जी सर, आप मुझे बहुत अच्छे लगते हैं,’’ नव्या ने दिल खोला.
‘‘अच्छा… कितना अच्छा लगता हूं?’’ विपुल सर ने बात को आगे बढ़ाया.
‘‘सब से अच्छे, इतने अच्छे, इतने अच्छे कि ऐसा लगता है कि…’’
नव्या ने बात अधूरी छोड़ दी.‘‘कितने अच्छे, अब बता भी दो.
यहां तो कोई नहीं हम दोनों के अलावा,’’ विपुल सर ने सुलगती आग को हवा देना शुरू किया.‘‘सर…’’
कह कर नव्या ने उन की जांघों पर हाथ फेरना शुरू कर दिया. विपुल सर ने नव्या का हाथ कस कर पकड़ लिया और कहा, ‘‘तुम्हारी बेचैनी मैं समझ रहा हूं. सब्र करो, बस घर पहुंचने ही वाले हैं, फिर तुम्हारे इस प्यारे से शरीर को बहुत प्यार करूंगा.’’
‘‘ओह सर, आई लव यू सर…’’ कहते हुए नव्या ने उन के गालों को चूम लिया.गाड़ी पार्क कर के विपुल सर नव्या को घर के भीतर ले आए.
दरवाजा बंद कर दिया और पलटते ही नव्या को बांहों में भर कर उस के होंठों को अपने होंठों में भर लिया. नव्या तो पहले ही बेकाबू हो चुकी थी. उसे तो बस आज अपने शरीर की भूख मिटानी थी, जो उसे भीतर ही भीतर खा रही थी. विपुल सर ने नव्या को गोद में उठा लिया और बैडरूम में ले जा कर बिस्तर पर लिटा दिया. नव्या बदहवास हो रही थी. उस ने विपुल सर को पकड़ कर अपने शरीर पर गिरा लिया और बेतहाशा चूमने लगी. विपुल सर के हाथ उस के उभारों पर थे, जिन्हें वह कस कर भींच रहे थे. नव्या को एक मीठामीठा दर्द हो रहा था. उस की सिसकारियां निकलने लगीं.
विपुल सर को तो कोरा बदन मिला था, सो वे भी उस का पूरा मजा लेना चाहते थे. उन्होंने नव्या की कमीज उतार दी. उस के बेदाग, गदराए उभार देखते ही वे पूरी तरह बहक गए. नव्या के अंगों से खेलते हुए उन्होंने कुछ ही देर में उस के सारे कपड़े उतार दिए.नव्या ने उन्हें कस कर पकड़ रखा था मानो वह तो यही चाहती थी. कुछ ही देर में नव्या की सिसकारियों से कमरा गूंज उठा.
नव्या का कुंआरापन भंग हो चुका था, लेकिन नव्या इस से बेफिक्र सैक्स के सागर में गोते लगा रही थी.थोड़ी देर में सबकुछ शांत हो गया.
नव्या कपड़े पहनने लगी. हालांकि, उसे बड़ा दर्द हो रहा था. विपुल सर ने जल्दी से दूसरी चादर बिछा दी और बोले, ‘‘नव्या, तुम ठीक हो न?’’‘‘जी सर.’’‘‘तो फिर अब क्या इरादा है?’’
‘‘क्या मतलब सर?’’‘‘अब दोबारा कब?’’‘‘जब आप कहें…’’‘‘कल?’’
‘‘आप की वाइफ…’’‘‘वह हफ्तेभर के लिए गई है.’’
‘‘फिर तो ठीक है.’’
‘‘चलो, तुम्हें बस स्टौप तक छोड़ दूं…’’
विपुल सर ने नव्या को सीने से कस कर लगाते हुए कहा.‘‘लव यू सर.’’‘‘लव यू टू, माय स्वीटी…’’ कहते हुए विपुल सर ने उस के होंठों को चूम लिया, फिर उसे बस स्टौप तक छोड़ आए.नव्या घर पहुंची, पर सैक्स से अभी उस का मन नहीं भरा था. उस का बस चलता तो वह घर आती ही नहीं. विपुल सर की वाइफ के न होने का वह भरपूर फायदा उठाना चाहती थी.‘‘बहुत थकी हुई लग रही है तू, ऐक्स्ट्रा क्लास के बारे में तू ने सुबह तो कुछ नहीं बताया था…’’ मम्मी ने कहा.‘‘मम्मी, ऐक्स्ट्रा क्लास अचानक ही अनाउंस हो गई.
अब रोज रहेगी. मैं रोज ही देर से आऊंगी,’’ नव्या ने लगे हाथ आगे का रास्ता साफ कर लिया.अगला पूरा हफ्ता नव्या और विपुल सर ने सैक्स का भरपूर मजा लिया.‘‘नव्या, कल मेरी वाइफ वापस आ रही है.’’‘‘ओह सर, फिर अब क्या करेंगे?’’‘‘यही मैं भी सोच रहा हूं.’’‘‘सर, कोई रास्ता तो निकालना होगा, अब तो मैं…’’‘‘जानता हूं, मेरी भी वही हालत है.’’‘‘तो फिर कुछ करिए न.’’
‘‘एक रास्ता है, अगर तुम तैयार हो जाओ तो…’’‘‘कौन सा रास्ता?’’‘‘मेरा एक दोस्त है. उस की वाइफ डिलीवरी के लिए मायके गई हुई है एक महीने के लिए, उस के घर इंतजाम हो सकता है, लेकिन…’’‘‘लेकिन, क्या सर?’’‘‘अब देखो नव्या, हम किसी से मदद लेना चाहते हैं, तो उसे कुछ देना भी होगा.’’‘‘क्या देना होगा?’’ नव्या ने बात समझते हुए कहा.‘‘कभीकभी वह भी तुम्हारे साथ…’’‘‘हां तो नो प्रौब्लम सर. आप के साथ के लिए इतना सैक्रिफाइस तो कर ही सकती हूं.’’‘‘तो फिर कल से गिरीश के घर.’’‘‘ओके सर,’’ दरअसल, नव्या को अब सैक्स का चसका लग चुका था.
उसे एक से ज्यादा मर्दों से संबंध बनाने से कोई परहेज नहीं था और इन शादीशुदा मर्दों को मुंह का जायका बदलने के लिए गरम और कम उम्र की चिडि़या मिल गई थी.अब तो नव्या का हर रोज सैक्स करने का सिलसिला चल निकला. स्कूल से अब कालेज में आ गई थी वह. अपनी अदाओं से नित नए मुरगे फंसाने का हुनर भी आ गया था.‘‘नव्या सुन, आज रोहित आ रहा है, उस की मीटिंग है यहां, शायद 2-4 दिन रुके. रमा बोल रही थी कि वह होटल में रुक जाएगा, लेकिन मैं ने कहा कि मौसी का घर होते हुए होटल में क्यों रुके, इसलिए मैं ने उसे यहीं बुला लिया है. ‘‘तू अपना कमरा उसे सोने के लिए दे देना.
तू मेरे साथ सो जाना. पापा बैठक में सोफे पर सो जाएंगे. ठीक है न?’’ तनुजा ने नव्या से कहा.‘‘अरे यार मम्मी, आप भी न…’’‘‘क्या आप भी, मौसेरा भाई है वह तेरा. 1-2 दिन एडजस्ट नहीं कर सकती क्या?’’‘‘ठीक है बाबा, कर लूंगी एडजस्ट.’’अगले दिन सुबह ही रोहित आ गया. काफी समय के बाद नव्या और रोहित मिले थे.‘‘और कैसी है रे तू छुटंकी?’’ रोहित ने हंसते हुए कहा.‘‘अब मैं छुटंकी कहां हूं, देख कितनी बड़ी हो गई…’’ नव्या ने तनते हुए कहा.‘‘हां, वह तो है,’’ रोहित ने उस के शरीर पर निगाह डालते हुए कहा. उस की नजरें नव्या के अंगों के उतारचढ़ाव से हटने को राजी नहीं थीं. बड़ी मुश्किल से खुद पर काबू करते हुए वह बोला, ‘‘और बताओ, आजकल क्या चल रहा है?’’
‘‘सब एकदम बढि़या चल रहा है. तुम सुनाओ, कैसी मीटिंग है तुम्हारी?’’ नव्या ने हिलते हुए कहा.‘‘औफिशियल है. खाली समय में तुम जबलपुर घुमा देना. घुमाओगी या नहीं?’’ रोहित ने नव्या की आंखों में गहरे झांकते हुए कहा.‘‘बिलकुल घुमाएंगे जबलपुर, बदले में क्या दोगे?’’ नव्या ने पूछा.‘‘क्या चाहिए बोलो तो, जो बोलोगी मिल जाएगा,’’ रोहित ने आंख मारते हुए कहा.‘‘अरे, क्या लेनेदेने की बातें हो रही हैं… चल बेटा रोहित, फ्रैश हो ले. मैं नाश्ता लगाती हूं.
नव्या, जरा रोहित को अपना रूम तो दिखा दो,’’ तनुजा ने आ कर कहा.‘‘ओके मम्मी. चलो रोहित, आज से मेरा रूम तुम्हारा है, ऐश करो,’’ नव्या ने हंसते हुए कहा और रोहित को अपने कमरे तक ले आई.‘‘वैलकम इन माय रूम…’’‘‘थैंक्स डियर,’’ कह कर रोहित ने शेकहैंड की मुद्रा में हाथ बढ़ाया.‘‘मोस्ट वैलकम,’’ कह कर नव्या ने अपना हाथ उस के हाथ में दिया, जिसे रोहित ने चूम लिया. नव्या ने मुसकराते हुए उस की इस हरकत का स्वागत किया.नव्या रोहित के इरादे समझ चुकी थी.
उस के लिए तो यह एक बेहतरीन मौका था, घर में ही रात को रंगीन बनाने का.रोहित नाश्ता कर के मीटिंग अटैंड करने चला गया. नव्या भी कालेज चली गई. यह उस का बीए का दूसरा साल था, जहां उस की खुली जिंदगी जीने की चाहत को पंख मिल चुके थे. सैक्स संबंध, ऐयाशी, अमीर मर्दों से महंगे गिफ्ट्स लेना… सबकुछ बड़े मजे से चल रहा था.
शाम को रोहित घर पहुंचा. उस के दिमाग में भी कुछ चल रहा था. नव्या मौसेरी बहन थी, लेकिन उस की दावत देती आंखों ने रोहित का विवेक खत्म कर दिया था. उसे तो बस नव्या का भरा हुआ कसा तन चुंबक की तरह खींच रहा था.‘‘बेटा, कैसी रही तुम्हारी मीटिंग?’’ तनुजा ने पूछा.‘‘बढि़या रही मौसी,’’ रोहित बोला.‘‘चलो, हाथमुंह धो कर रिलैक्स हो जाओ,’’ तनुजा ने कहा.‘‘जी मौसी, नव्या कहां है?’’ रोहित ने पूछा.‘‘वह फ्रैंड की बर्थडे पार्टी में गई है.
आती ही होगी,’’ तनुजा ने बताया.‘‘ओके मौसी, मैं फ्रैश हो कर आता हूं,’’ कह कर रोहित कमरे में चला गया.थोड़ी ही देर में नव्या भी आ गई, ‘‘और जनाब, कैसी रही आप की आज की मीटिंग?’’‘‘बढि़या रही, तुम्हें बहुत ज्यादा मिस कर रहा था.’’‘‘मुझे? वाह…’’‘‘हां नव्या, मैं तुम्हें बहुत मिस कर रहा था. क्या जादू है तुम में, जब से देखा है बस…’’‘‘बस क्या?’’ नव्या इतराते हुए बोली.
‘‘तुम रात में कहां सोओगी?’’‘‘मम्मी के पास.’’‘‘यहीं आ जाना, कुछ देर बातें करेंगे…’’‘‘बातें?’’‘‘और भी बहुतकुछ, आओगी न?’’‘‘आऊंगी… चलो, अब डिनर कर लो. मम्मी बुला रही हैं.’’खाने की टेबल पर रोहित और नव्या की आंखोंआंखों में बातें हो रही थीं. तनुजा और नव्या के पापा सुकेश इन सब बातों से अनजान खाना खा रहे थे.रात को नव्या मम्मीपापा के सो जाने का इंतजार करने लगी.
जब वह पूरी तरह यकीन हो गया कि वे दोनों सो चुके हैं, तो आहिस्ता से रोहित के कमरे में जा पहुंची. उस ने नाइट गाउन पहन रखा था.‘‘हैलो, स्वीटहार्ट…’’ नव्या फुसफुसाते हुए बोली.‘‘वैलकम डियर, मैं कब से तुम्हारा इंतजार कर रहा था. बहुत देर लगा दी तुम ने,’’ रोहित ने बेसब्री से कहा.‘‘तुम्हारे मौसाजी और मौसी के सोने का इंतजार कर रही थी… और कहो क्या इरादा है?’’
नव्या ने होंठ चबाते हुए कहा.‘‘तुम बोलो…’’‘‘अच्छा जी, अब वह सब भी मैं ही बोलूं…’’‘‘तो फिर?’’‘‘चलो, अब ये नाटक छोड़ो.’’‘‘सच में… छोड़ दूं नाटक, तो यह लो छोड़ दिया,’’ कह कर रोहित ने झटके से नव्या को अपनी बांहों में भर लिया.‘‘बहन हूं तुम्हारी…’’‘‘हां यार, लेकिन क्या करूं… यह दिल है कि मानता नहीं, इतनी हौट जो हो,’’ रोहित ने उसे गोद में उठा लिया. फिर शुरू हो गया हवस का गंदा खेल. रोहित और नव्या दोनों ने ही रिश्ते को दरकिनार कर जिस्मानी रिश्ते बना लिए.
बिस्तर पर नव्या के रंगढंग देख कर रोहित ने नव्या को लिवइन में रहने का प्रपोजल दे डाला.नव्या ने सोचा कि यह ऐक्सपीरियंस लेने में क्या जाता है… रोहित अच्छा कमाता है, कोई बुराई भी नहीं है. अगर उस के साथ लिवइन में रहूं, तो मम्मीपापा के बंधन से भी छुटकारा पा जाऊंगी और सैक्स भी ऐंजौय कर सकूंगी.3 दिनों में रोहित का औफिशियल काम भी खत्म हो गया.
नव्या और रोहित ने सब तैयारी कर ली. नव्या रोहित के साथ बालाघाट जाने के लिए पूरी तरह तैयार थी. दोनों ने फैसला किया कि कल घर वालों को अपने इरादों से वाकिफ करवा कर वे बालाघाट निकल जाएंगे.अगली सुबह घर में हंगामा मचा हुआ था. नव्या ने अपने फैसले को बहुत ही बेशर्मी से मातापिता को बता दिया.‘‘कुछ तो शर्म करो… हम दुनिया और समाज को क्या जवाब देंगे..
. क्या कहूंगी तेरी मौसी से… कुछ तो सोच, और तेरी उम्र तो देख, अभी तो पढ़नेलिखने के दिन हैं,’’ तनुजा भरी आंखों से बोली.‘‘मम्मी, अब इन सब बातों का कोई मतलब नहीं है. मेरा फैसला नहीं बदलने वाला… और फिर यह मेरी जिंदगी है, मुझे पूरा हक है कि इसे मैं कैसे जीऊं.
मैं रोहित के साथ बालाघाट जा रही हूं. वहीं उस की पोस्टिंग है. अपने मांबाप को वह बता देगा,’’ नव्या ने तुनक कर कहा और कमरे में चली गई.‘‘तनुजा, अब कोई फायदा नहीं इसे समझाने का. बालिग हो चुकी है वह और इसी बात का फायदा उठा रही है. उस के कदम बहक चुके हैं. क्या पता बात कहां तक बढ़ चुकी है. हमतुम तो शायद वहां तक सोच भी न सकें, क्योंकि जिस बुलंदी से नव्या ने यह बताया है, उस से तो लगता है कि इन दोनों के जिस्मानी…’’
तनुजा के पति हताश स्वर में बोले.‘‘क्या यही दिन देखना बाकी था… हम तो किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहे. क्या इसी दिन के लिए नाजों से पाला था इस को… इतनी आज़ादी दी थी. यह कहां की हवा लग गई इसे कि आंखों की शर्म तक खत्म हो गई…‘‘और रोहित, वह भी… अरे,
अब उसे क्या कहें, जब अपना सिक्का ही खोटा निकला,’’ तनुजा लगातार रोते हुए बोली.नव्या और रोहित परिवार व समाज के गाल पर तमाचा मार कर चले गए. पीछे रह गए 2 परिवार और शर्मसार मातापिता. सैक्स और ऐयाशी की चाहत में बच्चों ने घर वालों को एक ऐसा नासूर दे दिया, जो हर पल कसकता रहेगा. Hindi Story
Hindi Story: उस रात अंजु और मनोज बुरी तरह झगड़े. मनोज अपने दोस्त के घर से पी कर आया था और अंजु ने अपनी सास के साथ झड़प हो जाने के बाद कुछ देर पहले ही तय किया था कि वह अपनी ससुराल में किसी से डरेगीदबेगी नहीं. इन दोनों कारणों से उन के बीच झगड़ा बढ़ता ही चला गया.
‘‘तुम्हें इस घर में रहना है, तो काम में मां का पूरा हाथ बंटाओ. तुम मटरगस्ती करती फिरो और मां रसोई में घुसी रहे, यह मैं बिलकुल बरदाश्त नहीं करूंगा,’’ मनोज की गुस्से से कांपती आवाज पूरे घर में गूंज उठी.
‘‘आज औफिस में ज्यादा काम था, इसलिए देर से आई थी. फिर भी मैं ने उन के साथ थोड़ा सा काम कराया… अपनी मां की हर बात सच मानोगे, तो हमारी रोज लड़ाई होगी,’’ अंजु भी जोर से चिल्लाई.
‘‘उन की रोज की शिकायत है कि जिस दिन तुम वक्त से घर आ जाती हो, उस दिन भी तुम उन के साथ कोई काम नहीं कराती हो.’’
‘‘यह झठ बात है.’’
‘‘झठी तुम हो, मेरी मां नहीं.’’
‘‘नहीं, झठी तुम्हारी मां है.’’
उस रात मनोज ने अपनी दूसरी पत्नी पर पहली बार हाथ उठा दिया. उन की शादी को अभी 2 महीने ही बीते थे.
‘‘तुम्हारी मुझ पर हाथ उठाने की जुर्रत कैसे हुई? अब दोबारा हाथ उठा कर देखो… मैं अभी पुलिस बुला लूंगी.’’
उस की चिल्ला कर दी गई इस धमकी को सुन कर राजनाथ और आरती अपने बेटेबहू को शांत कराने के लिए उन के कमरे में आए.
गुस्से से कांप रही अंजु ने अपनी सास को जलीकटी बातें सुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. जवाब में आरती कुछ देर ही चुप रही. फिर वह भी ईंट का जवाब पत्थर से देते हुए उस से भिड़ गई.
‘‘मुझे नहीं रहना है इस नर्क में. मैं कल सुबह ही अपने मायके जा रही हूं. तुम्हारे मांबाप का बोझ मुझे नहीं ढोना है,’’ धमकी देने के बाद अंजु ने कमरे का दरवाजा अंदर से बंद कर लिया.
‘‘ये मुझे कैसे दिन देखने पड़ रहे हैं… पहली बीवी चरित्रहीन थी, सो मुझे छोड़ कर अपने प्रेमी के साथ भाग गई. अब यह दूसरी जो पल्ले पड़ी है, बहुत ही बदतमीज है,’’ अपने को कोसता मनोज उस रात सोफे पर ही सोया.
अगले दिन रविवार था. आंखों में गुस्सा भरी जब 10 बजे के करीब अंजु अपने कमरे से बाहर आई, तो उस ने मनोज को ड्राइंगरूम में मुंह लटकाए बैठे पाया.
उस के पूछे बिना मनोज ने उसे दुखी लहजे में बताया, ‘‘मम्मीपापा सुबह की गाड़ी से मामाजी के पास मेरठ चले गए हैं.’’
‘‘क्यों?’’ चाय बनाने रसोई में जा रही अंजु ने ठिठक कर पूछा.
‘‘ उन के जाने का कारण समझना क्या मुश्किल है?’’
‘‘मुझे जबरदस्ती कुसूरवार मत ठहराओ, प्लीज. तुम्हारी माताजी ने मुझे एक की चार सुनाई थीं.’’
‘‘वे दोनों बीमार रहते हैं. घर से दूर जा कर उन की कैसी भी दुर्गति हो, तुम्हारी बला से.’’
‘‘जब आज मैं ही घर छोड़ कर जाने वाली थी, तो तुम ने उन्हें रोका क्या नहीं?’’
‘‘मैं ने बहुत कोशिश करी, पर पापा नहीं माने.’’
‘‘वे कब तक लौटेंगे?’’
‘‘कुछ बता कर नहीं गए हैं,’’ मनोज ने थकेहारे अंदाज में अपना चेहरा हथेलियों से रगड़ा तो अंजु भी कुछ उदास सी हो गई.
दोनों दिनभर सुस्त ही रहे, पर शाम को उन का बाजार घूम आने का कार्यक्रम बन गया. पहले उन्होंने कुछ खरीदारी करी और फिर खाना भी बाहर ही खाया.
उस रात अंजु को जीभर के प्यार करते हुए मनोज को एक बार भी अपने मातापिता का ध्यान नहीं आया.
अगले 2-3 दिन उन के बीच झगड़ा नहीं हुआ. फिर एक दिन औफिस से अंजु देर से लौटी तो मनोज उस से उलझ पड़ा. दोनों के बीच काफी तूतू, मैंमैं हुई पर फिर जल्द ही सुलह भी हो गई. तब दोनों के मन में यह विचार एकसाथ उभरा कि अगर आरती घर में मौजूद होती, तो यकीनन झगड़ा लंबा खिंचता.
मनोज लगभग रोज ही अपने मातापिता से फोन पर बात कर लेता. अंजु ने उन से पूरा हफ्ता बीत जाने के बाद बात करी थी. उस ने उन दोनों का हालचाल तो पूछ लिया, पर उन के वापस घर लौट आने की चर्चा नहीं छेड़ी.
‘‘देखो, शायद अगले हफ्ते वापस आएं,’’ मनोज जब भी उन के घर लौटने की बात उठाता, तो राजनाथ उसे यही जवाब देते.
जब उन्हें मेरठ गए 1 महीना बीत गया तो अंजु और मनोज के मन की बेचैनी बढ़ने लगी. पड़ोसी और रिश्तेदार जब भी मिलते, तो आरती और राजनाथ के लौटने के बारे में ढेर सारे सवाल पूछते. तब उन्हें कोई झठा कारण बताना पड़ता और यह बात उन्हें अजीब से अपराधबोध का शिकार बना देती.
लोगों के परेशान करने वाले सवालों से बचने के लिए तब दोनों ने मेरेठ जा कर उन्हे वापस लाने का फैसला कर लिया.
‘‘अब वहां पहुंच कर उन से बहस में मत उलझना. उन्हें मनाने को अगर ‘सौरी’ बोलना पडे़, तो बोल देंगे. उन को साथ रखना हमारी जिम्मेदारी है, मामाजी या किसी और की नहीं,’’ मनोज सारे रास्ते अंजू को ऐसी बातें समझता रहा.
मामामामी के यहां 2 दिन बिताने के लिए शुक्रवार की रात को करीब 9 बजे उन के घर पहुंच गए.
उन दोनों से मामामामी बड़े प्यार से मिले. उन की नजरो में अपने लिए नाराजगी के भाव न देख कर अंजु मन ही मन हैरान हुई.
‘‘दीदी और जीजाजी खाना खाने के बाद पार्क में घूमने गए हैं,’’ अपने मामा की यह बात सुन कर मनोज हैरान रह गया.
‘‘पापामम्मी घूमने गए हैं? उन्होंने यह आदत कब से पाल ली?’’ मनोज की आंखों में अविश्वास के भाव पैदा हुए.
‘‘वे दोनों अब नियम से सुबह भी घूमने जाते हैं. तुम उन की फिटनैस में आए बदलाव को देखोगे, तो चकित रह जाओगे.’’
‘‘मम्मी की कमर का दर्द उन्हें घूमने की इजाजत देता है?’’
‘‘दर्द अब पहले से काफी कम है. जीजाजी दीदी का हौसला बढ़ा कर उन्हें सुस्त नहीं पड़ने देते हैं.’’
‘‘क्या मम्मी का किसी नए डाक्टर से इलाज चल रहा है?’’
‘‘हां, डाक्टर राजनाथ के इलाज में है दीदी,’’ अपने इस मजाक पर मामाजी ने जोरदार ठहाका लगाया, तो मनोज और अंजु जबरदस्त उलझन का शिकार बन गए.
जब वे सब चाय पी रहे थे, तब राजनाथ और आरती ने घर में प्रवेश किया. उन पर नजर पड़ते ही मनोज उछल कर खड़ा हो गया और प्रसन्न लहजे में बोला, ‘‘वाह, पापामम्मी. इन स्पोर्ट्स शूज में तो आप दोनों बड़े जंच रहे हो.’’
‘‘तुम्हारे मामाजी ने दिलाए हैं. अच्छे हैं न?’’ राजनाथ पहले किसी बच्चे की तरह खुश हुए और फिर उन्होंने मनोज को गले से लगा लिया.
अपनी मां के पैर छूते हुए मनोज ने उन की तारीफ करी, ‘‘ये बड़ी खुशी की बात है कि कमर का दर्द कम हो जाने से अब तुम्हे चलने में ज्यादा दिक्कत नहीं आ रही है. चेहरे पर भी चमक है. मामाजी के यहां लगता है खूब माल उड़ा रहे हैं.’’
‘‘मेरी यह शुगर की बीमारी कहां मुझे माल खाने देती है. तुम दोनों कैसे हो? आने की खबर क्यों नहीं दी?’’ अपने बेटेबहू को आशीर्वाद देते हुए आरती की पलकें नम हो उठीं.
‘‘तुम दोनों को भूख लग रही होगी. बोलो, क्या खाओगे?’’ बड़े उत्साहित अंदाज में अपनी हथेलियां आपस में रगड़ते हुए राजनाथ ने अपने बेटेबहू से पूछा.
‘‘ज्यादा भूख नहीं है, इसलिए बाजार से कुछ हलकाफुलका ले आते हैं,’’ कह मनोज अपने पिता के साथ जाने को उठ खड़ा हुआ.
‘‘बाजार से क्यों कुछ लाना है? आलूमटर की सब्जी रखी है. मैं फटाफट परांठे तैयार कर देती हूं,’’ कह मामी रसोई में जाने को उठ खड़ी हुई.
‘‘भाभी, आज आप अपने इस शिष्य को काम करने की आज्ञा दो,’’ रहस्यमयी अंदाज में मुसकरा रहे राजनाथ ने अपनी सलहज का हाथ पकड़ कर वापस सोफे पर बैठा दिया.
‘‘क्या परांठे आप बनाएंगे?’’ मनोज का मुंह आश्चर्य से खुला का खुला रह गया.
‘‘पिछले दिनों तुम्हारी मामी से कुछ कुकिंग सीखी है मैं ने. बस 15 मिनट से ज्यादा समय नहीं लगेगा खाना लगाने में. तुम दोनों तब तक फ्रैश हो जाओ,’’ अपने बेटे का गाल प्यार से थपथपाने के बाद राजनाथ सीटी बजाते हुए रसोई की तरफ चले गए.
राजनाथ ने क्याक्या बनाना सीख लिया है, इस की जानकारी उन दोनों को देते हुए आरती और मामामामी की आंखें खुशी से चमक रही. ‘‘मटरपनीर, कोफ्ते, बैगन का भरता, भरवां भिंडी. पापा ये सब बना सकते हैं. मुझे विश्वास नहीं हो रहा है. कैसे हुआ यह चमत्कार?’’ मनोज सचमुच बहुत हैरान नजर आ रहा था, क्योंकि राजनाथ को तो पहले चाय भी ढंग से बनानी नहीं आती थी.
‘‘अरे, जीजाजी आजकल बड़े मौडर्न हो गए हैं. कहते हैं कि आज के समय में हर इंसान को घर और बाहर के सारे काम करने आने चाहिए. किसी पर आश्रित हो कर बोझ बन जाना नर्क में जीने जैसा है… अपने इस नए आदर्श वाक्य को वे दिन में कई बार हम सब को सुनाते हैं. इस उम्र में कोई इतना ज्यादा बदल सकता है, यह सचमुच हैरान करने वाली बात है,’’ मामाजी की इस बात का पूरा अर्थ मनोज को अगले 2 दिनों में समझ आया.
राजनाथजी ने उन्हें उस रात खस्ता परांठे बना कर खिलाए. फिर रेत गरम कर के उसे एक पोटली में भरा और आरती की कमर की सिंकाई करी. वे पहले बहुत कम बोलत थे, पर अब उन की हंसी से कमरा बारबार गूंज उठता था.
अगले दिन सब को बैड टी उन्होंने ही पिलाई. इस से पहले वे और आरती घंटाभर पास के पार्क में घूम आए थे. नाश्ते में ब्रैडपकौड़े मामीजी ने बनाए पर सब को गरमगरम पकौड़े खिलाने का काम उन्होंने बड़े उत्साह से किया.
आरती ने पूरे घर में झड़ू लगाया और डस्टिंग का काम राजनाथजी ने किया. फिर नहाधो कर वे लाइब्रेरी में अखबार पढ़ने चले गए.
मनोज और अंजु उन की चुस्तीफुरती देख कर बारबार हैरान हो उठते. ऐसा प्रतीत होता जैसे उन में जीने का उत्साह कूटकूट कर भर गया हो.
शाम को वे सब बाजार घूमने गए. चाट खाने की शौकीन अंजु को राजनाथजी ने एक मशहूर दुकान से चाट खिलाई. बाद में आइसक्रीम भी खाई.
वापस आने पर किसी को ज्यादा भूख नहीं थी, इसलिए पुलाव बनाने का कार्यक्रम बना. आरती और मामीजी यह काम करना चाहती थीं, लेकिन राजनाथजी ने किसी की न चलने दी और रसोई में अकेले घुस गए.
उन्होंने बहुत स्वादिष्ठ पुलाव बनाया. सब के मुंह से अपनी तारीफ सुन कर वे फूले नहीं समाए.
काफी थके होने के बावजूद उन्होंने सोने से पहले आरती की कमर की सिंकाई करने के बाद मूव लगाने में कोई आलस नहीं किया.
रविवार की सुबह मामीजी ने सब को सांभरडोसे का नाश्ता कराया. राजनाथजी उन की बगल में खड़े हो कर डोसा बनाने की विधि बड़े ध्यान से देखते रहे.
सब ने इतना ज्यादा खाया कि लंच करने की जरूरत ही न रहे. कुछ देर आराम करने के बाद मनोज ने दिल्ली लौटने की तैयारी शुरू कर दी.
‘‘पापा, मम्मी, आप दोनों भी अपना सामान पैक करना शुरू कर दो. यहां से 2 बजे तक निकलना ठीक रहेगा. लेट हो गए तो शाम के ट्रैफिक में फंस जाएंगे,’’ मनोज की यह बात सुन कर राजनाथजी एकदम गंभीर हो गए तो आरती बेचैन अंदाज में उन की शक्ल ताकने लगी.
‘‘इन्हें अभी कुछ और दिन यहीं रहने दो, मनोज बेटा,’’ मामाजी भी सहज नजर नहीं आ रहे थे.
‘‘मामाजी, ये दोनों 1 महीना तो रह लिए हैं यहां. इन का अगला चक्कर मैं जल्दी लगवा दूंगा,’’ मनोज ने मुसकराते हुए जवाब दिया.
राजनाथ ने एक बार अपना गला साफ करने के बाद मनोज से कहा, ‘‘हम अभी नहीं चल रहे हैं मनोज.’’
‘‘क्यों? क्या आप अब भी हम से नाराज हो?’’ मनोज एकदम से चिड़ उठा.
‘‘मेरी बात समझ बेटे. हमारे कारण तेरे घर में क्लेश हो, यह हम बिलकुल नहीं चाहते हैं,’’ राजनाथ असहज नजर आने लगे.
‘‘इस तरह के झगड़े घर में चलते रहते हैं, पापा. इन के कारण आप दोनों का घर छोड़ देना समझदारी की बात नहीं है.’’
‘‘तेरी मां की बहू से नहीं बनती है. किसी दिन लड़झगड़ कर अंजु घर छोड़े, इस से बेहतर है कि हम तुम दोनों को अकेले रहने दें.’’
‘‘हमे अकेले नहीं, बल्कि आप दोनों के साथ रहना है. अब आप पिछली बातें भुला कर सामान बांधना शुरू कर दो. अंजु, तुम क्यों नहीं कुछ बोल रही हो?’’ मनोज ने उन दोनों पर दबाव बनाने के लिए अपनी पत्नी से सहायता मांगी.
‘‘आप दोनों हमारे साथ चलिए, प्लीज,’’ अंजु ने धीमी आवाज में अपने ससुर से प्रार्थना करी.
राजनाथजी कुछ पलों की खामोशी के बाद बोले, ‘‘तुम दोनों जोर डालोगे, तो हम वापस चल पड़ेंगे, पर पहले मैं कुछ कहना चाहता हूं.’’
‘‘क्या यह कहनासुनना घर पहुंच कर नहीं हो सकता है, पापा?’’
‘‘अभी मैं ने तुम्हारे साथ वापस चलने का फैसला नहीं किया है, मनोज.’’
‘‘वापस तो मैं आप दोनों को ले ही जाऊंगा. हम से क्या कहना चाहते हो आप?’’
तब राजनाथजी ने भावुक स्वर में बोलना शुरू किया, ‘‘बहू, तुम भी मेरी बात ध्यान से सुनो. उस रात मनोज से लड़ते हुए गुस्से में तुम ने हमें बोझ बताया था. तुम्हारी उस शिकायत को दूर करने के लिए मैं ने खाना बनाना, घर साफ रखना और मशीन से कपड़े धोना सीख लिया है. तुम्हारी सास से ज्यादा काम नहीं होता, पर मैं तुम्हारा हाथ बंटाने लायक हो गया हूं.
‘‘तुम्हारी सास का भी गुस्सा तेज है. मैं ने यहां आ कर इसे बहुत समझया है… इस ने मुझ से वादा किया है कि यह तुम्हारे साथ अपना व्यवहार बदल लेगी.
‘‘उस रात मनोज से झगड़ते हुए जब तुम ने घर छोड़ कर मायके चले जाने की धमकी दी, तो मैं अंदर तक कांप उठा था. उसी रात मैं ने ये फैसला कर लिया था कि घर में सुखशांति बनाए रखने को अगर कोई घर छोड़ेगा, तो वे तुम्हारी सास और मैं, तुम नहीं.
‘‘बहू, मनोज को अपनी पहली पत्नी से तलाक आसानी से नहीं मिला था. जिन दिनों केस चल रहा था, हम शर्मिंदगी के मारे लोगों से नजर नहीं मिला पाते थे. उन के सवालों के जवाब देने से बचने के लिए हम ने घर से निकलना बिलकुल कम कर दिया था. वकीलों और पुलिस वालों ने हमें बहुत सताया था.
‘‘वैसा खराब वक्त मेरी जिंदगी में फिर से आ सकता है, ऐसी कल्पना भी मेरी रूह कंपा देती है. तभी मैं कह रहा हूं कि तुम दोनों हमें साथ ले जाने की जिद न करो. अगर तुम दोनों के बीच कभी अलगाव हुआ और मुझे वैसी शर्मिंदगी का बोझ एक बार फिर से ढोना पड़ा, तो मैं जीतेजी मर जाऊंगा.’’
‘‘पापा, आप अपने आंसू पोंछ लो, प्लीज… मैं वादा करती हूं कि घर छोड़ कर जाने की बात मेरे मुंह से कभी नहीं निकलेगी.’’ अपने ससुर के मन की पीड़ा को दूर करने के लिए अंजु ने भरे गले से तुरंत उन्हें विश्वास दिलाया.
‘‘और मैं ने आज से शराब छोड़ दी,’’ मनोज के इस फैसले को सुन राजनाथजी ने भावविभोर हो कर उसे गले से लगा लिया.
‘‘आरती, तुम पैकिंग शुरू करो और मैं इस खुशी के मौके पर सब का मुंह हलवे से मीठा कराता हूं,’’ बहुत खुश नजर आ रहे राजनाथजी ने अपने बहूबेटे के सिर पर हाथ रख कर आशीर्वाद दिया और फिर रसोई की तरफ चले गए. Hindi Story