देसी नेताओं का सूटबूट में लुक्स है वायरल, टशन दिखाने में नहीं है किसी से कम

भारत में एक से बढ़ कर एक नेता हैं. कई तो यंग हैं, जो आज भी बिलकुल उसी तरह के कपड़े पहनना पसंद करते हैं, जो कभी आजादी के वक्त पहने जाते थे. ज्यादातर नेताओं की पोशाक अमूमन देसी ही देखी गई है, लेकिन अब ऐसा नहीं है, क्योंकि कई नेता काफी स्टाइलिश हैं और सूटबूट पहना करते हैं.

 

View this post on Instagram

 

A post shared by Sarassalil (@sarassalil_magazine)

रवि किशन

रवि किशन, जो गोरखपुर से भारतीय जनता पार्टी के सांसद हैं, का असल लुक काफी बदला है. पहले वे बिना दाढ़ीमूंछों के हंसमुख चेहरे के लिए जाने जाते थे, लेकिन अब वे घनी दाढ़ीमूंछों के साथ एक गंभीर लुक में नजर आते हैं. साथ ही, उन्हें हर तरह के स्टाइलिश लुक में भी देखा गया है. वे कभी देसी अवतार में नजर आते हैं, तो कभी सूटबूट के साथ, लेकिन ज्यादातर चुनावी दौर में उन्हें देसी लिबास में ही देखा गया है.

तेजस्वी सूर्या

तेजस्वी सूर्या, जो बैंगलुरु दक्षिण से भारतीय जनता पार्टी के सांसद हैं, का लुक काफी आकर्षक और युवा है. वे अकसर औफिशियल कपड़ों में नजर आते हैं, जैसे कि सूट और टाई, जो उन का पहनावा है. उन के बाल छोटे हैं  और वे अकसर बिना दाढ़ीमूंछों के साफसुथरे लुक में दिखते हैं. तेजस्वी सूर्या देसी लिबास में बेहद कम नजर आते हैं.

चंद्रशेखर आजाद

चंद्रशेखर आजाद का लिबास उन के क्रांतिकारी जीवन का प्रतीक है. वे अकसर धोतीकुरता पहनते हैं, जो उस समय के भारतीय ग्रामीण और साधारण लोगों की एक पहचान है. उन के पहनावे में सादगी और भारतीयता की झलक मिलती है. लेकिन ऐसा नहीं है कि उन्हें कभी सूटबूट में नहीं देखा गया है. वे सूटबूट के भी शौकीन रहे हैं.

चिराग पासवान

चिराग पासवान भी उन नेताओं की लिस्ट में आते हैं, जो देसी लिबास कैरी करने में बिलकुल नहीं शरमाते हैं. हालफिलहाल में चिराग पासवान ने एक इवैंट में अपने देसी लुक से सब का ध्यान खींचा था. उन्होंने ब्लैक शेरवानी पहनी थी, जिस में ग्रे धागों से कढ़ाई की गई थी. इस लुक में उन्होंने हील वाले ब्लैक लेदर के शूज और गोल्डन रिंग्स पहनी थीं. उन की यह ट्रैडिशनल आउटफिट और बियर्ड लुक उन्हें काफी हैंडसम और डैशिंग दिखा रहा था. इस के अलावा कई दफा चिराग पासवान सूटबूट में भी नजर आ चुके हैं.

अखिलेश यादव

अखिलेश यादव का लुक अकसर चर्चा में रहता है खासकर जब वे पब्लिक कार्यक्रमों में शामिल होते हैं. वे टोपी के साथ देसी लुक में दिखाई देते हैं. उन का पहनावा आमतौर पर सफेद कुरतापाजामा और लाल टोपी का होता है, जो समाजवादी पार्टी का प्रतीक है. यह लुक उन्हें एक पहचान देता है और उन के समर्थकों के बीच काफी लोकप्रिय बनाता है.

सिसोदिया का बहाना जमानत पर निशाना

दिल्ली शराब घोटाले में आम आदमी पार्टी के नेता और दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया को सुप्रीम कोर्ट ने 17 महीने के बाद जमानत दी. जमानत देते समय सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत स्वतंत्रता के पहलू को सामने रखते हुए निचली अदालतों को तमाम नसीहतें भी दे डालीं.

सवाल उठता है कि तमाम फैसलों में इस तरह दी जाने वाली नसीहतों को निचली अदालतें किस तरह से लेती हैं? जमानत देने में अदालतों को इतनी दिक्कत क्यों होती है? आरोपी देश छोड़ कर भाग नहीं रहा होता है. जमानत आरोपी का अधिकार है. इस के बावजूद अदालतें जमानत देने में संकोच क्यों करती हैं?

मनीष सिसोदिया जैसे लोगों पर तो होहल्ला खूब मचता है. इन के पास अच्छे वकीलों की कमी नहीं होती है. पैसा कोई समस्या नहीं है, तब यह हालत है. देश की जेलों में तमाम लोग जमानत मिलने के इंतजार में सड़ रहे हैं. इन की बात सुनने वाला कोई नहीं है. हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक जाना इन की हैसियत से बाहर होता है.

जब नेता सत्ता में होते हैं, तो उन को यह परेशानी क्यों नहीं पता चलती कि जमानत के लिए आरोपी का घरद्वार तक बिक जाता है. जमानत का इंतजार कर रहे हर आदमी के पास नेताओं की तरह महंगे वकील और पैसा नहीं होता है. सरकार जमानत को ले कर समाज सुधार का कोई कानून क्यों नहीं बनाती?

जेल नहीं, जमानत ही नियम है

हाईकोर्ट से जमानत के लिए जाने का कम से कम खर्च 3 लाख से 5 लाख रुपए के बीच आता है. सुप्रीम कोर्ट में यह खर्च 5 लाख से 10 लाख रुपए कम से कम हो जाता है. आम आदमी किस तरह से अपना मुकदमा वहां ले कर जाए? खासतौर पर तब, जब घर का कमाने वाला ही जेल में जमानत की राह देख रहा हो.

जमानत के अधिकार पर केवल सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से काम नहीं चलने वाला. इस को ले कर न्याय प्रणाली में एक सही व्यवस्था होनी चाहिए, जिस से कम से कम समय जमानत के इंतजार में लोगों को जेल में रहना पड़े.

सुप्रीम कोर्ट ने मनीष सिसोदिया को जमानत देते वक्त कहा कि जमानत को सजा के तौर पर नहीं रोका जा सकता. निचली अदालतों को यह समझाने का समय आ गया है कि ‘जेल नहीं, जमानत ही नियम है’. मुकदमे के समय पर पूरा होने की कोई उम्मीद नहीं है. मनीष सिसोदिया को दस्तावेजों की जांच करने का अधिकार है.

अदालत ने यह देखने के बाद याचिका मंजूर की कि मुकदमे में लंबी देरी ने मनीष सिसोदिया के जल्दी सुनवाई के अधिकार का उल्लंघन किया है. कोर्ट ने कहा कि जल्दी सुनवाई का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत स्वतंत्रता का एक पहलू है. बैंच ने कहा कि मनीष सिसोदिया को जल्दी सुनवाई के अधिकार से वंचित किया गया है.

हाल ही में जावेद गुलाम नबी शेख मामले में भी हम ऐसे ही निबटे थे. हम ने देखा कि जब अदालत, राज्य या एजेंसी जल्दी सुनवाई के अधिकार की रक्षा नहीं कर सकती हैं, तो अपराध गंभीर होने का हवाला दे कर जमानत का विरोध नहीं किया जा सकता है. अनुच्छेद 21 अपराध की प्रकृति के बावजूद लागू होता है.

समाज सुधार से भागती सरकारें

मनीष सिसोदिया की जमानत पर सांसद संजय सिंह ने कहा कि दिल्ली का नागरिक खुश है. सब मानते थे कि हमारे नेताओं के साथ जोरजबरदस्ती और ज्यादती हुई है. हमारे मुखिया अरविंद केजरीवाल और सत्येंद्र जैन को जेल में रखा है. वे भी बाहर आएंगे.

केंद्र की सरकार की तानाशाही के खिलाफ जोरदार तमाचा है. ईडी ने कोई न कोई जवाब दाखिल करने का बहाना बनाया. एक पैसा मनीष सिसोदिया के घर, बैंक खाते से नहीं मिला. सोना और प्रौपर्टी नहीं मिला. दिल्ली के विधानसभा चुनाव के लिए और आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता के लिए खुशखबरी है. हमें ताकत मिलेगी.

संजय सिंह का बयान राजनीतिक है. प्रधानमंत्री के साथसाथ उन को न्याय प्रणाली से सवाल करना चाहिए कि जमानत देने में हिचक क्यों होती है? संजय सिह और आम आदमी पार्टी सत्ता में हैं, जहां कानून बनते हैं. उन को राज्यसभा में यह बात उठानी चाहिए कि जमानत के अधिकार में रोड़ा न लगाया जा सके.

दरअसल, सरकारों के साथ यह दिक्कत होती है कि वे शोषक होती हैं. कानून के जरीए समाज सुधार के काम नहीं करती हैं. संजय सिंह और आम आदमी पार्टी आज भी दूसरे आरोपियों की चिंता नहीं कर रही, जो जमानत के इंतजार में जेल में हैं. वे सब केवल अपनी पार्टी के लोगों के लिए आवाज उठा रहे हैं.

आम आदमी पार्टी जब विपक्ष में थी, तब उस के नेता अरविंद केजरीवाल कहते थे कि दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को पहले जेल में डालो, फिर मुकदमा चलाओ. सब कबूल कर देंगी. कहां कैसे भ्रष्टाचार और घोटाले हुए हैं. अब जब उन पर भी यही हथियार चल पड़ा, तो सम?ा में आ रहा है कि जेल, जमानत, सुनवाई में देरी, ईडी और सीबीआई क्या करती है, उस का क्या असर पड़ता है. जो पार्टी सत्ता में हो, तो उसे इस तरह के कानून बनाने चाहिए कि समाज सुधार हो सके. जनता को राहत मिले.

जमानत का अधिकार एक बड़ा मुद्दा है. सुप्रीम कोर्ट बारबार निचली अदालतों को प्रवचन देती है, लेकिन निचली अदालतें कहानी की तरह सुन कर भूल जाती हैं. ऐसे में कानून बनाने वाली सरकारों की जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि वह ‘जेल नहीं, जमानत ही नियम है’ के सिद्धांत को लागू कराए, जिस से जमानत के लिए लोगों को अपना घरद्वार न बेचना पड़े. हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक न पहुंच सकने वाले आरोपियों को भी जल्दी जमानत मिल सके.

17 महीने बाद मिली जमानत

सुप्रीम कोर्ट ने तथाकथित दिल्ली शराब घोटाले में मनीष सिसोदिया की जमानत पर फैसला सुना दिया. मनीष सिसोदिया को सुप्रीम कोर्ट ने जमानत दे दी है. 17 महीने के बाद वे जेल से बाहर आ रहे हैं. उन्हें 10 लाख रुपए के निजी मुचलके पर जमानत मिल गई है. मनीष सिसोदिया पर दिल्ली आबकारी नीति में गड़बड़ी के आरोप लगे हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने कुछ शर्तों के साथ जमानत दी है. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुताबिक, मनीष सिसोदिया को अपना पासपोर्ट जमा करना होगा, इस का मतलब यह है कि वे देश छोड़ कर बाहर नहीं जा सकते. दूसरा, उन्हें हर सोमवार को थाने में हाजिरी देनी होगी.

आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह ने इस फैसले का स्वागत करते हुए कहा है कि यह सत्य की जीत हुई है. पहले से कह रहे थे, इस मामले में कोई भी तथ्य और सत्यता नहीं थी. जबरदस्ती हमारे नेताओं को जेल में रखा गया.

क्या भारत के प्रधानमंत्री इन 17 महीने का जवाब देंगे? जिंदगी के 17 महीने जेल में डाल कर बरबाद किए? जब ‘जेल नहीं, जमानत ही नियम है’ का सिद्धांत लागू होगा, तो किसी की जिंदगी का कीमती समय जमानत के इंतजार में जेल में नहीं कटेगा.

सरकार पर बरसे सिसोदिया

शुक्रवार, 9 अगस्त, 2024 को जमानत पर बाहर आए मनीष सिसोदिया ने कार्यकर्ताओं के संबोधित करते हुए कहा, ‘इन आंसुओं ने ही मुझे ताकत दी है. मुझे उम्मीद थी कि 7-8 महीने में इंसाफ मिल जाएगा, लेकिन कोई बात नहीं, 17 महीने लग गए. लेकिन जीत ईमानदारी और सचाई की हुई है. उन्होंने (भाजपा) बहुत कोशिशें कीं. उन्होंने सोचा कि अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और संजय सिंह को जेल में डालेंगे, तो हम सड़ जाएंगे.

‘अरविंद केजरीवाल का नाम आज पूरे देश में ईमानदारी का प्रतीक बन गया है. भाजपा दुनिया की सब से बड़ी पार्टी होने के बावजूद एक राज्य में एक उदाहरण नहीं दे पाई.

‘इसी छवि को बिगाड़ने के लिए ये सारे षड्यंत्र रचे जा रहे हैं. जनता के दिलों के दरवाजे खुले हुए हैं. आप जेल के दरवाजे बंद कर सकते हैं, लेकिन जनता के दिलों के दरवाजे बंद नहीं कर सकते हैं.

‘बाबा साहब अंबेडकर ने 75 साल पहले ही यह अंदाजा लगा लिया था कि कभीकभी इस देश में ऐसा होगा कि तानाशाही बढ़ जाएगी. तानाशाह सरकार जब एजेंसियों, कानूनों और जेलों का दुरुपयोग करेगी, तो हमें कौन बचाएगा?

‘बाबा साहेब अंबेडकर ने लिखा था, संविधान बचाएगा. सुप्रीम कोर्ट ने संविधान का इस्तेमाल करते हुए कल तानाशाही को कुचला. मैं उन वकीलों का भी शुक्रगुजार हूं, जो यह लड़ाई लड़ रहे थे. वे वकील एक कोर्ट से दूसरे कोर्ट धक्के खा रहे हैं.’

पर बात घूमफिर कर वहीं आ जाती है कि ‘जेल नहीं, जमानत ही नियम है’ का फार्मूला हर उस इनसान पर लागू क्यों नहीं होता है, जो जेल में बैठा न जाने कितने समय से सड़ रहा है.

‘इंडिया टुडे’ में छपी एक खबर के मुताबिक, भारत की दोतिहाई जेल आबादी दलित, आदिवासी और अन्य पिछड़ा वर्ग के समुदायों के विचाराधीन कैदियों की है, जो छोटेमोटे अपराधों के आरोप में बंद हैं.

कइयों के पास कानूनी मदद लेने को पैसे नहीं हैं. वे अपने अधिकारों से नावाकिफ भी हैं. सरकार की मुफ्त कानूनी सहायता आरोपपत्र दाखिल होने और मुकदमा शुरू होने के बाद मिलती है. ऐसे लोगों को भी तो जमानत मिलने की सहूलियत होनी चाहिए.

डिंपल यादव है अखिलेश की परफेक्ट वाइफ, दोनों की कैमिस्ट्री है सुपरहिट

समाजवादी पार्टी के प्रमुख और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और उनकी पत्नी डिंपल यादव सुर्खियों में रहते है. पति पत्नी की ये जोड़ी को खूब पसंद किया जाता है. लेकिन, डिपंल यादव, अखिलेश की परफेक्ट पत्नी है इस बात का जवाब डिपंल भी समय समय पर देती रही है. डिपंल यादव जितना राजनीति में उनके साथ एक्टिव उतना ही एक परफेक्ट वाइफ होने के लिए परफेक्ट है.दोनो की कैमिस्ट्री को भी खूब पसंद किया जाता है.

 

View this post on Instagram

 

A post shared by Sarassalil (@sarassalil_magazine)


डिपंल और अखिलेश की लव स्टोरी भी वायरल है. उनके लव के चर्चे राजनीति में जोरो शोरो से होते रहे है, वही, खई बार सांसद में दोनों के रिएक्शन भी ऐसे रहे है कि दोनों एक दूसरे को चीयर करते हुए नजर आए है. डिपंल यादव और अखिलेश यादव ने अपनी एक दूसरे का साथ बौंडिग को सांसद में सबके सामने भी दिखाया है.

संसद में करती है पति अखिलेश को चीयर

डिपंल यादल और अखिलेश यादव कन्नौज की सांसद में बैठे थे. अखिलेश यादव के भाषण के दौरान उनकी पत्नी और मैनपुरी से सांसद डिंपल यादव उनके ठीक पीछे बैठी थीं. अखिलेश ने जिस प्रकार से भाजपा को विभिन्न मुद्दों पर घेरा, उस दौरान डिंपल के इमोसन देखने लायक थे. कई मौकों पर वह खिलखिलाकर हंसती दिखाई दी. एक मौके पर डिंपल यादव मेज थपथपाकर हंसती दिखाई दी. डिपंल, अखिलेश का साथ देने से कभी भी पिछे नहीं हटती है.

जब साथ साथ बनें थे सांसद

दोनों की कैमिस्ट्री तब भी सुर्खियों में थी जब सपा चीफ अखिलेश यादव और उनकी पत्नी डिंपल यादव पहली बार एक साथ लोकसभा जा रहे हैं. ऐसे में अखिलेश और डिंपल, यूपी के पहले दंपत्ति होने जा रहे हैं, जो एक साथ सांसद बने हैं और एक साथ ही लोकसभा पहुंच रहे हैं.politics

प्यार से शादी तक दिया पूरा साथ

दोनों की प्रेम कहानी के किस्से भी मौजूद है. अखिलेश के नीजी जीवन पर एक किताब लिखी गई थी. जिसका नाम अखिलेश यादव-बदलाव की लहर है. इस किताब में उन्होंने अखिलेश की निजी जिंदगी से जुड़ी कई अहम बातें भी बताई हैं. किताब के मुताबिक, अखिलेश और डिंपल दोस्त से मिलने का बहाना बनाकर एक दूसरे से छुप छुपकर मिलते थे. इसके बादचार साल की दूरी, परिवार का विरोध, लेकिन बावजूद इसके इस जोड़ी ने हर बाधा को पार किया और आज जीवनसाथी है और दोनों के तीन बच्चे है.

लेकिन हर कदम पर डिंपल यादव ने साथ चलकर ये दिखाया है कि वे अखिलेश की एक परफेक्ट वाइफ है जो पर्सनल, प्रोफेशनल दोनों तरीके से उनका साथ देती है.

नीतीश कुमार ने विधानसभा में किया महिला विधायक का अपमान, हुए आपे से बाहर

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एक बार फिर आपे से बाहर हो गए और एक ‘महिला विधायक’ को इंगित करते हुए कुछ ऐसा कह दिया, जो खुद उन के लिए आफत बन गया है और अब जब वे घिरे गए हैं, तो उन से जवाब देते नहीं बना, मगर उन्होंने अपनी गलती या माफी नहीं मांगी, नतीजतन वे और उन का बरताव आज देशभर में चर्चा की बात बन गए हैं.

अच्छा होता कि नीतीश कुमार तत्काल अपने कथन को ले कर माफी मांग लेते, मगर आज हमारे समाज और देशप्रदेश में जो लोग ऊंचे ओहदों पर पहुंच जाते हैं, वे अपनेआप को सबकुछ समझते हैं और अपनी गलती पर माफी मांगने में उन्हें शर्म आती है.

नीतीश कुमार के तेवर

दरअसल, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार विधानसभा में अपना आपा खो बैठे और राष्ट्रीय जनता दल की विधायक रेखा देवी पर गुस्से में आ कर एक विवादास्पद टिप्पणी करते हुए कहा – ‘अरे महिला हो, कुछ जानती नहीं हो.”

नीतीश कुमार के इस कथन को ले कर विधानसभा में हंगामा खड़ा हो गया. थोड़ी देर बाद उन्हें बात समझ में आ गई कि गलती हो गई है, मगर अपनी गलती को छिपाने के बजाय समझदारी दिखाते हुए गलती स्वीकार कर लेते, तो बात वहीं खत्म हो जाती.

बिहार की मुख्यमंत्री रह चुकीं और राज्य विधानपरिषद में प्रतिपक्ष की नेता राबड़ी देवी ने इस मुद्दे पर कहा, “मुख्यमंत्री के साथ ऐसा पहली बार नहीं हुआ है… लोग जानते हैं कि उन के (नीतीश) मन में महिलाओं के लिए कोई सम्मान नहीं है. उन्होंने विधानसभा में जोकुछ किया है, वह सरासर एक महिला का अपमान है. जद (यू) नेताओं और राजग के अन्य गठबंधन सहयोगियों के मन में महिलाओं के लिए कोई सम्मान नहीं है. महिलाओं का सम्मान केवल राजद और इंडिया गठबंधन के नेताओं में ही है.”

यह महिलाओं का अपमान

नीतीश कुमार बिहार विधानसभा में अपनी कही हुई बातों के चलते चर्चा में रहे हैं. पहले भी उन्होंने कुछ ऐसी बातें कह दी थीं, जो संसदीय नहीं की जा सकती हैं.

रेखा देवी, जिन्हें इंगित करते हुए नीतीश कुमार ने टिप्पणी की थी, ने कहा, “नीतीश कुमारजी ने विधानसभा में जोकुछ कहा, वह एक महिला का अपमान है. उन्होंने मेरे साथ ऐसा किया… यह पहली बार नहीं हुआ है. हम आज यहां अपने नेता और पार्टी प्रमुख लालू प्रसाद की वजह से हैं… नीतीश कुमार की वजह से नहीं. नीतीश कुमार ने सदन में एक दलित विधायक का अपमान किया है. ऐसा लगता है कि मुख्यमंत्री का अपने दिमाग पर कोई नियंत्रण नहीं रहा.”

दरअसल, बिहार विधानसभा में 24 जुलाई, 2024 को राज्य के संशोधित आरक्षण कानूनों को संविधान की 9वीं अनुसूची में शामिल किए जाने की मांग को ले कर विपक्षी सदस्य हंगामा और नारेबाजी कर रहे थे. हंगामे के बीच मुख्यमंत्री नीतीश कुमार दखल देने के लिए उठ खड़े हुए. उस समय राजद की मसौढी से विधायक रेखा देवी अपनी बात कह रही थीं.

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने रेखा देवी की ओर उंगलियां दिखाते हुए ऊंची आवाज में कहा, “अरे महिला हो, कुछ जानती नहीं हो. इन लोगों (राजद) ने किसी महिला को आगे बढ़ाया था. क्या आप को पता है कि मेरे सत्ता संभालने के बाद ही बिहार में महिलाओं को उन का हक मिलना शुरू हुआ. 2005 के बाद हम ने महिलाओं को आगे बढ़ाया है. बोल रही हो, फालतू बात… इसलिए कह रह हैं, चुपचाप सुनो. ”

उन के इतना कहते ही सदन में हल्ला बोल शुरू हो गया. एक महिला विधायक से इस तरह मुखातिब होने का विपक्षी सदस्यों द्वारा विरोध किए जाने पर मुख्यमंत्री ने कहा, “अरे क्या हुआ… सुनोगे नहीं… हम तो सुनाएंगे और अगर नहीं सुनिएगा, तो यह आप की गलती है.”

बाद में संसदीय कार्यमंत्री विजय कुमार चौधरी ने दखल देते हुए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से आसन को संबोधित करने का अनुरोध किया तो नीतीश कुंअर ने विपक्षी सदस्यों के बारे में कहा, “आप समझ लीजिए कि हम लोगों ने 1-1 चीज को लागू कर दिया है.”

इधर तेजस्वी यादव ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की टिप्पणी को ‘महिला विरोधी व असभ्य’ करार दिया. उन्होंने आरोप लगाया कि महिलाओं के खिलाफ बयानबाजी नीतीश कुमार की आदत है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार मुख्यमंत्री के साथसाथ एक वरिष्ठतम विधायक हैं, उन्हें अपनी बात आसन को संबोधित करते हुए कहनी चाहिए थी, मगर जिस ढंग और शब्दों में उन्होंने आसन की अनदेखी कर के अपनी बात कही, वह हर नजरिए से आलोचना की बात बन गई है.

कांवड़ यात्रा : राहुल की मुहब्बत की दुकान, योगी के फैसले पर सवाल

उत्तर प्रदेश की योगी आदित्य नाथ सरकार पर संकट के बादल गहरे काले होते जा रहे हैं. एक तरफ नरेंद्र मोदी की चाह है कि योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री पद से मुक्त हो जाएं, तो दूसरी तरफ योगी आदित्यनाथ और उन के खास लोग ऐसा नहीं चाहते हैं.

बहुचर्चित कांवड़ यात्रा के संबंध में कहा जा सकता है कि सावन का महीना हो और बादल घने और पानी लिए न हों, भला यह कैसे मुमकिन है. कोई योगी हो तो भला वह आधुनिक विचारों से संपन्न कैसे हो सकता है. हालांकि, अपवाद हो सकते हैं, होते हैं, मगर उत्तर प्रदेश की बदहाली देखिए कि गोरखनाथ मठ के प्रमुख योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बन गए हैं. इस के बाद से मुख्यमंत्री पद का जो पतन हुआ है, वह सारा देश और दुनिया जानती है. सच तो यह है कि हिंदू आज आधुनिक सोच के साथ दुनियाभर में देश की कामयाबी का परचम लहरा रहे हैं, मगर योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री की कुरसी पर बैठ कर जिस तरह के फैसले ले रहे हैं, उन से हंसी भी आती है और रोना भी आता है.

कांवड़ यात्रा को ले कर आज देशभर में उत्तर प्रदेश चर्चा का केंद्र बन गया है और सरकार योगी आदित्यनाथ की छीछालेदर हो रही है. यहां तक कि भारतीय जनता पार्टी के सहयोगी दल भी मुखर हो चुके हैं और विरोध कर रहे हैं. अब सवाल यह है कि क्या योगी आदित्यनाथ पीछे हटेंगे? क्या वे यह कहेंगे कि यह फैसला उन का नहीं है, बल्कि प्रशासनिक लैवल पर लिया गया था और अपनी छवि बचाएंगे या फिर पूरे मामले में नया ट्विस्ट आएगा? सचमुच यह सब देखना दिलचस्प होगा.

भाजपा में खतरे की घंटी

कांवड़ यात्रा मार्ग पर बने ढाबों पर अपने नाम लिखने के उत्तर प्रदेश सरकार के आदेश की आम आदमी भी आलोचना कर रहा है. यह सचमुच हमारे देश की गंगाजमुना संस्कृति पर एक बड़ी चोट है. यही वजह है कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के सहयोगी दलों ने सवाल उठाए हैं.

जनता दल (यूनाइटेड) के नेता नीतीश कुमार, लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के नेता चिराग पासवान के बाद राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष और केंद्रीय राज्य मंत्री जयंत चौधरी ने भी सवाल उठाए हैं, जो यह बताते हैं कि जल्द ही योगी आदित्यनाथ की विदाई मुमकिन है या फिर वे राजनीति में एक पिटा हुआ चेहरा बन कर रह जाएंगे.

अपने पिता चौधरी चरण सिंह को ‘भारत रत्न’ मिलने से गदगद हुए जयंत चौधरी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन से जुड़ गए हैं, मगर योगी आदित्यनाथ के इस फैसले पर उन्होंने सरकार के फैसले की आलोचना करते हुए कहा, ‘ऐसा लगता है कि यह आदेश बिना सोचेसमझे लिया गया है और सरकार इस पर इसलिए अड़ी हुई है, क्योंकि फैसला हो चुका है. कभीकभी सरकार में ऐसी चीजें हो जाती हैं.’

उन्होंने आगे कहा, ‘अब भी समय है कि इसे वापस लिया जाए या सरकार को इसे लागू करने पर ज्यादा जोर नहीं देना चाहिए. कांवड़ की सेवा सभी करते हैं. कांवड़ की पहचान कोई जाति से नहीं की जाती है. इस मामले को धर्म और जाति से नहीं जोड़ा जाना चाहिए. कहांकहां नाम लिखें, क्या अब कुरते पर भी नाम लिखना शुरू कर दें, ताकि देख कर यह तय किया जा सके कि हाथ मिलाना है या गले लगाना है?’

इस से पहले नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल (यूनाइटेड) के प्रवक्ता केसी त्यागी ने फैसले की समीक्षा करने की मांग की. उन्होंने कहा कि ऐसा कोई भी आदेश जारी नहीं किया जाना चाहिए, जिस से समाज में सांप्रदायिक विभाजन पैदा हो. कई मौके पर मुजफ्फरनगर के मुसलमान कांवड़ यात्रियों की मदद करते देखे गए हैं.

राजग केंद्र सरकार में शामिल केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने भी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के फैसले पर सवाल उठाए हैं. उन्होंने कहा, ‘मेरी लड़ाई जातिवाद और सांप्रदायिकता के खिलाफ है, इसलिए जहां कहीं भी जाति और धर्म के विभाजन की बात होगी, मैं उस का कभी भी समर्थन नहीं करूंगा.’

दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता मुख्तार अब्बास नकवी ने पहले तो योगी सरकार के फैसले पर सवाल उठाए और इसे छुआछूत को बढ़ावा देने वाला बताया, पर बाद में कहा कि राज्य सरकार के आदेश से साफ है कि कांवड़ियों की आस्था को ध्यान में रखते हुए यह फैसला लिया गया है, लेकिन कुछ लोग सांप्रदायिकता फैलाने की कोशिश कर रहे हैं.

इस तरह भारतीय जनता पार्टी का चरित्र आज देश के चौराहे पर खड़ा है. दूसरी तरफ मजेदार बात किया है कि कांवड़ यात्रा के रास्ते पर कांग्रेस के नेता राहुल गांधी की मुहब्बत की दुकान के पोस्टर दिखाई देने लगे हैं, जो बताता है कि उन की लोकप्रियता और विचार अब देश की जनता स्वीकार करने लगी है. यह सीधेसीधे नरेंद्र मोदी सरकार के लिए खतरे की घंटी है.

जानिए मोदी जी और दूसरे नेताओं को मिलती है कितनी सैलेरी

भारत में सबसे ज्यादा अबादी युवाओं की है, भारत युवाओं का देश है. जहां का युवा पौलिटिक्स की हर चीज जानने में रुची रखता है हालांकि, युवा राजनीति में आने में तो ज्यादा नहीं आना चाहते है लेकिन देश के नेता कितना कमा रहे है ये जरूर जानना चाहते है. तो देश की पीएम मोदी जी कितना कमा रहे है इस बात की जानकारी सब लेना चाहते होंगे, साथ ही बाकी नेताओं की क्या सैलेरी है यहां जाने.
<

 

View this post on Instagram

 

A post shared by Sarassalil (@sarassalil_magazine)

राष्ट्रपति

राष्ट्रपति हर महीने 5 लाख रुपए कमाता है. इतना ही नही, रिटायर होने के बाद भी उनकी हर महीने 1.5 लाख रुपए की इनकम आती है. भारत की वर्तमान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू है.

उपराष्ट्रपति

उपराष्ट्रपति को राष्ट्रपति से हर महीना 1 लाख रुपए सैलेरी के तौर पर मिलता है. सैलेरी के अलावा उन्हे हर महीना हर तरह के भत्ते मिलते है. भारत के वर्तमान उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ जी है.

प्रधानमंत्री

अब बात आती है भारत के प्रधनमंत्री की सैलेरी कितनी है तो हाल के पीएम श्री नरेंद्र मोदी जी है. जो हर महीना 1 लाख 60 हजार रुपए बतौर इनकम लेते है. इसके साथ ही पीएम को अलग अलग तरह के सरकारी भत्ते और बाकि सेवाएं दी जाती हैं.

राज्यपाल

राज्यपाल की सैलेरी तो 1 लाख 10 हजार रुपए होती है लेकिन सरकारी भत्ता मिला कर उन्हे 3.5 लाख रुपए पूरी इनकम दी जाती है. बता दें, हर राज्य का राज्यपाल अलग होता है. वर्तमान में भारत की राजधानी दिल्ली के राज्यपाल अनिल बैजल है और उत्तर प्रदेश के राज्यपाल श्रीमती आनंदीबेन पटेल है.

मुख्यमंत्री   

मुख्यमंत्री भारत के हर राज्य के अलग है. वही, राज्य के हिसाब से सभी मुख्यमंत्री की सैलरी अलग होती है. जैसे की उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हर महीने 3 लाख 65 हजार रुपये सैलरी के रूप में मिलते हैं. वही, सबसे ज्यादा सैलरी कर्नाटक के मुख्यमंत्री की है जो 4 लाख 21 हजार रुपये है. बता दें, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल 1.70 लाख रुपये वेतन लेते हैं.

विधायक

हर राज्य के विधायक की सैलरी अलग-अलग होती है. अनुच्छेद 164 के अनुसार हर राज्य में विधायक की सैलरी उसके राज्य विधायिकाओं द्वारा तय की जाती है. तेलंगाना के विधायकों को सबसे ज्‍यादा सैलरी दी जाती है. वहीं सबसे कम सैलरी त्रिपुरा और मेघालय के विधायकों को दी जाती है. तेलंगाना के विधाय‍क हर महीने 2.50 लाख रुपये पाते हैं तो त्रिपुरा के विधायकों को 34 हजार रुपये सैलरी दी जाती है. इस तरह से विधायक लाख से हजार रुपए तक कमा लेते है.

राहुल गांधी का संसद में बयान, क्यों बौखलाई भाजपा

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष के रूप में राहुल गांधी का पहला भाषण ऐसा लगता है मानो भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर बिजली की तरह गिरा. राहुल गांधी के भाषण की जैसी प्रतिक्रिया देशभर में आई है, वह बताती है कि राहुल गांधी का एकएक शब्द लोगों ने ध्यान से सुना और भाजपा तो मानो चारों खाने चित हो गई. यही कारण है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उठ खड़े हुए और उन्होंने सफाई दी.

अब भाजपा नेताओं, नरेंद्र मोदी सहित संघ ने मोरचा संभाला और कहा कि राहुल गांधी हिंदुओं को ऐसावैसा कह रहे हैं….देखिए… जबकि हकीकत यह है कि जिस ने भी राहुल गांधी का भाषण सुना है, वह जानता है कि राहुल गांधी ने भाजपा और संघ पर टिप्पणी की है और कहा कि हिंदू समाज ऐसा नहीं है मगर भरम यह फैलाया जा रहा है कि राहुल गांधी ने संपूर्ण हिंदू समाज को हिंसक कहा है जो सीधेसीधे गलत है.

दरअसल, भाजपा के काम करने का ढंग यही है कि वह बातों को तोड़मरोड़ देती है. इस का सब से बड़ा उदाहरण है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसद में खड़े हो कर के कहना कि राहुल गांधी हिंदुओं को हिंसक कर रहे हैं, जबकि राहुल ने क्या कहा, यह साफ है.

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने सोमवार, 1 जुलाई, 2024 को भाजपा पर देश में हिंसा, नफरत और डर फैलाने का आरोप लगाया और दावा किया, ‘ये लोग हिंदू नहीं हैं, क्योंकि 24 घंटे की हिंसा की बात करते हैं.’

राहुल गांधी ने राष्ट्रपति के अभिभाषण पर लाए गए धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा में भाग लेते हुए कहा, ‘हिंदू कभी हिंसा नहीं कर सकता, कभी नफरत और डर नहीं फैला सकता.’

राहुल गांधी ने जब भाजपा पर यह आरोप लगाया तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की बौखलाहट साफ दिखाई दी. दोनों ने आपत्ति जताते हुए कहा कि कांग्रेस नेता ने पूरे हिंदू समाज को हिंसक कहा है.

राहुल गांधी ने भाजपा पर युवाओं, छात्रों, किसानों, मजदूरों, दलितों, महिलाओं और अल्पसंख्यकों में डर पैदा करने का आरोप लगाया. उन्होंने कहा कि भाजपा के लोग अल्पसंख्यकों, मुसलमानों, सिखों एवं ईसाइयों को डराते हैं, उन पर हमला करते हैं और उन के खिलाफ नफरत फैलाते हैं, लेकिन अल्पसंख्यक इस देश के साथ हैं.

नरेंद्र मोदी सामने आए

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने भारतीय जनता पार्टी पर निशाना साधते हुए कहा कि खुद को हिंदू कहने वाले हर समय ‘हिंसा और नफरत फैलाने’ में लगे हैं, जिस पर सत्ता पक्ष के सदस्यों ने जोरदार तरीके से विरोध जताया.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सामने आए और कहा, “पूरे हिंदू समाज को हिंसक कहना बहुत गंभीर बात है.” हालांकि राहुल गांधी ने प्रतिक्रिया में कहा कि वे भाजपा की बात कर रहे हैं और भाजपा, नरेंद्र मोदी या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पूरा हिंदू समाज नहीं हैं.

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने सदन में कई बार भगवान शिव की एक तसवीर दिखाते हुए कहा कि वे अहिंसा और निडरता का संदेश देते हैं. सदन में राष्ट्रपति अभिभाषण के धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा में भाग लेते हुए राहुल गांधी ने कहा, ‘सभी धर्मों और हमारे सभी महापुरुषों ने अहिंसा और निडरता की बात की है. वे कहते थे कि डरो मत, डराओ मत.’

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सामने आया

संघ ने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के बयान पर आपत्ति जाहिर की. संघ की ओर से कहा गया कि हिंदुत्व को हिंसा से जोड़ना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है. विश्व हिंदू परिषद ने भी राहुल के भाषण की भर्त्सना की है. हिंदुत्व चाहे विवेकानंद का हो या गांधी का, वह सौहार्द्र व बंधुत्व का परिचायक है. हिंदुत्व के बारे में ऐसी प्रतिक्रिया ठीक नहीं है.

विश्व हिंदू परिषद के अध्यक्ष आलोक कुमार ने कहा कि लोकसभा में राहुल गांधी ने बहुत ही नाटकीय आक्रामकता से भरा भाषण दिया है. नेता प्रतिपक्ष के नाते शायद उन के पहले भाषण में अपनेआप को साबित करने का जोश होगा. इस दौरान वे बोल गए कि हिंदू समाज हिंसक होता है.

संघ के सुनील आंबेकर ने कहा कि संसद में जिम्मेदार लोगों द्वारा हिंदुत्व को हिंसा से जोड़ना दुर्भाग्यजनक है.
उन्होंने कहा कि जिस हिंदू समाज के भिक्षुक पैदल ही दुनिया का भ्रमण करते थे, अपने प्रेम से, तर्क से, करुणा से लोगों को हिंदू बनाते थे, उस समाज पर ऐसा आरोप लगाने की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती थी.

कुलमिला कर राहुल गांधी के कथन से भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ दोनों के हाथों के तोते उड़े हुए हैं.

इन नेताओं की वाइफ है जरा हटके, कोई बीकौम तो कोई पढ़ी है डीपीएस से

नेताओं की लाइफ और वाइफ कैसी है ये जानने के लिए सभी उतवाले रहते हैं, जाहिर सी बात है कि जो राजनेता हमेशा सुर्खियों में रहते हैं उनकी वाइफ तो कमाल और हटकर की ही होगी. भले ही वे कितनी भी मौर्डन क्यों न हो पारंपरिक तरीके से रहती हैं. तो आइएं जानते हैं किस नेता की पत्नी कैसी और क्या है.

 

View this post on Instagram

 

A post shared by Sarassalil (@sarassalil_magazine)

अनुराग ठाकुर की पत्नी शेफाली ठाकुर

अनुराग ठाकुर जानेमाने नेता हैं उनकी पत्नी का नाम शेफाली ठाकुर है. शेफाली भी राजनैतिक परिवार से तालुक रखती हैं. उनके पिता गुलाब सिंह ठाकुर हिमाचल प्रदेश के पब्लिक वर्क डिपार्टमेंट में मंत्री रह चुके हैं. शेफाली काफी स्टाइलिश और खूबसूरत है. अनुराग कई बार उनके साथ सोशल मीडिया पर फोटोज शेयर करते है.

अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव

डिम्पल यादव एक भारतीय राजनेत्री हैं. वह समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष, उत्तर प्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष व उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की धर्मपत्नी हैं. स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद डिंपल यादव ने लखनऊ यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया जहां से उन्होंने कौमर्स में स्नातक की डिग्री ली. वे एक संस्कारी बहू भी हैं इन्हे ज्यादात्तर वक्त सिर पर चुन्नी रखे देखा गया है. राजनीति में होते हुए भी विवादों से बचती हैं, फैमिली फंक्शन्स में बड़े उत्साह से भाग लेती हैं.

तेजस्वी यादव की पत्नी राजश्री यादव

बिहार के पूर्व डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव की वाइफ राजश्री भी काफी चर्चा में रहती हैं. उन्हें पौलिटिक्स में सभी जानते हैं. तेजस्वी यादव की पत्नी राजश्री यादव का असली नाम रेचल है. तेजस्वी यादव और राजश्री यादव ने नई दिल्ली के आरके पुरम में डीपीएस स्कूल से एकसाथ पढ़ाई की है. शादी के बाद रेचल ने अपना नाम बदलकर राजश्री कर लिया था. राजश्री यादव पहले एक एयर होस्टेस रह चुकी है. मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक तेजस्वी यादव की पत्नी राजश्री यादव ग्रेजुएशन कर चुकी है. राजश्री शादी से पहले एक एयरलाइंस में केबिन क्रु के तौर पर काम करती थी. कुछ दिन पहले उनकी एक वीडयो वायरल हुई थी जिसमें वह अपनी सासु मां राबड़ी देवी के साथ चक्की चलाती दिखी थीं.

रहिमन पानी राखिए, बिन पानी मचे घमासान, कहीं हो सिरफुटौव्वल, कहीं गोली खाए जवान

नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री के रूप में एक बड़ी योजना ‘जल जीवन मिशन’ शुरू की है, जिस के तहत अरबों रुपए के बजट के तहत गांवगांव में पानी की टंकियां बनाई जा रही हैं. दूसरी तरफ पानी को ले कर होने वाले झगड़े देशभर में अब अपनी सीमाओं को लांघ रहे हैं. कहीं पानी के लिए मारामारी मची हुई है, तो कहीं लाठी और गोली चल रही है.

नरेंद्र मोदी की ‘जल जीवन मिशन’ योजना में पलीता लग चुका है… किस तरह और कैसे हम आप को आगे बताएंगे, अभी तो यह समझना चाहिए कि पानी की कमी सरकार के लिए एक सामान्य घटना हो सकती है, मगर यह सरकार की नाकामी ही कही जाएगी.

हम यहां कुछ घटनाओं का ब्योरा दे रहे हैं, जो बताती हैं कि पानी के चलते किस तरह के हालात पैदा हो रहे हैं :

-छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में पानी को ले कर 2 औरतों में तकरार हुई. एक औरत ने दूसरी औरत पर हमला कर दिया और मामला पुलिस तक जा पहुंचा.

-छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के अरजुनी गांव में एक आदमी ने पानी के झगड़े के चलते दूसरे आदमी पर डंडा चला दिया, जिस से उस का सिर फट गया.

यही हालात रहे तो किसी दिन देश और समाज दोनों को ही इस के लिए कोई बड़ा खमियाजा भुगतना पड़ सकता है. दरअसल, यह कल्पना करना भी मुश्किल है कि सिर्फ पानी के लिए कोई किसी के सिर पर लाठी मार दे या गोली चला दे. मगर ऐसी वारदातें अब आएदिन हो रही हैं, जो बताती हैं कि सरकार पानी की समस्या को ले कर गंभीर नहीं है.

भीषण गरमी के मौसम में पानी को ले कर मारामारी की खबरें अखबारों में सुर्खियां बनती रहती हैं, मगर इस के लिए गोली भी चल सकती है, क्या आप को मालूम है? यह वारदात बताती है कि पानी की समस्या कितनी गंभीर हो चुकी है.

गाजियाबाद जिले के निवाड़ी थाना क्षेत्र में पानी के झगड़े के चलते एक आदमी और उस के बेटे की गोली मार कर हत्या कर दी गई. यही नहीं, हमले में मृतक का दूसरा बेटा घायल हो गया. पुलिस को जब इस की जानकारी मिली तो मौका ए वारदात पर पहुंच कर उस ने हालात को शांत कराया और आरोपियों को हिरासत में ले लिया.

निवाड़ी इलाके के खिंदौड़ाधौलड़ी रजवाहा के रास्ते पर एक रात कुछ लोगों ने आम के बाग के ठेकेदार और धौलड़ी गांव के रहने वाले 55 साल के पप्पू और उन के 2 बेटों 26 साल के राजा और 22 साल के चांद पर ताबड़तोड़ गोलियां चला दीं. इस की वजह सिर्फ एक थी, पानी.

इस हमले में पप्पू और राजा की मौके पर मौत हो गई, जबकि कंधे और हाथ में कई गोलियां लगने के बावजूद चांद किसी तरह वहां से बच कर भाग गया.

पुलिस उपायुक्त ग्रामीण विवेकचंद यादव के मुताबिक, जलस्रोत से सिंचाई के लिए पानी की सप्लाई लेने के मुद्दे पर 2 पक्षों में विवाद हुआ. पप्पू और उन के बेटे मोटरसाइकिल से आम के एक बगीचे से दूसरे बगीचे में जा रहे थे, जिसे उन्होंने वेद प्रकाश त्यागी से ठेके पर लिया था.

पुलिस की शुरुआती जांच के मुताबिक, इन तीनों की शुक्रवार, 21 जून, 2024 की शाम को बगल के बगीचे के मालिक के साथ तीखी नोकझोंक हुई, फिर रात को बाग में पहले से ही मौजूद हमलावरों के एक गुट ने उन पर गोलियां चला दीं. मौके से पुलिस को 5 खाली कारतूस मिले हैं.

पुलिस ने शनिवार, 22 जून, 2024 की सुबह पप्पू और राजा के शवों को नहर से बरामद कर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. दूसरी ओर चांद के गुस्साए परिवार ने शनिवार, 22 जून, 2024 को निवाड़ी रोड पर यातायात जाम कर शासन से इंसाफ की फरियाद की. पप्पू के परिवार की तहरीर के आधार पर 7 नामजद लोगों के खिलाफ पुलिस ने मामला दर्ज किया है.

पुलिस उपायुक्त के मुताबिक, 3 मुख्य आरोपियों बिट्टू त्यागी, उस के भाई दीपक त्यागी और पिता सुधीर त्यागी को गिरफ्तार कर लिया गया है, जबकि बाकी आरोपियों को पकड़ने की कोशिश कर रही है.

दरअसल, देशभर में पानी की कमी की खबरें और उसे ले कर खूनी लड़ाई की वारदातें हो रही हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ‘जल जीवन मिशन’ योजना के तहत अरबों रुपए खर्च कर के गांवगांव में पानी की टंकियां बनवा रहे हैं. हम जानते हैं कि उन के पहले कार्यकाल में जब उन्होंने स्वच्छता अभियान चला कर घरघर में शौचालय बनवाए थे, तो आज उन की हालत देखने लायक है. पानी नहीं होने के चलते ज्यादातर शौचालय अब खंडहर बन चुके हैं. अब वे पानी की टंकियां बनवा रहे हैं, वे भी आने वाले समय में खंडहर बन जाएंगी और गांव वालों को पानी मिल ही नहीं पाएगा, क्योंकि इस योजना में खामियां ही खामियां हैं.

अच्छा हो कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समय निकाल कर कभी किसी पानी टंकी के बनने की जगह पर जा कर हालात का जायजा ले आएं, तो शायद कुछ ठोस बदलाव आ जाए.

तेजस्वी यादव के वो कमेंट्स जो लोकसभा चुनाव 2024 में चर्चा में रहे

लोकसभा चुनाव 2024 का रूझान सभी के लिए चौंकाने वाला थे. इस पूरे 7 चरणों के इस चुनाव में बिहार के पूर्व डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव ने विपक्ष पर जमकर तंज कसा. लालू के बेटे तेजस्वी यादव ने पूर्व सहयोगी बिहार के सीएम नीतीश कुमार पर चाचा चाचा कह कर खूब तंज कसा.

 

View this post on Instagram

 

A post shared by Sarassalil (@sarassalil_magazine)

लालू के राज में थे सब बाबू साहब

एक चुनावी सभा के दौरान तेजस्वी यादव ने कहा था कि जब लालू यादव का राज था तो गरीब सीना तान के “बाबू साहब” के सामने चलते थे. उन्होंने कहा कि, “हमारी सरकार आएगी तो हम सब लोगों को साथ लेकर चलेंगे. जो अपराध करेगा उसे सज़ा मिलेगी, जो कर्मचारी काम करेंगे उन्हें सम्मान मिलेगा.”

शरीर उधर है मन इधर है

जब से तेजस्वी यादव और नीतीश कुमार राजनीतिक तौर पर एक दूसरे से अलग हुए हैं. तभी से ऐसा देखा गया है कि तेजस्वी बीजेपी पर तो खूब हमलावर रहते हैं लेकिन नीतीश कुमार को लेकर उनका रुख नरम पड़ जाता है. ऐसे में तेजस्वी यादव ने हाल में नीतीश कुमार को लेकर एक बार फिर से बड़ा बयान दे दिया है. सीएम नीतीश कुमार को लेकर तेजस्वी यादव ने कहा – ‘चाचा जी का शरीर उधर है, मन इधर है’.

मोदी को लेकर तेजप्रताप की तरह है तेजस्वी यादव

तेजस्वी ने लोकसभा चुनावों के दौरान मंच पर राहुल गांधी के साथ एक भाषण दिया जिससे सोशल मीडिया पर मोदी और गोबर हलवा का नाम दिया. भाषण में ये जताने की कोशिश की गई कि मोदी सरकार और गोबर का हलवा बराबर है. यहां तेजस्वी ने पूरे भाषण में ऐसी बातें कही जिससे साथ में बैठे राहुल गांधी पर हंस पडे. उन्होंने कहा कि भाजपा का ‘बटन दबाओं खटाखट और बीजेपी का बटन दबाओं झटाझट, सरकार बदेलेंगी फटाफट’. इन सब कमेंट्स को लेकर तेजस्वी इन लोकसभा चुनाव में काफी चर्चा में रहे है. बता दें कि मोदी सरकार को लेकर तेजस्वी अपने बड़े भाई की तरह कभी नहीं चूकते है, वह भी विपक्ष पर खूब तंज कसते है.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें