मोबाइल लूटने वाली दिलकश हसीना

पहली अक्तूबर, 2016 की बात है. उस दिन भी शाम के वक्त कालेज बस ने लवलीन को माडलटाउन-1 के बसस्टैंड पर उतारा. वहां से कुछ दूरी पर स्थित परमानंद कालोनी में उस का घर था. बस से उतरने के बाद वह पैदल ही अपने घर जा रही थी. जब वह टैगोर पार्क के नजदीक पहुंची, तभी किसी ने अचानक ठीक उस के पीछे पहुंच कर उस की पीठ पर कोई सख्त चीज सटा कर सख्त लहजे में धमकी दी, ‘‘ऐ लड़की, तेरे पास जो कुछ नकदी और मोबाइल है, उसे फौरन मेरे हवाले कर दे वरना अपनी जान से हाथ धो बैठेगी.’’

वह आवाज किसी युवती की थी. लेकिन उस ने जिस तरह धमकी में उस से बात की थी, उस से लवलीन बुरी तरह सहम गई. उस की इतनी भी हिम्मत नहीं हुई कि वह एक बार पीछे मुड़ कर उस युवती या अपनी पीठ पर सटाई गई कठोर वस्तु को एक नजर देख ले. वह जस की तस खड़ी रह गई. लवलीन के ठिठक कर खड़े होते ही पीछे खड़ी युवती ने झट से उस की जेब में अपना दूसरा हाथ डाल दिया और उस की जेब में रखा एचटीसी का महंगा मोबाइल निकाल लिया.

उसी दौरान एक सफेद रंग की कार तेजी से उस के पास आ कर रुकी, उस की ड्राइविंग सीट पर एक युवक था. जिस युवती ने उस की जेब से मोबाइल फोन निकाला था, वह उसी कार में उस युवक के बराबर में जा कर बैठ गई. उस के सीट पर बैठते ही कार माडलटाउन के प्रिंस रोड की ओर बढ़ गई. उस कार के नजरों से ओझल हो जाने के बाद जैसे लवलीन को होश आया.

महंगा मोबाइल फोन लुट जाने पर लवलीन बहुत परेशान हुई. जिस जगह पर उस के साथ वारदात हुई थी, वहां से थोड़ी ही दूरी पर माडलटाउन पुलिस स्टेशन था. वह सोचने लगी कि जिस तरह उस के साथ वारदात हुई थी, वैसे में तो वे लोग अगर उस का अपहरण भी कर लेते तो वह क्या कर सकती थी.

बहरहाल, इस वारदात की रिपोर्ट लिखवाने के लिए वह माडनटाउन थाने पहुंच गई. ड्यूटी अफसर को उस ने अपने साथ घटी घटना की जानकारी दी तो ड्यूटी अफसर ने इस बारे में थानाप्रभारी प्रदीप पालीवाल से बात की. उन के निर्देश पर अज्ञात लोगों के खिलाफ भादंवि की धारा 382 के तहत रिपोर्ट दर्ज कर ली गई और जांच एसआई देवेंद्र कुमार को सौंप दी गई.

एसआई देवेंद्र कुमार ने लवलीन से बदमाश युवक और युवती के कदकाठी और कार के बारे में पूछा तो लवलीन ने बताया कि उस लड़की की उम्र कोई 25 से 30 साल थी. जो युवक सफेद रंग की होंडा ब्रियो कार से आया था, उस का चेहरा वह ठीक से नहीं देख पाई थी. लेकिन उस कार के पीछे की नंबर प्लेट पर कोई नंबर नहीं लिखा था. लवलीन से घटना के बारे में पूछताछ करने के बाद देवेंद्र कुमार ने उसे अपने घर जाने की इजाजत दे दी.

लवलीन से पुलिस को केवल उस लड़की की उम्र आदि के बारे में ही जानकारी मिली थी. यदि उन की कार का नंबर मिल जाता तो उस के सहारे उन दोनों तक पहुंचा जा सकता था. आगे की कारवाई के संबंध में एसआई देवेंद्र कुमार ने थानाप्रभारी प्रदीप पालीवाल से बात की. थानाप्रभारी ने देवेंद्र कुमार को कुछ जरूरी हिदायतें देने के बाद इस वारदात की सूचना उत्तरपश्चिमी दिल्ली के डीसीपी मिलिंद दुबड़े को दी.

डीसीपी मिलिंद दुबड़े ने इस घटना को काफी गंभीरता से लिया. बात सिर्फ एक मोबाइल फोन के लूटे जाने भर तक सीमित नहीं थी, बल्कि इस से ज्यादा महत्त्वपूर्ण बात यह थी कि यह घटना दिल्ली के बेहद पौश कहे जाने वाले इलाके माडलटाउन थाने के नजदीक घटी थी. वैसे भी यह घटना इस प्रकार की पहली घटना नहीं थी.

माडलटाउन, मुखर्जीनगर, मौरिसनगर और रूपनगर थानाक्षेत्र में इस तरह की अनेक वारदातें सितंबर, 2016 के बाद हो चुकी थीं. सभी वारदातों में युवक और युवती वारदात कर के कार से ही भागे थे. उन वारदातों में युवक और युवती बात करने के बहाने किसी लड़की का फोन लेते थे और बात करते करते कार में बैठ कर फरार हो जाते थे.

जानकारी में यह बात भी सामने आई थी कि युवती फर्राटेदार अंगरेजी बोलती थी. इसलिए डीसीपी ने वारदात करने वाले युवक युवती की तलाश के लिए माडलटाउन के एसीपी रविंद्र कुमार त्यागी के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई, जिस में थानाप्रभारी प्रदीप पालीवाल, अतिरिक्त थानाप्रभारी सुधीर कुमार, एसआई देवेंद्र कुमार, हैडकांस्टेबल जितेंद्र, कांस्टेबल सतीश आदि को शामिल किया गया.

पुलिस टीम में शामिल सभी सदस्य अपनेअपने स्तर से युवकयुवती को तलाशने लगे. 22 अक्तूबर की रात 8 बजे माडलटाउन थाने के हैडकांस्टेबल जितेंद्र और कांस्टेबल सतीश मैकडोनाल्ड्स की तरफ जाने वाले रास्ते पर बैरिकेड लगा कर उधर से आनेजाने वाले वाहनों को रोक कर रूटीन चैकिंग कर रहे थे. उन की नजरें खासतौर पर उस सफेद रंग की कार को तलाश रही थीं. उसी दौरान होंडा ब्रियो कार आ कर रुकी. वह भी सफेद रंग की थी. कार की अगली सीट पर एक युवती और युवक बैठे थे. हैडकांस्टेबल जितेंद्र ने कार की नंबर प्लेट की ओर नजर डाली तो वह चौंके, क्योंकि उस कार के आगे कोई नंबर प्लेट नहीं लगी थी.

जब उन से पूछताछ की गई तो वे दोनों पहले इधरउधर की बातें करने लगे. शक होने पर हैडकांस्टेबल जितेंद्र ने एसआई देवेंद्र कुमार को फोन कर के उन्हें इन दोनों के बारे में बताया. कुछ ही देर में देवेंद्र कुमार भी वहां पहुंच गए. उन्होंने उन दोनों से कार के कागजात दिखाने के लिए कहा. युवक ने कार के कागज दिखाए तो आरसी में कार नंबर दर्ज था, जबकि कार के आगेपीछे नंबर प्लेट नहीं लगी थी. कार पर नंबर प्लेट लगी न होने के बारे में उस से पूछा गया तो वह कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे सका.

मामला संदिग्ध देख कर पुलिस ने कार की तलाशी ली तो कार के अंदर से 10 महंगे मोबाइल फोन के अलावा ब्रांडेड लेडीज कपड़े और एक बुर्का मिला. पूछताछ के लिए उन्हें थाने ले जाया गया. दोनों से गाड़ी में मिले मोबाइल फोन और बिना नंबर की होंडा ब्रियो कार के बारे में सघन पूछताछ की गई तो दोनों ने स्वीकार कर लिया कि ये मोबाइल अलगअलग जगहों से लूटे गए हैं. युवती ने अपना नाम सोनम और युवक ने नीरज बताया.

दोनों ही शादीशुदा थे. लेकिन अपनेअपने जीवनसाथी को छोड़ कर दोनों लिवइन रिलेशन में रह रहे थे. इस प्रेमी जोड़े ने मोबाइल लूटने की जो कहानी बताई, वह बड़ी ही दिलचस्प निकली. सोनम के पिता एक पुलिस अधिकारी थे और मजलिस पार्क के एक फ्लैट में रहते थे. मजलिस पार्क में ही नीरज के पिता पत्नी और बड़े बेटे के साथ रहते थे. वह भी पुलिस की नौकरी में थे. एक ही महकमे में कार्यरत होने की वजह से उन के घरों में एकदूसरे का आनाजाना एक सामान्य सी बात थी.

सोनम और नीरज बचपन से ले कर जवानी तक साथसाथ पलेबढ़े. जवानी की दहलीज पर पांव रखते ही सोनम और नीरज की दोस्ती प्यार में बदल गई. कुछ ही दिनों में उन की हरकतों को देख कर उन के घर वाले समझ गए कि वे एकदूसरे से प्यार करते हैं. बात आगे बढ़ी तो नीरज ने कह दिया कि वह सोनम से ही शादी करेगा. लेकिन सोनम के मातापिता उस का हाथ नीरज के हाथ में नहीं देना चाहते थे.

बेटी जवान थी, कहीं वह गुस्से में कोई गलत कदम न उठा बैठे, इसलिए पिता ने सोनम के ग्रैजुएट होते ही उस की शादी शालीमारबाग में रहने वाले विक्रम से कर दी. विक्रम एक खातेपीते घर का लड़का था. वह वजीरपुर  स्थित नेताजी सुभाष पैलेस में किसी निजी कंपनी में अच्छे पद पर नौकरी करता था. सोनम और विक्रम शादी के बाद कुछ सालों तक एकदूसरे को बेहद प्यार करते रहे. 2 साल हंसीखुशी के साथ गुजारने के बाद सोनम ने एक बेटे को जन्म दिया. बेटे के जन्म पर विक्रम बेहद खुश हुआ. वह सोनम को पहले से भी ज्यादा प्यार करने लगा, लेकिन सोनम नीरज को अपने दिल से कभी नहीं निकाल सकी और एक बार जब उस का आमनासामना नीरज से हुआ तो नीरज ने बताया कि वैसे तो उस की भी शादी हो चुकी है, लेकिन वह अब भी उसे प्यार करता है.

वह नीरज से किनारा नहीं कर सकी. कुछ सालों के अंतराल के बाद उन का सोया प्यार फिर जाग उठा और वे लोगों की नजरों से बच कर एकदूसरे से फिर मिलने लगे. कुछ समय तक तो विक्रम को सोनम की बेवफाई का कुछ पता नहीं चला, लेकिन सोनम के बारबार घर से गायब रहने से उसे उस पर शक हो गया. तब उस ने सोनम के घर से बाहर जाने पर बंदिश लगा दी. लेकिन इश्क पर आज तक किसी का कोई जोर चला है, जो इन पर चलता. लिहाजा इन का मिलनाजुलना लगातार जारी रहा. नीरज और सोनम एकदूसरे से बदस्तूर प्यार करते रहे.

आखिरकार पत्नी की बेवफाई से तंग आ कर विक्रम अपने से 14 साल छोटी युवती नीरजा को अपना दिल दे बैठा. नीरजा भी उसी के औफिस में काम करती थी. नीरजा बेहद हसीन युवती थी और रंगरूप के मामले में सोनम से कहीं ज्यादा सुंदर थी. विक्रम न केवल नीरजा के साथ ज्यादा वक्त बिताता, बल्कि उसे महंगे तोहफे भी देता. नीरजा से नजदीकी बढ़ने के बाद विक्रम ने सोनम की तरफ ध्यान देना बंद कर दिया. सोनम को जब यह जानकारी मिली तो उस ने सारी बात प्रेमी नीरज को बताई. इस समस्या से निजात दिलाने में नीरज ने उस का हर तरह से सहयोग करने का वायदा किया. लेकिन ऐसा करने में नीरज के साथ एक अहम समस्या आड़े आ रही थी.

नीरज एक बेटी का पिता था. कुछ दिनों बाद नीरज की पत्नी शैफाली को जब पता चला कि नीरज के संबंध सोनम से हैं तो उस ने नीरज से नाराजगी जाहिर करते हुए सोनम से संबंध खत्म करने को कहा. जबकि नीरज को पत्नी शैफाली से ज्यादा सोनम की फिक्र रहती थी, इसलिए उस ने शैफाली की बातों को ज्यादा तवज्जो नहीं दी.

पति की तरफ से हो रही उपेक्षा से आहत हो कर शैफाली ने अपना रास्ता अलग कर लिया और फिर वह भी अपने बौयफ्रैंड के साथ मजलिस पार्क में अलग मकान ले कर रहने लगी. पत्नी के अलग रहने पर नीरज को दुख नहीं हुआ, बल्कि उस ने सोचा कि अच्छा हुआ. क्योंकि अब उसे रोकनेटोकने वाला कोई नहीं था. उस ने आव देखा न ताव, सोनम को अपने साथ रहने के  लिए राजी कर लिया. सोनम भी इस अवसर की ताक में थी. वह अपने बेटे को ले कर नीरज के पास मजलिस पार्क में रहने लगी. नीरज दुकानों में खिलौने वगैरह सप्लाई करने लगा. इस से उसे ठीकठाक आमदनी होने लगी.

उधर विक्रम को जब पता चला कि उस की पत्नी सोनम नीरज के साथ रह रही है तो उसे बड़ा बुरा लगा. वह पहले से ही नीरज को अपना दुश्मन समझता था. वह नीरज को सबक सिखाना चाहता था.

10 अक्तूबर, 2016 को उसे इस का मौका मिल गया. उस ने नीरज को भाडे़ के गुंडों से पिटवा दिया. इस में नीरज को काफी चोटें भी लगीं. काफी दिनों तक सोनम ने उस की सेवा की तब जा कर वह ठीक हुआ. नीरज के ठीक होने के बाद उस ने अपने पति से बदला लेने का निश्चय किया.

उधर विक्रम की प्रेमिका नीरजा ने 8 अक्तूबर, 2016 को नीरज के खिलाफ मारपीट और पीछा करने की रिपोर्ट थाना आदर्शनगर में दर्ज करा दी. महंगे लाइफस्टाइल को अपनाने तथा विक्रम से नीरज का बदला लेने के लिए उसे एक बड़ी रकम की जरूरत थी, जो उस के पास नहीं थी. इसलिए दोनों ने मिल कर मोबाइल लूटने की योजना बनाई. नीरज अपने पिता की होंडा ब्रियो कार का उपयोग करता था. वारदात को अंजाम देने के लिए उस ने कार की नंबर प्लेटें हटा दीं, जिस से किसी को कार का नंबर पता न चल सके. होंडा ब्रियो कार में सवार हो कर सोनम और नीरज शिकार को तलाशते, इन्हें कोई अकेली युवती सड़क पर चलती मिल जाती तो सोनम फर्राटेदार अंगरेजी बोल कर उस से यह कह कर उस का फोन मांग लेती कि उस के फोन की बैटरी डाउन हो चुकी है और उसे किसी से जरूरी बात करनी है. उस का फोन ले कर बात करतेकरते वह कार में बैठ कर प्रेमी नीरज के साथ फरार हो जाती. अक्तूबर, 2016 से उन्होंने वारदातों को अंजाम देना शुरू कर दिया था.

अब तक की तहकीकात के बाद एसआई देवेंद्र कुमार को सोनम और नीरज के खिलाफ दिल्ली में दर्ज 13 मुकदमों की जानकारी मिली है. यह मामले यहां के माडलटाउन, मुखर्जीनगर, मौरिसनगर और रूपनगर थानों में दर्ज हैं.  दोनों से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने 23 अक्तूबर को रोहिणी कोर्ट के ड्यूटी मजिस्ट्रैट के सामने पेश किया. जहां से दोनों को एक दिन के पुलिस रिमांड पर लिया गया. देवेंद्र कुमार ने 24 अक्तूबर को दोनों को फिर से मेट्रोपौलिटन मजिस्ट्रैट सुनील कुमार की अदालत में पेश कर 2 दिनों के पुलिस रिमांड पर लिया.

रिमांड अवधि में पुलिस ने उन से 6 आईफोन तथा एक एचटीसी का फोन बरामद किया. 26 अक्तूबर को दोनों को कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. नीरजा परिवर्तित नाम है.

रिश्तों की कब्र खोदने वाला क्रूर हत्यारा

30 जनवरी, 2017 को पश्चिम बंगाल के बांकुरा जिले से क्राइम ब्रांच की एक टीम भोपाल आई. 5 सदस्यीय इस टीम का नेतृत्व बांकुरा क्राइम ब्रांच के टीआई अमिताभ कुमार कर रहे थे. उन के साथ सबइंसपेक्टर कौशिक हजरत और संदीप बनर्जी के अलावा एएसआई चंद्रबाला भी थीं. इस टीम के साथ एक स्मार्ट और खूबसूरत युवक आयुष सत्यम भी था, जो काफी परेशान लग रहा था. भोपाल स्टेशन पर उतर कर यह टीम सीधे गोविंदपुरा इलाके के सीएसपी वीरेंद्र कुमार मिश्रा के पास पहुंची और उन्हें सिलसिलेवार सारी बात बता कर अपने आने का कारण स्पष्ट किया. अमिताभ ने वीरेंद्र मिश्रा को बताया कि एक युवती आकांक्षा शर्मा जोकि उन के साथ आए आयुष सत्यम की बड़ी बहन है, रहस्यमय तरीके से गायब है. उस के घर वालों ने 5 जनवरी को उस की गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखाई है. उन लोगों ने उदयन दास नाम के एक युवक पर संदेह व्यक्त किया है. पश्चिम बंगाल की पुलिस टीम ने यह भी बताया कि आकांक्षा का मोबाइल चालू है और उस की लोकेशन भोपाल के साकेतनगर की आ रही है.

अमिताभ कुमार ने यह भी बताया कि 28 वर्षीय आकांक्षा ने जयपुर के नजदीक स्थित वनस्थली से एमएससी इलैक्ट्रौनिक्स से डिग्री ली थी. उस के पिता शिवेंद्र शर्मा यूनाइटेड बैंक औफ इंडिया में चीफ मैनेजर हैं. जून 2016 में आकांक्षा ने घर वालों को बताया था कि अमेरिका में उस की जौब लग गई है और वह अमेरिका जा रही है. पासपोर्ट बनवाने की बात कह कर वह दिल्ली चली गई थी. इस के पहले कुछ दिनों तक वह दिल्ली की एक कंपनी में नौकरी भी कर चुकी थी.

आजकल के युवाओं के लिए विदेश में नौकरी करना अब कोई बहुत बड़ी बात नहीं रह गई है. ज्यादातर अभिभावकों की तरफ से उन्हें कैरियर चुनने के मामले में छूट मिली होती है. 24 जून, 2016 को आकांक्षा नौकरी के लिए कथित रूप से न्यूयार्क चली गई थी. जुलाई तक तो वह फोन पर घर वालों से बातें करती रही, लेकिन फिर व्यस्तता का बहाना बना कर उन्हें टालने लगी थी. मोबाइल फोन पर घर वालों से उस की आखिरी बार बात 20 जुलाई को हुई थी.

इस के बाद आकांक्षा ने वायस काल करना बंद कर दिया और मैसेज के जरिए चैट करने लगी थी. इस से शिवेंद्र शर्मा को तसल्ली तो थी लेकिन पूरी तरह नहीं. उन्हें बेटी को ले कर कुछकुछ आशंकाएं भी होने लगी थीं. उन की परेशानी तब बढ़ी जब मैसेज के जरिए भी बात होना बंद हो गया. इस पर उन्होंने 5 जनवरी, 2016 को बांकुरा थाने में आकांक्षा की गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखवा दी.

दरअसल, बात उतनी मामूली भी नहीं थी, जितनी दिख रही थी. शिवेंद्र और उन का बेटा अपने स्तर पर आकांक्षा को ढूंढ रहे थे. जब कहीं से कोई सुराग नहीं मिला तो पुलिस ने अपनी साइबर सेल के जरिए आकांक्षा के मोबाइल फोन की लोकेशन ट्रेस की. पता चला उस के फोन की लोकेशन भोपाल की आ रही है.

इस के कुछ दिन पहले शिवेंद्र शर्मा एक उम्मीद ले कर भोपाल आए थे. मोबाइल फोन पर हुई बात के आधार पर वह उदयन के घर एमआईजी 62, सेक्टर-3ए, साकेतनगर, भोपाल पहुंचे और उस से आकांक्षा के बारे में पूछताछ की. उदयन को वह पहले से जानते थे क्योंकि वह आकांक्षा का खास दोस्त था.

उदयन ने यह तो नहीं कहा कि वह आकांक्षा को नहीं जानता, लेकिन गोलमोल बातें बना कर वह शिवेंद्र शर्मा को टरकाने में जरूर कामयाब रहा था. शिवेंद्र शर्मा को उदयन की बातों पर पूरी तरह विश्वास नहीं हुआ था, लेकिन वह कर ही क्या सकते थे.

शिवेंद्र शर्मा को मायूस लौटाने के बाद उदयन का माथा ठनकने लगा था. कुछ दिन बाद वह सीधे कोलकाता स्थित शिवेंद्र के घर जा पहुंचा और 2 दिन तक वहीं रुका. आकांक्षा के बारे में शिवेंद्र और उन की पत्नी शशिकला की चिंता का भागीदार बन कर उस ने उन्हें भरोसा दिलाया कि आकांक्षा चूंकि उस की अच्छी फ्रैंड है, इसलिए वह उसे ढूंढने में उन की हरसंभव मदद करेगा.

उसी दौरान शिवेंद्र ने यह महसूस किया कि उदयन असामान्य व्यवहार कर रहा है और उन के घर आने के बाद ठीक से सोया भी नहीं है. इस से उन का शक यकीन में बदल गया कि जरूर कोई गड़बड़ है. यह उन के लिए एक और संदिग्ध बात थी कि उदयन बेवजह शशिकला से जिद करता रहा था कि किचन में जा कर वह खुद चाय बनाएगा. जाहिर है सहज होने की कोशिश में उदयन कुछ ज्यादा ही असहज हो गया था. यह बात शर्मा दंपति से छिपी नहीं रह सकी थी.

खूबसूरत, बिंदास और महत्त्वाकांक्षी आकांक्षा और उदयन के इस कनेक्शन को ले कर बांकुरा और भोपाल पुलिस के बीच लंबी मंत्रणा हुई, जिस का निष्कर्ष यह निकला कि कहीं कुछ गड़बड़ जरूर है. इस गड़बड़ का पता लगाने के लिए पुलिस टीम ने जो योजना तैयार की, उस का पहला चरण उदयन के बारे में खुफिया तरीके से जानकारियां इकट्ठा करने के साथसाथ उस की निगरानी करना भी था.

31 जनवरी और 1 फरवरी को पुलिस टीम ने उदयन की रैकी की. इस कवायद में पुलिस को जो जानकारियां मिलीं, वे चौंका देने वाली थीं. उदयन अड़ोसपड़ोस में किसी से भी मिलताजुलता नहीं था. अलबत्ता वह बेहद विलासी जिंदगी जी रहा था. उस के पास महंगी कारें औडी और मर्सिडीज थीं. पुलिस वालों को उस की जिंदगी और हरकतें हद से ज्यादा रहस्यमय लगीं. साकेतनगर वाला मकान, जिस में वह रहता था, उस का नीचे का हिस्सा उस ने ब्रह्मकुमारी आश्रम को किराए पर दे रखा था.

इन 2 दिनों में वह अपनी एक गर्लफ्रैंड पूजा अटवानी के साथ ‘काबिल’ और ‘रईस’ फिल्में देखने सिनेमा हौल गया था. पुलिस वालों ने दोनों फिल्में उस के पीछे वाली सीट पर बैठ कर देखी थीं, जिस की उसे भनक तक नहीं लगी थी.

2 फरवरी को पुलिस वाले जब उस के घर पहुंचे तो ताला बाहर से बंद था, लेकिन उदयन अंदर मौजूद था. ताला बंद होने के बावजूद पुलिस वालों ने दरवाजा खटखटाया तो अंदर किसी के होने की आहट मिली.

किसी अनहोनी से बचने के लिए बांकुरा पुलिस टीम ने गोविंदपुरा थाने से भी पुलिस बुला ली. उदयन अंदर है, पुलिस यह जान चुकी थी. उसे पकड़ने के लिए गोविंदपुरा थाने के एएसआई सत्येंद्र सिंह कुशवाहा छत के रास्ते से हो कर नीचे गए और उदयन का हाथ पकड़ कर उस से मुख्य दरवाजा खुलवाया.

पुलिस टीम जब अंदर दाखिल हुई तो वहां का नजारा देख चौंकी. कमरों का इंटीरियर बहुत अच्छा था, हर कमरे में एलसीडी लगे थे पर पूरा घर अस्तव्यस्त पड़ा था. ऐसा लग रहा था जैसे वहां मुद्दत से साफसफाई नहीं की गई है. पुलिस ने उदयन से आकांक्षा के बारे में पूछा तो वह खामोश रहा.

पहली मंजिल पर चबूतरा बना देख पुलिस वालों का चौंकना स्वाभाविक था. कमरों में सिगरेट के टोंटे पड़े थे. साथ ही शराब की खाली बोतलें भी लुढ़की पड़ी थीं. सिगरेट के टोंटों की तादाद हजारों में थी. कुछ प्लेटों में बासी सब्जी व दाल पड़ी थी, जिन से बदबू आ रही थी.

जैसेजैसे पुलिस टीम घर को देख रही थी, वैसेवैसे रोमांच और उत्तेजना दोनों ही बढ़ती जा रही थीं. हर कमरे की दीवार पर लव नोट्स लिखे हुए थे, जिन में आकांक्षा के साथ बिताए लम्हों का जिक्र साफ दिखाई दे रहा था.

कुछ देर घर में घूमने के बाद पुलिस ने जब उदयन से दोबारा पूछा कि आकांक्षा कहां है तो उस ने बेहद सर्द आवाज में जवाब दिया, ‘‘मैं ने उस का कत्ल कर दिया है और वह इस चबूतरे के नीचे है.’’

मकसद में इतनी जल्दी और आसानी से कामयाबी मिल जाएगी, यह बात पुलिस टीम की उम्मीद से बाहर थी. एक बम सा फोड़ कर उदयन खामोश हो गया. उस के चेहरे पर कोई शिकन या घबराहट नहीं थी. आकांक्षा की हत्या कर के उदयन ने उस की लाश दफना दी थी, यह जान कर पुलिस वालों ने उस पर सवालों की झड़ी लगा दी. इस के बदले उदयन ने जो जवाब दिए, उन से सिलसिलेवार यह कहानी सामने आई.

दरअसल, आकांक्षा घर वालों से झूठ बोल कर उदयन के पास भोपाल आ गई थी. उदयन से उस की जानपहचान फेसबुक के जरिए 2007-08 में हुई थी. फेसबुक पर उदयन ने आकांक्षा को बताया था कि वह एक आईएफएस अधिकारी है. उस के पिता भेल भोपाल से रिटायर्ड अधिकारी हैं और इन दिनों वह रायपुर में खुद की फैक्ट्री चलाते हैं. मां रिटायर्ड डीएसपी हैं और अमेरिका में रह रही हैं. उदयन की रईसी, पद और पारिवारिक पृष्ठभूमि का आकांक्षा पर वाजिब असर पड़ा और दोनों की दोस्ती गहराने लगी.

इस के बाद दोनों दिल्ली और भोपाल में मिलने लगे. उदयन ने जो झूठ रौब झाड़ने की गरज से आकांक्षा से बोले थे, उन में से एक यह भी था कि वह भी अमेरिका में रहता है. इसलिए जब भी वे मिलते थे तो उदयन यही बताता था कि वह कुछ समय के लिए अमेरिका से आया है.

इश्क में अंधी आकांक्षा उस की हर बात बच्चों की तरह मान जाती थी. इस दरम्यान दोनों के बीच क्या और कैसी बातें हुईं, यह अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं था. अलबत्ता यह जरूर था कि दोनों ही एकदूसरे का पहला प्यार नहीं थे.

बहरहाल, जून में जब आकांक्षा भोपाल आई तो उदयन ने उस से बरखेड़ा स्थित बंगाली समुदाय के मंदिर कालीबाड़ी में शादी कर ली. इस के बाद दोनों पतिपत्नी की तरह साकेतनगर में रहने लगे. आकांक्षा खुश थी, लेकिन उदयन की हिदायत पर अमल करते हुए वह पड़ोसियों से ज्यादा बातचीत नहीं करती थी. अलबत्ता एकदो धार्मिक आयोजनों में वह जरूर शामिल हुई थी.

यह बात गलत नहीं है कि एक झूठ को ढकने के लिए सौ झूठ बोलने पड़ते हैं. उदयन ने तो आकांक्षा से शायद एक भी सच नहीं बोला था. उस ने आकांक्षा को न जाने कौन सी घुट्टी पिलाई थी जो वह चाबी वाले खिलौने की तरह उस पर भरोसा किए जा रही थी. लेकिन कहते हैं कि झूठ के पांव नहीं होते. जल्द ही आकांक्षा के सामने उदयन की असलियत उजागर होने लगी.

आकांक्षा ने कभी भी उदयन को अपने मांबाप से फोन तक पर बात करते नहीं देखा था. जब भी वह उन के बारे में पूछती थी या उदयन की गुजरी जिंदगी को कुरेदती थी तो वह चालाकी से उसे टाल जाता था. लेकिन उसे यह भी समझ में आने लगा था कि यह सब बहुत ज्यादा दिनों तक चलने वाला नहीं है. उस ने आकांक्षा से कहा कि अमेरिका में उस का मन नहीं लगता, इसलिए वह उस के साथ भोपाल में ही घर बसाना चाहता है. आकांक्षा इस के लिए भी तैयार हो गई.

दोनों का अफेयर 8 साल पुराना था लेकिन शादी और गृहस्थी की मियाद महीने भर ही रही. तब तक उदयन के काफी झूठ फरेब उजागर हो चुके थे. फिर भी आकांक्षा ने समझदारी दिखाते हुए उन से समझौता कर लिया था. वह एक भावुक स्वभाव वाली युवती थी, जो अपने प्रेमी की खातिर मांबाप से झूठ बोल कर आई थी.

इसी वजह से वह ज्यादा कलह कर के न तो खुद को जोखिम में डालना चाहती थी और न ही कोई फसाद खड़ा करना चाहती थी. बावजूद इस के दोनों में खटपट तो होने ही लगी थी. लेकिन दोनों ने इस की भनक मोहल्ले वालों को नहीं लगने दी थी.

थाने ला कर पुलिस ने जब उदयन से पूछताछ की तो उस ने जो बताया, वह रोंगटे खड़े कर देने वाला था. उदयन और आकांक्षा के बीच 14 जुलाई, 2016 को जम कर कलह हुई थी, जिस की वजह थी उदयन के कई लड़कियों से जायजनाजायज संबंध.

यहां स्पष्ट कर दें कि दूध की धुली आकांक्षा भी नहीं थी. इस घटना के चंद दिन पहले आकांक्षा के एक पूर्व बौयफ्रैंड, जिस से वह अकसर फोन पर बात किया करती थी, ने उस के कुछ अश्लील फोटो सोशल मीडिया पर पोस्ट कर दिए थे. इसे ले कर उदयन के तनबदन में आग लग गई थी. उसे रहरह कर लग रहा था कि आकांक्षा के अपने एक्सबौयफ्रैंड से नाजायज संबंध भी थे और वह उस की आर्थिक मदद भी करती थी.

उस रात उदयन सोया नहीं, बल्कि जाग कर आकांक्षा की हत्या की साजिश रचता रहा. जबकि आकांक्षा लड़झगड़ कर सो गई थी. 15 जुलाई की सुबह लगभग 5 बजे एकाएक उदयन के सिर पर एक अजीब सा वहशीपन सवार हो गया. उस ने गहरी नींद में सो रही आकांक्षा का मुंह तकिए से दबा दिया. आकांक्षा कुछ देर छटपटाई और फिर उस का शरीर ढीला पड़ गया. हालांकि उदयन को तसल्ली हो गई थी कि वह मर चुकी है फिर भी उस ने कुछ मिनटों तक उस के चेहरे से तकिया नहीं हटाया.

कुछ देर बाद उदयन ने आकांक्षा के चेहरे से तकिया हटाया और दरिंदों की तरह उस का गला दबाने लगा, जिस से उस के गले की हड्डी टूट गई. आकांक्षा के मरने की पूरी तरह तसल्ली करने के बाद उदयन के सामने समस्या उस की लाश को ठिकाने लगाने की थी. लाश का चेहरा उस ने एक पौलीथिन से ढंक दिया था.

आकांक्षा की लाश को वह दूसरे कमरे में ले गया और उसे एक पुराने बक्से में डाल दिया. एक घंटे सुस्ताने और कुछ सोचने के बाद उदयन बाहर निकला और साकेतनगर की ही एक दुकान से शैलेष नाम के सीमेंट विक्रेता से 14 बोरी सीमेंट खरीद लाया. शैलेष ज्यादा सवाल या शक न करे, इसलिए उस ने उसे बताया था कि नईनई शादी हुई है, पत्नी के लिए बाथटब बनवाना है.

इस के बाद उदयन ने रवि नाम के मिस्त्री को बुलाया, जिस से उस की पुरानी पहचान थी. रवि को उस ने यह कह कर कमरे में चबूतरा बनाने को कहा कि वह उस के ऊपर मंदिर बनवाएगा. चबूतरा बनते समय उदयन ने आधा काम खुद किया. थोड़ी देर के लिए रवि को इधरउधर कर के उस ने लाश वाला बक्सा चबूतरे के नीचे बने गड्ढे में डाला और ऊपर से खुद चिनाई कर दी रवि को इस की भनक भी नहीं लगी. वैसे भी एक मामूली काम के एवज में उसे खासी मजदूरी मिल रही थी, इसलिए उस ने उदयन के इस विचित्र व्यवहार पर गौर नहीं किया.

चबूतरा बना कर उदयन ने उस पर पलस्तर कर दिया और खूबसूरती बढ़ाने के लिए उस पर मार्बल भी लगवा दिया. यह उस के अंदर की ग्लानि थी, डर था या आकांक्षा के प्रति नफरत कि वह अकसर इस चबूतरे पर बैठ कर सुबहसुबह ध्यान लगाता था.

आकांक्षा की लाश निकालने वाली पुलिस टीम ने चबूतरा खोदना शुरू किया तो 7 महीने पुरानी लाश को बाहर निकालने में उसे 7 घंटे पसीना बहाना पड़ा. खुदाई के लिए बाहर से मजदूर बुलाए गए, जिन्होंने सब से पहले मार्बल तोड़ा लेकिन उन के गैंती, फावड़े जैसे मामूली औजार इस चबूतरे को नहीं खोद  पाए तो ड्रिल मशीन मंगानी पड़ी. चबूतरा इतना मजबूत था कि खुदाई करने के दौरान एक ड्रिल मशीन भी टूट गई. उस की जगह दूसरी ड्रिल मशीन मंगानी पड़ी.

जैसेतैसे आकांक्षा की लाश वाला बक्सा बाहर निकाला गया. जब लाश बाहर निकली तो वहां मौजूद पुलिस वाले फिर सकते में आ गए. संदूक में लाश का अस्थिपंजर मिला, जिन्हें पोस्टमार्टम और फिर डीएनए जांच के लिए भेज दिया गया. प्रतीकात्मक तौर पर आकांक्षा का अंतिम संस्कार आयुष और उस के परिजनों ने भोपाल में ही कर दिया, जिस में शामिल होने के लिए उस के मातापिता नहीं आए.

इस जघन्य हत्याकांड की खबर देश भर में फैल गई. जिस ने भी सुना, उस ने उदयन को साइको कहा. पर उस के चेहरे पर पसरी बेफिक्री और बेशरमी वे पुलिस वाले ही देख पाए जो उसे ट्रांजिट रिमांड के लिए अदालत ले गए थे. इस के बाद रिमांड अवधि में शुरू हुई 32 वर्षीय उदयन दास और उस से जुड़ी दूसरी जानकारियां जुटाने की कवायद, जिन्होंने यह साबित कर दिया कि उसे साइको किलर बेवजह नहीं कहा जा रहा.

उदयन के पड़ोसियों की नजर में वह अजीबोगरीब यानी असामान्य व्यक्ति था, जो खुद को दुनिया से छिपा कर रखना चाहता था. दरअसल, वह अपनी बुनी एक काल्पनिक दुनिया में रहता था और उसे ही सच मान बैठा था. यानी व्यवहारिकता से उस का कोई सरोकार नहीं रह गया था. सुबहसुबह जब साकेतनगर में रहने वाले संभ्रांत और धनाढ्य लोगों के घरों से नाश्ता बनने की खुशबू आती थी, तब उदयन के घर से गांजे की गंध आ रही होती थी.

उदयन की कोई नियमित या तयशुदा दिनचर्या नहीं थी. वह अकसर शराब के नशे में धुत रहता था. पड़ोसियों के लिए वह एक रहस्य था. कभीकभार बात भी करता था तो खुद को इंटेलीजेंस ब्यूरो का अफसर बताता था. साथ ही जल्द ही अमेरिका शिफ्ट होने की बात भी करता था.

वह ऐसा शायद इसलिए करता था कि लोग उस की शाही जिंदगी के बारे में ज्यादा सिर न खपाएं. महंगी कारों का मालिक उदयन कभीकभार आटोरिक्शा में भी आताजाता दिखता था और रिक्शाचालक को 25-30 रुपए की जगह 500 रुपए थमा दिया करता था. नजदीक की दुकान से वह मैगी दूध बिस्किट जैसे आइटम लाता रहता था और दुकानदार को एकमुश्त भुगतान करता था.

पुलिस वालों ने जब उस के मांबाप के बारे में पूछा तो वह खामोश रहा. इस खामोशी में एक और तूफान छिपा हुआ था. आकांक्षा के कत्ल और लाश बरामदगी में उलझी पुलिस को इतना ही पता चला था कि उदयन के पिता का नाम बी.के. दास है और वे भोपाल के भेल के रिटायर्ड अफसर हैं और मां इंद्राणी भी सरकारी कर्मचारी रह चुकी हैं.

जब आकांक्षा की लाश बरामद हो गई और उदयन ने जुर्म कबूल लिया तो पुलिस का ध्यान उदयन से जुड़ी दूसरी बातों पर गया. काफी बवंडर मच जाने के बाद भी उस का कोई हमदर्द या दोस्त तो क्या कोई सगासंबंधी भी सामने नहीं आया, यह एक हैरानी की बात थी.

रिमांड पर लेने के बाद पुलिस ने जब सख्ती बरती तो उदयन बारबार बयान बदलता रहा. जब उस के दिल्ली आईआईटी से पढ़ने की बात भी झूठी निकली तो पुलिस वालों का माथा ठनका कि यह हत्यारा पागल ही नहीं बल्कि शातिर भी है. जब उस के मांबाप के फोन नंबर मांगे गए तो पहले तो वह मुकर गया कि उन के नंबर उस के पास नहीं हैं. लेकिन फिर दबाव पड़ने पर उस ने मां इंद्राणी का एक नंबर दिया जो बंद जा रहा था.

2 मकानों के किराए और मां की पेंशन से रईसी से जिंदगी गुजारने वाला उदयन कह रहा था कि उस की मां अमेरिका में है. लेकिन अब उस की बातें बयान और चेहरा साफसाफ चुगली कर रहे थे कि वह झूठ बोल रहा है. लिहाजा पुलिस ने उस के साथ सख्ती की, जो कामयाब रही.

उस की मां इंद्राणी दास डीएसपी नहीं थी, जैसा कि उस ने आकांक्षा और पड़ोसियों को बताया था. उस की मां भोपाल में सांख्यिकी विभाग में अधिकारी थीं और शिवाजीनगर के जी टाइप सरकारी क्वार्टर 122/43 में रहती थीं. पति के रायपुर शिफ्ट होने के बाद वह भी उन के साथ रायपुर चली गई थीं.

दरअसल, उदयन की कोशिश यह थी कि पुलिस वालों का ध्यान और काररवाई आकांक्षा के कत्ल में ही उलझ कर रह जाए. कह सकते हैं कि यह अहसास या उम्मीद इस चालाक कातिल को थी कि उसे आकांक्षा का हत्यारा साबित करना कानूनन उतना आसान काम नहीं है, जितना कि दिख रहा है.

गलत नहीं कहा जाता कि पुलिस की मार पत्थरों से भी मुंह खुलवा देती है, फिर उदयन साइको या शातिर ही सही था तो हाड़मांस का पुतला ही, जो 48 घंटे में ही टूट गया. इस के बाद सामने आई एक और कहानी, जिसे सुन कर पुलिस वालों के भी तिरपन कांप उठे. अब तक देश भर की दिलचस्पी इस साइको किलर में और बढ़ गई थी, जिस के कारनामों से अखबार भरे पड़े थे. जबकि न्यूज चैनल्स का तो वह हीरो बन गया था. 8 नवंबर को नोटबंदी के बाद यह दूसरी घटना थी, जिस पर आम लोग तरहतरह से अपनी प्रतिक्रियाएं दे रहे थे.

4 फरवरी को उदयन ने न केवल मान लिया बल्कि बता भी दिया कि उस ने अपने मांबाप की भी हत्या की थी और उन्हें रायपुर वाले घर के लौन में दफना दिया था. यानी रिश्तों की कब्र खोदने की उस की सनक या बीमारी काफी पुरानी थी. बहरहाल, फिर से एक नई कहानी इस तरह उभर कर सामने आई.

उदयन अपने मांबाप का एकलौता बेटा था. चूंकि मांबाप दोनों कामकाजी थे, इसलिए उसे कम ही वक्त दे पाते थे. बचपन से ही वह उद्दंड प्रवृत्ति का था. शुरुआती पढ़ाई के लिए उसे भोपाल के नामी सेंट जोसेफ को-एड स्कूल में दाखिला दिलाया गया था.

पढ़ाईलिखाई में उस का मन नहीं लगता था और वह अकसर अकेले रहना पसंद करता था. ये वे समस्याएं थीं जो आमतौर पर उन कामकाजी अभिभावकों के बच्चों के सामने पेश आती हैं, जिन्हें पैसों की कोई कमी नहीं होती. उदयन जब सातवीं कक्षा में था तब उस ने स्कूल में दीवार पर मारमार कर एक सहपाठी का सिर फोड़ दिया था, जिस की वजह से उसे स्कूल से निकाल दिया गया था.

संभ्रांत बंगाली दास परिवार जहांजहां भी रहा, लोगों से कटा ही रहा. इधर उदयन की शैतानियां इतनी बढ़ गई थीं कि मांबाप उसे पारिवारिक समारोहों में भी नहीं ले जाते थे. वे लोग उसे काबू में रखने के लिए बातबात पर डांटतेडपटते रहते थे.

मेरे मांबाप हिटलर सरीखे थे, अपनी कहानी सुनाते हुए उस ने यह बात जोर दे कर पुलिस को बताई. उदयन के हिंसक और असामान्य व्यवहार के बावजूद उस के पिता बी.के. दास की इच्छा थी कि बेटा गणित पढ़े और इंजीनियर बने. लेकिन बेटे की इस मनोदशा को वे नहीं समझ पाए थे कि वह उन से मरनेमारने की हद तक नफरत करने लगा है.

भोपाल से रिटायर होने के बाद बी.के. दास ने रायपुर में अपनी खुद की फैक्ट्री खोल ली थी. अपने सेवाकाल के दौरान दोहरी कमाई के चलते वे खासी जायदाद बना चुके थे. यानी वे एक अच्छे निवेशक जरूर थे पर अच्छे पिता नहीं बन पाए थे. रायपुर के पौश इलाके सुंदरनगर में एनसीसी औफिस के पास भी उन्होंने पत्नी के नाम से एक शानदार मकान बनवाया था और वहीं रहने लगे थे. उदयन का दाखिला भी उन्होंने वहीं के एक स्कूल में करा दिया था. जैसेतैसे 12वीं पास करने के बाद उदयन का दाखिला एक प्राइवेट कालेज में करा दिया गया.

उदयन ने कभी अपने कैरियर और जिंदगी के बारे में नहीं सोचा. उलटे कालेज में आ कर वह नशे का भी आदी हो गया था. यहां भी उस का कोई दोस्त नहीं था और मातापिता भी किसी से संपर्क नहीं रखते थे. यानी पूरा परिवार एकाकी जीवन जीने का आदी हो चला था.

पढ़ाई के बारे में पूछने पर वह मातापिता से साफ झूठ बोल जाता था. जब पढ़ाई खत्म होने का वक्त आया तो उस ने घर में झूठ बोल दिया कि उसे डिग्री मिल गई है. डिग्री मिल गई तो कहीं नौकरी करो, पिता के यह कहने पर उदयन को लगने लगा कि पढ़ाई का झूठ अब छिपने वाला नहीं है. मांबाप नहीं मानेंगे, यह सोच कर उदयन ने एक खतरनाक फैसला ले लिया. उस ने सोच लिया कि क्यों न मांबाप दोनों को ठिकाने लगा दिया जाए, फिर कोई रोकनेटोकने नहीं वाला होगा. करोड़ों की जायदाद व दौलत भी उस की हो जाएगी. उस ने ऐसा ही किया भी.

मांबाप के कत्ल की ठीक तारीख तो उदयन नहीं बता पाया, पर उस ने बताया कि यह कोई 5-6 साल पहले की बात है. उस दिन बारिश हो रही थी. पापा चिकन लेने बाजार गए थे और मम्मी कमरे में अलमारी में कपड़े रख रही थीं. हत्या के 2 हफ्ते पहले उस ने एक इंगलिश चैनल पर ‘वाकिंग डैथ’ नामक सीरियल देख कर मातापिता की हत्या की योजना बनाई थी. हत्या के दिन उदयन ने सुंदरनगर के ही गायत्री मैडिकल स्टोर्स से नींद की गोलियां खरीद ली थीं.

अलमारी में कपड़े सहेज कर रखती इंद्राणी को उदयन ने धक्का दे कर पलंग पर ढकेल दिया. इंद्राणी की बूढ़ी हड्डियों में दम नहीं था, वह अपने हट्टेकट्टे बेटे का ज्यादा विरोध नहीं कर पाईं. कुछ ही देर में उदयन ने उन का गला घोंट दिया.

लगभग आधे घंटे बाद बी.के. दास चिकन ले कर घर आए और इंद्राणी के बारे में पूछा तो उदयन ने सहज भाव से उन्हें बताया कि मां ऊपर कपड़े रख रही हैं. इस बात से संतुष्ट हो कर उन्होंने उदयन से चाय बनाने को कहा तो वह चाय बना लाया और उन के कप में नींद की 5 गोलियां मिला दीं.

चाय पीने के बाद बी.के. दास नींद की आगोश में चले गए तो उदयन ने उन की गला घोंट कर हत्या कर दी. अब समस्या लाशों को ठिकाने लगाने की थी. उन दिनों सुंदरनगर इलाके में कंस्ट्रक्शन का काम जोरों पर चल रहा था. उदयन ने बगल में काम करने वाले एक मजदूर को बुलाया और लौन के दोनों कोनों में गड्ढे खुदवा लिए. देर रात उस ने अपने जन्मदाताओं की लाशें घसीट कर गड्डों में डालीं और उन्हें हमेशा के लिए दफना दिया.

इस के बाद किसी ने बी.के. दास और उन की पत्नी इंद्राणी दास को नहीं देखा और न ही उन के बारे में कोई पूछने वाला था. उदयन की मौसी प्रिया चटर्जी ने जरूर एकाध बार उस के घर आ कर पूछा तो उदयन ने उन्हें टरकाऊ जवाब दे दिया.

भोपाल पुलिस उदयन को ले कर राजधानी एक्सप्रैस से 6 फरवरी को करीब 11 बजे रायपुर पहुंची और सुंदरनगर जा कर उस लौन की खुदाई शुरू करवा दी, जहां उदयन ने अपने मांबाप की कब्र बनाई थी. 3 घंटे की खुदाई के बाद लगभग 6 फुट नीचे से दोनों की खोपडि़यां निकलीं. साथ ही इंद्राणी के कपड़े, सोने की 4 चूडि़यां, चेन, एक ताबीज और बी.के. दास की पैंटशर्ट, बेल्ट और ताबीज भी कब्रों से मिले.

इस बंगले के मौजूदा मालिक हरीश पांडेय हैं, जो खुदाई होते वक्त वहां मौजूद थे. उन्होंने यह मकान उदयन से सुरेंद्र दुआ नाम के ब्रोकर के जरिए खरीदा था. 1800 वर्गफीट पर बने इस मकान का सौदा 30 लाख रुपए में हुआ था जोकि उन्हें सस्ता लगा था. हरीश ने जब यह मकान खरीदा था तब यहां बगीचा नहीं था, बल्कि खाली जमीन थी, जिस पर उन्होंने काली मिट्टी डाल कर गार्डन बनवा लिया था. उस वक्त उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि उदयन के मांबाप की कब्रें यहां बनी हुई हैं.

दोपहर ढाई बजे तक खुदाई का काम पूरा हो गया और सारे सबूत मिल गए. रायपुर पुलिस ने उदयन के खिलाफ मांबाप की हत्या का मामला दर्ज कर लिया. उदयन अब चर्चा के साथसाथ शोध का भी विषय बन गया था. 3 राज्यों मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल की पुलिस ने उस के खिलाफ हत्या, अपहरण व धोखाधड़ी जैसे दरजन भर मामले दर्ज किए हैं. रायपुर से उसे बांकुरा पुलिस बंगाल ले गई, फिर उसे वापस रायपुर लाया गया. जाहिर है, सब कुछ साफ होने तक उदयन रिमांड पर भोपाल, रायपुर और कोलकाता के बीच झूलता रहेगा.

7 फरवरी को जब उसे बांकुरा पुलिस ने सीजेएम अरुण कुमार नंदी की अदालत में पेश किया गया तो वहां गणतंत्र समनाधिकार नारी मुक्ति ने विरोध प्रदर्शन करते हुए उस पर पत्थर बरसाए. उदयन की कहानी खत्म सी हो गई है, पर जिज्ञासाएं और सवाल अभी भी बाकी हैं, जिन में से कुछ के जवाब मिल गए हैं और कुछ के मिलना शेष हैं.

अपनी मां इंद्राणी का मृत्यु प्रमाणपत्र बनवाने के लिए उस ने 8 फरवरी, 2013 को इटारसी नगर पालिका में रजिस्ट्रेशन फार्म भरा था. इस में उस ने मां की मौत 3 फरवरी, 2013 को 66 वर्ष की उम्र में होना लिखा था. इंद्राणी का स्थाई पता उस ने रायपुर का ही लिखाया था और अस्थाई पता द्वारा हेलिना दास, गांधीनगर, इटारसी लिखवाया था. इस आधार पर उसे इंद्राणी का डेथ सर्टिफिकेट मिल गया था जबकि पिता बी.के. दास का मृत्यु प्रमाणपत्र उस ने इंदौर जा कर बनवाया था.

जल्द ही साबित हो गया कि उदयन अव्वल दरजे का खुराफाती और चालाक शख्स भी था जो संयुक्त खाते से अपनी मां की पेंशन निकाल रहा था. इस बारे में फेडरल बैंक के कुछ अधिकारी शक के दायरे में हैं. इंद्राणी पेंशनभोगी कर्मचारी थीं. हर पेंशनभोगी को साल में एक बार अपने जीवित होने का प्रमाणपत्र बैंक को देना होता है. आमतौर पर पेंशनधारी खुद बैंक जा कर अपने जीवित होने का प्रमाण दे कर आते हैं.

अस्वस्थता, नि:शक्तता या किसी दूसरी वजह से बैंक जाने में असमर्थ पेंशनर्स को डाक्टरी हेल्थ सर्टिफिकेट देना पड़ता है. कैसे हर साल उदयन अपनी मां के जीवित होने का प्रमाणपत्र बैंक को दे रहा था, यह गुत्थी अभी पूरी तरह नहीं सुलझी है. लेकिन साफ दिख रहा है कि उदयन से किसी बैंक कर्मचारी की मिलीभगत थी.

हालांकि जनवरी 2012 में उस ने मां के जीवित होने का प्रमाण पत्र डिफेंस कालोनी, दिल्ली के डाक्टर एस.के. सूरी से लिया था, जिस की जांच ये पंक्तियां लिखे जाने तक चल रही थीं. अगर शुरू में ही फेडरल बैंक कर्मचारियों ने सख्ती बरती होती तो इंद्राणी की मौत का राज वक्त रहते खुल जाता.

सब कुछ साफ होने के बाद यह भी उजागर हुआ कि उदयन मांबाप की हत्या के बाद अय्याश हो गया था. नशे के साथसाथ उसे अलगअलग लड़कियों से सैक्स करने की लत भी लग गई थी. अपनी हवस बुझाने के लिए वह कालगर्ल्स के पास भी जाता था या फिर उन्हें होटलों में बुला कर ऐश करता था. फेसबुक पर उस के सौ से भी ज्यादा एकाउंट थे, जिन की प्रोफाइल में खुद को वह बड़ा कारोबारी बता कर लड़कियों को फांसता था.

उदयन की एकदो नहीं, बल्कि 40 गर्लफ्रैंड थीं जो उस की हवस पूरी करने के काम आती थीं. इन में कई अच्छे घरों की लड़कियां भी शामिल थीं.

उदयन का प्यार दिखावा भर होता था. साल छह महीने में ही एक लड़की से उस का जी भर जाता था और उसे वह बासी लगने लगती थी. फिर किसी न किसी बहाने वह उसे छोड़ देता था. अभी तक 14 ऐसी लड़कियों की पहचान हो चुकी है, जिन के उदयन के साथ अंतरंग संबंध थे. 2 गायब युवतियों को पुलिस ढूंढ रही है, शक यह है कि कहीं उदयन ने इसी तर्ज पर और भी कत्ल तो नहीं किए.

शराब और ड्रग्स के आदी उदयन ने मांबाप का पैसा जम कर अय्याशियों में उड़ाया. ऐसा मामला पहले न मनोवैज्ञानिकों ने देखा है, न ही वकीलों ने और न ही उन पुलिस वालों ने जिन का वास्ता कई अनूठे अपराधियों से पड़ता है. सब के सब उदयन दास की हकीकत जान कर हैरान हैं.

दास दंपति ने हाड़तोड़ मेहनत कर के जो पैसा कमाया था. शायद यह सोच कर कि बुढ़ापा आराम से बेटेबहू और पोते के साथ गुजरेगा. लेकिन उसी बेटे ने उन का बेरहमी से अर्पणतर्पण कर डाला और उन की अस्थियां तक लेने से मना कर दिया.

उदयन की परवरिश का मामला एक गंभीर विषय है जिस पर काफी सोचसमझ कर बोलने और सोचने की जरूरत है, क्योंकि हत्या जैसे संगीन जुर्म की वजह बचपन के एकाकीपन, किशोरावस्था की हिंसा और युवावस्था की क्रूरता को नहीं ठहराया जा सकता.

बंदूक के दम पर तेजी से बढ़ते अपराध

उत्तर प्रदेश के आगरा में एक मेला लगा था. मेले में डांस दिखाने वाला आरकेस्ट्रा चल रहा था. मंच पर तमाम डांसर नाच रही थीं. कम कपड़ों में डांस करती डांसर फिल्म ‘बुलेट राजा’ के गाने ‘तमंचे पे डिस्को…’ पर डांस कर रही थीं. इस बीच वहां डांस देख रहा एक बाहुबली मंच पर चढ़ गया. उस ने अपनी जेब से पिस्तौल निकाली और एक डांसर की कमर पर लगा दी. वह बाहुबली अपने दूसरे हाथ में पैसे भी लिए हुए था. डांसर की नजर उस के पैसों पर थी. डांसर पैसे लेने के चक्कर में पिस्तौल पर ठुमके लगा रही थी. पैसे की छीनाझपटी के बीच कब पिस्तौल से गोली चल गई, पता ही नहीं चला. वह गोली डांस देख रहे एक आदमी को लग गई. वह आदमी वहीं मर गया. यह इस तरह की अकेली वारदात नहीं है.

वाराणसी जिले में नौटंकी में एक लड़की ‘नथनिया पर गोली मारे सैयां हमार…’ गाने पर डांस कर रही थी. उस के डांस को देख कर वहां मौजूद एक दारोगा तैश में आ गया. उस ने अपनी जेब से पिस्तौल निकाल ली और डांसर के साथ डांस करना शुरू कर दिया.

नशे में धुत्त उस दारोगा को एहसास ही नहीं था कि उस से क्या गलती होने जा रही है. पिस्तौल से गोली चला कर वह नचनिया पर निशाना लगाने लगा. उस का निशाना चूक गया, जिस से डांसर घायल हो गई. अगर निशाना सही लग जाता, तो वह मर जाती.

लखनऊ शहर में एक कारोबारी परिवार में शादी की पार्टी चल रही थी. जब जयमाल हो गया, तो नातेरिश्तेदारों में से कुछ लोगों ने खुशी में बंदूक से गोली चलानी शुरू कर दी. गलती से एक गोली दूल्हे के भाई को लग गई, जिस से वह शादी के उसी मंडप में मर गया.

खुशी में होने वाली इस तरह की तमाम फायरिंग पीडि़त परिवार पर गम का पहाड़ तोड़ देती है.

शादी के अलावा जन्मदिन, बच्चा होने, मुंडन और दूसरे तमाम संस्कारों पर खुशी में फायरिंग का रिवाज होता है. ऐसे में तमाम घटनाएं घट जाती हैं, जो दुख की वजह बनती हैं.

लाइसैंसी असलहे का एक सच यह भी सामने आता है कि ये अपनी हिफाजत से कहीं ज्यादा खुदकुशी करने में इस्तेमाल होते हैं. पुलिस महकमे के आंकड़े बताते हैं कि बंदूक से होने वाली खुदकुशी में 95 फीसदी वारदातें लाइसैंसी असलहे से ही होती हैं.

लखनऊ में ही एक दारोगा की बेटी ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई में फेल होने के बाद पिता की लाइसैंसी रिवौल्वर से गोली मार कर खुदकुशी कर ली. एक रिटायर अफसर ने तनाव में आने के बाद अपनी लाइसैंसी राइफल से खुद को खत्म कर लिया.

ऐसी तमाम वारदातें रोज रोशनी में आती हैं, जहां पर बंदूक संस्कृति अपराध को बढ़ाने का काम करती है. असलहे की यह संस्कृति आम लोगों में दहशत फैलाने का काम भी करती है. बंदूक के बल पर केवल लूट और डकैती ही नहीं, बल्कि बलात्कार जैसे अपराध भी होते हैं.

1. दहशत में शहरी

लखनऊ के विकास नगर महल्ले में माफिया मुन्ना बजरंगी के रिश्तेदार रहते हैं. मुन्ना बजरंगी उत्तर प्रदेश के झांसी जेल में बंद है. जब वह पुलिस की निगरानी में अपने रिश्तेदार से मिलने आया, तो असलहे से लैस उस के समर्थक किसी कमांडो की तरह महल्ले की गलियों में फैल गए. किसी के हाथ में सिंगल बंदूक, तो किसी के हाथ में डबल बैरल रिपीटर बंदूक थी.

ज्यादातर लोगों के पास अंगरेजी राइफल थी. राइफल के साथ ये लोग कारतूस से भरे बैग भी अपने हाथों में लटकाए थे. कई लोगों के पास कमर में लगी पिस्टल भी देखी जा सकती थी.

मुन्ना बजरंगी 3 दिन के पैरोल पर झांसी जेल से बाहर आया था. उस के एक रिश्तेदार की मौत हो गई थी, जिस के परिवार से वह मिलने आया था. मुन्ना बजरंगी को पुलिस एक बुलेटप्रूफ वैन से लाई थी.

लखनऊ के विकास नगर महल्ले में रहने वालों ने पहली बार किसी के साथ बंदूकों का इतना बड़ा जखीरा देखा था. इस के कुछ दिन पहले ही एक और माफिया ब्रजेश सिंह उत्तर प्रदेश विधानपरिषद का चुनाव जीत कर जब शपथ ग्रहण करने लखनऊ विधानसभा पहुंचा था, तो उस के साथ भी बंदूकों का ऐसा ही जलजला देखा गया था.

उत्तर प्रदेश में बाहुबलियों की पसंद रेलवे ठेकेदारी है. आंकडे़ बताते हैं कि साल 1991 से साल 2016 के बीच लखनऊ में रेलवे का ठेका हासिल करने में 12 ठेकेदारों की हत्या हो चुकी है. 1999 के बाद इस में कुछ कमी आई, पर 18 मार्च, 2016 को उत्तर रेलवे में ठेकेदारी विवाद में आशीष पांडेय की हत्या कर दी गई. यह विवाद एक करोड़ रुपए के ठेके को ले कर हुआ था.

लखनऊ के चारबाग रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर 6 पर वाशेबल एप्रैल लगाने का काम होना था. आशीष पांडेय अपने साथियों के साथ यह ठेका हासिल करने आया था. ठेका लेने आए दूसरे गुट के लोगों को जब टैंडर डालने से रोका जाने लगा, तो संघर्ष शुरू हुआ और यह वारदात हो गई.

आशीष पांडेय हरदोई जिले का रहने वाला था. वह एक मामले में पहले भी जेलजा चुका था.

उत्तर प्रदेश सब से ज्यादा बंदूक रखने वाले राज्यों में शामिल है. साल 2012 से साल 2015 के बीच देश में 47 फीसदी बंदूकें जब्त की गईं, जिन की तादाद 16,925 रही. बंदूकों के जब्त होने के मामले में उत्तर प्रदेश सब से आगे है. यहां तकरीबन 7 फीसदी बंदूकें जब्त की गईं. इन की कुल तादाद 2,283 रही.

उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर को भारत की गन कैपिटल कहा जाता है. यहां बंदूक बेचने की सब से ज्यादा दुकानें हैं. उत्तर प्रदेश के बाद बिहार, पश्चिम बंगाल, जम्मूकश्मीर, असम, महाराष्ट्र, मणिपुर, हरियाणा और झारखंड का नंबर आता है. यही वजह है कि इन राज्यों में बंदूक से होने वाले अपराध सब से ज्यादा होते हैं.

इन प्रदेशों में जब लोकल लैवल पर हिंसा होती है, तो वहां पर सब से ज्यादा इस तरह की बंदूकों का इस्तेमाल होता है. चुनावों के समय यहां होने वाली हिंसा में भी गैरलाइसैंसी बंदूकों का इस्तेमाल सब से ज्यादा होता है. केवल दुश्मनी निकालने में ही नहीं, बल्कि खुशी के समय पर भी होने वाली फायरिंग में तमाम बार जान चले जाने की वारदातें होती हैं.

2. अपराध हैं ज्यादा

बंदूक को अपनी हिफाजत के लिए रखा जाता है. असल बात यह है कि बंदूक अपनी हिफाजत से ज्यादा दहशत फैलाने और समाज में अपराध को बढ़ावा देने में काम आती है. बंदूक रखना अपने दबदबे को बनाए रखने का आसान तरीका हो गया है.

भारत में कितनी बंदूकें हैं, इस बात का कोई आधिकारिक आंकड़ा सरकार के पास नहीं है. अपराध के आंकड़ों को देखने से पता चलता है कि देश में लाइसैंसी बंदूकों से ज्यादा गैरलाइसैंसी बंदूकें हैं.

बंदूकों से होने वाली हत्याओं को देखें, तो पता चलता है कि 90 फीसदी हत्याओं में गैरलाइसैंसी बंदूकों का इस्तेमाल होता है. चुनावी हिंसा में सब से ज्यादा बंदूकों का इस्तेमाल होता है.

चुनाव को करीब से देखने वाले कहते हैं कि चुनावों में बूथ कैप्चरिंग और वोट न डालने देने की वारदातों में बंदूकों का जम कर इस्तेमाल होता है. छोटेबडे़ पंचायत चुनावों से ले कर लोकसभा चुनावों तक में बहुत सारे पुलिस इंतजाम के बाद भी बंदूक का जोर देखने को मिलता है.

इन चुनावों में हिंसक वारदातें होती रहती हैं. इन को रोकने के लिए चुनाव आयोग ने चुनावों के समय बंदूकों को जमा कराने की मुश्किल भी शुरू की. लाइसैंसी बंदूकों के जमा होने के बाद भी चुनावी हिंसा की वारदातों से पता चलता है कि देश में लाइसैंसी हथियार से ज्यादा गैरलाइसैंसी हथियार हैं.

देश में फैक्टरी मेड और हैंडमेड हर तरह के असलहे मिलते हैं. इन का इस्तेमाल ऐसे ही अपराधों में किया जाता है. देश में बढ़ती बंदूक संस्कृति ने ही नक्सलवाद और आतंकवाद को बढ़ाने का काम किया है.

3. गैरलाइसैंसी हथियार ज्यादा

देश में लाइसैंसी से ज्यादा गैरलाइसैंसी हथियार जमा हो रहे हैं. लाइसैंसी हथियार लेने के लिए सरकारी सिस्टम से गुजरना पड़ता है. पुलिस से ले कर जिला प्रशासन तक की जांच से गुजरने के बाद बंदूक रखने का लाइसैंस मिलता है.

कई तरह के असलहे रखने के लिए शासन लैवल से मंजूरी लेनी पड़ती है. इस सिस्टम में बहुत सारा पैसा रिश्वत और सिफारिश में खर्च हो जाता है.

हर जिलाधिकारी के पास सैकड़ों की तादाद में लाइसैंस लेने के लिए भेजे गए आवेदन फाइलों में धूल खाते हैं. ऐसे में अपराध करने वाले लोग गैरकानूनी असलहे रखने लगते हैं.

आकंड़ों के मुताबिक, देश में साल 2012 से साल 2015 के बीच 4 सालों में 36 हजार से ज्यादा गैरकानूनी असलहे पकडे़ गए. साल 2009 से ले कर 2013 बीच 15 हजार से ज्यादा मौतें गैरकानूनी असलहों से हुईं. पुलिस महकमे से जुडे़ लोगों का मानना है कि कई ऐसे परिवार हैं, जहां पीढ़ी दर पीढ़ी केवल बंदूक बनाने का ही काम होता है.

उत्तर प्रदेश का पश्चिमी हिस्सा इस तरह की फैक्टरी चलाने वाला सब से बड़ा इलाका है. मध्य उत्तर प्रदेश में हरदोई सब से बड़ा जिला है, जहां हर तरह की ऐसी बंदूकें बनाई जाती हैं, जैसी ओरिजनल बनती हैं. इन को भ्रष्ट पुलिस की मिलीभगत से खरीदाबेचा जाता है.

दरअसल, गैरकानूनी असलहे को खरीदने और बेचने का एक बड़ा कारोबार है. इस के जरीए करोड़ों रुपयों की रकम इधर से उधर होती है. 3 हजार से ले कर 50 हजार रुपए तक के असलहे इन गैरकानूनी फैक्टरियों में बनते और बिकते हैं. उत्तर प्रदेश के पश्चिमी जिलों में जितने हथियार एक जिले में हैं, उतने किसी बाहरी देश में नहीं हैं.

साल 2011 के एक सर्वे में बताया गया कि भारत के 671 जिलों में से केवल 324 जिलों में 4 करोड़ लोगों के पास हथियार पाए गए. इन में से केवल 15 फीसदी लोगों के पास लाइसैंसी हथियार थे. बंदूक से होने वाली मौतों के मामले में 5 शहरों में से 4 शहर मेरठ, इलाहाबाद, वाराणसी और कानपुर उत्तर प्रदेश के हैं.

उत्तर प्रदेश के बाद बिहार सब से ज्यादा असलहे वाला प्रदेश है. गैरकानूनी असलहे का इस्तेमाल सब से ज्यादा बाहुबली और दबंग अपने दबदबे को बढ़ाने के लिए करते हैं. इस से ही वह अपना असर बढ़ाने का काम करते हैं.

समाज में अपराध को रोकने के लिए बंदूक संस्कृति पर रोक लगाने की जरूरत है. यह काम केवल लाइसैंस सिस्टम से काबू में आने वाला नहीं है. ऐसे में जरूरी है कि कुछ नया सिस्टम लागू किया जाए, जिस से समाज में बढ़ती बंदूक संस्कृति को रोका जा सके.

4. ‘बंदूक कल्चर’ पर फिल्मों का असर

आज तमाम फिल्में ऐसी बनती हैं, जिन में बंदूक संस्कृति को ग्लैमर की तरह पेश किया जाता है. बंदूक के बल पर अपराधियों को ऐश करते दिखाया जाता है. इस को देख कर आम जिंदगी में भी लोग बंदूक संस्कृति को बढ़ाने में लग जाते हैं. इस के अलावा आम लोगों में दिखावे की सोच बढ़ रही है, जिस से वे बंदूक खरीदना चाहते हैं.

शहरों से कहीं ज्यादा गांवों में यह चलन बढ़ रहा है. गांवों में जमीन बेच कर बंदूक खरीदने का चलन है. यहां पर लोग अपने दबदबे को बढ़ाने के लिए बंदूक खरीदते हैं. कई लोग तो ऐसे भी हैं, जिन के पास केवल साइकिल है, पर वे लोग भी बंदूक रखते हैं.

बंदूक की आड़ में समाज में गैरकानूनी असलहे बढ़ रहे हैं. सरकार को गैरकानूनी असलहे को जब्त करने के लिए सरकार को योजना बनानी होगी. जब तक यह योजना नहीं बनती, तब तक समाज को अपराध से मुक्त नहीं किया जा सकता. आम जिंदगी ठीक से गुजरे, इस के लिए जरूरी है कि समाज को बंदूक से दूर रखा जाए.

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