Best Hindi Kahani: भटकती जवानी – कविता का अकेलापन

Best Hindi Kahani: कविता को लगा कि जैसे उस के दाएं हाथ पर कुछ रेंगने लगा है. इस के पहले भी उस के बगल में बैठे दर्शक का पैर 2 बार उस के बाएं घुटने से छू गया था. उस समय तो वह इस ओर कोई ध्यान दिए बिना बड़े ध्यान से परदे पर फिल्म देखती रही, लेकिन अब उसे समझाते देर नहीं लगी कि यह बारबार का छू जाना अचानक नहीं है.

सीट पर बैठा दर्शक शायद कविता की शह पाते ही जोश से भर उठा. उस ने अंधेरे में कविता की ओर देखा, फिर उस की ओर झाकते हुए अपना बायां हाथ उठा कर उस के कंधे पर टिका दिया.

कविता एक अजीब सी सिहरन से भर उठी, जैसे उस पर नशा चढ़ने लगा हो.

कविता शादीशुदा थी. अमीर बाप की बेटी होने के बावजूद उस की शादी के पहले की जिंदगी कीचड़ में खिले कमल की तरह साफसुथरी थी. मांबाप, भाईबहन, यहां तक कि उस की भाभियां भी बड़े मौडर्न खयालों की थीं और क्लब वगैरह में जाती थीं, लेकिन कविता को यह सब कभी अच्छा नहीं लगा.

कविता घर से बहुत कम निकलती थी. पढ़ाई में ज्यादा दिलचस्पी होने की वजह से उस का स्कूलकालेज जाना एक मजबूरी थी.

यूनिवर्सिटी का माहौल उसे कभी रास नहीं आया, इसलिए और आगे पढ़ने की इच्छा होते हुए भी उस ने बीए करने के बाद कालेज छोड़ दिया और सारा दिन घर पर ही रहने लगी. कुछ दिन बाद मांबाप ने उस की शादी कर दी थी.

सालभर तक कविता की शादीशुदा जिंदगी बहुत ही अच्छी बीती, लेकिन उस के बाद उस में बदलाव आना शुरू होने लगा.

कविता खुद भी अपने अंदर होने वाले इस बदलाव से परेशान थी. कहां तो वह स्कूलकालेज के दोस्तोंसहेलियों से भी बहुत कम बोलती थी, कहां अब शादी के बाद अचानक उस की कामना इतनी प्रबल हो उठी कि हर समय उस का सारा बदन टीसता रहता था.

कुछ दिन तक तो कविता काफी कोशिशों के बाद अपने पर काबू किए रही, लेकिन आखिरकार वह बेबस हो गई. तब उस ने खुद ही आगे बढ़ कर पड़ोस के एक नौजवान से जानपहचान बढ़ा ली.

कविता ने सोचा था कि उस का पड़ोसी उस की इच्छा समझ जाएगा, लेकिन वह इस मामले में एकदम अनाड़ी था. जब कविता की बरदाश्त के बाहर होने लगा, तो टूट कर उस ने ही एक दिन पति की गैरमौजूदगी में पड़ोसी को घर बुला कर अपनी देह परोस दी.

उस दिन कविता को एक अजीब सा सुख मिला था. इतना सुख, जितना उसे सुहागरात में अपने पति से भी नहीं मिल पाया था.

इस सुख को बारबार भोगने की ललक में कविता अकसर उस नौजवान से मिलने लगी. लेकिन उस के मन की प्यास खत्म होने के बजाय बढ़ती ही जा रही थी. जल्दी ही वह किसी दूसरे मर्द की बांहों में बंधने के लिए बेचैन हो उठी.

इस के बाद तो जैसे यही सिलसिला बन गया. कविता अकसर किसी नौजवान से संबंध बनाती. कुछ दिन उस का संगसाथ उसे बड़ा अच्छा लगता, लेकिन जल्दी ही उकता कर वह कोई नया साथी बनाने के लिए छटपटाने लगती.

एक दिन कविता के पति विवेक को इस सब की जानकारी मिली, तो उसे यकीन ही नहीं हुआ. लेकिन महल्ले के आतेजाते नौजवानों की मजाक भरी नजरें जब बारबार छेदने लगीं, तो उसे बरदाश्त के बाहर हो गया.

एक दिन तिलमिला कर उस ने कविता से इस बारे में पूछा, तो वह रोने लगी. लेकिन उस ने कुछ भी नहीं छिपाया और अपने मन की सारी बात पति को बता दी.

यह सुन कर पति विवेक को गहरा धक्का तो लगा, लेकिन साथ ही उसे यह भी भरोसा था कि कविता धंधे वाली नहीं है.

विवेक ने सब्र से काम लिया. कविता को प्यार से समझबुझ कर वह सही रास्ते पर लाने की कोशिश करने लगा.

कविता ने भी विवेक से वादा किया कि अब वह कभी किसी से नहीं मिलेगी, लेकिन वह तो जैसे आदत से मजबूर थी और अपने तन की भूख मिटाने के लिए वह फिर दूसरे मर्दों की बांहों में खेलने लगती थी.

एक दिन विवेक ने उस से साफसाफ कह दिया, ‘‘अब या तो तुम अपने लफंगे साथियों से संबंध तोड़ लो या मुझे छोड़ दो…’’

कविता को फैसला करने में ज्यादा देर नहीं लगी. उस ने विवेक को ही छोड़ देना बेहतर समझा. वह उसी दिन अपना सामान ले कर उस घर से चली गई और अलग रहने लगी.

कविता ने ढेर सारे दोस्त बना लिए थे. अब जब जिस के साथ मन होता, वह अपनी जिस्मानी प्यास बुझ लेती थी.

उस दिन सिनेमाघर में फिल्म देखते समय बगल वाली सीट पर बैठे दर्शक की हरकतों ने कविता को बुरी तरह से जोश में ला दिया था. आखिरकार उस से रहा नहीं गया, तो वह कसमसाने लगी.

अचानक बिजली चली गई. कविता ने फुसफुसा कर कहा, ‘‘कहीं और चलें क्या?’’

‘‘बताओ कहां चलेंगे?’’ बगल की सीट पर बैठे दर्शक ने घुप अंधेरे का फायदा उठाया और झक कर अचानक कविता के जलते होंठों पर अपने होंठ रख दिए.

कविता के जिस्म पर हाथ फेरते हुए उस दर्शक ने पूछा, ‘‘कहां चलोगी? अपने घर या मेरे?’’

‘‘जहां चाहो?’’ वह फुसफुसाते हुए बोली.

इस बीच दोनों की सांसों की धड़कनें तेज हो गई थीं, इसलिए फिल्म देखना उन्हें गवारा नहीं लगा. दोनों उस अंधेरे में ही एकदूसरे का हाथ थामे सिनेमाघर से बाहर निकल आए.

उस समय सारे शहर की बिजली चली गई थी. कविता एक रिकशा कर के अपने घर की ओर चल पड़ी और बगल में बैठा उस का अनजान साथी रास्तेभर अंधेरे में उस के जिस्म से छेड़छाड़ कर रहा था.

घर पहुंच कर कविता ने ताला खोल कर जैसे ही अंदर कदम रखा, वैसे ही बिजली आ गई, तो वह एकदम चौंक पड़ी, क्योंकि सिनेमाघर से आया शख्स कोई और नहीं, बल्कि उस का अपना पति विवेक था.

विवेक के साथ रहते समय हरदम किसी पराए मर्द की बांहों में बंधने के लिए तड़पती रहने वाली कविता को उस समय वह भी गैरमर्द जैसा ही लगा.

वह उस से लिपट कर फुसफुसा उठी, ‘‘तुम एकाएक शांत कैसे हो गए जी? तुम्हारे लिए तो मैं ने फिल्म छोड़ दी… आओ, अब जो बाकी काम करना है, उसे भी कर लो…’’

कविता की बात सुन कर विवेक को ऐसा लगा, जैसे वह अपनी ही नजरों में गिर गया हो और अब उसे वहां से बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं दिखाई दे रहा था. Best Hindi Kahani

Hindi Family Story: पोस्टमार्टम – जल्लाद डाक्टर

Hindi Family Story: डाक्टर निकुंज अपनी कुरसी पर बैठे थे. वे एक विदेशी पत्रिका देखने में मग्न थे. तभी ‘चीरघर’ का जमादार काशीराम ‘नमस्ते साहब’ कह कर उन के पास आ खड़ा हुआ.

डाक्टर साहब ने सिर हिला कर उसके नमस्ते का जवाब दिया और बगैर नजर उठाए ही पूछा, ‘‘कोई तगड़ा पैसे वाला मरा है काशी?’’

काशीराम पान मसाले की पीक को गटकते हुए बोला, ‘‘कहां साहब, लगता है कि आज का दिन तो कल से भी ज्यादा खराब जाएगा.’’

‘‘तो फिर?’’ डाक्टर ने तीखी नजरों से काशीराम को देखा.

‘‘वही साहब, कल वाली लाशें… बुड्ढा मगज खाए जा रहा है मेरा.’’

‘‘कुछ ढीली की मुट्ठी उस ने?’’

‘‘साहब, वह वाकई बहुत गरीब है. आदमी बहुत लाचारी में खुदकुशी करता है. उस ने फूल सी बेटियों को जहर देने से पहले अपने दिल को कितना मजबूत किया होगा.’’

‘‘बड़ी सिफारिश कर रहा है उस की. कहीं अकेलेअकेले तो जेब नहीं गरम कर ली?’’

‘‘अपनी कसम साहब, जो मैं ने उस की एक बीड़ी भी पी हो. उलटे जब से अखबार से उस का सारा हाल जाना है, हर पल ‘हाय’ लगने का डर लगता है.’’

होंठों पर मतलबी मुसकान ला कर डाक्टर साहब बोले, ‘‘कैसा सिर चढ़ कर बोल रहा है जाति प्रेम.’’

‘‘जाति? नहीं साहब, वे तो ऊंची जाति के लोग हैं.’’

‘‘दुनिया में सिर्फ 2 ही जातियां होती हैं बेवकूफ, अमीर और गरीब. इसीलिए तुम्हारा दिल पिघल रहा है… लेकिन, मैं तुम्हारी भी सिफारिश नहीं मानूंगा.

‘‘मैं ने आज तक ‘सुविधा शुल्क’ वसूल किए बिना कोई भी पोस्टमार्टम नहीं किया और न ही आज करूंगा, चाहे मुरदा हफ्तेभर वैसे ही पड़ा रहे.’’

‘‘देखता हूं साहब, फिर बात कर के… बुड्ढा बाहर ही खड़ा है.’’

काशीराम बाहर निकल आया. बरामदे के गमले से सट कर खड़े धरम सिंह ने उस की ओर आशाभरी नजरों से देखा, तो वह न में सिर हिलाता हुआ बोला, ‘‘डाक्टर नहीं मानता ठाकुर. कहता है, बिना पैसा लिए उस ने कभी पोस्टमार्टम नहीं किया, न आगे करेगा.’’

‘‘अगर ‘पैसे’ की कसम ही खाए हैं, तो भैया बात कर के देखो, सौ 2 सौ…’’

‘‘सौ 2 सौ… क्या बात करते हो ठाकुर? 5 सौ रुपए का रोज धुआं उड़ाता है. हजार तो कम से कम लेता है… तुम्हारी तो 3 लाशें हैं.’’

धरम सिंह आह भर कर बोला, ‘‘ठीक है, तुम एक बार पूछ कर आओ कि कितना लेगा. खड़ी फसल बेच दूंगा आढ़ती को. मर नहीं जाऊंगा.

‘‘अरे, सरकार ने जमींदारी छीन ली तब नहीं मरा, फिर सीलिंग लगा दी तब नहीं मरा, जमुना मैया घरखेत लील गईं तब नहीं मरा, बुढ़ापे में दिल के टुकड़े चले गए तब भी मौत नहीं आई, तो अब फसल जाने से क्या मौत आ जाएगी?’’

‘‘मेरी चलती तो तुम पर एक रुपया न लगने देता. पर मजबूर हूं… क्योंकि आज के साहबों में दिल नहीं…’’

‘‘नहीं भाई, मैं तुम्हें कहां दोष दे रहा हूं, तुम जा कर पूछ तो आओ.’’

काशीराम चुपचाप डाक्टर के कमरे में घुस गया.

डाक्टर ने उसे देख कर पूछा, ‘‘बुड्ढा कितने पर राजी हुआ?’’

‘‘हजार से ज्यादा नहीं निकाला जा सकेगा साहब… वह भी खड़ी फसल औनेपौने में बेचेगा, तब जा कर पैसे का जुगाड़ होगा.’’

‘‘ठीक है, भागते भूत की लंगोटी भली… तुम्हारा कमीशन अलग होगा.’’

‘‘आप ही रखना साहब. उस का पैसा मु?ो तो हजम नहीं होगा.’’

‘‘बेवकूफ कहीं का, नहीं होगा… यह तो दुनिया का नियम है कि एक मरता है, तो दूसरा अपनी जेब भरता है… जाओ, जा कर देखो, शायद कोई पैसे वाला पोस्टमार्टम के लिए आया हो.’’

काशीराम से एक हजार की बात सुन कर धरम सिंह थके कदमों से अपने आढ़ती के यहां चल पड़ा.

कुछ देर बाद डाक्टर निकुंज के कमरे के बाहर एक बड़ीबड़ी मूंछों वाला आदमी आया और उस ने अंदर आने की इजाजत मांगी.

डाक्टर साहब से अंदर आने का संकेत पाते ही वह अंदर घुस गया.

‘‘बैठिए,’’ डाक्टर साहब ने उस के हावभाव को देखते हुए सामने की कुरसी की ओर इशारा किया.

वह आदमी कुरसी पर बैठ गया, पर कुछ बोल न सका. डाक्टर साहब ने उसे पहले तो नजरभर टटोला, फिर कहा, ‘‘कहिए…’’

‘‘साहब, पोस्टमार्टम के लिए अभी एक लाश आएगी.’’

‘‘आप… किस पक्ष से हैं?’’

‘‘बचाव पक्ष से.’’

‘‘क्या चाहते हैं?’’

‘‘राइफल की गोली बंदूक के छर्रों में बदल जाए.’’

‘‘जानते हैं आप कि यह कितना खतरनाक काम है?’’

‘‘खतरनाक काम की ही तो कीमत है,’’ उस आदमी ने जेब से 10 हजार की 2 गड्डियां निकालीं.

‘‘नहीं, 50 से कम नहीं.’’

‘‘तब लाश पर एक ही फायर दिखना चाहिए, जबकि घुटने, हाथ और छाती पर कुल 3 घाव हैं.’’

‘‘ठीक है. काम हो जाएगा.’’

उस आदमी ने 40 हजार रुपए गिन कर डाक्टर को दे दिए और मूंछों पर ताव देता हुआ बाहर निकल गया.

पोस्टमार्टम करते समय डाक्टर निकुंज और काशीराम की जेबों में जो गरमी थी, उस की वजह से उन दोनों के हाथ बड़ी तेजी से चले, इसलिए चारों पोस्टमार्टम एक घंटे में ही निबट गए.

डाक्टर साहब बाकी बचे कामों को अपने जूनियर को सौंप कर अपनी गाड़ी की ओर चल दिए, क्योंकि आज उन के हाथ में बीवीबच्चों की फरमाइशें पूरी करने के लिए मुफ्त में मिला पैसा था.

बीवी के लिए स्लिपर, बेटी के लिए मोतियों का हार, बेटे के लिए कैमरा खरीद कर जब डाक्टर निकुंज अपने घर पहुंचे, तो वहां माली के अलावा कोई और न था.

माली ने बताया कि मेमसाहब आज देर से लौटेंगी और जिम्मी बाबा व बिन्नी बेटी अभी कालेज से नहीं आए.

डाक्टर निकुंज ने घड़ी देखी. दोनों के कालेज छूटे डेढ़ घंटा हो चुका था. कुछ देर सोचने के बाद डाक्टर ने माली से गाड़ी में रखे उपहारों को निकाल लाने के लिए कहा.

अचानक उन्हें एक विचार सूझ कि क्यों न जिन के उपहार हैं, उन के कमरे में रख दिए जाएं. उन की आंखों में शरारती बच्चों जैसी चमक उभरी और वे बड़ा वाला पैकेट उठा कर पत्नी की कपड़ों वाली अलमारी खोल बैठे.

पैकेट भीतर रख कर वे अभी अलमारी बंद कर ही रहे थे कि किसी कपड़े से फिसल कर एक परचा उन के पैरों के पास आ कर गिरा. उन्होंने वह  परचा उठा लिया. परचे पर लिखा था:

‘नंदिताजी,

‘कई घंटों से आप का फोन नंबर मिला रहा हूं, मिल ही नहीं रहा. हार कर एक पालतू आप के पास भेज रहा हूं. खबर यह है कि जिस के बारे में मैं ने आप को पहले भी बताया था, वे आज इसी शहर में रात में रुकने वाले हैं. एमएलए का टिकट उन्हीं के हाथों में है. बाकी आप खुद सम?ादार हैं.

‘श्यामलाल.’

‘‘तो अब नेतागीरी चमकाने के लिए इस दलाल की उंगलियों पर नाचा जा रहा है,’’ डाक्टर निकुंज निचला होंठ चबाते हुए बड़बड़ाए, फिर कदम घसीटते हुए बेटी के कमरे में घुस गए.

थोड़ी सी उलटपुलट के बाद ही उन के हाथ में छिपा कर रखा गया एक फोटो अलबम आ गया.

अलबम का पहला पन्ना देखते ही डाक्टर निकुंज के हाथ, जो सड़ीगली लाशों की चीरफाड़ करने में भी नहीं कांपते थे, अचानक ऐसे थक गए कि अलबम छूट कर जमीन पर जा गिरा.

अभी बेटे के कारनामों की जानकारी बाकी थी, इसलिए वे जिम्मी के कमरे में जा घुसे.

बेटे की रंगीनमिजाजी के बारे में तो वे कुछकुछ जानते थे. उन का लाड़ला नशीली चीजों का आदी हो चुका था.

अगले कई दिनों तक उस बंगले में घरेलू ?ागड़े होते रहे. आखिर में डाक्टर निकुंज की हार हुई. बीवीबच्चों ने साफ शब्दों में कह दिया कि उन लोगों को अपना भलाबुरा सोचने का हक है और इस में उन्हें किसी की दखलअंदाजी पसंद नहीं है.

अकेले पड़ चुके डाक्टर निकुंज एक दिन जिंदगी से इतने निराश हो गए कि खुदकुशी करने पर उतर आए. पर ठीक समय पर उन्हें याद आ गई वह शपथ, जो उन्होंने डाक्टरी की उपाधि लेने के समय ली थी.

उन्होंने दोनों हाथों से मुंह छिपा लिया और फूटफूट कर रो पड़े. जब मन आंसुओं से धुल कर साफ हो गया, तब उन्होंने कागजकलम उठाई और लिखने लगे:

‘अभी तक मैं इस दुनिया की बेवकूफ भरी दौड़ में अंधों की तरह दौड़ता रहा, पर अब जिंदगी की सभी सचाइयां मेरे आगे खुल चुकी हैं.

‘नंदिता, तुम सुंदर शरीर की सीढ़ी के सहारे यकीनन सत्ता की सीढि़यां चढ़ जाओगी. बिन्नी, तुम भी आखिर अपनी मां की बेटी हो न. तुम भी इसी राह पर चल कर नाम कमा सकती हो.

‘जिम्मी बेटे, जिस की मांबहनें इतनी कमाऊ हों, वह चाहे हशीश के नशे में डूब कर मर जाए, चाहे ब्राउन शुगर के नशे में. ‘तुम तीनों अब मेरी ओर से आजाद हो. तुम जो चाहो करना, केवल मेरे सामने मत पड़ना, क्योंकि मैं खुदकुशी भले न कर सका, पर तुम लोगों का खून जरूर कर दूंगा.’

कागज मेज पर छोड़ कर डाक्टर निकुंज पैदल ही बाहर निकल गए. Hindi Family Story

Story In Hindi: सीवर का ढक्कन – जब बन गया नरक रास्ता

Story In Hindi: आज तीसरे दिन कर्फ्यू में 4 घंटे की छूट दी गई थी. इंस्पैक्टर राकेश अपनी पुलिस टीम के साथ हालात पर काबू पाने के लिए गश्त पर निकले हुए थे. रास्ते में आम लोगों से ज्यादा रैपिड ऐक्शन फोर्स के जवान नजर आ रहे थे. सड़कों के किनारे लगे अधजले, अधफटे बैनरपोस्टर दंगों की निशानदेही कर रहे थे.

अपनी गाड़ी से आगे बढ़ते हुए इंस्पैक्टर राकेश ने देखा कि एक सीवर का ढक्कन ऊपरनीचे हो रहा था. उन्होंने फौरन गाड़ी रुकवाई.

सीवर के करीब पहुंचने पर मालूम हुआ कि अंदर से कोई सीवर के ढक्कन को खोलने की कोशिश कर रहा था. इंस्पैक्टर राकेश ने जवानों से ढक्कन हटाने को कहा.

सीवर का ढक्कन खुलने के बाद जब पुलिस का एक सिपाही अंदर झांका तो दंग रह गया. वहां 2 नौजवान गंदे पानी में उकड़ू बैठे हुए थे. उन के कपड़े कीचड़ में सने हुए थे. उन के चेहरे पर मौत का खौफ साफ नजर आ रहा था.

ढक्कन खुलते ही वे दोनों नौजवान हाथ जोड़ कर रोने लगे. उन के गले से ठीक ढंग से आवाज भी नही निकल पा रही थी. उन में से एक ने किसी तरह हिम्मत कर के कहा, “सर… हमें बाहर निकालें…”

बहरहाल, कीचड़ से लथपथ और बदबू में सने हुए उन दोनों लड़कों को बाहर निकाला गया. इस बीच एंबुलैंस भी वहां आ चुकी थी.

बाहर निकलने के बाद वे दोनों लड़के गहरीगहरी सांसें लेने लगे. दोनों के पैरों को कीड़ेमकोड़ों ने काट खाया था, जिन से अभी भी खून बह रहा था. उन के शरीर के कई हिस्सों पर जोंक चिपकी हुई खून पी रही थीं और तिलचट्टे व कीड़े रेंग रहे थे. उन्हें झाड़ने या हटाने की भी ताकत उन में नहीं बची थी.

उन दोनों को जल्दीजल्दी एंबुलैंस में लिटाया गया. एंबुलैंस चलने के पहले ही एक नौजवान बोल पड़ा, “अंदर 2 जने और हैं सर…”

पुलिस टीम को यह समझते देर नहीं लगी कि सीवर में 2 और लोग फंसे हुए हैं. पुलिस का एक जवान सीवर में झांकते हुए बोला, “सर, अंदर 2 डैड बौडी नजर आ रही हैं.”

इंस्पैक्टर राकेश के मुंह से अचानक निकला, “उफ…”

बड़ी मशक्कत से उन दोनों लाशों को बाहर निकाला गया, जो पानी में फूल कर सड़ने लगी थीं. बदबू के मारे नाक में दम हो गया था.

अगले दिन जिंदा बचे उन दोनों लड़कों के बयान से मालूम हुआ कि उन में से एक का नाम महेश और दूसरे का नाम मकबूल है. मरने वाले माजिद और मनोहर थे.

उन में से एक ने बताया, “हम लोग नेताजी का भाषण सुनने आए थे. अभी भाषण शुरू भी नहीं हुआ था कि सभा स्थल के बाहर कहीं से धमाके की आवाज सुनाई पड़ी. पलक झपकते ही अफवाहों का बाजार गरम हो गया और लोगों में भगदड़ मच गई. ‘आतंकवादी हमला’ का शोर सुन कर हम लोग भी भागने लगे.

“लोग अपनी जान बचाने के लिए जिधर सुझाई दे रहा था, उधर भागे जा रहे थे. उसी भगदड़ में कुछ लोग मौके का फायदा उठा कर लूटपाट करने में मसरूफ हो गए.

“हालात की गंभीरता को देखते हुए घंटेभर में कर्फ्यू का ऐलान होने लगा.
पुलिस की गाड़ियों के सायरन चीखने लगे. साथ छूटने के डर से हम चारों ने एकदूसरे का हाथ पकड़ रखा था.

“घरों और दुकानों के दरवाजे बंद हो चुके थे. कहां जाएं, किस के घर में घुसें… कौन इस आफत में हमें पनाह देगा, यह समझ में नही आ रहा था.

“यह सोचते हुए हम चारों दोस्त भागे जा रहे थे कि तभी पीछे गली से गुजर रही पुलिस की गाड़ी से फायरिंग की आवाज आई. ऐसा लगा जैसे वह फायरिंग हम लोगों पर की गई थी.

“हम लोग हांफ भी रहे थे और कांप भी रहे थे. दौड़ने के चक्कर में हम में से किसी एक का पैर सीवर के अधखुले ढक्कन से टकराया. वह लड़खड़ा कर गिरने लगा. हाथ पकड़े होने के चलते हम चारों ही एकसाथ गिर पड़े.

“हम लोगों को तत्काल छिपने के लिए सीवर ही महफूज जगह लगा. इस तरह एक के बाद एक हम चारों लोग सीवर में उतरते चले गए और उस का ढक्कन किसी तरह से बंद कर लिया… और फिर…” इतना कह कर वह लड़का रोने लगा.

देखते ही देखते वही सीवर 2 नौजवानों की कब्रगाह जो बन गया था. Story In Hindi

Funny Story In Hindi: झूठे इश्तिहार वाली नौटंकी

Funny Story In Hindi: आज सुबहसुबह जब पूरब दिशा से सूरज उगा और लोग अपने डब्बों जैसे छोटे घरों से निकल कर बाहर आने लगे, तो सब की नजर पूरे शहर में लगे एक नए इश्तिहार पर पड़ी.

उस इश्तिहार में 3 तरह के लोगों की तसवीरें थीं. पहले वे कुछ लोग, जिन को सब पहचानते थे. उस से छोटी तसवीरों वाले दूसरी तरह के वे लोग थे, जिन की शक्लें केवल इधरउधर की जानकारी रखने वाले लोग पहचानते थे. सब से छोटी तीसरी तरह की तसवीरें उन लोगों की थीं, जिन को उन के परिवार के बाहर

2-4 लोग ही पहचानते थे. इन्हीं तीसरी तरह के लोगों ने आपस में चंदा इकट्ठा कर के इश्तिहार लगवाने के लिए पैसे जुटाए थे. ‘बाप बड़ा न भईया, सब से बड़ा रुपईया’ वाली कहावत में ऊपर वाले से भी ज्यादा गहरा विश्वास रखने वाले लोग इस ‘महंगे इश्तिहार और सस्ते विज्ञापन’ पर बिना वजह पैसा खर्च नहीं करते हैं.

इन में से जिन सब से छोटी तसवीरों वालों को मैं पहचानता हूं, इन के बारे में एक बात कमाल की है. इन के धंधे गोरे हैं या काले, यह तो किसी को ठीक से नहीं पता, लेकिन इन के धंधे करामाती जरूर हैं. इन सब की दिखने वाली आमदनी अठन्नी और दिखने वाला खर्चा रुपईया है.

छोटी तसवीरों वाले लोग अपने से बड़े साइज की तसवीरों वाले लोगों के भरोसे बैठे हैं और मझोले साइज की तसवीरों वाले लोग बड़ी तसवीरों वालों की मेहरबानी पर जिंदा हैं.

छोटी तसवीरों वाले लोगों के लिए बड़ी तसवीरों वाले लोग ऊपर वालों से कम नहीं हैं. इन ऊपर वालों के चलते ही इन का लोक सुरक्षित है, परलोक की चिंता करता ही कौन है?

ये सब से छोटी तसवीरों वाले लोग गारंटी से मूर्ख होते हैं. इन को चापलूसी के अलावा जिंदगी जीने का और कोई रास्ता आता भी नहीं है.

ये लोग दो टके के फायदे के चक्कर में रोज घपला करते हैं. छोटी तसवीरों वालों का रिस्क ज्यादा होता है. फायदा होने पर फायदा कम और नुकसान होने पर इन की बलि ही सब से पहले चढ़ती है. कोई भी गलती हो जाए, छोटी तसवीरों वाले बेचारे लोग अपनेअपने ऊपर वालों द्वारा बुरी तरह से रगड़े जाते हैं.

इश्तिहारों में तसवीर जितनी छोटी होगी, तसवीर को पोस्टरों से गायब करना उतना ही आसान होगा. हवा बदलते ही तसवीर जितनी छोटी होगी, वे लोग पोस्टर से उतनी जल्दी उड़ भी जाते हैं.

ये छोटी तसवीरों वाले लोग बेचारे तो हैं, लेकिन शरीफ कतई नहीं हैं. तिकड़मी हैं, तभी तो इश्तिहार लगवाते फिरते हैं. इन थर्ड कैटेगरी लोगों का आमतौर पर कोई एक फिक्स ऊपर वाला होता नहीं है. बदलते मौसम के हिसाब से इन के ऊपर वाले भी बदलते रहते हैं.

उस इश्तिहार में सचाई का रंग छोड़ कर बाकी सारे रंगों का बड़े करीने से इस्तेमाल किया गया था. इस इश्तिहार में ऐसेऐसे दावे किए गए हैं, जो बातें केवल दूसरों को मूर्ख समझने वाले मूर्ख ही कह सकते हैं. इश्तिहार में वादे ऐसेऐसे, जिन को ऊपर वाला भी चाहे तो इतने कम समय में पूरा नहीं कर पाएगा.

शब्द, शब्द हैं साहब, इन से कुछ भी कह दो. शब्दों में कहां इतनी ताकत कि झूठों को झूठ कहने से रोक लें. शब्द कब झूठों की कलम या जबान से बाहर आने से इनकार कर पाते हैं. शब्द अगर चाहें भी तो समझने वालों को अपनी सुविधा से मतलब निकालने से रोक नहीं पाएंगे.

इन इश्तिहारों का फायदा सिर्फ और सिर्फ उन लोगों को होगा, जिन की तसवीरें इन में छपी हैं. झूठे इश्तिहार को सच मानने वालों का फायदा इश्तिहार लगवाने वाले उठाएंगे. झूठ को सच मानने वाले पहले से मूर्ख हों या न हों, अब मूर्ख कहलाएंगे. Funny Story In Hindi

Best Hindi Story: सपनों का सफर – परिणीता के सपनों में जीता रवि

Best Hindi Story: उस ने आज फिर शाम होते ही खुद को अपने कमरे में बंद कर लिया. मुझे उलझन होने लगी. मैं खुद को रोक नहीं पाया और अब मैं उस के दरवाजे पर दस्तक दे रहा था.

थोड़ी देर में उस ने दरवाजा खोला, ‘‘क्या है अजय, मैं कुछ देर अकेले रहना चाहता हूं. प्लीज, मुझे छोड़ दो…’’ वह अजीब सी दर्दभरी सूरत बना कर एक तरह से मुझ से गुजारिश करने लगा.

मुझे यह देख कर घबराहट होने लगी. मैं ने उस के कमरे में तकरीबन दाखिल होते हुए पूछा, ‘‘क्यों इतनी परेशानी हो रही है? मैं दोस्त हूं तुम्हारा. मुझे अपना दर्द बताओ. कहने से दर्द कम हो जाता है.

‘‘अकेले घुटघुट कर सहने से अच्छा है कि दर्द को कह दिया जाए,’’ मैं देख रहा था कि उस की आंखें भर आई थीं और लग रहा था कि अभी वह रो देगा.

मैं ने उस की बांह पकड़ कर सोफे पर बैठा दिया और खुद उस के पास ही बैठ गया, ‘‘रवि, मुझे बताओ कि ऐसा क्या है, जिस ने तुम्हें इतना अकेला बना दिया है? ऐसी कौन सी बात है, जो तुम अपने बचपन के दोस्त से भी नहीं बताना चाहते? इस तरह से घुटते रहोगे, तो बीमार पड़ जाओगे. मुझे अपना सारा दर्द बताओ,’’ मैं ने उसे समझाया.

रवि इतना सुनते ही बच्चों की तरह फूटफूट कर रोते हुए लिपट गया, ‘‘अजय, मैं जीना नहीं चाहता हूं. मेरी जिंदगी में अब कुछ नहीं बचा है. मेरे जीने का मकसद ही खत्म हो गया है.’’

‘‘मुझे बताओ कि आखिर बात क्या है?’’ मैं ने उसे सहलाते हुए कहा.

थोड़ी देर की चुप्पी के बाद रवि कुछ संभलते हुए बोला, ‘‘अजय, मेरी जिंदगी में तूफान है और मैं एक ऐसी जगह खड़ा हूं, जहां से न तो पीछे जा सकता हूं और न आगे…’’

थोड़ी देर की खामोशी के बाद रवि ने आगे कहना शुरू किया, ‘‘अजय,  पहली बार मुझे जिंदगी में परिणीता से मिलने के बाद ऐसा लगा था कि कोई अनजानी सी ताकत है, जो हमें करीब लाने की कोशिश कर रही है. यह सही था कि मुझे उस से प्यार हो गया था, लेकिन धीरेधीरे हम कब एकदूसरे के होते चले गए, हमें खुद ही पता न चला.

‘‘परिणीता मेरी जिंदगी में एक खूबसूरत सपने की तरह थी और हम दोनों इस सपने को जीना चाहते थे, लेकिन जैसा कि हमेशा होता रहा है, परिणीता के घर वालों को हमारे बारे में पता चला और परिणीता पर पहरा लगा दिया गया. शादी के लिए लड़के की तलाश शुरू कर दी गई. फिर एक दिन मैं शाम को घर लौट रहा था कि गली के मोड़ पर परिणीता की आवाज सुनाई दी.

‘‘मैं ठिठक गया. वह बोली, ‘रवि, मुझे तुम से बहुत जरूरी बात करनी है. मेरे साथ चलो.’

‘‘मैं ने उस से पूछा, ‘ऐसी क्या बात है, जो तुम यहां नहीं कह सकतीं?’

‘‘वह बोली, ‘मेरे साथ चलो, मैं यहां नहीं कह सकती.’

‘‘यह बात उस ने मेरा हाथ पकड़ कर खींचते हुए कही. मैं चल पड़ा.

‘‘नवीन पार्क पहुंच कर उस ने कहना शुरू किया, ‘रवि, मैं यहां से कहीं दूर जाना चाहती हूं…’

‘‘मैं ने घबरा कर कहा, ‘क्यों परी, किसी ने कुछ कहा क्या?’

‘‘वह बोली, ‘रवि, मैं तुम से बहुत प्यार करती हूं. तुम्हारे बिना मैं मर जाऊंगी, लेकिन मेरे घर वाले न तुम्हें पसंद करते हैं और न ही मेरा आगे पढ़ना पसंद करते हैं. आज ही पता चला है कि किसी गांव में बहुत रूढि़वादी परिवार में मेरी शादी तय हो रही है. मैं तो जीतेजी मर जाऊंगी…’

‘‘मैं ने उसे समझाया, ‘परी, तुम परेशान मत हो. कोई न कोई उपाय निकल जाएगा.’

‘‘वह बोली, ‘नहीं रवि, कोई मदद नहीं करेगा. तुम तैयारी कर लो. हम कोर्ट मैरिज कर लेंगे और यहां से बहुत दूर चले जाएंगे.’

‘‘परिणीता एक बहुत ही होनहार लड़की है. उस का सपना एक कामयाब मैनेजर बनने का है. पर मुझे डर लग रहा है कि उस के घर वाले जबरदस्ती उस की शादी कहीं भी करा देंगे और उस के सपने पूरे नहीं हो पाएंगे. मेरे लिए इस से बड़ी हार और कुछ नहीं हो सकती…

‘‘अजय, तुम उस के पिता से मिलो और उन्हें समझाओ. वे परी के सपनों के साथ इस तरह की नाइंसाफी न

करें. मैं खुद को रोक लूंगा. वे कहेंगे तो मैं कहीं दूर चला जाऊंगा, लेकिन परिणीता को उसे अपना सपना पूरा करने दें…’’ इतना कह कर रवि चुप

हो गया. उस की आंखें भर आई थीं.

मैं ने उसे तसल्ली दी और कहा कि मैं कोशिश करूंगा परिणीता के पिता से मिलने की, लेकिन दिक्कत यह थी कि मैं इस के पहले कभी परिणीता के पिता से मिला नहीं था और मेरा उन से पहले से कोई ज्यादा परिचय भी नहीं था.

बहरहाल, मैं ने रवि से वादा तो कर ही लिया था और उस की घबराहट देखने के बाद इस के अलावा और कोई चारा भी नहीं था. उसे उस के घर छोड़ कर मैं लौट आया और सोचने लगा कि कैसे परिणीता के पिता से मिला जाए और इस मसले पर किस तरह बात की जाए कि परिणीता की पढ़ाई न रुके और वह अपने सपने को पूरा कर सके.

अगले दिन मैं अपने औफिस जाने के लिए निकला और सोचा कि आज शाम को लौटते हुए परिणीता के पिता से मिलने जाऊंगा.

औफिस पहुंच कर मैं अपने काम में बिजी हो गया था और लौटने के समय एक डिपार्टमैंटल स्टोर में कुछ जरूरी सामान खरीदने लगा.

इसी बीच मुझे लगा कि कोई बहुत गौर से मुझे देख रहा है. मैं ने ध्यान दिया तो मुझे लगा कि कुछ दूरी पर शायद परिणीता ही खड़ी थी और उस के साथ उस की मां भी थीं.

मैं ने बिना समय गंवाए उस की मां के पास पहुंच कर कहा, ‘‘नमस्ते आंटी.’’

‘‘नमस्ते बेटा, कैसे हो?’’

‘‘मैं ठीक हूं आंटी.’’

‘‘परी, तुम कैसी हो?’’ मैं ने धीरे से परिणीता से पूछा.

‘‘ठीक हूं,’’ उस ने उदास लहजे में जवाब दिया.

मैं ने जानबूझ कर पूछा, ‘‘तुम्हारी पढ़ाई ठीक से चल रही है या नहीं? देखो, अगले महीने यूनिवर्सिटी के मैनेजमैंट कोर्स का इम्तिहान है, फार्म भर देना और तैयारी शुरू कर देनी चाहिए.’’

‘‘जी, ठीक है,’’ वह औपचारिक रूप से बोली.

‘‘आंटी, आप की तबीयत ठीक है न?’’ मैं ने बात को बढ़ाने के लिए उस की मां

से पूछा.

‘‘अब क्या तबीयत ठीक रहेगी बेटा, उम्र भी हो गई है बस. परी की चिंता लगी है, इस

के हाथ पीले हो जाएं तो मन को

आराम मिले.’’

‘‘अरे आंटी, ऐसी भी क्या जल्दी है. परी एक बहुत ही होनहार लड़की है. उसे आगे पढ़ाइए. शादी तो हो ही जाएगी,’’ मैं ने उस की मां को अपने मतलब की तरफ ले जाने की कोशिश की.

‘‘मैं तो चाहती ही हूं, क्योंकि शादी में भी आजकल लड़के वाले नौकरी वाली लड़की की मांग करते हैं, पर इस के पापा जिद किए हुए हैं और जल्दी शादी करना चाहते हैं.’’

‘‘आंटी, ऐसी क्या बात है कि अंकल जैसे समझदार आदमी भी इस तरह जिद कर बैठे हैं?’’

‘‘असल में इस के पापा रवि को पसंद नहीं करते और परी को यहां से दूर भेजना चाहते हैं.’’

‘‘लेकिन आंटी, रवि की वजह से परी की जिंदगी, उस का भविष्य बरबाद करना क्या सही है? रवि से ज्यादा अहम परी की पढ़ाई, उस का भविष्य है, उस के सपने हैं और हर मांबाप की सब से बड़ी जिम्मेदारी अपने बच्चों के सपनों को पूरा करने में मदद करना है, न कि किसी छोटी समस्या को ले कर बच्चों के भविष्य को निराशा में धकेल देना,’’ मैं ने समझाने की कोशिश की.

‘‘मैं समझ सकती हूं और लड़के वाले भी हर जगह नौकरी वाली लड़की की मांग करते हैं, इसलिए भी मैं नहीं चाहती कि परी की पढ़ाई रुके.’’

‘‘आंटी, आप कहें तो मैं अंकल से बात करूं?’’

‘‘कोशिश कर लो, मगर मुझे नहीं लगता कि वे मानेंगे,’’ परी की मां की आवाज में निराशा झलक रही थी.

‘‘ठीक है आंटी, मैं बात करूंगा. लेकिन जब मैं बात करूं तो आप भी मौजूद रहेंगी. मैं कल सुबह ही आऊंगा.’’

‘‘ठीक है बेटा,’’ इतना कह कर मां आगे बढ़ गईं और परिणीता थोड़ा पीछे रही. मैं ने उसे देख कर कहा, ‘‘बिलकुल परेशान मत होना. सब ठीक हो जाएगा.’’

मेरी बातें सुन कर परिणीता को थोड़ी तसल्ली हुई.

अगले दिन मैं परिणीता के पिता से मिलने उस के घर पहुंचा तो देखा कि वे कहीं बाहर जा रहे थे.

‘‘नमस्ते अंकल,’’ मैं उन के सामने पहुंच कर बोला.

‘‘नमस्ते बेटा, क्या हाल है? अब तो कम ही दिखाई देते हो,’’ वे बोले.

‘‘अंकल, काम बहुत बढ़ गया है. औफिस में जल्दी जाना होता है और लौटने में भी देर हो जाती है, इसलिए कहीं भी चाह कर नहीं जा पाता,’’ मैं ने सफाई देते हुए कहा.

‘‘देखो बेटा, अकेले रहोगे तो ऐसे ही परेशान रहोगे. या तो घर से किसी को बुला लो और नहीं तो बेहतर होगा कि शादी कर लो, सब सही हो जाएगा.’’

‘‘अंकल, मेरी सगाई हो चुकी है और शादी अगले साल होगी. तब तक मेरी होने वाली वाइफ की भी बीएड पूरी हो जाएगी. हालांकि मेरे मातापिता चाहते थे कि इसी साल शादी हो जाए, लेकिन ऋचा यानी मेरी होने वाली पत्नी से पता चला कि वह बीएड करना चाहती है, तो मेरे मातापिता और मैं ने इसे मान लिया,’’ मैं ने कहा.

‘‘क्यों बेटा, शादी के बाद भी वह बीएड कर सकती है?’’ अंकल ने अपना नजरिया बताया.

‘‘अंकल, शादी हो जाने के बाद हर लड़की के हालात बदल जाते हैं और मानसिकता में बदलाव आ जाता है. लड़की ससुराल में रह कर पढ़ाई कर सकती है, लेकिन उसे बहुतकुछ खोने का डर भी रहता है और अपने मातापिता के यहां रह कर वह अपनी पढ़ाई अच्छी

तरह से बिना किसी दबाव के आसानी

से पूरी कर सकती है,’’ मैं ने अंकल

को प्रैक्टिकल तरीके से समझाने की कोशिश की.

‘‘हां, तुम्हारी बात कुछ सही है. चलो, ठीक है, बीएड कर लेने के बाद वह तुम्हारे लिए भी मददगार साबित होगी,’’ हम लोग बात करते हुए थोड़ी दूर बाजार तक आ गए थे.

‘‘अंकल, बुरा मत मानना, पर आप परी को आगे पढ़ने से क्यों मना कर रहे हैं? जब वह एमबीए करना चाहती है, तो उसे करने दीजिए. शादी तो बाद में भी हो जाएगी,’’ अपने मुद्दे पर आते हुए मैं ने कहा.

‘‘देखो अजय, परी का मामला कुछ अलग है. मेरी भी इच्छा थी कि परी एमबीए करने के बाद ही अपने घर से विदा हो, लेकिन कुछ हालात बदल गए हैं.’’

‘‘शायद रवि के बारे में आप कुछ कहना चाहते हैं. मेरे विचार से इस मसले पर भी समझदारी से काम लेना ही मुनासिब होगा. जहां तक परी की पढ़ाई की बात है, तो मुझे पूरा यकीन है कि रवि का मसला कोई बाधा नहीं बनेगा,’’ मैं ने पूरे यकीन से कहा.

‘‘जहां तक मैं समझता हूं, रवि एक समझदार लड़का है, लेकिन उस ने परी के साथ रिश्ता बनाया, यह सोच कर मुझे बहुत झटका लगा.’’

‘‘अंकल, आप की चिंता जायज है. लेकिन परी मेरे लिए बहन की तरह है और इस आधार पर मैं कह सकता हूं कि सिर्फ रवि ही नहीं, बल्कि परी भी बहुत समझदार है और ये दोनों ही बहुत भावुक हैं, इसलिए ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है, जिस से दोनों के परिवारों को कोई चिंता हो,’’ हम बात करते हुए एक पार्क में बैंच पर बैठ गए थे.

‘‘अजय, यह कैसे मुमकिन है कि परी इन हालात में पढ़ाई को एकाग्रता से पूरी कर पाएगी?’’ अंकल ने काफी सावधानी के साथ कहा.

‘‘इसलिए कि रवि खुद चाहता है कि परी को आगे एमबीए करने में कोई बाधा नहीं आए. वह तो जब तक परी की पढ़ाई पूरी न हो जाए, अपना ट्रांसफर कहीं दूर करा लेना चाहता है,’’ मैं ने कहा.

‘‘क्यों… रवि इतनी परेशानी किसलिए उठाएगा? उसे ऐसा कुछ करने की जरूरत नहीं है.’’

‘‘अंकल, इसलिए कि ऐसा करना जरूरी है. सच तो यह है कि जब 2 लोग आपस में सच्चा प्यार करते हैं, तो वे सिर्फ और सिर्फ एकदूसरे को खुश देखना चाहते हैं, चाहे इस के लिए उन्हें अपनी खुशी, अपनी भावनाओं को आहत ही क्यों न करना पड़े और इस में कोई शक नहीं है कि उन दोनों का प्यार एक हकीकत है…’’

‘‘अजय, यह प्यार नहीं है. यह इस उम्र की भावनाओं का उभार है. यह अकसर होता है.’’

‘‘मैं आप को अपनी समझ से कह रहा हूं. आप को मानने के लिए कोई दबाव नहीं दे रहा हूं. अगर आप को बुरा लगा तो मुझे माफ कर दें.’’

‘‘नहीं बेटा, मुझे बुरा नहीं लगा. तुम इसे गलत मत समझना,’’ अंकल की आवाज में भर्राहट सुनाई दे रही थी.

‘‘अंकल, आप भी मेरे पिता समान हैं. मैं आप की किसी बात का बुरा नहीं मान सकता और मैं परी को भी अपनी बहन समझता हूं, इसलिए इस हक से ही कुछ कहने की हिम्मत कर सका,’’ मैं ने अंकल को संभालने की कोशिश की.

अचानक ही अंकल ने मुझे अपने गले से लगा लिया और बुरी तरह से फूटफूट कर रोने लगे, ‘‘बेटा, मैं क्या करूं. परी मेरी एकलौती बेटी है और कभी भी मैं ने उसे किसी बात के लिए मना नहीं किया, उस की हर इच्छा पूरी की, पर आजकल मुझे क्या हुआ… मैं कैसे इतना कठोर हो गया…’’

मैं अंकल को समझाने और संभालने की कोशिश करने लगा.

थोड़ी देर में मैं अंकल को घर छोड़ कर चला गया. हालांकि देर हो गई थी. औफिस में बौस को भी देरी की वजह समझानी पड़ी, पर मन में एक संतोष हो रहा था कि सबकुछ अच्छे तरीके से मैं ने उन लोगों को समझा दिया.

शाम को घर आने के बाद फोन बजने लगा, ‘‘हैलो…’’

‘अजय, मैं परी का पापा बोल रहा हूं. तुम घर आ गए?’

‘‘जी अंकल, मैं घर आ गया हूं.’’

‘बेटा, कुछ बात करनी थी. मैं तुम से मिलना चाहता हूं. क्या मैं इस समय तुम से मिलने आ सकता हूं?’

‘‘जी, बिलकुल आ सकते हैं, लेकिन आप परेशान न हों, मैं खुद आ रहा हूं.’’

‘नहीं बेटा, मैं आ रहा हूं,’ अंकल ने फोन रख दिया. थोड़ी देर में वे मेरे घर आए और अंदर आ कर बैठ गए.

मैं ने पूछा, ‘‘क्या बात है अंकल? कुछ परेशानी है?’’

‘‘नहीं अजय, मैं ने काफी सोचा और परी की मम्मी से भी बात की. परी की पढ़ाई पूरी कराने के बाद ही हम उस की शादी करेंगे, यह हम लोगों ने तय कर लिया है.’’

‘‘अंकल, यह तो बहुत ही अच्छी बात है. आजकल लड़कियों को अपने पैरों पर खड़ा होने लायक बनाने में मांबाप को पूरा सहयोग देना चाहिए. बहुत ही होनहार लड़की है परी. मुझे बहुत खुशी हुई कि अब परी अपने सपनों को पूरा कर पाएगी,’’ मैं बहुत खुश हुआ. मुझे लगा कि मेरी कोशिश और रवि का पवित्र प्यार सफल हो गया.

‘‘बेटा, तुम ने मेरी आंखें खोल दीं. मैं ने परी को काफी टैंशन दी है. मैं

उस से माफी मांगूंगा. पर बेटा, तुम्हें

परी को एडमिशन दिलाने में मदद करनी होगी.’’

‘‘जरूर अंकल, मैं पूरी तरह से मदद करूंगा. आखिर वह मेरी भी बहन ही तो है. आप चिंता न करें.’’

‘‘अगर बहन मानते हो, तो एक जिम्मेदारी और निभानी पड़ेगी. कर सकोगे?’’

‘‘आप बोलिए तो सही, मैं हर जगह परी के भाई होने की जिम्मेदारी निभाऊंगा और मुझे बहुत खुशी होगी.’’

‘‘तो तुम्हें रवि को बताना होगा कि भले हम परी की शादी उस के एमबीए पूरा करने पर करेंगे, लेकिन सगाई हम इस महीने में ही कर देना चाहते हैं.’’

‘‘ठीक है अंकल, लेकिन क्या किसी लड़के को देखा है और बातचीत पक्की हुई है?’’

‘‘हां देखा और समझा भी है. परी को पसंद भी है, इसलिए रवि से कहना कि अपने मातापिता को मुझ से मिलवा दे, ताकि सगाई की तारीख जल्द ही तय कर ली जाए,’’ अंकल मुसकरा रहे थे और उन के चेहरे पर सुकून नजर आ रहा था. Best Hindi Story

Hindi Kahani: इमामुद्दीन – जिंदगी का मुश्किल सफर

Hindi Kahani: इमामुद्दीन काफी देर तक पार्क में टहलता रहा और फिर कोने की एक बैंच पर बैठ गया. वह बीचबीच में गहरी सांस लेता और ‘उफ’ कहता हुआ छोड़ देता. उस के भीतर चिंताओं के काले बादल उमड़घुमड़ रहे थे. ऐसा लग रहा था जैसे यही बादल इमामुद्दीन की आंखों से आंसू बन कर बरस पड़ेंगे.

इधर इमामुद्दीन की बीवी आयशा बानो घर पर अपने शौहर का इंतजार कर रही थी, उधर इमामुद्दीन कुछ सोच रहा था. पार्क में जब थोड़ी चहलपहल बढ़ने लगी, तो वह और ज्यादा बेचैन हो उठा. अब भूख से उस का पेट भी कुलबुलाने लगा था और जब प्यास लगने लगी तो वह अपने घर की तरफ लौटने लगा.

आयशा बानो दरवाजे पर ही खड़ी थी, बोली, ‘‘कहां चले गए थे तुम?’’

‘‘कहीं नहीं… बस, ऐसे ही पार्क तक. कुछ खाने को हो तो दे दो, प्यास भी लगी है.’’

आयशा बानो पानी ले आई और फिर रोटी बनाने लगी. इमामुद्दीन का सोचना अभी जारी था. वह खाना खातेखाते कई बार रुक जाता. आयशा उसे देख रही थी, लेकिन कुछ बोली नहीं थी. उसे मालूम था कि इमामुद्दीन के मन में क्या चल रहा है.

इमामुद्दीन ने आयशा से पूछा, ‘‘गंगाजी को होश आया कि नहीं?’’

‘‘नहीं,’’ आयशा ने छोटा सा जवाब दिया और रोटी इमामुद्दीन के आगे रख दी.

इमामुद्दीन और आयशा चंद्रभान तिवारी के घर में पिछले 24 साल से किराए पर रह रहे थे. चंद्रभान की कोई औलाद नहीं थी. वे अपनी पत्नी गंगा के साथ अकेले ही रहते थे. उन के घर से लगा हुआ 2 कमरे का एक और मिट्टी का कच्चा घर था, जिस में इमामुद्दीन किराए पर रहता था.

एक दिन चंद्रभान तिवारी की अचानक मौत हो गई और उन की पत्नी गंगा देवी बेसहारा हो गईं. इतना ही नहीं, एक दिन गंगा देवी को लकवा मार गया. अब तो उन की जिंदगी एक चारपाई पर सिमट गई थी.

कुछ दिनों तक नातेरिश्तेदार, पासपड़ोस के लोग गंगा देवी को देखने आते रहे, कुछ समय बाद उन्होंने भी आना बंद कर दिया.

इमामुद्दीन जब चंद्रभान तिवारी के घर में किराए पर रहने आया था, उस के पहले वह ईदगाह महल्ले में रहता था. उस के सिर से बचपन में ही उस की अम्मी नसरीन का साया उठ गया था. उस की खाला भी तब ईदगाह के पास ही रहती थीं.

इमामुद्दीन के अब्बू फैजान अली के इंतकाल के बाद इमामुद्दीन शहर आ गया और मजदूरी करने लगा. उस समय उस की उम्र रही होगी 20-22 साल. जब से ही वह चंद्रभान तिवारी के मकान में रह रहा था.

इमामुद्दीन को गंगा देवी में अपनी मां दिखाई देती थीं. इमामुद्दीन और आयशा दोनों मजदूर थे, पर उन के दिल में दूसरों के प्रति करुणा और इज्जत का अटूट भाव था. वे दोनों अनपढ़ थे. खास बात तो यह थी कि वे अनुभवी और समझदार थे. दोनों के दिल में दूसरों के लिए खूब जगह थी.

गंगा देवी जब लकवे के चलते खाट पर पड़ी थीं, तब इमामुद्दीन और आयशा ने ही उन की खूब सेवा की थी. गंगा देवी के इलाज में इमामुद्दीन ने अपनी थोड़ीबहुत जमापूंजी भी खर्च कर दी थी. आयशा गंगा देवी को नहलाती, उन के कपड़े बदलती और इमामुद्दीन दवा खत्म होने पर दवा लाता और उन्हें समय पर खिलाता.

धीरेधीरे यह रिश्ता और गाढ़ा होता चला गया. आयशा बहू की तरह बाकायदा गंगा देवी का खयाल रखती, उन के पैर दबाती, इमामुद्दीन उन्हें ह्वीलचेयर में बिठा कर थोड़ाबहुत बाहर घुमा कर ले आता.

समय बीतता गया. इमामुद्दीन पास में ही अपना छोटा सा घर बनवा रहा था. चंद्रभान तिवारी का घर धीरेधीरे खंडहर होता जा रहा था. आखिर घर की मरम्मत कराए तो कौन कराए? धीरेधीरे इमामुद्दीन का नया घर तैयार हो गया.

इमामुद्दीन और आयशा गंगा देवी को अपने नए घर में ले आए. भले ही इमामुद्दीन ने नया घर बनवा लिया था, लेकिन चंद्रभान तिवारी के खंडहर घर से उस का भावनात्मक रिश्ता हो गया था.

चंद्रभान तिवारी के घर को देख कर वह सोचा करता था, ‘भले ही यह घर अब खंडहर होता जा रहा है, लेकिन इसी घर ने ही मुझे छत्रछाया दी, पनाह दी.’

पड़ोस के कुछ लोगों ने तो इमामुद्दीन से कहा भी कि तेरी अक्ल मारी गई है, जो एक बीमार अपाहिज औरत को भी अपने नए घर में ले आया है. जितने मुंह उतनी बातें. जो आता इमामुद्दीन को अपनीअपनी समझ के हिसाब से पट्टी पढ़ाने लगता.

इमामुद्दीन सब लोगों की बातें सुनता और कहता कि बात मकान मालिक और किराएदार की नहीं है भाई, इन 23 सालों में जितना अपनापन चंद्रभान तिवारी और गंगा देवी ने मुझे दिया है, वह मैं कभी भूल नहीं सकता. मैं अब गंगा देवी की सूरत में अपनी मां नसरीन को देखता हूं.

इमामुद्दीन पुरानी यादों से लौट आया. उसी रात गंगा देवी की मौत हो गई. इमामुद्दीन ने हिंदू धर्म के हिसाब से गंगा देवी का क्रियाकर्म किया.

गंगा देवी अब शून्य में विलीन हो चुकी थीं, पर इमामुद्दीन और आयशा भी उन के बिना अजीब सा खालीपन महसूस कर रहे थे. Hindi Kahani

Hindi Family Story: दरार – जब हुई शायना और शौहर के बीच तकरार

Hindi Family Story: शायना के अम्मीअब्बू ने उस की शादी में कई लाख रुपए खर्च किए थे. खूब दहेज, जेवर और कैश दे कर उन्होंने सोचा था कि शायना की जिंदगी बेहतर हो जाएगी, ससुराल में इज्जत मिलेगी, इतना दहेज और कैश देने से उस का सुसराल में राज रहेगा, वह अपनी मनमानी करेगी और सब को उस की बात माननी पड़ेगी, क्योंकि वह एक बड़े घर के बेटी है, जो दहेज के साथ लाखों रुपए नकद लाई है…

शायना के अम्मीअब्बू की इस सोच ने शायना और उस के शौहर के बीच ऐसी दरार डाल दी, जो कभी नहीं भरी जा सकी और दोनों एक महीने के अंदर ही अलगअलग रह कर जीने के लिए मजबूर हो गए. शायना के जाने के बाद उस के शौहर शाहिद ने कई बार उसे फोन भी किया, पर उस के अम्मीअब्बू ने न तो शायना से शाहिद की बात होने दी और न ही शाहिद को शायना को अपने साथ ले जाने दिया.

वे इसी घमंड में रहे कि शाहिद उन की सारी बातें मानेगा और शायना वहां पर राज करेगी, पर उन का यह भरम उस वक्त टूट गया, जब शाहिद ने दूसरी शादी कर ली. शायना की शादी की बात शाहिद से तय हो गई थी. शाहिद के अब्बा का कपड़ों का कारोबार था.

शाहिद अपने अब्बा के साथ ही काम करता था. शाहिद के अलावा उस का एक और भाई था, जो कैंसर से पीडि़त होने की वजह से हर वक्त बीमार रहता था. सारे कारोबार की बागडोर शाहिद के हाथों में ही थी.  शाहिद ऊंची कदकाठी का एक खूबसूरत नौजवान था.

यही वजह थी कि शाहिद को पहली ही नजर में देख कर शायना के अम्मीअब्बू ने शाहिद के रिश्ते के लिए हां कर दी थी. शायना भी खूबसूरती की मलिका थी. ऊंचा कद, गदराए बदन के साथसाथ वह खूबसूरती की बेमिसाल मूर्ति थी.

गुलाबी होंठ और सुर्ख गाल उस की खूबसूरती में चार चांद लगा देते थे. जो भी शाहिद और शायना की जोड़ी को देखता था, बस देखता ही रह जाता था. उन दोनों की तारीफ करने के लिए लोगों के पास अल्फाज कम पड़ जाते थे.

शायना की शादी के अभी 4 महीने बाकी थे. उस के अम्मीअब्बू ने उस के दहेज का सामान खरीदना शुरू कर दिया था. हर सामान ब्रांडेड खरीदा जा रहा था. अगर कोई सामान उन के शहर में न मिलता तो वह दूसरे शहर से मंगाया जाता था.

शायना के लिए लाखों रुपए का सोना खरीदा गया था. सोना सिर्फ सायना के लिए ही नहीं, बल्कि सायना की सास के लिए भी खरीदा गया था. इस तरह महीनों तक शायना की शादी की तैयारी चलती रही, फिर वह दिन भी आ गया जब शायना का निकाह शाहिद से होना था.

शाहिद बरात ले कर शायना के घर आ गया. बरातियों का स्वागत बड़ी धूमधाम से किया गया. कई तरह के खानों का इंतजाम किया गया. निकाह के बाद विदाई के समय भी लाखों रुपया नकद दिया गया और इस तरह लाखों रुपया खर्च होने के बाद शायना और शाहिद की शादी हो गई. शायना बड़ी धूमधाम के साथ अपनी ससुराल पहुंच गई. शायना और शाहिद एकदूसरे को पा कर बहुत खुश थे.

अभी शादी को कुछ दिन ही गुजरे थे कि शायना ने शाहिद से महंगे मोबाइल फोन की मांग की.  शाहिद बोला, ‘‘अभी रुक जाओ. तुम्हें जिस से भी बात करनी है, मेरे मोबाइल फोन से बात कर लिया करो. कुछ दिनों में मैं अब्बा से बात कर के तुम्हें नया मोबाइल फोन दिला दूंगा.’’

शायना को शाहिद की यह बात पसंद नहीं आई. अभी शायना की मोबाइल फोन की बात तो कबूल हुई नहीं थी कि शायना ने शाहिद से बोला, ‘‘अगले हफ्ते मैं अपने मायके जाऊंगी. लेकिन मुझे इस पुरानी कार से नहीं जाना.

तुम मेरी पसंद की नई कार ले लो, उसी से मैं अपने मायके जाऊंगी.’’ शाहिद ने शायना को समझाते हुए कहा, ‘‘यह कार भी तो सही है. इस में क्या खराबी है? क्यों फालतू की जिद कर रही हो…’’ शायना को शाहिद की यह बात बहुत नागवार गुजरी.

उस ने अगले ही दिन फोन पर अपनी अम्मी से शाहिद की शिकायत कर दी और बोला, ‘‘मुझे तुम से बात करने को दिल करता है, तो मैं तुम से बात भी नहीं कर सकती, क्योंकि इन्होंने अभी तक मुझे मोबाइल फोन  नहीं दिलाया.

‘‘मैं तुम से मिलने भी नहीं आ सकती, क्योंकि इन्होंने अभी तक नई कार भी नहीं खरीदी. कैसे फटीचर लोगों से तुम ने मेरी शादी करा दी.’’ अगले दिन शायना की अम्मी का फोन शाहिद के पास आ गया. वे छूटते ही बोलीं, ‘‘हमारे लेनदेन में कौन सी कमी रह गई थी, जो तुम मेरी बेटी शायना की ख्वाहिश पूरी नहीं कर सकते? तुम्हारी जगह किसी और को इतना सबकुछ देते तो मेरी बेटी के पैर धो कर पीता.’’

शाहिद को शायना की एक तो यह बात बुरी लगी कि शायना ने घर की बात अपनी अम्मी को बताई और उन से अपनी सुसराल की बुराई की, दूसरे शायना की अम्मी ने अपनी दौलत का रुआब दिखाते हुए उसे जलील किया. शाहिद ने शायना को समझाते हुए कहा, ‘‘तुम्हें अपनी अम्मी से घर की बात नहीं करनी चाहिए थी.’’

शायना फौरन तड़क कर बोली, ‘‘मैं अपनी परेशानी अपने अम्मीअब्बा को नहीं बताऊंगी, तो किसे कहूंगी…’’ और वह ऐंठ कर अपने बिस्तर पर  पड़ गई. शाहिद ने शायना को काफी समझाने की कोशिश की, पर वह न खाना खाने को तैयार हुई और न अपने कमरे से बाहर निकली.

शाम को फिर शाहिद के मोबाइल फोन पर शायना की अम्मी का फोन आया, तो शाहिद ने शायना को मोबाइल फोन देते हुए कहा, ‘‘लो, आप की अम्मी का फोन आया है.’’ शायना ने फोन लेते ही रोना शुरू कर दिया और शाहिद के सामने  ही अपनी अम्मी से शाहिद की बुराई करने लगी.

उस की अम्मी ने शायना को कहा, ‘‘तुम चुप हो जाओ. मैं आज ही तुम्हारे भाई को भेजती हूं. तुम उस के साथ घर आ जाओ. जब तक ये तेरी बात नहीं मानेंगे, तुम हमारे पास ही रहना.’’ कुछ ही देर में शायना का भाई उस की ससुराल पहुंच गया और शाहिद के मना करने पर भी शायना को अपने साथ ले आया. शाहिद को शायना की यह बात बहुत बुरी लगी.

जब इस झगड़े का पता  शाहिद के अम्मीअब्बू को पता चला तो अब्बू ने शाहिद को डांटा, ‘‘हमें क्यों नहीं बताया. हम उसे समझाते. तुम कल ही अपनी सुसराल जाओ और शायना को  ले कर आओ. घर की बात घर में ही रहनी चाहिए.’’ उधर जब शायना घर पहुंची, तो उस ने अपनी सुसराल की तमाम बुराइयां की और कहा, ‘‘शाहिद तो अपने अब्बा के ही कहने पर चलता है.

छोटीछोटी चीज के लिए अपने अब्बा के सामने हाथ फैलाता है. मैं ने जब उस से मोबाइल फोन खरीदने को कहा तो बोला कि अब्बा से बोलता हूं. जब  वे पैसे देंगे, तब मोबाइल फोन दिला दूंगा. कार के लिए कहा, तो बहाने बनाने लगा.’’ शायना की अम्मी बोलीं, ‘‘तू फिक्र मत कर. जब तक शाहिद और उस के अब्बू तेरी बात नहीं मानेंगे, मैं तुझे वहां नहीं भेजूंगी.’’ अगले दिन शाहिद ने शायना की अम्मी को फोन किया, ‘‘मैं शायना को लेने आ रहा हूं…’’ इस पर शायना की अम्मी बोलीं, ‘‘अपने अब्बा को साथ ले कर आना. जब तक वह सायना की बात नहीं मानेंगे, हम उसे नहीं भेजेंगे.

जब उन्हें फुरसत मिल जाए, तब दोनों साथ आना. हमारी बेटी की जिंदगी का मामला है. हमें  क्या पता था कि हमें तुम जैसे घटिया रिश्तेदार मिलेंगे.’’ शाहिद ने अपने अब्बा को बताया,  तो उन्हें बहुत बुरा लगा. उन्होंने भी फैसला कर लिया था कि वे उसे लेने वहां नहीं जाएंगे.

शाहिद ने अगले दिन फिर फोन किया और शायना से बात करने की कोशिश की, मगर शायना की अम्मी ने ऐसा नहीं होने दिया.  शायना की अम्मी को यह घमंड था कि ससुराल वालों को शायना जैसी खूबसूरत और पैसे वाली लड़की मिली है, वे जरूर हाथ जोड़ कर आएंगे और शायना की सारी बातें मानेंगे. इधर शाहिद के छोटे भाई की अचानक तबीयत खराब हो गई.

घर के सब लोग उस की फिक्र करने लगे, क्योंकि उस का कैंसर लास्ट स्टेज पर पहुंच गया था. वह कुछ हफ्ते का ही मेहमान था. शाहिद ने शायना से बात करने की कोशिश की, पर उस ने उस से बात नहीं की. शाहिद ने उस की अम्मी को बताया, ‘‘भाई की तबीयत बहुत खराब है.

मैं शायना को लेने आ रहा हूं. अब्बा के पास अभी टाइम नहीं है. वे बहुत ज्यादा परेशान हैं.’’ शायना की अम्मी ने साफ मना कर दिया, ‘‘हम तब तक शायना को नहीं भेजेंगे, जब तक तुम्हारे अब्बू नहीं आएंगे.’’ शाहिद यह सुन कर दंग रह गया, फिर भी वह हिम्मत कर के शायना को लेने अपनी सुसराल पहुंच ही गया.

उस ने शायना से बात करनी चाही, मगर उस की सास ने उसे बात करने से मना कर दिया और उसे शाहिद के साथ भी भेजने से इनकार कर दिया. शाहिद निराश हो कर खाली हाथ वहां से वापस आ गया. जब शाहिद के अम्मीअब्बू को इस बात का पता चला, तो उन्हें बहुत बुरा लगा.

इधर वह दिन भी आ गया, जब शाहिद का छोटा भाई यह दुनिया छोड़ कर चला गया, जिस से पूरे घर वालों  को काफी दुख हुआ. घर में मातम  पसर गया. इतना सबकुछ होने के बाद भी शायना के घर वालों को जब इस बात की खबर मिली, तो उन में से कोई भी इस गमगीन माहौल में शाहिद के घर वालों को दिलासा देने नहीं गया. वक्त गुजरता गया.

कुछ रिश्तेदारों ने शायना के अम्मीअब्बू को यह दिलासा दी थी कि शाहिद जरूर अपने अब्बा के साथ शायना को लेने आएगा. शायना की अम्मी ने भी उसे यह कह रखा था कि तुम अपनी जिद पर डटी रहना. अभी वह वक्त है, जब शौहर को अपने इशारों पर नचाया जा सकता है.

अगर तुम हिम्मत हार गई, तो जिंदगीभर उस के और उस के घर वालों के इशारों पर तुम्हें नाचना पड़ेगा. इस तरह उन दोनों के रिश्ते में दरार बढ़ती गई. वक्त तेजी से गुजर रहा था.

शायना को अकेलापन अब खाने को दौड़ रहा था, लेकिन अपनी मां की जिद की वजह से वह सही फैसला नहीं ले पा रही थी. उसे लग रहा था कि पता नहीं कब  तक यों अकेले जिंदगी बितानी पड़ेगी? क्या शाहिद उसे लेने वापस आएगा भी या नहीं? उधर शाहिद ने मुसलिम पर्सनल ला के तहत दूसरी शादी कर ली और अपनी जिंदगी खुशीखुशी गुजारने लगा.

जब शायना और उस के अम्मीअब्बू को शाहिद की दूसरी शादी का पता चला, तो उन के होश उड़ गए. उन्होंने सपने में भी यह नहीं सोचा था कि शाहिद ऐसा भी कर सकता है. गुस्से में आ कर उन्होंने शाहिद से फैसला करने के बजाय उस पर दहेज लेने के अलावा और भी कई केस कर दिए, पर इस से कोई हल नहीं निकला. केस चल रहा है.

शायना घर पर बैठी है. जब तक उस का तलाक या कोई और फैसला नहीं होता, उसे यों ही बिना निकाह के घर पर ही रहना पड़ रहा है. इस केस को एक साल हो गया है, पर अभी तक शायना के अम्मीअब्बू कोई रास्ता नहीं निकाल पाए हैं. उन्होंने अपनी जिद के चक्कर में शायना की जिंदगी बरबाद कर दी और उन दोनों के रिश्ते में एक ऐसी दरार डाल दी जो कभी नहीं भरी जा सकती.

शायना आज अपने घर पर एक जीतीजागती मूर्ति बन कर रह गई थी और सोच रही थी कि काश, मैं अपने घर को खुद ही संभाल कर चलती तो आज यह दिन न देखना पड़ता. उस की उम्र ढलने लगी, पर अब तक कोई फैसला नहीं हो पाया है.  शायना कर भी क्या सकती है, वह खुद एक जिंदा लाश बन कर रह गई है. उन के रिश्तों की इस दरार की वजह उस की मां और खुद शायना है. अगर वक्त रहते वह सही फैसला ले लेती, तो उसे आज यह दिन न देखना पड़ता. Hindi Family Story

Hindi Story: हम ने जिंदगी से यह तो नहीं मांगा था – बीए पास मजदूर

Hindi Story: ‘‘आप तो बीए पास हैं चचा, फिर मजदूरी क्यों करने लगे? कोई अच्छी सी नौकरी तलाशने की कोशिश क्यों नहीं की?’’ साथ में काम कर रहे एक नौजवान मजदूर के इस सवाल का बुजुर्ग हो रहे रघु ने कोई जवाब नहीं दिया.

छत की ढलाई के लिए लग रहे तख्ते की कील पर निशाना टिका कर जोर से हथौड़ा चलाते हुए रघु को लगा कि उस ने हथौड़ा कील पर नहीं, बल्कि खुद पर चला लिया हो. ऐसे सवाल उसे कील से चुभते थे.

बीए पास होने का अहम रघु के अंदर अपनी जवानी में आ गया था. पढ़लिख लेने के बाद तो वह लोगों को कुछ समझता ही नहीं था. इस अहम में उस ने अपने मांबाप को कभी यह नहीं कहा कि पढ़लिख कर अगर उसे कोई नौकरी मिली तो वह उन्हें कभी मजदूरी नहीं करने देगा, बल्कि उलटे उन के मजदूरी करने पर हमेशा उन्हें कोसता कि वह भूखा मर जाएगा, पर जिंदगी में कभी मजदूरी नहीं करेगा.

पढ़ालिखा होने के अहम में रघु ने कोई हुनर भी नहीं सीखा. शादी हो गई, बच्चे हो गए, फिर तो जिंदगी जीने के लिए कुछ न कुछ करना ही था. उसी अहम और मांबाप की नाराजगी की वजह से रघु की कोई नौकरी नहीं लगी और आखिर में जिंदगी गुजारने के लिए उसे भी मजदूरी करनी पड़ी.

‘‘देखो बेटा, बात ऐसी है कि जब जैसा तब तैसा, नहीं किया तो इनसान कैसा? अभी समय की यही मांग है कि मैं मजदूरी कर के अपने परिवार का पेट पालूं, तो वह मैं कर रहा हूं और तू अपने काम से काम रख,’’ रघु ने अभी भी अपने पढ़ेलिखे होने का सुबूत दार्शनिक बातों से दिया.

‘‘चचा, ननकू ने तो मैट्रिक कर ली है. अब उस को भी क्यों नहीं ले आते हो काम पर? सारा दिन घूमता रहता है.’’

‘‘अरे, उस को भी अहम ने घेर लिया है. कहता है कि परदेश जाएगा, हुनर सीखेगा. मेरी तरह मजदूरी नहीं करेगा. बिलकुल अपने बाप पर गया है,’’ गहरी सांस लेते हुए रघु ने कहा.

‘‘सही तो कहता है चचा, यहां मजदूरी करने में कोई इज्जत नहीं है. न काम का ठिकाना, न मजदूरी का. ऊपर से तुम ने इतना कर्जा ले लिया है कमेटी से ब्याज पर, हर हफ्ते किस्त देनी पड़ती है. उस को परदेश भेजो. वहां कुछ कमाएगा, तो आप का ही बोझ हलका होगा.’’

शाम को मिली मजदूरी ले कर रघु घर की ओर चला, तो ननकू रास्ते में ही दिख गया. बस, फिर क्या था. दिन में कील से चुभे सवालों की भड़ास गांव वालों के सामने ही ननकू पर निकाल दी.

नतीजतन, रात के 10 बज गए, पर ननकू घर नहीं आया. मां का दिल बैठा जाता था और धीरेधीरे रघु को भी घबराहट होने लगी. उस ने डर के मारे घर में बताया भी नहीं कि रास्ते में उस ने ननकू को डांटा था. रातभर मांबाप सोए नहीं.

चाहे जो भी हो जाए, देरसवेर ननकू घर जरूर आ जाया करता था, पर इस बार वह घर नहीं आया. सब परेशान. गांव के उस के दोस्तयारों से पता चला कि उस के कुछ दोस्त परदेश जाने वाले थे, रात में वह उन्हीं के साथ था.

मां का कलेजा धक से रह गया. पक्का वह चला गया अपने दोस्तों के साथ. रघु के अंदर मिलेजुले भाव उमड़घुमड़ रहे थे. थोड़ा डर था कि इतनी कम उम्र और गुस्से में परदेश चला गया. थोड़ी खुशी इसलिए थी कि कुछ कमाएगा तो घर के हालात थोड़े अच्छे होंगे.

ट्रेन के जनरल डब्बे में खिड़की की तरफ बैठा ननकू पौ फटने के साथ आ रही सूरज की रोशनी में नई उम्मीदें देख रहा था. अंदर से वह इतना खुश था मानो जैसे किसी जेल की कैद से रिहा हुआ हो. आज उस का अपना ही बापू दुनिया का सब से जालिम आदमी लग रहा था.

ट्रेन की तेज रफ्तार की तरह उस के सपने भी तेजी से बढ़े चले जा रहे थे. घर के हालात और बापू की किचकिच की वजह से वह हमेशा घर से भाग जाना चाहता था.

हिंदी फिल्मों की दुनिया में खोया रहने वाला ननकू हमेशा यही सोचता था कि घर से भागने के बाद वह तब तक घर वापस नहीं आएगा, जब तक कि बहुत बड़ा आदमी नहीं बन जाता.

बड़ा आदमी बनने के बाद अपनी बड़ी सी गाड़ी में शहर से गांव आएगा, अपने दरवाजे पर उतरेगा, जब बापू दौड़ कर उस के पास आएंगे तो वह उन्हें नजरअंदाज करते हुए मां के पास चला जाएगा. आज उसे ऐसा लग रहा था कि उस के सपने सच होने की ओर यह पहला कदम है.

इधर गांव में सुबहसुबह घर का माहौल एकदम गुमसुम था, कोई किसी से कुछ नहीं बोल रहा था. सब खामोशी से खुद ही खुद को तसल्ली दे रहे थे. सब यही कह रहे थे कि जहां भी जाए अच्छे से रहे. 4 बहनों के बाद पैदा हुआ ननकू घर का सब से छोटा था. धीरेधीरे समय के थपेड़ों ने ननकू के भाग जाने का दुख थोड़ा कम कर दिया था.

साल बीतने को था, पर ननकू गांव नहीं लौटा. रघु का कर्ज दिनबदिन वैसे ही बढ़ता चला गया, जैसे ननकू का घर लौट आने या घर के लिए कुछ पैसे भेज देने का इंतजार. दोस्तों के फोन से ननकू घर पर सब से बातें करता, पर रघु से नहीं. इच्छा दोनों बापबेटे की होती थी एकदूसरे से बात करने की, पर ननकू डर से नहीं करता था और रघु अहम से.

सालभर तो ननकू को काम सीखने में ही लग गया. इधर घर की हालत सुधर नहीं पा रही थी. रघु को गांव में कभी काम मिलता, कभी नहीं मिलता था. कर्ज का मूल तो वैसे का वैसा ही रहा, सूद दिनबदिन बढ़ता चला गया.

आखिर में रघु ने भी फैसला किया कि वह भी परदेश चला जाएगा, कम से कम वहां रोज काम और समय पर मजदूरी तो मिल जाएगी. गांव के कुछ लोग कमाने के लिए किसी और परदेश जा रहे थे, रघु भी उन्हीं के साथ हो लिया.

वहां जाते ही रघु को अच्छी पगार वाला काम मिल गया और इधर ननकू भी कुछ पैसे भेजने लगा, जिस से जिंदगी थोड़ीथोड़ी पटरी पर आने लगी.

इधर ननकू को उस परदेश की आबोहवा कभी रास नहीं आई. जो सपने वह ट्रेन में संजो कर लाया था, वे ट्रेन में ही कहीं छूट गए थे. यहां कभी उस की मासूमियत छूटी तो कभी बचपना, कभी उस की नींद छूटी तो कभी उस की थकान और जो सब से ज्यादा छूटी, वह थी भूख. अब वह 2-2 वक्त भूखा रह सकता था.

तकनीक की इस दौड़ में जहां अमीर परिवार के बच्चे मोबाइल फोन और लैपटौप की वजह से समय से पहले बड़े हो रहे हैं, वहीं ननकू जैसा किशोर जिंदगी की भागदौड़ वाली भीड़ की वजह से समय से पहले बड़ा हो गया.

एक बात ननकू की समझ में अच्छे से आ गई थी कि रातोंरात अमीर आदमी सिर्फ 2-3 घंटे की फिल्मों में ही बना जा सकता है, असल जिंदगी में नहीं. गुस्से में वह अपने दोस्तों के साथ परदेश आ तो गया था, पर यहां हर कदम पर पैसे चाहिए थे. इसी चिंता में उस की सेहत दिनबदिन बिगड़ती चली जा रही थी.

इधर कुछ दिनों से ननकू के पेट में अजीब सा दर्द शुरू हो गया था. इस सब के बावजूद दिनरात मेहनत कर उस ने खुद के लिए एक मोबाइल फोन लिया और घर जाने को ले कर पैसे जोड़ने लगा, पर पेट का दर्द उसे बेचैन कर जाता था और फिर एक दिन बेतहाशा दर्द उठा.

सब दोस्तों ने मिल कर किसी तरह ननकू को सरकारी अस्पताल में भरती करा दिया. आननफानन में सर्जरी हुई, पर ननकू को होश नहीं आया और 2 दिन बाद वह जिंदगी की जंग हार गया. डाक्टरों ने आननफानन में ननकू को डिस्चार्ज कर दिया मानो किसी अनहोनी को छिपाने की कोशिश की जा रही हो.

दोस्तों को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था कि अब वे क्या करें. कैसे गांव में खबर करें. ननकू का क्रियाकर्म यहीं कर दें या गांव ले जाएं और ले जाएं तो कैसे ले जाएं. फिर सोचविचार कर सब से पहले रघु को ननकू के ही मोबाइल से फोन किया.

ननकू का फोन आया देख रघु को समझ ही नहीं आया कि वह खुश हो या हमेशा की तरह गुस्सा करे. उस के हाथ थरथराने लगे, दिल तेज धड़कने लगा मानो जैसे रघु बेटा हो और ननकू उस का पिता हो. उस समय रघु ऐसा महसूस करने लगा कि फोन पर पिता के रूप में उसे ननकू से डांट पड़ने वाली है.

इतने में फोन कट गया. पिता होने के अहम में रघु सोच में पड़ गया कि वापस इधर से फोन लगाए या नहीं, तब तक दूसरी बार फोन बज उठा. बगैर एक पल गंवाए उस ने फोन उठा लिया और मिलेजुले भाव के साथ ‘हैलो’ कहा.

जब रघु को लगा कि दूसरी तरफ ननकू नहीं है, तो उस की घबराहट थोड़ी कम हो गई और फिर उस के अंदर जो भाव उभरे, उस बारे में उस ने सोचा ही नहीं था. पर जो खबर उस ने फोन पर सुनी, उस की तो उस ने कभी कल्पना भी नहीं की थी.

पत्थर तो रघु पहले से था, पर ऐसा लगा कि उस पत्थर को बर्फ की वादियों में कोई अकेला छोड़ आया हो. उस की आंखों से आंसू नहीं निकले मानो आंसू अपना रास्ता भूल कर आंख के बदले खून की नसों में चले गए हों और वहां पर खून के साथ लड़ाई कर पूरे शरीर में एक भूचाल सा ला दिया हो, जो उस के बदन में थरथराहट पैदा कर रहा था.

‘‘उसे ले कर गांव आ जाओ. पैसे मैं भेज देता हूं,’’ इतना कह कर रघु ने फोन काट दिया.

गांव में ऐसा माहौल था मानो जैसे कोई जलजला आ गया हो. ननकू के दुनिया से चले जाने की खबर आसपास के गांवों में आग की तरह फैल गई. सारे नातेरिश्तेदार भी घर पर जमा होने लगे, पर अभागा रघु कैसे आए, सौ लोग सौ मशवरे जारी थे.

इधर रघु जल बिन मछली जैसे छटपटा रहा था मानो कोई जादू की छड़ी मिल जाए, जिस के सहारे वह झट से अपने लाल के पास पहुंच जाए. उस की पिछले 6 महीने की कमाई एंबुलैंस के किराए में चंद मिनटों में पहले ही खत्म हो चुकी थी. अमीर लोगों के लिए तो सब मुमकिन है, पर गरीब के जिंदगीरूपी शब्दकोश में कुछ शब्द नहीं होते हैं, ‘मुमकिन’ शब्द उसी में से एक है.

मीलों दूर इस परदेश से अपने गांव समय पर पहुंचना रघु के लिए कहां मुमकिन था. ऐसे में उस के साथ काम करने वाले लोगों ने उस की मदद की और उसे हवाईजहाज से गांव भेजने का इंतजाम कर दिया. उसी हवाईजहाज में सफर कर रहे एक सहयात्री को ढूंढ़ उस से मदद के लिए बोल कर रघु को हवाईअड्डे के अंदर भेज दिया गया.

जिंदगी में पहली बार रघु का पढ़ालिखा होना उस के काम आया. हवाईजहाज के 2 घंटे के सफर में आसमान की ऊंचाइयों के बीच रघु को अपनी जिंदगी की सारी गलतियां घड़ी की सूई की तरह घूमती दिखाई देने लगीं. ननकू के इन हालात के लिए वह खुद को जिम्मेदार मानने लगा.

विद्यार्थी जीवन के कुछ भूलेबिसरे सपने भी याद आने लगे, जिन में से हवाईजहाज पर चढ़ना भी एक था…

हवाईजहाज की तेज आवाज के बीच रघु खुशी और गम में फर्क नहीं कर पा रहा था. ऐसा लग रहा था कि सारे फर्क मिट गए हों. लोग अपनी चाहत को पाने के लिए क्या कुछ नहीं करते, लेकिन कभी सब दांव पर लगा कर भी कुछ मिले तो लगता है कि हम ने जिंदगी से यह तो नहीं मांगा था. रघु ननकू का शव आने से पहले ही गांव पहुंच गया था.

ननकू का बड़ी गाड़ी से गांव आना और रघु का हवाईजहाज पर चढ़ना… दोनों के सपने पूरे हो गए, पर इस कीमत पर पूरे होंगे, ऐसा उस ने कभी नहीं सोचा था. अधूरे सपने तो अधूरे रह ही गए. जवान बेटे की लाश देखने की हिम्मत रघु के अंदर नहीं थी. Hindi Story

Hindi Family Story: स्वाभिमान – पूजा के सपनों का राजकुमार

Hindi Family Story: 12वीं पास कर के पूजा ने कालेज में दाखिला लिया था. ट्यूशन पढ़ा कर वह अपनी फीस और कालेज के दूसरे खर्चे पूरे कर लेती थी और अपनी पढ़ाई के लिए भी समय निकाल लेती थी.

घर में कुल 6 लोगों का परिवार एक कमरे में रहता था. सब के तौलिएसाबुन एक ही थे. घर में दोनों समय भोजन मिलता था. नाश्ता सिर्फ रात की बची रोटी होती थी.

ऐसे में कभीकभार पूजा के चाचाचाची के आने पर उन के घर का माहौल किसी त्योहार से कम नहीं होता था. उन दिनों में परांठों की खुशबू, मिठाई के डब्बे और गरम चाय और पकौड़े घर के रूटीन को भंग करते थे. कभीकभी सारा परिवार चाचाचाची के साथ घूमनेफिरने या सिनेमा देखने भी चला जाता था.

पूजा की चाची का मायका इसी शहर में ही था, इसलिए चाची आतीजाती रहती थीं. वे बहुत अमीर कारोबारी की बेटी थीं और पूजा के चाचा का ब्याह चाची से इसीलिए हुआ था, क्योंकि चाचा का चयन एक पीसीएस के पद पर हो गया था.

पूजा भी अपने चाचा की तरह सरकारी अफसर बन कर अपने घर का कायाकल्प करना चाहती थी. अब उस की साधना पूरी होने का समय आ रहा था. वह बीए के आखिरी साल के इम्तिहान दे चुकी थी और प्रशासनिक सेवा की तैयारी कर रही थी.

इसी बीच चाची आई थीं और वे बहुत चिंतित दिख रही थीं. वजह, उन के मायके में ब्याह की तैयारी चल रही थी. उन का भतीजा अमेरिका से भारत लड़की देखने आ रहा था और उन के मायके का पुराना कुक अपने गांव चला गया था. अब उस परिवार को एक कुशल रसोइए की जरूरत थी, जो घर वालों के लिए उन की पसंद का खाना बना सके, साथ ही भरोसेमंद भी हो.

चाची ने पूजा की मां से कहा, ‘‘दीदी, पूजा को मेरे साथ भेज दो. पूजा अपने इम्तिहान की तैयारी वहां भी कर सकती है. कुछ दिनों की बात है. इस बीच जो भी रसोइया आएगा, उसे पूजा अपनी देखरेख में उस घर के हिसाब से ट्रेंड कर देगी.’’

पूजा की मां चाची को मना नहीं कर सकीं.

पूजा भी मन ही मन खुश हो गई कि कम से कम कुछ दिन के लिए उसे एक अलग कमरा मिल सकेगा, तो शायद वह देर रात तक जाग कर पढ़ सकती है. यहां तो सब की निगाहें टिकी रहती हैं कि कब लाइट बंद हो तो वे गहरी नींद में सो सकें.

पूजा चाची के साथ उन के मायके चल दी. रास्ते में चाची ने उसे कुछ कपड़े दिला दिए और घर का रूटीन और घर वालों की खानेपीने की पसंदनापसंद भी बता दी.

चाची का मायका किसी राजसी हवेली से कम ना था. पूजा को लगा कि उस के पूरे महल्ले जितना बड़ा तो उन का गार्डन ही था.

गरीब घर की लड़कियां खाना बनाना तो ऐसे सीख जाती हैं, जैसे चिडि़या के बच्चे उड़ना. पूजा ने खुशीखुशी किचन संभाल ली और जो रैसिपी उस ने कभी किताबों में पढ़ी थीं, उन्हें एकएक कर आजमाने लगी. 3 दिन में ही वह घर के सभी लोगों की पसंद से वाकिफ हो गई और इज्जत से बात करने के चलते नौकरों की फौज की भी चहेती बन गई.

आज रविवार था. सभी लोग आलोक को लेने एयरपोर्ट गए थे और घर में पूजा सब के लिए दोपहर का खाना बना रही थी, जिस में आलोक की पसंद के सब व्यंजन शामिल थे.

इतने में घंटी बजी और पूजा ने दरवाजे पर एक बहुत ही हैंडसम लड़के को देखा. उस नौजवान को वह नहीं पहचानती थी और लड़के ने भी खुद के घर में एक अजनबी लड़की को अपना परिचय देना ठीक नहीं समझा. पुराने माली को उस ने इशारे से कुछ भी बोलने के लिए मना कर दिया, जो पूजा को उस का परिचय देना चाह रहा था.

उस नौजवान को बाहर की बैठक में बैठने को कह कर पूजा अपने काम में बिजी हो गई. हां, उस ने मेहमान को चाय और नाश्ता भेज दिया था.

वह नौजवान आलोक था, जिसे इस खेल में मजा आने लगा था और उस ने सोचा कि इस सस्पैंस को बरकरार रखने में ज्यादा मजा है. घर वाले जब उसे यहां देखेंगे, तो वह एक अलग खुशी होगी. जो एयरपोर्ट से फ्लाइट कैंसिल हो जाने से उस के न आ पाने से दुखी हो कर लौट रहे होंगे.

हुआ भी बिलकुल वैसा ही. सब लोग आलोक को घर पर देख कर खुशी से झूम उठे, लेकिन चाची ने अकेले में पूजा की अच्छी खबर ली कि वह कितनी बेवकूफ है, जो घर के राजकुमार को पहचान नहीं सकी. वैसे, आलोक के फोटो जगहजगह लगे थे, पर शायद पूजा ने ही कभी गौर नहीं किया था.

अगले दिन आलोक को चाय देने गई पूजा ने अपनी कल की गलती

की माफी मांगी और फिर आलोक के पूछने पर उस ने अपना एक छोटा सा परिचय दिया.

उस के बाद पूजा ने गौर किया कि घर में किसी बात पर बड़ी संजीदगी से कोई चर्चा चल रही है. घर के सारे बड़े एक कमरे में शाम से जमे हुए थे.

देर रात चाची पूजा के कमरे में आईं. पूजा पढ़ रही थी. चाची बोलीं, ‘‘पूजा, आलोक ने तुझे पसंद किया है. वह तुझ से ब्याह कर के तुझे अमेरिका ले जाना चाहता है.’’

पूजा इम्तिहान के बीच में ऐसी किसी बात के लिए सोच भी नहीं सकती थी. आलोक जैसे अमीर लड़के को जीवनसाथी के रूप में देखना तो उस ने सपने में भी नहीं सोचा था.

चाची बोले ही चली जा रही थीं कि अगले शनिवार को वे लोग सगाई करना चाहते हैं. दीदी और भाई साहब को तेरे चाचाजी ने बता दिया है. और भी बहुतकुछ चाची ने बोला, पर पूजा कुछ सुन कर भी सुन नहीं पा रही थी. उस का दिमाग शून्य हो गया था.

तय कार्यक्रम के मुताबिक उन सब लोगों को पूजा के घर आना था और वहीं एक छोटे से समारोह में सगाई कर के वे पूजा को अपने साथ ले जाने वाले थे. बाद में मुंबई में धूमधाम से शादी और 20 दिन में पासपोर्टवीजा के साथ पूजा का आलोक के साथ अमेरिका जाना तय हुआ था.

सबकुछ परीकथा जैसा था. सखियां पूजा से जल रही थीं. पड़ोसी मन में कुढ़ रहे थे, पर सामने से बधाई देते नहीं थक रहे थे.

शाम 5 बजे तक उन्हें आना था, पर धीरेधीरे 9 बज गए और वे लोग पहुंचे ही नहीं. अब पूजा के पिताजी को चिंता होने लगी. फिर चाचा ने चाची को फोन किया तो पता चला कि वे लोग एक होटल में ठहरे हुए हैं. इस संकरी गली में फैली गंदगी को देख कर लौट गए हैं. अब वे लोग चाहते हैं कि पूजा का परिवार होटल में आ जाए, ताकि सगाई समारोह वहीं हो जाए.

पूजा के पिता कुछ दुखी हुए, फिर पूजा और उस की मां को बताने आए. सब सुन कर पूजा ने एक फैसला किया कि वह इस रिश्ते के लिए रजामंद नहीं है. जो इनसान पूजा के घर एक घंटे भी नहीं रुक सकता, वह उस इनसान के घर सारी जिंदगी कैसे रह सकती है. उसे समझते देर न लगी कि यह कोई रिश्ता नहीं हो रहा, बल्कि उसे उस के ही घर से अलग करने की साजिश है.

पूजा ने एक स्वाभिमानी की तरह इस रिश्ते के लिए न बोला और कपड़े बदल कर सब भाईबहनों को खाना परोसा. बेचारे बच्चे इतने स्वादिष्ठ भोजन को खाने के लिए कब से उतावले थे और पूजा मन ही मन सोच रही थी कि इस रिश्ते को ठुकरा कर उस ने अपना और अपने पिता का स्वाभिमान बचा लिया. Hindi Family Story

Best Hindi Kahani: उस रात का सच – जब महेंद्र का हुआ तबादला

Best Hindi Kahani: महेंद्र को यकीन था कि हरिद्वार थाने में वह ज्यादा दिनों तक थानेदार के पद पर नहीं रहेगा, इसीलिए नोएडा के थाने में तबादला होते ही उस ने अपना बोरियाबिस्तर बांधा और रेलवे स्टेशन चला आया.

रेल चलते ही हरिद्वार में गुजारे समय की यादें महेंद्र के सामने एक फिल्म की तरह गुजरने लगीं.

दरअसल हुआ ऐसा था कि महेंद्र ने रुड़की थाने में रहते हुए वहां के एक साधु द्वारा वहीं के लोकल नेताओं को लड़कियों के साथ मौजमस्ती कराते रंगे हाथों पकड़ा था.

यकीन मानिए, उन नेताओं को थाने में लाए उसे 10 मिनट भी नहीं हुए थे कि डीएसपी साहब का फोन आ गया कि फलांफलां नेता को फौरन रिहा कर दो.

महेंद्र बड़े अफसर का आदेश मानने को मजबूर था, इसलिए उसे उन नेताओं को फौरन रिहा करना पड़ा.

चूंकि वे नेता सत्ताधारी दल से जुड़े थे, इसलिए उन्होंने महेंद्र का तबादला हरिद्वार थाने में करा दिया.

हरिद्वार थाने में कुछ दिन महेंद्र चुपचाप बैठा अपना काम करता रहा, लेकिन जब एक दिन थाने में बैठ कर वह पुरानी फाइलें देख रहा था, तभी एक फाइल पर जा कर उस की नजर रुक गई.

महेंद्र ने फाइल में दर्ज रिपोर्ट पढ़ी. उस रिपोर्ट में लिखा था, ‘गंगाघाट आश्रम में रहने वाली गंगाबाई आश्रम की तिजोरी से 10 हजार रुपए चुरा कर भागी.’

उसी फाइल के अगले पेज पर उस आश्रम के महंत और उस के एक शिष्य का बयान था.

‘उस रात हम दोनों साधना करने के लिए पास की पहाड़ी पर बने मंदिर में गए थे. चूंकि इस बात की जानकारी गंगाबाई को थी, इसी बात का फायदा उठा कर उस ने हमारे कमरे से तिजोरी की चाबी चुराई और उस में रखे 10 हजार रुपए चुरा कर भाग गई. आश्रम से एक रजाई भी गायब है.’

महेंद्र ने जब यह रिपोर्ट पढ़ी, तो उसे इस में कुछ गोलमाल लगा. उस ने तभी सबइंस्पैक्टर राकेश को बुलाया और उस से पूछा,  ‘‘राकेश, गंगाघाट आश्रम में हुई चोरी की तहकीकात क्यों नहीं की गई?’’

राकेश ने जवाब दिया,  ‘‘सर, थानेदार साहब ने मु झ से कहा था कि आश्रम का महंत इस मामले की जांच की तहकीकात में मदद नहीं कर रहा है, इसलिए मामला इसे ऐसे ही पड़ा रहने दो.’’

राकेश के जाने के बाद महेंद्र को लगा कि हो न हो, इस मामले में कुछ राज जरूर है, जो महंत छिपा रहा है.

इस के बाद महेंद्र ने आश्रम पर पैनी नजर रखनी शुरू कर दी.

एक दिन शाम को महेंद्र गंगाघाट आश्रम के सामने वाले होटल में बैठा था. उस की नजर आश्रम के गेट पर थी. उस ने देखा कि कुछ औरतें आश्रम के अंदर गई हैं और तकरीबन एक घंटे बाद बाहर निकलीं.

यह देख कर महेंद्र सोच में पड़ गया कि ये औरतें इतनी देर तक आश्रम में क्या कर रही थीं?

जैसे ही वे औरतें आश्रम से

बाहर निकल कर होटल के पास आईं, तभी महेंद्र ने उन में से

एक औरत से पूछा,  ‘‘बहनजी, क्या आश्रम में बहुत से मंदिर हैं, जो दर्शन करने के लिए बहुत देर लगती है?’’

वह औरत हंसी और बोली,  ‘‘भैया, आश्रम में तो एक भी मंदिर नहीं है. हम तो महंतजी के पास गई थीं. वे  लाइलाज बीमारियों का इलाज भी मुफ्त में करते हैं.’’

महेंद्र ने आगे पूछा,  ‘‘बहनजी, आप इन महंतजी के आश्रम में कब से आ रही हैं?’’

वह औरत बोली,  ‘‘आज तो मैं दूसरी बार ही आई हूं, लेकिन महंतजी कहते हैं कि तुम्हारी बीमारी गंभीर है. तुम्हें ठीक होने में 4-5 महीने तो लग ही जाएंगे,’’ इतना कह कर वह औरत चली गई.

एक दिन शाम को महेंद्र ने एक पुलिस वाले को उस आश्रम के बाहर बैठा दिया और उस से कहा, ‘‘कोई औरत अंदर से बाहर आए, तो उसे ले कर तुम मेरे पास आना.’’

उस दिन रात के 8 बजे वह पुलिस वाला एक 30-32 साला औरत को ले कर महेंद्र के घर आया. महेंद्र ने उसे बैठने के लिए कहा.

‘‘क्या आप आश्रम में नौकरी करती हैं?’’ महेंद्र ने पूछा.

‘‘नहीं सर. दरअसल, मेरी शादी हुए तकरीबन 7 साल हो गए हैं और अभी तक मेरी गोद नहीं भरी है. मेरे महल्ले की एक औरत ने मु झे बताया था कि तू गंगाघाट आश्रम के महंत के पास जा. कुछ ही दिनों में तेरी गोद भर जाएगी, इसलिए आज मैं पहली बार वहां गई थी.’’

महेंद्र ने उस से यह जानकारी ली और उसे इस तसदीक के साथ जाने के लिए कहा, ‘‘मैं ने तुम से जो जानकारी ली है, यह बात तुम किसी को मत बताना.’’

उन दोनों औरतों से मिली जानकारी संकेत दे रही थी कि हो न हो, उस आश्रम में कोई  ‘अपराध का अड्डा’ जरूर चल रहा है. सो, महेंद्र ने गंगाघाट आश्रम में हुई चोरी की घटना की तहकीकात जोरशोर से शुरू कर दी.

एक बार जब महेंद्र इसी सिलसिले में महंत से मिलने आश्रम गया, तो उस ने उसे इस मामले पर हाथ ही नहीं रखने दिया और बोला,  ‘‘जाने भी दीजिए. 10 हजार रुपए कोई बड़ी बात नहीं है. आप तो चाय पीजिए.’’

उस की होशियारी देख महेंद्र के मन में शक और भी गहरा गया.

एक दिन रात को जब महेंद्र गश्त के लिए निकला तो देखा कि वह महंत अपने शिष्य के साथ पहाड़ी पर जा रहा था. उस के पहाड़ी पर जाते ही महेंद्र गंगाघाट आश्रम के अंदर पहुंचा. वहां उसे भोलाराम नाम का एक आदमी मिला.

‘‘तुम यहां क्या करते हो? ’’ महेंद्र ने पूछा.

‘‘सर, आप मु झे इस आश्रम

का मैनेजर भी कह सकते हैं और चौकीदार भी.

‘‘सच तो यह है कि यहां का सारा काम मैं ही संभालता हूं. अब मेरी उम्र 70 पार हो चली है, इसलिए समय काटने के लिए मैं यहां रहता हूं. मैं ईमानदार आदमी हूं, इसलिए महंत ने मु झे अपने पास रखा है,’’ उस आदमी ने बताया.

‘‘तुम ईमानदार हो और सच्चे भी लगते हो. अच्छा, यह बताओ कि तुम्हारे आश्रम में रहने वाली गंगाबाई कैसी औरती थी? क्या वाकई वह चोरी कर सकती है?’’ महेंद्र ने पूछा.

वह आदमी बोला,  ‘‘सर, मैं आप से  झूठ नहीं बोलूंगा. दरअसल, गंगाबाई इस आश्रम में  झाड़ूपोंछा लगाने का काम करती थी.

‘‘जब मैं नयानया इस आश्रम में आया था, तब गंगाबाई ने ही मु झे बताया था कि महंतजी का नित्यक्रम एकदम पक्का है. वे सुबह मु झ से एक गिलास दूध मंगवाते हैं, फिर उस में अपने पास रखे काजूबादाम और दूसरे मेवे मिलाते हैं और उसी का सेवन करते हैं. फिर दोपहर में केवल 2 रोटी खाते हैं. इसी तरह शाम को भी उन का यही नित्यक्रम रहता है.

‘‘उस दिन उस की यह बात सुन कर मु झे हंसी आ गई थी. तब गंगाबाई ने मु झ से पूछा भी था,  ‘भोला भैया, तुम्हें हंसी क्यों आई?’

‘‘सर, मु झे हंसी इसलिए आई

थी कि उस की बात सुन कर मैं

सोच में पड़ गया था कि एक दिन में 2-2 गिलास मेवे वाला दूध पी

कर यह महंत उसे हजम कैसे करता होगा? क्योंकि वह अपने कमरे से कभीकभार ही बाहर जाता है.

‘‘सर, गंगाबाई का पति इसी आश्रम में रहता था. मेरे यहां आने से पहले आश्रम का सारा काम वही देखता था. कुछ दिनों से मैं ने उस में एक बरताव देखा था कि वह रोजाना रात को शराब पी कर आश्रम में आने लगा था. तब मेरे मन में सवाल भी उठा था कि उस के पास शराब पीने के लिए पैसे कहां से आते हैं?

‘‘एक दिन मु झ से रहा नहीं गया और मैं ने गंगाबाई से पूछ ही लिया,  ‘तुम रोजाना अपने पति को शराब पीने के लिए पैसे क्यों देती हो?’

‘‘तब वह बोली थी,  ‘भोला भैया, मेरे पति को शराब पीने के लिए पैसे मैं नहीं देती हूं, बल्कि खुद महंतजी ही देते हैं.’’’

उस दिन उस आदमी के मुंह से ऐसी बातें सुन कर महेंद्र भी दंग रह गया था.

उस आदमी ने आगे बताया, ‘‘एक दिन जब रात को गंगाबाई का पति शराब पी कर आया, तब महंतजी ने उस की पिटाई की थी और आश्रम के गेट से उसे बाहर धकेलते हुए कहा था,  ‘तू रोज शराब पी कर आश्रम के नियमों को तोड़ता है. अब तू यहां नहीं रह सकेगा. आज के बाद तू मु झे कभी अपना मुंह मत दिखाना.’

‘‘सर, उस रात उस का पति जो इस आश्रम से गया, तो आज तक उस का पता नहीं चला कि वह कहां है? जिंदा भी है या नहीं?

‘‘गंगाबाई भी अपने पति के साथ  जाना चाहती थी, लेकिन उसी दिन महंत का एक शिष्य आश्रम में आया और उस ने महंतजी को कह कर उसे आश्रम से नहीं जाने दिया. महंत और उस का शिष्य रोजाना मेवे वाला दूध गंगाबाई के हाथों से पीते रहे.

‘‘एक दिन महंतजी ने मु झ से कहा,  ‘कुछ दिन तुम ऋषिकेश वाले आश्रम में जा कर रहो और वहां का इंतजाम देखो.’

‘‘सर, समय कब रुका है, जो रुकता. मैं एक महीने बाद दोबारा इस आश्रम में आ गया.

‘‘एक दिन सुबहसवेरे गंगाबाई अपने कमरे से बाहर निकली और बाथरूम में जा कर उलटियां करने लगी. जब उस की इस हरकत पर महंतजी और उन के शिष्य की नजर पड़ी, तब शिष्य बोला,  ‘गुरुजी, कुछ गड़बड़ लगती है. गंगा सुबह से कई बार उलटियां कर चुकी है. मु झे लगता है कि वह पेट से हो गई है.’

‘‘शिष्य के मुंह से ऐसी बात सुनते ही महंत के माथे पर पसीना आ गया. वे बोले, ‘जैसेजैसे इस का पेट बढ़ता जाएगा, अपने पाप का घड़ा लोगों के सामने आने लगेगा. फिर जो लोग हमें साधुसंन्यासी मान कर पूजते हैं, वे ही हमारा मुंह काला कर के सरेबाजार घुमाएंगे.’

‘‘सर, उस रात का सच आप को बता रहा हूं. वह अमावस की काली रात थी. रात को गंगाबाई उन्हें दूध देने उन के कमरे में गई, तभी उन्होंने उस के मुंह में कपड़ा ठूंसा, फिर गला दबा कर उस की हत्या कर दी. रात के अंधेरे में  महंत के शिष्य ने उस की लाश एक रजाई में लपेटी और उसे गंगा में बहा आया.

‘‘उस के बाद उन दोनों ने तिजोरी से रुपए निकाल कर उसे खुला छोड़ दिया, ताकि लगे कि यहां चोरी की वारदात हुई है.

‘‘सर, उस रात हुई हत्या और चोरी के बहुत से सुबूत मैं ने अपने पास महफूज रखे हैं. मेरी भी यही इच्छा थी कि साधु के रूप में छिपे इन अपराधी भेडि़यों को मैं सलाखों के पीछे देखूं, लेकिन जब आप के पहले के थानेदार ने इस केस में दिलचस्पी नहीं दिखाई, इसलिए मैं उन के सामने इन सुबूतों को नहीं लाया. अब मैं इस मामले से जुड़े सारे सुबूत आप को सौंप दूंगा.’’

‘‘अच्छा भोला भैया, यह बताओ कि यहां शाम ढले रोजाना कुछ औरतें लाइलाज बीमारी के इलाज के लिए आती हैं, कुछ गोद भर जाने की चाह में. इस का क्या राज है?’’ महेंद्र ने धीरे से पूछा.

भोला बोला,  ‘‘सर, यह महंत और उस का शिष्य भोलीभाली औरतों को उन की लाइलाज बीमारी को मुफ्त में ठीक करने के बहाने यहां बुलाते हैं. तकरीबन 2 महीने तक जड़ीबूटियों के नाम पर पहाड़ी पर लगे पेड़ों की डालियों को पीस कर उन्हें दूध में पिलाया जाता है और जब वे औरतें इस महंत पर पूरा विश्वास करने लगती हैं, तब बारीबारी से, एकएक को दूध में  नशे की गोलियां मिला कर बेहोश किया जाता है और फिर ये उन के जिस्म के साथ अपनी हवस पूरी करते हैं.’’

‘‘लेकिन, आश्रम में गोद भरने वाली ये औरतें किस आस पर आती हैं?’’ महेंद्र ने भोला से पूछा.

‘‘सर, यह महंत ऐसी हवा अपने बारे में फैलाता है कि गंगाघाट के आश्रम के महंत को सिद्धि प्राप्त हुई है और उन के आशीर्वाद से बां झ औरतों को भी बच्चे हो जाते हैं.

‘‘हमारा यह महंत गोद भरने की चाह रखने वाली औरतों को रात को आश्रम में बुलाता है, उन को 2-4 बार पूजापाठ और हवनों में बैठाता है, फिर एक  फल हाथ में दे कर उस के कान में धीरे से कहता है कि जब हम आदेश करें, तब इसे अपने मुंह में रखना. देखना, तुम्हारी गोद जल्दी ही भर जाएगी.

‘‘फिर उस औरत को महंत के कमरे के पास वाले अंधियारे कमरे में जाने के लिए कहा जाता है. वहां पहुंचते ही महंत का शिष्य उस औरत के कान में धीरे से कहता है, ‘आज तुम्हारी गोद भरने का  शुभ दिन है. देखना, आज चमत्कार होगा और महंतजी की कृपा से तुम्हारी गोद भर जाएगी. तुम इस फल को आंख बंद कर के खाती रहो.

‘‘जब वह औरत बिना कपड़ों में चमत्कार होने की राह देख रही होती है, तभी कभी यह महंत, तो कभी उस का शिष्य उस को उस अंधियारे कमरे में शिकार बनाते हैं. आखिर मेवे वाला दूध कभी तो अपना असर दिखाएगा ही न?

‘‘अपनी लुटी इज्जत को ढकने के चक्कर में ऐसी औरतें इन पाखंडियों की करतूत किसी को नहीं बतातीं, इसलिए इन की यह दुकानदारी चलती रहती है.’’

‘‘अगर मैं महंत के खिलाफ कोई कार्यवाही करूं, तो क्या तुम गवाही दोगे?’’ महेंद्र ने भोलाराम से पूछा.

‘‘सर, मैं यह सब लिख कर भी देने को तैयार हूं,’’ भोलाराम ने पूरे जोश के साथ कहा.

भोलाराम के बयान और उस के द्वारा दिए गए सुबूतों के आधार पर महेंद्र ने अगले ही दिन महंत और उस के शिष्य को गिरफ्तार कर लिया.

महंत और उस के शिष्य को गिरफ्तार हुए 2 घंटे भी नहीं हुए थे कि महेंद्र को आईजी और डीएसपी से संदेश मिलने शुरू हो गए कि उस महंत को तत्काल रिहा करो और उस के खिलाफ जो सुबूत हैं, उन्हें जला कर नष्ट कर दो.

जब महेंद्र ने आईजी साहब से कहा,  ‘‘सर, उस महंत के खिलफ मेरे पास पुख्ता सुबूत हैं.’’

तब आईजी बोले, ‘‘मिस्टर महेंद्र, मेरी बात सम झने की कोशिश करो. उस महंत का प्रभाव इतना ज्यादा है कि हम पर भी ऊपर से लगातार दबाव आ रहा है.’’

महेंद्र ने आईजी साहब से कहा,  ‘‘सर, मैं उन्हें रिहा नहीं कर सकता.’’

तब वे बोले, ‘‘फिर तुम मेरा यह और्डर भी सुन लो, तुम्हारा तबादला  नोएडा थाने में किया जाता है. तुम तत्काल नोएडा थाने में जा कर मु झे सूचना दो.’’

रेल एकदम से रुक गई. मालूम करने पर पता चला कि किसी ने चेन खींची थी. रेल के रुकते ही इंस्पैक्टर महेंद्र यादों के साए से बाहर निकला. तब भी उस के मन में यह एकदम पक्का था कि वह किसी भी थाने में क्यों न रहे, उस के काम करने का तरीका यही रहेगा, चाहे फिर तबादले कितने ही क्यों न होते रहें. Best Hindi Kahani

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