मैली लाल डोरी : दास्तान अपर्णा की

रविवार होने के कारण अपर्णा सुबह की चाय का न्यूज पेपर के साथ आनंद लेने के लिए बालकनी में पड़ी आराम कुरसी पर आ कर बैठी ही थी कि उस का मोबाइल बज उठा. उस के देवर अरुण का फोन था.

‘‘भाभी, भैया बहुत बीमार हैं. प्लीज, आ कर मिल जाइए,’’ और फोन

कट गया.

फोन पर देवर अरुण की आवाज सुनते ही उस के तनबदन में आग लग गई. न्यूजपेपर और चाय भूल कर वह बड़बड़ाने लगी, ‘आज जिंदगी के 50 साल बीतने को आए, पर यह आदमी चैन से नहीं रहने देगा. कल मरता है तो आज मर जाए. जब आज से 20 साल पहले मेरी जरूरत नहीं थी तो आज क्यों जरूरत आन पड़ी.’ उसे अकेले बड़बड़ाते देख कर मां जमुनादेवी उस के निकट आईं और बोलीं, ‘‘अकेले क्या बड़बड़ाए जा रही है. क्या हो गया? किस का फोन था?’’

‘‘मां, आज से 20 साल पहले मैं नितिन से सारे नातेरिश्ते तोड़ कर यहां तबादला करवा कर आ गई थी और मैं ने फिर कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा. तब से ले कर आज तक न उन्होंने मेरी खबर ली और न मैं ने उन की. तो, अब क्यों मुझे याद किया जा रहा है?

‘‘मां, आज उन के गुरुजी और दोस्त कहां गए जो उन्हें मेरी याद आ रही है. अस्पताल में अकेले क्या कर रहे हैं. आश्रम वाले कहां चले गए,’’ बोलतेबोलते अपर्णा इतनी विचलित हो उठी कि उस का बीपी बढ़ गया. मां ने दवा दे कर उसे बिस्तर पर लिटा दिया.

50 वर्ष पूर्व जब नितिन से उस का विवाह हुआ तो वह बहुत खुश थी. उस की ससुराल साहित्य के क्षेत्र में अच्छाखासा नाम रखती थी. वह अपने परिवार में सब से छोटी लाड़ली और साहित्यप्रेमी थी. उसे लगा था कि साहित्यप्रेमी और सुशिक्षित परिवार में रह कर वह भी अपने साहित्यज्ञान में वृद्धि कर सकेगी. परंतु, वह विवाह हो कर जब आई तो उसे मायके और ससुराल के वातावरण में बहुत अंतर लगा.

ससुराल में केवल ससुरजी को साहित्य से लगाव था, दूसरे सदस्यों का तो साहित्य से कोई लेनादेना ही नहीं था. इस के अलावा मायके में जहां कोई ऊंची आवाज में बात तक नहीं करता था वहीं यहां घर का हर सदस्य क्रोधी था. ससुरजी अपने लेखन व यात्राओं में इतने व्यस्त रहते कि उन्हें घरपरिवार के बारे में अधिक पता ही नहीं रहता था. सास अल्पशिक्षित, घरेलू महिला थीं. वे अपने शौक, फैशन व किटी पार्टीज में व्यस्त रहतीं. घर नौकरों के भरोसे चलता. हर कोई अपनी जिंदगी मनमाने ढंग से जी रहा था. सभी भयंकर क्रोधी और परस्पर एकदूसरे पर चीखतेचिल्लाते रहते. इन 2 दिनों में ही नितिन को ही वह कई बार क्रोधित होते देख चुकी थी. यहां का वातावरण देख कर उसे डर लगने लगा था.

सुहागरात को जब नितिन कमरे में आए तो वह दबीसहमी सी कमरे में बैठी थी. नितिन उसे देख कर बोले, ‘क्या हुआ, ऐसे क्यों बैठी हो?’

‘कुछ नहीं, ऐसे ही,’ उस ने दबे स्वर में धीरे से कहा.

‘तो इतनी घबराई हुई क्यों हो?’

‘नहीं…वो… मुझे आप से डर लगता है,’ अपर्णा ने घबरा कर कहा.

‘अरे, डरने की क्या बात है,’ कह कर जब नितिन ने उसे अपने गले से लगा लिया तो वह अपना सब डर भूल गई.

विवाह को कुछ ही दिन हुए थे कि एक दिन डाकिया एक पीला लिफाफा लैटरबौक्स में डाल गया. जब नितिन ने खोल कर देखा तो उस में केंद्रीय विद्यालय में अपर्णा की नियुक्ति का आदेश था जिस के लिए उस ने विवाह से पूर्व आवेदन किया था. खैर, समस्त परिवार की सहमति से अपर्णा ने नौकरी जौइन कर ली. घर और बाहर दोनों संभालने में तकलीफ तो उठानी पड़ती, परंतु वह खुश थी कि उस का अपना कुछ वजूद तो है.

तनख्वाह मिलते ही नितिन ने उस का एटीएम कार्ड और चैकबुक यह कहते हुए ले लिया कि ‘मैं पैसे का मैनेजमैंट बहुत अच्छा करता हूं, इसलिए ये मेरे पास ही रहें तो अच्छा है. कहां कब कितना इन्वैस्ट करना है, मैं अपने अनुसार करता रहूंगा.’

मेरे पास रहे या इन के पास, यह सोच कर अपर्णा ने कभी इस ओर ध्यान ही नहीं दिया. इस बीच वह एक बेटे की मां भी बन गई. एक दिन जब वह घर आई तो नितिन मुंह लटकाए बैठा था. पूछने पर बोला कि वह जिस कंपनी में काम करता था वह घाटे में चली गई और उस की नौकरी भी चली गई.

अपर्णा बड़े प्यार से उस से बोली, ‘तो क्या हुआ, मैं तो कमा ही रही हूं. तुम क्यों चिंता करते हो. दूसरी ढूंढ़ लेना.’

‘अच्छा तो तुम मुझे अपनी नौकरी का ताना दे रही हो. नौकरी गई है, हाथपैर नहीं टूटे हैं अभी मेरे,’ नितिन क्रोध से बोला.

‘नितिन, तुम बात को कहां से कहां ले जा रहे हो. मैं ने ऐसा कब कहा?’

‘ज्यादा जबान मत चला, वरना काट दूंगा,’ नितिन की आंखों से मानो अंगारे बरस रहे थे.

उसे देख कर अपर्णा सहम गई. आज उसे नितिन के एक नए ही रूप के दर्शन हुए थे. वह चुपचाप दूसरे कमरे में जा कर अपना काम करने लगी. नौकरी चली जाने के बाद से अब नितिन पूरे समय घर में रहता और सुबह से शाम तक अपनी मरजी करता. एक दिन अपर्णा को घर आने में देर हो गई. जैसे ही वह घर में घुसी.

‘इतनी देर कैसे हो गई.’

‘आज इंस्पैक्शन था.’

‘झूठ बोलते शर्म नहीं आती, कहां से आ रही हो?’

‘तुम से बात करना बेकार है. खाली दिमाग शैतान का घर वाली कहावत तुम्हारे ऊपर बिलकुल सटीक बैठती है,’ कह कर अपर्णा गुस्से में अंदर चली गई.

पूरे घर पर नितिन का ही वर्चस्व था. अपर्णा को घर की किसी बात में दखल देने की इजाजत नहीं थी. वह कमाने की मशीन और मूकदर्शक मात्र थी. एक दिन जब वह घर में घुसी तो देखा कि पूरा घर फूलों से सजा हुआ है. पूछने पर पता चला कि आज कोई गुरुजी और उन के शिष्य घर पर पधार रहे हैं. इसीलिए रसोई में खाना भी बन रहा है.

अपर्णा ने नितिन से पूछा, ‘यह सब क्या है नितिन? सुबह मैं स्कूल गई थी, तब तो तुम ने कुछ नहीं बताया?’

‘तुम सुबह जल्दी निकल गई थीं, सूचना बाद में मिली. आज गुरुजी घर आने वाले हैं. जाओ तुम भी तैयार हो जाओ,’ कह कर नितिन फिर जोश से काम में जुट गया.

उस दिन देररात्रि तक गुरुजी का प्रोग्राम चलता रहा. न जाने कितने ही लोग आए और गए. सब को चाय, खाना आदि खिलाया गया. अपर्णा को सुबह स्कूल जाना था, सो, वह अपने कमरे में आ कर सो गई. दूसरे दिन शाम को जब स्कूल से लौटी तो नितिन बड़ा खुश था. ट्रे में चाय के 2 कप ले कर अपर्णा के पास ही बैठ गया और कल के सफल आयोजन के लिए खुशी व्यक्त करने लगा. तभी अपर्णा ने धीरे से कहा, ‘नितिन, आप खुश हो, इसलिए मैं भी खुश हूं परंतु मेहनत की गाढ़ी कमाई की यों बरबादी ठीक नहीं.’

‘तुम क्या जानो इन बाबाओं की करामात? और जगदगुरु तो पहुंचे हुए हैं. तुम्हें पता है, शहर के बड़ेबड़े पैसे वाले लोग इन के शिष्य बनना चाहते हैं परंतु ये घास नहीं डालते. अपना तो समय खुल गया है जो गुरुजी ने स्वयं ही घर पधारने की बात कही. तुम्हारी गलती भी नहीं है. तुम्हारे घर में कोई भी बाबाओं के प्रताप में विश्वास नहीं करता. तो तुम कैसे करोगी? व्यंग्यपूर्वक कह कर नितिन वहां से चला गया. शाम को फिर आया और कहने लगा, ‘देखो, यह लाल डोरी. इसे सदा हाथ में बांधे रखना, कभी उतराना नहीं, गुरुजी ने दी है. सब ठीक होगा.’

कलह और असंतोष के मध्य जिंदगी किसी तरह कट रही थी. बिना किसी काम के व्यक्ति की मानसिकता भी बेकार हो जाती है. उसी बेकारी का प्रभाव नितिन के मनमस्तिष्क पर भी दिखने लगा था. अब उस के स्वभाव में हिंसा भी शामिल हो गई थी. बातबात पर अपर्णा व बच्चों पर हाथ उठा देना उस के लिए आम बात थी. घर का वातावरण पूरे समय अशांत और तनावग्रस्त रहता. लगातार चलते तनाव के कारण अपर्णा को बीपी, शुगर जैसी कई बीमारियों ने अपनी गिरफ्त में ले लिया.

एक दिन घर पर नितिन से मिलने कोई व्यक्ति आया. कुछ देर की बातचीत

के बाद अचानक दोनों में हाथापाई होने लगी और वह आदमी जोरजोर से चीखनेचिल्लाने लगा. कालोनी के कुछ लोग गेट पर जमा हो गए और कुछ अपने घरों में से झांकने लगे. किसी तरह मामला शांत कर के नितिन आया तो अपर्णा ने कहा, ‘यह सब क्या है? क्यों चिल्ला रहा था यह आदमी?’

‘शांत रहो, ज्यादा जबान और दिमाग चलाने की जरूरत नहीं है,’ बेशर्मी से नितिन ने कहा.

‘इस तरह कालोनी में इज्जत का फालूदा निकालते तुम्हें शर्म नहीं आती?’

‘बोला न, दिमाग मत चलाओ. इतनी देर से कह रहा हूं, चुप रह. सुनाई नहीं पड़ता,’ कह कर नितिन ने एक स्केल उठा कर अपर्णा के सिर पर दे मारा.

अपर्णा के सिर से खून बहने लगा. अगले दिन जब वह स्कूल पहुंची तो उस के सिर पर लगी बैंडएड देख कर पिं्रसिपल ऊषा बोली, ‘यह क्या हो गया, चोट कैसे लगी?’

उन के इतना कहते ही अपर्णा की आंखों से जारजार आंसू बहने लगे. ऊषा मैडम उम्रदराज और अनुभवी थीं. उन की पारखी नजरों ने सब भांप लिया. सो, उन्होंने सर्वप्रथम अपने कक्ष का दरवाजा अंदर से बंद किया और अपर्णा के कंधे पर प्यार से हाथ रख कर बोलीं, ‘क्या हुआ बेटा, कोई परेशानी है, तो बताओ.’

कहते हैं प्रेम पत्थर को भी पिघला देता है, सो ऊषा मैडम के प्यार का संपर्क पाते ही अपर्णा फट पड़ी और रोतेरोते उस ने सारी दास्तान कह सुनाई.

‘मैडम, आज शादी के 20 साल बाद भी मेरे घर में मेरी कोई कद्र नहीं है. पूरा पैसा उन तथाकथित बाबाजी की सेवा में लगाया जा रहा है. बाबाजी की सेवा के चलते कभी आश्रम के लिए सीमेंट, कभी गरीबों के लिए कंबल, और कभी अपना घर लुटा कर गरीबों को खाना खिलाया जा रहा है. यदि एक भी प्रश्न पूछ लिया तो मेरी पिटाई जानवरों की तरह की जाती है. सुबह से शाम तक स्कूल में खटने के बाद जब घर पहुंचती हूं तो हर दिन एक नया तमाशा मेरा इंतजार कर रहा होता है. मैं थक गई हूं इस जिंदगी से,’ कह कर अपर्णा फूटफूट कर रोने लगी.

ऊषा मैडम अपनी कुरसी से उठीं और अपर्णा के आगे पानी का गिलास रखते हुए बोलीं, ‘बेटा, एक बात सदा ध्यान रखना कि अन्याय करने वाले से अन्याय सहने वाला अधिक दोषी होता है. सब से बड़ी गलती तेरी यह है कि तू पिछले

20 सालों से अन्याय को सह रही है. जिस दिन तेरे ऊपर उस का पहला हाथ उठा था, वहीं रोक देना था. सामने वाला आप के साथ अन्याय तभी तक करता है जब तक आप सहते हो. जिस दिन आप प्रतिकार करने लगते हो, उस का मनोबल समाप्त हो जाता है. आत्मनिर्भर और पूर्णतया शिक्षित होने के बावजूद तू इतनी कमजोर और मजबूर कैसे हो गई? जिस दिन पहली बार हाथ उठाया था, तुम ने क्यों नहीं मातापिता और परिवार वालों को बताया ताकि उसे रोका जा सकता. क्यों सह रही हो इतने सालों से अन्याय? छोड़ दो उसे उस के हाल पर.’

‘मैं हर दिन यही सोचती थी कि शायद सब ठीक हो जाएगा. मातापिता की इज्जत और लोकलाज के डर से मैं कभी किसी से कुछ नहीं कह पाई. लगा था कि मैं सब ठीक कर लूंगी. पर मैं गलत थी. स्थितियां बद से बदतर होती चली गईं.’ अपर्णा ने रोते हुए कहा.

अब ऊषा मैडम बोलीं, ‘जो आज गलत है, वह कल कैसे सही हो जाएगा. जिस इंसान के गुस्से से तुम प्रथम रात्रि को ही डर जाती हो और जिस इंसान को अपनी पत्नी पर हाथ उठाने में लज्जा नहीं आती. जो बाबाओं की करामात पर भरोसा कर के खुद बेरोजगार हो कर पत्नी का पैसा पानी की तरह उड़ा रहा है, वह विवेकहीन इंसान है. ऐसे इंसान से तुम सुधार की उम्मीद लगा बैठी हो? क्यों सह रही हो? तोड़ दो सारे बंधनों को अब. निर्णय तुम्हें लेना है,’ कह कर मैडम ने दरवाजा खोल दिया था.

बाहर निकल कर उस ने भी अब और न सहने का निर्णय लिया और अगले ही दिन अपने तबादले के लिए आवेदन कर दिया. 6 माह बाद अपर्णा का तबादला दूसरे शहर में हो गया.

नितिन को जब तबादले के बारे में पता चला, तो क्रोध से चीखते हुए बोला, ‘यह क्या मजाक है मुझ से बिना पूछे ट्रांसफर किस ने करवाया?’

‘मैं ने करवाया. मैं अब और तुम्हारे साथ नहीं रह सकती. तुम्हारे उन तथाकथित गुरुजी ने तुम्हारी बसीबसाई गृहस्थी में आग लगा दी. आज और अभी से ही तुम्हारी यह दुनिया तुम्हें मुबारक. अब और अधिक सहने की क्षमता मुझ में नहीं है.’

‘हांहां, जाओ, रोकना भी कौन चाहता है तुम्हें? वैसे भी कल गुरुजी आ रहे हैं. तुम्हारी तरफ देखना भी कौन चाहता है. मैं तो यों भी गुरुजी की सेवा में ही अपना जीवन लगा देना चाहता हूं,’ कह कर भड़ाक से दरवाजा बंद कर के नितिन बाहर चला गया.

बस, उस के बाद से दोनों के रास्ते अलगअलग हो गए थे. बेटे नवीन ने पुणे में जौब जौइन कर ली थी. परंतु आज आए इस एक फोन ने उस के ठहरे हुए जीवन में फिर से तूफान ला दिया था. तभी अचानक उस ने मां का स्पर्श कंधे पर महसूस किया.

‘‘क्या सोच रही है, बेटा.’’

‘‘मां, कुछ नहीं समझ आ रहा? क्या करूं?’’

‘‘बेटा, पत्नी के नाते नहीं, केवल इंसानियत के नाते ही चली जा, बल्कि नवीन को भी बुला ले. कल को कुछ हो गया, तो मन में हमेशा के लिए अपराधबोध रह जाएगा. आखिर, नवीन का पिता तो नितिन ही है न,’’ अपर्णा की मां ने उसे समझाते हुए कहा.

अगले दिन वह नवीन के साथ दिल्ली के सरकारी अस्पताल के बैड नंबर 401 पर पहुंची. बैड पर लेटे नितिन को देख कर वह चौंक गई. बिखरे बाल, जर्जर शरीर और गड्ढे में धंसी आंखें. शरीर में कई नलियां लगी हुई थीं. मुंह से खून की उलटियां हो रही थीं. पूछने पर पता चला कि नितिन को कोई खतरनाक बीमारी है. उसे आया देख कर नितिन के चेहरे पर चमक आ गई.

वह अपनी कांपती आवाज में बोला, ‘‘तुम आ गईं. मुझे पता था कि तुम जरूर आओगी. अब मैं ठीक हो जाऊंगा,’’ तभी डाक्टर सिंह ने कमरे में प्रवेश किया. नवीन की तरफ मुखातिब हो कर वे बोले, ‘‘इन्हें एड्स हुआ है. अंतिम स्टेज में है. हम अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रहे हैं.’’

‘‘आज आप के तथाकथित गुरुजी कहां गए. आप की देखभाल करने क्यों नहीं आए वे. जिन के कारण आप ने अपनी बसीबसाई गृहस्थी में आग लगा दी. आज उन्होंने अपनी करामात क्यों नहीं दिखाई? मुझ से क्या चाहते हैं आप. क्यों मुझे फोन किया गया था?’’ अपर्णा आवेश से भरे स्वर में बोली. तभी देवर अरुण आ गया. उस ने जो बताया, उसे सुन कर अपर्णा दंग रह गई.

‘‘आप के जाने के बाद भैया एकदम निरंकुश हो गए. गुरुजी के आश्रम में कईकई दिन पड़े रहते. घर पर ताला रहता और भैया गुरुजी के आश्रम में. गुरुजी के साथ ही दौरों पर जाते. गुरुजी के आश्रम में सेविकाएं

भी आती थीं. गुरुजी सेविकाओं से हर प्रकार की सेवा करवाते थे. कई बार गुरुजी के कहने पर भैया ने भी अपनी सेवा करवाई. बस, उसी समय कोई इन्हें तोहफे में एड्स दे गई. गुरुजी और उन के आश्रम के लोगों को जैसे ही भैया की बीमारी के बारे में पता चला, उन्होंने इन्हें आश्रम से बाहर कर दिया. और आज 3 साल से कोई खैरखबर भी नहीं ली है.’’

अपर्णा मुंह खोले सब सुन रही थी. उस ने नितिन की ओर देखा तो उस ने अपने दोनों हाथ जोड़ दिए मानो अब तक की सारी काली करतूतों को एक माफी में धो देना चाहता हो.

अपर्णा कुछ देर सोचती रही, फिर नितिन की ओर घूम कर बोली, ‘‘नितिन, मेरातुम्हारा संबंध कागजी तौर पर भले ही न खत्म हुआ हो पर दिल के रिश्ते से बड़ा कोई रिश्ता नहीं होता. जब मेरे दिल में ही तुम्हारे लिए कोई जगह नहीं है, तो कागज क्या करेगा? जहां तक माफी का सवाल है, माफी तो उस से मांगी जाती है जिस ने कोई गुनाह किया हो. तुम ने आज तक जो कुछ भी मेरे साथ किया, उसे भुलाना तो मुश्किल है, पर हां, माफ करने की कोशिश करूंगी. पर अब तुम मुझ से कोई उम्मीद मत रखना.

मैं तुम्हारे लिए कुछ नहीं कर सकती. हां, इंसानियत के नाते तुम्हारी बीमारी के इलाज में जो पैसा लगेगा, मैं देने को तैयार हूं. बस, अब और मुझे कुछ नहीं कहना. मैं तुम्हें सारे बंधनों से मुक्त कर के जा रही हूं,’’ यह कह कर मैं ने पर्स में से एक छोटा पैकेट, वह मैली लाल डोरी निकाल कर नितिन के तकिए पर रख दी, ‘‘लो अपनी अमानत, अपने पास रखो.’’

यह कह कर अपर्णा तेजी से कमरे से बाहर निकल गई. नितिन टकटकी लगाए उसे जाते देखता रहा.

बेचारी दिव्यांशी : ब्यूटीपार्लर से कौन हुआ रफूचक्कर

महल्ले के कई लोग अचरज भरी निगाहों से उस कमरे को देख रहे थे जहां पर कोई नया किराएदार रहने आ रहा था और जिस का सामान उस छोटे से कमरे में उतर रहा था. सामान इतना ही था कि एक सवारी वाले आटोरिकशा में पूरी तरह से आ गया था.

सब यही सोच रहे थे और आपस में इसी तरह की बातें कर रहे थे कि तभी एक साइकिल रिकशा से एक लड़की उतरी जो अपने पैरों से चल नहीं सकती थी, इसीलिए बैसाखियों के सहारे चल कर उस कमरे की तरफ जा रही थी.

अब महल्ले की औरतें आपस में कानाफूसी करने लगीं… ‘क्या इस घर में यह अकेले रहेगी?’, ‘कौन है यह?’, ‘कहां से आई है?’ वगैरह.

कुछ समय बाद उस लड़की ने उन सवालों के जवाब खुद ही दे दिए, जब वह अपने पड़ोस में रहने वाली एक औरत से एक जग पानी देने की गुजारिश करने उस के घर गई.

घर में घुसते ही शिष्टाचार के साथ उस ने नमस्ते की और अपना परिचय देते हुए बोली, ‘‘मेरा नाम दिव्यांशी है और मैं पास के कमरे में रहने आई हूं. क्या मुझे पीने के लिए एक जग पानी मिल सकता है? वैसे, नल में पानी कब आता है? मैं उस हिसाब से अपना पानी भर लूंगी.’’

‘‘अरे आओआओ दिव्यांशी, मेरा नाम सुमित्रा है और पानी शाम को 5 बजे और सुबह 6 बजे आता है. कहां से आई हो और यहां क्या करती हो?’’ पानी देते हुए सुमित्रा ने पूछा.

‘‘आंटी, आप मेरे कमरे पर आइए, तब हम आराम से बैठ कर बातें करेंगे. अभी मुझे बड़ी जोरों की भूख लगी है. वैसे, मैं शहर के नामी होटल रामभरोसे में रिसैप्शनिस्ट का काम करती हूं, जहां मेरा ड्यूटी का समय सुबह 6 बजे से है. मेरा काम दोहपर के 3 बजे तक खत्म हो जाता है.’’

बातचीत में सुमित्रा को दिव्यांशी अच्छी लगी और उस के परिवार के बारे में ज्यादा जानने की उत्सुकता में शाम को पानी आने की सूचना ले कर वह दिव्यांशी के कमरे पर पहुंच गई.

दिव्यांशी अब अपने बारे में बताने लगी, ‘‘आज से तकरीबन 16 साल पहले मैं अपने मातापिता के साथ मोटरसाइकिल से कहीं जा रही थी कि तभी एक ट्रक से भीषण टक्कर होने से मेरे मातापिता मौके पर ही मर गए थे.

‘‘चूंकि मैं दूर छिटक गई थी इसलिए जान तो बच गई, पर पास से तेज रफ्तार से गुजरती बाइक मेरे दोनों पैरों पर से गुजर गई और मेरे दोनों पैर काटने पड़े. तभी से चाचाचाची ने अपने पास रखा और पढ़ायालिखाया.

‘‘उन के कोई बच्चा नहीं है. इस वजह से भी वे मुझ से बहुत स्नेह रखते हैं. चाचा की माली हालत ज्यादा अच्छी नहीं है, फिर भी वे मेरी नौकरी करने के खिलाफ हैं, पर मैं अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती हूं, इसीलिए शहर आ कर मैं ने इस नौकरी को स्वीकार कर लिया.

‘‘इस होटल की नौकरी के साथसाथ मैं सभी प्रतियोगी परीक्षाओं में हिस्सा लेती हूं ताकि कोई सरकारी नौकरी लग जाए. मैं अपनी योग्यता पर विश्वास रखती हूं इसी कारण किसी तरह की कोचिंग नहीं लेती हूं, बल्कि 3 बजे होटल से आ कर बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती हूं. इस से मेरी प्रतियोगिता की तैयारी भी हो जाती है और कुछ कमाई भी.

‘‘इस महल्ले में कोई बच्चा अगर ट्यूशन लेना चाहता हो तो उन्हें मेरे पास भेजिए न भाभी,’’ दिव्यांशी ने अपनेपन से सुमित्रा से कहा.

‘‘जरूर. मैं अपने सभी मिलने वालों से कहूंगी…’’ सुमित्रा ने पूछा, ‘‘और तुम अपने खाने का क्या करती हो?’’

‘‘सुबह का नाश्ता और दोपहर का खाना तो मैं होटल की पैंट्री में ही खा लेती हूं और शाम को इस आटोमैटिक हौट प्लेट पर दालचावल या खिचड़ी जैसी चीजें पका लेती हूं.’’

यह सुन कर सुमित्रा मन ही मन दिव्यांशी की हिम्मत की तारीफ कर रही थी. तकरीबन आधा घंटे तक दिव्यांशी के साथ बैठने के बाद वह अपने घर वापस आ गई.

सुबह साढ़े 5 बजे वही साइकिल रिकशा वाला जो दिव्यांशी को छोड़ने आया था, लेने आ गया. साफ था, दिव्यांशी ने उस का महीना बांध कर लाने व छोड़ने के लिए लगा लिया था.

सुमित्रा ने भी अपना काम बखूबी निभाया और महल्ले में सभी को दिव्यांशी के बारे में बताया. तकरीबन सभी ने उस की हिम्मत की तारीफ की. हर कोई चाहता था कि कैसे न कैसे कर के उस की मदद की जाए. कई घरों के बच्चे दिव्यांशी के पास ट्यूशन के लिए आने लगे थे.

दिव्यांशी को इस महल्ले में आए अभी पूरा एक महीना होने में 2-3 दिन बचे थे कि एक दिन महल्ले वालों ने देखा कि दिव्यांशी किसी लड़के के साथ मोटरसाइकिल पर आ रही है.

सभी को यह जानने की इच्छा हुई कि वह लड़का कौन है. पूछने पर पता चला कि उस का नाम रामाधार है और उसी के होटल में कुक है और आज ही उस ने यह सैकंडहैंड बाइक खरीदी है.

1-2 दिन के बाद ट्यूशन खत्म होने पर दिव्यांशी ने एक बच्चे को भेज कर महल्ले की 4-5 औरतों को अपने कमरे में बुलवा लिया और कहने लगी, ‘‘मैं इतने दिनों से आप लोगों के साथ रह रही हूं इसलिए आप लोगों के साथ एक बात करना चाहती हूं. रामाधार हमारे होटल में कुक है और वह चाहता है कि मैं रोज उस के साथ औफिस जाऊं.

‘‘वैसे भी रिकशे वाला 2,000 रुपए महीना लेता है. अगर आप लोगों को कोई एतराज न हो तो मैं उस के साथ आनाजाना कर लूं?’’

‘‘जब तुम पूछ कर सभी के सामने आनाजाना कर रही हो तो हमें क्या दिक्कत हो सकती है और पिछले एक महीने में इतना तो हम तुम्हें समझ ही गए हैं कि तुम कोई गलत काम कर ही नहीं सकती. तुम निश्चिंत हो कर रामाधार के साथ आजा सकती हो, ‘‘सुमित्रा बाकी सब औरतों की तरफ देख कर बोली. सभी औरतों ने अपनी सहमति दे दी.

रामाधार 26-27 साल का नौजवान था. उस की कदकाठी अच्छी थी. फूड और टैक्नोलौजी का कोर्स करने के बाद दिव्यांशी के होटल में ही वह कुक का काम करता था. वह दिव्यांशी को लेने व छोड़ने जरूर आता था, पर कभी भी दिव्यांशी के कमरे के अंदर नहीं गया था.

अब तक 3 महीने गुजर चुके थे. ट्यूशन पढ़ रहे सभी बच्चों के मासिक टैस्ट हो चुके थे और तकरीबन सभी बच्चों ने कहीं न कहीं प्रगति की थी. इस कारण दिव्यांशी का सम्मान और ज्यादा बढ़ गया था.

एक दिन अचानक दिव्यांशी ने फिर से सभी औरतों को अपने घर बुलवा लिया. इस बार मामला कुछ गंभीर लग रहा था.

सुमित्रा की तरफ देख कर दिव्यांशी बोली, ‘‘मैं ने आप सभी में अपना परिवार देखा है, आप लोगों से जो प्यार और इज्जत मिली है, उसी के आधार पर मैं आप लोगों से एक बात की इजाजत और चाहती हूं. मैं और रामाधार शादी करना चाहते हैं.

‘‘दरअसल, रामाधार को दुबई में दूसरी नौकरी मिल गई है और उसे अगले 3 महीनों में कागजी कार्यवाही कर के वहां नौकरी जौइन करनी है. वहां जाने के बाद वह वहां पर मेरे लिए भी जौब की जुगाड़ कर लेगा. जाने से पहले वह शादी कर के जाना चाहता है, ताकि पतिपत्नी के रूप में हमें एक ही संस्थान में काम मिल जाए.

‘‘मैं ने अपने चाचा को भी बता दिया है. वे भी इस रिश्ते से सहमत हैं, पर यहां आने में नाकाम हैं, क्योंकि उन के साले का गंभीर ऐक्सिडैंट हो गया है.’’

सभी औरतें एकदूसरे की तरफ देखने लगीं. 16 नंबर मकान में रहने वाली कमला ताई दिव्यांशी की हमदर्द बन गई थीं. उन की आंखों में सवाल देख दिव्यांशी बोली, ‘‘ताईजी, रामाधार की कहानी भी मेरे ही जैसी है. उस के मातापिता की मौत बचपन में ही हो गई थी. कोई और रिश्तेदार न होने के कारण पड़ोसियों ने उसे अनाथ आश्रम में दे दिया था. वहीं पर रह कर उस ने पढ़ाई की और आज इस लायक बना.’’

अब तो सभी के मन में रामाधार के प्रति हमदर्दी के भाव उमड़ पड़े.

‘‘शादी कब करने की सोच रहे हो,’’ 10 नंबर वाली कल्पना भाभी ने पूछा.

‘‘इसी हफ्ते शादी हो जाएगी तो अच्छा होगा और कागजी कार्यवाही करने में भी आसानी होगी.’’

‘‘इतनी जल्दी तैयारी कैसे होगी?’’ सुमित्रा ने सवाल किया.

‘‘तैयारी क्या करनी है, हम ने सोचा है कि हम आर्य समाज मंदिर में शादी करेंगे और शाम का खाना रामभरोसे होटल में रख कर आशीर्वाद समारोह आयोजित कर लेंगे. दूसरे दिन सुबह रामाधार अपनी कागजी कार्यवाही के लिए दिल्ली चला जाएगा और 10-12 दिन बाद जब वापस आएगा तो मैं उस के घर चली जाऊंगी.

‘‘मैं आप लोगों से अनुरोध करूंगी कि आप मुझे ट्यूशन की फीस अगले 3 महीने की एडवांस में दे दें. सामान के बदले में मुझे कैश ही दें क्योंकि सामान तो मैं साथ ले जा नहीं पाऊंगी.’’

सभी को दिव्यांशी की भविष्य के प्रति गंभीरता पसंद आई. 11 नंबर मकान में रहने वाली चंदा चाची उत्सुकतावश बोली, ‘‘बिना जेवर के दुलहन अच्छी नहीं लगती इसलिए शादी के दिन मैं अपना नया वाला सोने का सैट, जो अपनी बेटी की शादी के लिए बनवाया है, उस दिन दिव्यांशी को पहना दूंगी.’’

‘‘जी चाचीजी, रिसैप्शन के बाद मैं वापस कर दूंगी,’’ दिव्यांशी बोली.

अब तो होड़ मच गई. कोई अंगूठी, तो कोई पायल, कोई चैन, तो कोई कंगन दिव्यांशी को देने को तैयार हो गया. सुधा चाची ने अपनी लड़की का नया लहंगा दे दिया.

कुल 50-55 घरों वाले इस महल्ले में कन्यादान करने वालों की भी होड़ लग गई. कोई 5,000 रुपए दे रहा था, तो कोई 2,100 रुपए.

शादी के दिन महल्ले में उत्सव जैसा माहौल था. सभी छुट्टी ले कर घर पर ही थे. अपनेअपने वादे के मुताबिक सभी ने अपने गहनेकपड़े दिव्यांशी को दे दिए थे.

शादी दोपहर 12 बजे होनी थी. इसी वजह से दिव्यांशी को सुबह 9 बजे ब्यूटीपार्लर पहुंचना था और वहीं से आर्य समाज मंदिर. लेकिन सब से बड़ा सवाल यह था कि दिव्यांशी को ब्यूटीपार्लर ले कर जाएगा कौन?

इतनी सुबह उस के साथ जाने का मतलब था कि खुद को बिना तैयार किए शादी में जाना, इसलिए यह निश्चित हुआ कि सुमित्रा के पति दिव्यांशी को अपने साथ ले कर जाएंगे और ब्यूटीपार्लर की जगह पर छोड़ देंगे. जैसे ही पार्लर का काम पूरा हो जाएगा, दिव्यांशी फोन कर के उन्हें बुलवा लेगी और वहीं से सभी आर्य समाज मंदिर चले जाएंगे.

तय समय के मुताबिक ही सारा कार्यक्रम शुरू हो गया. सुबह साढ़े 8 बजे सुमित्रा के पति अपनी कार ले कर दिव्यांशी के दरवाजे पर पहुंच गए और उस के बताए ब्यूटीपार्लर पर सारे सामान के साथ ले गए. पार्लर अभीअभी खुला ही था. वह उसे पार्लर पर छोड़ कर चले गए.

अब सभी तैयार होने लगे. चूंकि रिसैप्शन शाम को होना था इसीलिए तकरीबन सभी घरों में या तो सिर्फ नाश्ता बना या खिचड़ी.

तकरीबन साढ़े 11 बजे सुमित्रा सपरिवार दिव्यांशी को लेने के लिए पार्लर पहुंची, पर दिव्यांशी तो वहां थी ही नहीं. ज्यादा जानकारी लेने पर पता चला कि पार्लर तो साढ़े 10 बजे खुलता है. 9 बजे तो सफाई वाला आता है जो पार्लर के कर्मचारियों के आने के बाद चला जाता है. आज सुबह 9 बजे किसी का भी किसी तरह का अपौइंटमैंट नहीं था.

सुमित्रा को चक्कर आने लगे. वह किसी तरह चल कर कार तक पहुंची और पति को सारी बात बताई.

पति तुरंत पार्लर के अंदर गए और उन के अनुरोध पर उस सफाई वाले को बुलवाया गया, ताकि कुछ पता चल सके.

सफाई वाले ने जो बताया, उसे सुन कर सभी के होश उड़ गए. उस ने बताया, ‘‘सुबह जो लड़की पार्लर में आई थी, उस ने बताया था कि वह एक नाटक में एक विकलांग भिखारी का रोल कर रही है. उसे हेयर कट और मेकअप कराना है.

‘‘तब मैं ने बताया कि पार्लर तो सुबह साढ़े 10 बजे खुलेगा, तो वह कहने लगी कि तब तक मेरा पैर फालतू ही मुड़ा रहेगा, मैं वाशरूम में जा कर पैरों में लगी इलास्टिक को निकाल लूं क्या? जब तक पार्लर खुलेगा, मैं नाश्ता कर के आ जाऊंगी.

‘‘मैं ने कहा ठीक है. देखिए, इस कोने में उस की बैसाखियां और निकला हुआ इलास्टिक रखा है.’’

सभी ने देखा, बैसाखियों के साथ एक छोटी सी थैली रखी थी. इस में चौड़े वाले 2 इलास्टिक और दिव्यांशी के फोन का सिम कार्ड रखा हुआ था.

आर्य समाज मंदिर में सभी लोग अपनेआप को ठगा सा महसूस करते हुए एकदूसरे की तरफ देख रहे थे.

शादी: सुरेशजी को अपनी बेटी पर क्यों गर्व हो रहा था?

‘‘सुनो, आप को याद है न कि आज शाम को राहुल की शादी में जाना है. टाइम से घर आ जाना. फार्म हाउस में शादी है. वहां पहुंचने में कम से कम 1 घंटा तो लग ही जाएगा,’’ सुकन्या ने सुरेश को नाश्ते की टेबल पर बैठते ही कहा.

‘‘मैं तो भूल ही गया था, अच्छा हुआ जो तुम ने याद दिला दिया,’’ सुरेश ने आलू का परांठा तोड़ते हुए कहा.

‘‘आजकल आप बातों को भूलने बहुत लगे हैं, क्या बात है?’’ सुकन्या ने चाय की चुस्की लेते हुए कहा.

‘‘आफिस में काम बहुत ज्यादा हो गया है और कंपनी वाले कम स्टाफ से काम चलाना चाहते हैं. दम मारने की फुरसत नहीं होती है. अच्छा सुनो, एक काम करना, 5 बजे मुझे फोन करना. मैं समय से आ जाऊंगा.’’

‘‘क्या कहते हो, 5 बजे,’’ सुकन्या ने आश्चर्य से कहा, ‘‘आफिस से घर आने में ही तुम्हें 1 घंटा लग जाता है. फिर तैयार हो कर शादी में जाना है. आप आज आफिस से जल्दी निकलना. 5 बजे तक घर आ जाना.’’

‘‘अच्छा, कोशिश करूंगा,’’ सुरेश ने आफिस जाने के लिए ब्रीफकेस उठाते हुए कहा.

आफिस पहुंच कर सुरेश हैरान रह गया कि स्टाफ की उपस्थिति नाममात्र की थी. आफिस में हर किसी को शादी में जाना था. आधा स्टाफ छुट्टी पर था और बाकी स्टाफ हाफ डे कर के लंच के बाद छुट्टी करने की सोच रहा था. पूरे आफिस में कोई काम नहीं कर रहा था. हर किसी की जबान पर बस यही चर्चा थी कि आज शादियों का जबरदस्त मुहूर्त है, जिस की शादी का मुहूर्त नहीं निकल रहा है उस की शादी बिना मुहूर्त के आज हो सकती है. इसलिए आज शहर में 10 हजार शादियां हैं.

सुरेश अपनी कुरसी पर बैठ कर फाइलें देख रहा था तभी मैनेजर वर्मा उस के सामने कुरसी खींच कर बैठ गए और गला साफ कर के बोले, ‘‘आज तो गजब का मुहूर्त है, सुना है कि आज शहर में 10 हजार शादियां हैं, हर कोई छुट्टी मांग रहा है, लंच के बाद तो पूरा आफिस लगभग खाली हो जाएगा. छुट्टी तो घोषित कर नहीं सकते सुरेशजी, लेकिन मजबूरी है, किसी को रोक भी नहीं सकते. आप को भी किसी शादी में जाना होगा.’’

‘‘वर्माजी, आप तो जबरदस्त ज्ञानी हैं, आप को कैसे मालूम कि मुझे भी आज शादी में जाना है,’’ सुरेश ने फाइल बंद कर के एक तरफ रख दी और वर्माजी को ऊपर से नीचे तक देखते हुए बोला.

‘‘यह भी कोई पूछने की बात है, आज तो हर आदमी, बच्चे से ले कर बूढ़े तक सभी बराती बनेंगे. आखिर 10 हजार शादियां जो हैं,’’ वर्माजी ने उंगली में कार की चाबी घुमाते हुए कहा, ‘‘आखिर मैं भी तो आज एक बराती हूं.’’

‘‘वर्माजी, एक बात समझ में नहीं आ रही कि क्या वाकई में पूरे स्टाफ को शादी में जाना है या फिर 10 हजार शादियों की खबर सुन कर आफिस से छुट्टी का एक बहाना मिल गया है,’’ सुरेश ने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा.

‘‘लगता है कि आप को आज किसी शादी का न्योता नहीं मिला है, घर पर भाभीजी के साथ कैंडल लाइट डिनर करने का इरादा है. तभी इस तरीके की बातें कर रहे हो, वरना घर जल्दी जाने की सोच रहे होते सुरेश बाबू,’’ वर्माजी ने चुटकी लेते हुए कहा.

‘‘नहीं, वर्माजी, ऐसी बात नहीं है. शादी का न्योता तो है, लेकिन जाने का मन नहीं है, पत्नी चलने को कह रही है. लगता है जाना पड़ेगा.’’

‘‘क्यों भई…भाभीजी के मायके में शादी है,’’ वर्माजी ने आंख मारते हुए कहा.

‘‘ऐसी कोई बात नहीं है, वर्माजी. पड़ोसी की शादी में जाना है. ऊपर वाले फ्लैट में नंदकिशोरजी रहते हैं, उन के बेटे राहुल की शादी है. मन इसलिए नहीं कर रहा कि बहुत दूर फार्म हाउस में शादी है. पहले तो 1 घंटा घर पहुंचने में लगेगा, फिर घर से कम से कम 1 घंटा फार्म हाउस पहुंचने में लगेगा. थक जाऊंगा. यदि आप कल की छुट्टी दे दें तो शादी में चला जाऊंगा.’’

‘‘अरे, सुरेश बाबू, आप डरते बहुत हैं. आज शादी में जाइए, कल की कल देखेंगे,’’ कह कर वर्माजी चले गए.

मुझे डरपोक कहता है, खुद जल्दी जाने के चक्कर में मेरे कंधे पर बंदूक रख कर चलाना चाहता है, सुरेश मन ही मन बुदबुदाया और काम में व्यस्त हो गया.

शाम को ठीक 5 बजे सुकन्या ने फोन कर के सुरेश को शादी में जाने की याद दिलाई कि सोसाइटी में लगभग सभी को नंदकिशोरजी ने शादी का न्योता दिया है और सभी शादी में जाएंगे. तभी चपरासी ने कहा, ‘‘साबजी, पूरा आफिस खाली हो गया है, मुझे भी शादी में जाना है, आप कितनी देर तक बैठेंगे?’’

चपरासी की बात सुन कर सुरेश ने काम बंद किया और धीमे से मुसकरा कर कहा, ‘‘मैं ने भी शादी में जाना है, आफिस बंद कर दो.’’

सुरेश ने कार स्टार्ट की, रास्ते में सोचने लगा कि दिल्ली एक महानगर है और 1 करोड़ से ऊपर की आबादी है, लेकिन एक दिन में 10 हजार शादियां कहां हो सकती हैं. घोड़ी, बैंड, हलवाई, वेटर, बसों के साथ होटल, पार्क, गलीमहल्ले आदि का इंतजाम मुश्किल लगता है. रास्ते में टै्रफिक भी कोई ज्यादा नहीं है, आम दिनों की तरह भीड़भाड़ है. आफिस से घर की 30 किलोमीटर की दूरी तय करने में 1 से सवा घंटा लग जाता है और लगभग आधी दिल्ली का सफर हो जाता है. अगर पूरी दिल्ली में 10 हजार शादियां हैं तो आधी दिल्ली में 5 हजार तो अवश्य होनी चाहिए. लेकिन लगता है लोगों को बढ़ाचढ़ा कर बातें करने की आदत है और ऊपर से टीवी चैनल वाले खबरें इस तरह से पेश करते हैं कि लोगों को विश्वास हो जाता है. यही सब सोचतेसोचते सुरेश घर पहुंच गया.

घर पर सुकन्या ने फौरन चाय के साथ समोसे परोसते हुए कहा, ‘‘टाइम से तैयार हो जाओ, सोसाइटी से सभी शादी में जा रहे हैं, जिन को नंदकिशोरजी ने न्योता दिया है.’’

‘‘बच्चे भी चलेंगे?’’

‘‘बच्चे अब बड़े हो गए हैं, हमारे साथ कहां जाएंगे.’’

‘‘हमारा जाना क्या जरूरी है?’’

‘‘जाना बहुत जरूरी है, एक तो वह ऊपर वाले फ्लैट में रहते हैं और फिर श्रीमती नंदकिशोरजी तो हमारी किटी पार्टी की मेंबर हैं. जो नहीं जाएगा, कच्चा चबा जाएंगी.’’

‘‘इतना डरती क्यों हो उस से? वह ऊपर वाले फ्लैट में जरूर रहते हैं, लेकिन साल 6 महीने में एकदो बार ही दुआ सलाम होती है, जाने न जाने से कोई फर्क नहीं पड़ता है,’’ सुरेश ने चाय की चुस्कियों के बीच कहा.

‘‘डरे मेरी जूती…शादी में जाने की तमन्ना सिर्फ इसलिए है कि वह घर में बातें बड़ीबड़ी करती है, जैसे कोई अरबपति की बीवी हो. हम सोसाइटी की औरतें तो उस की शानशौकत का जायजा लेने जा रही हैं. किटी पार्टी का हर सदस्य शादी की हर गतिविधि और बारीक से बारीक पहलू पर नजर रखेगा. इसलिए जाना जरूरी है, चाहे कितना ही आंधीतूफान आ जाए.’’

सुकन्या की इस बात को उन की बेटी रोहिणी ने काटा, ‘‘पापा, आप को मालूम नहीं है, जेम्स बांड 007 की पूरी टीम साडि़यां पहन कर जासूसी करने में लग गई है. इन के वार से कोई नहीं बच सकता है…’’

सुकन्या ने बीच में बात काटते हुए कहा, ‘‘तुम लोगों के खाने का क्या हिसाब रहेगा. मुझे कम से कम बेफिक्री तो हो.’’

‘‘क्या मम्मा, अब हम बच्चे नहीं हैं, भाई पिज्जा और बर्गर ले कर आएगा. हमारा डिनर का मीनू तो छोटा सा है, आप का तो लंबाचौड़ा होगा,’’ कह कर रोहिणी खिलखिला कर हंस पड़ी. फिर चौंक कर बोली, ‘‘यह क्या मां, यह साड़ी पहनोगी…नहींनहीं, शादी में पहनने की साड़ी मैं सिलेक्ट करती हूं,’’ कहतेकहते रोहिणी ने एक साड़ी निकाली और मां के ऊपर लपेट कर बोली, ‘‘पापा, इधर देख कर बताओ कि मां कैसी लग रही हैं.’’

‘‘एक बात तो माननी पड़ेगी कि बेटी मां से अधिक सयानी हो गई है, श्रीमतीजी आज गश खा कर गिर जाएंगी.’’

तभी रोहन पिज्जा और बर्गर ले कर आ गया, ‘‘अरे, आज तो कमाल हो गया. मां तो दुलहन लग रही हैं. पूरी बरात में अलग से नजर आएंगी.’’

बच्चों की बातें सुन कर सुकन्या गर्व से फूल गई और तैयार होने लगी. तैयार हो कर सुरेश और सुकन्या जैसे ही कार में बैठने के लिए सोसाइटी के कंपाउंड में आए, सुरेश हैरानी के साथ बोल पड़े, ‘‘लगता है कि आज पूरी सोसाइटी शादी में जा रही है, सारे चमकधमक रहे हैं. वर्मा, शर्मा, रस्तोगी, साहनी, भसीन, गुप्ता, अग्रवाल सभी अपनी कारें निकाल रहे हैं, आज तो सोसाइटी कारविहीन हो जाएगी.’’

मुसकराती हुई सुकन्या ने कहा, ‘‘सारे अलग शादियों में नहीं, बल्कि राहुल की शादी में जा रहे हैं.’’

‘‘दिल खोल कर न्योता दिया है नंदकिशोरजी ने.’’

‘‘दिल की मत पूछो, फार्म हाउस में शादी का सारा खर्च वधू पक्ष का होगा, इसलिए पूरी सोसाइटी को निमंत्रण दे दिया वरना अपने घर तो उन की पत्नी ने किसी को भी नहीं बुलाया. एक नंबर के कंजूस हैं दोनों पतिपत्नी. हम तो उसे किटी पार्टी का मेंबर बनाने को राजी नहीं होते हैं. जबरदस्ती हर साल किसी न किसी बहाने मेंबर बन जाती है.’’

‘‘इतनी नाराजगी भी अच्छी नहीं कि मेकअप ही खराब हो जाए,’’ सुरेश ने कार स्टार्ट करते हुए कहा.

‘‘कितनी देर लगेगी फार्म हाउस पहुंचने में?’’ सुकन्या ने पूछा.

‘‘यह तो टै्रफिक पर निर्भर है, कितना समय लगेगा, 1 घंटा भी लग सकता है, डेढ़ भी और 2 भी.’’

‘‘मैं एफएम रेडियो पर टै्रफिक का हाल जानती हूं,’’ कह कर सुकन्या ने रेडियो चालू किया.

तभी रेडियो जौकी यानी कि उद्घोषिका ने शहर में 10 हजार शादियों का जिक्र छेड़ते हुए कहा कि आज हर दिल्लीवासी किसी न किसी शादी में जा रहा है और चारों तरफ शादियों की धूम है. यह सुन कर सुरेश ने सुकन्या से पूछा, ‘‘क्या तुम्हें लगता है कि आज शहर में 10 हजार शादियां होंगी?’’

‘‘आप तो ऐसे पूछ रहे हो, जैसे मैं कोई पंडित हूं और शादियों का मुहूर्त मैं ने ही निकाला है.’’

‘‘एक बात जरूर है कि आज शादियां अधिक हैं, लेकिन कितनी, पता नहीं. हां, एक बात पर मैं अडिग हूं कि 10 हजार नहीं होंगी. 2-3 हजार को 10 हजार बनाने में लोगों को कोई अधिक समय नहीं लगता. बात का बतंगड़ बनाने में फालतू आदमी माहिर होते हैं.’’

तभी रेडियो टनाटन ने टै्रफिक का हाल सुनाना शुरू किया, ‘यदि आप वहां जा रहे हैं तो अपना रूट बदल लें,’ यह सुन कर सुरेश ने कहा, ‘‘रेडियो स्टेशन पर बैठ कर कहना आसान है कि रूट बदल लें, लेकिन जाएं तो कहां से, दिल्ली की हर दूसरी सड़क पर टै्रफिक होता है. हर रोज सुबहशाम 2 घंटे की ड्राइविंग हो जाती है. आराम से चलते चलो, सब्र और संयम के साथ.’’

बातों ही बातों में कार की रफ्तार धीमी हो गई और आगे वाली कार के चालक ने कार से अपनी गरदन बाहर निकाली और बोला, ‘‘भाई साहब, कार थोड़ी पीछे करना, वापस मोड़नी है, आगे टै्रफिक जाम है, एफ एम रेडियो भी यही कह रहा है.’’

उस को देखते ही कई स्कूटर और बाइक वाले पलट कर चलने लगे. कार वालों ने भी कारें वापस मोड़नी शुरू कर दीं. यह देख कर सुकन्या ने कहा, ‘‘आप क्या देख रहे हो, जब सब वापस मुड़ रहे हैं तो आप भी इन के साथ मुड़ जाइए.’’

सुरेश ने कार नहीं मोड़ी बल्कि मुड़ी कारों की जगह धीरेधीरे कार आगे बढ़ानी शुरू की.

‘‘यह आप क्या कर रहे हो, टै्रफिक जाम में फंस जाएंगे,’’ सुकन्या ने सुरेश की ओर देखते हुए कहा.

‘‘कुछ नहीं होगा, यह तो रोज की कहानी है. जो कारें वापस मुड़ रही हैं, वे सब आगे पहुंच कर दूसरी लेन को भी जाम करेंगी.’’ धीरेधीरे सुरेश कार को अपनी लेन में रख कर आगे बढ़ाता रहा. चौराहे पर एक टेंपो खराब खड़ा था, जिस कारण टै्रफिक का बुरा हाल था.

‘‘यहां तो काफी बुरा हाल है, देर न हो जाए,’’ सुकन्या थोड़ी परेशान हो गई.

‘‘कुछ नहीं होगा, 10 मिनट जरूर लग सकते हैं. यहां संयम की आवश्यकता है.’’

बातोंबातों में 10 मिनट में चौराहे को पार कर लिया और कार ने थोड़ी रफ्तार पकड़ी. थोड़ीथोड़ी दूरी पर कभी कोई बरात मिलती, तो कार की रफ्तार कम हो जाती तो कहीं बीच सड़क पर बस वाले बस रोक कर सवारियों को उतारने, चढ़ाने का काम करते मिले.

फार्म हाउस आ गया. बरात अभी बाहर सड़क पर नाच रही थी. बरातियों ने अंदर जाना शुरू कर दिया, सोसाइटी निवासी पहले ही पहुंच गए थे और चाट के स्टाल पर मशगूल थे.

‘‘लगता है, हम ही देर से पहुंचे हैं, सोसाइटी के लोग तो हमारे साथ चले थे, लेकिन पहले आ गए,’’ सुरेश ने चारों तरफ नजर दौड़ाते हुए सुकन्या से कहा.

‘‘इतनी धीरे कार चलाते हो, जल्दी कैसे पहुंच सकते थे,’’ इतना कह कर सुकन्या बोली, ‘‘हाय मिसेज वर्मा, आज तो बहुत जंच रही हो.’’

‘‘अरे, कहां, तुम्हारे आगे तो आज सब फीके हैं,’’ मिसेज गुप्ता बोलीं, ‘‘देखो तो कितना खूबसूरत नेकलेस है, छोटा जरूर है लेकिन डिजाइन लाजवाब है. हीरे कितने चमक रहे हैं, जरूर महंगा होगा.’’

‘‘पहले कभी देखा नहीं, कहां से लिया? देखो तो, साथ के मैचिंग टाप्स भी लाजवाब हैं,’’ एक के बाद एक प्रश्नों की झड़ी लग गई, साथ ही सभी सोसाइटी की महिलाओं ने सुकन्या को घेर लिया और वह मंदमंद मुसकाती हुई एक कुरसी पर बैठ गई. सुरेश एक तरफ कोने में अलग कुरसी पर अकेले बैठे थे, तभी रस्तोगी ने कंधे पर हाथ मारते हुए कहा, ‘‘क्या यार, सुरेश…यहां छिप कर चुपके से महिलाआें की बातों में कान अड़ाए बैठे हो. उठो, उधर मर्दों की महफिल लगी है. सब इंतजाम है, आ जाओ…’’

सुरेश कुरसी छोड़ते हुए कहने लगे, ‘‘रस्तोगी, मैं पीता नहीं हूं, तुझे पता है, क्या करूंगा महफिल में जा कर.’’

‘‘आओ तो सही, गपशप ही सही, मैं कौन सा रोज पीने वाला हूं. जलजीरा, सौफ्ट ड्रिंक्स सबकुछ है,’’ कह कर रस्तोगी ने सुरेश का हाथ पकड़ कर खींचा और दोनों महफिल में शरीक हो गए, जहां जाम के बीच में ठहाके लग रहे थे.

‘‘यार, नंदकिशोर ने हाथ लंबा मारा है, सबकुछ लड़की पक्ष वाले कर रहे हैं. फार्म आउस में शादी, पीने का, खाने का इंतजाम तो देखो,’’ अग्रवाल ने कहा.

‘‘अंदर की बात बताता हूं, सब प्यारमुहब्बत का मामला है,’’ साहनी बोला.

‘‘अमा यार, पहेलियां बुझाना छोड़ कर जरा खुल कर बताओ,’’ गुप्ता ने पूछा.

‘‘राहुल और यह लड़की कालिज में एकसाथ पढ़ते थे, वहीं प्यार हो गया. जब लड़कालड़की राजी तो क्या करेगा काजी, थकहार कर लड़की के बाप को मानना पड़ा,’’ साहनी चटकारे ले कर प्यार के किस्से सुनाने लगा. फिर मुड़ कर सुरेश से कहने लगा, ‘‘अरे, आप तो मंदमंद मुसकरा रहे हैं, क्या बात है, कुछ तो फरमाइए.’’

‘‘मैं यह सोच रहा हूं कि क्या जरूरत है, शादियों में फुजूल का पैसा लगाने की, इसी शादी को देख लो, फार्म हाउस का किराया, साजसजावट, खानेपीने का खर्चा, लेनदेन, गहने और न जाने क्याक्या खर्च होता है,’’ सुरेश ने दार्शनिक भाव से कहा.

‘‘यार, जिस के पास जितना धन होता है, शादी में खर्च करता है. इस में फुजूलखर्ची की क्या बात है. आखिर धन को संचित ही इसीलिए करते हैं,’’ अग्रवाल ने बात को स्पष्ट करते हुए कहा.

‘‘नहीं, धन का संचय शादियों के लिए नहीं, बल्कि कठिन समय के लिए भी किया जाता है…’’

सुरेश की बात बीच में काटते हुए गुप्ता बोला, ‘‘देख, लड़की वालों के पास धन की कोई कमी नहीं है. समंदर में से दोचार लोटे निकल जाएंगे, तो कुछ फर्क नहीं पड़ेगा.’’

‘‘यह सोच गलत है. यह तो पैसे की बरबादी है,’’ सुरेश ने कहा.

‘‘सारा मूड खराब कर दिया,’’ साहनी ने बात को समाप्त करते हुए कहा, ‘‘यहां हम जश्न मना रहे हैं, स्वामीजी ने प्रवचन शुरू कर दिए. बाईगौड रस्तोगी, जहां से इसे लाया था, वहीं छोड़ आ.’’

सुरेश चुपचाप वहां से निकल लिए और सुकन्या को ढूंढ़ने लगे.

‘‘क्या बात है, भाई साहब, कहां नैनमटक्का कर रहे हैं,’’ मिसेज साहनी ने कहा, जो सुकन्या के साथ गोलगप्पे के स्टाल पर खट्टेमीठे पानी का मजा ले रही थी और साथ कह रही थी, ‘‘सुकन्या, गोलगप्पे का पानी बड़ा बकवास है, इतनी बड़ी पार्टी और चाटपकौड़ी तो एकदम थर्ड क्लास.’’

सुकन्या मुसकरा दी.

‘‘मुझ से तो भूखा नहीं रहा जाता,’’ मिसेज साहनी बोलीं, ‘‘शगुन दिया है, डबल तो वसूल करने हैं.’’

उन की बातें सुन कर सुरेश मुसकरा दिए कि दोनों मियांबीवी एक ही थैली के चट्टेबट्टे हैं. मियां ज्यादा पी कर होश खो बैठा है और बीवी मीनमेख के बावजूद खाए जा रही है.

सुरेश ने सुकन्या से कहा, ‘‘खाना शुरू हुआ है, तो थोड़ा खा लेते हैं, नहीं तो निकलने की सोचते हैं.’’

‘‘इतनी जल्दी क्या है, अभी तो कोई भी नहीं जा रहा है.’’

‘‘पूरे दिन काम की थकान, फिर फार्म हाउस पहुंचने का थकान भरा सफर और अब खाने का लंबा इंतजार, बेगम साहिबा घर वापस जाने में भी कम से कम 1 घंटा तो लग ही जाएगा. चलते हैं, आंखें नींद से बोझिल हो रही हैं, इस वाहन चालक पर भी कुछ तरस करो.’’

‘‘तुम भी बच्चों की तरह मचल जाते हो और रट लगा लेते हो कि घर चलो, घर चलो.’’

‘‘मैं फिर इधर सोफे पर थोड़ा आराम कर लेता हूं, अभी तो वहां कोई नहीं है.’’

‘‘ठीक है,’’ कह कर सुकन्या सोसाइटी की अन्य महिलाआें के साथ बातें करने लगी और सुरेश एक खाली सोफे पर आराम से पैर फैला कर अधलेटे हो गए. आंखें बंद कर के सुरेश आराम की सोच रहे थे कि एक जोर का हाथ कंधे पर लगा, ‘‘सुरेश बाबू, यह अच्छी बात नहीं है, अकेलेअकेले सो रहे हो. जश्न मनाने के बजाय सुस्ती फैला रहे हो.’’

सुरेश ने आंखें खोल कर देखा तो गुप्ताजी दांत फाड़ रहे थे.

मन ही मन भद्दी गाली निकाल कर प्रत्यक्ष में सुरेश बोले, ‘‘गुप्ताजी, आफिस में कुछ अधिक काम की वजह से थक गया था, सोचा कि 5 मिनट आराम कर लूं.’’

‘‘उठ यार, यह मौका जश्न मनाने का है, सोने का नहीं,’’ गुप्ताजी हाथ पकड़ कर सुरेश को डीजे फ्लोर पर ले गए जहां डीजे के शोर में वर और वधू पक्ष के नजदीकी नाच रहे थे, ‘‘देख नंदकिशोर के ठुमके,’’ गुप्ताजी बोले पर सुरेश का ध्यान सुकन्या को ढूंढ़ने में था कि किस तरीके से अलविदा कह कर वापस घर रवानगी की जाए.

सुकन्या सोसाइटी की महिलाओं के साथ गपशप में व्यस्त थी. सुरेश को नजदीक आता देख मिसेज रस्तोगी ने कहा, ‘‘भाई साहब को कह, आज तो मंडराना छोड़ें, मर्द पार्टी में जाएं. बारबार महिला पार्टी में आ जाते हैं.’’

‘‘भाभीजी, कल मैं आफिस से छुट्टी नहीं ले सकता, जरूरी काम है, घर भी जाना है, रात की नींद पूरी नहीं होगी तो आफिस में काम कैसे करूंगा. अब तो आप सुकन्या को मेरे हवाले कीजिए, नहीं तो उठा के ले जाना पड़ेगा,’’ सुरेश के इतना कहते ही पूरी महिला पार्टी ठहाके में डूब गई.

‘‘क्या बचपना करते हो, थोड़ी देर इंतजार करो, सब के साथ चलेंगे. पार्टी का आनंद उठाओ. थोड़ा सुस्ता लो. देखो, उस कोने में सोफे खाली हैं, आप थोड़ा आराम करो, मैं अभी वहीं आती हूं.’’

मुंह लटका कर सुरेश फिर खाली सोफे पर अधलेटे हो गए और उन की आंख लग गई.

नींद में सुरेश ने करवट बदली तो सोफे से नीचे गिरतेगिरते बचे. इस चक्कर में उन की नींद खुल गई. चंद मिनटों की गहरी नींद ने सुरेश की थकान दूर कर दी थी. तभी सुकन्या आई, ‘‘तुम बड़े अच्छे हो, एक नींद पूरी कर ली. चलो, खाना शुरू हो गया है.’’

सुरेश ने घड़ी देखी, ‘‘रात का 1 बजा था. अब 1 बजे खाना परोस रहे हैं.’’

खाना खाते और फिर मिलते, अलविदा लेते ढाई बज गए. कार स्टार्ट कर के सुरेश बोले, ‘‘आज रात लांग ड्राइव होगी, घर पहुंचतेपहुंचते साढ़े 3 बज जाएंगे. मैं सोचता हूं कि उस समय सोने के बजाय चाय पी जाए और सुबह की सैर की जाए, मजा आ जाएगा.’’

‘‘आप तो सो लिए थे, मैं बुरी तरह थक चुकी हूं. मैं तो नींद जरूर लूंगी… लेकिन आप इतनी धीरे कार क्यों चला रहे हो?’’

‘‘रात के खाली सड़कों पर तेज रफ्तार की वजह से ही भयानक दुर्घटनाएं होती हैं. दरअसल, पार्टियों से वापस आते लोग शराब के नशे में तेज रफ्तार के कारण कार को संभाल नहीं पाते. इसी से दुर्घटनाएं होती हैं. सड़कों पर रोशनी पूरी नहीं होती, सामने से आने वाले वाहनों की हैडलाइट से आंखों में चौंध पड़ती है, पटरी और रोडडिवाइडर नजर नहीं आते हैं, इसलिए जब देरी हो गई है तो आधा घंटा और सही.’’

पौने 4 बजे वे घर पहुंचे, लाइट खोली तो रोहिणी उठ गई, ‘‘क्या बात है पापा, पूरी रात शादी में बिता दी. कल आफिस की छुट्टी करोगे क्या?’’

सुरेश ने हंसते हुए कहा, ‘‘कल नहीं, आज. अब तो तारीख भी बदल गई है. आज आफिस में जरूरी काम है, छुट्टी का मतलब ही नहीं. अगर अब सो गया तो समझ लो, दोपहर से पहले उठना ही नहीं होगा. बेटे, अब तो एक कप चाय पी कर सुबह की सैर पर जाऊंगा.’’

‘‘पापा, आप कपड़े बदलिए, मैं चाय बनाती हूं,’’ रोहिणी ने आंखें मलते हुए कहा.

‘‘तुम सो जाओ, बेटे, हमारी नींद तो खराब हो गई है, मैं चाय बनाती हूं,’’ सुकन्या ने रोहिणी से कहा.

चाय पीने के बाद सुरेश, सुकन्या और रोहिणी सुबह की सैर के लिए पार्क में गए.

‘‘आज असली आनंद आएगा सैर करने का, पूरा पार्क खाली, ऐसे लगता है कि हमारा प्राइवेट पार्क हो, हम आलसियों की तरह सोते रहते हैं. सुबह सैर का अपना अलग ही आनंद है,’’ सुरेश बांहें फैला कर गहरी सांस खींचता हुआ बोला.

‘‘आज क्या बात है, बड़ी दार्शनिक बातें कर रहे हो.’’

‘‘बात दार्शनिकता की नहीं, बल्कि जीवन की सचाई की है. कल रात शादी में देखा, दिखावा ही दिखावा. क्या हम शादियां सादगी से नहीं कर सकते? अगर सच कहें तो सारा शादी खर्च व्यर्थ है, फुजूल का है, जिस का कोई अर्थ नहीं है.’’

तभी रोहिणी जौगिंग करते हुए समीप पहुंच कर बोली, ‘‘पापा, बिलकुल ठीक है, शादियों पर सारा व्यर्थ का खर्चा होता है.’’

सुकन्या सुरेश के चेहरे को देखती हुई कुछ समझने की कोशिश करने लगी. फिर कुछ पल रुक कर बोली, ‘‘मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा है. आज सुबह बापबेटी को क्या हो गया है?’’

‘‘बहुत आसान सी बात है, शादी में सारे रिश्तेदारों को, यारों को, पड़ोसियों को, मिलनेजुलने वालों को न्योता दिया जाता है कि शादी में आ कर शान बढ़ाओ. सब आते हैं, कुछ कामधंधा तो करते नहीं…उस पर सब यही चाहते हैं कि उन की साहबों जैसी खातिरदारी हो और तनिक भी कमी हो गई तो उलटासीधा बोलेंगे, जैसे कि नंदकिशोर के बेटे की शादी में देखा, हम सब जम कर दावत उड़ाए जा रहे थे और कमियां भी निकाल रहे थे.’’

तभी रोहिणी जौगिंग का एक और चक्कर पूरा कर के समीप आई और बोलने लगी तो सुकन्या ने टोक दिया, ‘‘आप की कोई विशेष टिप्पणी.’’

यह सुन कर रोहिणी ने हांफते हुए कहा, ‘‘पापा ने बिलकुल सही विश्लेषण किया है शादी का. शादी हमारी, बिरादरी को खुश करते फिरें, यह कहां की अक्लमंदी है और तुर्रा यह कि खुश फिर भी कोई नहीं होता. आखिर शादी को हम तमाशा बनाते ही क्यों हैं. अगर कोई शादी में किसी कारण से नहीं पहुंचा तो हम भी गिला रखते हैं कि आया नहीं. कोई किसी को नहीं छोड़ता. शादी करनी है तो घरपरिवार के सदस्यों में ही संपन्न हो जाए, जितना खच?र् शादी में हम करते हैं, अगर वह बचा कर बैंक में जमा करवा लें तो बुढ़ापे की पेंशन बन सकती है.’’

‘‘देखा सुकन्या, हमारी बेटी कितनी समझदार हो गई है. मुझे रोहिणी पर गर्व है. कितनी अच्छी तरह से भविष्य की सोच रही है. हम अपनी सारी जमापूंजी शादियों में खर्च कर देते हैं, अकसर तो उधार भी लेते हैं, जिस को चुकाना भी कई बार मुश्किल हो जाता है. अपनी चादर से अधिक खर्च जो करते हैं.’’

‘‘क्या बापबेटी को किसी प्रतियोगिता में भाग लेना है, जो वहां देने वाले भाषण का अभ्यास हो रहा है या कोई निबंध लिखना है.’’

‘‘काश, भारत का हर व्यक्ति ऐसा सोचता.

घर वापसी : लड़कियों का बेरहम दलाल

नैशनल हाईवे 33 पटना को रांची से जोड़ता है. रांची से तकरीबन 25 किलोमीटर दूर बसा एक गांव है सिकदिरी. इसी गांव में फूलन रहता था. उस के परिवार में पत्नी छमिया के अलावा 3 बच्चे थे. बड़ा लड़का पूरन और उस के बाद 2 बेटियां रीमा और सीमा.

फूलन के कुछ खेत थे. खेतों से तो परिवार का गुजारा मुश्किल था, इसलिए वह कुछ पैसा मजदूरी से कमा लेता था. कुछ कमाई उस की पत्नी छमिया की भी थी. वह भी कभी दूसरों के खेतों में मजदूरी करती, तो कभी अमीर लोगों के यहां बरतन मांजने का काम करती थी.

फूलन के तीनों बच्चे गांव के स्कूल में पढ़ते थे. बड़े बेटे पूरन का मन पढ़ने में नहीं लगता था. वह मिडिल पास कर के दिल्ली चला गया था. पड़ोसी गांव का एक आदमी उसे नौकरी का लालच दे कर अपने साथ ले गया था.

पूरन वहां छोटामोटा पार्टटाइम काम करता था. कभी स्कूटर मेकैनिक के साथ हैल्पर, तो कभी ट्रक ड्राइवर के साथ  क्लीनर का काम, पर इस काम में पूरन का मन लग गया था. ट्रक के साथ नएनए शहर घूमने को जो मिलता था.

इस बीच एक बार पूरन गांव भी आया था और घर में कुछ पैसे और एक मोबाइल फोन भी दे गया था.

ट्रक ड्राइवर अपना दिल बहलाने के लिए कभीकभी रंगरलियां भी मनाते थे, तो एकाध बार पूरन को भी मौका मिल जाता था. इस तरह धीरेधीरे वह बुरी संगत में फंस गया था.

इधर गांव में रीमा स्कूल में पढ़ रही थी. अपनी क्लास में अच्छे नंबर लाती थी. वह अब 10वीं जमात में पहुंच गई थी. उस की छोटी बहन सीमा भी उसी स्कूल में 7वीं जमात में थी.

इधर सिकदिरी और आसपास  के गांवों से कुछ नाबालिग लड़कियां गायब होने लगी थीं. गांव के ही कुछ मर्द और औरतें ऐसी लड़कियों को नौकरी का लालच दे कर दिल्ली, चंडीगढ़ वगैरह शहरों में ले जाते थे.

शुरू में तो लड़कियों के मातापिता को कुछ रुपए एडवांस में पकड़ा देते थे, पर बाद में कुछ महीने मनीऔर्डर भी आता था, पर उस के बाद उन का कुछ अतापता नहीं रहता था.

इधर शहर ला कर इन लड़कियों से बहुत कम पैसे में घर की नौकरानी बना कर उन का शोषण होता था. उन को ठीक से खानापीना, कपड़ेलत्ते भी नहीं मिलते थे. कुछ लड़कियों को जबरन देह धंधे में भेज दिया जाता था.

इन लोगों का एक बड़ा रैकेट था.  पूरन भी इस रैकेट में शामिल हो गया था.

एक दिन अचानक गांव से एक लड़की गायब हो गई, पर इस बार उस के मातापिता को कोई रकम नहीं मिली और न ही किसी ने कहा कि उसे नौकरी के लिए शहर ले जाया गया है.

इस घटना के कुछ दिन बाद पूरन के पिता फूलन को फोन आया कि गायब हुई वह लड़की दिल्ली में देखी गई है.

2 दिन बाद फूलन को फिर फोन आया. उस ने कहा कि तुम्हारा बेटा पूरन आजकल लड़कियों का दलाल बन गया है. उसे इस धंधे से जल्दी ही निकालो, नहीं तो बड़ी मुसीबत में फंसेगा.

यह सुन कर फूलन का सारा परिवार सकते में आ गया था. बड़ी बेटी रीमा

ने सोचा कि इस उम्र में पिताजी से कुछ नहीं हो सकता, उसे खुद ही कुछ उपाय सोचना होगा.

रीमा ने अपने मातापिता को समझाया कि वह दिल्ली जा कर भाई को वापस लाने की पूरी कोशिश करेगी.

चंद दिनों के अंदर रीमा रांची से ट्रेन पकड़ कर दिल्ली पहुंच गई थी. वह वहां अपने इलाके के एक नेता से मिली और सारी बात बताई.

नेताजी को पूरन की जानकारी उन के ड्राइवर ने दे रखी थी.

वह ड्राइवर एक दिन नेताजी के किसी दोस्त को होटल छोड़ने गया था, तो वहां पूरन को किसी लड़की के साथ देखा था.

ड्राइवर भी पड़ोस के गांव से था, इसलिए वह पूरन को जानता था.

ड्राइवर ने रीमा से कहा, ‘‘मैं ने ही तुम्हारे घर पर फोन किया था. तुम घबराओ नहीं. तुम्हारा भाई जल्दी ही मिल जाएगा.

‘‘मैं कुछ होटलों और ऐसी जगहों को जानता हूं, जहां इस तरह के लोग मिलते हैं. मैं जैसा कहता हूं, वैसा करो.’’

रीमा बोली, ‘‘ठीक है, मैं वैसा ही करूंगी. पर मुझे करना क्या होगा?’’

‘‘वह मैं समय आने पर बता दूंगा. तुम साहब को बोलो कि यहां का एक एसपी भी हमारे गांव का है. जरूरत पड़ने पर वह तुम्हारी मदद करे.

‘‘वैसे, मैं पूरी कोशिश करूंगा कि पुलिस की नजर में आने के पहले ही तुम अपने भाई को इस गंदे धंधे से निकाल कर अपने गांव चली जाओ.’’

इधर ड्राइवर ने भी काफी मशक्कत के बाद पूरन का ठिकाना ढूंढ़ लिया

था. वह पूरन से बोला, ‘‘एक नईनवेली लड़की आई है. लगता है, वह तुम्हारे काम आएगी.’’

पूरन ने कहा, ‘‘तुम मुझे उस लड़की से मिलाओ.’’

ड्राइवर ने शाम को पूरन को एक जगह मिलने को कहा, इधर ड्राइवर रीमा को बुरका पहना कर शाम को उसी जगह ले गया.

चूंकि रीमा बुरके में थी, इसलिए पूरन उसे पहचान न सका था. ड्राइवर वहां से हट कर दूर से ही सारा नजारा देख रहा था.

पूरन ने रीमा से पूछा, ‘‘तो तुम मुसलिम हो?’’

‘‘हां, तो क्या मैं तुम्हारे काम की नहीं?’’ रीमा ने पूछा.

‘‘नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है. मेरे काम में कोई जातपांत, धर्म नहीं पूछता. पर तुम अपना चेहरा तो दिखाओ. इस से मुझे तुम्हारी उम्र और खूबसूरती का भी अंदाजा लग जाएगा.’’

‘‘ठीक है, लो देखो,’’ कह कर रीमा ने चेहरे से नकाब हटाया. उसे देखते ही पूरन के होश उड़ गए.

रीमा ने भाई पूरन से कहा, ‘‘तुम्हें शर्म नहीं आती, लड़कियों की दलाली करते हो. वे भी तो किसी की बहन होगी…’’

रीमा ने कहा, ‘‘तुम्हें पता है कि अगले हफ्ते ‘सरहुल’ का त्योहार है. पहले तुम इस त्योहार को दोस्तों के साथ खूब मौजमस्ती से मनाते थे. इस बार तुम्हारी घर वापसी पर हम सब मिल कर ‘सरहुल’ का त्योहार मनाएंगे.’’

तब तक ड्राइवर भी पास आ गया था. रीमा ने जब अपने गांव से लापता लड़की के बारे में पूछा, तो उस ने कहा कि उस में उस का कोई हाथ नहीं है. लेकिन वह लड़की एक घर में नौकरानी का काम कर रही है.

ड्राइवर और पूरन के साथ जा कर रीमा ने उस लड़की को भी बचाया.

रीमा अपने भाई पूरन को ले कर गांव आ गई. सब ने उसे समझाया कि सुबह का भूला अगर शाम को घर आ जाए, तो उसे भूला नहीं कहा जाता.

पूरन को अपनी गलती पर पछतावा था. उस की घर वापसी पर पूरे परिवार ने गांव वालों के साथ मिल कर ‘सरहुल’ का त्योहार धूमधाम से मनाया.

अब पूरन गांव में ही रह कर परिवार के साथ मेहनतमजदूरी कर के रोजीरोटी कमा रहा था.

जरा अच्छा नहीं लगता : पप्पू के बापू की कसक

लड़कपन से ही मैं कुछ ज्यादा लापरवाह रहा हूं, इसीलिए मेरी किताब की जगह किताब नहीं मिलती थी और न कपड़ों की जगह कपड़े ही. आते ही इधरउधर फेंक देता और ढूंढ़ते वक्त शामत आती मां की.

मां रोज कहती, ‘‘पप्पू के बापू, इस के दहेज में चाहे अठन्नी भी न मिले, मगर बहू ऐसी ला देना, जो इसे मेमना बना कर खाट से बांध दे.’’

पिताजी हंस कर कहते, ‘‘क्यों परेशान होती हो पप्पू की मां, अभी बच्चा ही तो है.’’

बाद में मैं बड़ा भी हो गया, मगर मेरी आदतें वही ‘पप्पू’ वाली ही रहीं, तो पिताजी के कान खड़े हुए. लोग वर ढूंढ़ने के लिए खाक छाना करते हैं, लेकिन उन्होंने मेरे लिए बीवी खोजने में 4 जोड़ी जूतियां घिस डालीं.

एक दिन उन्होंने खूंटी पर पगड़ी टांगते हुए कहा था, ‘‘लो पप्पू की मां, तुम्हारी मुराद पूरी हुई.’’

‘‘छोरी कैसी है पप्पू के बापू?’’

‘‘है तो थोड़ी काली, लेकिन रंग तो 2 ही होते हैं. अच्छी सेहतमंद भी है, पर सफाई से उसे बहुत प्यार है… और हर सलीका जानती है. इसी बात पर रीझ कर मैं ‘हां’ कह आया. तुम भी देखोगी तो निहाल हो जाओगी,’’ बापू बागबाग हुए जा रहे थे.

उस लड़की का खयाल कर के ही मेरे होश उड़ गए. लेकिन शादी का जो चाव होता है, उसी पागलनपन में घोड़ी पर चढ़ बैठा. भांवरे शुरू हुए ही थे कि गड्डमड्ड हुई. दुलहन ने मुझे कुहनी मार कर कहा, ‘‘सीधे बैठो जी, यों झुक कर बैठना जरा अच्छा नहीं लगता.’’

इस बात पर बापू ने मां की तरफ देख कर मूंछों पर ताव दिया था और मां ने इस तरह हंस कर सिर हिलाया था मानो कह रही हो कि मान गए जी, आप की पसंद को. पप्पू के लिए ऐसी ही बहू चाहिए थी. मैं तो खुश था कि चलो, अब मां की हर तकलीफ यह संभाल लेगी.

घर आते ही मांबाप के पैर छूते समय रामकटोरी ने समझाया था, ‘‘देखो जी, हम पैर छूने जाएंगे. इस का सही तरीका यह है कि पहले दोनों हाथ जोड़ कर हमें प्रणाम करना है. उस के बाद उन के पैरों में झुकना है. फिर उलटे पांव लौटना है, उन की तरफ पीठ नहीं करनी है.’’

इस बात को समझाने के लिए वह बापू के पैर छूने गई थी और वापसी में उस ने फर्श पर पड़े मर्तबान के टुकड़ेटुकड़े कर दिए थे.

मैं सोच रहा था कि अभी मां चिल्लाएंगी, ‘बहू अंधी हो क्या, जो कुछ नहीं दिखाई देता.’

मगर मांबाप तो पैर छूने के इस सलीके पर इतने खुश थे कि उन्हें मर्तबान का जरा भी अफसोस न हुआ. मां ने मेरे सारे काम रामकटोरी को सौंप दिए.

मैं जितना लापरवाह था, रामकटोरी उतनी ही सलीकापसंद. ‘जरा अच्छा नहीं लगता,’ कह कर वह मेरे जूतों को पलंग के नीचे इतनी दूर पहुंचा देती कि सुबह सूट व टाई पहनने के बाद जूते निकालने के लिए मुझे फर्श पर लेटना पड़ता.

मैं जांघिए को सूखने के लिए बाहर डाल जाता, पर वह शाम तक उसे स्टोर में पड़े संदूक के भीतर रख देती. वजह, ऐसी चीजों का बाहर दिखना अच्छा नहीं लगता.

रामकटोरी सुबहसवेरे उठ कर झाड़ू जरूर लगाएगी, मगर धूल उड़ कर सोफे, बिस्तर और किताबों पर जम जाती है. वह उन्हें झाड़ती है. तो धूल फर्श पर फिर. वह फिर से झाड़ू लगाएगी और बेशर्म धूल फिर सोफे, बिस्तर और किताबों पर. हार कर मैं कहता हूं, ‘‘रहने दो रामकटोरी, क्यों धूल में लट्ठ भांज रही हो?’’

मगर रामकटोरी झाड़ू लिए जुटी रहेगी, ‘‘रहने दो जी, घर गंदा रहे तो जरा अच्छा नहीं लगता.’’ इसी बीच सारी धूल रामकटोरी पर जम चुकी होती है और मैं हंस कर कहता हूं, ‘‘मगर, इस वक्त आप बहुत अच्छी लग रही हैं.’’

इस बात पर वह बिदक जाती, ‘‘क्यों जी, जब मैं नहा कर निकलती हूं या पाउडर, क्रीम लगाती हूं, तब तो आप कभी नहीं कहते कि अच्छी लग रही हूं. अब गंदी दिख रही हूं तो आप को अच्छी लग रही हूं. आप में धेले की भी अक्ल नहीं है. आप को मैलीकुचैली औरतें ही पसंद…’’ कहतेकहते वह रोने लगती है.

अब मुझे उसी का हथियार प्रयोग करना पड़ता, ‘‘ऐसे मत रोओ, रामकटोरी. इस तरह रोना जरा अच्छा नहीं लगता.’’

मुझे घर में बनियान पहन कर बैठने की आदत है. वह मास्टरनियों की तरह तुरंत घुड़क देती, ‘‘यह क्या तोंद निकाले बैठे हैं. चलिए, कमीज पहनिए.’’

मैं कहता, ‘‘देखो रामकटोरी, गरमी बहुत…’’ उधर से तुरंत जवाब मिलता, ‘‘मगर, इस तरह नंगे बैठना जरा अच्छा नहीं लगता.’’

जब कमीज बाजू से उधड़ी होती, तो मैं कई बार टांका लगाने को कहता, मगर वह कानों में तेल दिए बैठी रहती. मुझे उपाय सूझता. कमीज उस के सामने फेंक कर कहता, ‘‘यह फटी कमीज पहनना जरा अच्छा नहीं लगता.’’

रामकटोरी मेरी भी उस्ताद थी. कमीज मेरे मुंह पर मार कर कहती, ‘‘दर्जी के पास जाइए. बड़े घर की औरतें फटापुराना सीएं, तो जरा अच्छा नहीं लगता.’’

रामकटोरी की रसोई भी देखने वाली होती. सब से नीचे बड़े बरतन, उन से ऊपर छोटे बरतन और फिर सब से छोटे बरतन मीनार की तरह सजा कर रखे होते. सब से नीचे का बरतन चाहिए तो सारे बरतन उतारो. अपनी जरूरत का बरतन निकालने के बाद सारे बरतनों को फिर से उसी तरह सजाओ. गोया सजाना न हुआ, सजा हो गई. मगर वह मेरी कहां सुनती. इसी चक्कर में लगी रहती.

मैं चिल्लाता, ‘‘बाद में सजा लेना, मुझे दफ्तर के लिए देर हो जाएगी.’’

रामकटोरी हंस कर कहती, ‘‘रसोईघर तो औरत का मंदिर होता है, यही गंदा रहे तो जरा अच्छा नहीं लगता.’’ वह अच्छा लगने में ही लगी रहती. यही वजह है थी कि सब्जी वक्त पर नहीं बनती.

मगर रामकटोरी खाने का डब्बा हमेशा 5 खानों वाला देती. इस का भी एक सलीका था. पहले डब्बे में एक साबुत प्याज और 2 मिर्च, दूसरे में अचार, तीसरे में चटनी, चौथे में सब्जी और 5वें में 5 रोटियां.

मैं चाहता कि सूखी रोटियां कागज में लपेट कर मांगूं और बस पकड़ लूं, मगर उस का जवाब होता, ‘‘इतना बड़ा अफसर अखबार में रोटियां लपेट कर ले जाता जरा अच्छा नहीं लगता.’’

घर में सोफे पर बैठते वक्त मैं अधलेटा हो जाता या टांग पर टांग चढ़ा कर बैठ जाता, तो वही घिसापिटा जुमला कान छील देता है.

नहाते वक्त मेरा ध्यान नहाने में कम और गुसलखाने पर ज्यादा होता है. साबुन लगाने के बाद उसे साबुनदानी में रख कर ढक्कन लगा कर दाएं कोने में बने आले में इस तरह रखना पड़ता कि वह नीचे बैठेबैठे उठाया जा सके और गिरे भी नहीं.

नहा चुकने के बाद तंग से गुसलखाने में ही कपड़े पहनो और आते समय बालटी को फर्श पर औंधा रखना होता था. फिर उस पर मग इस तरह रखा जाए कि खुले दरवाजे से वह साफ नजर आता रहे.

इन सलीकों और रामकटोरी की टोकाटाकी से मैं बेहद डरता रहता और हर पल घबराता रहता कि कहीं कोई गलती न हो जाए और उस का घिसापिटा रिकौर्ड न सुनना पड़ जाए. इस के बावजूद यह मंत्र हमारे घर में गूंजता ही रहता.

अब तो बच्चे भी बड़े चालू हो गए हैं. उन्हें डांटता हूं तो तुरंत मां के अंदाज में बोलते हैं, ‘‘चुप पिताजी, जरा धीरे. यों डांटना जरा अच्छा नहीं लगता.’’

तंग आ कर मैं ने एक दिन बापू से कहा, ‘‘इस कटोरी पर आप ही रीझे थे, फिर मेरे पल्ले क्यों बांध दिया इसे?’’ बापू मां की तरफ देख कर हंसे थे, ‘‘भई, यह तुम्हारी मां तो मास्टरनी ही थी, बहू तो हैडमास्टरनी निकली. लेकिन…’’

तभी रामकटोरी आ पहुंची. मैं सोच रहा था कि अपनी तारीफ सुन कर वह फूल कर कुप्पा हो जाएगी. मगर उस ने मुंह फुला कर कहा, ‘‘पिताजी, आप इन से मजाक न करें. आप और जवान बेटे का इस तरह मजाक करना…’’

मैं ने तुरंत जुमला पूरा किया, ‘‘जरा अच्छा नहीं लगता.’’

रामकटोरी ने तुनक कर बापू से कहा, ‘‘देखिए, मेरी नकल उतार रहे हैं. इस तरह चिढ़ाना…’’

इस खाली जगह को बापू ने भरा, ‘‘जरा अच्छा नहीं लगता,’’ और ठहाका लगा दिया.

रामकटोरी हैरान रह गई. उस ने बड़ी उम्मीद से मां की तरफ देखते हुए कहा, ‘‘देखिए न मांजी, बापबेटा दांत निकाल रहे हैं, इस तरह मजाक उड़ाना…’’

मां ने उस के मुंह से बात छीनते हुए कहा, ‘‘जरा अच्छा नहीं लगता.’’

इस बार ठहाका और भी जोर का लगा और इस में रामकटोरी की आवाज सब से ऊंची थी.

मैं ने खुशी से कहा, ‘‘शुक्र है, तुम भी हंस दी, रोई तो नहीं.’’

रामकटोरी ने कहा, ‘‘सब हंस रहे हों, तो एक औरत का रोना जरा…’’

कुंआरी मां : राहिल और सिराज की कहानी

शाम का सुहाना मौसम था. राहिल रोजाना की तरह ट्यूशन पढ़ने जा रही थी कि अचानक एक खूबसूरत नौजवान लड़का तेज रफ्तार में बाइक चलाता हुआ उस के बगल से गुजरा.

राहिल जोर से चिल्लाते हुए बोली, ‘‘पागल हो क्या, जो इतनी तेज गाड़ी चला रहे हो… आतेजाते लोगों का कुछ तो खयाल करो.’’

बाइक सवार कुछ दूर जा कर बाइक रोकते हुए बोला, ‘‘पूरी सड़क पर आप का राज है क्या, जो बीच रोड पर चल रही हो?’’

राहिल ने कहा, ‘‘लगता है कि यह सड़क आप के अब्बा ने बनवाई है, जो आंधी की तरह बाइक चला रहे हो.’’

बाइक सवार बोला, ‘‘सड़क तो मेरे अब्बा ने ही बनवाई है, क्योंकि मैं इस गांव के प्रधान शौकत अली का बेटा सिराज हूं.’’

राहिल भी कहां कम थी, बोली, ‘‘तभी इतना घमंड आप के अंदर भरा है, जो राह चलते लोगों की भी परवाह नहीं है.’’

सिराज ने कहा, ‘‘मैडम, यह घमंड नहीं, बल्कि मेरा बाइक चलाने का शौक है और तेज गाड़ी चलाने का हुनर भी. आज तक कोई नहीं कह सकता कि सिराज से किसी तरह का कोई हादसा हुआ हो.

‘‘वैसे, आप इस गांव में नई लगती हो, जो मुझे इस तरह डांट रही हो, वरना मुझे देख कर लोग सिर्फ मेरी तारीफ ही करते हैं.’’

राहिल बोली, ‘‘बेवकूफ हैं वे लोग, जो एक सिरफिरे की तारीफ करते हैं और इस तरह बाइक चलाने से आनेजाने वालों को ही नहीं, बल्कि खुद को भी नुकसान पहुंचा सकता है.’’

सिराज ने कहा, ‘‘आप मेरी फिक्र न करें, मैं अपने हुनर में माहिर हूं.’’

राहिल भी जवाब देते हुए बोली, ‘‘फिक्र नहीं कर रही हूं, बल्कि मैं आप को चेतावनी दे रही हूं कि अपनी नहीं तो अपने मांबाप की परवाह करो. किसी दिन आप के साथ कोई हादसा हो गया, तो आप के मांबाप पर क्या गुजरेगी… क्या हाल होगा उन का…’’

राहिल के मुंह से यह बात सुन कर सिराज यह सोचने पर मजबूर हो गया कि वाकई उस के अम्मीअब्बा उस से कितना प्यार करते हैं. अगर उसे कुछ हो गया तो वे तो जीतेजी मर जाएंगे.

सिराज ने राहिल से कहा, ‘‘मुझे माफ करना. मैं ने तो कभी यह सोचा ही नहीं था कि मेरी जिंदगी पर मेरे मांबाप का भी हक है. वे मुझे लगी एक मामूली सी खरोंच से परेशान हो उठते हैं. वैसे, आप हैं कौन और यहां कहां रहती हैं?’’

राहिल ने बताया, ‘‘मैं युसूफ पटवारी की बेटी राहिल हूं, जो अभी कुछ महीने पहले ही यहां आ कर बसे हैं.’’

जैसे ही राहिल ने अपना नकाब हटाया, तो सिराज उस के खूबसूरत चेहरे को बस देखता ही रहा. राहिल उसे एक प्यारी सी मुसकान दे कर अपने रास्ते पर चली गई.

सिराज पहले तो उसे ठगा सा देखता रहा, पर फिर थोड़ी देर बाद उस ने बाइक स्टार्ट की और राहिल से बात करने के इरादे से उस के पीछे गया, पर तब तक वह कहीं गायब हो चुकी थी.

सिराज एक हैंडसम और हट्टाकट्टा लड़का था. आज वह राहिल को देख कर उस का दीवाना हो गया था.

उस रात सिराज की आंखों से नींद कोसों दूर थी. उस की आंखों के सामने बस राहिल ही घूम रही थी.

राहिल का सिराज को डांटना उस के दिल पर एक गहरी छाप छोड़ गया था, जबकि आज तक गांव में न जाने कितनी लड़कियां सिराज को पाने के लिए बेताब रहती थीं, पर उस ने आज तक किसी को भाव नहीं दिया था.

अगले दिन सिराज राहिल की एक झलक पाने और उस से अपने दिल की बात कहने के लिए उसी रास्ते पर जा

कर खड़ा हो गया, जहां वह कल उसे मिली थी. काफी इंतजार करने के बाद राहिल अपनेआप को नकाब में ढक कर उस रास्ते से गुजरती हुई नजर आई, तो सिराज भी उस के पीछेपीछे चल दिया.

राहिल सिराज को अपने पीछे आते देख एक सुनसान जगह पर रुकते हुए बोली, ‘‘जनाब, आप मेरा पीछा क्यों कर रहे हैं?’’

सिराज झिझकते हुए बोला, ‘‘आप बहुत खूबसूरत हो. मैं आप से प्यार

करता हूं.’’

राहिल बोली, ‘‘पर, मैं तो आप से प्यार नहीं करती.’’

सिराज ने कहा, ‘‘मैं आप के बिना नहीं रह सकता.’’

राहिल ने जवाब दिया, ‘‘आज तक तो मेरे बिना ही रह रहे थे.’’

सिराज बोला, ‘‘तब मैं ने आप को देखा नहीं था और न ही कभी किसी ने मुझे इस कदर तेज गाड़ी चलाने पर डांट कर समझाया था, जिस में एक मां की ममता भी थी और एक जीवनसाथी की परवाह भी.’’

राहिल ने कहा, ‘‘वह तो मैं ने आप को किसी बड़े हादसे का शिकार होने से बचाने के लिए बोला था.’’

सिराज बोला, ‘‘बस, यही वजह है. उसी समय आप ने मेरे दिल को जीत लिया था और मैं आप का दीवाना बन गया था.’’

राहिल ने साफसाफ कहा, ‘‘पर, मैं आप से प्यार नहीं करती.’’

सिराज ने जिद में आ कर कहा, ‘‘अगर आप मुझ से प्यार नहीं करेंगी, तो मैं अपनी जान दे दूंगा.’’

राहिल ने कहा, ‘‘ऐसी बातें नहीं करते. मुझे थोड़ा समय दो. मैं एकदम से कैसे हां कर सकती हूं…’’

सिराज बोला, ‘‘ठीक है, कल इसी समय या तो तुम मेरे प्यार को कबूल कर लेना, वरना तुम्हारे सामने ही मैं अपनी जान दे दूंगा.’’

राहिल भी मन ही मन सिराज को चाहने लगी थी, पर उस ने यह कभी नहीं सोचा था कि सिराज उसे इस कदर प्यार करने लगा है कि उस के न मिलने पर वह अपनी जान देने पर भी उतारू हो जाएगा.

अगले दिन सिराज समय से पहले ही राहिल के आने के इंतजार में वहीं खड़ा हो गया. उस का एकएक पल कई घंटे की तरह बीत रहा था. वह कभी अपनी घड़ी देखता, तो कभी राहिल के आने की झलक बेताबी से देखता. आज उसे ऐसा लग रहा था, मानो समय कहीं थम गया हो, जैसे घड़ी अपनी जगह पर रुक गई हो.

तभी कुछ देर बाद राहिल आती हुई नजर आई, तो सिराज की जान में जान आ गई, पर अभी भी वह इसी उधेड़बुन में लगा था कि वह उसे हां में जवाब देगी या न में.

राहिल जब सिराज के पास से हो कर गुजरी, तो उस ने अपना नकाब हटाते हुए सिराज को एक मुसकान भरी नजर से देखा और सीधी आगे चल दी.

राहिल का ग्रीन सिगनल पाते ही सिराज खुशी से झूम उठा. वह भी राहिल के पीछेपीछे चल दिया और उस सुनसान जगह पर जा कर दोनों ने एकदूसरे से अपने प्यार का इजहार करते हुए गले से लगा लिया.

अब दोनों को एकदूसरे का फोन नंबर मिल चुका था. दोनों घंटों एकदूसरे से प्यारमुहब्बत की बातें करते और एकदूसरे से शादी करने के सपने संजोते.

दोनों अपनी जिंदगी में खुश थे कि उन के प्यार की कहानी पूरे गांव में फैलने लगी, तो राहिल के अब्बा को भी इस बात का पता चल गया. उन्होंने गुस्से में आ कर राहिल को घर से बाहर निकलने पर पाबंदी लगा दी.

उधर जब सिराज को राहिल कहीं आतेजाते न मिली, तो वह पागलों की तरह उसे ढूंढ़ने लगा और जल्द ही राहिल के घर पहुंच गया.

सिराज ने राहिल के अब्बा को अपने और राहिल के प्यार के बारे में बताया, तो उन्हें गुस्सा आ गया और वे बोले, ‘‘तेरी हिम्मत कैसे हुई कि तू मेरी बेटी से मिलने मेरे ही घर तक आ गया…’’

सिराज ने कहा, ‘‘मैं राहिल से निकाह करना चाहता हूं. हम दोनों एकदूसरे से प्यार करते हैं.’’

यह सुनते ही राहिल भी अपने अब्बा के सामने आ गई और बोली, ‘‘अब्बा, मैं भी सिराज के बिना नहीं रह सकती और मैं इस से बहुत प्यार करती हूं.’’

राहिल के अब्बा समझ चुके थे कि बेटी पर जोरजबरदस्ती करने से कोई फायदा नहीं है.

राहिल के अब्बा सिराज से बोले, ‘‘बेटा, मुझे तुम दोनों के प्यार से कोई गिलाशिकवा नहीं है. तुम अपने अम्मीअब्बा को यहां भेज दो. अगर वे तुम्हारे लिए राहिल का रिश्ता मांगेंगे, तो मैं तैयार हूं.’’

यह सुनते ही सिराज खुशी से झूम उठा और उन से विदा ले कर अपने घर चला गया.

सिराज ने घर आ कर अम्मीअब्बा से अपने प्यार के बारे में बताया और कहा, ‘‘मैं राहिल से शादी करना चाहता हूं. आप मेरे लिए राहिल का हाथ मांगने उन के घर जाएं.’’

सिराज की बात सुन कर पहले

तो उस के अब्बा ने नानुकर की, पर सिराज की जिद और उस की अम्मी के जोर देने पर उन्हें अपने एकलौते बेटे

की बात माननी पड़ी और वे सिराज के लिए राहिल का हाथ मांगने उस के घर चले गए.

राहिल और सिराज के अब्बा दोनों अपने बच्चों की मुहब्बत के आगे झुक गए और राहिल के अब्बा ने सिराज से शादी करने के लिए एक साल का समय इस शर्त पर मांगा कि राहिल की तब तक पढ़ाई पूरी हो जाएगी और उसे बीच में पढ़ाई छोड़ कर शादी के बंधन में नहीं बंधना पड़ेगा.

सिराज के अब्बा इस बात के लिए भी राजी हो गए और दोनों की शादी की बात पक्की हो गई.

सिराज और राहिल का रिश्ता तय होने के बाद अब वे दोनों खूब घूमते और आपस में बातचीत कर के अपनी शादी के सपने संजोते.

शाम का समय था. सिराज राहिल को घुमाने अपने खेत पर ले गया, जहां उन की फसल लहलहा रही थी. जून का महीना था. आम के पेड़ पर कच्चे आम लगे थे, जिन्हें सिराज ने तोड़ कर राहिल को दिए राहिल खट्टे आम बड़े मजे से खा रही थी. दोनों खेतखलिहान की हवा का मजा ले रहे थे, तभी तेज आंधी आई और बारिश शुरू हो गई.

बारिश से बचने के लिए राहिल और सिराज खेत में बनी कोठरी के अंदर चले गए, जिस में काफी अंधेरा था. राहिल अंधेरा देख कर घबराने लगी कि तभी बिजली की गड़गड़ाहट से वह घबरा कर सिराज से चिपक गई.

राहिल की छुअन पाते ही सिराज के बदन में भी बिजली दौड़ने लगी. उस ने आज तक किसी लड़की के बदन को छुआ तक नहीं था. दोनों ऐसे चिपक गए, जैसे किसी पेड़ से कोई अमरबेल.

सिराज राहिल के उभरे हुए सीने को अपने सीने पर महसूस कर रहा था. उस के बदन में गरमी आने लगी. उस ने अपने गरम होंठ राहिल के कंपकंपाते होंठों पर रख दिए.

राहिल सिराज के होंठों की छुअन पाते ही सिहर उठी कि तभी सिराज राहिल के होंठों को चूमने लगा. फिर उस ने राहिल को जमीन पर लिटा दिया और उस की गरदन पर चुंबनों की बौछार

कर दी.

सिराज की इस हरकत से राहिल कामुक हो उठी. उस ने सिराज को

अपने ऊपर खींचते हुए अपनी बांहों में भर लिया.

सिराज ने मोके की नजाकत को समझते हुए बिना समय गंवाए राहिल के कपड़े उतारने शुरू कर दिए और उस पर हावी हो गया. फिर उन दोनों ने एकदूसरे के बदन की गरमी को शांत कर दिया.

राहिल और सिराज आज दोनों खुश थे. उन्होंने एकदूसरे के बदन से पहली बार एक ऐसा सुख भोगा था, जिस से वे अनजान थे.

बारिश रुक चुकी थी. उन दोनों ने जल्दीजल्दी कपड़े पहने और अपनेअपने अपने घर आ गए.

इस घटना को अभी एक हफ्ता भी नहीं गुजरा था कि एक दिन राहिल को एक दुखभरी घटना सुनने को मिली.

हुआ यों था कि एक दिन सिराज राहिल से मिलने की खुशी में तेज रफ्तार से बाइक चला कर उस के घर आ रहा था कि तभी एक मोड़ पर सामने से अचानक ट्रक आ गया. टक्कर इतनी तेज थी कि सिराज ने वहीं दम तोड़ दिया.

राहिल अभी सिराज के जाने का गम भुला भी नहीं सकी थी कि उसे एक दिन तेज चक्कर आया और वह वहीं गिर पड़ी. घर वालों ने जब उसे डाक्टर को दिखाया तो पता चला कि वह एक महीने के पेट से है.

यह सुन कर राहिल के घर वाले दंग रह गए. उन्होंने इस बदनामी से बचने

के लिए राहिल को बच्चा गिराने की सलाह दी.

राहिल को जब अपने पेट से होने का पता चला और उस के घर वालों ने उसे बच्चा गिराने के लिए कहा, तो राहिल ने ऐसा करने से साफ मना कर दिया.

राहिल की अम्मी ने उसे बहुत समझाया, ‘‘क्या तुम कुंआरी मां बन कर हमारी इज्जत उछालना चाहती हो? कुछ तो शर्म करो…’’

राहिल बोली, ‘‘मैं ने सिराज से सच्ची मुहब्बत की है. मैं अपने प्यार की निशानी को नहीं खो सकती. दुनिया क्या कहती है, मुझे परवाह नहीं. मैं अपने प्यार की निशानी को इस दुनिया में जरूर लाऊंगी.’’

आखिरकार वह समय भी आ गया, जब राहिल ने अपने प्यार की निशानी सिराज के बेटे को जन्म दिया, जिस से उसे बड़ी खुशी मिली और वह एक कुंआरी मां बन गई.

राहिल ने दुनिया की परवाह न करते हुए अपने प्यार की निशानी को दुनिया

में लाने के लिए कई ताने सहे, कई

लोगों ने उस की बुराई की, उस के मांबाप को भी काफी रुसवाई का सामना करना पड़ा, पर राहिल ने सिराज की इस आखिरी निशानी को दुनिया में लाने के लिए कुंआरी मां बनना पसंद किया. वह जिंदगीभर बिनब्याही मां रही.

एक सवाल : सुमित्रा की कामकाजी जिंदगी

अभी तक मामा अस्पताल से नहीं लौटे थे. मामी बड़ी बेचैनी से बारबार हर आनेजाने वाली गाड़ी के रुकने की आवाज सुन कर दरवाजे की ओर भागतीं और निराश हो कर फिर लौट आतीं.

दीपक ने मामी से कहा, ‘‘मामी, कब तक इंतजार कीजिएगा, पकौड़े बिलकुल ठंडे हो जाएंगे. अब आप भी खाना खा लीजिए. कोई मरीज आ गया होगा.’’

‘‘नहीं, इतनी देर तो वे कभी नहीं लगाते. आज तो कोई बड़ा आपरेशन भी नहीं करना था. पता नहीं, क्यों…’’ इतना कह कर मामी बिस्तर पर लेट कर एक पत्रिका पलटने लगीं.

उधर, सुमित्रा ड्राइंगरूम से मामी के चेहरे को एकटक निहार रही थी. मामी के चेहरे पर डर, चिंता और शक के मिलेजुले भाव उभरे थे. अकसर ऐसी हालत में यह सब देख कर सुमित्रा के चेहरे का रंग उड़ जाता था. शायद मामी की चिंता उस की भी चिंता थी. मामी को खुश देख कर वह भी खुश होती थी.

सुमित्रा ने अपने कामकाज से मामी का मन मोह लिया था. वह मामी को तो एक भी काम नहीं करने देती थी. खुद झपट कर उन का काम करने लग जाती थी. तब मामी दुलार से उसे ऐसे देखतीं, जैसे कह रही हों, ‘तुम मेरी कोख से क्यों नहीं जनमी?’

इतने में मामाजी आ गए. उन के हाथों में ढेर सारी मालाओं को देख कर मामी अचरज से भर उठीं. मामी कुछ पूछें, इस से पहले मालाओं का ढेर टेबल पर रखते हुए मामा ने बताया कि वे अंबेडकर जयंती में गए थे.

सुमित्रा फूलों को बड़े प्रेम से निहार रही थी. उस के पल्ले मामा की बात नहीं पड़ी.

‘‘वह क्या बाई?’’ उस ने पूछा.

‘‘अरे, छोटी जाति वालों ने साहब को बुलाया था. उन्हीं ने इन को माला पहनाई है. वे सब साहब को बहुत मानते हैं. ऊंचनीच, छोटी जाति, बड़ी जाति में हम लोग भेद नहीं करते. समझी?’’ मामी ने चहक कर कहा.

‘‘सच बाई?’’ सुमित्रा के पूछने में अचरज, शक और भरोसा, तीनों का मिलान था.

‘‘हांहां, एकदम सच,’’ मामी ने कहा.

उसी दिन शाम को कुछ लोगों का जुलूस जा रहा था. दूर से कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि वे कौन लोग हैं और क्या चिल्ला रहे हैं. मामी को जब कुछ समझ में नहीं आया, तो जुलूस में जा रहे एक लड़के को बुला कर उन्होंने पूछा.

वह ‘जलगार जना, जलगार जना,’ कह कर चला गया. मामी ‘जलगार जना’ का मतलब नहीं समझ पाईं. उन्होंने सुमित्रा से पूछा.

तब पलभर के लिए सुमित्रा सकपका गई. मामी को ताकते हुए दोनों हाथ उस ने इनकार में नचा दिए. शायद मामी की पेशानी पर चिड़चिड़ाहट भरी सिलवटें उभरी देख कर वह सहम गई थी या ‘जलगार जना’ शब्द की पहचान तक से अपने को अलग रखना चाहती थी.

दरअसल, सुमित्रा काम बड़ा अच्छा करती थी. अकसर उस के काम की बड़ाई मामी बड़े साफ दिल से अपनी सखीसहेलियों के बीच करती रहती थीं. इस का नतीजा यह हुआ कि उस से फायदा उठाने के लिए मामी की एक सहेली सीता ने उसे चुपके से फोड़ लेना चाहा.

एक दिन जब मामी के घर से काम निबटा कर सुमित्रा अपने घर जा रही थी, तभी रास्ते में खड़ी सीता उसे अपने घर ले गई. कुछ लगाईबुझाई की और अगले महीने से ज्यादा तनख्वाह पर काम करने के लिए राजी कर लिया जैसा कि अकसर लोग नौकरानी रखने से पहले करते हैं.

सीता एक दिन चुपके से सुमित्रा के पीछेपीछे गई. उसे शक था कि कहीं पूछने पर गलत घर न दिखा दे. गली तक उस के पीछे पैदल चलने के बाद उस ने एक घर में उसे घुसते देखा. वह उसी समय तेज चल कर उस के सामने पहुंची और पूछ बैठी, ‘‘तुम यहां रहती हो?’’

‘हां,’ में जवाब सुन कर सीता वहां से जल्दी हट गई, जैसे अंधे कुएं में गिरतेगिरते बची हो. उस के मन में एक खलबली सी थी, जिसे कहने के लिए वह बेचैन थी.

सीता दूसरे ही दिन मामी के पास आई और बोली, ‘‘देखिए, बुरा मत मानिएगा. आप की नौकरानी एक दिन मेरे घर आई और कहने लगी कि भूखी हूं. उस वक्त तो घर में कुछ था नहीं, इसलिए मैं ने होटल से मिठाई और डोसा मंगवा कर खिला दिया. पर वह तो खा भी नहीं रही थी. कह रही थी कि छोटे भाई के लिए घर ले जाऊंगी. फिर कहने लगी कि मेरा लहंगा फटा है. मुझे तरस आ गया और अपनी एक मैक्सी दे दी.’’

इतना सुनना था कि मामी गुस्से में उबलने लगीं. उन का तमतमाता चेहरा देख कर सीता असली बात तेजी से कह गई, ‘‘अरे, वह एससी कास्ट वाले सफाई का काम करते हैं.

मैं तो उस का घर चुपके से देख आई हूं. फिर, मैं ने चौकीदार को भी भेज कर पता लगवाया. वह भी यही कह रहा था.’’

ये बातें सुनने के बाद भी मामी के चेहरे पर कोई तीखे भाव नहीं दिखे, तो सीता सपाट शब्दों में कहने लगी, ‘‘मैं तो इन लोगों से काम नहीं करा सकती, क्योंकि ये लोग बहुत गंदे होते हैं.’’

तब भी मामी को गुस्सा उस के एससी होने पर नहीं के बराबर और अपनी सहेली पर ज्यादा हो रहा था. वे तो सोच रही थीं, ‘कैसी सहेली है? भला सुमित्रा क्या जाने इस का घर? आज तक उन से तो उस ने कभी मजाक में भी ‘भूख लगी है’ नहीं कहा. इस के घर जा कर क्यों कहेगी? जरूर उस ने काम करने से इनकार कर दिया होगा, तभी यह लगाईबुझाई कर रही है.’

मामी को सहीगलत तो सूझ नहीं रहा था. अलबत्ता, सहेली के सामने वे अपने को बड़ा शर्मिंदा महसूस कर रही थीं. ठीक उसी तरह जब छोटा बच्चा पड़ोस में जा कर ‘भूख लगी है, कुछ खाने को दो,’ कह कर मां को शर्मिंदा करता है.

इस झेंप को ढकने के लिए मामी अपनी सहेली से पूछने लगीं, ‘‘एससी होने का क्या सुबूत है तुम्हारे पास?’’

सीता तपाक से बोली, ‘‘अरे, क्या इस की दादी को नहीं देखा? रोज सिर पर एक टोकरी रख कर निकलती है. रास्तेभर कागज बटोरती, प्लास्टिक का टूटाफूटा सामान कूड़े से ढूंढ़ती इसी रास्ते से जाती है. ये जितनी औरतें सिर पर टोकरी रख कर निकलती हैं, सब छोटी जात हैं.’’

‘‘उसी वक्त एक औरत सिर पर टोकरी रखे सामने से आती दिखाई पड़ी. मामी ने सीता से पूछा, ‘‘क्या यह औरत भी?’’

‘‘हांहां, यह भी. अभी देखिएगा,’’ सीता ने कहा.

तभी वह औरत सड़क के उस पार वाले घर में घुस गई और टोकरी नीचे रख कर घर की मालकिन को बुलाने लगी. पता लगा कि वह तो सब्जी बेचने वाली थी. तब सीता ने कई और दलीलें दीं, पर मामी ने तो यह मान लिया था कि सीता झूठी है.

सुमित्रा को अचानक हटा देने का डर भी मामी के मन में कहीं न कहीं था. एक तो जल्दी नौकरानी मिलती नहीं, दूसरे एससी मान कर हटाना भी तो गलत होगा.

अब सीता की एकएक बात मामी की समझ में आने लगी. अपनी सहेली द्वारा लगाए गए जाति के लांछन की सचाई भी उन्होंने देख ही ली थी. वे मुसकरा रही थीं कि सीता कैसे अपनी ही बात से झूठी साबित हो गई.

दूसरे दिन मामी ने सुमित्रा को डांटा, ‘‘मुझे क्यों नहीं बताया कि सीता ने तुझे मैक्सी दी है?’’

तब सीधीसादी सुमित्रा ने जोकुछ बताया, उस से सबकुछ साफ हो गया. उस ने बताया कि किस तरह सीता उसे घर ले गई. अहाते की सफाई कराई. पौधों की जड़ों में गोबर डलवाया और 3 घंटे की मजदूरी की एवज में उसे पैसे के बदले पुरानी मैक्सी दी और डोसा खिलाया. साथ में मामी को कुछ भी नहीं बताने की हिदायत भी दी.

यह सुन कर मामी चिढ़ कर सीता पर बुदबुदाने लगीं, ‘‘कौन कहता है उसे पागल? वह तो खुद दूसरों को पागल बना दे. वह तो दूसरों की हमदर्दी का नाजायज फायदा उठाती रहती है और इसी ओट में चालें भी चलती रहती है.’’

उस दिन के बाद सीता ने मामी के घर आना बंद कर दिया. मामी ने कई बार देखा कि वह पड़ोस के घरों में आतीजाती थी, पर मामी को इस बात का बिलकुल भी दुख या मलाल नहीं था कि वह उन के घर नहीं आती. उन्हें उस का दूर रहना ही अच्छा लग रहा था.

एक बार सड़क पर दीपक से सीता मिली थी. दीपक के पूछने पर सीता ने कहा था, ‘‘मैं तो तुम्हारी मामी के घर पानी भी नहीं पी सकती.’’

यह बात दीपक ने मामी से नहीं कही थी, क्योंकि उस से मामी के घाव फिर हरे होते. दीपक ऐसा नहीं चाहता था.

उस दिन सुमित्रा बड़ी लगन से मामी के पैर दबा रही थी और वह बड़े दुलार से उस की ओर देख रही थीं. उसे कुछ खोया देख मामी ने पूछा, ‘‘क्या बात है सुमित्रा?’’

वह हंस कर बोली, ‘‘कुछ नहीं.’’

‘‘कुछ बात तो जरूर है. बड़ा सन्नाटा छाया है. बता, क्या बात है?’’

भोलीभाली सुमित्रा दुखभरी आवाज में कहने लगी, ‘‘बाई, उस जमाने में मेरी दादी को बड़े दुख उठाने पड़े थे.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘अब भी मेरी दादी बड़ी जाति वालों से डरती हैं.’’

‘‘यह बड़ी जाति और छोटी जाति क्या होती है?’’ मामी ने डपटा.

सुमित्रा बड़ी सावधान थी. साफसाफ न बता कर इशारों में बता रही थी, जैसे दूध का जला छाछ भी फूंकफूंक कर पीता है. वह बोली, ‘‘गांव में मेरी दादी को एक बार पुलिस वालों ने खूब मारा था.’’

फिर वह थोड़ा ठहर कर बोली, ‘‘शहर में डर नहीं है बाई.’’

मामी समझ नहीं पा रही थीं कि आखिर सुमित्रा कहना क्या चाह रही थी.

मामी को हैरानी में पड़ा देख सुमित्रा बोली, ‘‘गांव में तो दादी की परछाईं से भी लोग दूर भागते थे. यहां तो हम लोग मंदिर भी जाते हैं, कोई नहीं रोकता.’’

मामी ने पूछा, ‘‘तुम्हारी दादी गांव में करती क्या थीं?’’

‘‘सूअर चराती थीं,’’ जल्दी में या असावधानी में सुमित्रा के मुंह से सच निकल गया. फिर सफाई देते हुए वह बोली, ‘‘अब नहीं चराती हैं.’’

मामी तो मानो आसमान से धरती पर गिरी हों. वह अपने पैर उस के हाथों से धीरे से छुड़ा कर बैठ गईं. सीता की जानकारी में थोड़ा सा भी झूठ उन्हें दिखलाई नहीं पड़ रहा था. उन की आंखों के सामने वह सीन भी घूम गया, जब उन्होंने ‘जलगार जना’ का मतलब सुमित्रा से पूछा था, तब उस का चेहरा फक्क पड़ गया था. उन्होंने भी इधर जवान लड़कियों और औरतों को सड़क से कचरा बीनते देखा था, लेकिन उन में से किसी ने कभी आपस में बातचीत नहीं की थी. उन्हें इतमीनान होता चला गया था कि ये एससी होतीं, तो आपस में बोलतीं जरूर, पर नहीं.

आज मामी को याद आ रहा था उन लड़कियों को देख कर सुमित्रा या तो ठिठक कर कठोर चेहरा बना लेती थी या दूसरी तरफ मुंह मोड़ लेती थी. ऐसा वह क्यों करती थी, यह पहेली मामी सुलझा नहीं पा रही थीं.

मामी को यह भी याद आ रहा था कि अंबेडकर जयंती के दूसरे दिन सुमित्रा अपने देर से आने की सफाई देते हुए बोली थी, ‘‘बाई, कल हमारे दादीबाबा 20 कोस गए थे.’’

‘‘भला क्यों?’’

‘‘50-50 रुपए और एक जून का खाना

मिला था,’’ फिर थोड़ा रुक कर वह बोली थी,

‘‘मैं भी जाती तो 50 रुपए पाती, पर आप के डर से नहीं गई.’’

‘‘किसलिए रुपए मिले थे?’’

‘‘पता नहीं,’’ दोनों हाथ बड़ी सरलता व ईमानदारी से चमका कर सुमित्रा ने कहा था. तब मामी आदतन झुंझला गई थीं. आज दीपक को लग रहा है कि जहां दो जून की रोटी के लाले पड़े हों, पीने के लिए पानी न हो, वहां बौराई आबादी यही

तो करती है. उन का सारा समय तो जुगाड़ में बीत जाता है. ऊपर से उन का ठग मुखिया साल में एक बार 50 रुपए व एक वक्त के भोजन के बल पर चुनाव के आसपास नेताओं की सभा की शोभा बढ़ाता है, वोट दिलाता है.

एकाएक मामी को सुमित्रा में अनेक कमियां नजर आने लगी थीं. चूंकि महीना पूरा होने में एक हफ्ता बाकी था, इसलिए मामी ने उसे अचानक हटाने का पाप अपने सिर पर नहीं लिया. महीना पूरा होते ही उन्होंने उसे आगे से काम पर न आने को कह दिया.

उस वक्त यह बात देखने को मिली कि सुमित्रा के निकालते ही पड़ोसी बड़े खुश हो गए थे. बहुत लोग तो मामी को बधाई देने लगे थे मानो मामी ने सच में बड़ी होशियारी का काम किया.

कुछ ही दिनों बाद मामी अंदर ही अंदर अपने से लड़ती हुई बीमार पड़ गईं. एक हफ्ते बुखार में तपती रहीं.

दीपक को पता था कि मामी के मन में कुछ टीस रहा है. पर वे कह नहीं पा रही थीं मानो वे खुद से जूझते हुए पूछ रही थीं, ‘छुआछूत की प्रथा गई कहां है? बस, गंदगी के ऊपर कालीन बिछा दिया गया है. इतनी जवान, गरीब छोकरियां सड़क पर घूमा करती हैं. कोई उन्हें काम पर नहीं रखता. मैं ही कौन भली हूं? भूल से रख लिया, तो सचाई जानते ही निकाल दिया.’

यह सब देखने के बाद दीपक के दिमाग में एक महापुरुष के शब्द घूमने लगे, ‘यदि अछूतों को अछूत इसलिए माना जाता है कि वे जानवरों को मारते हैं, मांस, रक्त, हड्डियां और मैला छूते हैं, तब तो हर नर्स और डाक्टर को भी अछूत माना जाना चाहिए, जो खाने या बलि देने के लिए जानवरों की हत्या करते हैं.’

ये शब्द बारबार घंटे की तरह दीपक के दिमाग में बज रहे थे. तब वह मामी से यह पूछने के लिए बेचैन हो उठा, ‘तो क्या हम सब और मामा अछूत नहीं हुए?’

उधर सुमित्रा यह जान चुकी थी कि ऊंची जाति वाले आसानी से नहीं बदलने वाले. वे उन लोगों को बारबार एहसास दिलाएंगे कि तुम्हारा जन्म नीच कुल में हुआ है, नीचे रहोगे. वक्तजरूरत पर जरूर काम के लिए बुला लेंगे. कुरसी पर बैठा भी देंगे, पर उतरते ही उसे छींटे मार कर धोने से बाज नहीं आएंगे.

दीपक की मामी भी उस मकड़जाल से नहीं निकल पाईं, जो समाज ने उन के चारों ओर बुन रखा था. उन्हें सुमित्रा की जाति से न कोई शिकायत थी, न अलगाव पर पड़ोसियोंरिश्तेदारों का वे क्या करें. सुमित्रा ने उन्हें कब का माफ कर दिया, पर मामी खुद को सालों तक माफ नहीं कर पाईं.

बहन का सुहाग: चंचल रिया की चालाकी

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उलझे रिश्ते: क्या प्रेमी से बिछड़कर खुश रह पाई रश्मि

दिन भर की भागदौड़. फिर घर लौटने पर पति और बच्चों को डिनर करवा कर रश्मि जब बैडरूम में पहुंची तब तक 10 बज चुके थे. उस ने फटाफट नाइट ड्रैस पहनी और फ्रैश हो कर बिस्तर पर आ गई. वह थक कर चूर हो चुकी थी. उसे लगा कि नींद जल्दी ही आ घेरेगी. लेकिन नींद न आई तो उस ने अनमने मन से लेटेलेटे ही टीवी का रिमोट दबाया. कोई न्यूज चैनल चल रहा था. उस पर अचानक एक न्यूज ने उसे चौंका दिया. वह स्तब्ध रह गई. यह क्या हुआ?

सुधीर ने मैट्रो के आगे कूद कर सुसाइड कर लिया. उस की आंखों से अश्रुधारा बह निकली. उस का मन किया कि वह जोरजोर से रोए. लेकिन उसे लगा कि कहीं उस का रोना सुन कर पास के कमरे में सो रहे बच्चे जाग न जाएं. पति संभव भी तो दूसरे कमरे में अपने कारोबार का काम निबटाने में लगे थे. रश्मि ने रुलाई रोकने के लिए अपने मुंह पर हाथ रख लिया, लेकिन काफी देर तक रोती रही. शादी से पूर्व का पूरा जीवन उस की आंखों के सामने घूम गया.

बचपन से ही रश्मि काफी बिंदास, चंचल और खुले मिजाज की लड़की थी. आधुनिकता और फैशन पर वह सब से ज्यादा खर्च करती थी. पिता बड़े उद्योगपति थे. इसलिए घर में रुपयोंपैसों की कमी नहीं थी. तीखे नैननक्श वाली रश्मि ने जब कालेज में प्रवेश लिया तो पहले ही दिन सुधीर से उस की आंखें चार हो गईं.

‘‘हैलो आई एम रश्मि,’’ रश्मि ने खुद आगे बढ़ कर सुधीर की तरफ हाथ बढ़ाया. किसी लड़की को यों अचानक हाथ आगे बढ़ाता देख सुधीर अचकचा गया. शर्माते हुए उस ने कहा, ‘‘हैलो, मैं सुधीर हूं.’’

‘‘कहां रहते हो, कौन सी क्लास में हो?’’ रश्मि ने पूछा.

‘‘अभी इस शहर में नया आया हूं. पापा आर्मी में हैं. बी.कौम प्रथम वर्ष का छात्र हूं.’’ सुधीर ने एक सांस में जवाब दिया.

‘‘ओह तो तुम भी मेरे साथ ही हो. मेरा मतलब हम एक ही क्लास में हैं,’’ रश्मि ने चहकते हुए कहा. उस दिन दोनों क्लास में फ्रंट लाइन में एकदूसरे के आसपास ही बैठे. प्रोफैसर ने पूरी क्लास के विद्यार्थियों का परिचय लिया तो पता चला कि रश्मि पढ़ाई में अव्वल है. कालेज टाइम के बाद सुधीर और रश्मि साथसाथ बाहर निकले तो पता चला कि सुधीर को पापा का ड्राइवर कालेज छोड़ गया था. रश्मि ने अपनी मोपेड बाहर निकाली और कहा, ‘‘चलो मैं तुम्हें घर छोड़ती हूं.’’

‘‘नहीं नहीं ड्राइवर आने ही वाला है.’’

‘‘अरे, चलो भई रश्मि खा नहीं जाएगी,’’ रश्मि के कहने का अंदाज कुछ ऐसा था कि सुधीर उस की मोपेड पर बैठ गया. पूरे रास्ते रश्मि की चपरचपर चलती रही. उसे इस बात का खयाल ही नहीं रहा कि वह सुधीर से पूछे कि कहां जाना है. बातोंबातों में रश्मि अपने घर की गली में पहुंची, तो सुधीर ने कहा, ‘‘बस यही छोड़ दो.’’

‘‘ओह सौरी, मैं तो पूछना ही भूल गई कि आप को कहां छोड़ना है. मैं तो बातोंबातों में अपने घर की गली में आ गई.’’

‘‘बस यहीं तो छोड़ना है. वह सामने वाला मकान हमारा है. अभी कुछ दिन पहले ही किराए पर लिया है पापा ने.’’

‘‘अच्छा तो आप लोग आए हो हमारे पड़ोस में,’’ रश्मि ने कहा

‘‘जी हां.’’

‘‘चलो, फिर तो हम दोनों साथसाथ कालेज जायाआया करेंगे.’’ रश्मि और सुधीर के बाद के दिन यों ही गुजरते गए. पहली मुलाकात दोस्ती में और दोस्ती प्यार में जाने कब बदल गई पता ही न चला. रश्मि का सुधीर के घर यों आनाजाना होता जैसे वह घर की ही सदस्य हो. सुधीर की मम्मी रश्मि से खूब प्यार करती थीं. कहती थीं कि तुझे तो अपनी बहू बनाऊंगी. इस प्यार को पा कर रश्मि के मन में भी नई उमंगें पैदा हो गईं. वह सुधीर को अपने जीवनसाथी के रूप में देख कर कल्पनाएं करती. एक दिन सुधीर घर में अकेला था, तो उस ने रश्मि को फोन कर कहा, ‘‘घर आ जाओ कुछ काम है.’’

जब रश्मि पहुंची तो दरवाजे पर मिल गया सुधीर. बोला, ‘‘मैं एक टौपिक पढ़ रहा था, लेकिन कुछ समझ नहीं आ रहा था. सोचा तुम से पूछ लेता हूं.’’

‘‘तो दरवाजा क्यों बंद कर रहे हो? आंटी कहां है?’’

‘‘यहीं हैं, क्यों चिंता कर रही हो? ऐसे डर रही हो जैसे अकेला हूं तो खा जाऊंगा,’’ यह कहते हुए सुधीर ने रश्मि का हाथ थाम उसे अपनी ओर खींच लिया. सुधीर के अचानक इस बरताव से रश्मि सहम गई. वह छुइमुई सी सुधीर की बांहों में समाती चली गई.

‘‘क्या कर रहे हो सुधीर, छोड़ो मुझे,’’ वह बोली लेकिन सुधीर ने एक न सुनी. वह बोला,  ‘‘आई लव यू रश्मि.’’

‘‘जानती हूं पर यह कौन सा तरीका है?’’ रश्मि ने प्यार से समझाने की कोशिश की,  ‘‘कुछ दिन इंतजार करो मिस्टर. रश्मि तुम्हारी है. एक दिन पूरी तरह तुम्हारी हो जाएगी.’’ परंतु सुधीर पर कोई असर नहीं हुआ. हद से आगे बढ़ता देख रश्मि ने सुधीर को धक्का दिया और हिरणी सी कुलांचे भरती हुई घर से बाहर निकल गई. उस रात रश्मि सो नहीं पाई. उसे सुधीर का यों बांहों में लेना अच्छा लगा. कुछ देर और रुक जाती तो…सोच कर सिहरन सी दौड़ गई. और एक दिन ऐसा आया जब पढ़ाई की आड़ में चल रहा प्यार का खेल पकड़ा गया. दोनों अब तक बी.कौम अंतिम वर्ष में प्रवेश कर चुके थे और एकदूजे में इस कदर खो चुके थे कि उन्हें आभास भी नहीं था कि इस रिश्ते को रश्मि के पिता और भाई कतई स्वीकार नहीं करेंगे. उस दिन रश्मि के घर कोई नहीं था. वह अकेली थी कि सुधीर पहुंच गया. उसे देख रश्मि की धड़कनें बढ़ गईं. वह बोली,  ‘‘सुधीर जाओ तुम, पापा आने वाले हैं.’’

‘‘तो क्या हो गया. दामाद अपने ससुराल ही तो आया है,’’ सुधीर ने मजाकिया लहजे में कहा.

‘‘नहीं, तुम जाओ प्लीज.’’

‘‘रुको डार्लिंग यों धक्के मार कर क्यों घर से निकाल रही हो?’’ कहते हुए सुधीर ने रश्मि को अपनी बांहों में भर लिया. तभी जो न होना चाहिए था वह हो गया. रश्मि के पापा ने अचानक घर में प्रवेश किया और दोनों को एकदूसरे की बांहों में समाया देख आगबबूला हो गए. फिर पता नहीं कितने लातघूंसे सुधीर को पड़े. सुधीर कुछ बोल नहीं पाया. बस पिटता रहा. जब होश आया तो अपने घर में लेटा हुआ था. सुधीर और रश्मि के परिवारजनों की बैठक हुई. सुधीर की मम्मी ने प्रस्ताव रखा कि वे रश्मि को बहू बनाने को तैयार हैं. फिर काफी सोचविचार हुआ. रश्मि के पापा ने कहा,  ‘‘बेटी को कुएं में धकेल दूंगा पर इस लड़के से शादी नहीं करूंगा. जब कोई काम नहीं करता तो क्या खाएगाखिलाएगा?’’ आखिर तय हुआ कि रश्मि की शादी जल्द से जल्द किसी अच्छे परिवार के लड़के से कर दी जाए. रश्मि और सुधीर के मिलने पर पाबंदी लग गई पर वे दोनों कहीं न कहीं मिलने का रास्ता निकाल ही लेते. और एक दिन रश्मि के पापा ने घर में बताया कि दिल्ली से लड़के वाले आ रहे हैं रश्मि को देखने. यह सुन कर रश्मि को अपने सपने टूटते नजर आए. उस ने कुछ नहीं खायापीया.

भाभी ने समझाया, ‘‘यह बचपना छोड़ो रश्मि, हम इज्जतदार खानदानी परिवार से हैं. सब की इज्जत चली जाएगी.’’

‘‘तो मैं क्या करूं? इस घर में बच्चों की खुशी का खयाल नहीं रखा जाता. दोनों दीदी कौन सी सुखी हैं अपने पतियों के साथ.’’

‘‘तेरी बात ठीक है रश्मि, लेकिन समाज, परिवार में ये बातें माने नहीं रखतीं. तेरे गम में पापा को कुछ हो गया तो…उन्होंने कुछ कर लिया तो सब खत्म हो जाएगा न.’’

रश्मि कुछ नहीं बोल पाई. उसी दिन दिल्ली से लड़का संभव अपने छोटे भाई राजीव और एक रिश्तेदार के साथ रश्मि को देखने आया. रश्मि को देखते ही सब ने पसंद कर लिया. रिश्ता फाइनल हो गया. जब यह बात सुधीर को रश्मि की एक सहेली से पता चली तो उस ने पूरी गली में कुहराम मचा दिया,  ‘‘देखता हूं कैसे शादी करते हैं. रश्मि की शादी होगी तो सिर्फ मेरे साथ. रश्मि मेरी है.’’ पागल सा हो गया सुधीर. इधरउधर बेतहाशा दौड़ा गली में. पत्थर मारमार कर रश्मि के घर की खिड़कियों के शीशे तोड़ डाले. रश्मि के पिता के मन में डर बैठ गया कि कहीं ऐसा न हो कि लड़के वालों को इस बात का पता चल जाए. तब तो इज्जत चली जाएगी. सब हालात देख कर तय हुआ कि रश्मि की शादी किसी दूसरे शहर में जा कर करेंगे. किसी को कानोंकान खबर भी नहीं होगी. अब एक तरफ प्यार, दूसरी तरफ मांबाप के प्रति जिम्मेदारी. बहुत तड़पी, बहुत रोई रश्मि और एक दिन उस ने अपनी भाभी से कहा, ‘‘मैं अपने प्यार का बलिदान देने को तैयार हूं. परंतु मेरी एक शर्त है. मुझे एक बार सुधीर से मिलने की इजाजत दी जाए. मैं उसे समझाऊंगी. मुझे पूरी उम्मीद है वह मान जाएगा.’’

भाभी ने घर वालों से छिपा कर रश्मि को सुधीर से आखिरी बार मिलने की इजाजत दे दी. रश्मि को अपने करीब पा कर फूटफूट कर रोया सुधीर. उस के पांवों में गिर पड़ा. लिपट गया किसी नादान छोटे बच्चे की तरह,  ‘‘मुझे छोड़ कर मत जाओ रश्मि. मैं नहीं जी  पाऊंगा, तुम्हारे बिना. मर जाऊंगा.’’ यंत्रवत खड़ी रह गई रश्मि. सुधीर की यह हालत देख कर वह खुद को नहीं रोक पाई. लिपट गई सुधीर से और फफक पड़ी, ‘‘नहीं सुधीर, तुम ऐसा मत कहो, तुम बच्चे नहीं हो,’’ रोतेरोते रश्मि ने कहा.

‘‘नहीं रश्मि मैं नहीं रह पाऊंगा, तुम बिन,’’ सुबकते हुए सुधीर ने कहा.

‘‘अगर तुम ने मुझ से सच्चा प्यार किया है तो तुम्हें मुझ से दूर जाना होगा. मुझे भुलाना होगा,’’ यह सब कह कर काफी देर समझाती रही रश्मि और आखिर अपने दिल पर पत्थर रख कर सुधीर को समझाने में सफल रही. सुधीर ने उस से वादा किया कि वह कोई बखेड़ा नहीं करेगा. ‘‘जब भी मायके आऊंगी तुम से मिलूंगी जरूर, यह मेरा भी वादा है,’’ रश्मि यह वादा कर घर लौट आई. पापा किसी तरह का खतरा मोल नहीं लेना चाहते थे, इसलिए एक दिन रात को घर के सब लोग चले गए एक अनजान शहर में. रश्मि की शादी दिल्ली के एक जानेमाने खानदान में हो गई. ससुराल आ कर रश्मि को पता चला कि उस के पति संभव ने शादी तो उस से कर ली पर असली शादी तो उस ने अपने कारोबार से कर रखी है. देर रात तक कारोबार का काम निबटाना संभव की प्राथमिकता थी. रश्मि देर रात तक सीढि़यों में बैठ कर संभव का इंतजार करती. कभीकभी वहीं बैठेबैठे सो जाती. एक तरफ प्यार की टीस, दूसरी तरफ पति की उपेक्षा से रश्मि टूट कर रह गई. ससुराल में पासपड़ोस की हमउम्र लड़कियां आतीं तो रश्मि से मजाक करतीं  ‘‘आज तो भाभी के गालों पर निशान पड़ गए. भइया ने लगता है सारी रात सोने नहीं दिया.’’ रश्मि मुसकरा कर रह जाती. करती भी क्या, अपना दर्द किस से बयां करती? पड़ोस में ही महेशजी का परिवार था. उन के एक कमरे की खिड़की रश्मि के कमरे की तरफ खुलती थी. यदाकदा रात को वह खिड़की खुली रहती तो महेशजी के नवविवाहित पुत्र की प्रणयलीला रश्मि को देखने को मिल जाती. तब सिसक कर रह जाने के सिवा और कोई चारा नहीं रह जाता था रश्मि के पास.

संभव जब कभी रात में अपने कामकाज से जल्दी फ्री हो जाता तो रश्मि के पास चला आता. लेकिन तब तक संभव इतना थक चुका होता कि बिस्तर पर आते ही खर्राटे भरने लगता. एक दिन संभव कारोबार के सिलसिले में बाहर गया था और रश्मि तपती दोपहर में  फर्स्ट फ्लोर पर बने अपने कमरे में सो रही थी. अचानक उसे एहसास हुआ कोई उस के बगल में आ कर लेट गया है. रश्मि को अपनी पीठ पर किसी मर्दाना हाथ का स्पर्श महसूस हुआ. वह आंखें मूंदे पड़ी रही. वह स्पर्श उसे अच्छा लगा. उस की धड़कनें तेज हो गईं. सांसें धौंकनी की तरह चलने लगीं. उसे लगा शायद संभव है, लेकिन यह उस का देवर राजीव था. उसे कोई एतराज न करता देख राजीव का हौसला बढ़ गया तो रश्मि को कुछ अजीब लगा. उस ने पलट कर देखा तो एक झटके से बिस्तर पर उठ बैठी और कड़े स्वर में राजीव से कहा कि जाओ अपने रूम में, नहीं तो तुम्हारे भैया को सारी बात बता दूंगी, तो वह तुरंत उठा और चला गया. उधर सुधीर ने एक दिन कहीं से रश्मि की ससुराल का फोन नंबर ले कर रश्मि को फोन किया तो उस ने उस से कहा कि सुधीर, तुम्हें मैं ने मना किया था न कि अब कभी मुझ से संपर्क नहीं करना. मैं ने तुम से प्यार किया था. मैं उन यादों को खत्म नहीं करना चाहती. प्लीज, अब फिर कभी मुझ से संपर्क न करना. तब उम्मीद के विपरीत रश्मि के इस तरह के बरताव के बाद सुधीर ने फिर कभी रश्मि से संपर्क नहीं किया.

रश्मि अपने पति के रूखे और ठंडे व्यवहार से तो परेशान थी ही उस की सास भी कम नहीं थीं. रश्मि ने फिल्मों में ललिता पंवार को सास के रूप में देखा था. उसे लगा वही फिल्मी चरित्र उस की लाइफ में आ गया है. हसीन ख्वाबों को लिए उड़ने वाली रश्मि धरातल पर आ गई. संभव के साथ जैसेतैसे ऐडजस्ट किया उस ने परंतु सास से उस की पटरी नहीं बैठ पाई. संभव को भी लगा अब सासबहू का एकसाथ रहना मुश्किल है. तब सब ने मिल कर तय किया कि संभव रश्मि को ले कर अलग घर में रहेगा. कुछ ही दूरी पर किराए का मकान तलाशा गया और रश्मि नए घर में आ गई. अब तक उस के 2 प्यारेप्यारे बच्चे भी हो चुके थे. शादी के 12 साल कब बीत गए पता ही नहीं चला. नए घर में आ कर रश्मि के सपने फिर से जाग उठे. उमंगें जवां हो गईं. उस ने कार चलाना सीख लिया. पेंटिंग का उसे शौक था. उस ने एक से बढ़ कर एक पोट्रेट तैयार किए. जो देखता वह देखता ही रह जाता. अपने बेटे साहिल को पढ़ाने के लिए रश्मि ने हिमेश को ट्यूटर रख लिया. वह साहिल को पढ़ाने के लिए अकसर दोपहर बाद आता था जब संभव घर होता था. 28-30 वर्षीय हिमेश बहुत आकर्षक और तहजीब वाला अध्यापक था. रश्मि को उस का व्यक्तित्व बेहद आकर्षक लगता था. खुले विचारों की रश्मि हिमेश से हंसबोल लेती. हिमेश अविवाहित था. उस ने रश्मि के हंसीमजाक को अलग रूप में देखा. उसे लगा कि रश्मि उसे पसंद करती है. लेकिन रश्मि के मन में ऐसा दूरदूर तक न था. वह उसे एक शिक्षक के रूप में देखती और इज्जत देती. एक दिन रश्मि घर पर अकेली थी. साहिल अपने दोस्त के घर गया था. हिमेश आया तो रश्मि ने कहा कि कोई बात नहीं, आप बैठिए. हम बातें करते हैं. कुछ देर में साहिल आ जाएगा.

रश्मि चाय बना लाई और दोनों सोफे पर बैठ गए. रश्मि ने बताया कि वह राधाकृष्ण की एक बहुत बड़ी पोट्रेट तैयार करने जा रही है. उस में राधाकृष्ण के प्यार को दिखाया गया है. यह बताते हुए रश्मि अपने अतीत में डूब गई. उस की आंखों के सामने सुधीर का चेहरा घूम गया. हिमेश कुछ और समझ बैठा. उस ने एक हिमाकत कर डाली. अचानक रश्मि का हाथ थामा और ‘आई लव यू’ कह डाला. रश्मि को लगा जैसे कोई बम फट गया है. गुस्से से उस का चेहरा लाल हो गया. वह अचानक उठी और क्रोध में बोली, ‘‘आप उठिए और तुरंत यहां से चले जाइए. और दोबारा इस घर में पांव मत रखिएगा वरना बहुत बुरा होगा.’’ हिमेश को तो जैसे सांप सूंघ गया. रश्मि का क्रोध देख उस के हाथ कांपने लगे.

‘‘आ…आ… आप मुझे गलत समझ रही हैं मैडम,’’ उस ने कांपते स्वर में कहा.

‘‘गलत मैं नहीं समझ रही आप ने मुझे समझा है. एक शिक्षक के नाते मैं आप की इज्जत करती रही और आप ने मुझे क्या समझ लिया?’’ फिर एक पल भी नहीं रुका हिमेश. उस के बाद उस ने कभी रश्मि के घर की तरफ देखा भी नहीं. जब कभी साहिल ने पूछा रश्मि से तो उस से उस ने कहा कि सर बाहर रहने लगे हैं. रश्मि की जिंदगी फिर से दौड़ने लगी. एक दिन एक पांच सितारा होटल में लगी डायमंड ज्वैलरी की प्रदर्शनी में एक संभ्रात परिवार की 30-35 वर्षीय महिला ऊर्जा से रश्मि की मुलाकात हुई. बातों ही बातों में दोनों इतनी घुलमिल गईं कि दोस्त बन गईं. वह सच में ऊर्जा ही थी. गजब की फुरती थी उस में. ऊर्जा ने बताया कि वह अपने घर पर योगा करती है. योगा सिखाने और अभ्यास कराने योगा सर आते हैं. रश्मि को लगा वह भी ऊर्जा की तरह गठीले और आकर्षक फिगर वाली हो जाए तो मजा आ जाए. तब हर कोई उसे देखता ही रह जाएगा.

ऊर्जा ने स्वाति से कहा कि मैं योगा सर को तुम्हारा मोबाइल नंबर दे दूंगी. वे तुम से संपर्क कर लेंगे. रश्मि ने अपने पति संभव को मना लिया कि वह घर पर योगा सर से योगा सीखेगी. एक दिन रश्मि के मोबाइल घंटी बजी. उस ने देखा तो कोई नया नंबर था. रश्मि ने फोन उठाया तो उधर से आवाज आई,  ‘‘हैलो मैडम, मैं योगा सर बोल रहा हूं. ऊर्जा मैडम ने आप का नंबर दिया था. आप योगा सीखना चाहती हैं?’’‘‘जी हां मैं ने कहा था, ऊर्जा से,’’ रश्मि ने कहा.

‘‘तो कहिए कब से आना है?’’

‘‘किस टाइम आ सकते हैं आप?’’

‘‘कल सुबह 6 बजे आ जाता हूं. आप अपना ऐडै्रस नोट करा दें.’’

रश्मि ने अपना ऐड्रैस नोट कराया. सुबह 5.30 बजे का अलार्म बजा तो रश्मि जाग गई. योगा सर 6 बजे आ जाएंगे यही सोच कर वह आधे घंटे में फ्रैश हो कर तैयार रहना चाहती थी. बच्चे और पति संभव सो रहे थे. उन्हें 8 बजे उठने की आदत थी. रश्मि उठते ही बाथरूम में घुस गई. फ्रैश हो कर योगा की ड्रैस पहनी तब तक 6 बजने जा रहे थे कि अचानक डोरबैल बजी. योगा सर ही हैं यह सोच कर उस ने दौड़ कर दरवाजा खोला. दरवाजा खोला तो सामने खड़े शख्स को देख कर वह स्तब्ध रह गई. उस के सामने सुधीर खड़ा था. वही सुधीर जो उस की यादों में बसा रहता था.

‘‘तुम योगा सर?’’ रश्मि ने पूछा.

‘‘हां.’’

फिर सुधीर ने, ‘‘अंदर आने को नहीं कहोगी?’’ कहा तो रश्मि हड़बड़ा गई.

‘‘हांहां आओ, आओ न प्लीज,’’ उस ने कहा. सुधीर अंदर आया तो रश्मि ने सोफे की तरफ इशारा करते हुए उसे बैठने को कहा. दोनों एकदूसरे के सामने बैठे थे. रश्मि को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या बोले, क्या नहीं. सुधीर कहे या योगा सर. रश्मि सहज नहीं हो पा रही थी. उस के मन में सुधीर को ले कर अनेक सवाल चल रहे थे. कुछ देर में वह सामान्य हो गई, तो सुधीर से पूछ लिया, ‘‘इतने साल कहां रहे?’’

सुधीर चुप रहा तो रश्मि फिर बोली, ‘‘प्लीज सुधीर, मुझे ऐसी सजा मत दो. आखिर हम ने प्यार किया था. मुझे इतना तो हक है जानने का. मुझे बताओ, यहां तक कैसे पहुंचे और अंकलआंटी कहां हैं? तुम कैसे हो?’’ रश्मि के आग्रह पर सुधीर को झुकना पड़ा. उस ने बताया कि तुम से अलग हो कर कुछ टाइम मेरा मानसिक संतुलन बिगड़ा रहा. फिर थोड़ा सुधरा तो शादी की, लेकिन पत्नी ज्यादा दिन साथ नहीं दे पाई. घरबार छोड़ कर चली गई और किसी और केसाथ घर बसा लिया. फिर काफी दिनों के इलाज के बाद ठीक हुआ तो योगा सीखतेसीखते योगा सर बन गया. तब किसी योगाचार्य के माध्यम से दिल्ली आ गया. मम्मीपापा आज भी वहीं हैं उसी शहर में. सुधीर की बातें सुन अंदर तक हिल गई रश्मि. यह जिंदगी का कैसा खेल है. जो उस से बेइंतहां प्यार करता था, वह आज किस हाल में है सोचती रह गई रश्मि. अजब धर्मसंकट था उस के सामने. एक तरफ प्यार दूसरी तरफ घरसंसार. क्या करे? सुधीर को घर आने की अनुमति दे या नहीं? अगर बारबार सुधीर घर आया तो क्या असर पड़ेगा गृहस्थी पर? माना कि किसी को पता नहीं चलेगा कि योगा सर के रूप में सुधीर है, लेकिन कहीं वह खुद कमजोर पड़ गई तो? उस के 2 छोटेछोटे बच्चे भी हैं. गृहस्थी जैसी भी है बिखर जाएगी. उस ने तय कर लिया कि वह सुधीर को योगा सर के रूप में स्वीकार नहीं करेगी. कहीं दूर चले जाने को कह देगी इसी वक्त.

‘‘देखो सुधीर मैं तुम से योगा नहीं सीखना चाहती,’’ रश्मि ने अचानक सामान्य बातचीत का क्रम तोड़ते हुए कहा.

‘‘पर क्यों रश्मि?’’

‘‘हमारे लिए यही ठीक रहेगा सुधीर, प्लीज समझो.’’

‘‘अब तुम शादीशुदा हो. अब वह बचपन वाली बात नहीं है रश्मि. क्या हम अच्छे दोस्त बन कर भी नहीं रह सकते?’’ सुधीर ने लगभग गिड़गिड़ाने के अंदाज में कहा.

‘‘नहीं सुधीर, मैं ऐसा कोई काम नहीं करूंगी, जिस से मेरी गृहस्थी, मेरे बच्चों पर असर पड़े,’’ रश्मि ने कहा. सुधीर ने लाख समझाया पर रश्मि अपने फैसले पर अडिग रही. सुधीर बेचैन हो गया. सालों बाद उस का प्यार उस के सामने था, लेकिन वह उस की बात स्वीकार नहीं कर रहा था. आखिर रश्मि ने सुधीर को विदा कर दिया. साथ ही कहा कि दोबारा संपर्क की कोशिश न करे. सुधीर रश्मि से अलग होते वक्त बहुत तनावग्रस्त था. पर उस दिन के बाद सुधीर ने रश्मि से संपर्क नहीं किया. रश्मि ने तनावमुक्त होने के लिए कई नई फ्रैंड्स बनाईं और उन के साथ बहुत सी गतिविधियों में व्यस्त हो गई. इस से उस का सामाजिक दायरा बहुत बढ़ गया. उस दिन वह बहुत से बाहर के फिर घर के काम निबटा कर बैडरूम में पहुंची तो न्यूज चैनल पर उस ने वह खबर देखी कि सुधीर ने दिल्ली मैट्रो के आगे कूद कर सुसाइड कर लिया था. वह देर तक रोती रही. न्यूज उद्घोषक बता रही थी कि उस की जेब में एक सुसाइड नोट मिला है, जिस में अपनी मौत के लिए उस ने किसी को जिम्मेदार नहीं माना परंतु अपनी एक गुमनाम प्रेमिका के नाम पत्र लिखा है. रश्मि का सिर घूम रहा था. उस की रुलाई फूट पड़ी. तभी संभव ने अचानक कमरे में प्रवेश किया और बोला, ‘‘क्या हुआ रश्मि, क्यों रो रही हो? कोई डरावना सपना देखा क्या?’’ प्यार भरे बोल सुन रश्मि की रुलाई और फूट पड़ी. वह काफी देर तक संभव के कंधे से लग कर रोती रही. उस का प्यार खत्म हो गया था. सिर्फ यादें ही शेष रह गई थीं.

लुट गई जोगी तेरे प्यार में : क्या थी मौलाना की शर्त

जमीला और शर्मिला पक्की सहेलियां थीं. उन की दोस्ती को देख कर घरपरिवार वाले और पड़ोसी उन्हें दो जिस्म एक जान कहते थे.

दोनों सहेलियों ने गांव में ही एकसाथ पढ़ाई की थी. आगे की पढ़ाई के लिए गांव में स्कूल न होने, गरीबी और परदा प्रथा की वजह से उन के परिवारों ने आगे दिलचस्पी नहीं दिखाई. नतीजतन, वे दोनों घर पर ही रह कर परिवार के साथ बीड़ी बनाने का काम करने लगीं.

जमीला कब जवान हो गई, उस की समझ में नहीं आया. घर के बड़ेबूढ़े जब उसे टोकते, ‘बड़ी हो गई है तू, ठीक से दुपट्टा ओढ़ कर बाहर निकला कर. अकेले घूमने मत जाना. बहू, इसे नकाब ला कर दे. अब कोई छोटी बच्ची थोड़े ही है, बड़ी हो गई…’

वह सोचती, ‘आखिर मुझ में ऐसा क्या हुआ है? जब मैं स्कूल जाती थी, तब कोई कुछ नहीं कहता था.’

शर्मिला की शादी पास के गांव में हो गई और जमीला अकेली रह गई. दिल की बात कहनेसुनने वाला कोई न रहा. उस की जिंदगी कैद के पंछी की तरह रह गई. बीड़ी बनाते और घर का काम करतेकरते उस का दम घुटने लगा.

समय पंख लगा कर उड़ने लगा. जवानी जमीला को जिंदगी का मजा लूटने की दावत देने लगी. वह अंदर ही अंदर कसमसाने लगी. जब वह जवान जोड़ों को देखती, तो उस की बेचैनी और बढ़ जाती. शहनाई की आवाज सुन कर वह जोश में आ जाती.

‘‘जमीला के अब्बू, देखना… जमीला को क्या हुआ है…’’ उस की मां ने घबरा कर आवाज दी.

‘‘आया बेगम,’’ बाहर अपने दोस्तों के साथ बैठे जमीला के अब्बू जावेद मियां ने कहा.

वे दौड़ेदौड़े बैठक में आए, जहां जमीला अकेली बैठी बीड़ी बनातेबनाते बेहोश हो कर गिर गई थी.

‘‘क्या हुआ बेटी, देखो मुझे… आंखें खोलो… बेगम, पानी लाओ… इस के मुंह पर पानी के छींटे मारो,’’ जावेद मियां ने कहा.

तब तक उन के दोस्त भी अंदर आ गए थे.

‘‘कैसे हो गया यह सब?’’ मौलाना ने पूछा, जो जावेद के दोस्त थे.

‘‘क्या बताऊं… जमीला बैठी बीड़ी बना रही थी कि एकाएक बेहोश हो कर गिर पड़ी,’’ जमीला की मां ने बताया.

मौलाना ने झाड़फूंक शुरू कर दी. मुंह पर पानी के छींटे मारे, प्याज

सुंघाई गई और तकरीबन आधा घंटे बाद जमीला को होश आ गया.

जमीला कुछ थकीथकी सी लग

रही थी, इसलिए उसे आराम करने की सलाह दे कर जावेद मियां के दोस्त वहां से चले गए.

दूसरे दिन मौलाना ने जावेद मियां के घर पर दस्तक दी. दोनों बैठ कर जमीला की बीमारी पर बातचीत करने लगे.

‘‘देखो जावेद मियां, ऐसे हालात

में लड़की की शादी करने में मुश्किल आएगी,’’ मौलवी ने कहा.

‘‘बात तो सही है, पर इस का कोई उपाय तो बताओ?

‘‘जमीला के ठीक होते ही मुझे जैसा भी लड़का मिलेगा, मैं उस की शादी कर दूंगा,’’ कह कर जावेद मियां चुप हो गए.

‘‘ठीक है, मैं पता करता हूं, फिर तुम्हें खबर करूंगा…’’ मौलाना ने कहा, ‘‘अब मैं चलता हूं.’’

तकरीबन हफ्तेभर बाद मौलाना जावेद मियां के घर दोबारा आए.

‘‘आओ मौलाना, काफी दिन बाद आना हुआ,’’ जावेद मियां ने कहा.

‘‘मैं तुम्हारे काम में लगा था. बड़ी मुश्किल से एक शख्स मिला है. उस का कहना है कि वह लड़की को ठीक कर देगा. कुछ वक्त लगेगा, पैसा भी खर्च होगा. जब तक झाड़फूंक चलेगी, तब तक यह बात किसी तक न पहुंचे, वरना इल्म टूट जाएगा.’’

‘‘मौलाना, मुझे हर शर्त मंजूर है. तुम आज से ही इलाज शुरू करा दो. अपनी बेटी की बेहतरी के लिए मैं कुछ भी करने को तैयार हूं.’’

मौलाना के मन में खोट था. उस ने अपने एक दूर के साले असद से इस पूरे मसले पर पहले ही बात कर ली थी.

मौलाना ने उस से कहा था, ‘देखो मियां, मैं ने सौदा पटा लिया है. जावेद मियां की जमीन अपनी जमीन से लगी हुई है. हमें उसे हड़पना है. अब जा कर फंसा है. पहले तो बड़ीबड़ी बातें करता था, खेत जाने का रास्ता बंद कर दिया था, इसलिए मजबूरी में मुझे उस से दोस्ती करनी पड़ी.

‘तुम ऐसी चाल चलो कि जावेद की जमीन बिक जाए और वह मुझे मिल जाए.’

असद एक शातिर बदमाश था. उस की बीवी उस की हरकतों से तंग आ कर पिछले 10 सालों से अपने मायके में बैठी थी. गांव के भोलेभाले लोगों को गंडेतावीज बना कर देना, उन से रकम ऐंठना उस का पेशा था.

असद ने जावेद मियां के घर आ कर अपना काम शुरू कर दिया.

शुरूशुरू में तो जमीला को कुछ अच्छा न लगा, लेकिन अकेले में पराए मर्द को पा कर वह धीरेधीरे खुश रहने लगी.

जब असद को महसूस हुआ कि जमीला उस की ओर खिंच रही है, तो उस ने जावेद मियां से कहा, ‘‘जावेद साहब, कुछ जरूरी काम से मैं 1-2 दिन के लिए घर जा रहा हूं, लेकिन जल्दी ही वापस आ जाऊंगा.’’

जाने से पहले मौलाना और असद के बीच साजिश की लंबी बात चली. इसी के तहत वह अचानक अपने घर चला गया.

इधर जावेद मियां परेशान हो उठे, क्योंकि जमीला फिर से बारबार बेहोश होने लगी थी.

वे घबरा कर मौलाना के पास गए और असद को जल्द से जल्द बुलाने की गुहार लगाई.

मौलाना की खबर पा कर असद वापस आया ही था कि 8-10 मर्द और औरत उसे ढूंढ़ते हुए जावेद मियां के घर जा पहुंचे.

वे सभी गुजारिश करने लगे, ‘जोगी बाबा गांव वापस चलो, हम सब परेशान होने लगे हैं.’

इसी बीच मौलाना ने आ कर लोगों को समझीया कि आप के जोगी बाबा 2 दिन बाद आप के पास आ जाएंगे.

रात में असद उर्फ जोगी बाबा के शरीर में भयानक हलचल होने लगी और वह जोरजोर से हंसने लगा. घर के सभी लोग जाग गए. बाहर से आए उस के चेले दुआ मांगने लगे, परेशानी से बचने के उपाय पूछने लगे.

जोगी बाबा का गुस्से से भरा मिजाज देख कर सब डर गए. असद ने बताया कि जावेद के घर के पीछे किसी ने काला जादू कर दिया है, उसे निकाल कर नदी में डाल दो.

पर सावधान, किसी की जान जा सकती है. 5 क्विंटल पुलाव बना कर फातिहा दिलाओ और पहले कहीं से काले जादू की पुडि़या ढूंढ़ो. ज्यादा से ज्यादा लोगों को खाना खिलाओ. जोगी बाबा जो कहे वह करो. सब ठीक हो जाएगा.

काफी मशक्कत के बाद आखिर कपड़े में लिपटी एक पुडि़या मिल गई.

उस पुडि़या में हड्डी, काजल, सिंदूर, अनाज, काली चूड़ी वगैरह मिली. शक अब यकीन में बदल गया.

‘‘जावेद मियां, बात को समझे…’’ मौलाना ने कहा, ‘‘बच्ची प्यारी है या जायदाद. तुम ऐसा करो कि मेरे नाम जमीन की रजिस्ट्री कर दो. पूरा खर्चा मैं करता हूं. जब पैसा हो, तो मेरा पैसा लौटा देना और जमीन वापस ले लेना.’’

मौलाना ने अपनी चाल से जावेद को फांस लिया. अंधविश्वास में फंसे जावेद ने मौलाना की बात मान कर जमीन की रजिस्ट्री उन के नाम कर दी.

इधर असद उर्फ जोगी बाबा ने ऐसी चाल चली कि जमीला ने अपनेआप को उस के हवाले कर दिया.

अब वे दोनों बीमारी की आड़ले कर जिंदगी का मजा लूटने लगे. झाड़फूंक के बहाने अब दोनों को कोई नहीं रोक पाता था.

जमीला को जब से पराए मर्द का चसका लगा था, तब से वह खुश रहने लगी थी. उस के मांबाप इसे जोगी बाबा की झाड़फूंक का नतीजा मान रहे थे.

धीरेधीरे साल पूरा होने को आया. उस के मांबाप को जमीला की शादी

की फिक्र होने लगी और वे लड़के की तलाश में जुट गए.

इस बात की भनक असद को लग गई. वह मौका पा कर वहां से रफूचक्कर हो गया.

इसी बीच जमीला की शादी पक्की हो गई, लेकिन एक दिन वह अचानक बेहोश हो कर गिर पड़ी.

लोगों के झकझोरने पर भी होश नहीं आया, तो उसे अस्पताल ले जाया गया.

लेडी डाक्टर ने जांच करने के बाद कहा, ‘‘हम ने बच्ची को देख लिया है. अब वह होश में आ गई है. आप

उस का खयाल रखिए. भारी चीज न उठाने दें, क्योंकि आप की बेटी मां बनने वाली है.’’

लेडी डाक्टर की यह बात सुन कर जावेद, उस की बेगम और रिश्तेदारों के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई. उन की जमीला ढोंगी जोगी के प्यार में लुट चुकी थी.

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