Sadhvi Prem Baisa Case : भक्ति से मौत तक लापरवाही का सच

Sadhvi Prem Baisa Case. राजस्थान के जोधपुर जिले के एक शांत आश्रम में उस दिन सबकुछ सामान्य था. भजन की मधुर आवाज, श्रद्धालुओं की भीड़ और आस्था से भरा माहौल. लेकिन कुछ ही घंटों में यह सुकून एक ऐसी घटना में बदल गया, जिस ने पूरे राजस्थान को झकझोर कर रख दिया.

साध्वी प्रेम बाईसा. एक ऐसा नाम, जो भक्ति और कथावाचन के जरीए हजारों लोगों के दिलों में बस चुका था. उन की आवाज में ऐसा असर था कि लोग दूरदूर से उन्हें सुनने आते थे. एक श्रद्धालु ने कहा, जब बाईसा भजन गाती थीं, तो मन को एक अलग ही शांति मिलती थी.

लेकिन इस शांति के पीछे बीते कुछ समय से एक अलग ही तनाव पनप रहा था. कुछ महीनों पहले सोशल मीडिया पर वायरल हुए एक वीडियो ने साध्वी प्रेम बाईसा की छवि को ?ाटका दिया. आलोचना शुरू हुई. सवाल उठे. एक करीबी ने बताया, वे अंदर से टूट रही थीं, लेकिन बाहर खुद को संभालने की कोशिश करती थीं. यह मानसिक दबाव धीरेधीरे साध्वी प्रेम बाईसा की जिंदगी का हिस्सा बनता जा रहा था.

28 जनवरी का दिन. आश्रम में अचानक हलचल बढ़ गई. साध्वी प्रेम बाईसा को सांस लेने में तकलीफ होने लगी. हालात गंभीर थे. लेकिन इस समय जो फैसला लिया गया, वही आगे चल कर सब से अहम साबित हुआ.

डाक्टर को बुलाने के बजाय एक परिचित कंपाउंडर को बुलाया गया. कंपाउंडर देवी सिंह आश्रम पहुंचा. उस ने साध्वी प्रेम बाईसा की हालत देखी और उन्हें एक इंजैक्शन लगा दिया. इस के बाद दूसरा इंजैक्शन भी दिया गया. कुछ समय तक लगा कि हालत संभल रही है, लेकिन फिर अचानक हालत तेजी से बिगड़ने लगी.

एक ने बताया, इंजैक्शन के बाद थोड़ी राहत लगी थी, लेकिन फिर अचानक सांस तेज हो गई और बेचैनी बढ़ गई. हालात बिगड़ती देख कर साध्वी प्रेम बाईसा को तुरंत अस्पताल ले जाया गया. लेकिन अस्पताल पहुंचने तक बहुत देर हो चुकी थी. डाक्टरों ने बताया कि वे नहीं रहीं.

यहीं से यह मामला एक सामान्य मौत से निकल कर सवालों के घेरे में आ गया. जांच शुरू हुई तो सब से पहले इंजैक्शन पर सवाल उठे. कंपाउंडर देवी सिंह ने कहा, मैं ने डाक्टर की परची के आधार पर ही इंजैक्शन लगाया था. लेकिन जब डाक्टर से पूछा गया तो जवाब बिलकुल अलग था. डाक्टर ने साफ कहा, मैं ने कोई इंजैक्शन नहीं लिखा था.

यह विरोधाभास जांच का सब से बड़ा केंद्र बन गया. इस के साथ ही मौत की टाइमिंग को ले कर भी अलगअलग बयान सामने आए. पिता वीरमनाथ ने कहा, इंजैक्शन लगने के कुछ ही मिनट बाद हालत बिगड़ गई थी. वहीं कंपाउंडर का कहना था, मैं आश्रम से निकल गया था. करीब 20-25 मिनट बाद फोन आया कि हालत ज्यादा खराब हो गई है.

इन बयानों के अंतर ने जांच को और गंभीर बना दिया. लिहाजा, पुलिस ने मामले की जांच के लिए विशेष जांच दल का गठन किया. तकरीबन 46 लोगों से पूछताछ की गई. आश्रम से जुड़े लोगों, परिवार और वहां मौजूद दूसरे के बयान दर्ज किए गए. घटनास्थल से सैंपल लिए गए. सीसीटीवी फुटेज खंगाले गए. मोबाइल फोन जब्त कर डिजिटल जांच शुरू की गई.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट का इंतजार था, लेकिन शुरुआती रिपोर्ट में मौत की वजह क्लियर नहीं हो पाया. इस के बाद विसरा जांच कराई गई. तकरीबन 18 दिनों के बाद मैडिकल बोर्ड की बड़ी रिपोर्ट सामने आई. रिपोर्ट में बताया गया कि साध्वी प्रेम बाईसा की मौत की वजह कार्डियक अरैस्ट और सांस की बीमारी थी.

पुलिस के अनुसार साध्वी प्रेम बाईसा को पहले से अस्थमा जैसी समस्या थी, लेकिन जांच में एक और अहम बात सामने आई. इंजैक्शन बिना डाक्टर की परची के लगाया गया था. यही इस पूरे मामले का सब से बड़ा लापरवाही वाला पौइंट बन कर उभरा. पुलिस कमिश्नर ने प्रैस कौन्फ्रैंस में कहा, यह एक गंभीर लापरवाही का मामला है. संबंधित व्यक्ति के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी.

उन्होंने यह भी बताया कि कंपाउंडर के अधिकार और उस की भूमिका की जांच की जा रही है. अब यह मामला पूरी तरह स्पष्ट दिशा में आ चुका था. हत्या की आशंका तकरीबन खत्म हो गई, लेकिन लापरवाही का एंगल बेहद मजबूत हो कर सामने आया.

इस पूरे घटनाक्रम ने कई बड़े सवाल खड़े कर दिए. क्या यह मौत टाली जा सकती थी? क्या समय पर डाक्टर को बुलाया जाता तो नतीजा अलग होता? क्या बिना जांच के इंजैक्शन देना एक बड़ी गलती थी?

एक स्थानीय आदमी ने कहा, छोटे शहरों और गांवों में आज भी लोग डाक्टर के बजाय जानपहचान वाले लोगों पर ज्यादा भरोसा कर लेते हैं. यही भरोसा कई बार खतरनाक साबित होता है. इस मामले में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला. इस केस में सोशल मीडिया का एंगल भी सामने आया.

साध्वी प्रेम बाईसा की मौत के बाद इंस्टाग्राम पर एक पोस्ट डाली गई, जिस से इस मुद्दे पर कई तरह की चर्चाएं शुरू हो गईं. लेकिन पुलिस ने साफ किया, यह पोस्ट पिता के कहने पर डाली गई थी और इस के पीछे कोई दुर्भावनापूर्ण इरादा नहीं था.

इस से एक भ्रम जरूर खत्म हुआ, लेकिन इस घटना ने जो सवाल खड़े किए, वे अब भी मौजूद हैं. यह मामला सिर्फ एक साध्वी प्रेम बाईसा की मौत का नहीं है. यह उस सोच का आईना है, जहां कई बार लोग चिकित्सा और विज्ञान से ज्यादा भरोसा अनुभव और अनुमान पर कर लेते हैं.

साध्वी प्रेम बाईसा की मौत हमें यही सिखाती है कि समय पर लिया गया सही फैसला जिंदगी बचा सकता है, और एक छोटी सी लापरवाही जान ले सकती है. Sadhvi Prem Baisa Case.

लेखक : राकेश खुडिया

Crime Story: यह गाली नहीं बिहारी स्वाभिमान पर हमला

Crime Story: उत्तराखंड की महिला सशक्तीकरण और बाल विकास मंत्री रेखा आर्य के पति गिरधारी लाल साहू ने 2-3 जनवरी 2026 को पहलागढ़, अल्मोड़ा (सोमेश्वर) में एक कार्यक्रम के दौरान बिहारी लड़कियों को ले कर एक आपत्तिजनक टिप्पणी की थी. वायरल वीडियो में वे कह रहे थे किअगर शादी नहीं हो रही है तो बिहार से लड़की ले आओ… 20,000 से 25,000 रुपए में लड़कियां मिल जाती हैंऔरहम तुम्हें शादी करवा देंगे.’

इस बयान ने बिहार और देशभर में व्यापक आलोचना और राजनीतिक विवाद को जन्म दिया है. राष्ट्रीय जनता दल के विधायक अमरेंद्र्र कुमार कुशवाहा ने बताया कि बिहारी लड़कियों को ले कर दिया गया साहू का अभद्र, अश्लील और अपमानजनक बयान कोई सामान्य फिसलन या निजी टिप्पणी नहीं है. यह पूरे बिहार, बिहारी समाज और विशेष रूप से बिहारी स्त्रियों के स्वाभिमान पर सीधा हमला है.
यह बयान उस सामंती, अहंकारी और स्त्री विरोधी सोच का परिचायक है, जिस में बिहार को गाली देना और बिहारी पहचान को नीचा दिखाना एक तरह का अधिकार मान लिया गया है.

बिहारी लड़कियां किसी की जबान की गंदगी सहने के लिए पैदा नहीं हुई हैं. वे खेतों में काम करने वाली मेहनतकश महिलाएं भी हैं, यूनिवर्सिटी में रिसर्च करने वाली छात्राएं भी, प्रशासन, चिकित्सा, विज्ञान, खेल और कला के क्षेत्र में देश का नाम रोशन करने वाली सशक्त नागरिक भी. बिहार की महिलाओं ने उलट हालात में भी संघर्ष किया है, अपमान में भी आत्मसम्मान बचाया है और अवसर मिलने पर दुनिया को अपनी हैसियत दिखाई है. ऐसे में उन के खिलाफ गालीनुमा बयान देना केवल बेहूदगी नहीं, बल्कि सामाजिक अपराध भी है.

साहू का यह बयान उस पुरानी सोच को उजागर करता है, जिस में बिहार को हमेशा हाशिए पर, मजदूरी पर और उपहास के केंद्र में रखा गया. यह वही सोच है जो बिहारियों को सस्ते मजदूर के रूप में देखती है और बिहारी औरतों को सम्मान नहीं, बल्कि वस्तु सम?ाती है. यह बयान सिर्फ महिलाओं का अपमान नहीं करता, बल्कि पूरे बिहारी समाज को अपमानित करता है.सब से शर्मनाक पहलू यह है कि इस बयान के बाद सत्ता और संगठन की ओर से कोई साफ, सख्त और नैतिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई. चुप्पी केवल मौन नहीं होती, वह सहमति भी होती है.

यदि यही भाषा किसी और राज्य, किसी और समाज या किसी और वर्ग के लिए इस्तेमाल की गई होती, तो अब तक नैतिकता, संस्कृति और मर्यादा की दुहाई देते हुए बड़ेबड़े बयान चुके होते. लेकिन जब गाली बिहार और बिहारियों को दी जाती है, तो उसे हलके में ले लिया जाता है. यह दोहरा मापदंड नहीं, तो और क्या है? बिहारी स्वाभिमान किसी पार्टी, नेता या संगठन की जागीर नहीं है. यह उस समाज की सामूहिक चेतना है जिस ने देश के हर कोने में ईंटपत्थर जोड़े हैं, खेतों से ले कर फैक्टरियों तक काम किया है और लोकतंत्र को अपने वोट से जिंदा रखा है. बिहार को गाली देना आसान है, लेकिन बिहार के आत्मसम्मान को तोड़ना नामुमकिन.

आज जरूरत इस बात की है कि साहू के इस बयान की खुल कर, बिना लागलपेट के निंदा की जाए. यह कोईनिजी रायनहीं है, यह सार्वजनिक अपमान है. सार्वजनिक जीवन में रहने वालों को यह सम?ाना होगा कि उन की जबान उन की जिम्मेदारी होती है. गाली दे कर बच निकलना लोकतंत्र में स्वीकार करने लायक नहीं है और ही सभ्य समाज में. बिहारी समाज को भी अब साफ और एकजुट आवाज में कहना होगा कि वह बेइज्जती सहने के लिए नहीं बना है. हमारी बेटियां हमारी पहचान हैं, हमारी ताकत हैं और हमारे स्वाभिमान का प्रतीक हैं. उन के सम्मान पर किया गया कोई भी हमला, चाहे वह किसी भी शख्स, पद या राजनीतिक संरक्षण से लैस क्यों हो, बरदाश्त नहीं किया जाएगा.    

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