News Story : गुस्साए नौजवान और कौकरोच जनता पार्टी

News Story. विजय कई दिनों से अनामिका से नहीं मिला था. गरमी भी बहुत ज्यादा पड़ रही थी. इसी बीच अपने पड़ोस के एक बच्चे का सीईयूटी का एग्जाम दिलाने के लिए वह नोएडा भी गया था. वहां तपती दोपहरी में बच्चों के मांबाप ने कैसे दिन गुजारा था, यह देख कर विजय का दिलोदिमाग हिल गया था. वह तो अच्छा हो, विजय का एक दोस्त वहीं आसपास रहता था, वरना उस का भी लू के चलते भेजा फ्राई हो जाता.

इसी तनाव को दूर करने के लिए विजय अनामिका से मिलने उस के कमरे पर पहुंचा. पर वहां तो एक अलग ही राग अलापा जा रहा था. वहां कमरे के एक कोने में अनामिका ने कुछ डंडों पर प्लेकार्ड लगा रखे थे, जिन में कुछ फोटो और स्लोगन आदि थे. दीवार के बीच में एक कागज पर केजीपी लिखा था.

‘‘अनामिका, यह सब क्या नौटंकी है? यह केजीएफ क्या बला है?’’ विजय ने पूछा. ‘‘यह मेरा नया मिशन है. केजीएफ. बोले तो कटखनी गाय पार्टी. एक ऐसा आंदोलन जो सत्ता पक्ष की ईंट से ईंट बजा देगा,’’ अनामिका बोली. ‘‘अब इस की क्या जरूरत आ पड़ी है?’’ विजय ने पूछा.

‘‘तुम ने खबर नहीं पढ़ी कि कैसे लड़कियों और औरतों को सताया जा रहा है. ट्विशा शर्मा की मौत का मामला भूल गए क्या. उन के पति समर्थ सिंह पेशे से वकील हैं और उन की सास गिरिबाला सिंह पूर्व जिला जज हैं. इन दोनों पर दहेज उत्पीड़न और आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप है. दूसरी तरफ हमारे चीफ जस्टिस सूर्यकांत नई पीढ़ी को कौकरोच बता रहे हैं. सत्ता पक्ष का तो छोड़ ही दो, अब तो कानून वाले भी अपने फर्ज से भटकने लगे हैं,’’ अनामिका बोली.

‘‘तुम भी सोशल मीडिया के बहकावे में आ गई. हमारी सरकार और कानून व्यवस्था एकदम सही काम कर रही है. केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में जजों की अधिकतम संख्या (स्वीकृत पद) को 34 से बढ़ा कर 38 कर दिया है. ‘‘इतना ही नहीं, दुनियाभर में लड़ाई का माहौल है और हमारे प्रधानमंत्री हर बड़े नेता से मिल कर दुनिया को एकजुट कर रहे हैं. वे चाहते हैं कि दुनिया में शांति हो,’’ विजय ने सरकार को ले कर अपना पक्ष रखा.

‘‘हां, देख लिया हम ने उन का मैलोडी चौकलेट वाला वीडियो. भारत की जनता से कहा कि कहीं बाहर मत जाओ, अपने खर्चे कम करो, सोना मत खरीदो और खुद सरकारी खर्च पर विदेश यात्रा कर रहे हैं. ‘‘यही वजह है कि सोशल मीडिया पर बना कौकरोच जनता पार्टी पेज एकदम से वायरल हो गया है. देखते ही देखते लाखों नौजवान उस से जुड़ गए हैं.

‘‘हमारी कटखनी गाय पार्टी भी ऐसा ही भौकाल मचाने के लिए बनी है. जो लोग लड़कियों और औरतों को बेचारी गऊ समझते हैं उन्हें हम बताएंगे कि सींग मारने वाली कटखनी गाय कितनी खतरनाक होती है,’’ अनामिका ने कहा. ‘‘अब तुम किस कौकरोच जनता पार्टी को कहां से बीच में ले आई?’’

‘‘वही पार्टी जिस ने चीफ जस्टिस सूर्यकांत के एक गलत बयान के बाद जन्म लिया है और उसी के दम पर लाखों नौजवान अब केंद्र सरकार से सवाल पूछ रहे हैं,’’ अनामिका ने कहा. ‘‘चलो, मान लिया कि जस्टिस सूर्यकांत को इस तरह की टिप्पणी नहीं करनी चाहिए थी. पर इतना जल्दी सोशल मीडिया पर कौकरोच जनता पार्टी का पेज बनाना कोई हंसीखेल नहीं है. यह सब किस ने किया और हुआ कैसे?’’ विजय ने पूछा.

अनामिका बोली, ‘‘मैं इस बारे में जब खोजबीन कर रही थी, तो बीबीसी की एक रिपोर्ट पर मेरी नजर गई. वहां बड़ी डिटेल में सब बताया गया था.’’ ‘‘तो तुम मुझे  भी समझा दो न,’’ विजय बोला.

अनामिका ने कहा, ‘‘दरअसल, कौकरोच जनता पार्टी की वैबसाइट पर इस के संस्थापक और संयोजक की जानकारी दी गई है और उन का नाम अभिजीत दीपके है.

‘‘अभिजीत दीपके से बीबीसी न्यूज मराठी ने लंबी बातचीत की, जिस में उन्होंने बताया कि इस तरह का सोशल मीडिया कैंपेन उन्होंने किस वजह से शुरू किया.

‘‘अभिजीत दीपके ने बताया, ‘मैं ट्विटर (अब एक्स) पर सीजेई (भारत के मुख्य न्यायाधीश) का बयान देख रहा था, जहां पर वे सिस्टम की आलोचना करने और राय देने के लिए देश के नौजवानों की तुलना कौकरोच और परजीवियों से कर रहे थे.’

‘‘दीपके ने आगे बताया, ‘मैं ने इसे बेहद हास्यास्पद समझा  क्योंकि सीजेआई को देश के संविधान का संरक्षक माना जाता है. वह संविधान जो हर किसी को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आजादी देता है. अब एक ऐसा शख्स जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करने के लिए कैसे युवाओं की तुलना कौकरोच और परजीवियों से कर सकता है?

‘‘‘इस ने मुझे  गुस्से और निराशा से भर दिया और ट्विटर पर मैं ने इस पर अपनी राय दी. मैं ने पूछा कि सब कौकरोच एक साथ आ जाएं, तो क्या होगा? मु?ो जेन जी और 25 साल तक के नौजवानों के कमाल के जवाब मिले और उन्होंने कहा कि हमें साथ आना चाहिए और एक प्लेटफार्म बनाना चाहिए.

‘‘‘इस ने मुझे आइडिया दिया कि हमें औनलाइन एक पैरोडी पार्टी बनानी चाहिए, जिस का नाम कौकरोच जनता पार्टी हो. अगर आप हमें कौकरोच कह रहे हैं तो ठीक है, हम कौकरोच जनता पार्टी बनाते हैं. इस पार्टी में शामिल होने के लिए मैं ने पात्रता तय कीं, जैसे आप को आलसी होना होगा, जैसा सीजेआई ने कहा, आप को बेरोजगार होना होगा और आप लगातार औनलाइन रहने वाले हों, जैसा सीजेआई ने कहा था.

‘‘‘उन्होंने (सीजेआई) जिन भी शब्दों का इस्तेमाल नौजवानों को बेइज्जत करने के लिए किया, हम ने उन्हें इस पार्टी का सदस्य बनने के लिए पात्रता रखा है. कुछ ही घंटों में इस ने चमत्कार कर दिया और हर कोई इस पर प्रतिक्रिया देने लगा और खुद को रजिस्टर्ड करने लगा.

‘‘‘इस के बाद हमें लगने लगा कि यह बड़ा होने वाला है और सिर्फ मजाक नहीं रह गया है, क्योंकि लोग निराश हो चुके थे और हम ने एक वैबसाइट बनाई, पार्टी का घोषणापत्र बनाया. इंस्टाग्राम पर हमारे 2 मिलियन फौलोअर्स (अब कई मिलियन से ज्यादा) हो चुके हैं और 2 लाख से ज्यादा लोगों ने खुद को कौकरोच जनता पार्टी के सदस्य के तौर पर रजिस्टर किया है. भारतीय राजनीति में यह समय के बाद अभूतपूर्व है.’’’

‘‘क्या कुछ चर्चित लोगों ने भी अभिजीत दीपके की इस मुहिम का समर्थन किया है?’’ विजय ने पूछा. ‘‘अगर अभिजीत दीपके की मानें तो क्रिकेटर रह चुके और सांसद कीर्ति आजाद ने कहा कि वे इस पार्टी में शामिल होना चाहते हैं. टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा ने भी इस का समर्थन किया. इन के अलावा कई लोगों ने हमारा समर्थन किया है और आज यह चर्चा का विषय है. साथ ही दिन ब दिन यह तादाद बढ़ती चली जा रही है,’’ अनामिका ने बताया.

‘‘अच्छा, तुम्हें कौकरोच जनता पार्टी के सोशल मीडिया पर लाखों फौलोअर्स होने के पीछे की क्या कहानी नजर आती है?

‘‘इस बारे में अभिजीत कहते हैं, ‘मैं यह नहीं कहूंगा कि यह सब मैं ने हासिल किया है. ये सब लोग आपस में साथ आए हैं. हमें ये सम?ाना चाहिए कि इन्हें क्या चीज साथ ले कर आई है. अगर आज कोई डिजिटल एजेंसी या कोई राजनीतिक दल ऐसा कुछ करता तो उसे इतनी तेजी से ये कामयाबी नहीं मिलती. फर्क नहीं पड़ता कि उन्होंने कितना पैसा खर्च किया होता. करोड़ों रुपए खर्च कर के भी किसी को ऐसी प्रतिक्रिया देखने को नहीं मिलती.

‘‘‘नौजवानों के अंदर कई सालों से जो निराशा और गुस्सा पल रहा है वही इतनी बड़ी प्रतिक्रिया की वजह है. सरकार की नाकामियों की वजह से नौजवान बेरोजगार हैं. उन्हें एक मंच मिला जहां पर वे अपनी निराशा और गुस्से को निकाल सकते हैं.’’’ ‘‘लेकिन अभिजीत दीपके आखिर कौन हैं? सुना है वह आम आदमी पार्टी से जुड़ा रहा था?’’ विजय ने सवाल दागा.

‘‘इस बारे में अभिजीत दीपके खुद बताते हैं, ‘मैं महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजी नगर से हूं. ग्रैजुएशन के लिए मैं पुणे गया. इस के बाद मुझे कुछ सालों के लिए आम आदमी पार्टी के साथ काम करने का मौका मिला जहां मैं उन की कम्युनिकेशन टीम में था.

‘‘‘मैं उन के स्वास्थ्य और शिक्षा पर काम करने की वजह से उन से आकर्षित था. यह कुछ नया था जो पहली बार भारतीय राजनीति में हो रहा था. जैसे आज कौकरोच जनता पार्टी नई है, ऐसा ही मु?ो लगा कि वो कुछ नया बदलाव लाने जा रहे हैं.

‘‘‘मैं ने कुछ समय के लिए उन के साथ काम किया फिर मु?ो लगा मु?ो और पढ़ने की जरूरत है और मैं घर पर मास्टर्स की तैयारी करने लगा. मुझे बोस्टन यूनिवर्सिटी से बुलावा आया. मैं 2 साल से यहां पर हूं और अपनी ग्रैजुएशन पूरी की है.’’’ ‘‘क्या कौकरोच जनता पार्टी का कोई घोषणापत्र भी है?’’ विजय ने पूछा.

‘‘इस पर अभिजीत दीपके ने बताया, ‘मुझे लगता है कि घोषणापत्र इस समय भारत के लोकतंत्र और वर्तमान राजनीतिक स्थिति के बारे में बताता है. हम लगातार देख रहे हैं कि वे जज जिन्हें निष्पक्ष रहना होता है, जिन का सरकार से कुछ लेनादेना नहीं होना चाहिए वे रिटायरमैंट के बाद सरकार से लाभ ले रहे हैं. यह बहुत खतरनाक है, क्योंकि न्यायपालिका को स्वतंत्र रहना होता है. अगर न्यायपालिका भी सरकार की राह पर चलेगी तो फिर क्या रह जाएगा? फिर लोकतंत्र को कौन बचाएगा?

‘‘‘दूसरी बात महिला के प्रतिनिधित्व को ले कर है. मैं बचपन से सुनता आया हूं कि महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण मिलेगा, लेकिन आज तक यह नहीं हुआ. अगर महिलाओं को आरक्षण देना है तो उन्हें 50 फीसदी आरक्षण दीजिए.’’’

‘‘तो क्या भारत के जेन जी नेपाल और श्रीलंका के जेन जी वाले आंदोलन की तरफ जा रहे हैं? नेपाल में तो आंदोलन के बाद सरकार को इस्तीफा देना पड़ा था. क्या यहां भी ऐसा ही कुछ हो सकता है?’’

‘‘तुम्हारा सवाल बड़ा रोचक है. वैसे, ऐसे हालात पर अभिजीत दीपके कहते हैं कि भारत के जेन जी की तुलना श्रीलंका, नेपाल और बंगलादेश के जेन जी से करना ‘एक बड़ा अपमान’ होगा, क्योंकि वे (भारतीय जेन जी) हिंसा नहीं भड़का रहे हैं.

‘‘अभिजीत आगे कहते हैं, ‘भारतीय जेन जी व्यंग्य के जरीए अपनी नाखुशी जाहिर कर रहे हैं. कौकरोच का कौस्ट्यूम पहन कर वे यमुना को साफ कर रहे हैं, कूड़ा हटा रहे हैं. वे इस के जरीए सिस्टम की खिल्ली उड़ा रहे हैं. वे सड़क पर जा कर हिंसा नहीं भड़का रहे हैं और अगर कल को वे सड़कों पर जाते भी हैं तो वे लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण तरीके से यह करेंगे.

‘‘‘यह जेन जी आबादी हमारे केंद्रीय मंत्रिमंडल से ज्यादा पढ़ीलिखी है. हमें सवाल यह करना चाहिए कि हम पर अशिक्षित लोग शासन क्यों कर रहे हैं,’’’ अनामिका ने बताया. ‘‘कौकरोच जनता पार्टी का भविष्य क्या होगा?’’ विजय ने पूछा.

‘‘इस पर अभिजीत कहते हैं कि यह सिर्फ एक शुरुआत है, कल और युवा संगठन आगे आएंगे. नौजवान तबका मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था से तंग आ चुका है. अगले कुछ सालों में आप देखेंगे कि नौजवान बदलाव की मांग करेगा क्योंकि पिछले 10-12 सालों में इन्होंने ‘हिंदूमुसलिम’ उपदेश के अलावा कुछ भी नहीं सुना है,’’ अनामिका ने कहा.

‘‘इस का मतलब है कि यह नई पार्टी देश में कोई क्रांति ला सकती है?’’ विजय ने सवाल किया. ‘‘हां, बिलकुल ला सकती है,’’ अनामिका ने अपनी राय रखी.

विजय ने कुछ सोच कर कहा, ‘‘पर मुझे नहीं लगता. यह एक सोशल मीडिया का नया ट्रैंड जरूर हो सकता है, पर सिर्फ इस के चलते हम यह कह दें कि जेन जी कोई करिश्मा कर देंगे, अभी दूर की कौड़ी लगता है. इस की सब से बड़ी वजह यह है कि देश की ज्यादातर जनता, जो वोट करती है, उसे मालूम ही नहीं है कि रोज कुआं खोदो और पानी पियो से आगे भी जिंदगी है.

‘‘ऐसे लोग राजनीतिक पार्टियों की मुफ्त की घोषणाओं को ही तरक्की मान लेते हैं. बिहार में देखा नहीं कि जैसे ही कुछ महिलाओं के खाते में पैसे आए, सारे वोट उधर ही शिफ्ट होते दिखे. स्वराज पार्टी वालों ने देश की समस्याओं के नाम पर वोट मांगे, उन का हाल तो सब ने देख लिया.

‘‘हाल ही में थलापति विजय की पार्टी को भी तमिलनाडु राज्य में ऐसी घोषणाएं करनी पड़ीं. 200 यूनिट बिजली मुफ्त देने की बात हुई न? केंद्र हो या राज्य सरकार, सब जानते हैं कि जनता तुरंत का फायदा देखती है, बाकी बातें भूल जाती है.

‘‘अभी तो कौकरोच जनता पार्टी पर विपक्ष खूब हल्ला काट रहा है, पर कोई दल नहीं चाहेगा कि भविष्य की राजनीति में उस के अलावा कोई दूसरा भारतीय जनता पार्टी का विकल्प बने. हां, कौकरोच जनता पार्टी के नाम पर लोग सत्ता पक्ष के खिलाफ देश में कोई विद्रोह कर दे, तो उन का रास्ता आसान हो जाएगा.’’

‘‘तुम्हारी बात में दम है. लेकिन अगर ऐसा होता है तो भी देश का ही नुकसान है. सत्ता बदलने से समस्याएं पूरी तरह खत्म हो जाएंगी, इस बात की कोई गारंटी नहीं है,’’ अनामिका बोली.

‘‘पर एक बात की गारंटी जरूर है,’’ विजय बोला. ‘‘मैं समझी नहीं. किस बात की गारंटी?’’ अनामिका ने पूछा. ‘‘अगर तू कटखनी गाय पार्टी बनाएगी तो तेरीमेरी नहीं निभेगी. लिहाजा, मैं ने एक फैसला कर लिया है,’’ विजय बोला. ‘‘कैसा फैसला?’’ यह सुन कर अनामिका के कान खड़े हो गए.

‘‘जब तू कटखनी गाय बन जाएगी, तो सब से पहले सींग मु?ो ही मारेगी. इस से अच्छा तो यह है कि मैं कुछ दिनों के लिए कन्याकुमारी हो आता हूं. वैसे, जाना तो मैं एकदम दक्षिण में अंटार्टिका चाहता था, पर जब से मोदीजी ने कहा है कि एक साल तक बाहर विदेश घूमने मत जाओ तो अब भारत के दक्षिण कन्याकुमारी जाने का प्लान बनाया है. मोदीजी की बात रह जाएगी और कटखनी गाय यानी तुम से भी बचा रहूंगा,’’ विजय बोला.

‘‘अगर तुम एक सैकंड के अंदर यहां से दफा नहीं हुए, तो मैं अभी तुम्हारी चप्पल परेड करा दूंगी. कौकरोच की तरह तड़पते दिखोगे…’’ अनामिका का इतना कहना था कि विजय घुटनों पर आ गया.

Hindi Story: तुम, मैं और 2 कप चाय

बारिश की हलकी फुहार थी. सड़क किनारे वही पुरानी सी चाय की दुकान, जहां अकसर भीड़ नहीं होती थी.
संजय वहां बैठा था, हाथ में गरम चाय का कप लिए.
तभी सवि आई और बोली, ‘‘आज भी यहीं बैठे हो?’’
संजय ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘हां, लगा तुम आओगी.’’
सवि संजय के सामने बैठ गई. दुकानदार ने बिना पूछे चाय का दूसरा कप रख दिया.
सवि ने पूछा, ‘‘तुम्हें कैसे पता मैं चाय पीऊंगी?’’
‘‘पिछले 3 सालों से हर मुश्किल
में तुम ने चाय ही तो मांगी है,’’

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संजय बोला.
सवि हंस पड़ी. वही हंसी, जिस में सुकून था.
सवि बोली, ‘‘कभीकभी लगता है, हमारी पूरी कहानी इन्हीं 2 कप चाय में सिमटी है.’’
संजय ने कहा, ‘‘हां, एक तुम्हारे
हाथ में, एक मेरेऔर बीच में ढेर
सारी बातें.’’
कुछ पल खामोशी रही. बारिश तेज हो गई.
सवि धीमे से बोली, ‘‘अगर मैं कभी दूर चली जाऊं तो?’’
संजय बोला, ‘‘तो भी यहां कर
2 कप चाय मंगाऊंगा. एक तुम्हारे
इंतजार में.’’
सवि ने संजय की ओर देखा. आंखों में नमी थी, पर चेहरे पर मुसकान.
सवि ने पूछा, ‘‘कभी कहा क्यों नहीं कि तुम मुझ से…’’
संजय बीच में बात काट कर बोला, ‘‘डरता था, कहीं चाय की यह आदत भी छूट जाए,’’ फिर वह मुसकरा दिया.
सवि ने संजय का हाथ थाम लिया और बोली, ‘‘पागल, प्यार कहा नहीं जाता, महसूस किया जाता है. जैसे
यह चाय.’’ बारिश थम रही थी. चाय खत्म हो चुकी थी, पर कहानी नहीं.
संजय ने पूछा, ‘‘तो कल फिर?’’
सवि बोली, ‘‘हांतुम, मैं और
2 कप चाय.’’
उस दिन संजय को समझ आया
कि प्यार बड़े वादों में नहीं, छोटी
दुकानों, गरम चाय और सच्चे इंतजार में होता है.                             

संजय सिंह चौहान

News Story: ‘विश्वगुरु’ का विदेश कूटनीति में फेल होना

News Story: इ बार दिल्ली में मौसम नेताओं की तरह पलटूराम बना हुआ है, कभी सर्द तो कभी गरम. बेचारे कूलर बेचने वाले दुकान पर मक्खियां मारते दिख रहे हैं और सिर खुजा रहे हैं कि कूलर का बाजार तेज रहेगा या मंदा. पर आम आदमी थोड़ी राहत की सांस ले रहा है. विजय भी ऐसे ही लोगों की लिस्ट में शामिल है और चूंकि आज रविवार है तो उस ने अनामिका के साथ कहीं घूमने का प्लान बनाया है. पर अनामिका अब तक क्यों नहीं आई? इतने में बाहर कोई हलचल हुई. विजय ने देखा कि कोई काले रंग की उबर गाड़ी से आया था. एक जवान लड़की. पर जैसे ही वह गाड़ी से नीचे उतरी, तो आसपास जमा लोगों की भीड़ की नजरें उस पर ही जम गईं.

उस लड़की ने बिहार के मछुआरों की पारंपरिक चोली और घाघरा जैसी ड्रैस पहनी हुई थी. उस ड्रैस से उस के उभार और ज्यादा उभर आए थे. सिंगार भी किसी मछुआरिन सा था. नंगे पैर जब वह मटकमटक कर चल रही थी, तब कुछ मनचले सीटियां बजाने लगे. चूंकि अभी वह लड़की विजय को साफसाफ नहीं दिख रही थी, तो उसे महसूस ही नहीं हुआ कि यह बिंदास मछुआरिन किस के घर जाएगी. थोड़ा आगे आने पर जब विजय ने उस लड़की को देखा, तो अपना सिर पीट लिया, क्योंकि वह और कोई नहीं, अनामिका थी. विजय हैरान रह गया कि आज अनामिका को इस तरह उस के घर आने की क्या जरूरत थी. थोड़ी देर में डोरबैल बजी और बाहर से आवाज आई, ‘‘ बाबू, हम बाड़, हमरा के जान…’’

विजय ने जल्दी से दरवाजा खोला और अनामिका को ऊपर से नीचे घूरा. टाइट ब्लाउज, बदन से चिपकी धोती और हाथ में एक बैग, अनामिका एकदम अतरंगी लग रही थी.
‘‘जल्दी से अंदर आओ. और यह सब क्या नौटंकी है?’’
‘‘हम बाड़हमरा के खाना चाही,’’ अनामिका ने इतना कहा और खिलखिला कर हंस दी.
‘‘अनामिका, ज्यादा मजाक नहीं.
तुम उतरी तो काली गाड़ी से हो और यह सब प्रपंच क्यों? गाड़ी से आने की क्या जरूरत थी? और तुम आज बिहारी क्यों बोल रही हो? यह मेरे सिर के ऊपर से जा रही है,’’ विजय झल्लाया.
‘‘क्या एक मछुआरे की बेटी अपनी पारंपरिक वेशभूषा नहीं पहन सकती?’’ अनामिका ने सवाल किया.
‘‘पर मौका भी तो होना चाहिए . कोई फैंसी ड्रैस कंपीटिशन तो चल नहीं रहा. तुम तो टीशर्ट और जींस ज्यादा पहनती हो. तुम ने देखा नहीं, लोग तुम्हारी खिल्ली उड़ा रहे थे,’’ विजय
ने कहा.

‘‘मैं विश्वगुरु बनने निकली हूं. मुझे अपनी पारंपरिक वेशभूषा और बिहारी भाषा पर गर्व है.’’
‘‘यहां भाषा कहां से बीच में गई?’’ विजय बोला.
‘‘अपनी महल्ले वाली लड़ाई भूल गया. उन सरदारजी के हक में तू ने खूब बोला, पर उन की ठेठ पंजाबी तू खुद नहीं समझ पाया था. बड़ा चला था तू उन अंकलों का झगड़ा सुलटाने, खुद ही बुराई मोल ले कर बैठ गया. तू भी मोदीजी की तरह कूटनीति में फेल हो गया.’’
‘‘अब यहां पर कूटनीति और मोदीजी कैसे बीच में गए?’’

‘‘जैसे तू उन अंकलों का झगड़ा निबटाने में नाकाम रहा, उसी तरह मोदीजी दावे तो बहुत कर रहे थे, पर ईरान, इजराइल और अमेरिका के बीच की जंग की कूटनीति पर वे फेल हो गए. इस में भाषा का बड़ा रोल होता है. शब्दों का सही खेल ही कूटनीति की कामयाबी की पहली सीढ़ी है. विदेश के मसलों पर आप की भाषाई जानकारी बेवकूफी भी जाहिर कर सकती है.’’
‘‘क्या तुम मुझे आसान शब्दों में समझा सकती हो? मुझ में और मोदीजी की कूटनीति में क्या समानता है?’’
‘‘तुम समझ नहीं रहे हो. किसी राज्य का मुख्यमंत्री होने और देश का प्रधानमंत्री होने में बहुत ज्यादा फर्क है. आप को दुनियाभर में आनाजाना पड़ सकता है. यह ठीक है कि आप की अपनी भाषा पर अच्छी पकड़ है, पर उस का असर विदेशी कूटनीति पर पड़ भी रहा है या नहीं, यह भी बहुत ज्यादा अहम बात है.
‘‘विदेश कूटनीति में भाषा का रोल बहुत खास होता है. वहां वह भाषणबाजी के टूल की तरह इस्तेमाल नहीं होती है, बल्कि एक देश की संस्कृति, इतिहास, और मूल्यों को भी सब के सामने रखती है,’’ अनामिका बोली.

‘‘जैसे?’’ विजय ने सवाल किया.
‘‘जैसे तुम्हें मेरी बिहारी भाषा के चंद शब्द ही बरदाश्त नहीं हो रहे थे. तुम्हें कोफ्त हो रही थी. तुम मुझे झेल रहे थे.
‘‘पर जब विदेश कूटनीति की बात होती है, तो भाषा विदेश मंत्रियों, राजदूतों और दूसरे कूटनीतिज्ञों के बीच संचार का मुख्य साधन बन जाती है.
‘‘भाषा एक देश की संस्कृति को दूसरे देश में पहुंचाने में मदद करती है, जिस से दोनों देशों के बीच समझ और सहयोग बढ़ता है. यही वजह है कि भाषा व्यापार और वाणिज्य को बढ़ावा देने में मदद करती है, क्योंकि यह व्यावसायिक संचार को आसान बनाती है.
‘‘सब से जरूरी बात तो यह है कि भाषा राजनयिक संबंधों को मजबूत बनाने में मदद करती है, क्योंकि यह दोनों देशों के बीच समझ और विश्वास को बढ़ाती है.

‘‘मैं हिंदी में किसी प्रधानमंत्री के बात करने को गलत नहीं मानती, पर उस हिंदी को अन्य भाषाओं में जब ट्रांसलेट किया जाता है और दूसरे लोगों को सुनाया जाता है, तब उस दुभाषिए ने क्या उसे सही से समझा है या कहने वाले कीमन की बातका मतलब समझा है, इस की जवाबदेही कौन तय करेगा?’’
‘‘क्या तुम किसी उदाहरण से अपनी बात समझा सकती हो?’’ विजय ने सवाल किया.
‘‘बात बहुत पुरानी है. मैं ने बीबीसी में एक लेख पढ़ा था देवीलाल के बारे में. वही देवीलाल जो हरियाणा के दबंग नेता थे और जिन्हें हरियाणा की जनता नेताऊकी उपाधि दी थी.
‘‘बात साल 1989 की है. 1 दिसंबर, 1989 को आम चुनाव के बाद नतीजे आने के बाद संयुक्त मोरचा संसदीय दल की बैठक हुई और उस बैठक में विश्वनाथ सिंह के प्रस्ताव पर चंद्रशेखर के समर्थन से चौधरी देवीलाल को संसदीय दल का नेता मान लिया गया था.


‘‘देवीलाल धन्यवाद देने के लिए खड़े जरूर हुए, लेकिन सहज भाव से उन्होंने कहा, ‘मैं सब से बुजुर्ग हूं, मुझे सबताऊकहते हैं, मुझेताऊबने रहना ही पसंद है और मैं यह पद विश्वनाथ प्रताप को सौंपता हूं.’
‘‘उस समय तरह तरह की बातें चली थीं. देवीलालकिंगबन सकते थे, परकिंगमेकरबन गए. वीपी सिंह और उन के बीच पहले ही कोई समझौता हो चुका था. हालांकि, कुछ राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक तो देवीलाल के खुद का आत्मविश्वास प्रधानमंत्री पद के लायक नहीं था.
‘‘मुझे लगता है कि अगर खुद में आत्मविश्वास की कमी में भाषा पर अच्छी पकड़ होना भी बहुत माने रखती है. मैं 2 लोगों की बातों से अपना पक्ष रखूंगी. नरेंद्र मोदी सरकार में केंद्रीय मंत्री और नामचीन संपादक पत्रकार रहे एमजे अकबर ने देवीलाल के निधन पर लिखे स्मृति लेख में लिखा था, ‘दरअसल, देवीलाल ने महसूस कर लिया था कि शहरी भारत उन्हें स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है, लिहाजा उन्होंने खुद को सब से बड़े पद की दौड़ से अलग कर लिया था.’


‘‘इसी तरह देवीलाल की राजनीतिक जीवनी लिख चुके और आधुनिक भारतीय इतिहासकार प्रोफैसर केसी यादव बताते हैं, ‘देवीलाल खुद बहुत संपन्न परिवार के थे. वे 1930 से ही राजनीति में सक्रिय हो गए थे, लेकिन उन का अंदाज ठेठ ग्रामीणों वाला ही रहा. वे दिल्ली के पावर कौरिडोर में खेतिहर मजदूरों और गरीबगुरबों की सब से बड़ी उम्मीद थे. देश का अभिजात्य तबका उन को भदेस, दबंग और लठैत नेता की तरह ही देखता रहा.’
‘‘देवीलाल की यहताऊवाली इमेज हरियाणा में तो लोगों को खूब पसंद थी, पर पूरा देश उन्हें उन के भाषाई तेवर से पसंद करता, शायद देवीलाल को भी इस में शक था. खुद उन्होंने या उन के सलाहकारों ने इसे ध्यान में रख कर ही यह फैसला लिया होगा, जो समझदारी भरा फैसला था. इस से देवीलाल कीकिंगमेकरकी इमेज हमेशा के लिए इतिहास में दर्ज हो गई.’’
‘‘तुम्हारी बात में दम है. हम 8,000 करोड़ के हवाईजहाज में तो चल सकते हैं, करोड़ों की काली गाड़ी में सड़कें नाप सकते हैं, पर जब विदेश की कूटनीति पर बात करनी हो, तो भाषा का टूल सब से खास होता है.

‘‘अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप मुंहफट नेता हैं. वे कब क्या बोल दें, कोई नहीं जान सकता. वे दुनिया के एक धड़े में मशहूर हो सकते हैं, पर उन का भाषा का लैवल भी कोई कमाल का
नहीं है. ‘‘इधर नरेंद्र मोदीविश्वगुरुहोने का दावा तो करते हैं, पर विदेश कूटनीति में फेल दिखते हैं. उन के हाल में लिए गए बहुत से फैसले लोगों के मन में शक पैदा करते हैं. पड़ोसी देशों से बिगड़ते संबंध इस का सब से बड़ा उदाहरण है.
‘‘चीन की बात करें तो साल 2020 में गलवान घाटी झड़प के बाद एलएसी पर तनाव लगातार बना रहा. व्यापार घाटा रिकौर्ड लैवल पर पहुंचा और सीमा विवाद का कोई पक्का हल नहीं निकला.
‘‘इतना ही नहीं, पाकिस्तान में तथाकथित सर्जिकल स्ट्राइक और बालाकोट के बाद भी आतंकवाद और सीमा पार घुसपैठ जारी रही. कूटनीतिक संवाद पूरी तरह ठप है. भारत नेपाल, मालदीव और बंगलादेश में चीन के बढ़ते असर को रोकने में भारत नाकाम रहा. नेपाल ने नया नक्शा जारी किया, मालदीव मेंइंडिया आउटअभियान चला, बंगलादेश में भी चीन का निवेश बढ़ा.


‘‘इजराइल के खुल कर समर्थन से अरब देशों में भारत की पारंपरिक साख को नुकसान पहुंचा है. कतर में
8 पूर्व नौसैनिकों को मौत की सजा का मामला और फिर ईरान इजराइल तनाव में साफ रुख ले पाना, विदेश नीति की दुविधा दिखाता है,’’ विजय ने अपनी बात रखी.
‘‘अब तुम ने सही रग को पकड़ा है. चुनाव के समय जनता के सामने विदेश नीति की बड़ी बड़ी बातें करने से देश की कूटनीति पर कोई फर्क नहीं पड़ता है, बल्कि हमें समस्या की जड़ में जा कर उस का पक्का हल ढूंढ़ना होता है.
‘‘पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेनाध्यक्ष असीम मुनीर ईरान, इजराइल और अमेरिका के युद्ध में कितना अहम रोल निभाते हैं, यह तो आने वाला समय बताएगा, पर उन की गुपचुप कूटनीति पर आज दुनियाभर में बात हो रही है. जो काम भारत के लोग नरेंद्र मोदी से पूरा होने की उम्मीद देख रहे थे, वे सीन में कहीं भी नहीं दिखाई दे रहे हैं,’’ अनामिका बोली.


‘‘तभी तुम आज अपनी पारंपरिक वेषभूषा और बिहारी भाषा का ज्यादा ही दिखावा कर रही थी. मुझे समझ गया है कि दिखावा करना और अमल में लाना दोनों अलग बातें हैं.
‘‘किसी प्रदेश में दिए गए चुनावी भाषण में आप कुछ भी पारंपरिक पहन कर वहां की भाषा के
2-4 वाक्य बोल कर जनता का दिल एक बार को जीत सकते हैं, पर विदेश कूटनीति में हर कदम सोचसमझ कर उठाना पड़ता है. यहीविश्वगुरुबनने का मूलमंत्र है,’’ जब विजय ने यह बात कही, तो अनामिका ने तालियां बजाईं.
‘‘चलो, आज इसी खुशी में मैं तुम्हें लिट्टीचोखा खिलाती हूं. हरी मिर्च का अचार जरूर खाना, उस का स्वाद ही अलग लैवल का होता है,’’ अनामिका ने इतना कहा और आईने के सामने अपने बाल संवारने लगी. अभी उसे अपनी ड्रैस भी बदलनी थी. टीशर्ट और जींस, जिस में वह कमाल की लगती है.         

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