Family Story : दुनिया बदल गई

Family Story. कोरोना ने भुवन रावत और उन के परिवार को चंड़ीगढ़ से दोबारा उन के पहाड़ी गांव में पहुंचा दिया. वहां भुवन ने दूध का धंधा किया जिस में उन के दोस्त भोला ने काफी मदद की. इस बीच भोला और उर्मिला नजदीक आ गए. आगे क्या हुआ?

औरत हमेशा आदमी के साथ कंधे से कंधा मिला कर चलने की कोशिश करती है. कितनी भी मुसीबतें आ जाएं वह उस की हिम्मत बनाए रहती है. वह अपने आदमी को हारते हुए देखना नहीं चाहती.

वह औरत हिम्मत, साहस और संघर्ष का प्रतीक है. वह अपने परिवार रूपी घोंसले को कभी भी टूटते हुए देखना नहीं चाहती. इस के लिए कुदरत ने उसे कला कौशल प्रदान किए हैं और इन्हीं कलाओं से वह अपने नीड़ को संवार कर रखती है.

फिर भी कुछ अलग कहानी बन ही जाती है, इसीलिए शायद कहते हैं कि कुदरत के खेल निराले होते हैं, इनसान की सोच से भी परे. शायद यही कुदरत का वह रहस्यमयी चेहरा है, जिसे इनसान सदियों से पढ़ने की कोशिश में लगा है.

पौड़ी गढ़वाल में एक छोटा सा कसबा है बैजरो. पहाड़ों के बीच और एक छोटी नदी के दोनों किनारों पर बसा सुंदर सा कसबा. उसी कसबे के थे भुवन रावत और उन की पत्नी थी उर्मिला रावत. अब भुवन रावत चंडीगढ़ में अपने परिवार के साथ रहते थे.

चंडीगढ़ में रहते उन्हें लगभग 10 साल हो गए थे. वहां एक जानीमानी कंपनी में वे जूनियर इंजीनियर थे. उन की पत्नी उर्मिला ने भी एक प्राइवेट स्कूल में नौकरी करनी शुरू कर दी थी. वह जूनियर स्कूल के बच्चों को पढ़ाती थी. दोनों पतिपपत्नी अभी 38 और 35 साल के थे और उन के 3 बच्चे थे.

भुवन रावत का परिवार साल में 1-2 बार बैजरो हो आता था, जहां भुवन के बुजुर्ग मातापिता और सगेसंबंधी रहते थे.

चंडीगढ़ में भुवन रावत का परिवार आराम से किराए के फ्लैट में रह रहा था. उन की जिंदगी में कोई खास परेशानी नहीं थी. वर हर महीने अपने बुजुर्ग मातापिता को खर्चा भी भेज देते थे, लेकिन मुसीबतें कभी भी बता कर नहीं आतीं.

ऐसे ही दबे पांव कोरोना आया. बड़ेबड़े ज्योतिष, भविष्यवक्ता और वैज्ञानिक भी इस के बारे में सटीक भविष्यवाणी और आकलन न कर सके. भ्रामक जानकारियां आती रहीं और कोरोना किसी भयंकर आदमखोर की तरह इनसानों को निगलने लगा. लकड़बग्घों के मजबूत जबड़ों की तरह नौकरियों और कामधंधों को चबाने लगा. सब तरफ आफत की मार.

आखिरकार एक दिन भुवन रावत की कंपनी वालों ने भी उन से इस्तीफा लिखवा लिया. उर्मिला को तो स्कूल वालों ने बिना किसी औपचारिकता के ही घर बैठा दिया.

देशदुनिया में कहीं भी कुछ हो सब से पहले गाज स्कूलों पर ही गिरती है. स्कूल बंद, स्कूल बंद और स्कूल बंद. शिक्षा को सरकारों ने तमाशा बना कर रख दिया है.

भुवन और उर्मिला की नौकरी गई तो फ्लैट का किराया भरना भी मुश्किल लगने लगा. जमापूंजी तिनकों की तरह उड़ने लगी. लोकडाउन की अनिश्चितता ने भुवन जैसे लोगों को कहीं का नहीं छोड़ा.

भुवन ने कुछ कंपनियों में अपना बायोडाटा भेजा था, लेकिन उन्हें जल्दी ही मालूम हो गया कि कहीं से कोई जवाब आने वाला नहीं.

कंपनियां धड़ाधड़ कर्मचारियों की छंटनी कर रही थीं. बचेखुचे कर्मचारियों से कमरतोड़ ‘वर्क फ्रोम होम’ करवाया जा रहा था. फिर ऐसे समय में उन्हें कौन नौकरी देता?

आखिरकार भुवन ने भी परिवार सहित अपना बोरिया बिस्तर बांधा और मौका देख कर बैजरो जाने की राह पकड़ी. जैसेतैसे वे सब बैजरो पहुंचे, लेकिन इस बार वहां आने में बड़ा फर्क था. जब आप के पास नौकरी होती है तो आप का रुतबा और सम्मान होता है, समाज आप पर गर्व करता है, लेकिन जैसे ही आप की नौकरी जाती है, समाज की नजर भी बदल जाती है. आप दीनहीन से हो जाते हैं.

यही भुवन के साथ हुआ. हर कोई उन से नौकरी खोने के बारे में पूछता और फिर पीठ पीछे उन का मजाक उड़ाया जाता, लेकिन भुवन को तो सब से अधिक चिंता रोजीरोटी के जुगाड़ की थी. पेट भरा हो तो फिर आदमी कुछ और सोच सकता है.

पहाड़ की खेती अब भुवन के बस की बात नहीं थी. कई सालों से उन के खेत बंजर पड़े थे. उन को खेती लायक बनाने में ही बड़ी लागत आने वाली थी. फिर बीज, खाद आदि का खर्चा और उस के बाद बारिश होने का इंतजार. पहाड़ों में सिंचाई के लिए नलकूप तो होते नहीं कि स्विच औन किया और सिंचाई शुरू. वहां की खेती तो आज भी बारिश भरोसे ही है. बारिश न हो तो फसल ही सूख जाए. बारिश समय पर हो जाए तो फसल आने का लंबा इंतजार.

भुवन ने रोजीरोटी कमाने के दूसरे औप्शन भी सोचे, लेकिन उन्हें कुछ भी सही नहीं लगा. तनाव और चिंता की लकीरें उन के चेहरे पर साफ नजर आ रहीं थीं. तब एक रात सोते समय उन की पत्नी उर्मिला ने उन से पूछा, ‘‘क्यों जी, आप इतने परेशान क्यों हैं?’’

‘‘उर्मिला, परेशान न होऊं तो क्या होऊं? अब पैसा ही नहीं बचा. सब तो लोकडाउन में चंडीगढ़ में ही स्वाह हो गया. यह भी भरोसा नहीं कि यह लोकडाउन कब खत्म होगा? हम चंडीगढ़ पहले ही छोड़ देते तो अच्छा होता. कुछ पैसे तो हमारे हाथ में होते.’’

‘‘लेकिन इस में आप की क्या गलती? किसे पता था कि लोकडाउन खत्म ही नहीं होगा. रेलों तक का तो चक्का जाम हो गया.’’

‘‘हां, वह तो है उर्मिला. गलती तो किसी की नहीं. सरकार भी उलझन में है कि लोकडाउन खत्म करे कि नहीं. जो भी हो खानेकमाने के लिए कुछ तो करना ही पड़ेगा. मैं तो चाय की दुकान ही खोल लेता लेकिन यहां तो पर्यटक ही नहीं आते. गिनेचुने औफिस हैं, वे भी बंद ही चल रहे हैं.’’

उर्मिला जानती थी कि समस्या अनिश्चित और विकराल है और भुवन परेशान हैं. उस ने भुवन को अपने आगोश में लेते हुए और उस के होंठों को चूमते हुए कहा, ‘‘तुम ज्यादा चिंता मत करो जी, सब ठीक हो जाएगा.’’

इस के बाद दोनों प्यार की दुनिया में समा गए. उर्मिला जानती थी कि दुख को हरने की सब से अच्छी दवा सैक्स ही है. इस के बाद भुवन तो गहरी नींद सो गया लेकिन उर्मिला परिवार को संबल देने के बारे में सोचने लगी और उसे तब तक नींद नहीं आई जब तक कि वह एक फैसले पर नहीं पहुंच गई.

सुबह को उठ कर उर्मिला ने अपने मायके थैलीसैंण फोन लगाया और अपने पिता से पूछा, ‘‘बाबूजी, आप की दूध, दही और पनीर की दुकान है. कुछ टिप्स बताओ, हम भी लोकडाउन खत्म होने तक यही काम करने की सोच रहे हैं.’’

फिर उर्मिला के पिता ने उसे सारी बातें अच्छे से समझा दीं. उर्मिला ने अपनी योजना भुवन से सांझा की. वे खुश हो कर बोले, ‘‘अरे वाह उर्मिला, यह काम तो बहुत सही रहेगा. इस में ज्यादा पैसा भी नहीं लगाना पड़ेगा और अलग से दुकान भी नहीं खोलनी पड़ेगी. बाहर वाले कमरे में जो गली की ओर खुलता है, वहीं से यह काम शुरू किया जा सकता है.’’

‘‘हां, लेकिन आप को एक काम करना होगा.’’ ‘‘वह क्या? बोलो?’’ ‘‘तुम को किसी दूध वाले को तलाशना होगा जो सही दाम में दूध दे दे और पैसों के लिए एकदम से तकादा न करे.’’

‘‘तुम इस की चिंता मत करो उर्मिला. मैं 2-3 ऐसे दूध वालों को जानता हूं जो सही रेट में अच्छा दूध दे देंगे और पैसों के लिए एकदम से तकादा भी नहीं करेंगे.’’

भुवन का बचपन का दोस्त था भोला जो अब दूध का काम करता था. भुवन की बात सुन कर उस ने कहा, ‘‘भुवन यार, तू चिंता मत कर. तू तो अपने बचपन का साथी है. मैं तुझे दूध भी अच्छा ला कर दूंगा और अपनी जानपहचान वालों को बता कर तेरा दही और पनीर का काम भी चलवा दूंगा. हिसाबकिताब तू सप्ताह भर बाद कर दिया करना. हमारी बचपन की दोस्ती किस दिन काम आएगी…’’

अगले दिन से ही भोला ने भुवन के घर दूध देना शुरू कर दिया. उर्मिला उस दूध से दही जमाती और पनीर तैयार करती. क्वालिटी का पूरा ध्यान रखती. धीरेधीरे यह काम चल निकला. कौन सा घर था जहां दही और पनीर की जरूरत नहीं थी… यह काम चूंकि घर और गली में हो रहा था, तो पुलिस की नजर भी नहीं पड़ती थी.

धीरेधीरे भुवन पहाड़ी रास्तों से आसपास के गांवों में दूधपनीर की सप्लाई का काम करने लगे. आसपास के गांव से वे और्डर ले आते, फिर उसी हिसाब से दूधपनीर तैयार किया जाता. इस से भोला को भी अच्छा मुनाफा होने लगा.

जब से भुवन दहीपनीर के सप्लाई के काम में बिजी हो गए थे, तब से हिसाबकिताब का जिम्मा उर्मिला ने संभाल लिया था. इस से भोला और उर्मिला सीधे एकदूसरे के संपर्क में आ गए थे. कब दोनों की आंखें चार हुईं कुछ पता ही नहीं चला.

भुवन को इस का अहसास तो हुआ लेकिन उन्होंने इसे अपना केवल वहम समझ  कर टाल दिया. उन्होंने खुद को आधुनिक और शिक्षित आदमी मान कर शक करने को केवल गंवारपन समझा. उन्होंने सोचा कि उर्मिला दहीपनीर का यह काम करेगी तो भोला से दूध लेने, दूध का और्डर देने और हिसाबकिताब करने के लिए उस से बोलना तो पड़ेगा ही.

लेकिन भुवन यह भूल गए कि आग और घी को पास पास रखेंगे तो आग एक न एक दिन तो भड़केगी ही. उर्मिला में अभी जवानी की लहर थी. उन्माद का उछाल था. भोला उर्मिला को ‘भाभी’ कहता था और वह उसे ‘देवरजी’ कह कर पुकारती थी, इसलिए देवरभाभी की ठिठोली को मंजूरी भी मिल जाती थी.

हलकीफुलकी मजाकमस्ती तो भुवन के सामने भी हो जाती थी और उस समय भुवन कुढ़ कर रह जाता था, लेकिन भोला और उर्मिला के बीच जो चल रहा था उसे तो बस उन दोनों के दिल ही जानते थे.

फिर एक दिन… भुवन किसी काम से रामनगर गए हुए थे. रामनगर जाने का सीधा सा मतलब ही यह था कि बिलकुल सुबह निकलना और फिर देर शाम या अगले दिन वापस आना.

भोला जब दूध देने आया तो उसे भुवन दिखाई नहीं दिया. ‘‘भाभी, आज भुवन कहीं नहीं दिखाई दे रहा.’’ ‘‘वे रामनगर गए हैं देवरजी.’’ ‘‘बच्चे भी दिखाई नहीं दे रहे.’’ ‘‘अरे देवरजी, कल थैलीसैंण से उन का मामा आया था. बच्चे नानी के घर जाने की जिद करने लगे तो उन का मामा उन्हें कुछ दिन के लिए अपने साथ ले गया.’’

शिकारी का मुआयना पूरा हो चुका था. भोला ने कहा, ‘‘तो फिर अकेली हो?’’ ‘‘अकेली कहां हूं देवरजी, तुम हो तो,’’ उर्मिला ने मुसकराते हुए मस्ती भरी हुई आंखों से कहा.

भोला एकदम से कुछ नहीं कह सका. उस ने मुसकरा कर एक नजर उर्मिला पर डाली, फिर नजरें झुका लीं. उर्मिला समझ गई कि भोला कहने में हिचकिचा रहा है. तब वह बोली, ‘‘देवरजी, उन से कोई काम था क्या?’’

भोला ने बहाना बनाते हुए कहा, ‘‘हां भाभी, आज कुछ पैसों की जरूरत थी.’’ ‘‘तो खुल कर कहो न कि कुछ पैसे चाहिए. इतना हिचकिचा क्यों रहे हो, पैसे ही तो मांग रहे हो कुछ और थोड़े ही मांग रहे हो.’’

‘‘हां भाभी, मिल जाती… मतलब पैसे मिल जाते तो…’’ उर्मिला यह सुन कर मुसकरा पड़ी और भोला की चाहत को समझ  गई. उस ने कहा, ‘‘आओ देवरजी, पैसे ले लो.’’ ‘‘कहां?’’ भोला ने पूछा.

‘‘अरे देवरजी, पैसे यहां खुले में थोड़े ही रखें हैं. वे तो अंदर कोठरी में हैं. लेने हैं तो आ जाओ,’’ उर्मिला ने कोठरी की ओर जाते हुए कहा.

भोला उर्मिला के पीछेपीछे कोठरी में पहुंच गया. कोठरी में अंधेरा था. उर्मिला ने उस के ठीक सामने खड़े हो कर नशीले अंदाज में पूछा, ‘‘कितने चाहिए, देवरजी?’’ ‘‘जितने तुम दे सको,’’ भोला ने मस्ती के मूड में कहा.

‘‘फिर चाबी से ताला खोलो और गिनगिन कर ले लो,’’ उर्मिला ने अपना सिर भोला की छाती पर रखते हुए कहा.

भुवन को जल्दी ही पता चल गया कि उन के घर में बहुतकुछ पक रहा है. भोला और उर्मिला सभी सीमाएं लांघ चुके हैं. भुवन को एक बार को इस बात का पछतावा हुआ कि उन्होंने समय पर दखलअंदाजी न कर के बड़ी गलती कर दी, लेकिन उन्होंने बेवफाई की आग में जलने से बेहतर दूसरा रास्ता अपनाया. जो बेवफाई और धोखे का दर्द उन्हें मिला है, वैसा ही दर्द और धोखे का मजा वे उन्हें भी चखाना चाहते थे. लेकिन कैसे?

भुवन जानते थे कि भोला की शादी माला से हुई है और माला तो उन की बचपन की साथी थी. वह मासों गांव की रहने वाली थी और मासों भुवन का ननिहाल था. वहां उन्होंने बचपन के बहुत दिन गुजारे थे. बचपन में वे माला के साथ खूब खेलेकूदे थे. वे बचपन के अपने प्यार को अभी तक नहीं भूले थे और बचपन का वह प्यार अचानक से हिलोरें मारने लगा था.

बिना देरी किए भुवन ने कुछ ही दिनों में भोला के घर तक पहुंच बना ली. एक दिन जब भोला दूध बांटने के लिए निकला हुआ था तो भुवन किसी बहाने से उस के घर पहुंच गए. आज माला से उन की अकेले में शादी के बाद पहली मुलाकात थी. माला ने उन की खूब आवभगत की और उसे बिना चाय पिलाए न जाने दिया.

इस मुलाकात से भुवन समझ  गए कि माला के अंदर बचपन के प्रेम की पुरानी आग फिर सुलग उठी है. वर इस मौके को अब कैसे हाथ से जाने दें? उन्होंने सुलगती आग को भड़काने के लिए खूब हवा दी. उन की उम्मीद से पहले ही आग धधक उठी. कहते हैं कि औरत प्रेम में अंधी और आदमी पागल हो जाता है. भोला उर्मिला के प्यार में इतना बावला हो गया था कि उसे यही पता नहीं चला कि उस के घर में भुवन ने सेंधमारी कर दी है.

तब एक दिन भोला के घर में, ‘‘भुवन, तुम तो मुझे  बचपन में ही छोड़ कर चले गए थे. कभी तो मुझे  याद कर लेते.’’

‘‘माला, ऐसी बात नहीं है. बस हालात ही कुछ ऐसे बन गए थे. मैं तो हमेशा तुम्हारी यादों में तड़पता रहा. कहो तो दिल चीर कर दिखाऊं,’’ भुवन ने शातिराना पासा फेंका.

‘‘झूठे कहीं के,’’ माला ने भुवन के गाल पर चिकोटी काटते हुए कहा. फिर वह ऐसे ही खिलखिला कर हंसी जैसे ऐसी शरारत पर वह बचपन में हंसा करती थी. ‘‘झूठा मत कहो, माला, नहीं तो सच का ठप्पा ही लगा दूंगा.’’

‘‘ओहो, खुद को बड़े बहादुर बनते हो. जरा हिम्मत है तो लगा कर दिखाओ अपना सच का ठप्पा,’’ भुवन को उकसाते और मुसकराते हुए माला ने कहा.

इतना कह कर माला अपना दुपट्टा उतार कर नशीली आंखों से मुसकराते और भुवन को ललचाते हुए पलंग पर हाथ टिका कर और पैर लटका कर बैठ गई.

फिर बिना किसी देरी के भुवन ने माला के पूरे बदन को अपने प्रेम की सच्चाई के ठप्पे से तरबतर कर दिया.

जैसे कि हर मजे में सजा छिपी होती है, भुवन और भोला के संबंधों में जबरदस्त खटास पैदा हो गई. इस के बाद भी वे अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहे थे. न ही उर्मिला भोला को छोड़ने को तैयार थी और न ही माला भुवन को.

इश्क चीज ही ऐसी होती है जिस का जितना विरोध किया जाए वह उतना ही भड़कता है. इस के सामने बड़ेबड़े परिवार तबाह हो गए, लेकिन इश्क न झुका. तूफान आता है तबाही लाता है, मगर इश्क खुद तबाही को न्योता देता है.

मामला पंचायत तक पहुंचा तो इश्क और मचला, और वफादार हुआ, और मजबूत हुआ, और बेशर्म हुआ. उर्मिला ने भोला के साथ रहने की कसम खाई तो माला किसी भी सूरत में भुवन का साथ छोड़ने को तैयार नहीं. बच्चों की उम्र देखते हुए पंचायत ने उन्हें मांओं के सुपुर्द किया. बच्चे भी ऐसा ही चाहते थे. बिना कोर्टकचहरी के सारे फैसले हो गए, लेकिन भविष्य में कोई कानूनी अड़चन न आए, इसलिए वकील कर के इन संबंधों को कानूनी मंजूरी दिलाई गई.

कुछ ही दिनों के बाद लोकडाउन हटा तो दुनिया बदल चुकी थी. भोला के साथ उर्मिला तो भुवन के साथ माला थी. भुवन को फिर से उसी कंपनी में नौकरी मिल गई. भुवन माला और उस के बच्चों को ले कर चंडीगढ़ के लिए बस में सवार हो गया.

उन को ले कर लोग आज भी चर्चा करते हैं कि लोकडाउन ने सच मैं दुनिया बदल दी. आदमी सोचता कुछ है और होता कुछ है तो क्या आदमी सच में हालात का गुलाम है?

Hindi Story: चाहत

Hindi Story: जमीन के लालच में चाहत के पति और पिता को उस के अपनों ने ही मार डाला. गोद में रह गया बेटा उदय, पर चाहत ने हिम्मत नहीं हारी और उदय को प्रौफेसर बना दिया. फिर वह अपने मायके लौटी. आगे क्या हुआ?

खे से लौट कर प्रेम शंकर ने अपने गले से गमछा हटाया और चबूतरे पर बैठ गए. बीड़ी सुलगा कर फूंक से धुआं हवा में उछाला. माथे के पसीने की बूंदों को पोंछते हुए और थकी आवाज में पुकार लगाई, ‘‘चाहत की अम्मांअभी तक मेहमान गांव से नहीं लौटे हैं क्या?’’ सवाल पूछ कर वे बेचैनी से चारों तरफ टहलने लगे. चाहत की मां राजौरी हड़बड़ाती हुई बाहर निकल आई. चाहत भी पीछे से अपने बेटे उदय को गोद में ले कर गई. ‘‘इतनी जल्दी आप गए? कुछ हुआ है क्या? कभी सोहन के बारे में नहीं पूछतेआज?’’ राजौरी की सांसें फूलने लगीं. प्रेम शंकर उस का हाथ पकड़ कर बोले, ‘‘अरे, शांत हो जा राजौरी. मैं ने बस इतना पूछ लिया कि शाम हो गई और अभी तक नहीं लौटे.’’ राजौरी की घबराहट कुछ कम हुई, फिर अपने पति के लिए पानी लाने चली गई.

राजौरी पानी का लोटा और कटोरी में थोड़ा सा गुड़ ले कर आई और प्रेम शंकर को पकड़ाया. वे उठ कर आंगन में नली के पास जा कर कुल्ला करने लगे, फिर चबूतरे पर बैठ गए. गुड़ खा कर पानी पिया. थोड़ी तरावट महसूस हुई. आज मौसम में खुश्की थी. नीम और पकड़ी के पेड़ की पत्तियां भी हिलने से मना कर रही थीं. ‘‘चाहत की मां, हम आते हैं दालान से घूम कर,’’ प्रेम शंकर की आवाज में सुस्ती थी.
‘‘कोई बात है क्या चाहत के बापू? कुछ तो है जो हम सब से छिपा रहे हैं?’’
प्रेम शंकर ने अपनी गरदन को एक ?ाटका दिया और हौले से मुसकरा कर बोले, ‘‘कुछ नहीं है. उमस के मारे दम निकल रहा है और धान रोपनी का समय हो रहा है. बहुत काम है, इसी मारे चिंता लगी हुई है.’’
प्रेम शंकर असल बात राजौरी को बता नहीं पाए. दरअसल, जब वे रास्ते में सुरेश से मिल कर रहे थे, तो एक बात पता चली थी उन्हें. मारे घबराहट के उन को पसीना आने लगा था.

इस गांव की रीत है कि जायदाद अपने बेटे को ही देनी होती है. अगर बेटा नहीं है तो भतीजे को. बेटियों को जायदाद का एक हिस्सा भी नहीं दिया जा सकता है. प्रेम शंकर को एक ही बेटी है चाहत. वह छोटी थी तब प्रेम शंकर सोचते थे कि खेतखलिहान भतीजे को दे देंगे, पर बाद के दिनों में भाईभतीजे के रंगढंग ठीक नहीं लगने से उन का मन बदल गया था. चाहत की शादी राजौरी की बहन की ननद के बेटे रोहन से हुई थी, जिस के सिर से मांबाप का साया उठ गया था. हालांकि, गांव में अफवाह है कि चाहत और सोहन के बीच प्रेम था. बातों को दबाने के लिए उन दोनों की शादी करा दी गई. प्रेम शंकर ने सोहन और चाहत के नाम सारी जायदाद लिख दी. पूरे कुनबे में यह बात आग की तरह फैल गई. सब तिलमिलाहट से भर गए. सब के सब प्रेम शंकर और उन के परिवार से कट कर रहने लगे, पर प्रेम शंकर और उन के दामाद सोहन को गांव के लोग बहुत प्यार और इज्जत देते थे.

आज जो बात सुरेश ने बताई, उस के लिए प्रेम शंकर कभी सोच भी नहीं सकते थे. इतनी नीचता पर कैसे उतर सकते थे मथुरा भैया और भतीजे. ‘‘प्रेम शंकर, जरा बच कर रहना अपने भाईभतीजे से. उन लोगों ने प्लानिंग की है कि सोहन को जान से मार देंगे और उदय को भी.’’इतना सुनते ही प्रेम शंकर अचानक खांसने लगे थे. उन की छाती में कुछ अटका हुआ महसूस हो रहा था. उन की बेचैनी बढ़ गई थी. आखिर वे करें तो क्या करें? क्या प्रेम शंकर को पुलिस के पास जाना चाहिए? क्या यह बात सच हो सकती है? उन्होंने तय किया कि कल सुबह वे थाने में जा कर शिकायत दर्ज करा आएंगे. अपनी खुशियों को इस तरह दूसरों की हथेलियों में बंद नहीं होने देंगे. अजीब सा खालीपन चारों तरफ पसर गया था. परिंदे भी अपने अपने घोंसलों की ओर जा रहे थे, पर प्रेम शंकर को वापस घर जाने का मन नहीं हुआ.

हलका अंधेरा गहरा आया था. प्रेम शंकर धीमे कदमों से घर की ओर कर खेत की ओर चले गए. जिंदगी किस करवट लेगी, इस सोच ने उन का मन उथलपुथल से भर दिया. एक ऐसा समय भी था, जब प्रेम शंकर सिंह और उन के परिवार की जिंदगी आराम से कट रही थी. एक तरह का आनंद था उन के घर के चारों ओर. चाहत की नौकरी शिक्षामित्र में लग गई थी और सोहन भी पास के गांव में सरकारी टीचर हो गया था. उदय के पैदा होने के बाद तो प्रेम शंकर के घर में हर दिन उत्सव जैसा माहौल रहता था. फिलहाल प्रेम शंकर टहलतेटहलते कुछ दूर आगे अपने खेत के आसपास निकल आए. अचानक उन्हें कुछ आवाज सुनाई दी. पीछे मुड़ कर देखा. उन की आंखों के आगे अंधेरा छा गया. दुश्मन के रूप में उन के भाईभतीजे हाथ में गंडासा लिए खड़े थे. अभी प्रेम शंकर संभल पाते कि उन पर हमला शुरू हो गया. उन के मुंह को अपने हाथों से दबाए उन का एक भतीजा कह रहा था, ‘‘बहुत मर्दानगी छाई है . अब सब भुला जाओगे. हमारे रहते तू सोहन को मालिक बना देगा, ले अब भुगत.’’

गंडासे से प्रेम शंकर का सिर काट कर उन्हीं के सगे भाई नेजय भवानीके नारे से जीत का जश्न मनाया.
अचानक राजौरी का दिल जोर से धड़का. कुछ अपशकुन होने का सोच कर उस की आंखों में आंसू गए. दिल रहरह कर धड़क रहा था. पैर भी लड़खड़ा रहे थे. अपने अंदर कुछ रेंगता हुआ महसूस हुआ. मन बेचैन हुआ तो उदय को ले कर पड़ोस में चली गई. चाहत स्कूल की कौपियां जांचने बैठ गई. उस के चेहरे पर संतोष की चमक थी. तभी सोहन की आवाज सुनाई दी, ‘‘चाहत, एक लोटा पानी देना.’’ पानी और गुड़ लिए जब चाहत बाहर आई तो सोहन के हाथों को पकड़े हुए चाचा और भैया लोग को देखा. एक अनजाने डर से उस का मन कांप गया. उन के हाथों में कुल्हाड़ी और गंडासा था. चाहत दौड़ कर चाचा के पैरों से लिपट गई, ‘‘सोहन को कुछ मत करिए मथुरा चाचाजी.’’ ‘‘यहां से हट चाहत. आज प्रेम के खानदान को खत्म कर देंगे. बहुते गरमी चढ़ी है शरीर में.’’


‘‘चाचाजी, हम आप की गोद में खेले हैं. हमारा सुहाग मत उजाडि़ए. रजनीश भैया, धीरज भैया, छोड़ दीजिए सोहन को. हम सब जायदाद आप के नाम कर देंगे. इस गांव से हम सब बाहर चले जाएंगे. सोहन को कुछ मत करिए चाचाजी.’’ चाहत की दर्दभरी आवाज को अनदेखा कर धीरज ने कहा, ‘‘चल हट, ज्यादा अंगरेजी मत ?ाड़. आज हमारी आंखों में खून उतर आया है.’’ ‘‘अरी अम्मां, कहां गई रेजल्दी आओ अम्मां, वरना सोहन को ये लोग मार देंगे. अरे गांव के लोग, आओ बचाओ इन को. सब कहां चले गए हो? कोई तो इन कसाइयों सब को रोको,’’ चाहत की कातर आवाज चारों तरफ गूंजने लगी.
तभी कुल्हाड़ी और गंडासे से सोहन के पूरे शरीर पर वार होने लगे. चाहत की आंखों के सामने सोहन मर रहा था. उस की दर्दभरी आवाज से पूरा गांव रो रहा था, पर दुश्मन की आंखों पर जायदाद की पट्टी बंधी थी. राजौरी उदय को लिए घर की ओर रही थी कि तभी मुसहर टोले के परदेसी ने उदय को उन की गोद से ले लिया और रोते हुए बोला, ‘‘जल्दी घर जाओ मालकिन. प्रेम मालिक और सोहन बबुआ की जान…’’

राजौरी वहीं से चिल्लाते हुए घर की तरफ भागी आई, ‘‘चाहत के बाबू, जल्दी आओहमारा घर उजड़ गया है…’’ घर के पास कर राजौरी की आंखें फटी की फटी रह गईं. सोहन का शरीर कई टुकड़ों में इधरउधर फैला हुआ था. पास ही चाहत बेहोश पड़ी हुई थी. दुश्मन वहां से खूनी खेल खेल कर चले गए थे.
राजौरी प्रेम शंकर की खोज में खेत की तरफ गई. देखा गांव के लोग प्रेम शंकर की लाश लिए चले रहे
थे. इस सदमे से राजौरी का वहीं दम निकल गया. चाहत को गांव की औरतें पानी का छींटा दे कर होश में लाने की कोशिश कर रही थीं. होश आते ही वहसोहनसोहनचिल्लाने लगती थी और फिर बेहोश हो जाती थी. रात को पुलिस की गाडि़यां आईं. गांव के लोगों आंखों देखा सब बयान कर दिए. चाहत का भी बयान लिया गया. 3 लाशों का एकसाथ दाह संस्कार किया गया. श्मशान घाट पर धूंधूं कर चिताएं जल रही थीं. तेज हवा से लपटें कांप उठती थीं. पूरे गांव में मातमी सन्नाटा पसरा हुआ था. सब एकदूसरे से आंखें चुरा रहे थे. पुलिस मथुरा और उस के बेटों को खोजने में लगी हुई थी.

उस रात खौफ से पूरा गांव थर्रा गया था. चाहत को जब होश आया तब उदय का खयाल आया. मुसहर टोले के विशंभर ने बताया कि परदेसी बाबा उस को गांव से बाहर ले गए हैं. सुनने में आया है कि उदय बाबू को भी मारने की प्लानिंग है. ‘‘मु? ले चलो उदय के पास. पता नहीं वह कैसे रात में रहा होगा. एक दिन भी वह मेरे बगैर नहीं रहा है,’’ रोते हुए चाहत ने कहा. ‘‘उदय बाबू ठीक हैं बहन. परदेसी बाबा से बात हुई है. कल सुबह हम उदय को ले कर आएंगे.’चाहत के पास अब उदय बचा था. हिम्मत से काम लेना होगा उसे. उस ने सोचा कि गांव में रह कर इंसाफ की गुहार नहीं लगा सकती है और उदय को भी खतरे में नहीं डाल सकती है. रात के 10 बजे जब गांव के सारे लोग सो रहे थे, तब चाहत विशंभर के साथ अपनी मौसी के गांव चली आई. सुबह विशंभर उदय को परदेसी से ले कर चाहत के पास आया. आंसुओं पर बंधा हुआ बांध अचानक से टूट गया. उदय को गोद में ले कर चाहत फूटफूट कर रोने लगी.

उस का मन किया कि उदय को अपने सीने में छिपा ले. जिसे कोई देख पाए, जिसे कोई छू पाए.
मथुरा और उस के बेटे को पुलिस खोज नहीं पा रही थी. तब कोर्ट के आदेश पर उस के घर का कुर्की जब्ती का वारंट आया. एक दिन के बाद मथुरा और उस के बेटों ने पुलिस के हवाले कर दिया. ताउम्र कैद की सजा हुई. चाहत गांव लौट कर नहीं आई. उस ने अपना घर परदेसी बाबा के नाम कर दिया. खेतखलिहान उन लोगों को बेच दिया, जिन्होंने पुलिस के सामने मथुरा और उस के बेटों के खिलाफ गवाही
दी थी. दिन गुजरने लगे, महीने बीतने लगे. दुखों का मौसम बहुत लंबा होता है. इन बीते सालों में चाहत ज्यादातर चुप ही रहती थी. आंखें सूनी रहती थीं. वह कहीं भी आनाजाना छोड़ चुकी थी. उस का सपना बेटे को ऊंचाई पर देखना था. उदय 7 साल का हो गया था. उस पर वक्त के पहले ही गंभीरता गई थी. उस का सारा समय मां के साथ और पढ़ाई में गुजरता था.


एक दिन उदय ने पूछा, ‘‘मां, मेरे पिताजी कहां हैं? सभी के पिता उन के साथ रहते हैं, मेरे पिता तो कभी मु? देखने भी नहीं आते हैं.’’ चाहत बेबसी से मुसकराई. कुरसी से उठ कर उदय को सीने से लगा कर बोली, ‘‘तुम्हारे पिता अब इस दुनिया में नहीं हैं बेटा. उन की मौत हो गई है.’’ ‘‘कैसे मौत हो गई मां?’’ उदय ने हैरान हो कर पूछा. ‘‘इस बारे में मैं कभी बाद में बताऊंगी, तब जब तुम बड़े और सम?ाने लायक हो जाओगे,’’ कहते हुए चाहत ने अपनी मुट्ठियों को कस कर बांध लिया. चाहत भरसक कोशिश करती कि उदय को कोई तकलीफ हो. वह मां और पिता दोनों की भूमिका निभा रही थी. कभी भी उदय के सामने उदास नहीं रहती और कभी गुस्सा होती. एक दिन स्कूल की जल्दी छुट्टी हो गई. उदय घर आया तो मां को एक साड़ी को हाथों से सहलाते हुए देखा. उस को देख कर मां बक्से में उस साड़ी को रखने लगी.
‘‘मां, यह क्या रख रही हो? मु? दिखाओ,’’ उदय जिज्ञासा से पूछा.

‘‘कुछ नहीं रख रही. जाओ हाथमुंह धो लो. खाना साथ खाएंगे,’’ कहते हुए चाहत ने जल्दी से उस साड़ी को बक्से में रख दिया. ‘‘बताओ मां, क्या छिपा रही हो?’’ उदय ने जिद पकड़ ली. ‘‘अभी नहीं बेटा, अभी तुम सम?ाने लायक नहीं हो. बाद में इस बारे में बताऊंगी,’’ चाहत अपने सूखे होंठों पर जीभ फेर कर रसोईघर में चली गई. दिन बीतते रहे. उदय ने 10वीं के बोर्ड इम्तिहान में जिले में टौप किया था. पूरे गांव में उत्सव का माहौल था. चाहत सुबह से ही मिलनेमिलाने में बिजी थी. सभी की जबान पर एक ही बात थी कि बिना बाप का बेटा है, इस को हर क्षेत्र में कामयाबी मिले. रात के 10 बज रहे थे. उदय की नींद खुली. मां को अपने पलंग पर देख कर वह उसे खोजने लगा. स्टोररूम का दरवाजा खुला हुआ था. अंदर गया तो देखा कि मां साड़ी को गोद में ले कर बैठी हुई है. आहट सुन कर चाहत ने ?ाट से वह साड़ी बक्से में रख दी. ‘‘मां , इस साड़ी में ऐसी क्या बात हैआप जबतब इस को ले कर चूमती रहती हैं…’’


‘‘अभी नहीं बता सकती. बाद में बताऊंगी. जब मु? लगेगा कि तुम को बताना चाहिए,’’ चाहत की बातों में
इतनी मजबूती थी कि उदय कुछ नहीं पूछ सका. इस के बाद भी उदय ने कई बार अपनी मां को उस साड़ी के साथ तड़पते देखा, लेकिन फिर कुछ पूछने की हिम्मत नहीं कर सका. उदय को ऊंची तालीम हासिल करने के लिए चाहत ने उस को दिल्ली के एक होस्टल में भेज दिया. समय पंख लगा कर उड़ रहा था. उदय हरेक इम्तिहान में टौप करता गया. हर बार चाहत का सिर गर्व से ऊपर उठ जाता था. अब वह फिर से मुसकराने लगी थी. गांव के गरीब बच्चों और अनपढ़ औरतों को पढ़ाना उस का मकसद हो गया था.
आखिरकार ख्वाबों को मंजिल मिल गई. चाहत की इच्छा और उदय की मेहनत रंग लाई. उदय बनारस
हिंदू यूनिवर्सिटी में प्रोफैसर बन गया. एक चमकीली उम्मीद चाहत के आंचल में समा गई. वह सुनहरे भविष्य घोंसला बनाने के लिए फिर से उम्मीदों के तिनके जुटाने लगी.

उस के पैरों में पंख लग गए. अब तक का रोका हुआ बांध ढहने लगा. चाहत उदय के कंधे पर सिर रख कर फूट पड़ी, ‘‘आज मेरा जीवन सफल हो गया उदय. तुम्हारे नानानानी और पिता जहां भी होंगे, खुशी का जश्न मना रहे होंगे.’’ रात में वह साड़ी निकाल कर चाहत उदय के पास बैठ गई, ‘‘जो जिज्ञासा तुम्हारे अंदर बचपन से है, अब उस साड़ी और तुम्हारे पिता के बारे में बताने का समय गया है उदय.’’ चाहत ने गहरी सांस ली, ‘‘तुम्हारे पिता, नाना और नानी को उन के अपनों ने ही मारा, जायदाद के लिए. आज भी मैं उस जायदाद को कोसती हूं, जिस के चलते हमारा पूरा परिवार बेमौत मारा गया.’’ बीते हुए दिनों को बताते हुए चाहत उसी दुख से गुजर रही थी, जिसे याद कर के वह सालों से रोती रही है. कहा जाता है कि दुख बांटने से दुख कम होता हैपता नहीं कितना कम हुआ. पर चाहत के चेहरे पर शांति छा गई थी.
उदय सन्नाटे में था. अचानक वह चौंक कर उठा और बोला, ‘‘मां, चलो नाना के गांव. मैं देखना चाहता हूं उस गांव को मेरे मेरे पिता की मौत हुई थी.’’


दूसरे दिन चाहत उदय को ले कर उस गांव में गई, जहां उस का सारा संसार उजड़ गया था. चाहत और उदय के साथ गाड़ी में उदय का मामा विशंभर भी बैठा था. उस की आंखें बारबार नम हो जा रही थीं.
चाहत गाड़ी से उतरी. परदेसी का बेटा उस को देखते ही खुशी से चिल्ला उठा, ‘‘हम सब की चाहत बहन गई.’’ आवाज सुन कर गांव के लोग इकट्ठा होने लगे. विशंभर के साथ उदय भी गाड़ी से उतरा.
उदय ने सब को प्रणाम किया. विशंभर ने सब को बताया कि यह चाहत का बेटा उदय है और बनारस के कालेज में पढ़ाता है. सब की जबान पर एक ही बात थी, ‘हम सब के उदय बबुआ गए हमारे गांव…’
चाहत के घाव पर जैसे कोई मरहम लग रहा था. उसी पल महसूस हुआ, जैसे हवा में एक खुशबू बिखर रही हैसोहन के देह की खुशबू. ‘‘कुरसी लाओ जरा, उदय बबुआ के बैठने के खातिर,’’ विशंभर उल्लास से बोला.


तभी परदेसी की पत्नी बनवारी हांफते हुए आई. उस के हाथों में गुड़ और पानी का लोटा देख कर चाहत को अपना वही दिन याद गया, जब सोहन को पानी देने गई थी और अपनी आंखों से दर्दनाक मौत देखी थी. धुंधली नजर से उस ने बनवारी काकी को देखा और उन के गले लग कर रोने लगी. ‘‘काकी का पैर छुओ उदय. परदेसी काका अगर नहीं होते तो आज तुम जिंदा नहीं रहते,’’ चाहत ने कहा. उदय पैर छूने के लिए ?ाका, तभी बनवारी काकी ने कांपते हाथों से उसे गले लगा लिया. ‘‘बबुआ, तेरी माई के साथ बहुत बुरा हुआ. हम ने अपनी आंखों से सब देखा, पर कुछ कर नहीं पाई. आज भी वही हालात हैं. कुछ नहीं बदला बीते सालों में. बेटियों का हिस्सा आज भी भाईभतीजा के पास जा रहा है,’’ बनवारी काकी ने कहा. उदय कुछ देर के लिए वहीं चबूतरे पर बैठ गया और हाथ जोड़ कर बोला, ‘‘मु? कुरसी नहीं चाहिए और किसी तरह का स्वागतसत्कार. यह मेरे नाना का गांव है. आप सब मेरे अपने हैं.

मेरी एक छोटी सी चाहत है. आप चाहें तो इसे आशीर्वाद के रूप में मु? दे सकते हैंक्या आप लोग दीजिएगा?’’ उदय के बोलते ही पूरा गांव चिल्ला उठा, ‘मांगो बच्चा, हम सब से जो बन पड़ेगा, दे देंगे.’‘‘आज के बाद इस गांव की बेटियों को भी उन के हिस्से का हक देना होगा. जो मेरी मां के साथ हुआ, वह अब किसी बेटी के साथ हो. ‘‘आज बरसों बाद मेरी मां उसी साड़ी को पहन कर आई है, जिस साड़ी को पहने हुए अपने पति की लाश को गले लगाया था, चूमा था. देखिए, खून के छींटे अभी भी साड़ी पर लगे हुए हैं. क्या आप सब फिर ऐसी जिंदगी अपनी बेटियों के नाम लिखना चाहते हैं?’’ कहते हुए उदय की आंखों में आंसुओं का मानो समंदर उतर आया. इस माफी को किसी में ठुकराने की हिम्मत नहीं हुई. चाहत को लगा कोई अनजाना उस के पीछे खड़ा मुसकरा रहा है.                                 

कात्यायनी सिंह

  

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